मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

मंगलवार, 29 जून 2010

मनुष्य स्वभाव में पशुता का प्रभाव

इस संसार में मनुष्य जितना खतरनाक है उतना कोई पशु-पक्षी खतरनाक नही। मनुष्य की हानि जितनी मनुष्य के हाथों हुई है उतनी पशुओं के हाथों नही हुई हैं। कोई भी पशु-पक्षी इतना भयानक नही है जितना की मनुष्य भयानक है खूंखार है। कारण एक पशु सिर्फ़ एक पशु की ही बराबरी रखता है और मनुष्य अनेक पशु की बराबरी रखता है। इसीलिये मनुष्य जितना खतरनाक है उतना कोई भी खतरनाक नही हैं। इसीलिये जितनी बंदिश मनुष्य के लिये रखनी पडती है उतनी किसी पशु-पक्षी के लिये नही रखनी पड़ती हैं। ये जो बम, बन्दूक, तोप, टैंक, परमाणु बम बनाये गये है ये किसी पशु-पक्षी को मारने के लिये नही बनाये गये हैं, ये मनुष्य को मारने के लिये ही हैं। क्योकि जैसे-जैसे मनुष्य खतरनाक होता गया हथियार भी खतरनाक होते गये। जब मनुष्य सहज और सरल जी रहा था। तब उसका सबसे बडा हथियार लाठी थी। जब उसकी शान्ति थोडी भंग हुई तो लाठी ने बरछे का रूप ले लिया। जो थोडा और शान्ति भंग हुई तो तीर-कमान बन गये। फिर बन्दूक आयी, फिर तोपें आई, फिर टैंक आये। अब आज मनुष्य इतना खतरनाक हो गया है कि उसको काबू में रखने के लिये हाईड्रोजन बम बन गये हैं। अनगिनत ऐसे उदाहरण मिलते है कि मनुष्य जितना खतरनाक है उतना कोई भी पशु खतरनाक नही हैं। रात के समय तकरीबन-तकरीबन सारे बाजार बंद हो जाते हैं दुकानों में बडे-बडें ताले लग जाते हैं एक नही कई-कई ताले लगाये जाते हैं। दुकानदार से कोई पूछे कि जो तुने ये ५-१० ताले लगाये हैं वो किस लिये ? पशु से डर है, पक्षी से डर हैं, कीडीयों का डर है, मकोंडों का डर हैं, बैलों का डर हैं, आखिर तुझें किसका डर हैं ? तब वह एक ही जवाब देता है कि किसी पशु का डर नही है सिर्फ़ मनुष्य का ही डर हैं कही कुछ चुराकर न ले जाये। आदमी आदमी से जितना परेशान है उतना किसी से भी परेशान नही हैं। इससे इतना तो पता चलता है कि मनुष्य जितना खतरनाक है उतना कोई भी खतरनाक नही हैं। किसी पशु में जब खूँखारीपना आता है तो वो ज्यादा से ज्यादा १-२-३ के ऊपर हमला करके उनको मौत के घाट उतारता हैं लेकिन जब मनुष्य में पशु वृत्तियाँ प्रधान रूप लेती हैं, जब खूँखारीपना आता है तो वो बस्ती की बस्तियाँ उजाड़ देता हैं। शहरों के शहर खाख में मिला देता हैं। कई बार तो देश के देश बरबाद कर देता हैं। मनुष्य के अन्दर इतनी पशु वृत्तियाँ पैदा हो गयी हैं। आज कल सुनने में आया है कि देश-विदेशों में चर्चा हो रही है कि पशुओं की नस्ले खत्म हो रही हैं इनको कैसे बचाया जाये उनका उपाय ढूँढा जा रहा हैं। कही ऐसा ना हो कि वो जानवर बिलकुल ही खत्म ना हो जायें, परन्तु मैं तो सोचता हूँ कि उन जानवरों की तो हमको जरुरत ही नही हैं। क्युँ जब मनुष्य ही जानवरों की तरह जीने लगा हैं तो फिर जानवरों की जरुरत ही नही हैं। जो मनुष्य शहरों को ही जंगल बना ले तो फिर जंगल की भी जरुरत नही हैं क्योंकि जंगलों के अन्दर भी पशु इतने नही लडते हैं जितने शहरों में मनुष्य में लडते हैं। घोसलों में भी पक्षी इतने नही लडते है जितने अपने घर के अन्दर मनुष्य ने क्लेश, अनर्थ मचाया हुआ हैं। लडाई-झगडे की अगर परकाष्ठा देखनी है तो मनुष्यों के बीच देखने को मिलती है, पशुओं की दुनियाँ में इतनी नही। पक्षीयों की दुनियाँ में इतनी नही।
मनुष्य चिडियाघर में जाता हैं पशु-पक्षीयों को देखने के लिये और वहाँ बहुत से पशु-पक्षीयों को देखता हैं, अगर वो कभी अपनी सूरत को अपनी अंतराआत्मा में ले जाये तो उसे पशुओं की अनेक वृत्तियाँ अपने अन्दर नजर आयेगी। आकार या स्वरूप से पशु अन्दर नही बैठे हैं परन्तु सूरत करके, संस्कार करके, स्वभाव करके ये सारे पशु मनुष्य के अन्दर बैठे हैं। कौन-कौन से पशु इनमें प्रमुख हैं
उदयान बसनम संसारं सन बन्दी स्वान, स्याल, खरें ।
ऐं मनुष्य जो तेरे संबन्धी है वो है स्वान माने कुत्ता, सियाल माने गीदड़ और खरे मतलब गधा। ये तेरे रिश्तेदार हैं
अब ये पढों तो आपको क्रोध आयेगा कि मनुष्य के सम्बन्धी कुत्ते, सियाल और गधे हैं। हकीकत ये है कि मनुष्य का असली संबधी या रिश्तेदार तो उसका स्वभाव ही होता है और उसके स्वभाव में ही ये तीनों बैठें है।
सियाल की बात करे तो उसके रोम रोम में आलस्य भरा पडा हैं और डर हैं। तो जो बन्दा आठों पहर डरा ही हुआ हैं कि मौत का डर है, मुझे लूट लेगा, मुझसे मेरा सब कुछ छीन लेगा, बिमारी का डर, मान-सम्मान का डर और आलसी हैं वो चाहता है कि वो कुछ ना करे लेकिन उसको सब कुछ मिल जायें फिर उसके लिये चाहे कुछ भी करना पडे झूठ, फरेब, एक दूसरे को लडायें कैसे भी करें लेकिन मुझे सब कुछ मिले ये वृत्ति जिसके अन्दर है वो मनुष्य होते हुए भी सियाल रूप है।
कबीरदास जी का कहना हैं कि
कहत कबीर राम गुण गाओं, आप न डरों औरों न डराओं ।
राम के गुण गाते-गाते मैं इस हालत में पहुँच गया कि न किसी से डरता हूँ और ना किसी को डराता हूँ।
गुरु तेगबहादुर जी कहते हैं कि
भय काहू को देत है, न भय मानत को आन, कह नानक सुन रे मना, ज्ञानी ते बखान
मनुष्य के अन्दर कुत्ता भी हैं, कुत्ते की फितरत क्या हैं ? कि कुत्ता कुत्ते को पसन्द नही करता हैं। कुत्ता कुत्ते पर भोंकता हैं। कुत्ता कुत्ते पर टूट पडता हैं। हम देख रहे है कि कुत्ता कुत्ते का बैरी है। पर जो मनुष्य भी मनुष्य का बैरी होये तो, जब मनुष्य को मनुष्य ही अच्छे न लगें और मनुष्य मनुष्यों पर ही आवाजें करें तो मनुष्य और कुत्ते में क्या फर्क रह गया। ये वृत्ति कूकर वृत्ति हैं जो आज के मनुष्य में विशेष रूप में दिख रही हैं और आज एक बात और आश्चर्य की है कि मनुष्य मनुष्य को अपने पास बैठाने से कतराता हैं लेकिन कुत्ते को अपनी गोद में बडे प्यार से बैठाता है अपने साथ सुलाता है और अपने साथ घुमाता भी हैं। ऐसा क्युँ हैं लगता है कि अन्दर भी स्वभाव कुत्ते का और बाहर भी कुत्ते का संग दोनो का साथ हो गया हैं। वरना अगर मनुष्य के अन्दर मनुष्यता होती तो उसको मनुष्य के साथ भी प्यार होना चाहिये था, उसके साथ भी सहानुभूति होनी चाहिये थी, लेकिन नही है इससे साफ़ जाहिर होता है कि मनुष्य के अन्दर पशु वृतियाँ बहुत बढ़ गयी हैं। मनुष्य मनुष्य को गलत बोले, मनुष्य मनुष्य को बिना सोचे समझे दोष लगाये वह भी कूकर वृति हैं और मनुष्य मनुष्य को जख्मी कर जाये तो वो भी कूकर वृति हैं।
एक बार एक गरीब लकडहारा लकडी काट कर बाजार गया तो उसको रास्ते में एक कुत्ते ने काट लिया जब वह घर आया तो उसकी बच्ची ने कुत्ते के काटे का जख्म देख कर रोना शुरु कर दिया और पूछा कि अब्बा ! यह क्या हुआ तो उसने बोला कि बेटा कुत्ते ने काट लिया तो उसकी बेटी ने कहा कि जब उसने काटा तो फिर आपने उसको क्यों नही काटा क्या आपके पास तेज दाँत नही हैं। तब उसका पिता बोला कि बेटा ये काम तो कुत्ते का हैं किसी मनुष्य का नही अगर मनुष्य भी यह काम करने लगा तो फिर मनुष्य और कुत्ते में क्या फ़र्क रह जायेगा।
लेकिन आज यह अक्सर देखा गया हैं कि कोई किसी पर बिना किसी बात के चिल्लाता हैं, बिना सोचे समझे दोष लगाता हैं, उसे नफ़रत भरी निगाहों से देखता हैं और दूसरों को भी यह करने को बोलता है यह सब कूकर वृत्ति हैं
मनुष्य के अन्दर गधा भी हैं। गधा भारत के अन्दर बवकूफ़ का चिन्ह माना जाता हैं। ये धोबी का गधा या कुम्हार का गधा ये गधे असली गधे नही है असली गधा तो कोई और हैं। इस पर नानक जी कहते हैं।
नानक ते नर असल खर, जो बिन गुण गर्व करें
बिना गुण के आठों पहर मान को लिये जो नर फूला रहता हैं अहंकार को लिये फूला रहता है नानक जी उसके लिये कहते है कि वो असल में गधा हैं। क्योंकि इसको पता ही नही है कि तेरे आसरे पर जग नही खडा है बल्कि तु खुद किसी के आसरे पर खडा हैं। तू कृत है कर्ता नही । पर मनुष्य ने अहंकार की इतनी वृद्धि कर ली है कि उसका कोई मुआवजा ही नही हैं। ये गधे की वृत्ति हैं।
कबीरदास जी कहते है कि मनुष्य के अन्दर भैसे की भी वृत्ति भी होती है। भैसे की वृत्ति ये होती है कि वो अमोड चलता है मतलब कि उसको किसी दिशा में मोडों तो मुडता नही। वो अपनी धुन पर चलता हैं। वो अपनी ही चाल पर चलता है फिर चाहे वो चाल गलत हो या मार्ग गलत हो पर वो रुकता नही है कोई उसको रोके पर वो रुकता नही। ये देखा गया है कि जब किसी मनुष्य को २-४ लोग समझा रहे हो कि यह गलत है शास्त्र, गुरु या महापुरुष इसकी इजाजत नही देते, समाज भी इसको ठीक नजर से नही देखता हैं। तो भी वो मनुष्य उनकी नही सुनता है और इस पर तर्क करता है कि तुम कौन होते हो मुझे बताने वाले या समझाने वाले, मैं तो जिस रास्ते चलुंगा जैसी मेरी मर्जी, तो कबीरदास जी कहते हैं कि ये भैसे की वृत्ति हैं। कि समझाने पर भी न समझना, मोडने पर भी न मुडना, और अपनी हठधर्मी कायम रखनी और उस हठधर्मी के मुताबिक चलते जाना ये भैसे की वृत्ति हैं। गलती पे गलती करते जाना, कोई रोके तो रुके ना कबीरदास जी कहते है कि ये अमोड वृत्ति भैसा हैं।
माता भैसा अमुआ जाये, कुद कुद चरे रसातल पाये
धर्म का जन्म, ज्ञान का जन्म महापुरुषों का आगमन इस वास्ते हुआ कि मनुष्य अपने अन्दर हो रही इन पशु वृत्तियों को समाप्त करे जो उसको बेचैन कर रही हैं जो उसको दुखी कर रही हैं और सादा और सरल जीवन बनाये और ये विदा होंगे प्रभु चिन्तन से, सत्संग से, जो मनुष्य महापुरुषों की बात नही मानेगा तो उसके अन्दर की ये वृत्तियाँ बढती ही जायेंगी। साधू-संतों के बिना या प्रभु भजन के बिना जीना तो ऐसा जीना है जैसे साँप जीता है। साँप का काम क्या हैं वो खाता है पीता है तो खाते-पीते उसके अन्दर जहर बनता हैं जब जहर भर जाता है तो वह डंक मारता हैं। जहर को किसी के शरीर के अन्दर प्रविष्ट कर देता है। ऐसा ही नही कि साँप डंक मारते हैं, मनुष्य भी डंक मारते है। हो सकता है कि साँप का डसा हुआ कोई बच भी जाये परन्तु मनुष्य के डंक से तो कोई बचता ही नही, मनुष्य इस तरह का जहरीला है।
बिन सिमरन जैसे सर्प अरजारी, त्यु साखत जीवे नाम बिसारी ।
बिन सिमरन डिग कर्म करास, काक बटन विष्टा में वास ॥

गुरुओं का ऐसा भी वचन है कि मनुष्य के अन्दर कौवा भी है। किस तरह पता चलेगा कि मनुष्य के अन्दर काक वृत्ति है। कौवे के मुंह में सुगन्ध नही होती कपूर नही होता, दुर्गंध ही होती हैं विष्टा होती है, हड्डी का टुकडा होता हैं। दुर्गंध उसके मुह में होगी। कौवे की बोली बडी प्रखर हैं। बडी सख्त हैं। जो बन्दा बहुत सख्त बोले, कडुवा बोले, गंदा बोले, गालियाँ ही उसके मुह पर होवे, चार गालियाँ बोल कर ही बात शुरु करता हो तो साहिबो का कहना है कि ये कौवे वाली वृत्ति हैं। बडा कडक बोलता है, बडी कसक है इसकी बोली में, बडी चोट है, फिर बोलना बडा गंदा है तो मुह में इस गन्दगी का होना ये कौए की निशानी है। जिस समय मनुष्य के अन्दर कौवे की वृत्ति प्रधान होती है उसके मुह में गन्दगी आ जाती हैं।
बिन सिमरन डिग कर्म करास, काक बटन विष्टा में वास, बिन सिमरन गर्भक की नाई, सापध थाउ भ्रष्ट फिराई।
सिमरन को छोड़ कर जीव ऐसे जीता है जैसे कुत्ता, अब जो साहिब जी बताते है वो सबसे याद रखने वाली बात है
हर के नाम बिना है सुन्दर है नकटी, ज्यु वेश्वा के घर पूत जमत है तिस नाम परयों है प्रगटी।
वेश्या का पुत्र अपना नाम नही बोल सकता है किसी महफिल के वीच उसके पिता का नाम उसको पूछो तो वो बेचारा क्या बोलेगा क्योकि वेश्या का पुत्र हैं। इसलिये महफिल उसको शर्मसार करती है। गुरु अर्जुन देव जी महाराज का कहना है कि वेश्या के पुत्र को शर्मसार मत करों। वो सिर्फ अपने शरीर के पिता को नही जानता कि कौन है? और वेश्या का पुत्र नही हैं। वास्तव में वेश्या का पुत्र वो है जो जगतपिता को नही जानता जिसको जगत पिता का बोध नही हैं। जिसने इसकी माँ को भी पैदा किया, इसके पिता को भी पैदा किया और इसको भी पैदा किया है जिसको उसका बोध नही हैं वो वास्तविक में वेश्या का पुत्र हैं। ये इल्जाम इसलिये है न कि उस वास्ते कि वो वेश्या का पुत्र हैं। कारण ये है कि जिस समय मनुष्य नाम से टूटता हैं उसी समय अनगिनत पशु वृत्तियाँ उसके अन्दर जाग्रत हो जाती हैं और मनुष्य बहुत खतरनाक हो जाता हैं। जब खतरनाक हो जाता है तो फिर इस पर बंदिशें भी लगानी पड़ती हैं।
भाई गुरुदास जी कहते हैं कि मनुष्य को जीने का ढंग कीडी से सीखनी चाहियें। क्योकि जितने तेरे अन्दर अवगुण है उतने ही गुण भी हैं कीडीयों में एक खूबी होती है कि एक चोटी सी जगह में भी बहुत सारी एक साथ रहती है और प्यार के साथ में रहती है लेकिन मनुष्य बडे घर में दो परिवारों के साथ नही रह सकता हैं कीडी का आकार बहुत छोटा हैं लेकिन दिल बहुत बडा हैं। लेकिन मनुष्य का आकार बहुत बडा है पर दिल बहुत छोटा हैं। कीडी में एक और खूबी हैं कि घी शक्कर की खुशबू उसको आ जाये तो वो चल पडती है अकेले नही सभी को साथ लेकर, दाना मुह में लेकर आती है एक जगह पर रखती है और फिर दूसरा लेने जाती है क्योकि उसको विश्वास हैं कि जो दाना मैं रख कर गयी हूँ वो मुझे मिलेगा। पर मनुष्य की दुनिया में ये विश्वास नही हैं। अगर कोई चीज बाहर रख जाये तो उसको वो वापस मिलेगी कि नही उसको विश्वास नही हैं। मिल कर रहने की जो भावना कीडीयों के अन्दर है उतनी मनुष्य के अन्दर नही हैं।
इसलिये भाई गुरुदास जी कहते है कि हे मनुष्य तू प्रभु चिन्तन कर ताकि अपने अन्दर के पशुओं को तू बाहर निकाल सकें जिस दिन ये सारे पशु तेरे अन्दर से विदा हो जायेंगे उस दिन मनुष्यता निखर जायेगी। उस दिन वो जो प्रार्थना करता है तो उसके अन्दर देवत्व झलकता है। उसके अन्दर परमात्मा झलकता हैं, उसके अन्दर ईश्वर झलकता हैं। वो मनुष्य होते हुए ईश्वर की ज्योत प्रकट कर लेता हैं।
नामे नारायण नही भेद राम कबीरे भेद न पावे
मनुष्य दो जगत के बीच में है पशुओ का जगत और परमात्मा का जगत, पशुओ का जगत पीछें है और परमात्मा का जगत आगे हैं। जब पशु जगत की इच्छा मनुष्य के अन्दर जगती है तो वो दुराचारी बन जाता हैं तब वो किसी भी नियम को नही मानता परन्तु उसके अन्दर इच्छा उस प्रभु की भी हैं जो शिखर पर हैं। पशुओ का जगत नीचे है और प्रभु का जगत ऊपर हैं। मनुष्य इन दोनों के बीच में खडा हैं। कभी प्रभु की ओर खिचता है तो धर्म-मन्दिरों का रुख करता हैं। धर्म-ग्रन्थों का पाठ-पठन करता हैं। सतपुरुषों के बीच बैठता हैं और बैठकर आनंद मानता हैं। जब आनंद मना ही रहा होता है तो पशुओं के जगत का खिचाव शुरु हो जाता है क्योंकि राग-द्वेश-अहंकार उसके अन्दर आ जाते है फिर वो नीचे गिर जाता हैं। इसी तरह कभी ऊपर कभी तो कभी नीचे होता रहता है कारण कि पशुओं के जगत का अपना खिचाव है और प्रभु के जगत का अपना खिचाव हैं। सत्संग और साधना में बहुत ज्यादा जोर इसलिये दिया जाता है कि मनुष्य इस पशुओं के जगत के खिचाव से बच कर प्रभु के जगत के ओर पहुँच जाये और लीनता भी उसको इस तरह मिल जाये कि " नानक लीन भयों गोविन्द ज्यु पानी संग पानी " सरिता रेगिस्तान में भी खो सकती है और सरिता सागर में भी खो सकती हैं। सरिता अगर रेगिस्तान में खो गयी तो अपना वजूद मिटा देगी और अगर सागर में खोई तो सागर का रूप बन जायेगी। ऐसे ही मनुष्य अगर पशुओं के जगत में खो गया तो अपनी मनुष्यता खो बैठेगा और अगर परमात्मा में लीन हो गया तो परमात्मा का ही रूप हो जायेगा, ईश्वर का ही रूप हो जायेगा। और ईश्वर का रूप होने ही मनुष्य इस जगत में आया हैं।

रविवार, 27 जून 2010

गुरु हरगोविन्द सिंह जयन्ती (२७ जून २०१०)

सिखों के छ्ठे गुरु गुरु हरगोविन्द सिंह जी की आज जयन्ती है । इसी उपलक्ष्य में उनके समय की एक कथा लिख रहा हूँ।
कहते है कि गुरु के दरबार में जो भी आता हैं वह कभी खाली वापस नही जाता है फिर चाहे वो स्वार्थ भाव से आये या फिर निस्वार्थ भाव सें आयें ।
गुरु हरगोविन्द सिंह जी के समय में एक बहन जिसका नाम सुलक्षणा था बडी परेशान थी क्योंकि उसकी कोई संतान नही थी वह हर जगह जा जा कर थक गई मन्दिर, मस्जिद, मजार, मसान सभी जगह उसने फरियाद लगाई लेकिन उसको कोई संतान नही हुई। तभी किसी ने कहा कि जो तुझे पुत्र चाहिये तो गुरुनानक के दर पर जा, इस समय गुरुनानक जी की छठी ज्योत मीरी पीरी के मालिक गुरु हरगोविन्द जी अकाल तख्त में सुशोभित है तु उनके चरणों मे जा कर विनती कर, सुना है कि गुरुनानक जी के दर पर जा कर अरदास करता है माँग माँगता है वो कभी खाली नही लौटता है। सुलक्षणा बहन जब मीरी पीरी के मालिक गुरु हरगोविन्द जी के चरणों में गयी और विनती की " हे सच्चे बादशाह ! तेरे चरणों में अरदास हैं मैं सारे-सारे द्वारे ड़ोल आयी हुँ कही खैरात नही मिली एक बस अब तेरा दर रह गया है और तेरे दर के लिये मैने सुना है जो तेरे दर पर आता है वो कभी खाली नही जाता हैं । मेरी झोली में भी एक पुत्र ड़ाल दों । " मीरी पीरी के मालिक गुरु हरगोविन्द जी ने एक पल के लिये आँखें बन्द की और जो आँखे खोली तो बोले "सुलक्षणिये ! तेरे भाग्य में तो सात जन्मों तक संतान नही हैं ।" सुलक्षणा बहन बडी उदास होकर वापस चल पडी जब जा रही थी तो रास्ते में भाई गुरुदास जी मिल गये। आँखों में आँसु थे सुलक्षणा बहन के, भाई गुरुदास जी बोले " क्या बात है बहन ! गुरु नानक जी के दरबार से तो जो रोता हुआ आता है वो भी हँसता हुआ जाता है तो फिर तु क्युं रो रही है ।" सुलक्षणा बहन बोली कि एक पुत्र माँगने आयी थी गुरुनानक जी के दर पर, पर आज वहाँ से भी जवाब मिल गया। भाई गुरुदास जी ने पूछा "साहिब जी ने क्या कहा ?" सुलक्षणा बहन बोली "साहिब जी ने बोला है कि तेरे भाग्य में पुत्र है ही नही ।" तो भाई गुरुदास जी ने कहा कि आपने विनती करनी चाहिये थी कि अगर वहा भाग्य में नही लिखा है तो आप यहाँ लिख दो क्योकि वहाँ भी लिखने वाले आप ही हो और यहाँ भी देने वाले आप ही हो। सुलक्षणा बहन को युक्ति बताई भाई गुरुदास जी ने कि जब कल साहिब जी अपने घोड़े पर जायेंगे सैर के लिये तब रास्ते में तुम उनसे विनती करना।
आज सुलक्षणा बहन रास्ते पर आकर खड़ी हो गयी क्योंकि उसे पता था कि आज इस रास्ते से मीरी पीरी के मालिक गुरु हरगोविन्द जी आने वाले हैं, जैसे ही साहिब जी आये और घोड़े पर चढ़ने लगे तो सुलक्षणा बहन ने उनके चरण पकड़ लिये और बोली " गरीब नवाज ! कृपा करो
नाम मेरा सुलक्षणी, मैं वसती हूँ चोबे, अरज करेनीया है हरगोबिन्द आगे, अ फलजान्दीनु कोई फल लगें ।
विनती करती है कि एक पुत्र दे दो । तुझे बोला था कल कि तेरे भाग्य में पुत्र हैं ही नही ।" सुलक्षणा बहन बोली कि उधर भी भाग्य लिखने वाला तू ही है और ईधर भी भाग्य बनाने वाला तू ही हैं। जो उधर नही लिखा तो इधर लिख दों ऐसी प्यार से जो उसने विनती की तो हरगोविन्द जी प्रसन्न हो गये और बोले "सुलक्षणा जा तुझे पुत्र दिया ।" सुलक्षणा बहन हाथ जोड़कर बोली "साहिब जी ! मुझसे तो बहुतों ने कहा कि तुझे पुत्र होगा पर आज तक नही हुआ अब मुझे कह कर नही आप मुझे लिख कर देकर जाओ।" साहिब जी बोले "अच्छा तो जा कागज कलम ले आ मैं लिख देता हूँ ।" सुलक्षणा ने ढूँढा और तो कुछ नही मिला उसको, सामने एक ठीकरी पडी थी उसको ही उठा लाई और बोली "हे गरीब नवाज ! इसी पर लिख दो अपने तीर से ही लिख दों ।" गुरु हरगोविन्द जी ने तीर निकाला और जो ठीकरी पर एक लिखने लगें तो सुलक्षणा बहन हाथ जोड़कर कर साहिब जी के घोड़े से विनती की तु तो गुरु का घोडा हैं साहिब जी हर समय तेरे पर सवारी करते हैं। गुरुनानक जी के समय में तो कुतिया की भी करामात है तू भी कोई करामात कर के दिखा । घोड़े ने सिर हिलाया कि मानो कह रहा हो कि ठहर मैं जो तुझे कर के दिखाउगां उसको दुनिया देखेगी । साहिब जी ने ज्युँ ही एक लिखने के लिये तीर चलाया त्युँ ही घोडे ने सिर हिलाया तो वह एक की बजाय सात हो गया । साहिब जी बोले कि ले सुलक्षणिये एक लिखने जा रहा था सात लिख दिया। सुलक्षणा कहती थी कि गरीब नवाज! "लोहडी सत्ता दी सी", एक से कुछ होना ही नही था, जमीन जायदाद तो बहुत है पर "लोहडी सत्ता दी सी ।"
जो सुलक्षणा बहन के घर पर पहला पुत्र हुआ तो वह मीरी पीरी के मालिक गुरु हरगोविन्द जी के चरणों मे ले कर पहुँची और जो माथा झुकाया और माथा झुकाते-झुकाते कहती हैं ................
सोई सोई दे...वे, जो माँगे ठाकुर अपने ते
सोई सोई दे...वे .............

सोमवार, 14 जून 2010

श्री आसारामायण पाठ से मिली मंत्र - दीक्षा

मैं बहुत नास्तिक प्रकृति का था। ईश्वर या भगवान के प्रति मुझे तनिक भी श्रद्धा नहीं थी क्योंकि मैं विज्ञान का विद्यार्थी था और विज्ञान से बढ़कर दूसरा कोई धर्म हो ही नहीं सकता, ऐसी मेरी मान्यता थी। मेरी माता जी पूज्य स्वामी का साहित्य हमेशा पढ़ती रहती थी और मुझसे भी पढ़ने का आग्रह किया करती थी लेकिन मैं साधु-संतों के वचनों पर विश्वास नहीं करता था, इसलिए मैं उले टाल देता था। डिप्लोमा इन इलेक्ट्रोनिक्स की अंतिम वर्ष की परीक्षा देने के बाद घर पर ही छुट्टियों में मैंने माता जी के अत्यधिक आग्रह के कारण संत श्री आसारामजी आश्रम द्वारा प्रकाशित जीते जी मुक्ति पुस्तक पढ़ना आरम्भ किया। जैसे-जैसे उस पुस्तक का एक-एक पृष्ठ पढ़ता गया, वैसे-वैसे अदृश्य आनंद से अभिभूत होकर मेरी नास्तिकता आस्तिकता में परिवर्तित होने लगी। ईश्वर और धर्म का महत्त्व मुझे समझ में आने लगा। मैं इन महापुरूष के दर्शन के लिए बेचैन होने लगा जिन्होंने जिन्होंने मेरे जीवन में धर्म के प्रति आस्तकिता का बीजारोपण किया। मैंने अनेक प्रयत्न किये लेकिन अनेकानेक समस्याओं के कारण उनके पावन दर्शन करने नहीं जा सका।

एक बार मैंने पढ़ा कि श्री आसारामायण के 108 पाठ करने वालों की सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं। मैंने भी श्रीआसारामायण के 108 पाठ किये और गुरूदेव को मन ही मन प्रार्थना की कि मंत्रदीक्षा के मार्ग में आने वाले सभी व्यवधान दूर कर दर्शन देकर अनुगृहीत कीजिएगा।

उस दिन मेरे विश्वास को अत्यधिक बल मिला तथा ईश्वर का अस्तित्व जगत में है, ऐसा आभास होने लगा। श्रीआसारामायण के 108 पाठ पूर्ण होते ही सूरत आश्रम जाकर पूज्य श्री के दर्शन तथा मंत्रदीक्षा प्राप्ति के मेरे सब मार्ग खुल गये। मंत्रदीक्षा के समय गुरूदेव द्वारा की गई शक्तिपात-वर्षा से प्राप्त अलौकिक आनंद के मधुर क्षणों का अनुभव शब्दों में वर्णित करना मेरे लिए असंभव है। पूज्यश्री के पावन सान्निध्य में आये हुए मुझे तीन वर्ष से अधिक समय हो चुका है और इस दौरान अनेक दिव्यातिदिव्य अनुभवों के दौर से मैं गुजर चुका हूँ। पूज्य गुरूदेव के सान्निध्य में रहते हुए मैंने अनुभव किया है कि इस कलियुग में पूज्यश्री ही भक्तिदाता, मुक्तिदाता व सर्वसमर्थ संत हैं। पूज्य श्री के महान् गुणों का वर्णन करने को बैठूँ तो कितने ही ग्रन्थ तैयार हो जाय लेकिन यहाँ मैं सिर्फ इतना ही कहूँगा कि पूज्य श्री के सान्निध्य और मार्गदर्शन में जीवन, समाज और राष्ट्र जितना उन्नत हो सकता है, उतना विज्ञान से नहीं। मेरा भ्रमभेद मिटाकर मुझे निजानंद का रसपान करवाने वाले श्री गुरूदेव के श्रीचरणों में मेरे कोटि-कोटि नमन्....

किशोर विश्वनाथ चौधरी
27, चेतना नगर, नासिका (महा.)

ये तो श्री आसारामायण पाठ की एक महिमा है, ऐसी तो कितनी सारी है जिनका बयान नही किया जा सकता हैं। ऐसे कितने लोगों के अनुभव है जिनके बारे में हमने सुना भी नही होगा। जो जो पाठ करता है उसके मन की मुराद तो पूरी होती ही है और उसकी गुरुभक्ति भी बढ़ती हैं। क्योंकि जैसे जैसे आप इस पाठ की पंक्तियों में डूबते जायेंगे आपको गुरुदेव की जीवन लीला के साक्षात दर्शन होते चले जायेंगे। अगर मेरी इस बात पर यकीन ना आये तो खुद ही अनुभव करके देख लीजिये।

हरि: ॐ .........

रविवार, 13 जून 2010

जो जिस भाव से भजे गुरुदेव को वैसा ही बना देते है गुरुवर.


सेवी साहिब आपनों, और ना जाचों कोई.....
"हे गुरुदेव! मुझे बल दो, मुझे शक्ति दो कि मैं एक तेरी सेवा करुं बस सिर्फ़ तेरी सेवा करुं"

शिष्य के आसरा है सदगुरुदेव और जो शिष्य गुरुदेव को छोड़कर किसी और के पास जायेगा, किसी देवी-देवता के पास, किसी मन्त्र-तन्त्र वाले के पास या किसी कब्र या मजहार में जायेगा तो जैसे बछडा अपनी गौ माता को छोड़कर किसी दूसरी गाय के पास जा कर उससे दूध माँगेगां तो उसको दूध नही मिलेगा लातें मिलेगी। वैसे ही अगर अपने गुरु को छोड़कर यदि कोई कही और जायेगा तो फिर इसी संसार में फँसा रह जायेगा। कभी पार नही पायेगा।
सेवा कर गुरु की तो पार ही पायेगा कभी मार नही खायेगा, जितने भी महान संत प्रसिद्ध हुए है अपने गुरु की सेवा करके ही प्रसिद्ध हुए है। भाई लहड़ा गुरुनानक जी की सेवा करके ही गुरुगद्दी ले गयें। गुरुदेव की सेवा जिसने मनोकामना करके की उसकी मनोकामना पूरी हो गयी और जिन्होनें सदगुरु की सेवा निष्कामता से की उन्होने गुरुदेव को ही पा लिया। भाई लहड़ा जी ने गुरुनानक जी की सेवा निष्कामता से की जिसके फ़लस्वरूप गुरुनानकजी ने उनको बुलाया और कहा कि "लहडियाँ जो तू लहड़ा है तो असी तेरा देड़ा है" और गुरुनानक जी ने उनको अपने अंग से लगा कर उनको अंगद कर दिया और अपनी ज्योति उनके अंदर जला दी और आज्ञा दी कि आप खण्डूर जा कर साध-संगत को नाम जप करवाओं। गुरु अंगद देव जी खण्डूर की धरती पर बैठें हर रोज सिर्फ़ एक ही अरदास करते है गुरुनानक जी से कि जब से मैने तुझे देखा है तब से मुझे और कोई जचता ही नही हैं।
"सेवी साहिब आपनों और ना जाचों कोई, नानक ता का दास है बिंद-बिंद चुख-चुख होई "
रोज सवेरे उठकर गुरु अंगद देव जी साध-संगत को दर्शन देते है और कीर्तन करते हैं। एक दिन सवेरे गुरु अंगद देव जी खण्डूर की धरती पर बैठें है और गुरु का दरबार सजाया हैं और कीर्तन गा रहे है सेवी साहिब आपनों और ना जाचों कोई, नानक ता का दास है बिंद-बिंद चुख-चुख होई तो भाई बाला गुरु अंगददेव के दर्शन करने के लिये आये कि देखुं वो कौन है जिन्होने गुरु नानक जी को भी जीत लिया है। जिन्होने गुरुनानक जी का हृदय भी जीत लिया है। जब भाई बाला गुरु के दरबार में पहुँचे तो क्या देखते है कि गुरु अंगददेव कीर्तन में झूम रहे है जब कीर्तन से उनकी आँखे खुली तो देखा कि भाई बाला खडे है। थोडी देर के बाद गुरुअंगद देव जी ने उनको पास बुलाया और पूछा कि "भाई! आप कौन है।" भाई बाला ने कहा कि "हे गरीब नवाज! मेरा नाम भाई बाला है और मैने सारी उम्र गुरुनानक जी के साथ रहकर उनकी सेवा की है।" जैसे ही गुरुअंगद देव जी ने सुना "भाई बाला" तो उठ खड़े हुए और उनको हृदय से लगा लिया कि "तू बाला है मेरे गुरु नानक जी का साथी" अपने पास बिठा लिया और बोले कि सुनाओ गुरुनानक जी की लीलायें। जैसे-जैसे भाई बाला गुरुनानक जी की लीलाओं का वर्णन करते त्युँ-त्युँ गुरु अंगददेव की आँखों से आँसू बहते हैं। जैसे कोई अपने किसी प्यारे की खबर दे तो कैसे हमारी आँखें भर आती है वैसे ही गुरु अंगददेव की आँखें गुरुयाद से भर गयी। कुछ दिन तक भाई बाला उनके साथ रहे तो गुरु अंगददेव जी ने उनसे गुरुनानक जी की साखीयाँ लिख ली और उनको रख लिया। जब भाई बाला जाने लगे तो उन्होनें गुरु अंगददेव जी से बोला "गरीब नवाज! एक शंका है मन में उसको आप निवृत कर दे" तो गुरुअंगददेव जी ने बोला "भाई बाला गुरु के सामने कोई शंका नही रखना चहिये। क्योकि गुरु के सामने जिनके हृदय में शंका रह जाता है उसका हृदय मैला हो जाता हैं"। अपनी शंका बताओं। भाई बाला बोले कि सारी उम्र गुरु नानकजी की सेवा तो मैने की, गुरुनानजी के साथ मैं रहा लेकिन जब गुरुगद्दी देने का समय आया तो उन्होने आपको बैठा दिया। गुरु अंगददेव जी बोले "भाई बाला! तूने गुरु नानकजी को क्या मान कर सेवा की थी, तूने गुरु नानकजी को क्या मान कर पूजा था"। भाई बाला बोले "मैं गुरु नानकजी को पूर्ण संत मान कर पूजा की थी"। तो गुरु अंगददेव जी ने कहा कि फिर गुरुनानकजी ने तुझे पूर्ण संत ही बना दिया। तब भाई बाला ने पूछा "गरीब नवाज ! मैने तो गुरु नानकजी को पूर्ण संत समझ कर पूजा था पर आप बताओ कि आपने गुरु नानकजी को क्या मान कर पूजा था। तब गुरुअंगद देव जी की आँखें भर आई और उन्होने कहा कि मैने गुरुनानक जी को पारब्रह्म परमेश्वर जान कर पूजा था तब भाई बाला की आँखे भर आयी और उन्होने बोला तो फिर गुरुनानकजी ने आपको पारब्रह्म परमेश्वर का रूप ही बना दिया।
"सदगुरु नो जेहा को कर जाणें, तेहा फल पावे सोई...."
सदगुरु की सेवा सदगुरु को जो जैसा मानकर करता है वो वैसा फल पाता है। भाई लहड़ा पा गये और गुरु अंगददेव बन गयें।
साहिब मेरा नीत नवाँ सदा सदा दातार.................

शनिवार, 12 जून 2010

५ मंत्रों की आहुति मन ही मन करें

पूज्य बापू जी ने सत्संग में भगवान को मन से प्रार्थना करते हुए मन ही मन निम्न लिखित पाँच (५) मंत्रों की आहुतियाँ देने के लिए कहा है :

1। ॐ अविद्यां जुहोमि स्वाहा: (Om Avidyaam Juhomi Svaha)

अर्थ : हे परमात्मा ! हम अपनी अविद्या को , अज्ञान को , आपके ज्ञान में स्वाहा करते हैं ।

2। ॐ अस्मिता जुहोमि स्वाहाः (Om Asmita Juhomi Svaha)

अर्थ : अपने शरीर से जुड़ कर हमने जो मान्यताएं पकड़ रखी हैं , धन की , पद की , आदि उन सब को हम स्वाहा करते हैं ।

3। ॐ रागं जुहोमि स्वाहा: (Om Raagam Juhomi Svaha)

अर्थ : जिसमें राग होता है उसके दुर्गुण नहीं दिखते और जिसमें द्वेष होता है उसके गुण नहीं दिखते। हम किसी भी व्यक्ति, वस्तु अथवा परिस्थिति से राग न करें। राग को हम स्वाहा करते हैं ।

4। ॐ द्वेषं जुहोमि स्वाहाः (Om Dvesham Juhomi Svaha)

अर्थ : किसी भी व्यक्ति, वस्तु अथवा परिस्थिति से द्वेष न करें; उस द्वेष को भी हम स्वाहा करते हैं ।

5। ॐ अभिनिवेशम जुहोमि स्वाहाः (Om Abhinivesham Juhomi Svaha)

अर्थ : मृत्यु का भय निकाल दें ; यह शरीर मैं हूँ और मैं मर जाऊंगा इस दुर्बुद्धि का मैं त्याग करता हूँ ; जो शरीर मरता है वह मैं अभी से नहीं हूँ ; जो शरीर के मरने के बाद भी रहता है, वह मैं अभी से हूँ ।

हरि ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ

मंगलवार, 8 जून 2010

श्री राम नाम की महिमा

एक बार पार्वती जी ने भगवान शिवजी से श्री हरि की आराधना के बारे में पूछा तो भगवान शिव ने उनको भगवान श्री विष्णु की श्रेष्ठ आराधना, नित्य-नैमित्तिक कृत्य तथा भगवत्भक्तों की पूजा का वर्णन किया। जिसे सुन कर पार्वती जी ने कहा - नाथ ! आपने उत्तम वैष्णव धर्म का भलीभाँति वर्णन किया। वास्तव में परमात्मा श्री विष्णु का स्वरूप गोपनीय से भी अत्यन्त गोपनीय है। सर्वदेव वन्दित महेश्वर ! मैं आपके प्रसाद से धन्य और कृतकृत्य हो गयी। अब मैं भी सनातन देव श्री हरि का पूजन करूँगी।
श्री महादेव जी बोले - देवी ! बहुत अच्छा, बहुत अच्छा ! तुम सम्पूर्ण इन्द्रियों के स्वामी भगवान लक्ष्मीपति का पूजन अवश्य करो। भद्रे ! मैं तुम-जैसी वैष्णवी पत्नी को पाकर अपने को कृतकृत्य मानता हूँ।
वसिष्ठजी कहते है - तदनन्तर महादेव जी से उपदेशानुसार पार्वती जी प्रतिदिन श्रीविष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करने के पश्चात भोजन करने लगीं। एक दिन परम मनोहर कैलास शिखर पर भगवान श्री विष्णु की आराधना करके भगवान शंकर ने पार्वतीदेवी को अपने साथ भोजन करने के लिये बुलाया। तब पार्वति देवी ने कहा - "प्रभो ! मैं श्रीविष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करने के पश्चात भोजन करूँगी, तब तक आप भोजन कर लें" यह सुन कर महादेव जी ने हँसते हुए कहा - "पार्वती ! तुम धन्य हो, पुण्यात्मा हो ; क्योकि भगवान श्रीविष्णु में तुम्हारी भक्ति है। देवि ! भाग्य के बिना भगवान श्रीविष्णु की भक्ति प्राप्त होना बहुत कठिन है। सुमुखि ! मैं तो "राम ! राम ! राम !" इस प्रकार जप करते हुये परम मनोहर श्रीराम नाम में ही निरन्तर रमण किया करता हूँ । राम-नाम सम्पूर्ण सहस्त्रनाम के समान है। पार्वती ! रकारादि जितने नाम हैं, उन्हें सुनकर रामनाम ही आशंका से मेरा मन प्रसन्न हो जाता है।

श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्त्रनाम ततुल्यं रामनाम वरानने ॥
रकारादीनि नामानि श्रृण्वतो म्म पार्वति । मनः प्रसप्रतां याति रामनामाभिशंकया ॥ (२८१ । २१-२२)

अतः महादेवि ! तुम राम-नाम का उच्चारण करके इस समय मेरे साथ भोजन करों ।" यह सुन कर पार्वती जी ने राम-नाम का उच्चारण करके भगवान शंकर के साथ बैठकर भोजन किया। इसके बाद उन्होने प्रसन्नचित होकर पूछा - ‘ देवेश्वर ! आपने राम-नाम को सम्पूर्ण सहस्त्रनाम के तुल्य बतलाया है यह सुन कर राम-नाम में मेरी बडी भक्ति हो गयी हैं अतः भगवान श्री राम के यदि और भी नाम हों तो बताइयें।’
श्री महादेव जी बोले - "पार्वती ! सुनो, मैं श्रीरामचन्द्र जी के नामों का वर्णन करता हूँ। लौकिक और वैदिक जितने भी शब्द हैं, वे सब श्रीरामचन्द्रजी के ही नाम हैं। किन्तु सहस्त्रनाम उन सबमें अधिक है और उन सहस्त्रनामों में भी श्रीराम के एक सौ आठ नामों की प्रधानता अधिक है। श्रीविष्णु का एक-एक नाम ही सब वेदों से अधिक माना गया है। वैसे ही एक हजार नामों के समान अकेला श्रीराम-नाम माना गया है। पार्वती ! जो सम्पूर्ण मन्त्रों और समस्त वेदों का जप करता है, उसकी अपेक्षा कोटिगुना पुण्य केवल राम-नाम से उपलब्ध होता है।"

[{( स्रोत - पद्मपुराण - उत्तरखण्ड, अध्याय २९१ (श्रीराम-नाम महिमा और श्रीरामचन्द्रजी के १०८ नाम का माहात्म्य )}]

यही नाम अगर गुरुदेव से गुरुमन्त्र के रूप में मिल जाये तो फिर उसकी बराबरी कोई नही कर सकता........

शनिवार, 5 जून 2010

मेरे साहिबा (जोगी) कौन जाने गुण तेरे....

सदगुरुओं के गुण कौन जान सकता हैं। सदगुरुओं ने कितने तारे उनको कौन जान सकता हैं। आकाश के तारे गिनें जा सकते है परन्तु सदगुरुओं ने कितने तारे कोई नही गिन सकता हैं।

तारे गिने जात है ना तारे गिने जात

ऐसे ही गुरु नानक जी थे जिन्होने कितनों को तारा ये किसी को नही पता।
एक बार गुरु नानक जी का एक शिष्य भगीरथ गुरु नानक जी के पास आया और पूछा कि गुरुजी ! मैं दूसरे शहर जा रहा हूँ, आप मुझे जाने की आज्ञा दीजिये। गुरुनानक जी ने कहा कि भगीरथा जा रहा है तो बेशक जा पर एक बात का ध्यान रखना कि एक रात से ज्यादा मत रुकना, जो तू एक रात से ज्यादा रुका तो तेरा जन्म बिगड़ जायेगा। भगीरथ ने विनती की कि हे मेरे सच्चे बादशाह ! मैं नही रुकुंगा। आपका हुक्म है कि एक रात रुकना तो मेरे सच्चे बादशाह मैं एक रात ही रुकुंगा। मेरा जन्म क्युं बिगडें, क्योकि गुरु के वचन से ही जनम सफ़ल होता हैं और वचन ना मानने से ही वचन बिगडता हैं। फ़िर गुरुनानक जी ने भगीरथ से कहा कि जो तू दूसरे शहर जा रहा है तो एक काम और करना कि मरदाने की बेटी की शादी है उसे जो सामान चाहिये वो लिखवा ले और लेते आना। भगीरथ आया मरदाना के पास और जो जो सामान मरदाना को चाहिये था लिख लिया, सुहाग का जोडा भी लिख लिया, सारा सामान लिख लिया और आज्ञा लेने गुरुनानक जी के पास आया कि सच्चे बादशाह मैं जाउं ! गुरुनानक जी बोले कि जा भगीरथा पर एक रात से ज्यादा मत रुकना, जो तू एक रात से ज्यादा रुका तो तेरा जन्म बिगड़ जायेगा। भगीरथ ने चरणों में माथा रखा और कहा कि सच्चे बादशाह मैं एक रात ही रुकुंगा। भगीरथ दूसरे शहर पहुंचा तो उसका एक व्यापारी मित्र रहता था भाई मनसुख, शाम को वो भाई मनसुख के घर पहुंचा और बोला "मित्रा ! आज की रात मैं तेरे घर रुकुंगा और कल मैं वापस जाउंगा क्योकि मेरे गुरु का हुक्म है जो मैं एक रात से ज्यादा रुकुंगा तो मेरा जनम बिगड जायेगा।" मनसुख ने पूछा कि "ऐसा कौन सा तेरा गुरु है कि जिसका वचन मानने से तेरा जन्म सफ़ल होता है और न मानने से जन्म बिगडता हैं" तब भगीरथ ने हाथ जोड़ कर कहा कि "मेरे गुरु गुरु नानक जी हैं।" जैसे ही मनसुख ने गुरु नानक जी का नाम सुना तो उसका मन खिंच गया, फ़िर भगीरथ ने कहा कि भाई ये सामान का पर्चा है ये सामान बांध दे क्योकि मुझे सुबह ही जाना हैं। सवेरा हुआ, भाई मनसुख ने सामान बांध दिया था। भगीरथ ने कहा कि "मनसुखा ! चल एक बार गुरुनानक जी के दर्शन कर ले पूर्ण पुरुष है गुरु नानक जी परमेश्वर का रूप है भाई मनसुख कहने लगा "कि चलता तो हूँ पर मेरी एक शर्त है कि जब मैं वहाँ पहुँचु तो गुरुनानक मेरा नाम पुकार कर मुझे बुलावे।" दोनों जब गुरुनानक जी के पास पहुचें तो भगीरथ ने गुरु नानक जी के चरणों में माथा टेका। मनसुख साथ में खडा रहा, तो गुरु नानक जी बोले भगीरथा ! आ गया हैं और साथ उसको भी लाया है जिसकी माँ ने इसका नाम मनसुख रखा है। लेकिन कभी इसने मन का सुख नही जाना कि मन का सुख क्या होता है। इसने तन के सुख को ही सदा सुख समझा है। तन का सुख तो इसने बहुत पाया पर मन का सुख आज तक इसको नही मिला। जैसे ही भाई मनसुख ने गुरुनानक जी के मुख से अपना नाम सुना तो वो चरणों में गिर पडा और बोला "सच्चे बादशाह ! मुझे माफ़ कर दो। मै आपकी परीक्षा रहा था कि आप पूर्ण हो की नही। चरणों में गिर कर मनसुख कहता है कि सच्चे बादशाह मुझे अपना सिख (शिष्य) बना लो। ये जब गुरुनानक जी ने सुना तो मनसुख से सिर पर हाथ रखा और बोले मनसुखा जप "श्री वाहेगुरु"। जैसे ही गुरुनानक जी के हाथ की शरण मनसुख को मिली मनसुख को इतना सुख मिला कि आज तक उसे वो सुख नही मिला था। इतना धन कमाकर आज तक मनसुख को जो सुख नही मिला था उससे ज्यादा सुख सिर्फ़ गुरुनानक जी के उसके सिर पर हाथ रखने से मिल गया। फ़िर मनसुख ने विनती की कि हे गरीब नवाज दया करों मुझे अपना सिख बना लो। तो गुरुनानक जी बोले कि मनसुखा जो तुने मेरा सिख बनना है तो तुझे सवेरे जल्दि उठना पडेगा, नियम करना पडेगा, साधसंगत के साथ बैठ कर नाम जप करना पडेगा जा मरदाने के पास जा और सबद लिख ले और रोज कीर्तन करना जो तू कीर्तन करेगा न तो हम तेरे साथ बैठे होंगे। क्योकि जो कर्ते (परमब्रह्म) का कीर्तन करता है तो सारा जग उसके साथ हो जाता है। भाई मनसुख ने मरदाना से सबद ले लिये और गुरुनानक जी से आज्ञा ले कर घर चला आया और रोज नियम करने लगा। वो व्यापारी था तो एक दिन दूर देश से वापस लौट रहा था तो उसका बेडा समुद्री तूफ़ान में फ़ँस गया मल्लाहों ने बहुत कोशिश की लेकिन जब कुछ नही हुआ तो उन्होने लंगर डाल दिये और भाई मनसुख के पास आकर बोले कि अब जहाज नही संभल रहा हैं क्योकि हवा विपरीत हो रही है और बेडा तेज समुद्री लहरों से टूट जायेगा, अब हम लोगों लो डूबने से कोई नही बचा सकता हैं। तो भाई मनसुख ने कहा कि तुम लोग चिन्ता क्यु करते हो जिसका गुरु गुरुनानक हो उसका बेडा कोई डुबा नही सकता वो तो हमेशा तरता ही है। फिर सब लोग बैठ कर गुरुनानक जी का नाम लेकर कीर्तन शुरु किया। कीर्तन में जब वे एक मन और एक चित्त हो गये तब जब आँख खुली तो सभी क्या देखा कि उनका बेडा किनारे लगा हुआ हैं। गुरु नानक जी ने भाई मनसुख का बेडा तार दिया डूबने नही दिया। क्योकि जिस बेडे के अन्दर कीर्तन होता है और जिसका कोई गुरु होता है उसका बेडा भी कभी डूब सकता है ? इस प्रकार से उन सब की जान बच गयी। सभी ने गुरुनानक जी को शुक्रिया अदा किया और सभी बोले

मेरे साहिबा कौन जाने गुण तेरे.... कौन जाने गुण तेरे....
कौन जाने गुण तेरे.... कौन जाने गुण तेरे.... कौन जाने गुण तेरे....
मेरे साहिबा कौन जाने गुण तेरे.... कौन जाने गुण तेरे....