तीसवाँ सर्ग
अपने चित्त का उद्वेग दर्शा रहे
श्रीरामचन्द्रजी द्वारा उसके निरास एवं शांति के लिए उपदेश की प्रार्थना।
हेतुओं द्वारा अपने चित्त की उद्विग्नता का विस्तारपूर्वक
वर्णन कर रहे श्रीरामचन्द्रजी चित्तविश्रान्ति के हेतुभूत उपदेश की प्रार्थना करते
हैं।
उक्त रीति से सैंकड़ों अनर्थों से परिपूर्ण संसाररूपी अँधे
कुँए के छिद्र में सम्पूर्ण प्राणियों को मग्न देखकर मेरा मन चिन्तारूपी कीचड़ में
फँस गया है। मेरा मन घूम सा रहा है और मुझे भय भी हो रहा है, अतएव मेरे अंग
प्रत्यंग पुराने वृक्ष के पत्तों की नाईं काँप रहे हैं। जैसे निर्जन अरण्य में
रहने वाली दुर्बल भर्तृका मुग्धा नारी पद पद में भयभीत और शंकित रहती है, वैसे ही
उत्कुष्ट सन्तोषदायक धैर्यरूपी माँ की गोद न मिलने के कारण व्याकुल हुई मेरी
बालबुद्धि भी इस संसार में पद पद में भयभीत और सशंक हो रही है। जैसे मृगगण
विषमस्थान में लटक रहे तुच्छ तृणों के लोभ से वंचित होकर गड्ढे में गिर पड़ते हैं,
वैसे ही असार विषयों से वंचित ये अन्तःकरण वृत्तियाँ विक्षेपरूप दुःखों की
प्राप्ति के लिए दुःखरूप गड्ढे में गिरती है। अविवेकी पुरुषों की नेत्र आदि
इन्द्रियाँ चिरपरिचित होने के कारण संसार की ओर ही पूर्णरूप से आकृष्ट है (संसार
में ही उनकी दृढ़ वासना है), परमार्थ वस्तु के प्रति उनका तनिक भी आकर्षण नहीं है।
अतएव वे बेचारी नेत्र आदि इन्द्रियाँ आत्मा के उद्धार में समर्थ नहीं हैं और
अन्धकूप में गिरे हुए जीवों की नाईं दुःखी हैं। जैसे पति के अधीन कान्ता न तो
उपराम को प्राप्त होती है और न स्वेच्छा से कहीं मन चाहे प्रदेश को ही जाती है,
किन्तु पति के घर में ही रहती है, वैसे ही जीवरूपी पति की कान्ता चिन्ता भी न तो
उपराम को प्राप्त होती है और न मन चाहे विषयों को ही प्राप्त होती है, किन्तु
स्वपति जीव के प्रियस्थान हृदय में ही निवास करती है। जैसे मार्गशीर्ष मास के अन्त
में लताएँ तुषार गिरने के कारण जीर्ण पत्तों को गिरा देती हैं, कुछ हरे पत्तों को
धारण भी करती है, वैसे ही विवेक से विषयों को तुच्छ समझकर उनका त्याग कर रही और रस
के (ђ) (राग के) शेष रहने के कारण कुछ विषयों
को धारण कर रही मेरी धृति संकट को प्राप्त हो गई है।।1-7।।
ђ 'रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते' (परमात्मा का साक्षात्कार कर इसका रस
भी निवृत्त हो जाता है) इस भगवद् वचन के अनुसार परमात्मादर्शन के बिना रस की
निवृत्ति नहीं हो सकती।
क्लेशदायिनी अपनी उसी अन्तरालावस्था का वर्णन करते हैं।
मेरी उक्त चित्त की अस्थिरता सांसारिक और पारमार्थिक सम्पूर्ण
सुखों को गँवाकर स्थित है, क्योंकि संसार स्थिति आत्मा के विवेकमात्र से अर्थ बोध
होने के कारण मुझे आधा छोड़कर आधा पकड़े हुए है अर्थात् न तो मैं पूर्ण ज्ञानी ही
हूँ और न पूरा अज्ञानी ही, इसलिए अन्तराल में स्थित मुझे न ऐहिक सुख ही प्राप्त है
और न पारमार्थिक ही। जैसे कटे हुए वृक्ष के ठूँठ द्वारा (स्थानु द्वारा) अन्धकार
में सत्य कोटि और असत्य कोटिरूप यह ठूँठ है या चोर है, इस प्रकार स्थिरत्व और
अस्थिरत्व प्रकार के संशय से लोगों की बुद्धि वंचित (भ्रमित) होती है वैसे ही
आत्मतत्त्व के निश्चय से रहित (आत्मतत्त्वनिश्चय में सन्देहयुक्त) मेरी बुद्धि भी
यह तत्त्व है या यह तत्त्व है, इस प्रकार के सन्देह से वंचित हो रही है। जैसे
देवता विविध भोगसामग्रियों से परिपूर्ण, भुवनों में विहार करने वाले एवं शीघ्रगामी
अपने विमान का परित्यागनहीं करते वैसे ही स्वभावतः चंचल नानाभोगसामग्रियों से
परिपूर्ण भुवनों में परिभ्रमण से अधिक चपलता को प्राप्त मेरा मन भी चंचलता को नहीं
छोड़ता है। मैं उसे जबरदस्ती रोकना चाहता हूँ, पर तत्त्वज्ञान न होने के कारण मैं
ऐसा नहीं कर सकता हूँ। इसलिए हे मुनिनायक, परमार्थ सत्य, जन्म मरण आदि दुःखों से
शून्य, देहादि उपाधि से विरहित, भ्रम से रहित वह विश्रान्ति-स्थान कौन है, जिसे
प्राप्त कर शोक नहीं होता। हमारे ही समान दृष्ट और अदृष्टरूप फलदायक सम्पूर्ण
कर्मों के अनुष्ठाता एवं लौकिक व्यवहार में तत्पर जनक आदि महापुरुष कैसे उत्तम पद
को प्राप्त हुए ? हे परसत्कारकारिन्, इस संसार में वह
कौन सा उपाय है, जिससे कि संसाररूपी पंक अर्थात् पुण्य-पापरूपी पंक का या
शोकमोहरूपी पंक का अनेक बार शरीर से सम्पर्क होने पर भी मनुष्य उससे लिप्त नहीं
होता ? महामहिमाशाली, वीतराग एवं जीवन्मुक्त
आप लोग किस दृष्टि का अवलम्बन कर इस संसार में विचरते हैं ? प्राणियों को भयभीत करने के लिए लुभा
रहे नश्वर (ф) विषय सर्पों के सदृश हैं, भला वे
कल्याणकारी कैसे हो सकते हैं ?
ф
मूलस्थित 'भंगुराकारविभवाः' का विषयपक्ष में – विनाशशील आधार और
विभववाले और सर्पपक्ष में कुटिक आकार और विषशक्ति से युक्त, यह अर्थ है।
मोहरूपी हाथी द्वारा विलोडित, काम आदिरूपी कीचड़ और सेवाल से
व्याप्त प्रज्ञारूपी तालाब किस प्रकार तालाब किस प्रकार अत्यन्त निर्मलता को
प्राप्त हो ? जैसे कमल के पत्ते से जल का सम्पर्क
नहीं होता, वैसे ही संसारप्रवाह में व्यवहार करने पर भी पुरुष बन्धन को प्राप्त न
हो, इसका क्या उपाय है ? इस सम्पूर्ण दृश्य प्रपंच को
तत्त्वदृष्टि से आत्मा के समान और बाह्यदृष्टि से तृण के समान देख रहे एवं कामादि
वृत्तियों का स्पर्श न कर रहे पुरुष कैसे श्रेष्ठता को प्राप्त होते हैं ? जिसने अज्ञानरूपी महासागर पार कर लिया
है, ऐसे किस महापुरुष के चरित्र का स्मरणपूर्वक आचरण कर मनुष्य दुःखी नहीं होता ? अविनाशी होने के कारण प्राप्त करने के
योग्य मोक्ष क्या है और कर्म उपासना आदि का उचित फल क्या है ? भला बतलाइय तो सही, इस विषम संसार में
कैसे व्यवहार करना चाहिए ? प्रभो, मुझे तत्त्व का उपदेश दीजिए,
जिससे मैं अव्यवस्थित ब्रह्मा की कृति जगत की पूर्वा पर वस्तु जानूँ अर्थात् जगत
के आदि और अन्त में अवशिष्ट रहने वाला पारमार्थिक तत्त्व जानूँ। ब्रह्मन् जैसे
मेरे हृदयरूपी आकाश के चन्द्ररूप साभार अन्तःकरण का मल (अज्ञान) हट जाय वैसा
प्रयत्न आप निशंक होकर कीजिए। इस संसार में कौन वस्तु उपादेय (प्राप्त करने योग्य)
है, कौन वस्तु अनुपादेय है और कौन वस्तु न उपादेय है और न अनुपादेय है। यह चंचल
चित्त कैसे पर्वत के समान स्थिरता (शान्ति) को प्राप्त हो ? सैंकड़ों क्लेशों की सृष्टि करने वाली
यह निन्दित संसाररूपी महामारी किस पवित्रतम मन्त्र से अनायास शान्ति को प्राप्त हो
? जैसे पूर्ण चन्द्रमा अत्यन्त आनन्द
देने वाली शीतलता को प्राप्त करता है, वैसे ही मैं भी आनन्दरूपी वृक्ष की मंजरीरूप
देशपरिच्छेद और कालपरिच्छेद से शून्य शीतलता को अपने हृदय में कैसे प्राप्त करूँ ? भगवन्, आप तत्त्वज्ञ और सज्जनशिरोमणि
हैं, इसलिए अपने में पूर्णता को प्राप्त कर पूर्ण हुआ मैं जैसे इस लोक में फिर शोक
को प्राप्त न होऊँ वैसा आप मुझे उपदेश दीजिए। महात्मन् जैसे वन में कुत्ते स्वल्प
बल से युक्त जीवों की (क्षुद्र प्राणियों की) देह को अति पीड़ित करते हैं, वैसे ही
विविध संशय सर्वोत्कृष्ट आनन्दमय ब्रह्मपद में आत्यान्तिक स्थिरता से रहित पुरुष
को सदा अति पीड़ित करते हैं।।8-27।।
तीसवाँ सर्ग समाप्त
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