मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

बुधवार, 14 जुलाई 2010

मौनः शक्तिसंचय का महान स्रोत

मौन शब्द की संधि विच्छेद की जाय तो म+उ+न होता है। म = मन, उ = उत्कृष्ट और न = नकार। मन को संसार की ओर उत्कृष्ट न होने देना और परमात्मा के स्वरूप में लीन करना ही वास्तविक अर्थ में मौन कहा जाता है। वाणी के संयम हेतु मौन अनिवार्य साधन है। मनु्ष्य अन्य इन्द्रियों के उपयोग से जैसे अपनी शक्ति खर्च करता है ऐसे ही बोलकर भी वह अपनी शक्ति का बहुत व्यय करता है। मनुष्य वाणी के संयम द्वारा अपनी शक्तियों को विकसित कर सकता है। मौन से आंतरिक शक्तियों का बहुत विकास होता है। अपनी शक्ति को अपने भीतर संचित करने के लिए मौन धारण करने की आवश्यकता है।


कहावत है कि न बोलने में नौ गुण। ये नौ गुण इस प्रकार हैं।
1. किसी की निंदा नहीं होगी।
2. असत्य बोलने से बचेंगे।
3. किसी से वैर नहीं होगा।
4. किसी से क्षमा नहीं माँगनी पड़ेगी।
5. बाद में आपको पछताना नहीं पड़ेगा।
6. समय का दुरूपयोग नहीं होगा।
7. किसी कार्य का बंधन नहीं रहेगा।
8. अपने वास्तविक ज्ञान की रक्षा होगी। अपना अज्ञान मिटेगा।
9. अंतःकरण की शाँति भंग नहीं होगी।


मौन के विषय में महापुरूष कहते हैं।


सुषुप्त शक्तियों को विकसित करने का अमोघ साधन है मौन। योग्यता विकसित करने के लिए मौन जैसा सुगम साधन मैंने दूसरा कोई नहीं देखा। - परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू


ज्ञानियों की सभा में अज्ञानियों का भूषण मौन है। - भर्तृहरि


बोलना एक सुंदर कला है। मौन उससे भी ऊँची कला है। कभी-कभी मौन कितने ही अनर्थों को रोकने का उपाय बन जाता है। क्रोध को जीतने में मौन जितना मददरूप है उतना मददरूप और कोई उपाय नहीं। अतः हो सके तब तक मौन ही रहना चाहिए। - महात्मा गाँधी

सोमवार, 12 जुलाई 2010

५ प्रकार के स्वप्न

लोग सत्संग के अभाव में ऐसे जीते है जैसे सोये हुये हों, मानो निन्द्राचारी हों। केवल चर्मचक्षुओं के खुले होने से ही आदमी जागा हुआ नही माना जायेगा। आँख खुली तो बोले कि मैं जाग गया नही-नही, हर कदम जागरुपता से आगे बढाया जायें वही व्यक्ति वास्तव में जागा हुआ हैं। ऐसी जाग्रति सत्संग से ही आती हैं। सत्संग के अभाव से, गुरुदीक्षा के अभाव में सारा दिन तेरा-मेरा करते बीत जाता है तो फिर रात को स्वप्न भी ऐसे ही देखते रहते हैं। ५ प्रकार के स्वप्न होते हैं।

१. मात्र कूडा-कर्कट कचरा स्वप्न - दिन में बाजार जाते है लोग कुछ खरीददारी करने तो वहाँ से भी बहुत कुछ कचरा ले आते है किसी से मिले, किसी से बात की, किसी पर दृष्टि पडी या किसी से परिचय हो गया फ़ोन किया, किसी को मैसेज किया या किसी का मैसेज आया ये सब कचरा ही तो है। ये सब कचरा दिन भर में लोग इकट्ठा कर लेते है और फिर रात को स्वप्न में इन्ही को देखते रहते है। धूल बहुत जम जाती है दिन भर में, सत्संग के बिना सिवाय जो भी बात करते है न, समझो कि वो धूल जमा कर रहे हैं। मिट्टी जम रही है, मैल जम रहा हैं। दिन भर हम लोग बाजार जाते है आफ़िस जाते है तो हमारे कपडों में धूल जम जाती है हम कपडे बदल देते है धो देते है साबुन लगाकर हम स्नान करते है शरीर के स्नान की अवश्यकता तो है पर अन्तःकरण की शुद्धता की आवश्यकता महसूस क्यों नही होती ? सत्संग के अभाव के कारण।

२. दूसरे प्रकार के सपने वो होते है बहुत सी आवश्यकताओं के बारे में। दिन भर में मनुष्य को बहुत सी चीजो की आवश्यकता पडती हैं जैसे मुझे ठंडा पानी मिल जाता या ठंडी लस्सी मिल जाती तो कितना मजा आता, तो ये आवश्यकतायें दिन भर में होती है और उनमें से कई आवश्यकतायें पूरी नही होती है तो भूखी आवश्यकताएं परिपूर्ती की मांग करती हैं। फिर स्वप्न में वो प्रकट हो जाती है। जैसे दिन भर किसी ने उपवास किया हो तो रात में स्वप्न देख रहा है कि में आलू की सब्जी खा रहा हूँ, परवल की सब्जी खा रहा हूँ, और रोटी खा रहा हूँ। आलू और गोभी के पराठे खा रहा हूँ दही के साथ और मजा आ रहा है वाह-वाह....। स्वप्न वही देखेगा।

३. तीसरे प्रकार के सपने होते है कुछ ईश्वरीय संकेत के, कुछ गुरु के संकेत के होते हैं कि ऐसा करों, वैसा करों। जैसे त्रिजटा को सपना आया था। जैसे अप्ने एक साधक रहते है अमदावाद में उसको बापू ने कहा कि क्या तु सो रहा है घर में, उठ जल्दी जा अपने होटल में और जो दूध आया है उसको फिकवा दे गटर में। वो जल्दी से गया और उसने दूध को छाना तो उसने देखा कि एक बडी सी मरी हुई छिपकली पडी हुई हैं। तो उसने सोचा कि बापूजी ने मुझे प्रेरणा दी अगर मैं ये दूध ग्राहकों कों दे देता और उनको कुछ हो जाता तो क्या होता ? तो कुछ सपने ईश्वरीय संकेत के होते है और वो बडे गहरे मार्गदर्शक होते हैं। हो सकता है कि आप लोगों को भी ये संकेत मिले हों लेकिन सबको नही मिल पाते हैं क्योंकि लोगों ने उसके साथ अपना संपर्क खो दिया हैं। इसलिये उसके संकेत मिल नही पाते हैं और फिर जीवन में कई प्रश्न बने रहते हैं। संसारी लोगों को भी और कई भक्ति करने वालों को भी कि क्या करुँ मेरा मन नही लगता जप में, मेरा अनुष्ठान पूरा नही हो पाता इसका क्या करुँ तो ये कई प्रश्न बने रहते हैं। तो अगर व्यक्ति शांत रहना सीखे, राग-द्वेष से रहित होना सीखें, आकर्षण-विकर्षण से रहित होना सीखे तो हम उस संकेत को पा सक्ते हैं।

४ चौथे प्रकार के सपने होते है कुछ पिछ्ले जन्मों से भी संबन्ध रखते है जैसे कभी-कभी दिखा कि हम आकाश में उड रहे हैं। अब क्या आदमी कभी आकाश में उड सकता हैं क्या ? संभव ही नही है। लेकिन किसी जन्म में पक्षी बना था उसके संसकार थे चित्त में और स्वप्न में उभरा कि मैं आकाश में उड रहा हूँ। पानी की गहराई में तैर रहा हूँ। तो पिछ्ले जन्मों से ये संबन्ध रखते हैं।

५ पाँचवें प्रकार के सपने होते है जो कि भविष्य से संबन्ध रखते हैं। कभी-कभी स्वप्न में होने वाली घटना आपको स्वप्न में पता चल जाये कि ऐसा होने वाला है। जैसे त्रिजटा को पता चल गया कि हनुमान जी लंका में आग लगाने वाले हैं। कोई पवित्र आत्मा हो या जिनका हृदय शुद्ध हो उसको कई बार बाद में होने वाली घटनायें पहले ही पता चल जाती हैं। हृदय शुद्ध होता हैं तो संकेत मिल जाते हैं। हृदय शुद्ध हो तो अकस्मात ही द्वार खुल जाता है। भविष्य के बारे में संप्रेक्षण हो जाता हैं।

परन्तु ज्युँ-ज्युँ सदगुरु की उपासना होगी भक्ति होगी त्युँ-त्य़ुँ पता चलता है विवेक जगता है कि वास्तव में ये सब स्वप्न हैं। जैसे ५ प्रकार के स्वप्न है न वैसे ही येह जो हम देख रहे है दिन में वो भी एक स्वप्न ही हैं। ये अलग प्रकार का स्वप्न है पर है, यह भी स्वप्न। पर सत्संग और भक्ति के अभाव में यह सत्य प्रतीत होता हैं। तो हमको यह सोचना चाहिये कि रात को स्वप्न में सुख भी होता है और दुख भी होता है परन्तु जब आँख खुली तो न सुख हैं, न दुख हैं और न उसकी असर हैं। तो ज्युँ-ज्युँ हम लोगों की उपासना, भक्ति बढेगी सत्संग सुनेंगे आदरपूर्वक, प्रीतीपूर्वक गुरुदेव का त्युँ-त्य़ुँ आन्तरिक स्थिति भी ऊँची होती जायेगी।

स्रोत :- हरिद्वार कुम्भ - १२ अप्रैल २०१० शाम के सत्र में स्वामी सुरेशानन्द जी (12 APR 0556PM.mp3)

रविवार, 11 जुलाई 2010

आपके पास कल्पवृक्ष है

एक ऐसा भगतड़ा था, धार्मिक था। शरीर से हट्टा-कट्टा था। कभी शिवजी की पूजा करता तो कभी राम जी की, कभी कन्हैया को रिझाता तो कभी जगदम्बा को, कभी गायत्री की उपासना करता है तो कभी दुर्गा की। कभी-कभी हनुमानजी को भी रिझाने का लगता था ताकि और कोई देवी-देवता संकट के समय में न आवें भी पवनसुत हनुमानजी जम्प मारकर आ सकते हैं। अपने पूजा के कमरे में वह भगत कई देवी-देवता के चित्र रखता था, मानो कोई छोटी-मोटी प्रदर्शनी हो।
शरीर से पहलवान जैसा वह भगतड़ा बैलगाड़ी चलाने का धंधा करता था। एक बार उसकी बैलगाड़ी फँस गई। वह नर्वस हो गया। आकाश की ओर निहार कर गिड़गिड़ाने लगाः "हे मेरे रामजी, आप दया करो। हे ठाकुरजी, आप आओ। हे कन्हैया, तू सहायता कर। हे भोलेनाथ, आप पधारो। मेरी बैलगाड़ी फँस गई है, आप निकाल दो।"
भगतड़ा एक के बाद एक करके तमाम देवी-देवताओं को बुला चुका। कोई आया नहीं। शाम ढलने लगी। सूर्य डूबने की तैयारी में था। गाँव काफी दूर था। गाड़ी में माल भरा था। लुटेरों का भय था। वह रोया। आखिर हनुमानजी को याद किया, गिड़गिड़ाया। पवनसुत जी भी नहीं आये तो वह रोते-रोते सुन्न हो गया, अनजाने में शांत हो गया। चित्त शांत हुआ तो जिससे हनुमान जी हनुमान जी हैं, जिससे गुरु गुरु हैं, शिष्य शिष्य है, जिससे सृष्टि सृष्टि है उस चैतन्य तत्त्व के साथ एकता हो गई क्षणभर। हनुमान जी के दिल में स्फुरित हुआ कि मेरा भक्त विह्वल है, मुझे याद कर रहा है।
कहानी कहती है कि वहाँ हनुमानजी प्रकट हो गये। भगत से बोलेः
"अरे ! रो क्यो रहा है ? क्या बात है ?"
"मेरी गाड़ी फँस गई है कीचड़ में। अब आपके सिवाय मेरा कोई सहारा नहीं। कृपा करके आप मेरी बैलगाड़ी निकलवा दो।"
हनुमानजी ने कहाः "अरे पराश्रित प्राणी ! यही अर्थ करता है तू भगवान को रिझाने का ? ऐसे छोटे-छोटे कार्य करवाने के लिए भगवान की पूजा करता था ? ऐसा ताजा तगड़ा है.... तेरे हृदय में भगवान का अथाह बल छुपा है उस पर तूने भरोसा छोड़ दिया ? उतर नीचे। साँस फुला। जोर लगा। पहिये को धक्का मार और बैल को चला। गाड़ी निकल जायेगी। गाड़ी पर बैठा बैठा रो रहा है कायर ! बोल, नीचे उतरता है कि नहीं ? जोर लगाता है कि गदा मारूँ ?"
आदमी अपने शौक से दौड़ता है लेकिन कोई डण्डा लेकर मारने के लिए पीछे पड़ता है तो भागने की अजीब शक्ति अपने आप आ जाती है। छुपी हुई, दबी हुई शांति प्रकट हो जाती है।
भगतड़े में आ गया जोर। नीचे उतरा, पहिये को धक्का लगाया, बैल को प्रोत्साहित किया। गाड़ी निकल गई।
"हे प्रभु ! आपकी दया गई।"
"हमारी दया नहीं, तुमने अभी अपनी शक्ति का उपयोग किया।"
हम लोग दर्शन शास्त्र का अनादर करते हैं, उससे अनभिज्ञ रहते हैं और तथाकथित भगतड़े हो जाते हैं तो हिन्दू धर्म की मजाक उड़ती है। हमारा हिन्दू धर्म, सनातन धर्म अपने पूर्व गौरव को खो बैठा है, हम लोगों के कारण। धर्म के नाम पर हम लोग पलायनवादी बन जाते हैं। व्यवहार में अकुशल और राग-द्वेष के गुलाम बनने से हमारी शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं। परब्रह्म परमात्मा का एक नाम 'उदासीन' भी है। उसमें तुम्हारी वृत्ति को आसीन करो।

आपके पास कल्पवृक्ष है। आप जो चाहें उससे पा सकते हैं। उसके सहारे आपका जीवन जहाँ जाना चाहता है, जा सकता है, जहाँ पहुँचना चाहता है, जो बनना चाहता है बन सकता है। ऐसा कल्पवृक्ष हर किसी के पास है।
सुंञा सखणा कोई नहीं सबके भीतर लाल। मूरख ग्रंथि खोले नहीं करमी भयो कंगाल।।

सोमवार, 5 जुलाई 2010

आप चाकलेट खा रहे हैं या निर्दोष बछड़ों का मांस?

चाकलेट का नाम सुनते ही बच्चों में गुदगुदी न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। बच्चों को खुश करने का प्रचलित साधन है चाकलेट। बच्चों में ही नहीं, वरन् किशोरों तथा युवा वर्ग में भी चाकलेट ने अपना विशेष स्थान बना रखा है। पिछले कुछ समय से टॉफियों तथा चाकलेटों का निर्माण करने वाली अनेक कंपनियों द्वारा अपने उत्पादों में आपत्तिजनक अखाद्य पदार्थ मिलाये जाने की खबरे सामने आ रही हैं। कई कंपनियों के उत्पादों में तो हानिकारक रसायनों के साथ-साथ गायों की चर्बी मिलाने तक की बात का रहस्योदघाटन हुआ है।

गुजरात के समाचार पत्र गुजरात समाचार में प्रकाशित एक समाचार के अनुसार नेस्ले यू.के.लिमिटेड द्वारा निर्मित किटकेट नामक चाकलेट में कोमल बछड़ों के रेनेट (मांस) का उपयोग किया जाता है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि किटकेट बच्चों में खूब लोकप्रिय है। अधिकतर शाकाहारी परिवारों में भी इसे खाया जाता है। नेस्ले यू.के.लिमिटेड की न्यूट्रिशन आफिसर श्रीमति वाल एन्डर्सन ने अपने एक पत्र में बतायाः “ किटकेट के निर्माण में कोमल बछड़ों के रेनेट का उपयोग किया जाता है। फलतः किटकेट शाकाहारियों के खाने योग्य नहीं है। “ इस पत्र को अन्तर्राष्टीय पत्रिका यंग जैन्स में प्रकाशित किया गया था। सावधान रहो, ऐसी कंपनियों के कुचक्रों से! टेलिविज़न पर अपने उत्पादों को शुद्ध दूध से बनते हुए दिखाने वाली नेस्ले लिमिटेड के इस उत्पाद में दूध तो नहीं परन्तु दूध पीने वाले अनेक कोमल बछड़ों के मांस की प्रचुर मात्रा अवश्य होती है। हमारे धन को अपने देशों में ले जाने वाली ऐसी अनेक विदेशी कंपनियाँ हमारे सिद्धान्तों तथा परम्पराओं को तोड़ने में भी कोई कसर नहीं छोड़ रही हैं। व्यापार तथा उदारीकरण की आड़ में भारतवासियों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ हो रहा है।

हालैण्ड की एक कंपनी वैनेमैली पूरे देश में धड़ल्ले से फ्रूटेला टॉफी बेच रही। इस टॉफी में गाय की हड्डियों का चूरा मिला होता है, जो कि इस टॉफी के डिब्बे पर स्पष्ट रूप से अंकित होता है। इस टॉफी में हड्डियों के चूर्ण के अलावा डालडा, गोंद, एसिटिक एसिड तथा चीनी का मिश्रण है, ऐसा डिब्बे पर फार्मूले (सूत्र) के रूप में अंकित है। फ्रूटेला टॉफी ब्राजील में बनाई जा रही है तथा इस कंपनी का मुख्यालय हालैण्ड के जुडिआई शहर में है। आपत्तिजनक पदार्थों से निर्मित यह टॉफी भारत सहित संसार के अनेक अन्य देशों में भी धड़ल्ले से बेची जा रही है।

चीनी की अधिक मात्रा होने के कारण इन टॉफियों को खाने से बचपन में ही दाँतों का सड़ना प्रारंभ हो जाता है तथा डायबिटीज़ एवं गले की अन्य बीमारियों के पैदा होने की संभावना रहती है। हड्डियों के मिश्रण एवं एसिटिक एसिड से कैंसर जैसे भयानक रोग भी हो सकते हैं।

सन् 1847 में अंग्रजों ने कारतूसों में गायों की चर्बी का प्रयोग करके सनातन संस्कृति को खण्डित करने की साजिश की थी, परन्तु मंगल पाण्डेय जैसे वीरों ने अपनी जान पर खेलकर उनकी इस चाल को असफल कर दिया। अभी फिर यह नेस्ले कंपनी चालें चल रही है। अभी मंगल पाण्डेय जैसे वीरों की ज़रूरत है। ऐसे वीरों को आगे आना चाहिए। लेखकों, पत्रकारों को सामने आना चाहिए। देशभक्तों को सामने आना चाहिए। देश को खण्ड-खण्ड करने के मलिन मुरादेवालों और हमारी संस्कृति पर कुठाराघात करने वालों के सबक सिखाना चाहिए। देव संस्कृति भारतीय समाज की सेवा में सज्जनों को साहसी बनना चाहिए। इस ओर सरकार का भी ध्यान खिंचना चाहिए।

ऐसे हानिकारक उत्पादों के उपभोग को बंद करके ही हम अपनी संस्कृति की रक्षा कर सकते हैं। इसलिए हमारी संस्कृति को तोड़नेवाली ऐसी कंपनियों के उत्पादों के बहिष्कार का संकल्प लेकर आज और अभी से भारतीय संस्कृति की रक्षा में हम सबको कंधे-से-कंधा मिलाकर आगे आना चाहिए।

रविवार, 4 जुलाई 2010

भारतीय सिद्धान्त के अनुसार जन्मदिन कैसे मनायें?

बच्चों को अपना जन्मदिन मनाने का बड़ा शौक होता है और उनमें उस दिन बड़ा उत्साह होता है लेकिन अपनी परतंत्र मानसिकता के कारण हम उस दिन भी बच्चे के दिमाग पर अंग्रजियत की छाप छोड़कर अपने साथ, उनके साथ व देश तथा संस्कृति के साथ बड़ा अन्याय कर रहे हैं. बच्चों के जन्मदिन पर हम केक बनवाते हैं तथा बच्चे को जितने वर्ष हुए हों उतनी मोमबत्तियाँ केक पर लगवाते हैं। उनको जलाकर फिर फूँक मारकर बुझा देते हैं। ज़रा विचार तो कीजिए के हम कैसी उल्टी गंगा बहा रहे हैं! जहाँ दीये जलाने चाहिए वहाँ बुझा रहे हैं। जहाँ शुद्ध चीज़ खानी चाहिए वहीं फूँक मारकर उड़े हुए थूक से जूठे बने हुए केक को हम बड़े चाव से खाते हैं! जहाँ हमें गरीबों को अन्न खिलाना चाहिए वहीं हम बड़ी पार्टियों का आयोजन कर व्यर्थ पैसा उड़ा रहे हैं! कैसा विचित्र है आज का हमारा समाज? हमें चाहिए कि हम बच्चों को उनके जन्मदिन पर भारतीय संस्कार व पद्धति के अनुसार ही कार्य करना सिखाएँ ताकि इन मासूम को हम अंग्रेज न बनाकर सम्माननीय भारतीय नागरिक बनायें।

1। मान लो, किसी बच्चे का 11 वाँ जन्मदिन है तो थोड़े-से अक्षत् (चावल) लेकर उन्हें हल्दी, कुंकुम, गुलाल, सिंदूर आदि मांगलिक द्रव्यों से रंग ले एवं उनसे स्वस्तिक बना लें। उस स्वस्तिक पर 11 छोटे-छोटे दीये रख दें और 12 वें वर्ष की शुरूआत के प्रतीकरूप एक बड़ा दीया रख दें। फिर घर के बड़े सदस्यों से सब दीये जलवायें एवं बड़ों को प्रणाम करके उनका आशीर्वाद ग्रहण करें।

2। पार्टियों में फालतू का खर्च करने के बजाए बच्चों के हाथों से गरीबों में, अनाथालयों में भोजन, वस्त्रादि का वितरण करवाकर अपने धन को सत्कर्म में लगाने के सुसंस्कार सुदृढ़ करें।

3। लोगों के पास से चीज-वस्तुएँ लेने के बजाए हम अपने बच्चों के हाथों दान करवाना सिखाएँ ताकि उनमें लेने की वृत्ति नहीं अपितु देने की वृत्ति को बल मिले।

4। हमें बच्चों से नये कार्य करवाकर उनमें देशहित की भावना का संचार करना चाहिए। जैसे, पेड़-पौधे लगवाना इत्यादि।

5। बच्चों को इस दिन अपने गत वर्ष का हिसाब करना चाहिए यानि कि उन्होंने वर्ष भर में क्या-क्या अच्छे काम किये? क्या-क्या बुरे काम किये? जो अच्छे कार्य किये उन्हें भगवान के चरणों में अर्पण करना चाहिए एवं जो बुरे कार्य हुए उनको भूलकर आगे उसे न दोहराने व सन्मार्ग पर चलने का संकल्प करना चाहिए।

6। उनसे संकल्प करवाना चाहिए कि वे नए वर्ष में पढ़ाई, साधना, सत्कर्म, सच्चाई तथा ईमानदारी में आगे बढ़कर अपने माता-पिता व देश के गौरव को बढ़ायेंगे।

उपरोक्त सिद्धान्तों के अनुसार अगर हम बच्चों के जन्मदिन को मनाते हैं तो जरूर समझ लें कि हम कदाचित् उन्हें भौतिक रूप से भले ही कुछ न दे पायें लेकिन इन संस्कारों से ही हम उन्हें महान बना सकते हैं। उन्हें ऐसे महकते फूल बना सकते हैं कि अपनी सुवास से वे केवल अपना घर, पड़ोस, शहर, राज्य व देश ही नहीं बल्कि पूरे विश्व को सुवासित कर सकेंगे।

शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

द्वेष की गाँठ मत बाँधो

मुझे एक महात्मा बताया करते थेः "हमारे गुरुजी मुझसे कहते थे कि बेटा ! मन में आये तो किसी को दो गाली दे देना लेकिन मन में गाँठ मत बाँधना। ऐसी कुछ बात हो जाय तो ठपका दे देना, तमाचा मार देना लेकिन किसी भी व्यक्ति के प्रति चित्त में द्वेष की गाँठ मत बाँधना।"

द्वेष की गाँठ अपने चित्त को मलिन कर देती है। जो कलह, झगड़े, परेशानियाँ होती हैं वे द्वेष की आग के कारण ही होती हैं। ऐसा नहीं कि परेशान करने वाला व्यक्ति दूसरे को ही परेशान करता है। नहीं.... वह बेचारा स्वयं भी परेशान होता है। जहर तो जो पीता है उसका खाना खराब करता है, जिस बोतल में पड़ा है उस बोतल का पहले सत्यानाश करता है और फिर जिस पर उड़ेला जाता है उसका सत्यानाश करता है। दोनों पक्षों की हानि होती है, फिर चाहे पति-पत्नी का द्वेष हो, राजा-राजा का द्वेष हो, व्यापारी-व्यापारी का द्वेष हो, साधक-साधक का द्वेष हो चाहे सुर-असुर का द्वेष हो। द्वेष सात्त्विक प्रकृति के व्यक्तियों के बीच का हो चाहे राजसिक-तामसिक प्रकृति के व्यक्तियों के बीच का हो, वह खाना खराबी करता है, कोई फायदा नहीं करता।

ब्रह्माजी इन्द्र और विरोचन से कहते हैं- "अगर तुममें द्वेष न होगा तो तुम मेरा थोड़ा-सा उपदेश भी समझ जाओगे। आँखों में जो दिखता है वह परब्रह्म है।" ब्रह्माजी ने सोचा कि ब्रह्मभाव में आकर मैंने ये वचन कहे हैं। मेरे इन वचनों को ही याद करेंगे, दोहरायेंगे, मनन करेंगे तो इनकी बुद्धि प्रकाशित हो जायेगी लेकिन विरोचन तो विरोचन ही था, मोटी बुद्धि का। जाकर पानी में देखा तो अपनी परछाई दिखी। किसी की आँख में देखा तो अपना प्रतिबिम्ब दिखा। आँखों में जो दिखता है वह ब्रह्म है। एक-दूसरे की आँखों में हम ही दिख रहे हैं तो हम ही ब्रह्म हैं। देहो ब्रह्मः। दिल में द्वेष की आग के कारण बुद्धि खुली नहीं थी। वह देह को ब्रह्म मानकर उलझ गया और अपनी प्रजा को भी उलझा दिया। शरीर को ही ब्रह्म मानकर अपने राज्य में जाकर प्रचार कर दिया। खाओ, पियो और मौज से जियो। मरने के बाद किसने क्या देखा है?

यावज्जीवेत् सुखं जीवेत् ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्। भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः।।

विरोचन का यह सिद्धान्त विदेशों में देखा जाता है। सुबह से शाम तक, जन्म से मौत तक जीवन का पूरा आयोजन, विकास और वैज्ञानिक आविष्कार, बुद्धिमानों की पूरी अक्ल होशियारी शरीर को सुख देने के लिए ही लगायी जा रही है। उनमें असुरों का सिद्धान्त फूला-फला है।
देवताओं का राजा इन्द्र सात्त्विक था। उसने सोचाः 'दिखता तो देह है, क्या देह ब्रह्म है?' जाकर ब्रह्माजी से पूछा तो वे खुश हुए कि इसने विचार का सहारा लिया है। बोलेः "अब इस देह को नहलाकर, सुन्दर वस्त्रालंकार पहनाकर आओ।"
इन्द्र वैसा होकर गया। ब्रह्माजी ने कहाः "अब अपना प्रतिबिम्ब पानी में देखो। क्या दिखता है?"
"अब मैं सजा-धजा, आभूषणों से विभूषित दिखता हूँ। पहले बिना आभूषण का था।"
"आभूषणवाला और बिना आभूषण का, इन दोनों को जो जानता है वह ब्रह्म् है। एकान्त में जाकर चिन्तन करो।" चिन्तन व खोजबीन में समय बिताकर इन्द्र फिर ब्रह्माजी के पास आया। बोलाः "इन दोनों को देखता है मन।" "मन को भी जो देखता है वह ब्रह्म है।"
सोचते-सोचते, खोज करते-करते विश्रांति नहीं मिली, साक्षात्कार नहीं हुआ। फिर वापस आकर बोलाः "हे भन्ते ! कृपानाथ ! कृपा करें। मुझे ब्रह्म-साक्षात्कार करा दीजिए, परमात्मा में विश्रांति प्राप्त करा दीजिए। इसके बिना जीव अभागा है। जब तक आत्म-साक्षात्कार नहीं होता तब तक मेरी इन्द्र पदवी भी तुच्छ है ऐसा मैंने समझा है। अब आपके शरण हूँ। कैसे भी हो, मुझे परमात्मतत्त्व का बोध करा दीजिए प्रभो !"
ब्रह्माजी के हृदय में प्रसन्नता हुई कि शिष्य अधिकारी है, ब्रह्मज्ञान का मूल्य समझता है। अपने जीवन व आत्मबोध का मूल्य समझता है। बोलेः "मन को जो देखता है वह ब्रह्म है। फिर से जा एकान्त में और खोज कर, चिन्तन कर।"
एकान्त में जाकर इन्द्र विचार करने लगा, देखने लगा कि कौन मन को देखता है। वह समाहित होने लगा। धीरे-धीरे इन्द्रियाँ मन में आ गईं। मन को कौन देखता है – यह प्रश्न करते-करते मन के संकल्प – विकल्प कम हो गये। इन्द्रियों का संयम हो गया, मन एकाग्र हो गया। मन संयत हुआ तो बुद्धि का प्रकाश होने लगा। मन की हरकतों को देखते-देखते उसका मन अमनीभाव को प्राप्त होने लगा। ऐसे गहरे चिन्तन में उतरते-उतरते इन्द्र इन्द्र न बचा। इन्द्र वही हो गया जिससे ब्रह्माजी ब्रह्माजी हैं।
ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर कार्य रहे न शेष।
मोह कभी न ठग सके इच्छा नहीं लवलेश।।
पूर्ण गुरु कृपा मिली पूर्ण गुरु का ज्ञान।
सुरपति इन्द्र हो गये स्वयं ब्रह्मप्रतिरूप।।