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१८
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शनिवार, 15 अक्तूबर 2011

मृत्यु ...........


मौत से मनुष्य डरता है, जीवन में पग पग पर छोटी मोटी परिस्थितियों से घबरा उठता है। ऐसा भयभीत जीवन भी कोई जीवन है ? जहाँ पग पग पर मृत्यु का भय प्रकम्पित करता रहे ? ऐसा नीरस जीवन, भयपूर्ण जीवन मौत से भी बदतर है। ऐसा जीवन जीने में कोई सार नहीं। यह जीवन जीवन नहीं है। इसलिए कहता हूँ कि असली जीवन जीना हो, निर्भय जीवन जीना हो तो फकीरी मौत को एक बार जान लो।
मौत तो इतनी प्यारी है कि उसे यदि आमंत्रित किया जाय तो अमृतमय जीवन के द्वार खोल देती है।
एक ऐसी जगह है जहाँ मौत की पहुँच नहीं, जहाँ मौत का कोई भय नहीं, जिसमें मौत भी भयभीत होती है-उस जगह पर हम बैठे हैं। तुम चाहो तो तुम भी बैठ सकते हो।
मौत तो एक पड़ाव है, एक विश्रान्तिस्थान है। उससे भय कैसा ? यह तो प्रकृति की एक व्यवस्था है।
स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर का वियोग, जिसको मृत्यु कहा जाता है वह विश्रामस्थल तो है परन्तु पूर्ण विश्रान्ति उसमें भी नहीं है। यह फकीरी मौत नहीं है। फकीरी मौत तो वह है जिसमें सारी वासनाएँ जड़ सहित भस्म हो जाय।
दिन के भारी काम से थका हुआ मनुष्य जैसे नींद की चाह करता है उसी प्रकार समझदार व्यक्ति मृत्यु से भय न रखकर उसे समझपूर्वक आमंत्रित करके आत्मा में आराम पाता है।
फकीरी मौत ही असली जीवन है। फकीरी मौत अर्थात् स्वयं के अहं की मृत्यु.... स्वयं के जीवभाव की मृत्यु..... मैं देह हूँ, मैं जीव हूँ, इस परिच्छिन्न भाव की मृत्यु... स्वयं की सूक्ष्म वासनाओं की मृत्यु।
एक बार फकीरी मौत में डूबकर बाहर आ जाओ। फिर देखो कि संसार का कौन-सा भय तुम्हें भयभीत कर सकता है। तुम शाहों के शाह हो।
हमारी भूल यह है कि अवस्थाएँ बदलने को हम अपना बदलना मान लेते हैं। वस्तुतः न तो हम जन्मते और न मरते हैं और न ही हम बालक, किशोर, प्रौढ़ और वृद्ध बनते हैं। ये सब हमारी देह के धर्म हैं और हम देह नहीं हैं।
मौत के बाद अपने सब पराये हो जाते हैं। तुम्हारा शरीर भी पराया हो जाता है लेकिन तुम्हारी आत्मा आज तक परायी नहीं हुई।
मौत से भी मौत का भय खराब है। मौत आ जाय यह ठीक है, लेकिन मौत से सदैव भयभीत रहना ठीक नहीं। क्योंकि भय में से ही सारे पाप पैदा होते हैं। भय ही मृत्यु है।
यदि हमने शरीर के साथ अहंबुद्धि की तो हम में भय व्याप्त हो ही जायगा, क्योंकि शरीर की मृत्यु निश्चित है। उसका परिवर्तन अवश्यंभावी है। उसको तो स्वयं ब्रह्माजी भी नहीं रोक सकते। यदि हमने अपने आत्मस्वरूप को जान लिया, स्वरूप में हमारी निष्ठा हो गई तो हम निर्भय हो गये, क्योंकि स्वरूप की मृत्यु होती नहीं। मौत भी उससे डरती है।
यदि मौत पर विजय प्राप्त करनी हो, जीवन को सही तरीके से जीना हो, तो फकीरों के कहे अनुसार आसन करो, प्राणायाम करो, ध्यान करो, योग करो, आत्मचिन्तन करो और ऐसा पद प्राप्त कर लो कि जहाँ मृत्यु की पहुँच नहीं है।
"..आश्रम से प्रकाशित पुस्तक ऋषि प्रसाद से लिया गया प्रसंग.."
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