मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

शनिवार, 27 अगस्त 2011

प्रभु पूजा के पुष्प ... (परम पूज्य संत श्री आसाराम जी "बापू")


हर भक्त ईश्वर की, गुरु की पूजा करना चाहता है। इस उद्देश्य से वह धूप, दीप और बाह्य पुष्पों से पूजा की थाली को सजाता है। बाह्य पुष्पों एवं धूप-दीप से पूजा करना तो अच्छा है परंतु इतने से इष्ट या गुरु प्रसन्न नहीं होते। ईश्वर या गुरु की कृपा को शीघ्र पाना हो तो भक्त को अपनी दिलरूपी पूजा की थाली में भक्ति, श्रद्धा, प्रेम, समता, सत्य, संयम, सदाचार, क्षमा, सरलता आदि दैवी सदगुणरूपी पुष्प भी सजाने चाहिए। पवित्र और स्वस्थ मन-मंदिर में मनमोहन की स्थापना करनी हो तो इन पुष्पों की ही आवश्यकता पड़ेगी।

इन फूलों का त्याग करके जो केवल बाह्य फूलों से ही परमात्मा को प्रसन्न करना चाहता है, उस भक्त के हृदय में सच्चिदानन्द भगवान अपने आनंद, माधुर्य, ऐश्वर्य के साथ विराजमान नहीं होते और जहाँ सच्चिदानन्दस्वरूप की प्रतिष्ठा ही न हो वहाँ उनकी पूजा का प्रश्न ही कहाँ पैदा होता है !

इस हकीकत को हृदय में दृढ़ कर लो कि जगत क्षणभंगुर है और हम सब मौत के मुख में बैठे हैं। काल-देवता कब, किस घड़ी किसका ग्रास कर लेंगे इसका पता तक न चलेगा। इसलिए प्रत्येक क्षण सावधान रहो। ईश्वर ने साधन-शक्ति दी है तो दूसरों के सुख का सेतु बनो, किसी के दुःख का कारण तो कभी न बनना। सबका भला चाहो और साथ-साथ सबका भला करो भी। ईश्वर से प्रेम करो और अपने विशुद्ध व्यवहार से आपके स्वामी भगवान, गुरुदेव के प्रति सबको प्रेमभाव जगे ऐसा आचरण करो।

कभी भी हृदय में निराशा को, हताशा को स्थान मत देना और इतना तो पक्का समझना कि दुनिया के सबसे बड़े महापुरुष को ईश्वर ने जितनी शक्ति दी है, उतनी शक्ति तुम्हें भी दी है, फर्क केवल इतना ही है कि उन्होंने जिस निश्चय, विश्वास और साधना से आत्मशक्ति का विकास किया है, वह तुमने नहीं किया है। नहीं तो यदि तुम्हारा दृढ़ निश्चय हो, अविचल विश्वास और नियमित साधना हो तो तुम भी इसी जन्म में ऊँचे-से-ऊँचे ध्येय को सिद्ध कर सकते हो।

अपनी इस अशक्ति को नजर के सामने रखकर तुम उत्साहहीन मत बनाना। तुम शक्तिहीन हो या शक्तिमान किंतु सर्वशक्तिमान प्रभु तो सदा अपने बालकों की सहायता करने के लिए प्रतिक्षण मौजूद हैं। केवल उस शक्ति को पाने के लिए तुम्हारी अपनी तत्परतापूर्वक तैयारी होनी चाहिए।

अतः अपनी पूजा की थाली में कर्तव्य-परायणता, परहित की भावना, शील, संयम, निर्भयता आदि दिव्य सुख प्रदान करने वाले सदगुण अवश्य सजाना। इससे हे मानव ! तेरा कल्याण अवश्य हो जायेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 25, अंक 213

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

क्यों देर करते हो ?... (परम पूज्य संत श्री आसाराम जी "बापू")


हमारे देव केवल एक मंदिर में नहीं रह सकते, हालाँकि वे केवल एक मंदिर में ही थे ऐसी बात नहीं थी। हमारी बुद्धि छोटी थी तो हमने उनको मंदिर में मान रखा था। अब तो वे अनंत ब्रह्माण्डों में हैं, ऐसी हमारी मति हो रही है। हमारे देव अभी बड़े नहीं हुए, वे तो बड़े थे परंतु अब हमको उनकी कृपा से देखने की दृष्टि बढ़िया मिली है।

अगर तुम अपने देव को सर्वत्र नहीं देख सकते हो तो कम से कम एक ऐसे पुरुष में उनको देखो, जिनको तुम निर्दोष प्यार कर सकते हो। एक ऐसे चित्त में देखो जिससे तुम्हारी दृष्टि को ठंडक मिलती हो। फिर धीरे-धीरे दूसरे व्यक्ति में भी उन्हें अपने देव को देखो, फिर तीसरे चौथे में देखो। ऐसा करते करते बुद्धि को विशाल करो तो तुम्हारी मर्जी और उन्हीं देव के प्यारों को मिल के, उनके वचनों को पाकर एकदम दृष्टि को खोल दो तो तुम्हारी मर्जी ! पर आना तो यहीं पड़ेगा, अखंड अनुभव में.... वहीं विश्राँति है और वही अपने जीवन का लक्ष्य होना चाहिए।

तुम अपना लक्ष्य उन्नत बना दो तो फिर हजार हजार गल्तियाँ हो जायें, डरो नहीं। फिर से कोशिश करोक, एक बार फिर से कदम रखो। जिसका लक्ष्य पवित्र नहीं, उन्नत नहीं, सर्वव्यापक सर्वेश्वर के साक्षात्कार का नहीं है, वह लक्ष्यहीन, आदमी हजारों गलतियाँ करेगा और लक्ष्यवाला आदमी पचासों गलतियाँ कर लेगा किंतु पचासों गलतियाँ करता है तब भी लक्ष्य जिसका उन्नत है, वह जीत जाता है। जिसका लक्ष्य उन्नत नहीं है वह सैंकड़ों गलतियों में रूकेगा नहीं, हजारों में नहीं रूकेगा, लाखों में नहीं रूकेगा, करोड़ों गलतियाँ करोड़ों जन्मों तक करता ही रहेगा क्योंकि उसके जीवन में सर्वेश्वर, सर्व में व्यापक एक परमात्मा है – ऐसा लक्ष्य नहीं है, उसके जीवन में मोक्ष का लक्ष्य नहीं है, उसके जीवन में मोक्ष का लक्ष्य नहीं है, उसके जीवन में सुख-दुःख से पार होने का लक्ष्य नहीं है। वह सदा सुखी-दुःखी होता रहेगा और जो सुखी-दुःखी होता है वह गलतियाँ करता ही है। इसीलिए हजारों-हजारों जन्म बीत गये, हजारों हजारों हजारों युग बीत गये, काम पूरा नहीं हुआ क्योंकि लक्ष्य नहीं बना। इसलिए हे मेरे प्यारे साधक ! तू अपने जीवन का लक्ष्य बना ले। सर्वत्र सर्वेश्वर को देख, आप सहित परमेश्वर को देख।

सो प्रभ दूर नहीं, प्रभ तू है।

घर ही महि अंमृतु भरपूरू है,

मनमुखा सादु न पाईआ। (सादु- स्वाद)

जिन खोजा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठ।

मैं भोरी डूबन डरी, रही किनारे बैठ।।

खोज अपने आप में – जो विचार उठता है वह कहाँ से उठा ? जो इच्छाएँ और चिंताएँ उठती हैं, कहाँ से उठीं, क्यों उठीं ? खोज ! खोज !! और तू पहुँच जायेगा अपने परम लक्ष्य में। फिसल जाय तो डर मत, फिर से चल। रूक जाय कहीं, कोई थाम ले तुझे तो सदा के लिए चिपक मत, फिर चल। चल, चल और चल... अवश्य पहुँचेगा। और चलना पैरों से नहीं है, केवल विचारों और अपने सत्कृत्यों से चलना है। चलना क्या है ? तन और मन की भागदौड़ मिटाकर अपने अचल आत्मा में विश्रान्ति पाना ही सचमुच में चलना है। सर्वेश्वर कहीं दूर नहीं है कि चलो, यात्रा करो और चलते चलते पहुँचो। क्या कलकत्ते (कोलकाता) में बैठा है, दिल्ली या वैकुण्ठ में बैठा है ? जिस सत्ता से तुम चल रहे हो न, वह सत्ता भी उसी की है और जहाँ से उसको खोजने की शुरूआत करते हो, वहीं वह बैठा है। फिर भी खोजो। उसी के भाव से खोजते-खोजते घूमघाम के वहीं विश्रान्ति मिलेगी जहाँ से खोजना शुरू हुआ है, किंतु बिना खोजे विश्रान्ति नहीं मिलती। बिना खोजे अगर बैठ गये तो आलस्य, प्रमाद और मौत मिलती है। खोजते-खोजते आप नाक की सिधाई में सीधे चलते जाओ, चलते चलते पूरी पृथ्वी की यात्रा करके वहीं पहुँचोगे जहाँ से चले थे।

ॐ..... ॐ.... ॐ.....ॐ..... मधुर-मधुर आनंद-ही-आनंद ! शांति ही शांति ! तू ही तू, तू ही तू, अथवा तो मैं ही मैं ! वह गैर, वह गैर... नहीं, सब तू ही तू अथवा सबमें मैं ही मैं। तुम अनन्त से जुड़े हो। वास्तव में तुम अनंत हो। अनंत श्वासराशि से तुम्हारा श्वास जुड़ा है। अनंत आकाश से तुम्हारा हृदयाकाश और शरीर का आकाश जुड़ा है। तुम्हारा शरीर अनन्त जलराशि से जुड़ा है, अनंत तेजराशि से जुड़ा है, अनन्त पृथ्वी तत्त्व से जुड़ा है। ये पंचभूत भी अनंत महाभूतों से जुड़े हैं। इन पंचभूतों को चलाने वाला तुम्हारा चिदाकाश तो अपने ब्रह्मानंदस्वरूप से, तुम्हारा आत्मा तो अपने परमात्मा से सदैव जुड़ा है। जुड़ा है, यह कहना भी छोटी बात है। हकीकत में तुम्हारा आत्मा ही परमात्मा है। जैसे तरंग पानी स्वरूप है, घटाकाश महाकाशस्वरूप है, ऐसे ही जीव ब्रह्मस्वरूप है, खामखाह परेशान हो रहा है।

तुम अपने परमेश्वर-स्वभाव का सुमिरन करो और जग जाओ... युद्ध के मैदान में श्रीकृष्ण के प्रसाद से अर्जुन ने सुमिरन कर लिया और अर्जुन कहता हैः नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा..... तो यहाँ साबरमती के तट पर तुम भी सुन लो, नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा... कर लो। क्यों कंजूसी करते हो ! क्यों देर करना ! यह तो जेटयुग है मेरे लाला ! मेरी लालियाँ ! ॐ....ॐ.....ॐ....

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2010, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 214

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ