मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 35 (मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण)


ग्यारहवाँ सर्ग
ज्ञानप्राप्ति का विस्तार, श्रीरामचन्द्रजी के वैराग्य की स्तुति और वक्ता तथा प्रश्नकर्ता के लक्षण आदि का प्रधानतः वर्णन।

श्रीवसिष्ठजी ने कहाः हे पुण्यचरित, ज्ञान का पृथिवी पर अवतरण, अपने जन्म, ज्ञानावरोध, पुनः ज्ञानप्राप्ति आदि और श्री ब्रह्माजी का कार्य यह सब मैं आपसे कह चुका हूँ। अब आपका चित्त महान् पुण्य के उदय से उस ज्ञान के सुनने के लिए अति उत्कण्ठित हो रहा होगा।।1,2।।
उक्त पुण्यपरिपाक की किन लक्षणों से पहचान करनी चाहिए एवं उस लक्ष्यभूत पदार्थ के उपदेश की प्रणालियाँ कैसी हैं? इस बात को प्राचीन कथा के विस्तार के श्रवण द्वारा जानने के इच्छुक श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः
ब्रह्मन्, सृष्टि करने के अनन्तर भगवान् ब्रह्मजी की बुद्धि इस लोक में ज्ञान के अवतारण के लिए किस प्रकार हुई ? कृपया उस प्रकार को विस्तार से कहिए।।3।। श्रीवसिष्ठजी ने कहाः राजकुमार, जैसे सागर में तरंग बार बार उत्पन्न होती है वैसे ही प्रचुर क्रियाशक्ति से सम्पन्न ब्रह्मा अपने पूर्वजन्म की विद्या, कर्म और वासनाओं के प्रकर्ष से परम ब्रह्म में उत्पन्न हुए। उन्होंने विविध प्राणियों की सृष्टि करने के अनन्तर सृष्ट लोगों को इस प्रकार जन्म, मरण, नरकक आदि से अपने अज्ञान के कारण दुःखी देखकर वर्तमान सृष्टि के दृष्टान्त से अतीत, वर्तमान और भविष्यकाल की सृष्टि की सम्पूर्ण अवस्थाओं का अनुमान कर लिया। विशेषरूप से स्वर्ग और मोक्ष के साधनों के अनुष्ठान के योग्य सत्ययुग आदि समय के क्षीण होने पर लोगों में सिक्का जमाने वाले अज्ञान का प्राबल्य देखकर भगवान ब्रह्माजी को बड़ी दया आई। तदुपरान्त भगवान ब्रह्माजी ने मेरी सृष्टि कर और बार बार उपदेश द्वारा मुझे ज्ञानसम्पन्न बनाकर लोगों के अज्ञान की शान्ति के लिए मुझे पृथिवी में भेजा। भगवान ब्रह्मा ने इस लोक में जैसे मुझे भेजा वैसे ही सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, नारद आदि अनेक अन्यान्य महर्षियों को अधिकार के अनुसार पुण्य कर्मकाण्ड के उपदेश और ज्ञानकाण्ड के उपदेश द्वारा मन और अज्ञान रूपी महाव्याधि के वशीभूत लोगों का उद्धार करने के लिए भेजा। प्राचीन काल में सत्ययुग के बीतने पर कालक्रम से पृथ्वी पर वैदिक या राग, लोभ आदि से अनुपहत कर्मकाण्ड का ह्रास होने पर कर्मकाण्ड के संचालन और मर्यादा के रक्षण के लिए पृथक पृथक देशों का विभाग कर राजाओं की कल्पना की गई। पृथवी में राजाओं की कल्पना होने पर राजाओं और प्रजाओं के धर्म का नियन्त्रण करने में समर्थ स्मृतिशास्त्र और यज्ञ की विधि के प्रतिपादक श्रोतसूत्र और गृह्यसूत्र तथा श्रौतगृह्यप्रयोगों का धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि के लिए निर्माण किया गया। इस कालचक्र के परिवर्तित होने पर फिर कर्मकाण्डक्रम नष्टभ्रष्ट हो गया, प्रतिदिन लोग भोजनमात्रपरायण और विषयों के अर्जन में तत्पर हो गये। ऐसी अवस्था में राजाओं के देश या भोग्यपदार्थों के लिए परस्पर युद्ध होने लगे, इस प्रकार पृथ्वी में अनेक प्राणियोंको दण्ड भोगना पड़ा(◄)।
◄ अथवा मूलस्थित 'द्वन्द्व' शब्द का अर्थ शीतोष्ण आदि द्वन्द्व करना चाहिए। उनके परिहार में उपायभूत विषयों के सम्पादन के लिए प्राणी राजाओं के दण्डनीय हुए, कारण कि विषयों की सिद्धि धनमूलक है और धन के लिए राजाओं ने प्रजा पर कर लगाया।
पहले युद्ध के बिना ही पृथ्वी के पालन में समर्थ होते हुए भी तदनन्तर राजा युद्ध के बिना पृथ्वी पर शासन करने के लिए समर्थ नहीं हुए, इसका फल यह हुआकि प्रजाओं के साथ राजा दीनता को प्राप्त हो गये। भाव यह कि देह में आत्मत्त्वबुद्धि से युद्ध आदि में देह का नाश होने पर आत्मा का नाश हो जायेगा, इस भय से वे दीनता को प्राप्त हो गये। तदनन्तर उन लोगों की दीनता को दूर करने के लिए और आत्मज्ञान के प्रचार के लिए हम लोगों ने ज्ञानवर्धक बड़े-बड़े दर्शनों का उपदेश किया। इस अध्यात्म विद्या का पहले राजाओं में उपदेश हुआ तदनन्तर इसका और लोगों में प्रसार हुआ, इस कारण श्रीवेदव्यास आदि ने इसको राजविद्या कहा है। हे राघव, राजा लोग राजविद्या, राजगुह्य आदि नामों से प्रसिद्ध उत्तम अध्यात्मज्ञान को जानकर अत्यन्त आनन्द को प्राप्त हुए, तदनन्तर उनमें किंचित भी दुःख नहीं रहा। कालक्रम से निर्मल कीर्ति वाले अनेक राजाओं के कीर्तिशेष होने पर इन महाराज श्रीदशरथजी से आप श्रीरामचन्द्र इस पृथ्वी में उत्पन्न हुए हैं।।4-19।।
परन्तप, आपके अतिनिर्मल मन में 'श्मशानमापदं दैन्यम्' इत्यादि से आगे कहे जाने वाले दृष्ट निमित्तों के बिना ही पवित्रतम ज्ञानोत्पादन समर्थ वह उत्तम वैराग्य उत्पन्न हुआ है।।20।।
हे श्रीरामचन्द्र, सम्पूर्ण विवेकी पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ रूप से विख्यात साधु का सब विषयों में दृष्टनिमित्तपूर्वक ही राजस(╧) वैराग्य होता है। श्रीरामजी, सत्पुरुषों को भी आश्चर्य में डालने वाला अपने विवेक से उत्पन्न आपका यह सात्त्विक (╪) वैराग्य किसी निमित्त के बिना ही उत्पन्न हुआ है, ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया है।
╧ रजोगुण का कार्य दुष्ट दुःख के अनुभव से होता है अतएव राजस कहलाता है।
╪ केवल विवेकमात्र से उत्पन्न हुआ है अतएव सात्विक है।
बीभत्स (घृणाजनक) विषयों को देखकर किसको वैराग्य नहीं होता, किन्तु सत्पुरुषों का का उत्तम वैराग्य विवेक से ही होता है। वे महापुरुष हैं, वे महाविद्वान हैं और उन्हीं का चित्त गंगाजल के समान निर्मल है, जिन्हें निमित्त के बिना ही वैराग्य होता है।।21-24।। हे परन्तप, केवल अपने विवेक से उत्पन्न तत्त्वपदार्थ के प्रति अभिमुखता से अन्य विषयों से विरक्त बुद्धि से युक्त पुरुष वैसा शोभित होता है जैसे कि वरमाला से युवा पुरुष शोभित होता है। विवेक से  इस संसार रचना की दुःखरूपता का विचार कर जो लोग वैराग्य को प्राप्त होते हैं, वे श्री श्रेष्ठ पुरुष हैं। अपने विलक्षण विवेक से ही इस इन्द्रजालतुल्य प्रपंच का पुनः पुनः विचार कर हठपूर्वक इस मायिक बाह्य जगत के साथ देह, इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि और अविद्या का परित्याग करना चाहिए। श्मशानभूमि, आपत्तियों और दीनता को देखकर किसे वैराग्य न होगा ? वही वैराग्य परम श्रेय का साधन है, जो स्वतः उत्पन्न होता है। जैसे खूब जोता गया अतएव कोमल हुआ खेत बीज बोने के योग्य होता है वैसे ही स्वाभाविक वैराग्यरूपी अत्यन्त महत्त्व को प्राप्त हुआ आप आत्मज्ञान के उपदेश के योग्य पात्र हैं।।25-29।।
'तपः प्रभावाद् देवप्रसादाच्च' (तप के प्रताप से और देवता की प्रसन्नता से 'यस्य देवे परा भक्तिः' (जिसकी देवता पर परम भक्ति होती है) और ईश्वरानुग्रहादेव पुसामद्वैतवासना। प्रसादादेव रूद्रस्य भवानीसहितस्य तु। अध्यात्मविषयं ज्ञानं जायते बहुजन्मभिः।' (ईश्वर की अनुकम्पा से लोगों की अद्वैतवासना होती है। श्रीभगवती पार्वती जी सहित भगवान् महादेवजी के प्रसाद से ही बहुत जन्मों के पश्चात् अध्यात्म ज्ञान होता है) इत्यादि श्रुति और स्मृतियों का अनुसरण करते हुए कहते हैं।
परम प्रभु भगवान श्रीमहादेव जी की प्रसन्नता से आप जैसे सज्जनों की शुभ बुद्धि विवेक की ओर अग्रसर होता है।।30।।
'तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन' (उस परमात्मतत्त्व को ब्राह्मण लोग वेदाध्ययन, यज्ञ, दांन और अविनाशी तप से जानने की इच्छा करते हैं) इत्यादि श्रुति के अनुसार कहते हैं। गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चूड़ाकारण, उपनयन, चार वेदव्रत, समावर्तन, विवाह, पाँच महायज्ञों का अनुष्ठान, अष्टका, पार्वण, श्राद्ध, उपाकरण, उत्सर्जन, चैत्र और आश्विन में होने वाली नवसस्येष्टि – ये सात पाकयज्ञ, अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्श – पौर्णमास, चातुर्मास्य, आग्रयणेष्टि, निरूढ पशुबन्ध, सौत्रामणी – ये सात हविर्यज्ञ, अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडसी, वाजपेय, अतिरात्र, आत्मोर्याम – ये सात सोमयज्ञ, ये चालीस संस्कार और सब भूतों में दया, क्षान्ति, अनसूया, शौच, आयासाभाव, मांगल्य, कार्पण्यका अभाव, अस्पृहा – ये आठ गुण जिसके हों वह सायुज्य को प्राप्त होता है – यों गौतमस्मृति में दर्शाये गये।
कर्मकाण्ड के क्रम से, विपुल तपस्या से, इन्द्रिय, प्राण और मन के नियमन से, दान से, तीर्थयात्राओं से और चिरकाल तक विचार करने से पापराशि के क्षीण होने के अनन्तर परमात्मचिन्तन करने पर काकतालीयन्याय से (कौए के आने और ताल के गिरने के समान) संयोगतः सम्पन्न साधनों के संमिलन से प्राणी की बुद्धि विवेक की ओर अग्रसर होती है।।31,32।।
ऐसी परिस्थिति में ब्रह्मजिज्ञासा के प्रयोजक विचार का उदय ही दुर्लभ है, यह भाव है।
जब तक परमपदका साक्षात्कार नहीं करते तब तक चक्र के समान लोगों को घुमाने वाले राग-द्वेष आदि से आवृत्त लोग कर्मकाण्डपरायण होकर इस संसार में पुनः पुनः जन्म-मरणरूप परम्परा को प्राप्त होते हैं।।33।।
श्रुति भी है 'मन्तरे वर्तमान स्वयं धीराः' (अविद्या में स्थित अपने को पण्डित मानने वाले मूढ जन अन्धों से ले जाये जा रहे अन्धों की नाईं पतन को प्राप्त होते हैं)।
इस संसार को असार और दुःखरूप जानकर और संसारमयी बुद्धि का परित्याग कर विद्वान लोग बन्धन-स्तम्भ से निर्मुक्त हाथियों की नाईं परब्रह्म को प्राप्त होते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, वह संसार सृष्टि-विषम और असीम है। देहाध्यास से युक्त महान जीव भी कृमि, कीट आदि के सदृश ही है। ज्ञान के बिना परम पद को प्राप्त नहीं हो सकते। रघुवंशशिरोमणे, विवेकी लोग ज्ञानरूपी नौका से ही सुदुस्तर संसार सागर को एक पलकभर में पार कर गये हैं। संसाररूपी सागर से जीव को पार कराने वाले वक्ष्यमाण (आगे कहे जाने वाले) ज्ञानरूप उपाय को विचाराभ्यासपरायण तथा विवेक, वैराग्य आदि से युक्त बुद्धि से एकाग्र होकर सुनिये। इस अनिन्दित ज्ञानयुक्ति के बिना अनन्त विक्षेपों से पूर्ण ये सांसारिक दुःखभीतियाँ चिरकाल तक हृदय को सन्तप्त करती हैं। हे राघव, साधुजनों में शीत, वात, धूप आदि दुःखद्वन्द्व ज्ञानयुक्ति को छोड़कर किस उपाय से सह्य होते हैं ? अर्थात् ज्ञान से अतिरिक्त किसी उपाय से सह्य नहीं होते  ? जैसे अग्नि की ज्वालाएँ तृण को जला डालती है, वैसे ही मूढ़ पुरुष को पदपद में (क्षण-क्षण में) दुःख-चिन्ताएँ प्राप्त होती हैं और जला डालती है। जैसे वर्षाकाल में सींचे गये वन को अग्नि जला नहीं सकती, वैसे ही जिसने ज्ञातव्य वस्तु को जान लिया है, ऐसे विवेकशील प्राज्ञ पुरुष को मानसिक व्यथाएँ सन्ताप नहीं पहुँचा सकती। शारीरिक और मानसिक पीड़ारूपी बवंडर से परिपूर्ण संसाररूपी मरूस्थल में प्रसिद्ध वायु के तेज चलने पर भी तत्त्वज्ञानी पुरुष कल्पवृक्ष की नाईं उखाड़ा नहीं जा सकता यानी पीड़ित नहीं होता। इसलिए तत्त्वपदार्थ के ज्ञान के लिए बुद्धिमान पुरुष को श्रुति आदि प्रमाण देने में अतिकुशल आत्मतत्त्वज्ञ बुद्धिमान पुरुष से ही अनुगमन, साष्टांग प्रणाम, सेवा आदिरूप प्रयत्न से विनयपूर्वक प्रश्न करना चाहिए। जिज्ञासु द्वारा पूछे गये, श्रुति आदि प्रमाण देने में निपुण और विशुद्ध चित्त वाले वक्ता के वाक्य वैसे ग्रहण करने चाहिए जैसे कि रँगने के लिए घोले गये पक्के रंग में डुबाया गया वस्त्र रंग को पकड़ लेता है फिर उसे कभी नहीं छोड़ता।।34-44।।
हे वक्ताओं में श्रेष्ठ श्रीरामजी, जो पुरुष तत्त्ववस्तु को नहीं जानता अतएव जिसका वचन ग्राह्य नहीं है, ऐसे पुरुष से जो प्रश्न करता है, उससे बढ़कर मूर्ख दूसरा कोई नहीं है। पूछे गये तत्त्वज्ञ प्रामाणिक वक्ता के उपदेश का जो प्रयत्न से आचरण नहीं करता, उससे बढ़कर नराधम दूसरा नहीं है। व्यवहार से वक्ता की अज्ञता और तत्त्वज्ञाता का पहले निर्णय कर जो पुरुष प्रश्न करता है, वह प्रश्नकर्ता महामति है। जो मूर्ख (परीक्षा द्वारा) प्रकृष्ट वक्ता का निर्णय किये बिना प्रश्न करता है, वह अधम प्रश्नकर्ता है और वह आत्मज्ञानरूप महान अर्थ का पात्र नहीं हो सकता अर्थात् उसे कभी तत्त्वज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। प्राज्ञ पुरुष को चाहिए कि उक्त और अनुक्त का विवेचन कर निश्चय करने में जिसकी बुद्धि समर्थ हो और जो निन्दनीय न हो ऐसे पुरुष के लिए पृष्ट वस्तु का उपदेश दे पशु के जाड्य आदि धर्मों से युक्त अधम को कभी तत्त्व का उपदेश न दे।।45-49।। प्रश्नकर्ता की श्रुति आदि प्रमाणों से निर्णीत पदार्थ के ग्रहण की योग्यता का विचार किये बिना जो तत्त्व का उपदेश देता है, उसको प्राज्ञ पुरुष मूढ़तर कहते हैं।।50।। हे रघुनन्दन, आप अत्यन्त श्रेष्ठ प्रश्नकर्ता है और मैं उपदेश देना जानता हूँ, इसलिए हमारा यह समागम सदृश है। हे शब्दार्थ के ज्ञाता श्रीरामजी, जिस पदार्थ का मैं उपदेश देता हूँ उसको आप 'यह तत्त्व वस्तु है' ऐसा निश्चय कर प्रयत्नपूर्वक अपने हृदय में ज्यों-का-त्यों पूर्णरूप से धारण कीजिए। हे श्रीरामचन्द्रजी, आप कुल, दया, दाक्षिण्य आदि गुणों और सदाचार आदि से महान हैं, विरक्त हैं एवं तत्त्वज्ञ हैं, मुझसे जो कहा जायेगा वह जैसे वस्त्र में घोला हुआ रंग बैठ जाता है वैसे आपके हृदय के अन्तस्तर में बैठ जायेगा। आपकी उक्त पदार्थ के ग्रहण में निपुण मेघा है और परम तत्त्व का विचार करने वाली प्रतिभा भी है। मेघा और प्रतिभा से सम्पन्न आपकी प्रज्ञा जैसे सूर्य की किरणें जल के अन्दर प्रवेश कर जाती हैं, वैसे ही प्रतिपाद्य अर्थ (तत्त्वज्ञान) में प्रवेश करती है। मैं जो कुछ कहूँ, उसे आप ग्रहण कीजिए और प्रयत्नपूर्वक उसे अपने हृदय में स्थान दीजिए। यदि ऐसा आप न कर सकें, तो आपको मुझसे पूछना ही नहीं चाहिए, क्योंकि ऐसा पूछना निरर्थक है।।51-55।।
हे श्रीरामचन्द्रजी, संसाररूपी वन का बन्दर मन बड़ा ही चपल है, उसको संस्कार द्वारा अपने वश में कर परमार्थतत्त्व का श्रवण करना चाहिए और फिर उसको प्रयत्न से हृदय में धारण करना चाहिए। विवेकशून्य, शास्त्र के अभ्यास से उत्पन्न ज्ञान से रहित एवं असाधु पुरुषों में प्रीति रखने वाले पुरुष से अति दूर होकर चिरकालतक महात्माओं की सेवा करनी चाहिए। सदा सन्त-महात्माओं की संगति से विवेक उत्पन्न होता है। भोग और मोक्ष विवेकरूपी वृक्ष के ही फल कहे गये हैं। मोक्षद्वार के चार द्वारपाल कहे गये हैं – शम, विचार, सन्तोष और चौथा साधुसंगम। पहले तो इन चारों का ही प्रयत्नपूर्वक सेवन करना चाहिए। यदि चारों को सेवन की शक्ति न हो तो तीन का सेवन करना चाहिए। तीन का सेवन न हो सकने पर दो का सेवन करना चाहिए। इनका भली भाँति सेवन होने पर ये मोक्षरूपी राजगृह में मुमुक्षु का प्रवेश होने के लिए द्वार खोलते हैं। यदि दो के सेवन की भी शक्ति न हो, तो सम्पूर्ण प्रयत्न से प्राणों की बाजी लगाकर भी इनमें से एक का अवश्य आश्रय लेना चाहिए। यदि एक वश में हो जाता है, तो शेष ती भी वश में हो जाते हैं। जैसे अन्य तेजस्वियों में सूर्य सर्वश्रेष्ठ है वैसे ही विवेकवान पुरुष सब लोगों में सिर के आभूषण के समान आदरणीय है। वह शास्त्र के श्रवण, मनन और निदिध्यासन का और ज्ञान का योग्य पात्र है। जैसे अधिक शीत पड़ने से जल घनीभूत होकर बर्फ बन जाता है, वैसे ही अविवेकियों की मूर्खता घनता को प्राप्त होकर अति कठिन हो जाती है।।56-63।। हे रघुकुलतिलक, आप तो जैसे सूर्य का उदय होने पर कमल विकसित होता है, वैसे ही सौजन्य आदि गुण एवं शास्त्रार्थ की दृष्टि से विकसित अन्तःकरणवाले हैं। हे सदबुद्धि श्रीरामजी, जैसे मृग आदि जन्तु ऊपर कान करके (कान खड़े करके) वीणा के शब्द को सुनते हैं वैसे ही आप इस ज्ञानमय वाणी को सुनने और समझने के योग्य हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, आप वैराग्य के अभ्यास आदि से सम्पूर्ण विनय आदि रूप सम्पत्तियों का उपार्जन कीजिए, जिनके प्राप्त होने पर नाश नहीं होता। पहले संसाररूप बन्धन से छुटकारा पाने के लिए शास्त्राभ्यास और सज्जन संगतिपूर्वक तपस्या और इन्द्रियनिग्रह से प्रज्ञा को (विवेक के ग्रहण और धारण में निपुण बुद्धि को) ही बढ़ावें।।56-67।।
प्रज्ञा की अभिवृद्धि में शास्त्राभ्यास ही उपाय है, इस अभिप्राय से कहते हैं।
संस्कृत (विशुद्ध) बुद्धि से जो कुछ शास्त्र का अवलोकन, चिन्तन आदि किया जाता है, उसी को इस मूर्खता के विनाश का हेतु समझो। यह संसाररूपी विषवृक्ष आपत्तियों का एकमात्र घर है यह अज्ञानी पुरुष को सदा मोह में डालता है, इसलिए अज्ञान का यत्न से विनाश करना चाहिए। दुराशा से साँप की-सी कुटिल गति को धारण करने वाली हृदय में हजारों विक्षेपरूप से व्याप्त मूर्खता से बुद्धि अग्नि में सबसे रक्खे हुए चमड़े की भाँति संकोच को प्राप्त होती है अर्थात् संकुचित कमल की नाईं मलिनता को प्राप्त होती है। जैसे मेघरहित और सम्पूर्ण निर्मल मण्डलवाले चन्द्रमा में दृष्टि प्रसन्नता को प्राप्त होती है वैसे ही यह पूर्वोक्त वस्तुदृष्टि (वस्तु यानी परमार्थरूप तत्त्व जिसमें देखा जाता है) अर्थात् सूक्ष्मबुद्धि प्राज्ञ में, यथार्थवस्तु की एकरसता को प्राप्त होकर प्रसन्नता को प्राप्त होती है। जिसकी पूर्वापर के विचार से और अतिसूक्ष्म अर्थ के ग्रहण में अत्यन्त पटु तथा चतुरता से शोभित बुद्धि विकासयुक्त हो, इस लोक में वही 'पुरुष' कहा जाता है।।68-72।।
मेरी बुद्धि विकासयुक्त है या नहीं, यों सन्देह कर रहे श्रीरामचन्द्रजी को आश्वासन देते हुए श्रीवसिष्ठजी कहते हैं।
हे श्रीरामजी, आप भी विकसित, अज्ञान का त्याग कर रहे अतएव विशुद्ध शान्ति आदि गुणों से शोभित एवं परमतत्त्व के विचार से शीतल बुद्धि से विराजमान है।।73।।
ग्यारहवाँ सर्ग समाप्त
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रविवार, 14 अक्टूबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 34 (मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण)


दसवाँ सर्ग
ब्रह्माजी के और अपने जन्म का वर्णन एवं समस्त जनों की मुक्ति के लिए मेरा उपदेश है इसका ज्ञान की अवतरणिका के रूप में वर्णन।

प्राक्तन पौरुष का ही नाम दैव है। उस पर आधुनिक पौरुष से भले ही विजय प्राप्त हो जाय। नियति तो, जो वैराग्य प्रकरण में कृतान्त की पत्नी कही गई है, अजेय है क्योंकि उसे श्रेष्ठ पुरुष भावी पदार्थों की अवश्यंभावरूप भवितव्यता और अप्रतिकार्य (अजेय) कहते हैं - 'अवश्यंभाविभावानां प्रतीकारो भवेद यदि। तदा दुःखेर्न लिप्येरन् नलरामयुधिष्ठिराः। अर्थात् यदि अवश्य होने वाली घटनाओं का प्रतीकार होता, तो नल, राम, युधिष्ठिर आदि दुःखी न होते। ऐसी परिस्थिति में पुरुष पर नियति का नियन्त्रण रहने के कारण पुरुष की स्वतन्त्रता कहाँ रही ?
इस शंका का निवारण करने के लिए श्रीवसिष्ठजी ने कहा।
हे रामचन्द्र, ब्रह्मतत्त्व सब जगह सच्चिदानन्दप्रकाशरूप से सबकी अनुकूलता तथा समतारूप से स्थित है। उससे सम्बन्ध रखने वाली सम्पूर्ण पदार्थों की सत्ता को ही नियति कहते हैं जिसका भविष्त काल के सम्बन्ध से भवितव्यता शब्द से व्यवहार किया जाता है। और सत्ता सर्वत्र उक्त रूप से स्थित ब्रह्मतत्त्व है। वही कारण और कार्य में क्रमशः नियामक और नियम्यरूप से रहती है। कारण है तो अवश्य कार्य होना चाहिए और कार्य है तो कारण अवश्य होना चाहिए, इस प्रकार का नियम नियति है। वह नियन्ता कारण आदि की नियन्तृता (कार्यादिनियामकता) है और नियम्य कार्य आदि की नियम्यता है। पूर्वकाल में नियत सत्ता कारणता है और पश्चातकाल में नियत सत्ता कार्यता है।।1।।
वे दोनों देश-काल से विशेषित सत्तारूप ही हैं, यह भाव है।
नियति सर्वानुकूल ब्रह्मसत्तारूप है, अतः पौरुष की सफलता के लिए भी नियति अनुकूल ही है, प्रतिकूल नहीं है, इस अभिप्राय से कथित चित्त को एकाग्र करने के उपाय बोधक वचन को कहते हैं।
इसलिए पौरुष का अवलम्बन कर श्रेय के लिए नित्य बन्धुरूप चित्त को एकाग्र करो, मेरे इस कथन को सुनो। इन्द्रियों को सदा विषयों की वासना बनी रहती है और वे मुक्ति से रहित ऐहिक और स्वर्ग आदि सुख में आसक्त रहती हैं, अतः जैसे वे विषय की वासना करें वैसे प्रयत्न से इन्द्रियों को शीघ्र अपने वश में कर के मन को सम कीजिए।।2,3।।
तदुपरान्त जो कर्तव्य है, उसका उपदेश देते  हैं।
इस लोक की सिद्धि (जीवन्मुक्ति) तथा परलोक की सिद्धि के (विदेह मुक्ति के) लिए या मनुष्यलोक और स्वर्ग आदि लोकों में अधिकारियों की ज्ञान सिद्धि के लिए पुरुषार्थरूप फल देने वाली, मोक्ष के उपायों के उपदेश से परिपूर्ण तथा सारभूत जिस संहिता को कहूँगा, उसे सावधान होकर सुनिये। श्रीराम जी (▲) अपुनर्ग्रहण के लिए (सर्वदा के लिए) संसारवासना को हृदय से विदा कर तथा उदार बुद्धि से परिपूर्ण शान्तिसुख और सन्तोषसुख का ग्रहण कर पूर्ववाक्य (कर्मकाण्ड श्रुतियों) और उत्तरवाक्यों के (उपासनापरक श्रुतियों के) अर्थ के विचार से सम्पन्न और विषयों द्वारा अविद्ध (वेध को प्राप्त न हुए) मन को आत्मानुसंधान से युक्त और समरस (गुरु और शास्त्र द्वारा उपदिष्ट प्रकार की और अपने अनुभव की एकरसता के आस्वादन से युक्त) करके सुख और दुःख का नाश करने वाले महान् आनन्द के एकमात्र कारणभूत इस मोक्ष के उपाय को, जिसे मैं अभी कहूँगा, आप सावधान होकर सुनिय। श्रीरामचन्द्रजी, आप सम्पूर्ण विवेकशील(▼) पुरुषों के साथ इस मोक्षकथा को सुनकर उस दुःखरहित परमपद को प्राप्त होंगे, जहाँ पर विनाश का भय नहीं है।।4-8।।
▲ उक्त संहिता के सुनने में मन्दविरक्त का भी अधिकार नहीं है, यह सूचित करने के लिए 'अपुनर्ग्रहणाय' ऐसा कहा है।
▼ श्रवणशाला में अविवेकी प्रविष्ट भी न हो सकें, यह सूचित करने के लिए विवेकशील कहा।
इस प्रकार सांगोपांग श्रवण की भूमिका रचकर श्रवणीय शास्त्र की (मोक्षकथा की) सिद्धि के लिए मोक्षकथा की प्राप्ति का प्रकार कहते हैं।
श्रीरामजी, सृष्टि के आदि में भगवान ब्रह्माजी ने सम्पूर्ण दुःखों का विनाश करने वाली और बुद्धि को अत्यन्त शान्ति देने वाली यह मोक्षकथा कही थी।।9।। श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः भगवन्, सृष्टि के आरम्भ में भगवान ब्रह्माजी ने किस लिए यह मोक्षकथा कही थी और यह कैसे आपको प्राप्त हुई, यह कृपाकर मुझसे कहिए।।10।।
श्रीवसिष्ठजी ने कहाः श्रीरामचन्द्रजी, घट-घट व्यापी, सबका आधार, अखण्ड चेतन, अविनाशी, सब प्राणियों में प्रकाशरूप से स्थित एवं असीम मायिक विलासों का एकमात्र अधिष्ठान परमात्मा है। माया और माया के कार्यों के आविर्भाव और तिरोभाव में सदा एकाकार (निर्विकार) उस परमात्मा से विष्णु (सम्पूर्ण कार्यों में व्याप्त रहने वाले ब्रह्माण्डरूप विराट्) सूक्ष्मभूतों के क्रम से उत्पन्न हुए जैसे कि स्पन्दमान जल से परिपूर्ण निश्चलावस्था और चंचलावस्था में अप्रच्युत जल-स्वभाव सागर से तरंगे उत्पन्न होती हैं। उस विराट् पुरुष के हृदयरूपी कमल से परमेष्ठी की (चतुर्मुख ब्रह्मा की) उत्पत्ति हुई। सुवर्णाचल सुमेरू उस कमल की कर्णिका है, दिशाएँ दल हैं और तारे केसर हैं। हे श्रीरघुकुलतिलक, जैसे कि मन विविध विकल्पों की सृष्टि करता है वैसे ही वेद और वेदार्थ के महान परिज्ञाता ब्रह्माजी ने देवताओं और मुनियों की मण्डली के साथ सम्पूर्ण प्राणियों की सृष्टि आरम्भ की। उन्होंने इस जम्बूद्वीप के एक भाग इस भारतवर्ष में लाभ और हानि से दुःखी, जन्म-मरण-शील एवं मानसिक और कायिक व्याधियों से पीड़ित विविध प्राणियों की सृष्टि की। प्राणियों की इस सृष्टि में विविध विषयभोगरूपी व्यसनों से पूर्ण लोगों का क्लेश देखकर सम्पूर्ण लोकों की सृष्टि करने वाले भगवान ब्रह्मा को, जैसे पुत्र को दुःखी देखकर पिता को दया आती है वैसे ही, बड़ी दया आई। उन्होंने प्राणियों के कल्याण के लिए क्षणभर एकाग्रचित्त होकर विचार किया कि इन अल्पायु बेचारे जीवों के दुःख का अन्त किस उपाय से होगा ? ऐसा विचार कर भगवान ब्रह्माजी ने स्वयं तप, धर्म, दान सत्य और तीर्थों की सृष्टि की। हे रघुवर, तप आदि की सृष्टि कर श्रीब्रह्माजी ने पुनः स्वयं विचार किया कि सृष्टिप्रवाह में पड़े हुए लोगों के दुःख का तप आदि से समूल विनाश नहीं हो सकता। निर्वाण (मोक्ष) परम सुख है, जिसके प्राप्त होने पर जीव न तो फिर जन्म लेता है और न मरता है। वह निर्वाण ज्ञान से ही प्राप्त होता है। अतः जीव के संसारसागर से पार होने का एकमात्र उपाय ज्ञान ही है।।11-22।।
तप, दान और तीर्थ संसारतरण के लिए 'न कर्मणा न प्रजया धनेन' (न कर्म से, न पुत्रोत्पादन से और न धनोपार्जन से ही मुक्ति हो सकती है) और 'प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपाः' (ये यज्ञ आदि कच्चे प्लव(छोटी डोंगी) हैं, इनसे संसारमुक्ति नहीं हो सकती) इत्यादि श्रुतियों में असाधन कहे गये हैं।
इसलिए मैं इन दीन-हीन लोगों के दुःख के समूल विनाश के लिए नूतन (मजबूत) संसाररसागरतरण का उपाय शीघ्र प्रकट करता हूँ। यों विचार कर कमल पर बैठे हुए भगवान ब्रह्माजी ने मन से संकल्प कर मुझे, जो तुम्हारे सामने बैठा हूँ, पैदा किया। पुण्यमय श्रीरामजी, जैसे एक तरंग से शीघ्र दूसरी तरंग होती है वैसे ही मैं भी अनिर्वचनीय मायावश ही उत्पन्न हुआ और उत्पन्न होते ही तुरन्त पिताजी के समीप में उपस्थित हुआ। जिनके हाथ में कमण्डल एवं रूद्राक्ष माला शोभा पा रही थी, उन भगवान् ब्रह्माजी को कमण्डल और रूद्राक्षमाला से युक्त मैंने विनम्रतापूर्वक प्रणाम किया। मुझसे 'हे पुत्र, यहाँ आओ' कहकर उन्होंने अपने आसनरूप कमल की ऊपरी पँखुड़ी में सफेद बादलपर चन्द्रमा के समान मुझे अपने हाथ से बैठाया। मेरे पितृदेव ब्रह्माजी ने मृगचर्म पहन रक्खा था, उन्हीं के अनुरूप मैं भी मृगचर्मधारी था। जैसे सुन्दर हंस सारस के कहे वैसे मृगचर्मधारी पितृदेव ब्रह्मा ने मृगचर्मधारी मुझसे कहाः हे पुत्र, जैसे चन्द्रमा में कलंक प्रविष्ट होता है वैसे ही वानर के समान चंचल अज्ञान एक मुहूर्त के लिए तुम्हारे चित्त में प्रवेश करे। वत्स रामचन्द्रजी, यों शीघ्र ब्रह्माजी से अभिशप्त हुआ मैं उनके संकल्प के अनन्तर ही अपना सारा निर्मल स्वरूप भूल गया। तदुपरान्त मैं जैसे किसी धनी का धन हर लेने से वह दीन-हीन हो जाता है वैसे ही दीन हीन हो गया, तत्त्वविज्ञान से रहित और दुःख-शोक से आक्रान्त मैं दिन पर दिन जीर्णशीर्ण होने लगा। बड़े दुःख की बात है कि यह महाक्लेशदायक संसार नामक दोष कहाँ से मुझको प्राप्त हो गया ऐसा विचार करता था और किसी प्रकार की चेष्टा नहीं करता था। तदुपरान्त पूज्य ब्रह्माजी ने मुझसे कहाः पुत्र, तुम क्यों दुःखी हो ? इस दुःख के नाशक का उपाय मुझसे पूछो। तदुपरान्त तुम अवश्य नित्यसुखी होओगे। तत्पश्चात स्वर्णकमल की पँखुरी में बैठे हुए मैंने सम्पूर्ण लोकों के रचयिता श्रीब्रह्माजी से संसारदुःखकी औषधि पूछी। मैंने पूछाः भगवन्, यह महादुःखमय संसार जीव को कैसे प्राप्त हुआ और कैसे इसका विनाश होता है। यों मेरे द्वारा पूछे गये उन्होंने मुझको उस प्रचुर ज्ञान का उपदेश दिया, जिस परम पवित्र ज्ञान को जानकर मैं पिता के सर्वोत्कृष्ट तत्वज्ञान के समान परिपूर्णस्वभाव हो गया। तदुपरान्त जब कि मैंने ज्ञातव्य तत्त्व ज्ञान जान लिया था, अतएव मैं अपनी प्रकृति में स्थित हो गया था, तब जगत के निर्माता, सबके कारण और उपदेशक ब्रह्माजी ने मुझसे कहाः पुत्र, मैंने शाप द्वारा तुम्हें अज्ञानी बनकर समस्त अधिकारी लोगों की ज्ञान सिद्धि के लिए इस सारभूते ज्ञान का जिज्ञासु बनाया। वत्स, अब तुम्हारा शाप शान्त हो गया है, जैसे चिरकाल तक मल के संसर्ग से मानों सुवर्ण अभावता को प्राप्त हुआ सुवर्ण पुनः शोधन से पूर्वकालिक शुद्ध सुवर्ण रूपता को प्राप्त हो जाता है, वैसे ही तुम्हारा औपाधिक अज्ञान नष्ट हो गया है, अब उत्कृष्ट ज्ञान को प्राप्त हुए तुम मेरी नाईं अद्वितीय आत्मरूप हो गये हो।।23-31।। हे सज्जनशिरोमणे, इस समय तुम लोकानुग्रह के लिए भूलोक में जम्बूद्वीप के मध्य में स्थित भारतवर्ष में जाओ। वत्स, वहाँ पर महामति तुम कर्मकाण्डपरायण लोगों को क्रम से शोभित होने वाले कर्मकाण्डक्रम से ही उपदेश देना, क्योंकि 'न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसंगिनाम्' (कर्म परायण अज्ञानियों की बुद्धि में सन्देह उत्पन्न नहीं करना चाहिए) ऐसा न्याय है, और जो लोग विचारशील विरक्त और अतीन्द्रिय तत्त्व के ग्रहण में समर्थ हों, उन्हें आनन्ददायक ज्ञानमार्ग का उपदेश देना। रघुवंशशिरोमणि, इस प्रकार पिता ब्रह्माजी द्वारा आज्ञप्त मैं इस लोक में रहता हूँ और जब तक इस लोक में अधिकारी पुरुष रहेंगे, तब तक रहूँगा। इस लोक में मेरा कुछ भी कर्तव्य नहीं है, पर रहना चाहिए, यों विचार कर मैं अमनस्क होकर यहाँ स्थित हूँ, अतएव अभिमानशून्य वृत्ति से रहता हुआ मैं अज्ञानियों की बुद्धि से कार्य करता हूँ, अपनी बुद्धि से तो कुछ भी नहीं करता, यह भाव है।।40-44।।

दसवाँ सर्ग समाप्त
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गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 33 (मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण)


नौवाँ सर्ग
दैव के अपलाप की सिद्धि के लिए सफल कर्मों की मनोमात्रता और मन की चिदात्मता का वर्णन।

पुरुषप्रयत्न की स्वतन्त्रता की सिद्ध करने के लिए पहले कहीं पर 'दैव असत् है' ऐसा कहा और कहीं पर प्राक्तन प्रयत्न जनित कर्म ही दैव एवं पुरुष प्रयत्न कहलाता है, ऐसा कहीं पर यह ठीक नहीं है, क्योंकि 'दैव असत् है' इस प्रथम पक्ष को मानने से लोक और वेद में दैव की जो प्रबल प्रसिद्धि है, उसकी असंगति हो जायेगी और दुर्बल दैव के अभाव में उसकी अपेक्षा पुरुषप्रयत्न की प्रबलता का प्रतिपादन करनेवाली उक्ति के साथ विरोध होगा। प्राक्तन प्रयत्न जनित कर्म ही दैव है, इस द्वितीय पक्ष में तो 'दैव असत् है' इस प्रकार की दैव में असत्त्वप्रतिज्ञा का भंग हो जायेगा, आधुनिक प्रवृत्तियाँ भी पूर्वकर्म की फलरूपा हैं, अतः प्राक्तन कर्मों के अनुकूल होने के कारण उनका विरोध न होने से 'आधुनिक प्रवृत्तियों से पूर्वकर्मों का जय होता है, यह कथन भी विरुद्ध होगा एवं कर्मपरतन्त्र होने पर पुरुष की स्वतन्त्रता का भी विघात होगा, इस प्रकार के गूढ़ अभिप्राय वाले श्रीरामचन्द्रजी उसके तात्पर्य की जिज्ञासा से वसिष्ठजी से पूछते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः भगवन्, आप सम्पूर्ण धर्मों के ज्ञाता हैं, लोक में अत्यन्त विख्यात जो दैव है, वह क्या है ? यानी वह सत् है, या असत् ? उसे आप कृपया मुझसे कहिए।।1।।
रामचन्द्रजी के पूछने पर उनके अभिप्राय को जानकर श्रीवसिष्ठजी भी दैव का अपलाप करने वाली युक्तियों से ही जगत् के अपलाप द्वारा अद्वितीय आत्मतत्त्व को समझाने की इच्छा से 'पूर्वोक्त दोनों पक्षों में फलतः कोई भेद नहीं है, इस गूढ़ अभिप्राय से प्रथम पक्ष का अवलम्बन कर उक्त अर्थ को ही कहते हैं।
वसिष्ठजी ने कहाः हे राघव, सम्पूर्ण कार्यों को करने वाला पौरुष ही है, अन्य नहीं है एवं सम्पूर्ण फलों का उपभोक्ता भी पुरुषप्रयत्न है, उसमें दैव कारण ही नहीं है। वस्तुतः आत्मा स्वयं उदासीन है, अतः उसमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व की किसी प्रकार भी उपपत्ति नहीं होती।।2।।
ऐसा बोधन करने के लिए करणभूत पुरुषप्रयत्न में फलकर्तृत्व का कथन किया गया है, यह तात्पर्य है।
दैव न कुछ करता है, न भोग करता है, न उसका अस्तित्व है, न दिखाई देता है, एवं न तो विवेकी पुरुष द्वारा उसका आदर किया जाता है, पर अनादि रूढ़ भ्रान्ति से केवल मूढ़ों ने उसकी कल्पना कर रखी है।।3।।
निरालम्बत्वरूप अनुपपत्तिका परिहार करते हैं।
फल को अवश्य देने वाले पुरुष प्रयत्न से सिद्ध वनिता आदि को पति और सपत्नी आदि से जो कुछ और अशुभ फल प्राप्त होता है, उसी का अवलम्बन कर दैवशब्द का लोक में व्यवहार होता है। अथवा पुरुषप्रयत्न द्वारा प्राप्त इष्ट और अनिष्ट वस्तु की जो इष्ट और अनिष्टरूपा प्राप्ति है, वह भी सदा लोगों द्वारा दैवशब्द से कही जाती है।।4,5।।
श्रीवसिष्ठजी चार्वाक मत का प्रदर्शन करते हैं।
पुरुषप्रयत्न से होने वाला जो अवश्य फल का भोग है, वही इस लोक में दैवशब्द से कहा जाता है।।6।।
अब महामुनि वसिष्ठजी सिद्धान्त बतलाते हैं।
हे रामचन्द्रजी, किसी पुरुष का कोई दैव ही भ्रान्त दृष्टि से आकाश को शून्य के सदृश या नील के सदृश बना देता है और विवेक दृष्टि से वैसा नहीं बनाता है अर्थात् दैव की सिद्धि भ्रान्ति से ही है, विवेक से नहीं। सिद्ध पुरुषार्थ से शुभ और अशुभ फल का उदय होने पर 'यह फल इस बीज के स्वरूप में पहले रहा' इस प्रकार जो कहा जाता है, वही दैव है। मेरी ऐसी बुद्धि थी और ऐसा मेरा निश्चय था यों कर्मफल के प्राप्त होने पर जो कहा जाता है, वही दैव है। इष्ट और अनिष्ट फल के प्राप्त होने पर प्राक्तन कर्म ही इस प्रकार था। इस अभिप्राय को बतलाने वाला केवल आश्वासनमात्र ही दैव है।।7-10।।
दोनों कल्पों के अभेद का कथन करने से आशय को न जान रहे एवं प्रथम कल्प का उपक्रम कर द्वितीय कल्प से उपसंहार करने में विरोध को जान रहे श्रीरामचन्द्रजी अपने अभिप्राय को प्रकट करते हुए बोले। श्री रामचन्द्रजी ने कहाः भगवन्, हे सर्वधर्मज्ञ, जो प्राक्तन कर्म है वही दैव है, ऐसा आपने बार बार कहा, फिर दैव है ही नहीं, इस प्रकार उसका आप अपलाप कैसे करते हैं यानी उसके अपलाप करने में आपका क्या अभिप्राय है ?।।11।। श्रीवसिष्ठजी ने कहाः हे रामचन्द्र, ठीक है, आप उन दोनों कल्पों के विरोध को जानते हैं, सुनिये, मैं आपसे सम्पूर्ण वृत्तान्त को कहूँगा, जिससे दैव है ही नहीं, यह आपकी बुद्धि स्थिर हो जायेगी। मनुष्यों के मन में पहले जो अनेक प्रकार की वासनाएँ हुई थीं, वे ही कायिक और वाचिक कर्मरूप से परिणत हुई क्योंकि 'यद्धि मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति तत्कर्मणा करोति ' यानि जिसका मन चिन्तन करता है उसको वाणी से बोलता है और उसको कर्म से करता है। हे राम जी, प्राणी में जिस प्रकार की वासना होती है, वह शीघ्र ही वैसा कर्म करता है। अन्य प्रकार की वासना हो और अन्य कर्म करे यह बात नहीं बन सकती। गाँव में जाने की जिसकी इच्छा होती है वह गाँव में पहुँचता है और शहर में जाने की जिसकी इच्छा होती वह शहर में पहुँचता है, जिसकी जिस विषय में अभिलाषा होती है वह उस विषय में प्रयत्न करता है। पूर्वजन्म में फल की उत्कट अभिलाषा से जो कर्म प्रबल प्रयत्न से किया जाता है वही इस जन्म में दैव शब्द से कहा जाता है अर्थात् पूर्व जन्म में फल की उत्कट अभिलाषा से किये गये कर्म का ही दूसरा नाम दैव है, अतः दैव कर्म से अतिरिक्त नहीं है।।12-16।। कर्मकर्ताओं के सभी कर्म इसी प्रकार के होते हैं। अपनी प्रबल वासना ही कर्म है और वासना भी आपने कारणभूत मन से पृथक नहीं है।।17।।
क्योंकि 'वाचारम्भणं विकारों नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्' (विकार और नाम केवल वाचारम्भणमात्र है, मृत्तिका ही (कारण ही) सत्य है) श्रुति में उक्त ऐसा न्याय है। यद्यपि वाचिक और कायिक भी कर्म देखे जाते हैं तथापि विचार करने पर भी केवल मनोवासनारूप ही हैं, ऐसा आगे कहा जायेगा, उसी के अनुसार सकल कर्म मनोवासनामात्र हैं, ऐसा कहा गया है।
मन पुरुष (परमात्मारूप) ही है, उससे पृथक नहीं है, क्योंकि 'तन्मनोऽकुरुत आत्मन्वी स्याम्' (मैं मनस्वी होऊँ, इस अभिप्राय से उसने मन को बनाया) इस श्रुति से मन पुरुष का विवर्तरूप ही है, यह सिद्ध है।
हे सज्जनशिरोमणि श्रीरामजी, जो दैव है, वही कर्म है, दैव कर्म से पृथक नहीं है, कर्म मन से पृथक नहीं है और मन पुरुषरूप है और पुरुष परमार्थरूप से निर्विकार चैतन्यमात्ररूप ही है, इससे मन असत् ठहरा, मन के असत् होने से कर्म भी असत् ठहरा और असत् कर्मरूप दैव भी असत् हुआ, अतएव दैव नहीं है, यह फलितार्थ है।।18।।
'प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति वदन् वाक्, पर्श्यैश्चक्षुः श्रोत्रं मन्वानो मनः' इस श्रुति से अध्यास से मन आदि भाव से स्थित आत्मा की ही कर्म और कर्म के फलरूप से भी स्थिति है इसलिए वही दैव है, ऐसा यदि कहो, तो वह दैव रहे उससे पुरुष की स्वतन्त्रता का विनाश नहीं होगा, इस आशय से कहते हैं।
मन आदि भाव को प्राप्त हुआ यह प्राणी ही अपने हित के लिए जैसा प्रयत्न करता है दैवनाम से प्रसिद्ध अपने कर्म से वैसा ही फल पाता है।।19।।
यदि मन अत्यन्त असत् है, तो उससे व्यवहार की सिद्धि कैसे होगी ? अत्यन्त असत् वन्ध्यापुत्र आदि से किसी व्यवहार की सिद्धि नहीं देखी जाती, ऐसी आशंका कर युक्ति से उसकी अनिर्वचनीयता को दर्शा रहे 'तदेतद्धृहयं मनश्चैतात्संज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानम्' (वही हृदय, मन, संज्ञान, अज्ञान, विज्ञान और प्रज्ञान है) इत्यादि श्रुति के अनुसार मन की ही दैव आदि संज्ञाएँ हैं ऐसा कहते हैं।
हे श्रीरामजी, मन, चित्त, वासना, कर्म, दैव और निश्चय से सब सत्त्व था असत्त्व, चित्त्व या जडत्व, भेद या अभेद आदि से तत्त्वतः जिसका निश्चय नहीं हो सकता ऐसा मिथ्याभूत मन की (मनोरूपता को प्राप्त हुए पुरुषकी) संज्ञाएँ कही गई हैं। यों पुरुष की स्वतन्त्रता सिद्ध हुई, ऐसा कहते हैं। हे रामचन्द्र, पूर्वोक्त नामों वाला (मन, चित्त आदि संज्ञाओंवाला) पुरुष दृढ़ वासना से जैसा नित्य प्रयत्न करता है वैसा ही उसे पर्याप्त फल मिलता है। हे रघुकुलतिलक, इस प्रकार पौरुष से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है उससे अन्य से कुछ भी नहीं मिलता, इसलिए पौरुष से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है उससे अन्य से कुछ भी नहीं मिलता, इसलिए आपका पुरुषप्रयत्न शुभ फल देने वाला हो।।20-22।। श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः मुनिवर, पूर्वजन्म की वासनाएँ जैसे मुझे कार्य में लगाती है, वैसे ही मैं रहता हूँ, परवश मैं कर ही क्या सकता हूँ। अर्थात् पूर्वजन्म की वासनाओं के अधीन हुए मुझे स्वतन्त्रतापूर्वक कुछ करने की शक्ति कहाँ है, वासना मुझसे जैसा नाच-नचा रही है, वैसा नाच मैं नचाता हूँ।।23।।
इस समय प्राप्त हो रहे फल में भले ही तुम्हारी स्वतन्त्रता न हो, पर भावी फल के अनुकूल यत्न में तो स्वतन्त्रता है ही। सदविद्या से संयुक्त जन्म से अनुमित पूर्वजन्म के सत्प्रयत्न की फलभूत पूर्व वासना केवल अपने विरुद्ध फलों की अवरोधिका है, अतएव उससे युक्त जन्म में भी यदि पुरुष की सत्प्रवृत्ति में स्वतन्त्रता न हुई, तो कर्म और ब्रह्मविद्यापरक शास्त्र ही व्यर्थ हो जायेंगे। अपने मन में ऐसा अभिप्राय रखकर श्रीवसिष्ठजी ने कहा।
श्रीवसिष्ठजी ने कहाः हे रामजी, आप प्रस्तुत जन्म की हेतुभूत वासनाओं की अनुकूलता से ही अपने प्रयत्न से प्राप्त पौरुष द्वारा अक्षय श्रेय को प्राप्त होओगे, अन्यथा नहीं।।24।।
उक्त अर्थ का ही समर्थन करने के लिए वासनाओं का भेद दर्शा कर कहते हैं।
पूर्वजन्म की वासनाएँ, दो प्रकार की होती हैं, एक शुभ और दूसरी अशुभ। उनमें से आपकी पूर्वजन्म की वासनाएँ या शुभ हो सकती है या अशुभ हो सकती हैं।।25।।
प्रथम पक्ष में कहते हैं।
यदि आपकी पूर्वजन्म की वासनाएँ शुभ हों, तो पूर्वजन्म की शुभ वासनाओं द्वारा इस समय भी आप शुभ वासना में प्राप्त कराये जा रहे हैं, ऐसी अवस्था में शुभ वासनाओं द्वारा ही क्रमशः अविनश्वर पद को प्राप्त होंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं है।।26।।
दूसरे पक्ष में कहते हैं।
यदि आपकी पूर्वजन्म की वासनाएँ अशुभ हैं और वे आपको संकट की ओर ले जाती हैं, तो उन प्राक्तन अशुभ वासनाओं पर आपको प्रयत्नपूर्वक दृढ़ता से विजय प्राप्त करनी चाहिए। भाव यह कि वासनाओं का उदबोध स्वतन्त्ररूप से नहीं होता, किन्तु किसी उदबोधक के अनुसार ही होता है। यदि असज्जन की संगति आदि से कदाचित् एक आध अशुभ वासना उठे, तो उसका, उसके विरोधी साधु संगति, सत्-शास्त्र के अभ्यास आदि से विरोधी शुभ वासना की उत्पत्ति कराकर, तिरस्कार कर देना चाहिए।।27।।
'यो मनसि तिष्ठन्मनोऽन्तरो यं मनो न वेद' इस श्रुति से मन को प्रेरित करने वाला प्रज्ञानामक आत्मा दूसरा सुना जाता है उसके अधीन ही मनोवासनाएँ होती हैं, ऐसी परिस्थिति में सद्वासनाओं के उत्पादन में मेरी स्वतन्त्रता कहाँ है ? ऐसी शंका उठने पर कहते हैं।
जो चेतनमात्र प्राज्ञ श्रुति में कहा गया है, वही आप हैं। आप जड़रूप सूक्ष्म, स्थूल देह नहीं हैं जिससे उससे अपने को पृथक समझें, इसलिए चेतनरूप आपकी अन्य चेतन से भास्यता कहाँ है ? भाव यह कि यदि प्राज्ञ आप से पृथक हो, तो चेतन का अन्य चेतन से प्रकाश न होने के कारण आपको प्रकाशित न करता हुआ वह सर्वज्ञ न होगा, इसलिए आप ही प्राज्ञ हो, इस प्रकार प्राज्ञ और आपमें अभेद सिद्ध हुआ।।28।।
चेतनरूप आपको कोई दूसरा चेतन प्रकाशित करता है, ऐसा यदि मानो, तो उसको भी दूसरा चेतन प्रकाशित करेगा, यों अनवस्था भी होगी, ऐसा कहते हैं।
यदि आपको कोई दूसरा चेतन प्रकाशित करता है, ऐसा यदि मानो, तो उसको भी दूसरा चेतन प्रकाशित करेगा, यो अनवस्था भी होगी, ऐसा कहते हैं।
यदि आपको अन्य कोई प्रकाशित करता है, तो उस प्रकाशित करने वाले को कौन प्रकाशित करेगा और उस दूसरे प्रकाशित करने वाले को कौन प्रकाशित करेगा ? उसको भी अन्य करेगा और उसको भी अन्य प्रकाशित करेगा, ऐसा माना जय, तो अनवस्था होगी। अनवस्था किसी भी वस्तु को सिद्ध नहीं कर सकती। यों सदवासनाओं का उदबोध करने में आपकी स्वतन्त्रता अक्षुण्ण है।।29।।
पुरुष की स्वतन्त्रता के साधन का फल कहते हैं।
सन्मार्ग और असन्मार्ग से बह रही वासनारूपी नदी को अपने पुरुषप्रयत्न से अशुभ मार्ग से हटाकर शुभ मार्ग में लगाना चाहिए। हे बलवानों में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी, असत् मार्गों में उलझे हुए अपने मन को अपने पुरुषार्थ से बलपूर्वक शुभ मार्गों में लगाओ।।30,31।।
चित्तरूपी नदी दो प्रकार से बहती है पाप के लिए और पुण्य के लिए उन दो स्रोतों में से एक का निरोध होने पर दूसरे स्रोत में चित्तनदी दुगुने प्रवाह से बहती है, यह बात योगशास्त्र के अनुसार कहते हैं।
अशुभ कर्म से (पापमार्ग से) निवारित मनुष्य का चित्त बालक की नाईं शुभ कर्म में (पुण्यमार्ग में) जाता है और पुण्य मार्ग से निवारित पापमार्ग में जाता है, इसलिए प्रयत्न के साथ पापमार्ग से चित्त को हटाना चाहिए।।32।। इस प्रकार पूर्वोक्त क्रम से चित्तरूपी बालक को शीघ्र रागादि दोषों के विश्लेषण से और स्वाभाविक समता में स्थापन से निर्दोष बनाकर धीरे-धीरे आत्मस्वरूप में निरोधरूप पौरुषप्रयत्न से लगावे।।33।।
शीघ्र हठपूर्वक उसका निरोध न करें, ऐसा करने से उद्वेग से समाधि के टूटने का भय रहता है। भगवान ने भी श्रीमुख से कहा हैः 'शनैः शनैरुपरभेद् बुद्धया धृतिगृहीतया।' (धारणा से वश में की गई बुद्धि से मन को शनैः शनैः (अभ्यासक्रम के अनुसार न कि सहसा) बाह्य विषयों से विरत करे।)
आपने पहले अभ्यास से चाहे शुभ वासनाओं को चाहे अशुभ वासनाओं को निविड़ बना रक्खा हो, किन्तु इस समय तो आप शुभ वासनाओं को ही दृढ़ कीजिए। भाव यह कि पूर्वजन्मों में यदि आपके अभ्यास से शुभ वासनाओं को ही दृढ़ किया होगा, तो इस समय में भी शुभ वासनाओं को दृढ़ करने का शीघ्र फल प्राप्त होगा। यदि पूर्वजन्म में अशुभ वासनाओं को निविड़ बना रक्खा होगा, तो विरोधी वासनाओं के विनाश के लिए भी शुभ वासनाओं के दृढ़ीकरण की आवश्यकता है।।34।।
वासनाओं के अभ्यास की विफलता की शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि पूर्ववासनाओं के अभ्यास का फल प्रत्यक्ष है, ऐसा कहते हैं।
हे शत्रुनाशन, जब आपकी पूर्वजन्म की वासनाएँ अभ्यासवश घनीभाव को (निविडता को) प्राप्त हुई हैं, तब आप अभ्यास की सफलता को जानिये। हे पुण्यचरित, पूर्व की भाँति इस समय भी अभ्यासवश आपकी वासना घनीभाव को प्राप्त हो रही है, इसलिए शुभवासनाओं का ही अभ्यास कीजिए।।35,36।।
पूर्वजन्म की वासनाओं के घनीभाव में भी सन्देह कर रहे श्रीरामचन्द्रजी से कहते हैं।
हे प्रिय, यदि पूर्वजन्म में अभ्यास से आपकी वासना घनीभाव को प्राप्त नहीं हुई, तो इस समय भी वह वृद्धि को प्राप्त नहीं होगी, इसलिए आप सुखी होइये। भाव यह कि पूर्वजन्म में अभ्यासवश वासनाएँ वृद्धि को प्राप्त नहीं हुई, इस जन्म में भी वे अभ्यासवश दृढ़ नहीं होगी, ऐसी अवस्था में आप राजकुमारोचित सुख पूर्वक व्यवहार कीजिए, दुर्वासनाओं की अभिवृद्धि से जनित अनर्थ की संभावना से आपको विषाद नहीं होना चाहिए।।37।।
यदि ऐसा है, तो शुभ और अशुभ वासनाओं की अभिवृद्धि के लिए मुझे क्यों उपदेश देते हैं ?
राजकुमार, 'शुभ और अशुभ वासनाओं की सफलता में सन्देह होने पर भी आप अत्यन्त शुभ वासनाओं का ही संग्रह कीजिए। शुभ कर्मों के आचरण से शुभ वासना की अभिवृद्धि होने पर कोई दोष नहीं है।।38।।
जैसा की न्याय हैः शुभाशुभफलारम्भे सन्दिग्धेऽपि शुभं चरेत्। यदि न स्यात्तदा किं स्याद्यदि स्यान्नास्तिको हतः।। शुभ और अशुभ कर्मों की फलदातृता में सन्देह होने पर भी शुभ का ही आचरण करना चाहिए। यदि फल नहीं हुआ, तो क्या बिगड़ा, यदि हुआ, तो नास्तिक के मुँह में कालिख लगी।
वस्तुतः तो इस विषय में सन्देह का अवसर ही नहीं है, क्योंकि अन्य स्थलों से भी अभ्यास में अभ्यस्यमान की (जिसका अभ्यास किया जाता है उसकी) दृढ़ता की हेतुता देखी जाती है, ऐसा कहते हैं।
लोक में मनुष्य जिस-जिस विषय का अभ्यास करता है, उसी मैं निःसन्देह तन्मय हो जाता है, यह बात बाल कों से लेकर बड़े-बड़े विद्वानों तक में देखी गई है। हे श्रीरामचन्द्रजी, इसलिए आप परम ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए परम पुरुषार्थ का अवलम्बन कर और पाँचों इन्द्रियों को अपने वश में कर शुभ वासना से युक्त होइए।।39,40।।
कितने समय तक शुभ वासना का अभ्यास करना चाहिए ?
भद्र जब तक गुरु के उपदेश, शास्त्राभ्यास और युक्ति, अनुभव आदि प्रमाणों से तत्पद का निर्णय न हो जाय और जब तक अव्युत्पन्न चित्तवाले आपको तत्पद का ज्ञान न हो जाय, तब तक शुभवासनाओं का आचरण कीजिए। तदुपरान्त जब जैसे क्षार में पकाने से वस्त्र आदि में लगे हुए मल आदि शिथिल हो जाते हैं वैसे ही आपके राग आदि दोष नष्ट हो जाय, परम तत्त्व का परिज्ञान हो जाय और मानसिक व्यथाएँ नष्ट हो जाय तब आपको निश्चय इस शुभ वासनासमूह का भी परित्याग कर देना चाहिए।।41,42।।
पूर्वोक्त अर्थ का ही संक्षेप से उपसंहार कर रहे महर्षि वसिष्ठजी आचरण करने के योग्य शुभ का ही निर्देश करते हैं।
महाभाग, आप श्रेष्ठतम पुरुषों द्वारा सेवित अति सुन्दर उन शुभ वासनाओं का अनुसरण कर, शुभ वासना से सम्पन्न बुद्धि से परमार्थ वस्तु का ( परब्रह्म का ) साक्षात्कार कीजिए और तदन्तर शुभ वासनाओं के अनुसरण का भी त्याग कर परम सत्य में स्थित होइय।।43।।
नौवाँ सर्ग समाप्त
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