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१८ फरवरी -विजया एकादशी (भागवत)
१८
फरवरी - व्यतिपात योग (१८ फरवरी - रात को ११:४७ से १९ फरवरी २२:०६ तक)
2० फरवरी - महाशिवरात्रि (निशीथकाल रात्रि १२.२७ - १.१७ तक)
2१ फरवरी - अमावस्या और द्वापर युगादी तिथि
२९
फरवरी -बुधवारी अष्टमी (शाम ५-४२ से सूर्योदय तक)
४ मार्च - रविपुष्य अमृत योग - रात्री १२-०१ से ५ मार्च सूर्योदय तक


मंगलवार, 15 नवम्बर 2011

परिप्रश्नेन.... (1)



प्र. – पतन किसका नहीं होता ?
उ. – वशीभूत अंतःकरण वाला पुरूष राग-द्वेष से रहित और अपनी वशीभूत इन्द्रियों के द्वारा विषयों का आचरण करता हुआ भी प्रसन्नता को प्राप्त होता है। वह उनमें लेपायमान नहीं होता। उसका पतन नहीं होता। जिसका चित्त और इन्द्रियाँ वश में नहीं है वह चुप होकर बैठे तो भी संसार का चिन्तन  करेगा। ज्ञानी संसार में बैठे हुए भी अपने स्वरूप में डटे रहते हैं।
भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. श्रीराधाकृष्णन् अच्छे चिन्तक माने जाते हैं। उन्होंने एक कहानी लिखी हैः
एक भठियारा था। उसको हर रोज स्वप्न आता कि मैं चक्रवर्ती सम्राट हूँ। वह अपना काम निपटाकर जल्दी-जल्दी सो जाता उस मधुर स्वप्नलोक में जाने के लिए। बाहर के जगत में वह भठियारा था। खाने-पीने को भी पर्याप्त नहीं था। गुजारा चलाने के लिए बड़ा परिश्रम करना पड़ता था। लेकिन धीरे-धीरे वह स्वप्न में सुखी होने लगा तो बाहर के जगत में रूचि कम होने लगी।
प्रतिदिन स्वप्न में देखता कि मैं चक्रवर्ती सम्राट बन गया हूँ। छोटे-छोटे राजा लोग मेरी आज्ञा में चलते हैं। छनन-छनन करते हीरे, जवाहरात के गहनों से सजी ललनाएँ चँवर डुला रही हैं।
एक दिन स्वप्न में वह बाथरूम जाने उठा तो पास में जलती हुई भट्ठी में पैर पड़ गया। जलन के मारे चिल्ला उठा। सो तो रहा था भट्ठियों के बीच लेकिन स्वप्न देख रहा था कि सम्राट है, इसलिए वह सुखी था।
किसी भी परिस्थिति में आदमी का मन जैसा होता है, सुख-दुःख उसे वैसे ही प्रतीत होते हैं। ज्ञानी का मन परब्रह्म में होता है तो वे संसार में रहते हुए, सब व्यवहार करते हुए भी परम सुखी हैं, ब्रह्मज्ञान में मस्त हैं।
आदमी का शरीर कहाँ है इसका अधिक मूल्य नहीं है। उसका चित्त कहाँ है इसका अधिक मूल्य है। मंदिर में बैठा है पुजारी। सोच रहा है कि कब बारह बजें और लड्डू लेकर पुजारिन के पास जाऊँ। तो वह मंदिर में नहीं है, पुजारिन के पास है। चित्त परमात्मा में है और आप संसार में रहते हैं तो आप संसार में नहीं हैं, परमात्मा में हैं।
प्रभातकाल में उठो तब आँख बन्द करके ऐसा चिन्तन करो कि मैं गंगाकिनारे पर गया। पवित्र गंगामैया में गोता लगाया। किसी संत के चरणों में सिर झुकाया। उन्होंने मुझे मीठी निगाहों से निहारा।
पाँच मिनट ऐसा मधुर चिन्तन करो, आपका हृदय शुद्ध होने लगेगा, भाव पवित्र होने लगेगा।
सुबह उठकर देखे हुए सिनेमा के दृश्य याद आयेः 'आहाहा... वह मेरे पास आयी, मुझसे मिली.....' आदि आदि। तो देखो, सत्यानाश हो जायगा। कल्पना तो मन से होगी लेकिन तन पर भी प्रभाव पड़ जायगा। कल्पना में कितनी शक्ति है !
संत-महात्मा-सदगुरू-परमात्मा के साथ विचरते हैं, समाधि लगाते हैं, उनका स्मरण-चिन्तन करते हैं तो हृदय आनन्दित होता है।

स्रोतः- ......पूज्य गुरुदेव के सत्संग से 

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