मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

गुरुवार, 11 अक्तूबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 33 (मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण)


नौवाँ सर्ग
दैव के अपलाप की सिद्धि के लिए सफल कर्मों की मनोमात्रता और मन की चिदात्मता का वर्णन।

पुरुषप्रयत्न की स्वतन्त्रता की सिद्ध करने के लिए पहले कहीं पर 'दैव असत् है' ऐसा कहा और कहीं पर प्राक्तन प्रयत्न जनित कर्म ही दैव एवं पुरुष प्रयत्न कहलाता है, ऐसा कहीं पर यह ठीक नहीं है, क्योंकि 'दैव असत् है' इस प्रथम पक्ष को मानने से लोक और वेद में दैव की जो प्रबल प्रसिद्धि है, उसकी असंगति हो जायेगी और दुर्बल दैव के अभाव में उसकी अपेक्षा पुरुषप्रयत्न की प्रबलता का प्रतिपादन करनेवाली उक्ति के साथ विरोध होगा। प्राक्तन प्रयत्न जनित कर्म ही दैव है, इस द्वितीय पक्ष में तो 'दैव असत् है' इस प्रकार की दैव में असत्त्वप्रतिज्ञा का भंग हो जायेगा, आधुनिक प्रवृत्तियाँ भी पूर्वकर्म की फलरूपा हैं, अतः प्राक्तन कर्मों के अनुकूल होने के कारण उनका विरोध न होने से 'आधुनिक प्रवृत्तियों से पूर्वकर्मों का जय होता है, यह कथन भी विरुद्ध होगा एवं कर्मपरतन्त्र होने पर पुरुष की स्वतन्त्रता का भी विघात होगा, इस प्रकार के गूढ़ अभिप्राय वाले श्रीरामचन्द्रजी उसके तात्पर्य की जिज्ञासा से वसिष्ठजी से पूछते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः भगवन्, आप सम्पूर्ण धर्मों के ज्ञाता हैं, लोक में अत्यन्त विख्यात जो दैव है, वह क्या है ? यानी वह सत् है, या असत् ? उसे आप कृपया मुझसे कहिए।।1।।
रामचन्द्रजी के पूछने पर उनके अभिप्राय को जानकर श्रीवसिष्ठजी भी दैव का अपलाप करने वाली युक्तियों से ही जगत् के अपलाप द्वारा अद्वितीय आत्मतत्त्व को समझाने की इच्छा से 'पूर्वोक्त दोनों पक्षों में फलतः कोई भेद नहीं है, इस गूढ़ अभिप्राय से प्रथम पक्ष का अवलम्बन कर उक्त अर्थ को ही कहते हैं।
वसिष्ठजी ने कहाः हे राघव, सम्पूर्ण कार्यों को करने वाला पौरुष ही है, अन्य नहीं है एवं सम्पूर्ण फलों का उपभोक्ता भी पुरुषप्रयत्न है, उसमें दैव कारण ही नहीं है। वस्तुतः आत्मा स्वयं उदासीन है, अतः उसमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व की किसी प्रकार भी उपपत्ति नहीं होती।।2।।
ऐसा बोधन करने के लिए करणभूत पुरुषप्रयत्न में फलकर्तृत्व का कथन किया गया है, यह तात्पर्य है।
दैव न कुछ करता है, न भोग करता है, न उसका अस्तित्व है, न दिखाई देता है, एवं न तो विवेकी पुरुष द्वारा उसका आदर किया जाता है, पर अनादि रूढ़ भ्रान्ति से केवल मूढ़ों ने उसकी कल्पना कर रखी है।।3।।
निरालम्बत्वरूप अनुपपत्तिका परिहार करते हैं।
फल को अवश्य देने वाले पुरुष प्रयत्न से सिद्ध वनिता आदि को पति और सपत्नी आदि से जो कुछ और अशुभ फल प्राप्त होता है, उसी का अवलम्बन कर दैवशब्द का लोक में व्यवहार होता है। अथवा पुरुषप्रयत्न द्वारा प्राप्त इष्ट और अनिष्ट वस्तु की जो इष्ट और अनिष्टरूपा प्राप्ति है, वह भी सदा लोगों द्वारा दैवशब्द से कही जाती है।।4,5।।
श्रीवसिष्ठजी चार्वाक मत का प्रदर्शन करते हैं।
पुरुषप्रयत्न से होने वाला जो अवश्य फल का भोग है, वही इस लोक में दैवशब्द से कहा जाता है।।6।।
अब महामुनि वसिष्ठजी सिद्धान्त बतलाते हैं।
हे रामचन्द्रजी, किसी पुरुष का कोई दैव ही भ्रान्त दृष्टि से आकाश को शून्य के सदृश या नील के सदृश बना देता है और विवेक दृष्टि से वैसा नहीं बनाता है अर्थात् दैव की सिद्धि भ्रान्ति से ही है, विवेक से नहीं। सिद्ध पुरुषार्थ से शुभ और अशुभ फल का उदय होने पर 'यह फल इस बीज के स्वरूप में पहले रहा' इस प्रकार जो कहा जाता है, वही दैव है। मेरी ऐसी बुद्धि थी और ऐसा मेरा निश्चय था यों कर्मफल के प्राप्त होने पर जो कहा जाता है, वही दैव है। इष्ट और अनिष्ट फल के प्राप्त होने पर प्राक्तन कर्म ही इस प्रकार था। इस अभिप्राय को बतलाने वाला केवल आश्वासनमात्र ही दैव है।।7-10।।
दोनों कल्पों के अभेद का कथन करने से आशय को न जान रहे एवं प्रथम कल्प का उपक्रम कर द्वितीय कल्प से उपसंहार करने में विरोध को जान रहे श्रीरामचन्द्रजी अपने अभिप्राय को प्रकट करते हुए बोले। श्री रामचन्द्रजी ने कहाः भगवन्, हे सर्वधर्मज्ञ, जो प्राक्तन कर्म है वही दैव है, ऐसा आपने बार बार कहा, फिर दैव है ही नहीं, इस प्रकार उसका आप अपलाप कैसे करते हैं यानी उसके अपलाप करने में आपका क्या अभिप्राय है ?।।11।। श्रीवसिष्ठजी ने कहाः हे रामचन्द्र, ठीक है, आप उन दोनों कल्पों के विरोध को जानते हैं, सुनिये, मैं आपसे सम्पूर्ण वृत्तान्त को कहूँगा, जिससे दैव है ही नहीं, यह आपकी बुद्धि स्थिर हो जायेगी। मनुष्यों के मन में पहले जो अनेक प्रकार की वासनाएँ हुई थीं, वे ही कायिक और वाचिक कर्मरूप से परिणत हुई क्योंकि 'यद्धि मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति तत्कर्मणा करोति ' यानि जिसका मन चिन्तन करता है उसको वाणी से बोलता है और उसको कर्म से करता है। हे राम जी, प्राणी में जिस प्रकार की वासना होती है, वह शीघ्र ही वैसा कर्म करता है। अन्य प्रकार की वासना हो और अन्य कर्म करे यह बात नहीं बन सकती। गाँव में जाने की जिसकी इच्छा होती है वह गाँव में पहुँचता है और शहर में जाने की जिसकी इच्छा होती वह शहर में पहुँचता है, जिसकी जिस विषय में अभिलाषा होती है वह उस विषय में प्रयत्न करता है। पूर्वजन्म में फल की उत्कट अभिलाषा से जो कर्म प्रबल प्रयत्न से किया जाता है वही इस जन्म में दैव शब्द से कहा जाता है अर्थात् पूर्व जन्म में फल की उत्कट अभिलाषा से किये गये कर्म का ही दूसरा नाम दैव है, अतः दैव कर्म से अतिरिक्त नहीं है।।12-16।। कर्मकर्ताओं के सभी कर्म इसी प्रकार के होते हैं। अपनी प्रबल वासना ही कर्म है और वासना भी आपने कारणभूत मन से पृथक नहीं है।।17।।
क्योंकि 'वाचारम्भणं विकारों नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्' (विकार और नाम केवल वाचारम्भणमात्र है, मृत्तिका ही (कारण ही) सत्य है) श्रुति में उक्त ऐसा न्याय है। यद्यपि वाचिक और कायिक भी कर्म देखे जाते हैं तथापि विचार करने पर भी केवल मनोवासनारूप ही हैं, ऐसा आगे कहा जायेगा, उसी के अनुसार सकल कर्म मनोवासनामात्र हैं, ऐसा कहा गया है।
मन पुरुष (परमात्मारूप) ही है, उससे पृथक नहीं है, क्योंकि 'तन्मनोऽकुरुत आत्मन्वी स्याम्' (मैं मनस्वी होऊँ, इस अभिप्राय से उसने मन को बनाया) इस श्रुति से मन पुरुष का विवर्तरूप ही है, यह सिद्ध है।
हे सज्जनशिरोमणि श्रीरामजी, जो दैव है, वही कर्म है, दैव कर्म से पृथक नहीं है, कर्म मन से पृथक नहीं है और मन पुरुषरूप है और पुरुष परमार्थरूप से निर्विकार चैतन्यमात्ररूप ही है, इससे मन असत् ठहरा, मन के असत् होने से कर्म भी असत् ठहरा और असत् कर्मरूप दैव भी असत् हुआ, अतएव दैव नहीं है, यह फलितार्थ है।।18।।
'प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति वदन् वाक्, पर्श्यैश्चक्षुः श्रोत्रं मन्वानो मनः' इस श्रुति से अध्यास से मन आदि भाव से स्थित आत्मा की ही कर्म और कर्म के फलरूप से भी स्थिति है इसलिए वही दैव है, ऐसा यदि कहो, तो वह दैव रहे उससे पुरुष की स्वतन्त्रता का विनाश नहीं होगा, इस आशय से कहते हैं।
मन आदि भाव को प्राप्त हुआ यह प्राणी ही अपने हित के लिए जैसा प्रयत्न करता है दैवनाम से प्रसिद्ध अपने कर्म से वैसा ही फल पाता है।।19।।
यदि मन अत्यन्त असत् है, तो उससे व्यवहार की सिद्धि कैसे होगी ? अत्यन्त असत् वन्ध्यापुत्र आदि से किसी व्यवहार की सिद्धि नहीं देखी जाती, ऐसी आशंका कर युक्ति से उसकी अनिर्वचनीयता को दर्शा रहे 'तदेतद्धृहयं मनश्चैतात्संज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानम्' (वही हृदय, मन, संज्ञान, अज्ञान, विज्ञान और प्रज्ञान है) इत्यादि श्रुति के अनुसार मन की ही दैव आदि संज्ञाएँ हैं ऐसा कहते हैं।
हे श्रीरामजी, मन, चित्त, वासना, कर्म, दैव और निश्चय से सब सत्त्व था असत्त्व, चित्त्व या जडत्व, भेद या अभेद आदि से तत्त्वतः जिसका निश्चय नहीं हो सकता ऐसा मिथ्याभूत मन की (मनोरूपता को प्राप्त हुए पुरुषकी) संज्ञाएँ कही गई हैं। यों पुरुष की स्वतन्त्रता सिद्ध हुई, ऐसा कहते हैं। हे रामचन्द्र, पूर्वोक्त नामों वाला (मन, चित्त आदि संज्ञाओंवाला) पुरुष दृढ़ वासना से जैसा नित्य प्रयत्न करता है वैसा ही उसे पर्याप्त फल मिलता है। हे रघुकुलतिलक, इस प्रकार पौरुष से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है उससे अन्य से कुछ भी नहीं मिलता, इसलिए पौरुष से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है उससे अन्य से कुछ भी नहीं मिलता, इसलिए आपका पुरुषप्रयत्न शुभ फल देने वाला हो।।20-22।। श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः मुनिवर, पूर्वजन्म की वासनाएँ जैसे मुझे कार्य में लगाती है, वैसे ही मैं रहता हूँ, परवश मैं कर ही क्या सकता हूँ। अर्थात् पूर्वजन्म की वासनाओं के अधीन हुए मुझे स्वतन्त्रतापूर्वक कुछ करने की शक्ति कहाँ है, वासना मुझसे जैसा नाच-नचा रही है, वैसा नाच मैं नचाता हूँ।।23।।
इस समय प्राप्त हो रहे फल में भले ही तुम्हारी स्वतन्त्रता न हो, पर भावी फल के अनुकूल यत्न में तो स्वतन्त्रता है ही। सदविद्या से संयुक्त जन्म से अनुमित पूर्वजन्म के सत्प्रयत्न की फलभूत पूर्व वासना केवल अपने विरुद्ध फलों की अवरोधिका है, अतएव उससे युक्त जन्म में भी यदि पुरुष की सत्प्रवृत्ति में स्वतन्त्रता न हुई, तो कर्म और ब्रह्मविद्यापरक शास्त्र ही व्यर्थ हो जायेंगे। अपने मन में ऐसा अभिप्राय रखकर श्रीवसिष्ठजी ने कहा।
श्रीवसिष्ठजी ने कहाः हे रामजी, आप प्रस्तुत जन्म की हेतुभूत वासनाओं की अनुकूलता से ही अपने प्रयत्न से प्राप्त पौरुष द्वारा अक्षय श्रेय को प्राप्त होओगे, अन्यथा नहीं।।24।।
उक्त अर्थ का ही समर्थन करने के लिए वासनाओं का भेद दर्शा कर कहते हैं।
पूर्वजन्म की वासनाएँ, दो प्रकार की होती हैं, एक शुभ और दूसरी अशुभ। उनमें से आपकी पूर्वजन्म की वासनाएँ या शुभ हो सकती है या अशुभ हो सकती हैं।।25।।
प्रथम पक्ष में कहते हैं।
यदि आपकी पूर्वजन्म की वासनाएँ शुभ हों, तो पूर्वजन्म की शुभ वासनाओं द्वारा इस समय भी आप शुभ वासना में प्राप्त कराये जा रहे हैं, ऐसी अवस्था में शुभ वासनाओं द्वारा ही क्रमशः अविनश्वर पद को प्राप्त होंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं है।।26।।
दूसरे पक्ष में कहते हैं।
यदि आपकी पूर्वजन्म की वासनाएँ अशुभ हैं और वे आपको संकट की ओर ले जाती हैं, तो उन प्राक्तन अशुभ वासनाओं पर आपको प्रयत्नपूर्वक दृढ़ता से विजय प्राप्त करनी चाहिए। भाव यह कि वासनाओं का उदबोध स्वतन्त्ररूप से नहीं होता, किन्तु किसी उदबोधक के अनुसार ही होता है। यदि असज्जन की संगति आदि से कदाचित् एक आध अशुभ वासना उठे, तो उसका, उसके विरोधी साधु संगति, सत्-शास्त्र के अभ्यास आदि से विरोधी शुभ वासना की उत्पत्ति कराकर, तिरस्कार कर देना चाहिए।।27।।
'यो मनसि तिष्ठन्मनोऽन्तरो यं मनो न वेद' इस श्रुति से मन को प्रेरित करने वाला प्रज्ञानामक आत्मा दूसरा सुना जाता है उसके अधीन ही मनोवासनाएँ होती हैं, ऐसी परिस्थिति में सद्वासनाओं के उत्पादन में मेरी स्वतन्त्रता कहाँ है ? ऐसी शंका उठने पर कहते हैं।
जो चेतनमात्र प्राज्ञ श्रुति में कहा गया है, वही आप हैं। आप जड़रूप सूक्ष्म, स्थूल देह नहीं हैं जिससे उससे अपने को पृथक समझें, इसलिए चेतनरूप आपकी अन्य चेतन से भास्यता कहाँ है ? भाव यह कि यदि प्राज्ञ आप से पृथक हो, तो चेतन का अन्य चेतन से प्रकाश न होने के कारण आपको प्रकाशित न करता हुआ वह सर्वज्ञ न होगा, इसलिए आप ही प्राज्ञ हो, इस प्रकार प्राज्ञ और आपमें अभेद सिद्ध हुआ।।28।।
चेतनरूप आपको कोई दूसरा चेतन प्रकाशित करता है, ऐसा यदि मानो, तो उसको भी दूसरा चेतन प्रकाशित करेगा, यों अनवस्था भी होगी, ऐसा कहते हैं।
यदि आपको कोई दूसरा चेतन प्रकाशित करता है, ऐसा यदि मानो, तो उसको भी दूसरा चेतन प्रकाशित करेगा, यो अनवस्था भी होगी, ऐसा कहते हैं।
यदि आपको अन्य कोई प्रकाशित करता है, तो उस प्रकाशित करने वाले को कौन प्रकाशित करेगा और उस दूसरे प्रकाशित करने वाले को कौन प्रकाशित करेगा ? उसको भी अन्य करेगा और उसको भी अन्य प्रकाशित करेगा, ऐसा माना जय, तो अनवस्था होगी। अनवस्था किसी भी वस्तु को सिद्ध नहीं कर सकती। यों सदवासनाओं का उदबोध करने में आपकी स्वतन्त्रता अक्षुण्ण है।।29।।
पुरुष की स्वतन्त्रता के साधन का फल कहते हैं।
सन्मार्ग और असन्मार्ग से बह रही वासनारूपी नदी को अपने पुरुषप्रयत्न से अशुभ मार्ग से हटाकर शुभ मार्ग में लगाना चाहिए। हे बलवानों में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी, असत् मार्गों में उलझे हुए अपने मन को अपने पुरुषार्थ से बलपूर्वक शुभ मार्गों में लगाओ।।30,31।।
चित्तरूपी नदी दो प्रकार से बहती है पाप के लिए और पुण्य के लिए उन दो स्रोतों में से एक का निरोध होने पर दूसरे स्रोत में चित्तनदी दुगुने प्रवाह से बहती है, यह बात योगशास्त्र के अनुसार कहते हैं।
अशुभ कर्म से (पापमार्ग से) निवारित मनुष्य का चित्त बालक की नाईं शुभ कर्म में (पुण्यमार्ग में) जाता है और पुण्य मार्ग से निवारित पापमार्ग में जाता है, इसलिए प्रयत्न के साथ पापमार्ग से चित्त को हटाना चाहिए।।32।। इस प्रकार पूर्वोक्त क्रम से चित्तरूपी बालक को शीघ्र रागादि दोषों के विश्लेषण से और स्वाभाविक समता में स्थापन से निर्दोष बनाकर धीरे-धीरे आत्मस्वरूप में निरोधरूप पौरुषप्रयत्न से लगावे।।33।।
शीघ्र हठपूर्वक उसका निरोध न करें, ऐसा करने से उद्वेग से समाधि के टूटने का भय रहता है। भगवान ने भी श्रीमुख से कहा हैः 'शनैः शनैरुपरभेद् बुद्धया धृतिगृहीतया।' (धारणा से वश में की गई बुद्धि से मन को शनैः शनैः (अभ्यासक्रम के अनुसार न कि सहसा) बाह्य विषयों से विरत करे।)
आपने पहले अभ्यास से चाहे शुभ वासनाओं को चाहे अशुभ वासनाओं को निविड़ बना रक्खा हो, किन्तु इस समय तो आप शुभ वासनाओं को ही दृढ़ कीजिए। भाव यह कि पूर्वजन्मों में यदि आपके अभ्यास से शुभ वासनाओं को ही दृढ़ किया होगा, तो इस समय में भी शुभ वासनाओं को दृढ़ करने का शीघ्र फल प्राप्त होगा। यदि पूर्वजन्म में अशुभ वासनाओं को निविड़ बना रक्खा होगा, तो विरोधी वासनाओं के विनाश के लिए भी शुभ वासनाओं के दृढ़ीकरण की आवश्यकता है।।34।।
वासनाओं के अभ्यास की विफलता की शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि पूर्ववासनाओं के अभ्यास का फल प्रत्यक्ष है, ऐसा कहते हैं।
हे शत्रुनाशन, जब आपकी पूर्वजन्म की वासनाएँ अभ्यासवश घनीभाव को (निविडता को) प्राप्त हुई हैं, तब आप अभ्यास की सफलता को जानिये। हे पुण्यचरित, पूर्व की भाँति इस समय भी अभ्यासवश आपकी वासना घनीभाव को प्राप्त हो रही है, इसलिए शुभवासनाओं का ही अभ्यास कीजिए।।35,36।।
पूर्वजन्म की वासनाओं के घनीभाव में भी सन्देह कर रहे श्रीरामचन्द्रजी से कहते हैं।
हे प्रिय, यदि पूर्वजन्म में अभ्यास से आपकी वासना घनीभाव को प्राप्त नहीं हुई, तो इस समय भी वह वृद्धि को प्राप्त नहीं होगी, इसलिए आप सुखी होइये। भाव यह कि पूर्वजन्म में अभ्यासवश वासनाएँ वृद्धि को प्राप्त नहीं हुई, इस जन्म में भी वे अभ्यासवश दृढ़ नहीं होगी, ऐसी अवस्था में आप राजकुमारोचित सुख पूर्वक व्यवहार कीजिए, दुर्वासनाओं की अभिवृद्धि से जनित अनर्थ की संभावना से आपको विषाद नहीं होना चाहिए।।37।।
यदि ऐसा है, तो शुभ और अशुभ वासनाओं की अभिवृद्धि के लिए मुझे क्यों उपदेश देते हैं ?
राजकुमार, 'शुभ और अशुभ वासनाओं की सफलता में सन्देह होने पर भी आप अत्यन्त शुभ वासनाओं का ही संग्रह कीजिए। शुभ कर्मों के आचरण से शुभ वासना की अभिवृद्धि होने पर कोई दोष नहीं है।।38।।
जैसा की न्याय हैः शुभाशुभफलारम्भे सन्दिग्धेऽपि शुभं चरेत्। यदि न स्यात्तदा किं स्याद्यदि स्यान्नास्तिको हतः।। शुभ और अशुभ कर्मों की फलदातृता में सन्देह होने पर भी शुभ का ही आचरण करना चाहिए। यदि फल नहीं हुआ, तो क्या बिगड़ा, यदि हुआ, तो नास्तिक के मुँह में कालिख लगी।
वस्तुतः तो इस विषय में सन्देह का अवसर ही नहीं है, क्योंकि अन्य स्थलों से भी अभ्यास में अभ्यस्यमान की (जिसका अभ्यास किया जाता है उसकी) दृढ़ता की हेतुता देखी जाती है, ऐसा कहते हैं।
लोक में मनुष्य जिस-जिस विषय का अभ्यास करता है, उसी मैं निःसन्देह तन्मय हो जाता है, यह बात बाल कों से लेकर बड़े-बड़े विद्वानों तक में देखी गई है। हे श्रीरामचन्द्रजी, इसलिए आप परम ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए परम पुरुषार्थ का अवलम्बन कर और पाँचों इन्द्रियों को अपने वश में कर शुभ वासना से युक्त होइए।।39,40।।
कितने समय तक शुभ वासना का अभ्यास करना चाहिए ?
भद्र जब तक गुरु के उपदेश, शास्त्राभ्यास और युक्ति, अनुभव आदि प्रमाणों से तत्पद का निर्णय न हो जाय और जब तक अव्युत्पन्न चित्तवाले आपको तत्पद का ज्ञान न हो जाय, तब तक शुभवासनाओं का आचरण कीजिए। तदुपरान्त जब जैसे क्षार में पकाने से वस्त्र आदि में लगे हुए मल आदि शिथिल हो जाते हैं वैसे ही आपके राग आदि दोष नष्ट हो जाय, परम तत्त्व का परिज्ञान हो जाय और मानसिक व्यथाएँ नष्ट हो जाय तब आपको निश्चय इस शुभ वासनासमूह का भी परित्याग कर देना चाहिए।।41,42।।
पूर्वोक्त अर्थ का ही संक्षेप से उपसंहार कर रहे महर्षि वसिष्ठजी आचरण करने के योग्य शुभ का ही निर्देश करते हैं।
महाभाग, आप श्रेष्ठतम पुरुषों द्वारा सेवित अति सुन्दर उन शुभ वासनाओं का अनुसरण कर, शुभ वासना से सम्पन्न बुद्धि से परमार्थ वस्तु का ( परब्रह्म का ) साक्षात्कार कीजिए और तदन्तर शुभ वासनाओं के अनुसरण का भी त्याग कर परम सत्य में स्थित होइय।।43।।
नौवाँ सर्ग समाप्त
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