मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

बुधवार, 31 अगस्त 2011

गणेश चतुर्थी या कलंकी चौथ


गणेश चतुर्थी को कलंकी भी कहते हैं। इस चतुर्थी को चाँद देखना वर्जित है।

इस वर्ष गणेश चतुर्थी (1 सितम्बर) के दिन चन्द्रास्त रात्रि 9-15 बजे हैं। इस समय तक चन्द्रदर्शन निषिद्ध है।

यदि भूल से भी चौथ का चन्द्रमा दिख जाये तो 'श्रीमद् भागवत' के 10 वें स्कन्ध के 56-57वें अध्याय में दी गयी 'स्यमंतक मणि की चोरी'की कथा का आदरपूर्वक श्रवण करना चाहिए। भाद्रपद शुक्ल तृतिया या पंचमी के चन्द्रमा का दर्शन करना चाहिए, इससे चौथ को दर्शन हो गये हों तो उसका ज्यादा खतरा नहीं होगा।

अनिच्छा से चन्द्रदर्शन हो जाय तो......

निम्न मंत्र से पवित्र किया हुआ जल पीना चाहिए। मंत्र का 21, 54 या 108 बार जप करें। मंत्र इस प्रकार हैः

सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः।

सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः।।

'सुन्दर, सलोने कुमार ! इस मणि के लिए सिंह ने प्रसेन को मारा है और जाम्बवान ने उस सिंह का संहार किया है, अतः तुम रोओ मत। अब इस स्यमंतक मणि पर तुम्हारा ही अधिकार है।'

(ब्रह्मवैवर्त पुराण, अध्यायः78)

चौथ के चन्द्रदर्शन से कलंक लगता है। इस मंत्र प्रयोग अथवा उपर्युक्त पाठ से उसका प्रभाव कम हो जाता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2010, पृष्ठ संख्या 27, अंक 212

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मंगलवार, 30 अगस्त 2011

लापरवाही नहीं तत्परता ! (पूज्य बापू जी की सत्संग सुधा)


साधक के जीवन में, मनुष्यमात्र के जीवन में अपने लक्ष्य की स्मृति और तत्परता होनी ही चाहिए। संयम और तत्परता सफलता की कुंजी है, लापरवाही और संयम का अनादर विनाश का कारण है। जिस काम को करें, उसे ईश्वर का कार्य मानकर साधना का अंग बना लें। उस काम में से ही ईश्वर की मस्ती का आनंद आने लग जायेगा।

तत्परता व सजगता से काम करने वाला व्यक्ति कभी विफल नहीं होता। आलस्य और प्रमाद मनुष्य की योग्यताओं के शत्रु हैं। लापरवाही सारी योग्यताओं को खा जाती है, इसलिए अपनी योग्यता विकसित करने के लिए भी तत्परता से कार्य करना चाहिए। जिसकी कम समय में सुंदर, सुचारू रूप से व अधिक से अधिक कार्य करने की कला विकसित है, वह आध्यात्मिक जगत में जाता है तो वहाँ भी सफल हो जायेगा और लौकिक जगत में भी, परंतु समय बर्बाद करने वाला, टालमटोल करने वाला तो व्यवहार में भी विफल रहता है और परमार्थ में तो सफल हो ही नहीं सकता।

लापरवाह, पलायनवादी लोगों को सुख-सुविधा और भजन का स्थान भी मिल जाय तो भी उनकी कार्य करने में तत्परता नहीं होती, ईश्वर में, जप में प्रीति नहीं होती। ऐसे व्यक्तियों को ब्रह्माजी भी आकर सुखी करना चाहें तो नहीं कर सकते। ऐसे व्यक्ति दुःखी ही रहेंगे। कभी-कभी दैवयोग से उन्हें सुख मिलेगा तो आसक्त हो जायेंगे और दुःख मिलेगा तो बोलेंगेः 'क्या करें, जमाना ऐसा है !' ऐसा कहकर वे फरियाद ही करेंगे।

काम-क्रोध तो मनुष्य के वैरी हैं ही परंतु लापरवाही, आलस्य, प्रमाद – ये मनुष्य की योग्यता के वैरी हैं, इसलिए अपने कार्य में तत्पर होना चाहिए। रावण, सिकंदर, हिरण्यकशिपु, हिटलर – ये तत्पर तो थे लेकिन अहं को पोसने में, विषय-विकारों को पाने में विनाश की तरफ चले गये। आत्मा परमात्मा को पाने का उद्देश्य बना के धर्म-मर्यादा के अनुरूप तत्परता होनी चाहिए। कई लोग तत्पर भी पाये जाते हैं पर भोग-विलास और अहं पोसने में लगते हैं तो विनाश की तरफ जाते हैं। तत्परता अविनाशी की तरफ होनी चाहिए। जो कर्मयोग में तत्पर नहीं है वह भक्तियोग और ज्ञान योग में तत्पर नहीं होगा। जप करेगा तो व्यग्रचित्त होकर बंदरछाप जप करेगा, इससे उसका फल क्षीण हो जायेगा। अतः जो भी काम करो तत्परता से करो। भोजन करो तो चबा-चबाकर करो। इधर-उधर देखते-देखते, बातें करते हुए, जल्दी-जल्दी, लापरवाही से भोजन करते हैं तो भोजन पचता नहीं, आँते खराब होती हैं, तबीयत खराब होती है। यात्रा करनी है और देर से गये, गाड़ी छूट गयी तो यह लापरवाही है। रोटी बनाते बनाते रोटी पर काले दाग कर दिये, जला दी तो लापरवाह है, मूर्ख है। सब्जी बना रहा है तो सब्जी को छौंक लगाकर इतना सेंका कि उसके बहुत सारे विटामिन नष्ट हो गये या नमक मिर्ची ज्यादा डाल दी अथवा तो फीकी बना दी। ऐसे लोग लापरवाह होते हैं। चावल ठीक से साफ नहीं किये, खाते समय कंकड़ आते हैं तो साफ करने वाला लापरवाह है, मूर्ख है। चाहे कितना भी बड़ा सेठ हो, साहब हो... साहब है, वेतन लेता है इसलिए उसकी जिम्मेदारी है कि दफ्तर का काम तत्परता से करे। झाड़ू लगाने वाला है तो झाड़ू ठीक से लगाये, यह उसकी जिम्मेदारी है।

संचालक लोग लापरवाह होते हैं तो स्वामी को बहुत कष्ट सहना पड़ता है। मुनीम, मैनेजर, सहायक लापरवाह होता है तो उसके मालिक को बहुत दुःख देखना पड़ता है। लापरवाह आदमी से भगवान नाराज रहते हैं। शबरी कर्म करने में कैसी तत्पर, रैदासजी कितने तत्पर, ध्रुव और प्रह्लाद काम करने में कितने तत्पर..... भगवान को प्रसन्न कर लिया, पा लिया। धिक्कार है लापरवाह लोगों को जो अपने स्वामी को दुःख देते हैं, समाज के लोगों से धोखा करते हैं ! खाना-पीना समाज का और समाज के कार्य में लापरवाही करना, ऐसे लोग कुत्ते से भी बेकार होते हैं। लापरवाह आदमी को 'कुत्ता' बोलो तो कुत्ता भी नाराज हो जायगा, 'गधा' बोलो तो गधा नाराज हो जायेगा। बोलेगाः 'मैं तो रूखा-सूखा खा लेता हूँ और मालिक का खाता हूँ और काम विलम्ब में डालता है, ऊपर से सफाई देता है।' पलायनवादी, लापरवाह व्यक्ति घर, दुकान, दफ्तर, आश्रम जहाँ भी जायेगा देर-सवेर असफल हो जायेगा। कर्म के पीछे भाग्य बनता है, हाथ की रेखाएँ बदल जाती हैं, प्रारब्ध बदल जाता है।

सुविधा पूरी चाहिये लेकिन जिम्मेदारी नहीं, इससे लापरवाह व्यक्ति खोखला हो जाता है। जो तत्परता से काम नहीं करता, उसे कुदरत दुबारा मनुष्य शरीर नहीं देती। कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनसे काम लिया जाता है परंतु तत्पर व्यक्ति को कहना नहीं पड़ता, वह स्वयं कार्य करता है। समझ बदलेगी तब व्यक्ति बदलेगा और व्यक्ति बदलेगा तब समाज और देश बदलेगा।

जो मनुष्य-जन्म में काम से कतराता है, वह पेड़-पौधा, पशु बन जाता है, फिर कुल्हाड़े मारकर, डंडे मारकर उससे काम लिया जाता है। सूर्य दिन रात कार्य कर रहा है, हवाएँ दिन-रात कार्य कर रही हैं, प्रकृति दिन रात कार्य कर रही है, परमात्मा दिन रात चेतना दे रहा है और हम अगर कार्य से भागते फिरते हैं तो स्वयं ही अपने पैर पर कुल्हाड़ा मारते हैं।

काम की अधिकता नहीं अनियमितता आदमी को मार डालती है। विद्यार्थी है तो 'आज पढ़ने का पाठ कल पढ़ेंगे, बाद में करेंगे....' ऐसा नहीं करे। जिस समय का जो काम है वह उस समय ही कर लेना चाहिए, बाद के लिए नहीं रखना चाहिए। बढ़िया समय आयेगा तब कुछ करेंगे या बढ़िया समय था तब कुछ कर लेते....' नहीं, अभी जो समय है वही बढ़िया है।

जो काम, जो बात अपने बस की है उसे ईमानदारी, तत्परता और कुशलतापूर्वक करो। अपने प्रत्येक कार्य को ईश्वर की पूजा समझो। राज-व्यवस्था में भी अगर तत्परता नहीं है तो वह बिगड़ जाती है। रिश्वत मिल जाती है तो जो काम अधिकारियों से तत्परता से लेना है वह नहीं लेते और वे लापरवाह हो जाते हैं। इस देश में 'ऑपरेशन' की जरूरत है। जो कामचोर हैं, लापरवाह हैं, समाज का शोषण करते हैं, खूब रिश्वत ले के देश विदेशों में जमा करते हैं, ऐसे लोगों को तो कड़ी सजा मिलनी चाहिए, तभी देश सुधरेगा। आप लोग जहाँ भी हों, अपने जीवन को संयम और तत्परता के ऊपर उठाओ। परमात्मा हमेशा उन्नति में साथ देता है, पतन में नहीं। पतन में हमारी वासनाएँ, लापरवाही काम करती है। मुक्ति के रास्ते भगवान साथ देता है, प्रकृति साथ देती है, बंधन के लिए तो हमारी बेवकूफी, इन्द्रियों की गुलामी, लालच और हलका संग ही कारणरूप होता है। हम तो ईश्वर का संग करेंगे, संतों शास्त्रों की शरण जायेंगे, श्रेष्ठ संग करेंगे और संयमी व तत्पर होकर अपना कार्य करेंगे – यही भाव रखना चाहिए।

लापरवाही के दुर्गुण से बचने में 'लं' बीजमंत्र का जप सहायक है, लाभदायी है।

रोज ॐ लं लं लं लं लं.... इस प्रकार आदर से, तत्परता से कम से कम हजार बार जप करने वाला लापरवाह भी सुधर जायेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2010, पृष्ठ संख्या 11,12 अंक 214

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सोमवार, 29 अगस्त 2011

मनुष्य की विलक्षणता


एक होती है कामना, जो जीवमात्र में होती है – खाने की, पीने की, भोगने की, रखने की। कुत्ते का भी जब पेट भर जाता है तब उसे कोई बढ़िया चीज मिलती है तो वह उसे उठाकर ले जाता है और गड्ढा खोदकर गाड़ देता है कि 'कल खायेंगे', यह कामना है। 'पैसे अभी हैं पर थोड़े बैंक में पड़े रहे हैं, फिर काम आयेंगे' – यह कामना है। पेड़-पौधों को भी कामना होती है परंतु उनकी कामना और होती है, मनुष्य की कामना और होती है, कुत्ते की कामना और होती है पर कामना सभी जीवों में होती है। मनुष्य में दो चीजें ऐसी होती हैं जो और जीवों में नहीं होतीं। पेड़ पौधों में कामना होती है खाद-पानी की, कीट-पतंग में कामना होती है अपने आहार की, अपने बच्चों को सुरक्षित रखने की लेकिन मनुष्य में कामना के साथ लालसा भी होती है और जिज्ञासा भी होती है। यह बहुत ऊँची चीज है। इस ऊँची चीज को महत्त्व दे और कामना को प्रारब्ध के, भगवान के हवाले छोड़ दे तो देखते-देखते मनुष्य महान आत्मा बन जायेगा, दिव्यात्मा बन जायेगा। इसीलिए कहते हैं कि मनुष्य-जीवन देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। देवताओं में भी लालसा और जिज्ञासा तो होती है परंतु देवताओं के यहाँ इतनी सुविधा, इतना सुख-वैभव है कि कामना-कामना में वे इतने मशगूल हो जाते हैं कि इन दो चीजों का फायदा उठाने से रह जाते हैं। जब पुण्य नष्ट होते हैं तो फिर मनुष्य शरीर में आते हैं परंतु मनुष्य-जन्म में ये चीजें ज्यों-की-त्यों बरकरार रहती हैं – लालसा और जिज्ञासा।

लालसा होती है भगवान का रसपान करने की, भगवान का माधुर्य पाने की। कितना भी धन हो जाये फिर भी अंदर से धनी भी भगवान की तरफ जाते हैं, किसी-न-किसी को मानते हैं। लगभग सभी लोग भगवान को मानते हैं, कोई-कोई नहीं मानता होगा। जो नहीं मानते, समझो उनकी मनुष्यता ही खो गयी।

मनुष्य में यह लालसा रहती है कि भगवत्सुख मिले, भगवत्प्रीति मिले, भगवदरस मिले, भगवदधाम मिले। हम लोग स्वर्ग बोलते हैं, कोई बिहिश्त बोलता है, कोई पैराडाइज बोलता है, कोई कुछ बोलता है किंतु यह लालसा मनुष्य में रहती है।

जिज्ञासा होती है 'हम वास्तव में कौन हैं ?' इसे जानने की। शरीर मर जाता है फिर भी हम तो रहते हैं। अगर हम नहीं रहते तो स्वर्ग में कौन जाता है, नरक में कौन जाता है ? मरने के बाद भी हम तो हैं न ! तो हम कौन हैं और भगवान क्या हैं ? हमारे और भगवान के बीच क्या संबंध है, क्या दूरी है और वह कैसे मिटे, कैसे जानें ? यह जो जानने की भावना होती है वह जिज्ञासा है। भगवदरस पाने का जो लालच होता है उसे लालसा बोलते हैं और संसारी चीजों को पाने की इच्छा को वासना बोलते हैं।

तो मनुष्य में तीनों होती हैं – वासना, लालसा और जिज्ञासा। अगर वासना-ही-वासना है तो मनुष्य और कुत्ते में कोई ज्यादा फर्क नहीं है। दुःख आया तो मनुष्य दुःखी हो गया, घबड़ा गया... कुत्ता भी दुःख में घबड़ाता है, पूँछ दबा देता है और सुख आया तो पूँछ हिलाता है, खुशी दिखाता है, मनुष्य भी दिखाता है लेकिन कुत्ते से मनुष्य बहुत ऊँचा है। बैल, घोड़े, गधे, - सभी प्राणियों से मनुष्य ऊँचा है क्योंकि दो रत्न और भी हैं – लालसा और जिज्ञासा। मनुष्य उन रत्नों को महत्त्व दे दे तो वह देवताओं से भी आगे निकल जायेगा। देवता भगवान के बाप नहीं बने हैं परंतु मनुष्य भगवान के बाप भी बने हैं। देवता भगवान के गुरु नहीं बने हैं पर मनुष्य भगवान के गुरु भी बने हैं।

मनुष्यैः क्रियते यत्तु तन्न शक्यं सुरासुरैः।

'जो ऊँचाई मनुष्य पा सकता है, वह सुर और असुर भी नहीं पा सकते।'

(ब्रह्म पुराणः 27.70)

मनुष्य अपनी जिज्ञासा और लालसा को महत्त्व देकर इतना ऊँचा उठ सकता है, इतना ऊँचा उठ सकता है कि जहाँ ऊँचाई की हद हो जाय! यदगत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम। जहाँ जाने के बाद पतन ही नहीं होता। न तदभासयते सूर्यो न शशांको न पावकः। वहाँ सूर्य का प्रकाश, चन्द्रमा का प्रकाश या अग्नि का प्रकाश नहीं। अग्नि, चंदा और सूर्य को भी जो प्रकाशित करता है उस प्रकाशमय सत्त्व को, तत्त्व को, आत्मा को जानकर मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। बाहर से इतनी गरीबी है कि शरीर पर केवल लँगोटी है, तीन थिगली (पैवंद) लगी हैं, सब्जी में नमक डालने के पैसे नहीं हैं किंतु जिज्ञासा और लालसा बढ़ गयी तो ऐसे पद को पाता है कि इन्द्र भी उसके आगे बबलू हो जाता है।

जिज्ञासा से ब्रह्मज्ञान हो जाता है, लालसा से ब्रह्म-परमात्मा का रस पैदा होता है। मैं तो आपको सलाह देता हूँ कि आपके अंदर ये दो दिव्य शक्तियाँ हैं, उनको सहयोग करो। लालसा और जिज्ञासा को बढ़ाओ। कामना में समय बर्बाद मत करो। कामनाएँ क्षीण होती जायें तथा जिज्ञासा और लालसा सफल होती जायें तथा जिज्ञासा और लालसा सफल होती जायें, यह सच्ची सफलता है।

कामनावाले से तो वृक्ष भी डरते हैं। आप बस-स्टैंड पर खड़े हैं और कोई भिखमंगा कामना करके आता है तो आपको अच्छा नहीं लगता है। जान छुड़ाने के लिए कुछ पैसे डाल देते हो। औज जिनको कामना नहीं है ऐसे संत को हाथ जोड़कर, माथा टेककर भी पीछे-पीछे घूमते हो कि"बाबाजी ! जरा यह फल-फूल ले लो।" बाबाजी बोलते हैं- "नहीं चाहिए बेटे !" आप फिर से 'बाबा ! बाबा !!' करते हैं, मानो उन्होंने लिया तो हम पर मेहरबानी कर दी। कामना रहित पुरुष को कुछ देते हैं तो वह महापुण्य बन जाता है और कामनावाले को देते हो तो जान छुड़ाने के लिए। आप भगवान से, समाज से या प्रकृति से भिखमंगे होकर कामनापूर्ति के गुलाम मत बनो तो प्रकृति आपके पीछे-पीछे घूमेगी। मैंने अपने आश्रमों में बोर्ड लगा रखे हैं कि 'चीज-वस्तु, रूपये पैसे की कोई जरूरत नहीं है। आश्रम के नाम पर कोई रूपया-पैसा माँगता है तो मुख्यालय को खबर करो।' आज तक मैंने कोई आश्रम बनाने के लिए चंदा नहीं किया, फिर भी आपको पता है कि कितने सारे आश्रम चल रहे हैं। कितनी गौशालाएँ चल रही हैं, कितने औषधालय चल रहे हैं और गरीबों को रोजी-रोटी नहीं मिलती, काम-धंधा नहीं मिलता तो आश्रमों में, समितियों में 'भजन करो, भोजन करो, दक्षिणा पाओ' केन्द्र चल रहे हैं। मैंने कामना नहीं की आप मुझे यह चीज दो, रूपया दो। अरे, जो प्रारब्ध में होगा, आयेगा। बच्चा माँ के गर्भ से जन्म लेता है तो क्या कामना करता है कि मेरे लिए दूध बन जाय, दूध बन जाय ? प्रकृति और परमात्मा की व्यवस्था है, अपने आप दूध बन गया न ! तो प्रारब्ध-वेग से सब मिलता रहता है। क्या आप कामना करते हो कि श्वास मिल जाय, मिल जाय ? अरे, आपकी आवश्यकता है तो श्वास मिलता रहता है। इसलिए कामना करके अपनी इज्जत मत बिगाड़ो, लालसा और जिज्ञासा करके, उनको बढ़ाकर अपना खजाना पा लो बस !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2010, पृष्ठ संख्या 20,21 अंक 212

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रविवार, 28 अगस्त 2011

ज्ञान की दृष्टि बना लो.. (परम पूज्य संत श्री आसाराम जी "बापू")


जान लिया कीचड़ में कोई सार नहीं, जान लिया तरंग बनकर किनारों से टकराने में सार नहीं, अब तो मुझे जलराशि में ही अच्छा लगता है। भीड़भाड़ में विकारी लोगों के बीच रहना अच्छा नहीं लगता। एकांत में या तो फिर भगवान की मस्ती में जीनेवाले मस् साधकों के बीच रहना अच्छा लगता है, बाकी फिर हमें और कहीं अच्छा नहीं लगता। अब इन्द्रियों के प्रदेश में ज्यादा जीना, घूमना अच्छा नहीं लगता। इन्द्रियातीत आत्मभाव में, आत्मज्ञान में ही सुख का अनुभव है। 'आओ सेठ ! बैठो सेठ ! फलाना सेठ !' – ऐसे लोगों के पास अब सेठपने का अहं को पोसने में मजा नहीं आता। अब तो मजा आता है कि मिट जायें....

मिल जाये कोई पीर फकीर, पहुँचा दे भवपार।

जीवन की शाम हो जाय उसके पहले अपने जीवनतत्त्व में विश्रांति मिल जाय बस ! अब 'फलानी जगह का यह चेयरमैन है, फलाने का यह है....' – यह सब देख लिया खिलवाड़। अपने को सता के देख लिया, खपा के देख लिया। अभी देखना बाकी है तो फिर जरा करके देख लो। अब तक तो करके देख लिया आजीवन। अनुभवी आदमी एक थप्पड़ से चेत जाता है, नहीं तो फिर दूसरा मिलता है, तीसरा मिलता है।

संसार में प्रकृति थप्पड़ मार-मार के भी तुम्हें परमेश्वर पद में पहुँचाना चाहती है। अगर समझ के पहुँचते हो तो आराम से तुम्हें खेलते-कूदते ले जाने के लिए वह प्रकृति देवी तैयार है। नहीं मानते हो, मोह ममता करते हो तो वह चीज छीन के थप्पड़ मार के भी तुमको जगाने के लिए उत्सुक रहती है वह महामाया, क्योंकि वह तो आखिर परमेश्वर की आह्लादिनी शक्ति ! कोई तुम्हारे शत्रु की तो है नहीं। माया कहो, प्रकृति कहो, है तो परमेश्वर की आह्लादिनी शक्ति, है तो उसी का अभिन्न अंग ! जैसे जल की चाहे कैसी भी तरंगें हो सागर में, है तो जल का ही विवर्त। परिणाम नहीं विवर्त, परिणाम तो बदल जाता है, विवर्त नहीं बदलता। जैसे दही दूध का परिणाम है, ऐसे ही भगवान का परिणाम जगत नहीं है। भगवान का विवर्त है जगत। वस्तु में अपने मूल स्वभाव को छोड़े बिना ही अन्य वस्तु की प्रतीति होना यह विवर्त है। सीपी में रूपा दिखना रस्सी में साँप दिखना विवर्त है।

ताना बुनते हैं न सूत का, तो कपड़े के एक छेड़े से दूसरे छेड़े तक अनेक आड़े-सीधे, गोलाकार, चौरसाकार या लम्बचौरस, जो भी तानाबुनी है सब सूत ही सूत होता है। ऐसे ही जगत में जो भी कुछ तानाबुनी है, सब ब्रह्म ही ब्रह्म की है। फिर मृत्यु कहाँ है ? जन्म भी कहाँ है ? अपना कहाँ ? पराया कहाँ ?

एक जगह महात्मा गाँधी का सूत के कपड़े में सूत का बना हुआ चित्र देखा गया। अब महात्मा गाँधी की वह चप्पल भी सूत है तो हाथ में डंडा भी सूत है और आँख पर चश्मा भी सूत है, जो धोती पहनी है वह भी सूत है और जो हड्डियाँ दिख रही हैं वे भी सूत ही सूत हैं। ऐसे ही सब ब्रह्म ही ब्रह्म है।

खाँड का खिलौना राजा बना है और महाराजा ! ताज पहना है, रथ पर बैठा है। वाइसराय बना है, ट्रेन के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में बैठा है, टोपा पहना है। अब महाराज ! टिकट चेकर भी बना है खाँड का। उस वाइसराय को थप्पड़ मारकर टोपा तोड़ दो और मुँह में डालो तो स्वाद खाँड का आयेगा और टिकट चेकर का टिकट माँगने का हाथ उठा के मुँह में डालो तो स्वाद खाँड का ही आयेगा। उन खिलौनों में से घोड़ा, गधा, कुत्ता, बिल्ला, ऊँट, हाथी, साहब-साहिबा.... कोई भी मुँह में डालो तो स्वाद खाँड का आयेगा। ऐसे ही ब्रह्मज्ञान की दृष्टि बना लो, फिर जहाँ भी दृष्टि जायेगी परमेश्वर का ही ब्रह्मानंद आयेगा। जिसको एक जगह अपना प्रियतम, प्रिय मिलता है तो कितना आनंदित होता है ! कभी-कभी अपना प्रिय मिलता है, अपनी प्रिय वस्तु मिलती है, प्रिय व्यक्ति मिलता है, प्रिय जगह मिलती है तो कितना सुखद लगता है ! ज्ञानी को तो सब जगह अपना परम प्रिय मिलता रहता है, इसलिए वे परमानंद में मस्त रहते हैं। ज्ञान से तो आपको सदा सर्वत्र प्रिय-ही-प्रिय मिलेगा, जबकि वस्तुओं में तो कभी प्रिय वस्तु मिली तो भी छूट जायेगी। प्रिय वस्तु भोगते-भोगते शरीर दुर्बल हो जायेगा, निराशा आ जायेगी लेकिन ज्ञान की दृष्टि जगी, प्रेम की सरिता बही तो आपको सर्वत्र अपना प्यारा ही प्यारा दिखेगा।

एक आदमी जो अपने-आपको विषय विकार विलास में, सम्पूर्ण शरीर के सुखों में खर्च रहा है वह भी गलत जगह पर है, गलत जगह पर उसके पैर पड़े हैं। भविष्य उसका दुःखद और अँधकारमय होगा। दूसरा आदमी वह है जो सब कुछ छोड़कर निर्जन जंगल में रहता है। अपने शरीर को सुखाता है, मन को तपाता है, 'संसार खराब है, यह मायाजाल है.... यह ऐसा है, यह वैसा है.... इससे बचो' – ऐसा करके जो बिल्कुल त्याग करता है, ज्ञानसहित नहीं लेकिन एक धारा में बहते हुए त्याग करता है, वह भी कहीं गलत रास्ते की यात्रा करता है। बुद्धिमान तो वह है जो सबमें सब होकर बैठा है उस सर्वाधिष्ठान पर दृष्टि डाले। मोह-ममता का त्याग, संकीर्णता का त्याग, अहंकार का त्याग, उद्वेग-आवेश का त्याग... और वह त्याग तब सिद्ध होगा जब ज्ञान की दृष्टि से देखोगे, संकीर्णता मिटेगी। परमात्मा की दृष्टि से देखोगे तो मोह-ममता मिटेगी और सर्वेश्वर के ज्ञान से पल्लवित, पावन होकर तुम्हारा हृदय और मस्तिष्क जब तालबद्ध होंगे, तब तुम सब कुछ देते, लेते, खाते महात्यागी और महाभोगी, महान एकांती और महान-महान प्रवृत्ति करने वाले – दोनों की अनुभूतियाँ एक साथ करोगे।

त्यागी एक अलग छोर पर है, भोगी दूसरे छोर पर है लेकिन बुद्धिमान, ज्ञानवान, सत्शिष्य और साधक त्याग और भोग दोनों को साधन बनाकर जिससे त्याग और भोग दिखते हैं उस परम पद में जग जाते हैं। त्याग भोग जाके नहीं, सो विद्वान अरोग। भोग का रोग भी नहीं और त्याग का आवेश भी नहीं, ऐसे जो ज्ञानी हैं वे विद्वान निरोग होते हैं। 'मैं त्यागी हूँ' – ऐसा भाव भी जिनको नहीं है, 'मैं भोगी हूँ' – ऐसा भाव भी जिनको नहीं है, जो भोग और त्याग दोनों को इन्द्रियों का खिलवाड़ समझते हैं, मन का फुरना समझते हैं और सर्वत्र व्याप्त अपने सर्वेश्वर की सत्ता को अपने से अभिन्न मानते हैं, ऐसे धीर ज्ञानी के जो सत्शिष्य होते हैं, वे हर हाल में हर स्थिति में सुखद अनुभव, सुखद दृष्टि पा लेते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2010, पृष्ठ संख्या 12,13 अंक 212

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शनिवार, 27 अगस्त 2011

प्रभु पूजा के पुष्प ... (परम पूज्य संत श्री आसाराम जी "बापू")


हर भक्त ईश्वर की, गुरु की पूजा करना चाहता है। इस उद्देश्य से वह धूप, दीप और बाह्य पुष्पों से पूजा की थाली को सजाता है। बाह्य पुष्पों एवं धूप-दीप से पूजा करना तो अच्छा है परंतु इतने से इष्ट या गुरु प्रसन्न नहीं होते। ईश्वर या गुरु की कृपा को शीघ्र पाना हो तो भक्त को अपनी दिलरूपी पूजा की थाली में भक्ति, श्रद्धा, प्रेम, समता, सत्य, संयम, सदाचार, क्षमा, सरलता आदि दैवी सदगुणरूपी पुष्प भी सजाने चाहिए। पवित्र और स्वस्थ मन-मंदिर में मनमोहन की स्थापना करनी हो तो इन पुष्पों की ही आवश्यकता पड़ेगी।

इन फूलों का त्याग करके जो केवल बाह्य फूलों से ही परमात्मा को प्रसन्न करना चाहता है, उस भक्त के हृदय में सच्चिदानन्द भगवान अपने आनंद, माधुर्य, ऐश्वर्य के साथ विराजमान नहीं होते और जहाँ सच्चिदानन्दस्वरूप की प्रतिष्ठा ही न हो वहाँ उनकी पूजा का प्रश्न ही कहाँ पैदा होता है !

इस हकीकत को हृदय में दृढ़ कर लो कि जगत क्षणभंगुर है और हम सब मौत के मुख में बैठे हैं। काल-देवता कब, किस घड़ी किसका ग्रास कर लेंगे इसका पता तक न चलेगा। इसलिए प्रत्येक क्षण सावधान रहो। ईश्वर ने साधन-शक्ति दी है तो दूसरों के सुख का सेतु बनो, किसी के दुःख का कारण तो कभी न बनना। सबका भला चाहो और साथ-साथ सबका भला करो भी। ईश्वर से प्रेम करो और अपने विशुद्ध व्यवहार से आपके स्वामी भगवान, गुरुदेव के प्रति सबको प्रेमभाव जगे ऐसा आचरण करो।

कभी भी हृदय में निराशा को, हताशा को स्थान मत देना और इतना तो पक्का समझना कि दुनिया के सबसे बड़े महापुरुष को ईश्वर ने जितनी शक्ति दी है, उतनी शक्ति तुम्हें भी दी है, फर्क केवल इतना ही है कि उन्होंने जिस निश्चय, विश्वास और साधना से आत्मशक्ति का विकास किया है, वह तुमने नहीं किया है। नहीं तो यदि तुम्हारा दृढ़ निश्चय हो, अविचल विश्वास और नियमित साधना हो तो तुम भी इसी जन्म में ऊँचे-से-ऊँचे ध्येय को सिद्ध कर सकते हो।

अपनी इस अशक्ति को नजर के सामने रखकर तुम उत्साहहीन मत बनाना। तुम शक्तिहीन हो या शक्तिमान किंतु सर्वशक्तिमान प्रभु तो सदा अपने बालकों की सहायता करने के लिए प्रतिक्षण मौजूद हैं। केवल उस शक्ति को पाने के लिए तुम्हारी अपनी तत्परतापूर्वक तैयारी होनी चाहिए।

अतः अपनी पूजा की थाली में कर्तव्य-परायणता, परहित की भावना, शील, संयम, निर्भयता आदि दिव्य सुख प्रदान करने वाले सदगुण अवश्य सजाना। इससे हे मानव ! तेरा कल्याण अवश्य हो जायेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 25, अंक 213

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क्यों देर करते हो ?... (परम पूज्य संत श्री आसाराम जी "बापू")


हमारे देव केवल एक मंदिर में नहीं रह सकते, हालाँकि वे केवल एक मंदिर में ही थे ऐसी बात नहीं थी। हमारी बुद्धि छोटी थी तो हमने उनको मंदिर में मान रखा था। अब तो वे अनंत ब्रह्माण्डों में हैं, ऐसी हमारी मति हो रही है। हमारे देव अभी बड़े नहीं हुए, वे तो बड़े थे परंतु अब हमको उनकी कृपा से देखने की दृष्टि बढ़िया मिली है।

अगर तुम अपने देव को सर्वत्र नहीं देख सकते हो तो कम से कम एक ऐसे पुरुष में उनको देखो, जिनको तुम निर्दोष प्यार कर सकते हो। एक ऐसे चित्त में देखो जिससे तुम्हारी दृष्टि को ठंडक मिलती हो। फिर धीरे-धीरे दूसरे व्यक्ति में भी उन्हें अपने देव को देखो, फिर तीसरे चौथे में देखो। ऐसा करते करते बुद्धि को विशाल करो तो तुम्हारी मर्जी और उन्हीं देव के प्यारों को मिल के, उनके वचनों को पाकर एकदम दृष्टि को खोल दो तो तुम्हारी मर्जी ! पर आना तो यहीं पड़ेगा, अखंड अनुभव में.... वहीं विश्राँति है और वही अपने जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।

तुम अपना लक्ष्य उन्नत बना दो तो फिर हजार हजार गल्तियाँ हो जायें, डरो नहीं। फिर से कोशिश करोक, एक बार फिर से कदम रखो। जिसका लक्ष्य पवित्र नहीं, उन्नत नहीं, सर्वव्यापक सर्वेश्वर के साक्षात्कार का नहीं है, वह लक्ष्यहीन, आदमी हजारों गलतियाँ करेगा और लक्ष्यवाला आदमी पचासों गलतियाँ कर लेगा किंतु पचासों गलतियाँ करता है तब भी लक्ष्य जिसका उन्नत है, वह जीत जाता है। जिसका लक्ष्य उन्नत नहीं है वह सैंकड़ों गलतियों में रूकेगा नहीं, हजारों में नहीं रूकेगा, लाखों में नहीं रूकेगा, करोड़ों गलतियाँ करोड़ों जन्मों तक करता ही रहेगा क्योंकि उसके जीवन में सर्वेश्वर, सर्व में व्यापक एक परमात्मा है – ऐसा लक्ष्य नहीं है, उसके जीवन में मोक्ष का लक्ष्य नहीं है, उसके जीवन में मोक्ष का लक्ष्य नहीं है, उसके जीवन में सुख-दुःख से पार होने का लक्ष्य नहीं है। वह सदा सुखी-दुःखी होता रहेगा और जो सुखी-दुःखी होता है वह गलतियाँ करता ही है। इसीलिए हजारों-हजारों जन्म बीत गये, हजारों हजारों हजारों युग बीत गये, काम पूरा नहीं हुआ क्योंकि लक्ष्य नहीं बना। इसलिए हे मेरे प्यारे साधक ! तू अपने जीवन का लक्ष्य बना ले। सर्वत्र सर्वेश्वर को देख, आप सहित परमेश्वर को देख।

सो प्रभ दूर नहीं, प्रभ तू है।

घर ही महि अंमृतु भरपूरू है,

मनमुखा सादु न पाईआ। (सादु- स्वाद)

जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ।

मैं भोरी डूबन डरी, रही किनारे बैठ।।

खोज अपने आप में – जो विचार उठता है वह कहाँ से उठा ? जो इच्छाएँ और चिंताएँ उठती हैं, कहाँ से उठीं, क्यों उठीं ? खोज ! खोज !! और तू पहुँच जायेगा अपने परम लक्ष्य में। फिसल जाय तो डर मत, फिर से चल। रूक जाय कहीं, कोई थाम ले तुझे तो सदा के लिए चिपक मत, फिर चल। चल, चल और चल... अवश्य पहुँचेगा। और चलना पैरों से नहीं है, केवल विचारों और अपने सत्कृत्यों से चलना है। चलना क्या है ? तन और मन की भागदौड़ मिटाकर अपने अचल आत्मा में विश्रान्ति पाना ही सचमुच में चलना है। सर्वेश्वर कहीं दूर नहीं है कि चलो, यात्रा करो और चलते चलते पहुँचो। क्या कलकत्ते (कोलकाता) में बैठा है, दिल्ली या वैकुण्ठ में बैठा है ? जिस सत्ता से तुम चल रहे हो न, वह सत्ता भी उसी की है और जहाँ से उसको खोजने की शुरूआत करते हो, वहीं वह बैठा है। फिर भी खोजो। उसी के भाव से खोजते-खोजते घूमघाम के वहीं विश्रान्ति मिलेगी जहाँ से खोजना शुरू हुआ है, किंतु बिना खोजे विश्रान्ति नहीं मिलती। बिना खोजे अगर बैठ गये तो आलस्य, प्रमाद और मौत मिलती है। खोजते-खोजते आप नाक की सिधाई में सीधे चलते जाओ, चलते चलते पूरी पृथ्वी की यात्रा करके वहीं पहुँचोगे जहाँ से चले थे।

ॐ..... ॐ.... ॐ.....ॐ..... मधुर-मधुर आनंद-ही-आनंद ! शांति ही शांति ! तू ही तू, तू ही तू, अथवा तो मैं ही मैं ! वह गैर, वह गैर... नहीं, सब तू ही तू अथवा सबमें मैं ही मैं। तुम अनन्त से जुड़े हो। वास्तव में तुम अनंत हो। अनंत श्वासराशि से तुम्हारा श्वास जुड़ा है। अनंत आकाश से तुम्हारा हृदयाकाश और शरीर का आकाश जुड़ा है। तुम्हारा शरीर अनन्त जलराशि से जुड़ा है, अनंत तेजराशि से जुड़ा है, अनन्त पृथ्वी तत्त्व से जुड़ा है। ये पंचभूत भी अनंत महाभूतों से जुड़े हैं। इन पंचभूतों को चलाने वाला तुम्हारा चिदाकाश तो अपने ब्रह्मानंदस्वरूप से, तुम्हारा आत्मा तो अपने परमात्मा से सदैव जुड़ा है। जुड़ा है, यह कहना भी छोटी बात है। हकीकत में तुम्हारा आत्मा ही परमात्मा है। जैसे तरंग पानी स्वरूप है, घटाकाश महाकाशस्वरूप है, ऐसे ही जीव ब्रह्मस्वरूप है, खामखाह परेशान हो रहा है।

तुम अपने परमेश्वर-स्वभाव का सुमिरन करो और जग जाओ... युद्ध के मैदान में श्रीकृष्ण के प्रसाद से अर्जुन ने सुमिरन कर लिया और अर्जुन कहता हैः नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा..... तो यहाँ साबरमती के तट पर तुम भी सुन लो, नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा... कर लो। क्यों कंजूसी करते हो ! क्यों देर करना ! यह तो जेटयुग है मेरे लाला ! मेरी लालियाँ ! ॐ....ॐ.....ॐ....

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2010, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 214

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गुरुवार, 25 अगस्त 2011

सुख का विज्ञान....(पूज्य बापूजी का सत्संग-वचनामृत)


प्राणिमात्र का एक ही उद्देश्य है कि हम सदा सुखी रहें, कभी दुःखी न हों। सुबह से शाम तक और जीवन से मौत तक प्राणी यही करता है – दुःख को हटाना और सुख को थामना। धन कमाते हैं तो भी सुख के लिए, धन खर्च करते हैं तो भी सुख के लिए। शादी करते हैं तो भी सुख के लिए और पत्नी को मायके भेजते हैं तो भी सुख के लिए। पत्नी के लिए हीरे जवाहरात ले आते हैं तो भी सुख के लिए और तलाक दे देते हैं तो भी सुख के लिए। प्राणिमात्र जो भी चेष्टा करता है वह सुख के लिए ही करता है, फिर भी देखा जाय तो आदमी दुःखी का दुःखी है क्योंकि जहाँ सुख है वहाँ उसने खोज नहीं की।

यदि किसी को कहें- भगवान करे दो दिन के लिए आप सुखी हो जाओ, फिर मुसीबत आये। तो वह व्यक्ति कहेगाः "अरे भैया ! ऐसा न कहिये।"

'अच्छा, दस साल के लिए आप सुखी हो जाओ, बाद में कष्ट आये।'

'नहीं, नहीं....।'

'जियो तब तक सुखी रहो, बाद में नरक मिले।'

'न-न.... नहीं चाहते। दुःख नहीं सदा सुख चाहते हैं।'

तो उद्देश्य है सदा सुख का परंतु इच्छा है नश्वर से सुख लेने की, क्षणिक सुखों के पीछे भागने की इसलिए ठोकर खाते हैं।

क्षणिक सुखों की इच्छा क्यों होती है ? क्योंकि क्षण-क्षण में बदलने वाले जगत की सत्यता खोपड़ी में घुस गयी है। नश्वर जगत की सत्यता चित्त में ऐसी मजबूती से घुस गयी है, नश्वर जगत को, नश्वर संबंधों को, नश्वर परिस्थितियों को इतना सत्य मानते हैं कि सत्य को समझने की योग्यता ही गायब कर देते हैं।

वास्तव मे हमारा उद्देश्य तो है शाश्वत सुख किंतु इच्छा होती है नश्वर सुख की, नश्वर वस्तुओं की। तो उद्देश्य और इच्छा जब तक विपरीत रहेंगे तब तक जीवन में 'सोऽहं' का संगीत न गूँज पायेगा। उद्देश्य और इच्छा में जब तक फासला होगा, तब तक दो नाव में पैर रखने वालों की हालत से हम गुजरते रहेंगे, दुःखी होते रहेंगे।

आप सुखप्राप्ति चाहते हैं, सदा सुखी रहना चाहते हैं, जो स्वाभाविक है। तुम्हारा उद्देश्य जो है न, वह स्वाभाविक है और इच्छा जो वह अज्ञान से उठती है।

जैसे ठीक जानकारी न होने से, ठीक वस्तु का बोध न होने से आदमी गलत रास्ते चला जाता है। दूरबीन से नक्षत्रों या चाँद को देखना हो और काँच साफ न हो तो ठीक से नहीं दिखता, ऐसे ही ठीक बोध न होने से, ठीक समझ न होने से ज्ञान की नजर खुलती नही। और जब तक ज्ञान की नजर खुलती नहीं तब तक सुख-दुःख सब हमारी उन्नति के लिए आते हैं, ऐसा दिखता नहीं।

ठीक देखने क लिए ठीक अंतःकरण चाहिए और ठीक अंतःकरण के लिए उच्च विवेक चाहिए।

संत तुलसी दास ने कहाः

बिन सतसंग विवेक न होई।

राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।

भगवान की कृपा से ही ऐसे विवेक के रास्ते मनुष्य चलता है और उसकी अनात्मा की आसक्ति धीरे-धीरे मिटती जाती है तथा आत्मा का ज्ञान, प्रीति, विश्रांति, आत्मतृप्ति, परमात्मतृप्ति की तरफ चलती रहती है।

आत्मतृप्तमानवस्य कार्यं न विद्यते।

विकारों की तरफ फिसले नहीं तो जल्दी से पूर्ण स्वभाव की प्राप्ति हो जाती है। शिवजी कहते हैं-

उमा राम सुभाउ जेहिं जाना।

ताहि भजनु तजि भाव न आना।।

श्रीरामचरित. सुं.कां.33.2

उस आत्मानंद का रस पाकर फिर वह विकारी रस में आसक्त नहीं होता यही जीवन्मुक्ति है, जीते जी मुक्ति ! दुःखों से, आकर्षणों से, प्रशंसा से, निंदा से मुक्त महापुरुष बन जाओ। अष्टावक्र जी कहते हैं- तस्य तुलना केन जायते ? ऐसे आत्मा-परमात्मा में जागे उस महापुरुष की तुलना किससे करोगे ? इंद्रदेव का सुख भी आत्मसुख के आगे तुच्छ हो जाता है।

'अष्टावक्र गीता' में आता हैः

यत्पदं प्रेप्सवो दीनाः शक्राद्याः सर्वदेवताः।

अहो तत्र स्थितो योगी न हर्षमुपगच्छति।।

जिस पद को पाये बिना इंद्रादि देवता भी दीन हो जाते है, उस आत्मपद को पाकर आत्मारामी महापुरुष न यश से फूलते हैं न अपयश में दुःखी, चिंतित, परेशान होते हैं, ऐसा ब्रह्मस्वभाव का सुख है।

तैसा अंम्रितु1 तैसी बिखु2 खाटी।

तैसा मानु तैसा अभिमानु।

हरख सोग3 जा कै नही बैरी मीत समान।

कहु नानक सुनि रे मना मुकति ताहि तै जान

1 अमृत, 2 विष, 3 हर्ष-शोक

ऐसा सत्संग का विवेक मुक्तात्मा, महात्मा बना देता है। क्षुद्र विषय-विकारी सुख से अपने को थोड़ा बचाते जाओ और निर्विकारी, शाश्वत सुख में बढ़ते जाओ, यही मनुष्य जीवन की उपलब्धि है। सदा रहने वाला सुख सदा रहने वाले अपने क्षेत्रज्ञ स्वरूप में ही है। पंचभौतिक शरीर, मन, बुद्धि, अहंकार यह अष्टधा प्रकृति का क्षेत्र है। भगवान कहते हैं-

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।

अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।

(भगवदगीताः 7.4)

भगवान कृपा करके अपना स्वभाव बता रहे हैं कि मैं इनसे भिन्न हूँ, अतः आप भी इनसे भिन्न हैं। पंचभौतिक शरीर, मन, बुद्धि और अहंकार बदलते हैं, आप अबदल हैं। आप आत्मा हो, शाश्वत हो, शरीर के मरने के बाद भी आपकी मृत्यु नहीं होती, आप अजर-अमर हो नारायण ! आप अपनी अमरता में जागो, टिको। शाश्वत सुख आपका अपना-आपा है।

सुख शांति का भण्डार है, आत्मा परम आनन्द है।

क्यों भूलता है आपको ? तुझमें न कोई द्वन्द्व है।।

भगवान हमारे परम सुहृद हैं। उन परम सुहृद के उपदेश को सुनकर अगर जीव भीतर, अपने स्वरूप में जाग जाय तो सुख और दुःख की चोटों से परे परमानन्द का अनुभव करके जीते-जी मुक्त हो जायेगा। जीव जब तक परम सुख नहीं पा लेता तब तक नश्वर सुख की चाह बनी रहती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2010, पृष्ठ संख्या 10,11, अंक 209

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बुधवार, 24 अगस्त 2011

परिवर्तन नहीं परिमार्जन....(परम पूज्य संत श्री आसाराम जी "बापू")


अर्जुन के सामने भगवान श्रीकृष्ण खड़े हैं, फिर भी उनका भय नहीं गया, शोक नहीं गया। जब उसने श्रीकृष्ण का सत्संग सुना और उस अनुसार अपने आत्मा का ज्ञान जगाया तो अर्जुन का भय भी नहीं रहा, शोक भी नहीं रहा, दुःख भी नहीं रहा और युद्ध जैसा घोर कर्म किया किंतु उसके ऊपर बंधन नहीं रहा, मुक्तात्मा हो गया।

तो गीता का ज्ञान तुम्हे ऐरी-गैरी चीजों में आसक्ति करके भोगी नहीं बनाना चाहता, ऐरी गैरी परिस्थितियों का गुलाम बनाकर तुम्हें जगत का पिट्ठू नहीं देखना चाहता। लोग क्या करते हैं कि परिवर्तन चाहते हैं। दुःख आया है.... अब दुःख मिटे, सुख आयें। रोग आया है... रोग मिटे, तंदुरूस्ती आये। निंदा आयी है, अभी सराहना आ जाय, परिवर्तन... परिवर्तन करते-करते खुद परिवर्तित होकर मौत के मुँह में चले जाते हैं लेकिन'गीता' कहती है कि परिवर्तन के चक्कर में मत आओ। दुःख को सुख से दबाओ मत। दुःख की जड़ उखाड़ के फेंक दो। निंदा को प्रशंसा से दबाओ मत, निंदा और प्रशंसा की गहराई में तुम एकरूप हो – ऐसी ज्ञान की समझ जगाओ। बीमारी में और तंदुरुस्ती में तुम एकरस हो। बचपन, जवानी, बुढ़ापा – यह सब बदलता है, फिर भी जो नहीं बदलता वह है तुम्हारा अपना आप, हर परिस्थिति का बाप ! गुरु की कृपा से ऐसे अनुभव की कुंजी पा लो। शब्दों की डींग मत हाँकना। वास्तविक अनुभव में सदगुरु का प्यारा सत्शिष्य ही पहुँच सकता है।

अपने जीवन में परिवर्तन की इच्छा मत करो। जैसे यूरोप, अमेरिका, और देश परिवर्तन, परिवर्तन में लगे हैं। नया पैक, नया फैशन, गाड़ी नयी, मॉडल नया, कार्पेट नया, रंग-रोगन नया.. नया, नया, नया... परिवर्तन, परिवर्तन..... यहाँ तक कि पत्नी बदलो, पति बदलो, मकान बदलो.... फिर भी अभागे लोग दुःखी हैं। 'गीता' कहती है प्रकृति के परिवर्तन में मत पड़ो। तुम तो अपनी बुद्धि का परिमार्जन करो। सारे परिवर्तन तुम्हें उलझा रहे हैं। तुम परिवर्तन के आधारस्वरूप परमात्मा में सुलझकर अभी सुखी हो जाओ, अभी निश्चिंत हो जाओ, अभी निर्णय हो जाओ।

मर जायेंगे फिर हमें श्मशान में, कब्र में डालकर आयेंगे। कोई पैगम्बर आकर हमारे लिए सिफारिश करेगा, फिर हमें बिहिश्त मिलेगा, अप्सराएँ मिलेंगी, शराब के चश्मे मिलेंगे। यहाँ शराब की बोतल तबाही कर देती है, अपनी पत्नी के सिवाय रावण जैसा भी यदि दूसरे की पत्नी के प्रति बुरी नजर करता है तो उसकी दुर्दशा होती है तो वे अप्सराएँ क्या दे देंगी ! सोचते हैं, 'यहाँ बुढ़िया है, मर जायेंगे तो अप्सराएँ मिलेंगी।' शराब के चश्मे, हूरें और हूरों का विलास तुम्हें नोच लेगा बेटे ! सावधान हो जाओ, ऐसी ख्वाहिश मत करो। इश्क मिजाजी, इश्क इलाही, इश्क नुरानी में अभी लग जाओ। जिसे प्रेमाभक्ति, अनुरागा भक्ति, पराभक्ति भी कहते हैं।

मदभक्तिं लभते पराम्।

श्रीकृष्ण के वचनों को रहीम खानखाना ने और अकबर की बेगम ताज ने अनुभव किया, मौलाना जलालुद्दीन रूमी ने, कबीर जी ने और लीलाशाह प्रभुजी ने, राजा जनक ने जो प्रेमाभक्ति का परम स्वाद पाया और बाँटा उसी में तुम आ जाओ।

सब दुःखों की एक दवाई,

पराभक्ति पा लो भाई।

वह प्रभु तुमसे दूर नहीं, तुम उससे दूर नहीं।

आदि सचु जुगादि सचु।

है भी सचु नानक होसी भी सचु।।

तो गीता परिवर्तन नहीं परिमार्जन करती है, समझ बदल देती है परिवर्तन प्रकृति में होगा।

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।

समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते।

'हे पुरुषश्रेष्ठ ! दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है।'

(गीताः 2.15)

परमात्मा तो नित्य और एकरस है। जो भी होगा हमारे विकास के लिए होगा। सिनेमा में सुंदर मकान, बगीचे दिखते हैं। हो-हो के चले जाते हैं। जो मूर्ख है, उन्हें रोके रखना चाहता है वह दुःखी होगा। जो अपने ढंग का देखना चाहता है वह भी दुःखी होगा। जो दिख रहा है, दिख रहा है... बदल रहा है, बदल रहा है। जो आता है आने दो, जाता है जाने दो। बनता है बनने दो बिगड़ता है बिगड़ने दो। जो धन मिल गया, मिल गया। जो चला गया, उसके लिए रोते क्यों हो ! जो मान मिल गया मिल गया, चला गया तो चला गया। इसी का नाम तो दुनिया है।

खून पसीना बहाता जा, तान के चादर सोता जा।

यह नाव दो हिलती जायेगी, तू हँसता जा या रोता जा।।

तो काहे को रोयें ! वाह-वाह ! क्यों न करें ! अपनी बुद्धि में भगवान के ज्ञान का प्रकाश ले आओ। जो बीत गया उसको याद करके शोक मत करो। मैं पहले ऐसा सुखी था, यह दुःख मिला, अभी ऐसा है। नहीं, नहीं, जो बीत गया, अभी हमारे पास नहीं है उसके पीछे क्यों मरें !

भविष्य हमारे पास नहीं है, वर्तमान में आनंदित करो, परिमार्जित करो अपने मन को रसमय जीवन... जिह्वा में भगवदरस में, मन में भगवदरस भरो। मधुर बोलेंगे, सारगर्भित बोलेंगे, स्नेहयुक्त बोलेंगे, गीता के ज्ञान से भरकर वाणी बोलेंगे। हो गया परिमार्जन ! मन में किसी का बुरा नहीं सोचेंगे, किसी का बुरा नहीं चाहेंगे और कोई भी हमारा बुरा करे को वह व्यक्ति सदा के लिए ऐसा नहीं है, ऐसी समझ जाग्रत रखेंग। कोई किसी को दुःख देता है तो दुःख सामने वाले को मिले न मिले, दुःख देने वाले का दिल तो दुःख देने के विचार से गंदा होता है और कोई किसी को सुख देता है या भला करता है तो सामने वाले का कब-कितना भला हो भगवान जानें लेकिन भलाई के विचार से उसका खुद का दिल तो भला होता है न !

जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा है, जो होगा वह भी अच्छा होगा यह नियम प्रभु का है। हम मन के चाहे पर अड़ जाते हैं इसीलिए दुःख होता है, तनाव होता है। बच्चा मनचाही चाहता है इसीलिए दुःखी होता है। माँ बच्चे को रगड़-रगड़ के शुद्ध करना चाहती है लेकिन बच्चे को अच्छा नहीं लगता, स्कूल भेजना चाहती है लेकिन अच्छा नहीं लगता फिर भी रोते-रोते भी स्नान तो करना पड़ता है, रोते-रोते भी स्कूल जाना तो पड़ता है। तो आप अपना मनचाहा परिवर्तन मत करो, परिमार्जन होने दो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 18,19 अंक 213

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