मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

सोमवार, 24 अक्तूबर 2011

महालक्ष्मी को कैसे बुलायें ?



लक्ष्मी चार प्रकार की होती है। एक होता है वित्त, दूसरा होता है धन, तीसरी होती है लक्ष्मी और चौथी होती है महालक्ष्मी जिस धन से भोग-विलास, आलस्य, दुराचार हो वह पापलक्ष्मी, अलक्ष्मी है।
 जिस धन से सुख-वैभव भोगा जाय वह वित्त है।
 जिस धन से सुख-वैभव भोगा जाय वह वित्त है।
 जिस धन से कुटुम्ब-परिवार को भी सुखी रखा जाय वह लक्ष्मी है और
 जिस धन से परमात्मा की सेवा हो, परमात्म तत्त्व का प्रचार हो, परमात्म-शांति के गीत दूसरों के दिल में गुँजाये जायें वह महालक्ष्मी है।

 हम लोग इसीलिए महालक्ष्मी की पूजा करते हैं कि हमारे घर में जो धन आये, वह महालक्ष्मी ही आये। महालक्ष्मी नारायण से मिलाने का काम करेगी। जो नारायण के सहित लक्ष्मी है, वह कुमार्ग में नहीं जाने देती। वह धन कुमार्ग में नहीं ले जायेगा, सन्मार्ग में ले जायेगा। धन में 64 दोष हैं और 16 गुण हैं, ऐसा वसिष्ठजी महाराज बोलते हैं।
सनातन धर्म ऐसा नहीं मानता है कि धनवानों को ईश्वर का द्वार प्राप्त नहीं होता, धनवान ईश्वर को नहीं पा सकते। अपने शास्त्रों के ये दृष्टान्त हैं कि जनक राजा राज्य करते थे, मिथिला नरेश थे और आत्मसाक्षात्कारी थे। भगवान राम जिनके घर में प्रकट हुए, वे दशरथ राजा राज्य करते थे, धनवान थे ही। जो सत्कर्मों में लक्ष्मी को लुटाता है, खुले हाथ पवित्र कार्यों में लगाता है उसकी लक्ष्मी कई पीढ़ियों तक बनी रहती है, जैसे राजा दशरथ, जनक आदि के जीवन में देखा गया। 22 पीढ़ियाँ चली जनक की, 22 जनक हो गये।
दीपावली में लक्ष्मी पूजन की प्रथा देहातों में भी है, शहरों में भी है। इस पर्व में जो व्यक्ति लक्ष्मी और तुलसी का आदर पूजन करेगा, वह धन-धान्य तथा आरोग्य पाकर सुखी रहेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 8, अंक 215
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शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

विवेकसम्पन्न पुरुष की महिमा


 (श्री योगवाशिष्ठ महारामायण)

श्री वशिष्ठजी बोले: "रघुकुलभूषण श्रीराम ! जब संसार के प्रति वैराग्य सुदृढ़ हो जाता हैसत्पुरुषों का सान्निध्य प्राप्त हो जाता हैभोगों की तृष्णा नष्ट हो जाती हैपाँचों विषय नीरस भासने लगते हैंशास्त्रों के तत्त्वमसि आदि महावाक्यों का यथार्थ बोध हो जाता हैआनन्दस्वरुप आत्मा की अपरोक्षानुभूति हो जाती हैह्रदय में आत्मोदय की पूर्ण भावना विकसित हो जाती है तब विवेकी पुरुष एकमात्र आत्मानन्द मेंरममाण रहता है और अन्य भोग-वैभवधन-सम्पत्ति को जूठी पत्तल की तरह तुच्छ समझकर उनसे उपराम हो जाता है ।

ऎसे विवेक-वैराग्यसम्पन्न पुरुष एकान्त स्थानों में या लोकाकीर्ण नगरों मेंसरोवरों मेंवनों में या उद्यानों मेंतीर्थो में या अपने घरों मेंमित्रों की विलासपूर्ण क्रीड़ाओं में या उत्सव-भोजनादि समारम्भों में एवं शास्त्रों की तर्कपूर्ण चर्चाओं में आसक्ति न होने से कहीं भी लम्बे समय तक रुकते नहीं । कदाचित कहीं रुकें तो तत्त्वज्ञान का ही अन्वेषण करते हैं । वे विवेकी पुरुष पूर्ण शांतइन्द्रियनिग्रहीस्वात्मारामीमौनी और एकमात्र विज्ञानस्वरुप ब्रह्म का ही कथन करनेवाले होते हैं । अभ्यास और वैराग्य के बल से वे स्वयं परमपदस्वरुप परमात्मा में विश्रांति पा लेते हैं । वे मनोलय की पूर्ण अवस्था में आरुढ़ हो जाते हैं । जिस प्रकारह्रदयहीन पत्थरों को दूध का स्वाद नहीं आताउसी प्रकार इन अलौकिक पुरुषों को विषयों में रस नहीं आता ।

जिस प्रकार दीपक अन्धकार का नाश करता हैउसी प्रकार विवेक-ज्ञानसम्पन्न महापुरुष अपने ह्रदयस्थित अज्ञानरुपी अन्धकार का नाश कर देते हैंबाहर के राग-द्वेषशोक-भय आदि दूर हटा देते हैं । जिनमेंतमोगुण का सर्वथा अभाव हैजो रजोगुण से रहित हैंसत्त्वगुण से भी पार हो चुके हैं वे महापुरुष गगनमण्डल में सूर्य के समान हैंसाक्षात परमात्मस्वरुप हैं । सर्व जीवप्राणीसमग्र चराचर सृष्टि स्वेच्छानुसारउपहार प्रदान करके उन आनन्दस्वरुप आत्मदेव की ही निरन्तर पूजा करते हैं । अनेक जन्मों तक जब ये आत्मदेव पूजित होते हैं तब वे अपने पुजारी पर प्रसन्न होते हैं । प्रसन्न बने हुए ये देवाधिदेव महेश्वररुपआत्मा पूजा करनेवाले की शुभ कामना से उसे ज्ञान प्रदान करने के लिये अपने पावन दूत को प्रेरित करते हैं ।

श्री रामजी ने पूछा : "ब्रह्मन ! परमेश्वररुप आत्मा कौन-से दूत को प्रेरित करते हैं और वह दूत किस प्रकार ज्ञानोपदेश देता है ? "

श्री वशिष्ठजी बोले : " रामभद्र ! आत्मा जिस दूत को प्रेरित करता है उसका नाम है विवेक । वह सदा आनन्द देनेवाला है । अधिकारी पुरुष की ह्रदयरुपी गुफा में वह दूत ऎसे स्थित हो जाता  है मानों निर्मल आकाश में चन्द्रमा । विवेक ही वासनायुक्त अज्ञानी जीव को ज्ञान प्रदान करता है और धीरे-धीरे संसार-सागर से उसका उद्धार कर देता है ।

यह ज्ञानस्वरुप अन्तरात्मा ही सबसे बड़े परमेश्वर हैं । वेदसम्मत जो प्रणव है है वह उन्हींका बोधक शुभ नाम है । नर-नागसुर-असुर ये सब जपहोमतपदानपाठयज्ञ और कर्मकाण्ड के द्वार नित्यउन्हींको प्रसन्न करते हैं । चिन्मय होने से वे ही सर्वत्र विचरण करते हैंजागते हैंऔर देखते हैं । वे सर्वव्यापक हैं । ये चिदात्मा ही विवेकरुपी दूत को प्रेरित करके उसके द्वारा चित्तरुपी पिशाच को मारकर जीव को अपने दिव्य अनिर्वचनीय पद तक पहुँचा देते हैं ।

अतः तमाम संकल्प-विकल्पविकार तथा अर्थसंकटों को छोड़कर अपने पुरुषार्थ से उन चिदात्मा को प्रसन्न कर लेना चाहिए । ज्ञानरुपी चिदात्म-सूर्य का उदय होते ही संसाररुपी रात्रि में विचरता हुआ मनरुपी पिशाच नष्ट हो जायेगा । काम-क्रोधादि छः ऊर्मिरुपी कालिमा बिखर जायेगी । जीवन का मार्ग पूर्ण प्रकाशितआनन्दमय हो जायेगा । मनुष्य जन्म सार्थक हो जायेगा । 

 आनन्द ....

आश्रम से प्रकाशित पुस्तक "मन को सीख" से लिया गया प्रसंग
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बुधवार, 19 अक्तूबर 2011

निरीक्षण.......


सत्संग हमें यह सिखाता है कि हमें आत्म निरीक्षण करना चाहिए। हमने क्या-क्या गलतियाँ हैं, किस कारण से गलती होती है यह जाँचो। न देखने जैसी जगह पर हम बार-बार देखते तो नहीं हैं ? काम विकार से हमारी शक्ति नष्ट तो नहीं होती है ? बीड़ी से, शराब से, कबाब से या किसी की हल्की संगत से हमारे संस्कार हल्के तो नहीं हो रहे हैं ? हल्के विचारों से हमारा पतन तो नहीं हो रहा है ? आत्म निरीक्षण करो।
शत्रु कुछ निन्दा करता है तो कैसे ध्यान से लोग सुनते हैं ? लोभी धन का कैसा निरीक्षण करता है ? ड्राइवर रास्ते का कैसा निरीक्षण करता है ? चाहे स्कूटर ड्राइवर हो चाहे कार ड्राइवर हो, वह सावधानी से सड़क को देखता रहता है। कहीं खड़ा होता है तो स्टीयरिंग घूम जाती है, कहीं बम्प होता है तो ब्रेक लग जाती है, कहीं चढ़ाई होती है तो रेस बढ़ जाती है, ढलान होती है तो रेस कम हो जाती है। हर सेकेंड ड्राइवर निर्णय लेता रहता है और गन्तव्य स्थान पर गाड़ी सुरक्षित पहुँचा देता है। अगर वह सावधान न रहे तो कहीं टकरा जायगा, खड्डे में गिर जाएगा, जान खतरे में पड़ जाएगी।
ऐसे ही अपने हृदय की वृत्तियों का निरीक्षण करो। खोजो कि किन कारणों से हमारा पतन होता है ? दिनभर के क्रिया कलापों का निरीक्षण करो, कारण खोज लो और सुबह में पाँच-दस प्राणायाण करके ॐ की गदा मारकर उन हल्के पतन के कारणों को भगा दो।
झूठ बोलने से हृदय कमजोर होता है।
जीवन में उत्साह होना चाहिए। उत्साह के साथ सदाचार होना चाहिए। उत्साह के साथ पवित्र विचार होने चाहिए। उत्साह के साथ ऊँचा लक्ष्य होना चाहिए। दुःशासन, दुर्योधन और रावण में उत्साह तो था लेकिन उनका उत्साह शुद्ध रास्ते पर नहीं था। उनमें दुर्वासनाएँ भरी पड़ी थी। दुर्योधन ने दुष्टता करके कुल का नाश करवाया। रावण में सीताजी के प्रति दुर्वासना थी। राजपाट सहित अपना और राक्षस कुल का सत्यानाश किया। दुःशासन ने भी अपना सत्यानाश किया।
उत्साह तो उन लोगों में था, चपलता थी, कुशलता थी। कुशलता होना अच्छा है, जरूरी है। उत्साह होना अच्छा है, जरूरी है। चपलता तत्परता होना अच्छा है, जरूरी है लेकिन तत्परता कौन-से कार्य में हैं ?ईश्वरीय दैवी कार्य में तत्परता है कि झूठ कपट करके बंगले पर बंगला बनाकर विलासी होने में तत्परता है ? बड़ा पद पाकर लोगों का शोषण करने की तत्परता है कि लोगों के हृदय में छुपे हुए लोकेश्वर को जगाकर भगवान के मार्ग में सहायरूप होने की, मुक्त होने की अथवा मुक्ति के मार्ग में जाने वालों की सेवा, सहयोग में तत्परता है ? यह देखना पड़ेगा।
अपने को बचाने में तत्परता है कि अपने को सुधारने में तत्परता है ? अपना बचाव पेश करने में तत्परता है कि दोष खोजने में तत्परता है ? अपने को निर्दोष साबित करने में तत्परता है कि वास्तव में निर्दोष होने में तत्परता है ? अपने को आलसी, प्रमादी बनाने में बुद्धि लग रही है कि अपने को उत्साही और सदाचारी बनाने में लग रही हैं ?
अपना साखी आप है निज मन माँही विचार।
नारायण जो खोट है वाँ को तुरन्त निकाल।।
रोज सुबह ऐसी खोट को निकालते जाओ..... निकालते जाओ.....। चन्द दिनों में तुम्हारा जीवन विलक्षण लक्षणों से सम्पन्न होगा। तुममें दैवी गुण विकसित होने लगेंगे।

आश्रम से प्रकाशित पुस्तक "सच्चा सुख" से लिया गया प्रसंग
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मंगलवार, 18 अक्तूबर 2011

अहं...


परमात्मा हृदय में ही विराजमान है। लेकिन अहंकार बर्फ की सतह की तरह आवरण बनकर खड़ा है। इस आवरण का भंग होते ही पता चलता है कि मैं और परमात्मा कभी दो न थे, कभी अलग न थे।
वेदान्त सुनकर यदि जप, तप, पाठ, पूजा, कीर्तन, ध्यान को व्यर्थ मानते हो और लोभ, क्रोध, राग, द्वेष, मोहादि विकारों को व्यर्थ मानकर निर्विकार नहीं बनते हो तो सावधान हो जाओ। तुम एक भयंकर आत्मवंचना में फँसे हो। तुम्हारे उस तथाकथित ब्रह्मज्ञान से तुम्हारा क्षुद्र अहं ही पुष्ट होकर मजबूत बनेगा।
आप किसी जीवित आत्मज्ञानी संत के पास जायें तो यह आशा मत रखना कि वे आपके अहंकार को पोषण देंगे। वे तो आपके अहंकार पर ही कुठाराघात करेंगे। क्योंकि आपके और परमात्मा के बीच यह अहंकार ही तो बाधा है।
अपने सदगुरु की कृपा से ध्यान में उतरकर अपने झूठे अहंकार को मिटा दो तो उसकी जगह पर ईश्वर आ बैठेगा। आ बैठेगा क्या, वहाँ ईश्वर था ही। तुम्हारा अहंकार मिटा तो वह प्रगट हो गया। फिर तुम्हें न मन्दिर जाने की आवश्यकता, न मस्जिद जाने की, न गुरुद्वारा जाने की और न ही चर्च जाने की आवश्यकता, क्योंकि जिसके लिए तुम वहाँ जाते थे वह तुम्हारे भीतर ही प्रकट हो गया।
निर्दोष और सरल व्यक्ति सत्य का पैगाम जल्दी सुन लेता है लेकिन अपने को चतुर मानने वाला व्यक्ति उस पैगाम को जल्दी नहीं सुनता।
मनुष्य के सब प्रयास केवल रोटी, पानी, वस्त्र, निवास के लिए ही नहीं होते, अहं के पोषण के लिए भी होते हैं। विश्व में जो नरसंहार और बड़े बड़े युद्ध हुए हैं वे दाल-रोटी के लिए नहीं हुए, केवल अहं के रक्षण के लिए हुए हैं।
जब तक दुःख होता है तब तक समझ लो कि किसी-न-किसी प्रकार की अहं की पकड़ है। प्रकृति में घटने वाली घटनाओं में यदि तुम्हारी पूर्ण सम्मति नहीं होगी तो वे घटनाएँ तुम्हें परेशान कर देंगी। ईश्वर की हाँ में हाँ नहीं मिलाओ तब तक अवश्य परेशान होगे। अहं की धारणा को चोट लगेगी। दुःख और संघर्ष आयेंगे ही।
अहं कोई मौलिक चीज नहीं है। भ्रान्ति से अहं खड़ा हो गया है। जन्मों और सदियों का अभ्यास हो गया है इसलिए अहं सच्चा लग रहा है।
अहं का पोषण भाता है। खुशामद प्यारी लगती है। जिस प्रकार ऊँट कंटीले वृक्ष के पास पहुँच जाता है, शराबी मयखाने में पहुँच जाता है, वैसे ही अहं वाहवाही के बाजार में पहुँच जाता है।
सत्ताधीश दुनियाँ को झुकाने के लिए जीवन खो देते हैं फिर भी दुनियाँ दिल से नहीं झुकती। सब से बड़ा कार्य, सब से बड़ी साधना है अपने अहं का समर्पण, अपने अहं का विसर्जन। यह सब से नहीं हो सकता। सन्त अपने सर्वस्व को लुटा देते हैं। इसीलिए दुनियाँ उनके आगे हृदयपूर्वक झुकती है।
नश्वर का अभिमान डुबोता है, शाश्वत का अभिमान पार लगाता है। एक अभिमान बन्धनों में जकड़ता है और दूसरा मुक्ति के द्वार खोलता है। शरीर से लेकर चिदावली पर्यंत जो अहंबुद्धि है वह हटकर आत्मा में अहंबुद्धि हो जाय तो काम बन गया। 'शिवोऽहम्.... शिवोऽहम्....' की धुन लग जाय तो बस.....!
मन-बुद्धि की अपनी मान्यताएँ होती हैं और अधिक चतुर लोग ऐसी मान्यताओं के अधिक गुलाम होते हैं वे कहेंगेः "जो मेरी समझ में आयेगा वही सत्य। मेरी बुद्धि का निर्णय ही मानने योग्य है और सब झूठ....।"
नाम, जाति, पद आदि के अभिमान में चूर होकर हम इस शरीर को ही "मैं" मानकर चलते हैं और इसीलिए अपने कल्पित इस अहं पर चोट लगती है तो हम चिल्लाते हैं और क्रोधाग्नि में जलते हैं।
नश्वर शरीर में रहते हुए अपने शाश्वत स्वरूप को जान लो। इसके लिए अपने अहं का त्याग जरूरी है। यह जिसको आ गया, साक्षात्कार उसके कदमों में है।
परिच्छिन्न अहंकार माने दुःख का कारखाना। अहंकार चाहे शरीर का हो, मित्र का हो, नाते-रिश्तेदारों का हो, धन-वैभव का हो, शुभकर्म का हो, दानवीरता का हो, सुधारक का हो या सज्जनता का हो, परिच्छिन्न अहंकार तुमको संसार की भट्ठी में ही ले जायगा। तुम यदि इस भट्ठी से ऊबे हो, दिल की आग बुझाना चाहते हो तो इस परिच्छिन्न अहंकार को व्यापक चैतन्य में विवेक रूपी आग से पिघला दो। उस परिच्छिन्न अहंकार के स्थान पर "मैं साक्षात् परमात्मा हूँ", इस अहंकार को जमा दो। यह कार्य एक ही रात्रि में हो जायेगा ऐसा नहीं मानना। इसके लिए निरन्तर पुरुषार्थ करोगे तो जीत तुम्हारे हाथ में है। यह पुरुषार्थ माने जप, तप, योग, भक्ति, सेवा और आत्म-विचार।
बाहर की सामग्री होम देने को बहुत लोग तैयार मिल जायेंगे लेकिन सत्य के साक्षात्कार के लिए अपनी स्थूल और सूक्ष्म सब प्रकार की मान्यताओं की होली जलाने लिए कोई कोई ही तैयार होता है।
किसी भी प्रकार का दुराग्रह सत्य को समझने में बाधा बन जाता है।
जब क्षुद्र देह में अहंता और देह के सम्बन्धों में ममता होती है तब अशांति होती है।
जब तक 'तू' और 'तेरा' जिन्दे रहेंगे तब तक परमात्मा तेरे लिये मरा हुआ है। 'तू' और 'तेरा' जब मरेंगे तब परमात्मा तेरे जीवन में सम्पूर्ण कलाओं के साथ जन्म लेंगे। यही आखिरी मंजिल है। विश्व भर में भटकने के बाद विश्रांति के लिए अपने घर ही लौटना पड़ता है। उसी प्रकार जीवन की सब भटकान के बाद इसी सत्य में जागना पड़ेगा, तभी निर्मल, शाश्वत सुख उपलब्ध होगा।
अपनी कमाई का खाने से ही परमात्मा नहीं मिलेगा। अहंकार को अलविदा देने से ही परमात्मा मिलता है। तुम्हारे और परमात्मा के बीच अहंकार ही तो दीवार के रूप में खड़ा है।
जब कर्म का भोक्ता अहंकार नहीं रहता तब कर्मयोग सिद्ध होता है। जब प्रेम का भोक्ता अहंकार नहीं रहता तब भक्तियोग में अखण्ड आनन्दानुभूति होती है। जब ज्ञान का भोक्ता अहंकार नहीं रहता तब ज्ञानयोग पूर्ण होता है।
कुछ लोग सोचते हैं- प्राणायाम-धारणा-ध्यान से या और किसी युक्ति से परमात्मा को ढूँढ निकालेंगे। ये सब अहंकार के खेल हैं, तुम्हारे मन के खेल हैं। जब तक मन से पार होने की तैयारी नहीं होगी, अपनी कल्पित मान्यताओं को छोड़ने की तैयारी नहीं होगी, अपने कल्पित पोपले व्यक्तित्व को विसर्जित करने की तैयारी नहीं होगी तब तक भटकना चालू रहेगा। यह कैसी विडम्बना है कि परमात्मा तुमसे दूर नहीं है, तुमसे पृथक नहीं है फिर भी उससे अनभिज्ञ हो और संसार में अपने को चतुर समझते हो

आश्रम से प्रकाशित पुस्तक "ऋषि प्रसाद" से लिया गया प्रसंग
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सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

गुरु...


संसार में माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी के सम्बन्ध की तरह गुरु-शिष्य का सम्बन्ध भी एक सम्बन्ध ही है लेकिन अन्य सब सम्बन्ध बन्धन बढ़ाने वाले हैं जबकि गुरु-शिष्य का सम्बन्ध सम बन्धनों से मुक्ति दिलाता है। यह सम्बन्ध एक ऐसा सम्बन्ध है जो सब बन्धनों से छुड़ाकर अन्त में आप भी हट जाता है और जीव को अपने शिवस्वरूप का अनुभव करा देता है।
सच्चे गुरु नहीं मिले हों तो पुण्य कर्म करो। जिनके पुण्यकर्म में कमी है उनको गुरु सामने मिल जायें फिर भी वे उन्हें पहचान नहीं पाते।
गुरु को नापने तोलने का विचार शिष्य के दिल में उठा और गुरु के बाह्य आचरण-व्यवहार को देखकर उनकी गहराई का अन्दाज लगाना शुरु किया तो समझो शिष्य के पतन का प्रारंभ हो चुका।
गुरु शिष्य के कल्याण के लिए सब कुछ करते हैं। उनके अन्दर निरन्तर अदम्य स्नेह की धारा बहती रहती है। वे द्वेष के वश होकर किसी को थोड़े ही डाँटते फटकारते हैं ? उनके सब राग-द्वेष व्यतीत हो चुके हैं। तभी तो वे गुरु बने हैं। उनकी हर चेष्टा सहज और सब के लिए हितकर ही होती है।
गुरुदेव के पीछे पीछे जाने की क्या आवश्यकता है ? उनके आदेश का अनुसरण करना है न कि उनके पीछे पीछे भटकना है। देह के पीछे पीछे भटकने से क्या होगा ? सत्शिष्य वही है जो गुरु के आदेश के मुताबिक चले। गुरुमुख बनो, मनमुख नहीं। गुरुदेव के वचनों पर चलो। सब ठीक हो जायेगा। बड़े दिखने वाले आपत्तियों के घनघोर बादल गुरुमुख शिष्य को डरा नहीं सकते। उसके देखते देखते ही वे बादल छिन्न-भिन्न हो जाते हैं। गुरुमुख शिष्य कभी ठोकर नहीं खाता। जिसको अपने गुरुदेव की महिमा पर पूर्ण भरोसा होता है ऐसा शिष्य इस दुर्गम माया से अवश्य पार हो जाता है। गुरुकृपा से वह भी एक दिन अपने अमरत्व का अनुभव कर लेता है और स्वयं गुरुपद पर आरूढ़ हो जाता है।
जिस शिष्य में गुरु के प्रति अनन्य भाव नहीं जगता वह शिष्य आवारा पशु के समान ही रह जाता है।
सब पुरुषार्थ गुरुकृपा प्राप्त करने के लिए किये जाते हैं। गुरुकृपा प्राप्त हो जाये तो उसे हजम करने का सामर्थ्य आये इसलिए पुरुषार्थ किया जाता है। दूध की शक्ति बढ़ाने के लिए कसरत नहीं की जाती लेकिन शक्तिमान दूध को हजम करने की योग्यता आये इसलिए कसरत की जाती है। दूध स्वयं पूर्ण है। उसी प्रकार गुरुकृपा अपने आप में पूर्ण है, सामर्थ्यवान है। भुक्ति और मुक्ति दोनों  देने के लिए वह समर्थ है। शेरनी के दूध के समान यह गुरुकृपा ऐसे वैसे पात्र को हजम नहीं होती। उसे हजम करने की योग्यता लाने के लिए साधक को सब प्रकार के साधन-भजन, जप-तप, अभ्यास-वैराग्य आदि पुरुषार्थ करने पड़ते हैं।
जो साधक या शिष्य गुरुकृपा प्राप्त होने के बाद भी उसका महत्त्व ठीक से न समझते हुए गहरा ध्यान नहीं करते, अन्तर्मुख नहीं होते और बहिर्मुख प्रवृत्ति में लगे रहते हैं वे मूर्ख है और भविष्य में अपने को अभागा सिद्ध करते हैं।
संसारियों की सेवा करना कठिन है क्योंकि उनकी इच्छाओं और वासनाओं का कोई पार नहीं, जबकि सदगुरु तो अल्प सेवा से ही तुष्ट हो जायेंगे क्योंकि उनकी तो कोई इच्छा ही नहीं रहा।
सच पूछो तो गुरु आपका कुछ लेना नहीं चाहते। वे आपको प्रेम देकर तो कुछ देते ही हैं परन्तु डाँट-फटकार देकर भी आपको कोई उत्तम खजाना देना चाहते हैं।
उपदेश बेचा नहीं जा सकता। उपदेश का दान हो सकता है। इसी कारण हम सदगुरुओं के ऋणी रहते हैं। और.... सदगुरु का कर्जदार रहना विश्व का सर्वाधिक धनवान बनने से भी बड़े भाग्य की बात है।
अपनी वाणी को पवित्र करने के लिए, अपनी बुद्धि को तेजस्वी बनाने के लिए, अपने हृदय को भावपूर्ण बनाने के लिए हम लोग सन्त, महापुरुष और सदगुरुओं की महिमा गा लेते हैं। यह ठीक है लेकिन उनकी असली महिमा के साथ तो अन्याय ही होता है। वेद भी उनकी महिमा गाते गाते थक चुके हैं।
गुरुकृपा या ईशकृपा हजम हुई कि नहीं, हम ज्ञान में जगे कि नहीं यह जानना हो तो अपने आपसे पूछोः "परमात्मा में रूचि हुई कि नहीं ? विलास, ऐशो-आराम से वैराग्य हुआ कि नहीं ?"
गुरुकृपा, ईश्वरकृपा और शास्त्रकृपा तो अमाप है। किसी के ऊपर कम ज्यादा नहीं है। कृपा हजम करने वाले की योग्यता कम ज्यादा है। योग्यता लाने का पुरुषार्थ करना है, ईश्वर पाने का नहीं।
गुरु जिस साधक या शिष्य की बेईज्जती करके जीवन सुधारते हैं उनकी इज्जत आखिर में बढ़ती है। गुरु द्वारा की गई बेइज्जती सहन नहीं करने से बाद में शिष्य के जीवन में जो बेइज्जती होती है वह कितनी भयंकर होती है !
जो सदभागी शिष्य गुरु की धमकियाँ, डाँट-फटकार सहकर आगे बढ़ता है, खुद यमराज भी उसकी इज्जत करते हैं।
गुरु के कटुवचन जो हँसते हुए स्वीकार कर लेता है उसमें जगत भर के विष हजम करने का सामर्थ्य आ जाता है।
गुरुकृपा हुई तो समझना कि आनन्द के खजाने खुलने लगे।
अध्यात्म मार्ग में प्रवेश कराने वाले ज्ञानी और फकीर लोग एक दृष्टिमात्र से अध्यात्म के जिज्ञासु को जान लेते है, उसकी योग्यता प्रगट हो जाती है। इसलिए आज तक ऐसे जिज्ञासुओं को चुनने के लिये प्रवेशपत्र नहीं निकाले गये।
पति में परमात्मा को देखने लगोगे तो जल्दी नहीं दिखेगा क्योंकि अभी पति ने भी खुद में परमात्मा नहीं देखा है। पत्नी में परमात्मा को देखने लगोगे तो जल्दी नहीं दिखेगा क्योंकि अभी पत्नी ने भी खुद में परमात्मा को नहीं देखा है। गुरु ने खुद में परमात्मा को देखा है, पूर्णतया साक्षात्कार किया है। वहाँ पर्दा पूरा हट चुका है। गुरु परमात्मा के ही स्वरूप हैं। वास्तव में तो पति भी परमात्मा का स्वरूप है, पत्नी भी परमात्मा का स्वरूप है, अरे कुत्ता भी परमात्मा का ही स्वरूप है, लेकिन वहाँ अभी पर्दा हटा नहीं है। गुरु में वह पर्दा हट चुका है। अतः गुरु में परमात्मा को निहारो। तुम जल्दी सफल हो जाओगे।
फकीर की अमृतवाणी सबको ऐसे ही हजम नहीं होती। इसीलिए प्रयोगशील बनकर फकीर लोग अहं पर चोट करके सत्य का द्वार खोलने का प्रयास करते हैं। सदभागी साधक यह मर्म समझ लेते हैं लेकिन व्यवहार में अपने को चतुर मानने वाले लोग इस दिव्य लाभ से वंचित रह जाते हैं। ऐसे लोग जहाँ अपनी प्रशंसा होती है वहीं रुकते हैं।
गुरुदेव के चरणों की पावन रज आदर से जो अपने सिर चढ़ाता है उसकी चरणरज लेने के लिए दुनियाँ के लोग लालायित रहते हैं।
प्रारंभ में गुरु का व्यवहार चाहे विष जैसा लगता हो लेकिन परिणाम में अमृततुल्य फल देता है।
गुरु की बात को ठुकराने वाले को जगत और अन्त में यमदूत भी ठोकर मारते हैं।
गुरुदेव जो देना चाहते हैं वह कोई ऐरा-गैरा पदार्थ टिक नहीं सकता है। इसलिए सदगुरु अपने प्यारे शिष्य को चोट मार मारकर मजबूत बनाते हैं, कसौटियों में कसकर योग्य बनाते हैं।
जब-जब, जहाँ-जहाँ आपके भीतर कर्त्तापन अंगड़ाइयाँ लेने लगे तब-तब, वहाँ-वहाँ जैसे मूर्तिकार मूर्ति बनाते वक्त हथौड़ी और छेनी से पत्थर को काट काटकर अनावश्यक हिस्से को हटाता है वैसे ही, गुरु अपनी कुशलता से तुम्हारे अहंकार को हटाते रहते हैं। जीवित सदगुरु के सान्निध्य का लाभ जितना हो सके अधिकाधिक लो। वे तुम्हारे अहंकार को काट कूट कर तुम्हारे शुद्ध स्वरूप को प्रकट कर देंगे।
आत्मानन्द देने वाली गुरुकृपा मिलने के बाद भी विषय सुख के पीछे भटकना, लोगों पर प्रभाव डालने के लिए टिपटाप करना तथा शरीर को सजाने में जीवन का नूर खो देना यह तो मूर्खता की पराकाष्ठा है।
आश्रम से प्रकाशित पुस्तक "ऋषि प्रसाद" से लिया गया प्रसंग 
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रविवार, 16 अक्तूबर 2011

जीवन


जीवन जीवत्व से ब्रह्मत्व की ओरि विकास की एक प्रक्रिया है।
हे मानव ! इस असार संसार की मिथ्या दौड़ धूप में कब तक दुःखी होना है ? नहाना, धोना, खाना-पीना, रोटी के लिए परिश्रम करना, निद्राधीन होना और वंशवृद्धि करना... यह कोई जीवन की सार्थकता नहीं है। जीवन की सार्थकता तो है अपने आपको जानने में।
रोटी के टुकड़ों की फिकर नहीं करो। जिसने जीवन दिया है वही अनाज भी देगा ही। फिकर करना ही हो तो इस बात की करो कि संसार के बन्धन से मुक्ति कैसे हो।
अपने लिए तो सब जीते हैं। दूसरों के लिए जो जीते हैं उनका जीवन धन्य है।
जीवन में प्रेम ही बाँटो, सुख ही बाँटो, दुःख न बाँटो। प्रेम और सुख बाँटोगे तो बदले में वे ही वापस आकर मिलेंगे। उसे कोई रोक नहीं सकता। .....हाँ बदले की अपेक्षा न रखो।
लोगों को अच्छा लगे इसलिए महँगे वस्त्र पहनना, उस ढंग से जीना यह तो लोगों की गुलामी हुई। लोग हमारे स्वामी हुए। वे हमारे भोक्ता हुए और हम उनके भोग्य हुए। लोग क्या कहेंगे ? लोगों को क्या अच्छा लगेगा ? अरे पागल ! यह नहीं सोचता कि लोकेश्वर को क्या अच्छा लगेगा ? सदगुरु को क्या अच्छा लगेगा ? शरीर को स्वस्थ रखने मात्र के लिए वस्त्रादि होना ठीक है लेकिन उसी में अधिक समय खर्चना, पूरी वृत्ति को लगाना यह जीवनदाता का घोर अपमान है।
बुद्धि रूपी स्त्री भीतर सोये हुए आत्मा रूपी स्वामी को छोड़कर बाह्य पदार्थों रूपी परदेसियों के साथ व्यवहार करती है। प्रेम स्वरूप परमात्मा को छोड़कर परदेसी को प्यार करने जाती है। विषयसुख भोगकर क्षणिक सुखाभास मिलता है लेकिन वह सुखाभास जीवन को अन्धकारमय कन्दरा में ही ले जाता है।
जगत के लोगों को खुश किये लेकिन आत्मदेव खुश नहीं हुए तो क्या खुशी मिली, खाक ? नाते-रिश्तेदारों को प्रसन्न किया लेकिन परमात्मा प्रसन्न नहीं हुए तो क्या प्रसन्नता मिली, खाक ? नश्वर चीजें इकट्ठी करने में जीवन खर्च दिया लेकिन आत्मधन नहीं मिला तो क्या कमाई की, खाक ?
जो शाश्वत है उस परम तत्त्व को जान लो। आप कहेंगेः हम तो गृहस्थ हैं। मैं कहता हूँ कि संन्यासी को योग की जितनी आवश्यकता है उससे ज्यादा आवश्यकता गृहस्थी को है। अपने जीवन को ऋषि जीवन बनाओ। योग के बल से अनेकों की जिन्दगियाँ बदल गई हैं तो तुम्हारी क्यों नहीं बदल सकती ? तुम अंशतः गुमराह हुए हो। यह गलती दूर करनी पड़ेगी। धन्य है उस वैदिक धर्म को कि जिसके कारण भारत जगत का गुरु बना है और भविष्य में भी बना रहेगा। लेकिन.... हमको जागना होगा। खड़ा होना पड़ेगा। जीवन आत्म-साक्षात्कार के लिए मिला है। यही समझाने के लिए विविध आध्यात्मिक उत्सवों की रचना की गई है।
आप अपने दिल की डायरी में सुवर्ण अक्षरों से लिखकर रखें कि प्रकृति में जो कुछ घटना घटती है वह जीव को अपने शिवस्वरूप की ओर ले जाने के लिए ही घटती है।
अपना हृदय विशाल रखो। अपने हृदय को सँभालो। कोई गिरता हो तो उसे थाम लो।
विषय-सेवन विष है, त्याग और संयम अमृत है। क्रोध विष है, क्षमा अमृत है। कुटिलता विष है, सरलता अमृत है। क्रूरता विष है, करूणा अमृत हे। देहाभिमान विष है, आत्मज्ञान अमृत है।
ऐसा कोई आदमी नहीं कि जिसको जीवन में सदा अनुकूलता मिलती रहे। ऐसा कोई आदमी नहीं कि जिसको सदा प्रतिकूलता मिलती रहे। ऐसा कोई आदमी नहीं कि जिसका सदा यश होता रहे या सदा अपयश होता रहे
आश्रम से प्रकाशित पुस्तक "ऋषि प्रसाद" से लिया गया प्रसंग 
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शनिवार, 15 अक्तूबर 2011

मृत्यु ...........


मौत से मनुष्य डरता है, जीवन में पग पग पर छोटी मोटी परिस्थितियों से घबरा उठता है। ऐसा भयभीत जीवन भी कोई जीवन है ? जहाँ पग पग पर मृत्यु का भय प्रकम्पित करता रहे ? ऐसा नीरस जीवन, भयपूर्ण जीवन मौत से भी बदतर है। ऐसा जीवन जीने में कोई सार नहीं। यह जीवन जीवन नहीं है। इसलिए कहता हूँ कि असली जीवन जीना हो, निर्भय जीवन जीना हो तो फकीरी मौत को एक बार जान लो।
मौत तो इतनी प्यारी है कि उसे यदि आमंत्रित किया जाय तो अमृतमय जीवन के द्वार खोल देती है।
एक ऐसी जगह है जहाँ मौत की पहुँच नहीं, जहाँ मौत का कोई भय नहीं, जिसमें मौत भी भयभीत होती है-उस जगह पर हम बैठे हैं। तुम चाहो तो तुम भी बैठ सकते हो।
मौत तो एक पड़ाव है, एक विश्रान्तिस्थान है। उससे भय कैसा ? यह तो प्रकृति की एक व्यवस्था है।
स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर का वियोग, जिसको मृत्यु कहा जाता है वह विश्रामस्थल तो है परन्तु पूर्ण विश्रान्ति उसमें भी नहीं है। यह फकीरी मौत नहीं है। फकीरी मौत तो वह है जिसमें सारी वासनाएँ जड़ सहित भस्म हो जाय।
दिन के भारी काम से थका हुआ मनुष्य जैसे नींद की चाह करता है उसी प्रकार समझदार व्यक्ति मृत्यु से भय न रखकर उसे समझपूर्वक आमंत्रित करके आत्मा में आराम पाता है।
फकीरी मौत ही असली जीवन है। फकीरी मौत अर्थात् स्वयं के अहं की मृत्यु.... स्वयं के जीवभाव की मृत्यु..... मैं देह हूँ, मैं जीव हूँ, इस परिच्छिन्न भाव की मृत्यु... स्वयं की सूक्ष्म वासनाओं की मृत्यु।
एक बार फकीरी मौत में डूबकर बाहर आ जाओ। फिर देखो कि संसार का कौन-सा भय तुम्हें भयभीत कर सकता है। तुम शाहों के शाह हो।
हमारी भूल यह है कि अवस्थाएँ बदलने को हम अपना बदलना मान लेते हैं। वस्तुतः न तो हम जन्मते और न मरते हैं और न ही हम बालक, किशोर, प्रौढ़ और वृद्ध बनते हैं। ये सब हमारी देह के धर्म हैं और हम देह नहीं हैं।
मौत के बाद अपने सब पराये हो जाते हैं। तुम्हारा शरीर भी पराया हो जाता है लेकिन तुम्हारी आत्मा आज तक परायी नहीं हुई।
मौत से भी मौत का भय खराब है। मौत आ जाय यह ठीक है, लेकिन मौत से सदैव भयभीत रहना ठीक नहीं। क्योंकि भय में से ही सारे पाप पैदा होते हैं। भय ही मृत्यु है।
यदि हमने शरीर के साथ अहंबुद्धि की तो हम में भय व्याप्त हो ही जायगा, क्योंकि शरीर की मृत्यु निश्चित है। उसका परिवर्तन अवश्यंभावी है। उसको तो स्वयं ब्रह्माजी भी नहीं रोक सकते। यदि हमने अपने आत्मस्वरूप को जान लिया, स्वरूप में हमारी निष्ठा हो गई तो हम निर्भय हो गये, क्योंकि स्वरूप की मृत्यु होती नहीं। मौत भी उससे डरती है।
यदि मौत पर विजय प्राप्त करनी हो, जीवन को सही तरीके से जीना हो, तो फकीरों के कहे अनुसार आसन करो, प्राणायाम करो, ध्यान करो, योग करो, आत्मचिन्तन करो और ऐसा पद प्राप्त कर लो कि जहाँ मृत्यु की पहुँच नहीं है।
"..आश्रम से प्रकाशित पुस्तक ऋषि प्रसाद से लिया गया प्रसंग.."
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