मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

शनिवार, 5 नवंबर 2011

भोगों से वैराग्य


"इन मल-मूत्र से भरे स्थानों के लिए मैं काम से अंधा हो रहा हूँ ! इन गंदे अंगों के पीछे मैं अपनी जिंदगी तबाह किये जा रहा हूँ !"
आंध्र प्रदेश में एक धनाढय सेठ का छोटा पुत्र वेमना माता-पिता की मृत्यु के बाद अपने भैया और भाभी की छत्रछाया में पला-बढ़ा। उसकी भाभी लक्ष्मी उसे माँ से भी ज्यादा स्नेह करती थी। वह जितने रूपये माँगता उतने उसे भाभी से मिल जाया करते। बड़ा भाई तो व्यापार में व्यस्त रहने लगा और छोटा भाई वेमना खुशामदखोरों के साथ घूमने लगा। उनके साथ भटकते-भटकते एक दिन वह वेश्या के द्वार तक पहुँच गया। वेश्या ने भी देखा कि ग्राहक मालदार है। उसने वेमना को अपने मोहपाश में फँसा लिया और कुकर्म के रास्ते चल पड़ा।
अभी वेमना की उम्र केवल 16-17 साल की ही थी। वेश्या जो-जो माँगें उसके आगे रखती, भाभी से पैसे लेकर वह उन्हें पूरी कर देता। एक बार उस वेश्या ने हीरे-मोतियों से जड़ा हार, चूड़ियाँ और अँगूठी माँगी।
वेमना उस वेश्या के मोहपाश में पूरी तरह बँध चुका था। उसने रात को भाभी के गहने उतार लिये। भाभी ने देख के अनदेखा कर दिया। कुछ दिनों बाद वेमना ने भाभी का मँगलसूत्र उतारने की कोशिश की, तब भाभी ने पूछाः "सच बता, तू क्या करता है ? पहले के गहने कहाँ गये ?" सच्चाई जानकर भाभी रो पड़ी। सोचने लगी कि 'इतनी सी उम्र में ही यह अपना तेज बल सब नष्ट कर रहा है।'
किंतु भाभी कोई साधारण महिला नहीं थी, सत्संगी थी। उसने देवर को गलत रास्ते जाने से रोकने के लिए डाँट-फटकार की जगह विचार का सहारा लिया और देवर के जीवन में भी सदविचार आ जाय – ऐसा प्रयत्न किया। उसने एक शर्त रखकर वेमना को जेवर दियेः
"बेटा ! वह तो वेश्या ठहरी। तू जैसा कहेगा, वैसा ही करेगी। उसे कहना कि 'तू नग्न होकर सिर नीचे करक और अपने घुटनों के बीच से हाथ निकालकर पीछे से ले, तब मैं तुझे गहने दूँगा।' जब वह इस तरह तेरे से गहने लेने लगे तब तू काली माता का स्मरण करके उनसे प्रार्थना करना कि हे माँ ! मुझे विचार दो, भक्ति दो। मुझे कामविकार से बचाओ।"
दूसरे दिन वेमना की शर्त के अनुसार जब वेश्या गहने लेने लगी, तब वेमना ने माँ काली से सदबुद्धि के लिए प्रार्थना की। भाभी की शुभ भावना और माँ काली की कृपा से वेमना का विवेक जाग उठा कि 'इन मल-मूत्र से भरे स्थानों के लिए मैं काम से अंधा हो रहा हूँ। इन गंदे अंगों  पीछे मैं अपनी जिंदगी तबाह किये जा रहा हूँ....' यह विचार आते ही वेमना तुरन्त गहने लेकर भाभी के पास आया और भाभी के चरणों में गिर पड़ा। भाभी ने वेमना का और भी मार्गदर्शन किया।
वेमना मध्यरात्रि में ही माँ काली के मंदिर में चला गया और सच्चे हृदय से प्रार्थना की। उसकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर माँ काली ने उसे योग की दीक्षा दे दी और माँ के बताये निर्देश के अनुसार वह लग गया योग-साधना में। उसकी सुषुप्त शक्तियाँ जागृत होने लगीं और कुछ सिद्धियाँ भी आ गयीं। अब वेमना वेमना न रहा, योगिराज वेमना होकर प्रसिद्ध हो गया। उनके सत्संग से 'वेमना योगदर्शनम्' और 'वेमना तत्त्वज्ञानम्' – ये दो पुस्तकें संकलित हुई। आज भी आंध्र प्रदेश के भक्त लोग इन पुस्तकों को पढ़कर योग और ज्ञान के रास्ते पर चलने की प्रेरणा पाते हैं।
कहाँ तो वेश्या के मोह में फँसने वाला वेमना और कहाँ करूणामयी भाभी ने सही रास्ते पर लाने का प्रयास किया, माँ काली से दीक्षा मिली, चला योग व ज्ञान के रास्ते पर और भगवदीय शक्तियाँ पा लीं, भगवत्साक्षात्कार कर लिया एवं कइयों को भगवान के रास्ते पर लगाया। कई व्यसनी-दुराचारियों के जीवन को तार दिया। जिससे वे संत वेमना होकर आज भी पूजे जा रहे हैं।

आश्रम से प्रकाशित पुस्तक "अपने रक्षक आप" से लिया गया प्रसंग 
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2 टिप्‍पणियां:

  1. Hariom bahut bahut sadhuvad, Guru ki seva sadhu jaane.........

    6th nov, ko Devuthi ekadasi hai not probodhini ekadosi

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  2. Hariom

    omsis ji thanks for reading Guruvani....

    Devuthi ekadashi ko Prabodhini ekadashi bhi kehte hai

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