मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

शुक्रवार, 9 नवंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 42 (मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण)


अठारहवाँ सर्ग
मुख्य, अमूल्य और आनुंषगिक फलों के साथ इस ग्रन्थ के गुणों का निरूपण।
इस प्रकार विषय और प्रयोजन से प्रकरणभेद का वर्णन कर सम्पूर्ण ग्रन्थ के गुणों का वर्णन कर रहे श्रीवसिष्ठजी तत् तत् दृष्टान्तों के उपन्यास में ग्राह्य अंश और तात्पर्य को, ग्रन्थ शैली के ज्ञान के लिए कहते हैं।
हे रघुवंशतिलक, जैसे जोते हुए उपजाऊ खेत में उचित समय में बोये गये उत्तम बीज से अवश्यम्भावी सत्फल प्राप्त होता है, वैसे ही पूर्वोक्त छः प्रकरणों से युक्त इस मोक्षसंहिता के केवल हृदयंगम करने से ज्ञान प्राप्त होता है।।1।।
अनेक शाखाओं के भेद से विभिन्न अनेक श्रुतियों के विद्यमान रहते उन्हें छोड़कर पुरुषबुद्धि से विरचित इसी को आप परम उपादेय क्यों कहते हैं ? ऐसी शंका होने पर कहते हैं।
यदि पुरुषबुद्धि से विरचित शास्त्र युक्तियों द्वारा तत्त्व का निर्णायक हो, तो उसका भी ग्रहण करना चाहिए। युक्तियों द्वारा तत्त्व का निर्णय न करने वाले आर्ष ग्रन्थ का (वेद का) भी त्याग करना चाहिए। पुरुष को सदा न्याय से युक्त (युक्ति-युक्त) का ही अनुसरण करना चाहिए। भाव यह कि यद्यपि श्रुतियाँ पुरुषबुद्धिविरचित शास्त्र की अपेक्षा अत्यन्त पूज्यतम हैं तथापि उनका अभिप्राय नितान्त गुढ़ है, अतः उनसे सहसा ज्ञान नहीं होता, इसलिए साधारण अधिकारियों को उनका ग्रहण नहीं करना चाहिए, सार के ज्ञाता सत्पुरुषों के अनुभवमूलक युक्तियों से पूर्ण इस शास्त्र का अभिप्राय अत्यन्त साफ है, अतः इससे शीघ्र ज्ञान होता है, इसका अवश्य सादर सेवन करना चाहिए। युक्तियों से पूर्ण वचन बालक का भी हो, तो उसको ले लेना चाहिए और युक्तियों से शून्य वचन ब्रह्माजी का ही क्यों न हो पर उसका तृण के समान त्याग कर देना चाहिए।।2,3।।
यदि कोई कहे कि पुरुषबुद्धि से विरचित शास्त्र ही ग्राह्य है, तो हमारे पूर्वजों के बनाये हुए ही किन्हीं अन्य ग्रन्थों को सुनेंगे, इसको क्यों सुने ? इस पर कहते हैं।
जो पुरुष यह कुआँ हमारे बाप-दादों का बनाया हुआ है यह सोचकर सामने का गंगाजल छोड़कर कुएँ का जल पीता है, उस अतिरागी को कौन शिक्षा दे सकता है ?।।4।।
अन्य की अपेक्षा इसमें अतिशय दिखलाते हैं।
जैसे प्रातःकाल होने पर अवश्य ही अवकाश होता है, वैसे ही इसके भी केवल चित्त में स्थित करने मात्र से सुन्दर स्वच्छ विवेक होगा।।5।।
गुडजिह्विकान्याय से आनुषंगिक फलों को दर्शाने की इच्छा से श्रीवसिष्ठजी पहले शब्दव्युत्पत्तिरूप प्रथम फल कहते हैं।
विद्वान पुरुष के मुँह से अन्त तक इसका श्रवण कर और स्वयं ही मोटा-मोटी इसका ज्ञान प्राप्त कर विचार से धीरे-धीरे बुद्धि में संस्कार प्राप्त होने पर पहले उन्नत लता के समान सभा को अत्यन्त विभूषित करने वाली शुद्धवाक्यता हृदय में उत्पन्न होती है।।6,7।।
अर्थव्युत्पत्तिरूपी चतुरता भी इसका दूसरा फल है, ऐसा कहते हैं।
महत्त्वरूपी गुण से शोभित होने वाली वह दूसरी चतुरता उत्पन्न होती है जिससे राजा और देवताओं के तुल्य पूजनीय विद्वान भी बड़ा प्रेम करते हैं। जैसे सुन्दर नेत्रवाला पुरुष रात्रि के समय दीपक को हाथ में लेकर पदार्थों का ज्ञाता होता है वैसे ही उससे बुद्धिमान पुरुष सर्वत्र पूर्वापर का ज्ञाता हो जाता है। जैसे शरद ऋतु से परिपूर्ण दिशा का कुहरा नष्ट हो जाता है, वैसे ही बुद्धि के लोभ, मोह आदि दोष शनैः शनैः अत्यन्त क्षीण हो जाते हैं। हे श्रीरामजी, आपकी बुद्धि भी मलरहित (निर्मल) हो गई है, अब आपको केवल विवेकाभ्यास की अपेक्षा है। अपने अभ्यास के बिना किया कुछ भी फल नहीं देता। विवेकाभ्यास से मन शरतकाल में महान् सरोवर के तुल्य अतिप्रसाद से युक्त और मन्दर पर्वत से रहित समुद्र के समान क्षोभरहित हो जाता है। हे श्रीरामचन्द्रजी, इस ग्रन्थ के अभ्यास से जिसमें व्यामोहरूपी काजल की गन्ध भी नहीं है ऐसी रत्नदीपक की लौ के समान जिसका अज्ञानरूप आवरण नष्ट हो गया है अतएव पदार्थों के विभाग से युक्त प्रज्ञा अत्यन्त दैदीप्यमान हो जाती है। जैसे कवच और शिरत्राण आदि से सुसज्जित योद्धा को बाण छिन्न-भिन्न नहीं कर सकते, वैसे ही दीनता, दरिद्रता आदि दोषों से भरी हुई दृष्टियाँ इस ग्रन्थ के अभ्यास से धन आदि विषयों में असारता ज्ञात होने के कारण मर्मच्छेदन नहीं कर सकती। प्रस्तुत ग्रन्थ का ज्ञाता भयहेतुओं के सामने खड़ा क्यों न हो, फिर भी जैसे बाण पत्थर की चट्टान को नहीं काट सकते वैसे ही भीषण सांसारिक भय उसके हृदय को पीड़ित नहीं कर सकते। क्रमशः दैव और पौरूष की प्रधानता के हेतु जन्म और कर्मों की आदिता कैसे होगी अर्थात् संसार में जन्म के प्रथम होने पर पौरूष की प्रधानता और कर्म के प्रथम होने पर दैव की प्रधानता कैसे होगी ? इत्यादि सन्देह दिन में अन्धकार की नाईं शान्त हो जाते हैं, कारण कि इस ग्रन्थ के सुनने से दोनों में (जन्म और कर्म में) अविद्यामूलक मिथ्यात्व का निश्चय हो जाता है। रात्रि की नाईं अविद्या के नष्ट होने एवं ज्ञानरूपी आलोक के प्राप्त होने पर सदा सब पदार्थों में शान्ति (राग-द्वेष आदि से क्षोभ न होना) हो जाती है। इस ग्रन्थ का विचार करने वाले पुरुष के हृदय में समुद्र की सी गम्भीरता, मेरू पर्वत की सी निश्चलता और चन्द्रमा की सी शीतलता प्राप्त होती।।8-18।।
इस प्रकार आनुषंगिक (गौण) फलों को दर्शा कर मुख्य फल दर्शाते हैं।
भूमिका के क्रम से सम्पूर्ण विशेषताओं के शान्त होने पर पुरुष की वह जीवन्मुक्ति परिपुष्ट हो जाती है, जिसका वाणी से वर्णन नहीं हो सकता। जैसे सम्पूर्ण पदार्थों को शीतल करने वाली तथा अत्यन्त प्रकाश करने वाली शरत्काल की चाँदनी अत्यन्त शोभा को प्राप्त होती है, वैसे ही इस ग्रन्थ का विचार करने वाले पुरुष की सम्पूर्ण पदार्थों को शीतल करने वाली तथा परमात्मा का दर्शन कराने वाली बुद्धि अत्यन्त प्रकाश को प्राप्त होती है। हृदयरूपी आकाश में शम से प्रकाशयुक्त विवेकरूप निर्मल सूर्य के उदित होने पर विविध अनर्थों के हेतु काम, क्रोध आदि धूमकेतु कभी उदित नहीं होते, इसमें कोई सन्देह नहीं है। जैसे शरदऋतु में वृष्टि करने में अनिच्छुक मेघमालाएँ उन्नत पर्वत में स्थित होती हैं, स्वच्छता को प्राप्त होती हैं और शान्त हो जाती हैं, वैसे ही इस ग्रन्थ का विचार करने से विषयों में तृष्णारहित सौम्य पुरुष चंचलतारहित उन्नत स्वात्मपद में स्थित हो जाते हैं, शुद्धि को प्राप्त होते हैं और शान्त होते हैं। जैसे दिन होने पर पिशाचों की लीला समाप्त हो जाती है, वैसे ही दूसरों का द्वेष आदि करने वाली मुख को दीन बनाने वाली कुटिल अश्लीलवचनता की निवृत्ति हो जाती है। जैसे चित्र में लिखी गई लता को हवा कँपा नहीं सकती, वैसे ही धर्मरूपी (शम, दमरूपी अथवा() परमात्मरूपी) भीत जिसमें एकाग्रता पूर्वक लीन हुई अतएव धैर्य की पराकाष्ठा को प्राप्त हुई बुद्धि को मानसिक व्यथाएँ (चिन्ताएँ) विचलित नहीं कर सकती।
विश्वरूपी चित्र का आधार होने से धर्म में (परमात्मा में) भीत्तित्त्व का आरोप होता है।
तत्त्वज्ञानी पुरुष विषयों में आसक्तिरूपी मोहगर्त में नहीं पड़ता, भला बतलाइये तो सही, जिसे मार्ग ज्ञात होगा वह गड्डे की ओर क्यों दौड़ेगा ? जैसे पतिव्रता नारी अन्तःपुर के आँगन में ही प्रसन्न रहती है, इधर उधर नहीं जाती, वैसे ही सत् शास्त्रों के परिज्ञान से उत्तम चरित्रवाले लोगों की बुद्धि शास्त्र के अनुकूल यथायोग्य प्राप्त कर्म में ही रमण करती है। असंगबुद्धिवाला पुरुष, करोड़ों लाख जगतों में जितने परमाणु हैं, उनमें से प्रत्येक ब्रह्माण्डों को अपने अन्तःकरण में देखता है, कारण कि उसे माया की अघटित घटना में अत्यन्त पटुता का ज्ञान हो जाता है। मोक्ष के उपाय के ज्ञान से जब पुरुष शुद्ध अन्तःकरणवाला हो जाता है, तब उसे विविध भोग न तो क्लेश पहुँचाते हैं और न आनन्द ही देते हैं। प्रत्येक परमाणु में जो सम्पूर्ण सर्गवर्ग असंकीर्ण होकर जलतरंगों की नाईं आविर्भूत और तिरोभूत होते हैं, उन्हें असंगबुद्धि पुरुष देखता रहता है। वह प्राप्त हुए अनिष्ट कार्यों के लिए द्वेष नहीं करता और निवृत्त हुए इष्ट कार्यों की प्राप्ति के लिए इच्छुक नहीं होता, कार्य के फल आदि के स्वरूप का ज्ञाता होता हुआ भी वह उसे न जानने वाले वृक्ष के समान रहता है। जो कुछ मिल गया उससे निर्वाह करने वाला वह सर्वसाधारण लोगों की नाईं दिखाई देता है, इष्ट या अनिष्ट वस्तु की प्राप्ति होने पर उसके चित्त में तनिक भी विकार नहीं होता। हे श्रीरामजी, इस सम्पूर्ण शास्त्र को बँचवा कर और मोटा  मोटी जानकर फिर तात्पर्य के पर्यालोचनपूर्वक प्रत्येक श्लोक का विवेचन कीजिए। इसे आप केवल उक्ति ही न समझिए, किन्तु ब्रह्मा आदि देवताओं के शाप और वरदान के समान इसका फल अवश्य प्राप्त होता है। माधुर्य तथा उपमा, यमक आदि अर्थालंकार और शब्दालंकारों से विभूषित कवितामय और रसमय यह सुन्दर शास्त्र आयास के बिना ही ज्ञात हो जाता है। इसमें दृष्टान्तों द्वारा अर्थ का प्रतिपादन किया गया है, थोड़ी बहुत भी व्यत्पत्ति वाला पुरुष इसे स्वयं ही जान लेता है। जो इसे स्वयं नहीं जान सकता, उसे पण्डित के मुख से इसको सुनना चाहिए। इसके सुनने, विचार करने और जानने पर मनुष्य को मोक्षप्राप्ति के लिए तपस्या, ध्यान, जप आदि किसी की भी आवश्यकता नहीं रहती, कारण कि तपस्या, ध्यान, जप आदि का फल इसके फल से गतार्थ हो जाता है, यह भाव है। इस ग्रन्थ का खूब अभ्यास करने एवं पुनः पुनः इसके पर्यालोचन से चित्तसंस्कारपूर्वक अपूर्व पाण्डित्य होता है। यद्यपि अन्य ग्रन्थों के अभ्यास से भी पाण्डित्य होता है, तथापि वह चित्तसंस्कारपूर्वक नहीं होता, इसलिए इस ग्रन्थ के विचार से जनित पाण्डित्य को अपूर्व कहा है। जैसे सूर्योदय से पिशाच स्वयं नष्ट हो जाता है, वैसे ही मैं और जगत् इस प्रकार का अतिप्रौढ़ द्रष्टा और दृश्य रूप पिशाच अनायास नष्ट हो जाता है, अर्थात् द्रष्टा दृश्य दोनों के शान्त होने से चिन्मात्र शुद्ध आत्मा अवशिष्ट रहता है। मैं और जगत् इत्याकारक भ्रम नष्ट हो जाता है, केवल अधिष्ठान ही शेष रह जाता है, जैसे स्वप्न मोह के ज्ञात होने पर वह भ्रम पैदा नहीं करता, वैसे ही यह भी भ्रम पैदा नहीं करता। जैसे संकल्प द्वारा निर्मित नगर में पुरुष को हर्ष और विषाद नहीं होते अर्थात् संकल्पनिर्मित नगर के पूर्णतया बन जाने पर हर्ष नहीं होता और उसके भंग हो जाने से विषाद नहीं होता, वैसे ही यह जगतभ्रम कल्पनामात्र है, ऐसा ज्ञात होने पर फिर यह क्लेशकारक नहीं होता। यह चित्र लिखित सर्प है, वास्तविक सर्प नहीं है, यों ज्ञात होने  पर चित्रसर्प चित्रसर्प दर्शनजनितभयप्रद नहीं होता, वैसे ही दृश्यरूपी सर्प का परिज्ञान होने पर यह सुखप्रद अथवा दुःखप्रद नहीं होता। जैसे यह चित्रलिखित सर्प है, ऐसा ज्ञान होने से चित्र सर्प की सर्पता नष्ट हो जाती है, वैसे ही संसार के यथार्थ स्वरूप का ज्ञान होने पर अधिष्ठानपरिशेषपूर्वक संसार शान्त हो जाता है।।19-41।।
यह प्रपंच अति विस्तीर्ण है, इसका करोड़ों कुदालियों से भी छेदन नहीं हो सकता यह अनायास कैसे नष्ट होगा ? ऐसी शंका कर ज्ञान का प्रभाव ही वैसा है इस अभिप्राय से कहते हैं।
फूलों और पल्लवों के (नवीन पत्तों के) मलने में (नख और सुई आदि से उन्हें छेदने में) भले ही कुछ प्रयत्न करना पड़े, पर परमपदप्राप्ति में तनिक भी यत्न नहीं करना पड़ता।।42।।
ऐसी याद बात है तो पहले पौरूष का समर्थन क्यों किया ?
ज्ञान के प्रतिबन्धक राग, असंभावना, विपरीतभावना आदि पुरुषापराध के निराकरण के लिए पौरूष का समर्थन किया है। फूल की पांखुड़ी के मर्दन में भी अंगों में व्यापार होता है, परमार्थपदप्राप्ति में बुद्धि व्यापार का भी रोध हो जाता है अंग-प्रत्यंगों के व्यापार की तो कौन कहे ? सुखकर आसन में बैठे हुए, यथायोग्य भोगों का भोग कर रहे, शास्त्रविरूद्ध मार्ग से विमुख एवं देश, काल तथा यथायोग्य सत्संग के अनुसार इस शास्त्र का तथा उपनिषद् आदि का सुखपूर्वक विचार कर रहे पुरुष को फिर माता के उदर में निवास और प्रसवसमय के क्लेश नहीं भोगने पड़ते। ऐसे प्रशंसनीय और सुलभ शास्त्र के रहने पर भी जो पापात्मा नरक आदि क्लेशों से भयभीत न होकर भोगों में आसक्त है, वे अधम माता के मल के कीड़े हैं, उनका नाम लेना भी उचित नहीं है, क्योंकि वे आत्मघाती हैं।।43-47।। हे श्रीरामचन्द्रजी, मुझसे कहे जा रहे इस शास्त्र को आप सुनिये, यह शास्त्र जिनकी बुद्धि अत्यन्त परिशुद्ध है, उनका हृदयभूत है या विवेकबुद्धि से गृहीत होने वाले सारतर पदार्थों की चरमसीमारूप है या इस शास्त्र का विषय बुद्धि से भी बढ़कर सारतर प्रत्यगतभूत आत्मतत्त्व है और यह ज्ञान का विस्तार करने वाला। जिस दृष्टान्त से यह शास्त्र सुना जाता है और जिस संकेत से इस ग्रन्थ का यथार्थरूप से विचार किया जाता है, उस अवतरणिका को आप सुनिये। जिस अर्थ से सादृश्य से बोध किया जाता है, बोधोपकाररूप फल को देने वाला उसको विद्वान लोग दृष्टान्त कहते हैं। (दृष्टान्त – दृष्टः अन्तः सादृश्य बलेन प्रकृतार्थनिर्णयो येन सः। जिससे सादृश्य के बल से प्रस्तुत अर्थ का निश्चय होता है, वह दृष्टान्त है।) हे श्रीरामचन्द्रजी जैसे रात्रि में दीपक के बिना घर में स्थित घट, पट आदि पदार्थों का परिज्ञान नहीं होता वैसे ही दृष्टान्त के बिना अपूर्व (अननुभूत) अर्थ का परिज्ञान नहीं होता।।48-51।।
दृष्टान्तों में विलक्षित सादृश्य के विवेक के लिए त्याज्य अंश को दिखलाते हैं।
हे काकुत्स्थ, जिन जिन दृष्टान्तों द्वारा मैं आपको बोध करता हूँ वे सब स्मरण (जन्मवान्) अतएव मिथ्या हैं, ज्ञातव्य परमार्थ सत्य और कारण रहित (नित्य) है। मिथ्याभूत मिट्टी, सुवर्ण आदि से बने हुए दृष्टान्तों से ब्रह्म का बोध कराया जाता है। इससे जन्मत्त्व आदि दृष्टान्तधर्म हेय हैं, यह निष्कर्ष निकला।।52।।
परब्रह्म के दृष्टान्तों में ही यह नियम है, अन्य दृष्टान्तों में यह नियम लागू नहीं है। - ऐसा कहते हैं।
केवल एक परब्रह्म को छोड़कर सम्पूर्ण उपमान और उपमेयों का कार्यत्व, कारणत्व आदि से सदृश्य पहले कहा गया है। भाव यह है कि जैसे विचार आदि से बिम्ब का ग्राहक ज्ञान उत्पन्न होता है यह कहा जाता है, वैसे ज्ञान से बिम्ब उत्पन्न होता है, यह नहीं कहना चाहिए, क्योंकि ब्रह्म की उत्पत्ति नहीं कह सकते हैं।।53।।
जो पूर्व श्लोक में 'परम ब्रह्म को छोड़ कर' कहा है, उसे विशेषरूप से स्पष्ट रूप करते हैं।
मैं यहाँ ब्रह्मोपदेश में आपसे जो दृष्टान्त कहता हूँ, उसमें एक देश का साधर्म्य लेकर प्रस्तुत अर्थ का निर्णय किया जाता है। भाव यह कि जगदरूप विवर्त के अधिष्ठान ब्रह्म के बोधन में सर्परूप विवर्त के अधिष्ठान का बोधक रज्जुदृष्टान्त अधिष्ठान का विवर्त होता है, केवल इसी एक अंश में दिया जाता है, दार्ष्टान्तिक ब्रह्म में रहने वाले नित्यत्व, सुखित्व आदि सम्पूर्ण अंशों में नहीं।।54।।
दृष्टान्त का एक देश में ही ग्रहण क्यों होता है ? ऐसी कोई शंका न कर बैठे, इसलिए सर्वांश में सादृश्य की प्रसिद्धि ही नहीं है, इस अभिप्राय से कहते हैं।
यहाँ ब्रह्मतत्त्व के ज्ञापन में जो-जो दृष्टान्त दिया जाता है वह स्वप्न में प्रतीत पदार्थ की नाईं मिथ्याभूत जगत् के अन्तर्गत ही है वास्तविक नहीं है, क्योंकि दूसरी परमार्थसत्य और चिदानन्दस्वरूप वस्तु है ही नहीं, यह आशय है।।55।। ऐसा होने पर निराकार ब्रह्म में साकार दृष्टान्त कैसे ? ब्रह्म सद्वितीय है या अद्वितीय ? यदि सद्वितीय है, तो सिद्धान्त की हानि होगी। यदि अद्वितीय है, तो गुरु शास्त्र आदि के अभाव से ज्ञान की उत्पत्ति नहीं होगी, इस प्रकार के विकल्पों से उत्पन्न मूर्खजनों की उक्तियों को अवसर नहीं मिलता।।56।।
इससे दृष्टान्त के अनुमान द्वारा बोधक होने से दृष्टान्त, हेतु, व्याप्ति आदि के मिथ्या होने पर व्याप्यत्वासिद्धि, स्वरूपासिद्धि इत्यादि और प्रपंच से सम्बन्ध रखने वाले हेतुओं से सत्यत्व आदि के साधन में विरूद्धत्व आदि हेत्वाभासता के प्रयोजक दोष होगे, यों तार्किकों को विवाद के लिए अवसर भी नहीं दिया गया, ऐसा कहते हैं।
असिद्ध, विरूद्ध आदि दूषण देने में दक्ष तार्किकों के दृष्टान्त-दोषों से, दूषणीय जगत् के स्वप्नतुल्य होने के कारण, वस्तु में कुछ भी दोष नहीं होता। साध्य की सिद्धि होने तक हेतु आदि जगत् के पदार्थों में जो बोध्य-बोधक व्यवहार होता है, वह व्यावहारिक सत्यतामात्र से भी उत्पन्न हो जाता है, यह भाव है।।57।।
हेतु आदि भूत जगत् की स्वप्नोमता का साधर्म्यप्रदर्शन द्वारा उपपादन करते हैं।
उत्पत्ति के पूर्वकाल में और विनाश के उत्तरकाल में अवस्तुभूत(अभावग्रस्त) यह जगत् वर्तमानकाल में भी विचार करने पर अवस्तुभूत ही है, अतः जैसे जाग्रत पदार्थ हैं वैसे ही स्वप्न पदार्थ भी हैं, दोनों में मिथ्यात्व का साम्य है, यह बात बालकों तक की समझ में आ सकती है।।58।।
यदि शंका हो कि प्रतिभासिक सत्तावाले स्वप्न से व्यावहारिक सत्तावाले की तुलना कैसे हो सकती है ? इस पर उन दोनों में परस्पर कार्यकारणता के प्रदर्शन से और लौकिक व्यवहार से तुलना है, ऐसा कहते हैं।
जाग्रतकाल में विजययात्रा करनी चाहिए अथवा नहीं, यों यात्रा के विषय में सन्देह होने पर देवताप्रार्थनापूर्वक सोये हुए पुरुष का स्वप्न में यात्रा करनी चाहिए ऐसा संकल्प होने पर चिरकाल तक पूजा, मन्त्रजप, स्तुति आदि से विजययात्रा के अनुकूल वर मिलने या शत्रुओं के प्रति मुनिशाप आदि देखने पर प्रातःकाल यात्रा करने से शत्रुओं पर विजय देखी जाती है और स्वप्न में औषधि की प्राप्ति से जाग्रतावस्था में रोगशान्ति देखी जाती है। यों स्वप्नसादृश्य होने के कारण सम्पूर्ण जगत् की व्यवस्था स्वप्नरूप ही है, अतएव जाग्रत में स्वप्नदृष्टान्त यथार्थ ही हैं। मोक्ष के उपायों की रचना करने वाले महामुनि वाल्मीकि जी ने अन्य भी पूर्व रामायण आदि जिन ग्रन्थों की रचना की है, उनमें भी दृष्टान्तों की बोध्य के साम्य के बोधन में यही केवल एक व्यवस्था प्रसिद्ध है अर्थात् जिस अंश में साम्य संभव हो उसी अंश के साम्यज्ञापन में व्यवस्था प्रसिद्ध है।।59-60।।
कोई कहे कि यदि ऐसा है, तो इस ग्रन्थ के श्रोता, जगत् की जो स्वप्न तुल्यता कही गई है, उसे सहसा क्यों नहीं जान लेते, इस विषय में विवाद क्यों करते हैं ? इस पर अध्यात्मशास्त्र के श्रवण से उत्पन्न संस्कार न होने से उन्हें जगत् में सत्यत्व-भ्रम है, अतः उन्हें शीघ्र जगत् की स्वप्नतुल्यता प्रतीत नहीं होती, ऐसा कहते हैं।
सम्पूर्ण शास्त्र सुनने पर जगत् की स्वप्नतुल्यता ज्ञात होती है, उसका बोध शीघ्र नहीं कराया जाता, क्योंकि वाणी क्रमशः अपना कार्य करती है। शास्त्रश्रवण में जो लोग आलस्य करते हैं, उन्हें जगत की स्वप्नतुल्यता प्रतीत नहीं होती, यह भावार्थ है। चूँकि यह जगत् स्वप्न, मनोरथ और ध्यान से कल्पित नगर के सदृश है इसलिए वे ही दृष्टान्त यहाँ पर दिये गये हैं, अन्य नहीं है।।61,62।।
यदि जगत् में स्वप्नादि दृष्टान्त देने पर सर्वांश विवक्षित हो, तो ब्रह्म में भी कटक, कुण्डल आदि के उपादान सुवर्ण का दृष्टान्त देने पर, सुवर्ण की सी परिणामिता क्यों न विवक्षित होगी ? इस पर कहते हैं।
बोध के लिए अपरिणामी ब्रह्म में जो परिणामी सुवर्ण आदि का दृष्टान्त दिया जाता है, वहाँ पर उपमाप्रयुक्त प्रयत्नों से सर्वांश में सादृश्य नहीं हो सकता। भाव यह कि 'तदेतत् ब्रह्मापूर्वमनपरबाह्यम्', 'एकमेवाद्वितीयम्' इत्यादि श्रुतियों से चित् शक्ति के परिणाम शून्य, प्रतिसंक्रमरहित, शुद्ध और अनन्त होने, 'अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽम्' इत्यादि स्मृतियों से असंग, उदासीन ब्रह्म में परिणाम हेतु का स्पर्श न होने और चित् का जड़ के आकार में होना संभव नहीं है इत्यादि युक्तियों से ब्रह्म का परिणाम न होने के कारण अपरिणामी ब्रह्म में जो परिणामी सुवर्णादि के तुल्य कारणता की उपमा दी जाती है वहाँ पर उपमाप्रयुक्त प्रयत्नों से भी सर्वांश में साधर्म्य का लाभ होना संभव नहीं है।।63।।
उक्त अर्थ को ही स्पष्ट करते हैं।
विवादरहित बुद्धिमान् पुरुष को बोध के लिए उपमान से उपमेय का एक अंश में साधर्म्य स्वीकार करना चाहिए।।64।।
लोक में भी 'मणि दीपक के सदृश दिखाई देती है' इत्यादि स्थल में अविवक्षित अंश का सादृश्यज्ञान नहीं देखा जाता, ऐसा कहते हैं।
पदार्थों के प्रदर्शन में प्रकाशमात्ररूप दीपक के सिवा स्थान (दिया), तेल, बत्ती आदि किसी का उपयोग नहीं होता। एकदेश में सादृश्य होने से उपमान उपमेय का ज्ञान कराता है, जैसे 'मणिर्दीप इव' (मणि दीपक के समान है) इस दृष्टान्त से उपमान दीप केवल प्रभा से (प्रकाश से) उपमेय मणि का बोध करा देता है।।65।।
इस शास्त्र के सम्पूर्ण दृष्टान्तों का उपयोग कहते हैं।
दृष्टान्त के अंशमात्र से बोध्य का (ज्ञेय ब्रह्म का) बोधोदय होने पर 'तत्त्वमसि' आदि महावाक्यों के अर्थ के निश्चय का उपादेयरूप से ग्रहण करना चाहिए। भाव यह कि स्वप्न आदि दृष्टान्तों से जगत् का मिथ्यात्व प्रतीत होने पर जीवात्मा के आकाश, सूर्य आदि दृष्टान्तों के और ब्रह्म के मिट्टी, सुवर्ण आदि दृष्टान्तों के भी पदार्थ परिशोधन द्वारा बोध्यरूप लक्ष्य अर्थ के लिए और उसका बोध होने पर कार्यसहित अविद्या के विनाश के लिए अवश्य उपादेय होने से सम्पूर्ण श्रुति, और शास्त्रों के महातात्पर्य का विषय 'अहं ब्रह्मास्मि' (मैं ब्रह्म हूँ) इस प्रकार का महावाक्य के अर्थ का निश्चय ग्राह्य है।।66,67।।
'मैं गोरा हूँ, स्थूल हूँ' इत्यादि प्रत्यक्ष से, औषधपान, आरोग्यलाभ आदि प्रवृत्ति के फलदर्शनरूप लिंग से, अन्य के व्यवहार के साम्यरूप उपमान से, सम्पूर्ण व्यावहारिक महाजनवाक्यों से, 'ब्राह्मणो यजेत्' (ब्राह्मण यज्ञ करे) इत्यादि श्रुति, स्मृति, धर्मशास्त्रों तथा अनेक तार्किकों की युक्तियों से देह और उससे भिन्न कर्तृत्व, भोक्तृत्व स्वभाववाला आत्मा जाना जाता है, ऐसी परिस्थिति में प्रत्यक्ष आदि अनेक प्रमाणों से विरूद्ध अर्थका केवल महावाक्य से कैसे ग्रहण करते हैं, ऐसी आशंका होने पर कहते हैं।
कुतार्किकता को प्राप्त होकर विद्वानों के अनुभव का अपलाप करने वाले अपवित्र देहात्मभावविषयक होने और अपवित्र कुत्ते, सूअर आदि की योनिप्रद होने के कारण अपवित्र विकल्पों से अर्थात् ब्रह्म प्रमाण सहित है या प्रमाण रहित ? यदि सप्रमाण है, तो अद्वैत की हानि होगी, यदि अप्रमाण है, तो प्रमेय की हानि होगी इत्यादि विकल्पों से परम पुरुषार्थ को प्राप्त कराने वाली प्रबुद्धता का विनाश नहीं करना चाहिए। देह आदि में जिस प्रकार आत्मत्व का असंभव है, वह प्रकार आगे कहा जायेगा।।68।।
सभी लोग प्रतिबन्धशून्य स्वेच्छाविहारजनित सुख के प्रार्थी हैं, अतः दयालु परमहितैषी चार्वाक आदि का तथा स्त्री, पुरुष, मित्र आदि का विविध विचित्र दृष्टभोगसुखजनक स्वाभाविक स्वप्रीति के विषयों में प्रवर्तक संसार में सारता आदि का प्रतिपादक वचन कैसे हेय है ? तपस्याजनित क्लेश, संयम, धनव्यय तथा परिश्रम कराने वाले, इष्ट पुत्र, धन, स्त्री आदि का वियोग कराने वाला तथा संन्यास भिक्षाटन आदि हजारों दृष्ट अनर्थों से परिपूर्ण निर्विषय आत्ममात्रपरिशेषरूप परम दारिद्रयभूत मोक्षफल को देने वाली जीवब्रह्म की एकता बोधक होने से शत्रु के वाक्य से तुल्य अचेतन श्रुतिप्रतिपादित महावाक्य कैसे उपादेय है, ऐसी शंका होने पर कहते हैं।
ठीक है, विचार न करने से ही वैसा प्रतीत होता है। आपाततः वैरिरूप से ज्ञात हुए वेद का वाक्य विचार से तो नित्य निरतिशय आनन्द आत्मरूप परमपुरुषार्थ का अनुभव कराने वाला है, अतः अनुभवनिष्ठ हम लोगों में, वह सम्पूर्ण प्रमाणों में सर्वोत्तम है, यों समादृत है। परमार्थभूत वैदिक पुरुषार्थ से विरहित वचन यदि परम प्रिय स्त्री का भी कहा हो, तो मरण, नरक, आदि अनेक अनर्थों का हेतु होने से प्रलापमात्र ही है, वह न तो वेद है, न आप्त पुरुष का वाक्य है और न प्रमाण ही है।।69।।
यदि ऐसी बात है, तो कपिल, कणाद, जैमिनि आदि ने वेदार्थ के ज्ञाता होने पर भी, पुरुषार्थ और उसके उपायभूत तत्त्व का निरूपण अन्यथा ही कैसे किया और आप अन्यथा ही उसका निरूपण कैसे कर रहे हैं, आपके कथन में कौन सी विलक्षणता है ? ऐसी शंका होने पर कहते हैं।
हे श्रीरामचन्द्रजी, जिस बुद्धि से तत्त्वसाक्षात्कारजनित जीवन्मुक्तिरूप शुभ भाग्य होता है, वैसी हमारी बुद्धि है, उस बुद्धि से पूर्वोक्त रीति से अपरोक्षानुभवयोग्य परमपुरुषार्थ जिससे प्राप्त होता है, वैसी सम्पूर्ण श्रुतियों की-आध्यात्मिक शास्त्रों की – एक वाक्यता (एक महावाक्य के अर्थ में पर्यवसान) फलित होती है। उससे भिन्न श्रुति के तात्पर्य का अविषय, केवल तर्क आदि से ही पुष्ट (विकसित) सांख्य, कणाद आदि का ज्ञान है। हमारा प्रमाण उससे सर्वथा विलक्षण महावाक्यार्थरूप अपरोक्षानुभव योग्य अर्थवाला है, उनका वैसा नहीं है। भाव यह कि उनकी मति कुतर्कों से कुण्ठित हो गई है, अतएव वे श्रुति के तात्पर्य का निश्चय करने योग्य बुद्धि से विरहित है।।70।।
अठारहवाँ सर्ग समाप्त
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बुधवार, 24 अक्तूबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 41 (मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण)


सत्रहवाँ सर्ग
प्रकरणों के क्रम से ग्रन्थसंख्या का वर्णन।
इस प्रकार साधनों का वर्णन कर उक्त साधनों से सम्पन्न पुरुष को प्रस्तुत ग्रन्थ के श्रवण आदि से पुरुषार्थ-प्राप्ति दर्शा रहे श्रीवसिष्ठजी ग्रन्थप्रवृत्ति के क्रम का, प्रकरण आदि के विभाग से, वर्णन करने के लिए उपक्रम करते हैं।
पूर्वोक्त प्रकरण का विवेक (विवेक आदि गुणों की सम्पत्ति) जिसे प्राप्त हो गया है, वह पुरुष महान है। जैसे राजा नीतिशास्त्र सुनने का अधिकारी है, वैसे ही वह भी ज्ञान की वाणी सुनने का अधिकारी है। जैसे मेघ के संसर्ग से विमुक्त आकाश शरत्काल के चन्द्रमा के योग्य होता है, वैसे ही मूर्खों के संग से मुक्त एवं निर्मल उदार पुरुष निर्दोष को (परम ब्रह्म को) प्रकाशित करने वाले विचार का योग्य भाजन है।।1,2।।
श्रीरामचन्द्रजी में उक्त गुणों के अभाव की शंका का निराकरण करते हैं।
हे श्रीरामचन्द्रजी, आप इन अखण्डित गुणगणों से परिपूर्ण हैं, अतएव आप आगे कहे जाने वाले मन के अज्ञान के विनाशक इस वाक्य को सुनिये। जिसका फलों के भार से खूब लदा हुआ पुण्यरूपी कल्पवृक्ष है, उसी पुण्यात्मा जीव का मुक्ति के लिए इसे सुनने के लिए उद्यम होता है। उक्त गुणों से सम्पन्न पुरुष ही मुक्ति के लिए अति पवित्र अन्य को बोध देने वाले उदार वचनों का पात्र होता है, अधम पुरुष नहीं। मोक्ष के साधन का प्रतिपादन करने वाली और सारभूत अर्थ से परिपूर्ण अतएव मोक्षदायिनी इस संहिता में बत्तीस हजार श्लोक हैं। जैसे गहरी नींद में सोये हुए पुरुष के सामने दिये के जलने पर यद्यपि सोये हुए पुरुष को प्रकाश की अभिलाषा नहीं रहती तथापि प्रकाश होता है, वैसे ही इस संहिता के श्रवण से, इच्छा न होने पर भी, मोक्ष का साधन ज्ञान अवश्य प्राप्त होता है। जैसे स्वयं दर्शन करके जानी गई और दूसरे के मुख से सुनी गई श्रीगंगाजी विविध योनियों में भ्रमण के हेतुभूत पाप और ताप की शान्ति द्वारा शीघ्र सुखप्रद होती है वैसे ही स्वयं परिशीलन करके जानी गई अथवा दूसरे के मुख से सुनी गई यह सहिंता अज्ञान के विनाश द्वारा शीघ्र सुखप्रद होती है। जैसे रस्सी के अवलोकन से रस्सी में हुई सर्पभ्रान्ति नष्ट हो जाती है, वैसे ही इस संहिता के अवलोकन से (परिशीलन से) संसारदुःख नष्ट हो जाता है। इस संहिता में युक्तिसंगत अर्थवाले वाक्यों से परिपूर्ण, श्रेष्ठ-श्रेष्ठ दृष्टान्तों से भरी हुई आख्यायिकाओं से युक्त तथा पृथक-पृथक रचे गये छः प्रकरण हैं। उनमें पहला प्रकरण वैराग्य नामक कहा गया है, जैसे निर्जल स्थान में भी जल के सेक से वृक्ष बढ़ता है, वैसे ही उक्त वैराग्यप्रकरण से वैराग्य बढ़ता है। डेढ़ हजार श्लोकों से युक्त वैराग्यप्रकरण में निरूपण किया गया है। जिसके विचार करने पर विषयों में दोष का ज्ञान होने से हृदय में ऐसी शुद्धता उत्पन्न होती है जैसे कि मणि को सान में चढ़ाने पर प्रकाश से उसमें स्वच्छता उत्पन्न होती है।।3-12।।
वैराग्य प्रकरण के अनन्तर मुमुक्षु-व्यवहार नामक प्रकरण की रचना की गई है, इसमें एक हजार श्लोक हैं। यह प्रकरण युक्तियों से बड़ा सुन्दर है। इसमें मुमुक्षु पुरुषों के स्वभाव का वर्णन है। इसके पश्चात दृष्टान्त और आख्यायिकाओं से भरे हुए ज्ञानप्रद उत्पत्तिप्रकरण की रचना की गई है। उस सात हजार श्लोक वाले प्रकरण में जगत की 'अहम्' 'इदम्' स्वरूपवाली दृष्टा और दृश्य के भेद की विचित्रतारूप सम्पत्ति वास्तव में उत्पन्न न हुई भी भ्रम से उत्पन्न हुई सी प्रतीत होती है, ऐसा वर्णन किया गया है। उक्त प्रकरण के सुनने पर श्रोता युष्मत् और अस्मत् से युक्त, जिनका अर्थ भिन्न प्रतीत होता है, उन त्वंपद और अहंपद की एकार्थता के प्रतिपादक अनन्त ब्रह्माण्डों के विस्तार से युक्त तथा प्रत्येक ब्रह्माण्ड में लोकालोक पर्वत और आकाश से युक्त इस चराचर सम्पूर्ण जगत् को अपने हृदय में मूर्त द्रव्यता से रहित, भेदशून्य, अतएव पर्वत आदि पदार्थों से रहित, पृथिवी आदि भूतों से रहित, संकल्पमय (कल्पनामय) नगर के तुल्य असत्, स्वप्न में जो मनोमय पदार्थ दिखाई देते हैं, उनके तुल्य, मनोराज्य के समान स्थित, अर्थशून्य होने के कारण गन्धर्व नगर के सदृश, दो चन्द्रमाओं की भ्रान्ति के सदृश, मृगतृष्णा में जल की भ्रान्ति के समान समझता है तथा नाव आदि के चलने से पर्वत, वृक्ष आदि के चलनभ्रम के सदृश, सत्य पुरुषार्थ से शून्य, चित्त के मोह से कल्पित भूत के सदृश, निर्बीज होने पर भी (जगत् की बीज माया के मिथ्या होने से और आत्मा के निर्विकार होने से बीजरहित होने पर भी) प्रकाशमान, कथा के अर्थ के प्रतिभास के समान (कथा सुनने में आसक्ति होने से संस्कार द्वारा प्रत्यक्ष के सदृश कथा के अर्थ की प्रतीति होना लोक में प्रसिद्ध है), आकाश में कल्पित मुक्तावली  के सदृश, सुवर्ण में कंकणत्व आदि की नाईं एवं जल में तरंगत्व की नाईं (ф) और आकाश में नीलिमा के सदृश असत् ही यह सदा उत्पन्न हुआ है, भीत (जिस पर चित्र बनाया जाता है) और विविध रंगों के बिना केवल प्रतीतिमात्र से (पूर्व अनुभव के स्मरणमात्र से) मनोहर एवं कर्ता से रहित चित्र जैसे स्वप्न में या आकाश में चिरकाल तक प्रतीत होता है तथा जैसे चित्रलिखित अग्नि अग्नि न होने पर भी अग्नि सी प्रतीत होती है, वैसे ही मिथ्याभूत यह प्रपंच जगत् शब्द के अनुरूप अर्थ को जाता है।
ф कंकणता और तरंगता का सुवर्ण, जल के स्वरूप के बिना निरूपण नहीं हो सकता, अतः वे मिथ्या हैं, वैसे ही यह भी मिथ्या है।
(गच्छति) यानि विचार में नहीं ठहरता इस अर्थ को धारण करता है। तरंगों में भ्रान्ति से कल्पित नील कमलों की माला के तुल्य, पहले देखे गये स्मृतिपथ में आरूढ़ हो रहे नृत्य के समान मन में उत्थित, जैसे चित्त होकर सोये हुए पुरुष या कवि को चक्रवाक के (चकवा पक्षी के) चीत्कार से पूर्ण आकाश को देखने पर यह तालाब है, ऐसी उत्प्रेक्षा होती है, वैसे ही यह जगत् भी उत्प्रेक्षित है। ग्रीष्म ऋतु में पत्तों से शून्य, सूखे हुए और सारहीन अतएव छाया, शोभा आदि से रहित और फल आदि समृद्धि से शून्य वन की नाईं, मरण के समय में व्यग्र हुए लोगों के मन की नाईं (मरण के समय व्यग्र हुए लोगों का मन भ्रम और मूर्च्छा से युक्त और अस्थिर रहता है, यह प्रसिद्ध है), पर्वतों की गुफाओं की तरह (गुफाएँ अन्धकार से भरी हुई, शून्य और भयंकर होती हैं, वैसे ही यह भी है), अन्धकारपूर्ण गुफा में प्रत्येक के नृत्य के सदृश, उन्मत्त पुरुषों की चेष्टाओं के सदृश, भीत में लिखे हुए चित्र एवं खम्भे में खोदी हुई मूर्ति के समान तथा पंक आदि से बनाई गई प्रतिमा के सदृश पृथकसत्ता से शून्य है, ऐसा समझता है। परमार्थ दृष्टि से यह प्रशान्त और अज्ञानरूपी कुहरे से शून्य ज्ञानरूपी शरत्काल के आकाश के सिवा अन्य कुछ नहीं है, अर्थात् अज्ञान के विकार के दूर होने पर यह नित्य निर्विशेष सच्चिदानंद परब्रह्म में पर्यवसित हो जाता है। तदुपरान्त चौथा स्थितिप्रकरण कहा गया है, तीन हजार श्लोकवाले उस प्रकरण में प्रपंच और उसके अधिष्ठान तत्त्व का वास्तविक प्रतिपादन और कथाएँ प्रचुर मात्रा में हैं। ब्रह्म ही द्रष्टा और दृश्य भाव को स्वीकार कर इस प्रकार जगत्-रूप से और अहंरूप से स्थिति को प्राप्त हुआ है, ऐसा स्थितिप्रकरण में बतलाया गया, दस दिशाओं के मण्डल की विशालता से दैदीप्यमान यह जगदभ्रम चिरकाल से इस प्रकार वृद्धि को प्राप्त हुआ, यह बात उसमें भली भाँति समझाई गई है। तदनन्तर पाँच हजार श्लोकों से विरचित परम पवित्र तथा विविध युक्तियों से अतिरमणीय पाँचवाँ उपशान्तिप्रकरण कहा गया है। उक्त प्रकरण में यह (जगत), मैं, तुम और वह यों उत्पन्न हुई भ्रान्ति इस प्रकार शांत होती है, यह बात अनेक श्लोकों से दर्शाई गई है। उपशान्तिप्रकरण के सुनने पर यह संसार जीवन्मुक्तिक्रम से क्षीण होता हुआ अंशतः अवशिष्ट रहता है। जैसे जीर्णशीर्ण चित्रलिखित सेना कुछ दिखाई देती है, वैसे ही जिसका भ्रमपूर्ण स्वरूप शान्त हो गया है ऐसी यह संसृति शतांश शेष रह जाती है।।13-34।।
उत्तरोत्तर भूमिका की प्राप्ति होने पर अधिक विनाश होने से दृश्य और अदृश्य संस्कारमात्र से इसकी अवशिष्टता दृष्टान्तों से कहते हैं।
यह संसार अन्य के संकल्प से विरचित होने के कारण अन्य के चित्त में स्थित अतएव मिथ्याभूत, जिसमें संकल्प करने वाले पुरुष के पास बैठे हुए अन्य पुरुष के स्वप्न के युद्ध और वादविवाद से कुछ भी धन आदि वस्तु प्राप्त नहीं होती ऐसी नगरश्री के समान है, मिथ्या होने के कारण संसार और उक्त नगरश्री दोनों तुल्य हैं, अतएव अन्य की क्रिया और शब्द के अविषय भी हैं, वह जैसे स्वप्न देखने वाले की दृष्टि से कुछ स्पष्ट दृश्य है, किन्तु संकल्प करने वाले की दृष्टि से तनिक भी दृश्य न होती हुई अपने आप शान्त हो जाती है वैसे ही यह संसार बना है, यह भाव है।।35।। उससे भी अधिक शान्ति का प्रकर्ष होने पर अदृश्य अवस्था से अन्त यह संसार शान्त हुए संकल्प से कल्पित मदोन्मत्त गजराज के समान निरंकुश मेघ की भीषण गर्जना के समान, जिस नगर का स्वप्न द्वारा निर्माण या संकल्प द्वारा निर्माण भूल गया है, उस नगर के समान भावी (बनाये जाने वाले) नगर की वाटिका में बच्चा पैदा करने वाली बाँझ की स्त्री के समान शून्यस्वरूप से युक्त, उक्त वन्ध्या स्त्री की जिह्वा से कही जा रही अपने पुत्र के युद्ध आदि की वीररस पूर्ण कथा के अर्थ के अनुभव के तुल्य, जिस घर में चित्र नहीं लिखा गया उस घर की चित्रों से भरी हुई भीत की नाईं, जिसकी अर्थशून्य कल्पना विस्मृत होती जा रही है, उस कल्पित नगरी के सदृश, भावी फूलों के वन के आकाररूप वसन्त से रसरंजित तथा सम्पूर्ण ऋतुओं से युक्त होने पर भी अनुत्पन्न वन के स्पन्दन (उल्लास विकास) के सदृश अस्पष्ट आकारवाला तथा तरंगमालाओं के अपने में समा जाने से अतिनिश्चल जल से युक्त नदी के समान प्रतीत होता है।।36-39।। तदुपरान्त निर्वाण नाम का छठा प्रकरण कहा गया है। शेष ग्रन्थ उसका परिमाण है अर्थात् बत्तीस हजार श्लोकों में से ऊपर गिने गये साढ़े सत्रह हजार श्लोकों से शेष साढ़े चौदह हजार ग्रन्थ उसका परिमाण है यानी इसकी श्लोक संख्या साढ़े चौदह हजार है। यह प्रकरण ज्ञानरूपी महान् (दुर्लभ) पदार्थ क (परम पुरुषार्थ को) देने वाला है। उसके ज्ञात होने पर मूलअविद्या का सर्वनाश होने से सम्पूर्ण कल्पनाएँ शान्त हो जाती है और मोक्षरूप कल्याण प्राप्त होता है। बहुत क्या कहें, उक्त प्रकरण के भली भाँति हृदयंगम होने पर जीव के सम्पूर्ण सांसारिक भ्रम विनष्ट हो जाते हैं और वह निर्विषय चैतन्य प्रकाशरूप अतएव सम्पूर्ण आधिव्याधियों से रहित तथा विगत स्पृह हो जाता है। उसकी सम्पूर्ण जगत्-यात्राएँ शान्त हो जाती हैं तथा कृतकृत्य होने से वह स्वस्थ हो जाता है जैसे हीरे का खम्भा अपने में किसी प्रकार के विकार के बिना ही अपने में प्रतिबिम्बित जनता और उसकी चेष्टाओं का आधार होता है वैसे ही आकाश तुल्य (सर्वव्यापक) उक्त जीव भी सबका आधार हो जाता है। मानों सम्पूर्ण जगत्-जलों के निगलने से अति तृप्ति को प्राप्त हो जाता है। उसके बाह्य इन्द्रियों के भोग और मानसिक भोग सब शान्त हो जाते हैं। वह आधिभौतिक आध्यात्मिक और आधिदैविक सम्पूर्ण विषयों में स्वीकार और परित्याग दृष्टि से रहित हो जाता है अतएव देहयुक्त होने पर भी देह रहित सा संसार में रहने पर भी असंसारी हो जाता है, निविड़ पत्थर के हृदय की भाँति छिद्र रहित और वस्तुएँ भी जिसकी उपमा हों इस प्रकार का वह चैतन्यरूप सूर्य अपने अज्ञान से कल्पित लोकों को आत्माकार वृत्ति से खूब प्रदीप्त हुए अपने प्रकाश से दीप्त करता हुआ भी (प्रकाशरूप होता हुआ भी) दृश्य पदार्थों के न होने से ही उनके प्रकाश के अविषय में निविड़ हुए अन्धकाररूप पत्थर के सदृश परम अन्धकार को प्राप्त हुआ-सा हो जाता है, उसकी जन्ममरणरूप संसार की दुष्ट लीलाएँ शान्त हो जाती हैं और आशारूपी हैजा नष्ट हो जाता है। उसका अहंकाररूपी पिशाच नष्ट हो जाता है तथा वह शरीर रहित होता हुआ भी देहवान् रहता है। भगवती श्रुति भी कहती है -'अशरीरं शरीरेष्वनवस्थेष्व-वस्थितम्। महान्त विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति' (शरीर रहित होता हुआ भी नश्वर शरीरों में स्थित महान् विभु आत्मा को जानकर धीर पुरुष शोक नहीं करता) जैसे महान् मेरू पर्वत के किसी एक प्रदेश में फूल में भँवरी बैठी रहती है वैसे ही उसके सिर के रोम के अग्रभाग में अर्थात् रोमकोटि के तुल्य परिच्छिन्न अविद्या के भी अग्रभाग में (एकदेश में) यह जगत्सम्पत्ति स्थित है।।40-48।।
विस्तारशून्य प्रदेश में अतिविस्तारयुक्त जगत की प्रतीति कैसे होती है। ऐसी शंका होने पर छोटे से दर्पण के अन्दर मेघ, ग्रह और नक्षत्रों से युक्त आकाश का समावेश सबको दिखाई देता है, अतः अज्ञान के लिए यह कोई कठिन काम नहीं है कि विस्तारशून्य प्रदेश में अतिविस्तारयुक्त जगत दिखलाई दे, इस अभिप्राय से कहते हैं।
चैतन्यघन परमात्मा अपने अपने भीतर कल्पित आकाश में, परमाणु-परमाणु में हजारों जगतों को स्वयं बनाकर धारण करता है और स्वयं उन्हें देखता है। श्रीरामचन्द्रजी, महामति जीवन्मुक्त पुरुष का हृदय परमात्मा ही है, उसकी विस्तीर्णता का माप करोड़ों हरि, हर आदि भी नहीं कर सकते। उनकी ऐसा करने की सामर्थ्य नहीं है, सो बात नहीं है, किन्तु सत्ता से, अनन्तता से और आनन्दस्वरूपता से जिससे बढ़कर उत्कृष्ट कोई वस्तु ही नहीं है, उस परमात्मा की अपरिच्छिन्नता पारमार्थिक ही है, आकाश आदि की तरह द्रष्टा पुरुष की शक्ति से कल्पित नहीं है, यह भाव है।।49,50।।
सत्रहवाँ सर्ग समाप्त
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मंगलवार, 23 अक्तूबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 40 (मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण)


सोलहवाँ सर्ग
साधुसंगतिरूप चतुर्थ द्वारपाल का वर्णन तथा चारों में से
प्रत्येक के सेवन में भी पुरुषार्थहेतुता का वर्णन।
साधुसमागमरूप चतुर्थ द्वारपाल का वर्णन कर रहे और चारों में से प्रत्येक के विषय में किया गया प्रबल पुरुषप्रयत्न पुरुषार्थपद है, ऐसा दर्शाते हुए श्रीवसिष्ठजी बोलेः
हे महामते, इस लोक में श्रेष्ठ साधुसमागम मनुष्यों के संसारसागर से उत्तरण में विशेषरूप से सब जगहों में (सम्पूर्ण अवस्थाओं में) उपकार करता है। साधुसंगतिरूपी वृक्ष के उत्पन्न हुए विवेकरूपी सफेद फूल की जो महात्मा रक्षा करते हैं, वे मोक्षफलरूप सम्पत्ति के भाजन होते हैं। साधु पुरुषों का समागम होने पर आत्मीय जन और धन से शून्य दुःखपूर्ण स्थान धन और जन से परिपूर्ण हो जाता है, मृत्यु भी उत्सव में परिणत हो जाती है और आपत्तियाँ सम्पत्तियाँ की तरह मालूम होती है। इस संसार में आपत्तिरूपी कमलिनी के लिए हेमन्त ऋतुरूप और मोहरूपी कुहरे के लिए वायुरूप केवल श्रेष्ठ साधुसमागम ही सर्वोत्कृष्ट है। हे रामचन्द्रजी, आप साधुसमागम को बुद्धि को अत्यन्त बढ़ाने वाला, अज्ञानरूपी वृक्ष का उच्छेद करने वाला और मानसिक व्याथाओं को दूर करने वाला जानिये। जैसे उद्यान को सींचने से फल-फूलों के गुच्छे प्राप्त होते हैं, वैसे ही साधुसंगम से मनोहर और निर्मल विवेकरूपी परम दीप उत्पन्न होता है। साधुसंगतिरूपी विभूतियाँ नित्य बढ़ाने वाले अविनाशी और बाध रहित उत्तम सुख को देती हैं। कितनी ही बड़ी आपत्ति को प्राप्त क्यों न हो और कितनी ही बड़ी पराधीनता को प्राप्त क्यों न हो फिर भी मनुष्यों को क्षणभर के लिए भी साधु संगति का त्याग नहीं करना चाहिए। साधुसंगति सन्मार्ग की दीपक है और हृदयान्धकार को दूर करने वाली ज्ञानरूपी सूर्य की प्रभा है। जिसने शीतल और स्वच्छ साधुसंगतिरूपी गंगा में स्नान किया है, उसको दानों से, तीर्थों से, तपस्याओं से और यज्ञों से क्या प्रयोजन है ? जिनके राग नष्ट हो गये हैं, सन्देह कट चुके हैं एवं चिद्जड़ग्रन्थि नष्ट हो चुकी हैं, ऐसे साधु पुरुष यदि विद्यमान हैं, तो तप और तीर्थ करने से क्या प्रयोजन है ? जैसे दरिद्र पुरुष मणियों को बड़े प्रेम से देखते हैं, वैसे ही जिनका चित्त विश्रान्तिसुख से परिपूर्ण है, ऐसे धन्य साधु पुरुषों के बड़े प्रयत्न से दर्शन करने चाहिए। जैसे अप्सराओं के समूह में विष्णु के समागम और अपनी सर्वोत्कृष्ट सुन्दरता से युक्त लक्ष्मी शोभित होती है, वैसे ही जिन बुद्धिमानों की मति सत्समागम रूप सौन्दर्य से युक्त है, वह भी सदा विराजमान रहती है। जिस धन्य पुरुष ने साधुसंगति का परित्याग नहीं किया, ब्रह्म की प्राप्ति के लिए प्रयत्न कर रहे लोगों में ब्रह्म की प्रथम प्राप्ति से वह अपनी शिरोभूषणता (सर्वोत्कृष्टता) प्रसिद्ध कर लेता है। जिनकी अन्तःकरण और उसके धर्मों में तादात्म्यसंसर्गाध्यासरूप चिदजड़-ग्रन्थि छिन्न-भिन्न हो गई है, उन ब्रह्मज्ञानी एवं सर्वसम्मत साधुओं की दान, सम्मान, सेवा आदि सब प्रयत्नों से सेवा करनी चाहिए, क्योंकि वे लोग भवसागर में डूबे हुए लोगों के तारण के उपाय हैं। जिन लोगों ने नरकरूपी अग्नि को बुझाने के लिये जल बरसाने वाले मेघरूप सन्त-महात्माओं को तिरस्कार की दृष्टि से देखा, वे लोग नरकरूपी अग्नि की सूखी लकड़ी बन गये, अर्थात् सूखी लकड़ियों की नाईं नरकाग्नि ने उन्हें जला डाला। सज्जनसंगतिरूपी औषधियों से दरिद्रता, मृत्यु, दुःख आदि विषयक सन्निपात समूल नष्ट हो जाता है।।1-17।।
सम्पूर्ण द्वारपालों की एक ही साथ प्रशंसा करने की इच्छा से पूर्वोक्त का अनुवाद करते हैं। सन्तोष, सत्संगति, विचार और शान्ति ये ही चार संसारसागर में मग्न हुए लोगों के तरने के उपाय हैं। सन्तोष सम्पूर्ण लाभों से सर्वश्रेष्ठ लाभ है, सत्संगति परम गति है, विचार परम ज्ञान है और शम परम सुख है अर्थात् सन्तोष के तुल्य कोई लाभ नहीं है, सत्संग के तुल्य कोई गति नहीं है, आत्मविचार के समान ज्ञान नहीं है और शान्ति के तुल्य और सुख नहीं है। ये चार संसार के समूल विनाश के लिए निर्मल उपाय हैं, इनका जिन्होंने खूब अभ्यास किया, वे मोहरूपी जल से लबालब भरे हुए संसारसागर से तर गये।।18-20।।
यदि सबका अभ्यास करने की सामर्थ्य न हो, तो एक के उत्तम अभ्यास से भी चारों का अभ्यास हो जाता है, ऐसा कहते हैं।
हे मतिमानों में श्रेष्ठ, उनमें से निर्मल उदयवाले एक का अभ्यास होने पर भी शेष चारों का अभ्यास हो जाता है। एक-एक भी इन सबकी उत्पत्तिभूमि है, जनक है, अतः सबकी सिद्धि के लिए एक का प्रयत्नपूर्वक आश्रय लेना चाहिए। जैसे तरंगों से शून्य (प्रशान्त) सागर में बड़े-बड़े व्यापारिक जहाज बिना किसी धक्का-मुक्की के बड़ी सावधानी से चलते हैं, वैसे ही शान्ति से स्वच्छ पुरुष में सत्संगति, सन्तोष और विचार बड़ी सावधानी से प्रवृत्त होते हैं। जैसे कल्पवृक्ष के आश्रय में स्थित पुरुष को लौकिक सम्पत्तियाँ प्राप्त होती हैं, वैसे ही विचार, सन्तोष, शान्ति और साधुसंगति से सुशोभित पुरुष को ज्ञानसम्पत्तियाँ प्राप्त होती है, वैसे ही विचार, सन्तोष, शान्ति और साधुसंगति से सुशोभित पुरुष को ज्ञानसम्पत्तियाँ प्राप्त होती हैं। जैसे परिपूर्ण पूर्णिमा में सौन्दर्य आदि गुण प्राप्त होते हैं। जो राजा सदा विचार के लिए मन्त्रियों को निमन्त्रित करता है या मन्त्रित सन्धि, विग्रह आदि पदार्थों को गुप्त रखता है, उस राजा को जैसे विजयलक्ष्मी प्राप्त होती है, वैसे ही सत्संग, सन्तोष, शान्ति और विचार से युक्त सदबुद्धि पुरुष को ज्ञानसम्पत्ति प्राप्त होती है। इसलिए हे रघुकुलतिलक, पुरुषप्रयत्न से मन को नित्य अपने वश में कर इनमें से एक गुण का प्रयत्नपूर्वक उपार्जन करना चाहिए। प्रयत्नपूर्वक अपने चित्तरूपी हाथी को अपने वश में कर जबतक हृदय में एक गुण की प्राप्ति नहीं की जाती तब तक उत्तम गति दुर्लभ है। हे श्रीरामजी, जब तक आपका चित्त गुणों के उपार्जन के लिए आग्रहवान् न हो, तब तक प्रयत्नपूर्वक दाँतों को दाँतों से पीसना चाहिए अर्थात् गुणार्जन के लिए अत्यन्त उद्योग करना चाहिए।।21-29।।
सात्त्विक देव आदि जन्म के लिए प्रयत्न करना चाहिए, देव आदि जन्म प्राप्त होने पर बिना परिश्रम के ज्ञान होगा, इस शंका पर कहते हैं।
हे महाबाहो, आप चाहे देवता होइये या यक्ष होइये, पुरुष होइये अथवा वृक्ष होइये पर जब तक आपका चित्त गुणों के उपार्जन के लिए आग्रहवान न होगा तब तक उत्तम गति का कोई उपाय नहीं है। फलदायक एक ही गुण के दृढ़ होने पर दोषाधीन चित्त के सम्पूर्ण दोष शीघ्र ही क्षीण हो जाते हैं।।30-31।।
परस्पर विरोधियों में एक की वृद्धि होने पर उसके सजातीय कुल की वृद्धि होने से अन्य का क्षीण होना प्रसिद्ध ही है, ऐसा कहते हैं।
गुणों की अभिवृद्धि होने पर दोषों पर विजय पाने वाले गुणों की वृद्धि होती है और दोषों के बढ़ने पर गुणविनाशक दोष बढ़ते हैं। इस मनोमोहरूपी वन में, सब प्राणियों में वेगवती वासनारूपी नदी सदा बहती है, पुण्य और पाप उसके बड़े-बड़े तट हैं। अपने प्रयत्न से दूसरे तट का निरोध कर उक्त वासनारूपी नदी जिस तट की ओर फेंकी जाती है, उसी तट से बहती है, अतएव हे रामजी, आपको जैसा अभीष्ट हो, वैसा कीजिए। हे शुभमते, आप अपनी वासनारूपी नदी मनरूपी वन में क्रमशः पुण्य तट की ओर प्रवृत्त कीजिए, ऐसा करने से आप तनिक भी पापप्रवाह से नहीं बहाये जायेंगे।।32-35।।
सोलहवाँ सर्ग समाप्त
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