मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

गुरु...


संसार में माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी के सम्बन्ध की तरह गुरु-शिष्य का सम्बन्ध भी एक सम्बन्ध ही है लेकिन अन्य सब सम्बन्ध बन्धन बढ़ाने वाले हैं जबकि गुरु-शिष्य का सम्बन्ध सम बन्धनों से मुक्ति दिलाता है। यह सम्बन्ध एक ऐसा सम्बन्ध है जो सब बन्धनों से छुड़ाकर अन्त में आप भी हट जाता है और जीव को अपने शिवस्वरूप का अनुभव करा देता है।
सच्चे गुरु नहीं मिले हों तो पुण्य कर्म करो। जिनके पुण्यकर्म में कमी है उनको गुरु सामने मिल जायें फिर भी वे उन्हें पहचान नहीं पाते।
गुरु को नापने तोलने का विचार शिष्य के दिल में उठा और गुरु के बाह्य आचरण-व्यवहार को देखकर उनकी गहराई का अन्दाज लगाना शुरु किया तो समझो शिष्य के पतन का प्रारंभ हो चुका।
गुरु शिष्य के कल्याण के लिए सब कुछ करते हैं। उनके अन्दर निरन्तर अदम्य स्नेह की धारा बहती रहती है। वे द्वेष के वश होकर किसी को थोड़े ही डाँटते फटकारते हैं ? उनके सब राग-द्वेष व्यतीत हो चुके हैं। तभी तो वे गुरु बने हैं। उनकी हर चेष्टा सहज और सब के लिए हितकर ही होती है।
गुरुदेव के पीछे पीछे जाने की क्या आवश्यकता है ? उनके आदेश का अनुसरण करना है न कि उनके पीछे पीछे भटकना है। देह के पीछे पीछे भटकने से क्या होगा ? सत्शिष्य वही है जो गुरु के आदेश के मुताबिक चले। गुरुमुख बनो, मनमुख नहीं। गुरुदेव के वचनों पर चलो। सब ठीक हो जायेगा। बड़े दिखने वाले आपत्तियों के घनघोर बादल गुरुमुख शिष्य को डरा नहीं सकते। उसके देखते देखते ही वे बादल छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। गुरुमुख शिष्य कभी ठोकर नहीं खाता। जिसको अपने गुरुदेव की महिमा पर पूर्ण भरोसा होता है ऐसा शिष्य इस दुर्गम माया से अवश्य पार हो जाता है। गुरुकृपा से वह भी एक दिन अपने अमरत्व का अनुभव कर लेता है और स्वयं गुरुपद पर आरूढ़ हो जाता है।
जिस शिष्य में गुरु के प्रति अनन्य भाव नहीं जगता वह शिष्य आवारा पशु के समान ही रह जाता है।
सब पुरुषार्थ गुरुकृपा प्राप्त करने के लिए किये जाते हैं। गुरुकृपा प्राप्त हो जाये तो उसे हजम करने का सामर्थ्य आये इसलिए पुरुषार्थ किया जाता है। दूध की शक्ति बढ़ाने के लिए कसरत नहीं की जाती लेकिन शक्तिमान दूध को हजम करने की योग्यता आये इसलिए कसरत की जाती है। दूध स्वयं पूर्ण है। उसी प्रकार गुरुकृपा अपने आप में पूर्ण है, सामर्थ्यवान है। भुक्ति और मुक्ति दोनों  देने के लिए वह समर्थ है। शेरनी के दूध के समान यह गुरुकृपा ऐसे वैसे पात्र को हजम नहीं होती। उसे हजम करने की योग्यता लाने के लिए साधक को सब प्रकार के साधन-भजन, जप-तप, अभ्यास-वैराग्य आदि पुरुषार्थ करने पड़ते हैं।
जो साधक या शिष्य गुरुकृपा प्राप्त होने के बाद भी उसका महत्त्व ठीक से न समझते हुए गहरा ध्यान नहीं करते, अन्तर्मुख नहीं होते और बहिर्मुख प्रवृत्ति में लगे रहते हैं वे मूर्ख है और भविष्य में अपने को अभागा सिद्ध करते हैं।
संसारियों की सेवा करना कठिन है क्योंकि उनकी इच्छाओं और वासनाओं का कोई पार नहीं, जबकि सदगुरु तो अल्प सेवा से ही तुष्ट हो जायेंगे क्योंकि उनकी तो कोई इच्छा ही नहीं रहा।
सच पूछो तो गुरु आपका कुछ लेना नहीं चाहते। वे आपको प्रेम देकर तो कुछ देते ही हैं परन्तु डाँट-फटकार देकर भी आपको कोई उत्तम खजाना देना चाहते हैं।
उपदेश बेचा नहीं जा सकता। उपदेश का दान हो सकता है। इसी कारण हम सदगुरुओं के ऋणी रहते हैं। और.... सदगुरु का कर्जदार रहना विश्व का सर्वाधिक धनवान बनने से भी बड़े भाग्य की बात है।
अपनी वाणी को पवित्र करने के लिए, अपनी बुद्धि को तेजस्वी बनाने के लिए, अपने हृदय को भावपूर्ण बनाने के लिए हम लोग सन्त, महापुरुष और सदगुरुओं की महिमा गा लेते हैं। यह ठीक है लेकिन उनकी असली महिमा के साथ तो अन्याय ही होता है। वेद भी उनकी महिमा गाते गाते थक चुके हैं।
गुरुकृपा या ईशकृपा हजम हुई कि नहीं, हम ज्ञान में जगे कि नहीं यह जानना हो तो अपने आपसे पूछोः "परमात्मा में रूचि हुई कि नहीं ? विलास, ऐशो-आराम से वैराग्य हुआ कि नहीं ?"
गुरुकृपा, ईश्वरकृपा और शास्त्रकृपा तो अमाप है। किसी के ऊपर कम ज्यादा नहीं है। कृपा हजम करने वाले की योग्यता कम ज्यादा है। योग्यता लाने का पुरुषार्थ करना है, ईश्वर पाने का नहीं।
गुरु जिस साधक या शिष्य की बेईज्जती करके जीवन सुधारते हैं उनकी इज्जत आखिर में बढ़ती है। गुरु द्वारा की गई बेइज्जती सहन नहीं करने से बाद में शिष्य के जीवन में जो बेइज्जती होती है वह कितनी भयंकर होती है !
जो सदभागी शिष्य गुरु की धमकियाँ, डाँट-फटकार सहकर आगे बढ़ता है, खुद यमराज भी उसकी इज्जत करते हैं।
गुरु के कटुवचन जो हँसते हुए स्वीकार कर लेता है उसमें जगत भर के विष हजम करने का सामर्थ्य आ जाता है।
गुरुकृपा हुई तो समझना कि आनन्द के खजाने खुलने लगे।
अध्यात्म मार्ग में प्रवेश कराने वाले ज्ञानी और फकीर लोग एक दृष्टिमात्र से अध्यात्म के जिज्ञासु को जान लेते है, उसकी योग्यता प्रगट हो जाती है। इसलिए आज तक ऐसे जिज्ञासुओं को चुनने के लिये प्रवेशपत्र नहीं निकाले गये।
पति में परमात्मा को देखने लगोगे तो जल्दी नहीं दिखेगा क्योंकि अभी पति ने भी खुद में परमात्मा नहीं देखा है। पत्नी में परमात्मा को देखने लगोगे तो जल्दी नहीं दिखेगा क्योंकि अभी पत्नी ने भी खुद में परमात्मा को नहीं देखा है। गुरु ने खुद में परमात्मा को देखा है, पूर्णतया साक्षात्कार किया है। वहाँ पर्दा पूरा हट चुका है। गुरु परमात्मा के ही स्वरूप हैं। वास्तव में तो पति भी परमात्मा का स्वरूप है, पत्नी भी परमात्मा का स्वरूप है, अरे कुत्ता भी परमात्मा का ही स्वरूप है, लेकिन वहाँ अभी पर्दा हटा नहीं है। गुरु में वह पर्दा हट चुका है। अतः गुरु में परमात्मा को निहारो। तुम जल्दी सफल हो जाओगे।
फकीर की अमृतवाणी सबको ऐसे ही हजम नहीं होती। इसीलिए प्रयोगशील बनकर फकीर लोग अहं पर चोट करके सत्य का द्वार खोलने का प्रयास करते हैं। सदभागी साधक यह मर्म समझ लेते हैं लेकिन व्यवहार में अपने को चतुर मानने वाले लोग इस दिव्य लाभ से वंचित रह जाते हैं। ऐसे लोग जहाँ अपनी प्रशंसा होती है वहीं रुकते हैं।
गुरुदेव के चरणों की पावन रज आदर से जो अपने सिर चढ़ाता है उसकी चरणरज लेने के लिए दुनियाँ के लोग लालायित रहते हैं।
प्रारंभ में गुरु का व्यवहार चाहे विष जैसा लगता हो लेकिन परिणाम में अमृततुल्य फल देता है।
गुरु की बात को ठुकराने वाले को जगत और अन्त में यमदूत भी ठोकर मारते हैं।
गुरुदेव जो देना चाहते हैं वह कोई ऐरा-गैरा पदार्थ टिक नहीं सकता है। इसलिए सदगुरु अपने प्यारे शिष्य को चोट मार मारकर मजबूत बनाते हैं, कसौटियों में कसकर योग्य बनाते हैं।
जब-जब, जहाँ-जहाँ आपके भीतर कर्त्तापन अंगड़ाइयाँ लेने लगे तब-तब, वहाँ-वहाँ जैसे मूर्तिकार मूर्ति बनाते वक्त हथौड़ी और छेनी से पत्थर को काट काटकर अनावश्यक हिस्से को हटाता है वैसे ही, गुरु अपनी कुशलता से तुम्हारे अहंकार को हटाते रहते हैं। जीवित सदगुरु के सान्निध्य का लाभ जितना हो सके अधिकाधिक लो। वे तुम्हारे अहंकार को काट कूट कर तुम्हारे शुद्ध स्वरूप को प्रकट कर देंगे।
आत्मानन्द देने वाली गुरुकृपा मिलने के बाद भी विषय सुख के पीछे भटकना, लोगों पर प्रभाव डालने के लिए टिपटाप करना तथा शरीर को सजाने में जीवन का नूर खो देना यह तो मूर्खता की पराकाष्ठा है।
आश्रम से प्रकाशित पुस्तक "ऋषि प्रसाद" से लिया गया प्रसंग 
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