मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 29 (मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण)


पाँचवाँ सर्ग
पौरुष के प्रबल होने पर अवश्य फलप्राप्ति में एवं दैव की पुरुषार्थ से अभिन्नता में युक्ति और दृष्टान्तों का प्रदर्शन।
पूर्व में जो यह कहा था कि दैव पौरुष से अतिरिक्त नहीं है, दैव से पौरुष प्रबल है और पौरुष से ही पुरुषार्थ की सिद्धि होती है, उक्त सबका युक्ति से समर्थन करने के लिए प्रतिज्ञा करते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहाः जैसे नीला, पीला आदि रंगों की अभिव्यक्ति में प्रकाश ही मुख्य कारण है, वैसे ही शास्त्र के अनुसार कायिक, वाचिक और मानसिक व्यवहार करने वाले अधिकारी पुरुषों के सब पुरुषार्थों की सिद्धि में प्रवृत्ति ही मुख्य कारण है।।1।।
विद्या तृप्ति आदि के समान दृष्टफलक है, उसके साधन में शास्त्रीय नियम का क्या उपयोग है ? इस पर कहते हैं।
पुरुष जिसकी केवल मन से इच्छा करता है, शास्त्रानुसार कर्म से नहीं करता, वह उन्मत्त की चेष्टा ही करता है, वह पुरुषार्थ का साधन नहीं है, बल्कि मोह का साधन है। सारांश यह कि यद्यपि विद्या दृष्टफलक है, तथापि विद्या  साधन में अशास्त्रीय ही फल होता है, इस प्रकार औचित्य के बल से भी व्यवस्था की सिद्धि होती है। जो आदमी जैसा प्रयत्न करता है, वह वैसा ही फल पाता है। प्राक्तन (पूर्व जन्म का) स्वकर्म है दैव कहलाता है, उससे अतिरिक्त दैव कुछ नहीं है। पौरुष दो प्रकार का है-एक शास्त्रानुमोदित और दूसरा शास्त्रविरुद्ध। उनमें शास्त्रविरुद्ध कर्म अनर्थ का कारण है और शास्त्रानुमोदित कर्म परमार्थवस्तु की प्राप्ति का कारण है। कहीं पर सम और कहीं पर असम प्राक्तन और ऐहिक दो पुरुषार्थ भेड़ों की तरह परस्पर लड़ते हैं, उनमें जो कम बलवाला होता है, वह नष्ट हो जाता है। इसलिए पुरुष को शास्त्रीय प्रयत्न से सज्जन महात्माओं के संग के द्वारा वैसा उद्योग करना चाहिए जिससे कि इस जन्म का पौरुष पूर्व जन्म के पौरुष को शीघ्र जीत ले।।2-6।।
'त्रिभिऋणैऋणवान् जायते' इस श्रुति से मनुष्य, देवता आदि का ऋणि, सुना जाता है और 'तस्मादेषां तन्न प्रियमेतन्मनुष्या विद्युः' (इसलिए देवताओं को यह प्रिय नहीं है कि मनुष्य आत्मतत्त्वज्ञानी होवें) ऐसी भी श्रुति है, इसलिए वे देवता अवश्य विघ्न करेंगे, उनके विघ्न करने पर किया गया प्रयत्न ही विफल हो जायगा, ऐसी आशंका कर कहते हैं।
सम और विषम अपना और दूसरे का पुरुषार्थ – ये दोनों भेड़ों की तरह लड़ते हैं उन दोनों में जो अति बलवान होता है, वह जीत जाता है। भाव यह है कि दोषों के रहते ही देवता विघ्न कर सकते हैं, अपने प्रयत्न से दोषों पर विजय पाने से उनकी विघ्नशक्ति कुण्ठित हो जाती है।।7।।
शास्त्रीय मार्ग में यत्न कर रहे लोगों को भी कभी कभी रोगादि अनर्थ क्यों प्राप्त होते हैं ? ऐसी आशंका होने पर कहते हैं।
जहाँ पर शास्त्रानुमोदित पौरुष से भी विघ्नबाधा प्राप्त होती है, वहाँ पर अनर्थकारी अपने पौरुष को बलवान् समझना चाहिए।।8।।
उसको भी जीत लेना चाहिए यह भाव है।
अपने उत्कृष्ट पौरुष का अवलम्बन कर दाँतों से दाँतों को पीस रहे पुरुष को अपने शुभ पौरुष से विघ्न करने के लिए उद्यत पूर्व जन्म के अशुभ पौरुष को जीत लेना चाहिए। यह प्राचीन पौरुष मुझे प्रेरित करता है, इस प्रकार की बुद्धि को बलपूर्वक कुचल डालना चाहिए, क्योंकि वह प्रत्यक्ष प्रयत्न से अधिक बलवान नहीं है। तब तक पौरुष पूर्वक भली भाँति प्रयत्न करना चाहिए जब तक कि प्राक्तन (पूर्व जन्म का) अशुभ पौरुष स्वयं () (निःशेष) शान्त हो जाये।
'स्वयम्' विशेषण निःशेषतता का सूचक है, अन्य से शान्ति होने पर उसके (शामक अन्य के) हटने पर फिर उसका उद्भव हो सकता है वह न हो इसलिए 'स्वयम्' यह विशेषण दिया है।
इस जन्म के गुणों से (शुभ पौरुष से) पूर्वजन्म का दोष (अशुभ पौरुष) अवश्य नष्ट हो जाता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है। आज के गुणों से (लंघन आदि से) कल के दोष का (अजीर्ण आदिका) क्षय इसमें दृष्टान्त है। पूर्व जन्म के दुरदृष्ट का ऐहिक शुभ कर्मों से सदा उद्योगशील बुद्धि द्वारा तिरस्कार कर अपने में संसार को तरने के लिए सम्पादनार्थ (मुक्तयर्थ) शम, दम, श्रवण आदि सम्पत्ति के लिए यत्न करना चाहिए। आलसी पुरुष गदहे से भी निकृष्ट है, अतएव उद्योगहीन होकर गर्दभ तुल्य नहीं बनना चाहिए, किन्तु स्वर्ग और मोक्ष की सिद्धि के लिए शास्त्रानुसार सदा यत्न करना चाहिए।।9-14।। जैसे विष्णु असुरों द्वारा प्रयुक्त माया रूप पिंजड़े से स्वयं बलपूर्वक निकल गये। अथवा जैसे सिंह मनुष्यों से बनाये गये बन्धन रूप पिंजड़े से स्वयं बलपूर्वक निकल जाता है, वैसे ही मनुष्यों को पौरुषरूप यत्न का अवलम्बन कर इस संसाररूप गर्त से स्वयं बलपूर्वक निकल जाना चाहिए। अपने शरीर को प्रतिदिन नश्वर देखें, पशुओं के साथ समानता को छोड़ दें अर्थात् पशुता का स्वीकार न करें, किन्तु सत्पुरुषों के योग्य साधु संगम और सत्शास्त्रों का अवलम्बन करे। जैसे कीड़ा घाव में पीव आदि द्रव पदार्थ का आस्वादन करता है, वैसे ही घर में स्त्री, अन्न, पान आदि द्रव और कोमल पदार्थों का आस्वादन लेकर सम्पूर्ण पुरुषार्थों के साधनभूत यौवन को व्यर्थ नहीं कर देना चाहिए। शुभ पुरुष प्रयत्न से शीघ्र शुभ फल प्राप्त होता है और अशुभ पुरुष प्रयत्न से अशुभ फल मिलता है। पूर्वजन्म के शुभ और अशुभ पुरुष प्रयत्नो के सिवा दैव नाम की कोई वस्तु नहीं है। जो मनुष्य प्रत्यक्ष प्रमाण का त्याग कर अनुमान प्रमाण का अवलम्बन करता है, वह अपनी बाहुओं को ये सर्प है, ऐसा समझकर उनसे भयभीत होकर भागता है। विश्वामित्र आदि श्रेष्ठ पुरुषों ने पुरुष प्रयत्न से ही पुरुषार्थ (परम लक्ष्य) प्राप्त किया था, इस बात को न जानने वाले अतएव मुझे दैव प्रेरित कर रहा है, ऐसा कहने वाले दुर्बुद्धियों का मुख देखकर लक्ष्मी लौट जाती है। इसलिए पहले पुरुष प्रयत्न से नित्यानित्यवस्तु विवेक आदि चार साधनों का अवलम्बन लेना चाहिए और आत्मज्ञानरूपी महान अर्थवाले शास्त्रों का विचार करना चाहिए। शास्त्रानुसार श्रवण, मनन आदि चेष्टाओं द्वारा परमार्थभूत आत्मतत्त्व का विचार न कर रहे अतएव उक्त पुरुषार्थसाधन से शून्य मूढ़ पुरुषों की अनन्त नरकों की हेतु होने के कारण अतिदुष्ट भोगेच्छा के लिए धिक्कार है। अर्थात् ऐसे पुरुष शोचनीय हैं।।15-22।।
'एव' पद योग्य जन्म का लाभ होने पर भी पुरुषार्थ की सिद्धि न करने पर फिर पुरुषार्थ सिद्धि की दुर्लभता का द्योतक है। श्रुति भी है - 'इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः' अर्थात् यदि अधिकारी मनुष्य ने आत्मतत्त्व को जान लिया, तो मनुष्य जन्म की ठीक सार्थकता है, यदि आत्मतत्त्व को नहीं जाना, तो बड़ा भारी विनाश है – अविच्छिन्न जन्म, मरण, नरक दि की परम्परा प्राप्त होती है।
इतने समय तक पुरुषार्थ करना चाहिए, इस प्रकार अवधिका ज्ञान न होने के कारण वह अनन्त है उसमें अति परिश्रम भी है, अतः उसमें कैसे प्रवृत्ति हो ? इस पर कहते हैं। पौरूष निरवाधिक नहीं है, साक्षात्कार का उदय ही उसकी अवधि है। वह प्रयत्न की भी अपेक्षा नहीं करता।।23।।
क्योंकि 'प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्' (अनेक जन्मों से संचित निष्काम कर्म का फल गुरु द्वारा प्रदर्शित विचार से युक्त वेदान्तवाक्य से सुखपूर्वक प्राप्त किया जा सकता है) ऐसी स्मृति है।
यदि शंका हो कि उक्त 'प्रत्यक्षावगमम्' इत्यादि वाक्य 'पूर्णाहुत्या सर्वान् कामानवाप्नोति' (पूर्णाहूति से सम्पूर्ण कामों को प्राप्त करता है) इसके समान प्ररोचनामात्र है, क्योंकि अधिक श्रम होने पर ही अधिक फल प्राप्त होता है, ऐसा नियम है, तो उक्त नियम पर अन्वयव्यभिचार दर्शाते हैं।
बड़े भारी प्रयत्न से भी पत्थर से रत्न नहीं प्राप्त हो सकता और रत्न की परीक्षा में निपुण व्यक्तियों को परिश्रम के बिना भी प्रचुर लाभ होता दिखाई देता है। इस प्रकार व्यतिरेक व्यभिचार भी समझना चाहिए। जैसे जल से घड़ा परिमित है एवं जैसे लम्बाई चौड़ाई आदि परिमाण से वस्त्र परिमित है, वैसे ही पुरुषप्रयत्न भी परिमाणस्थ (आत्मतत्त्वसाक्षात्काररूपी फल की अवधि में स्थित) एवं परिमित है, अर्थात् उसकी अवधि (सीमा) तत्त्वसाक्षात्कार है। उक्त पुरुषप्रयत्न यदि सत् शास्त्र, सत्संग और सदाचार से युक्त होता है, तो अपना फल (तत्त्वसाक्षात्कार) देता है, यह उसका स्वभाव है। यदि वह सत्शास्त्र, सत्संग और सदाचार से रहित होता है, तो उससे फल की सिद्धि नहीं होती। पौरुष का यह स्वरूप है, इस प्रकार व्यवहार कर रहे किसी भी पुरुष का प्रयत्न भी विफल नहीं होता। दीनता और दरिद्रता से उत्पन्न दुःख से पीड़ित हुए नल, हरिश्चन्द्र आदि श्रेष्ठ पुरुष भी अपने पुरुषप्रयत्न से ही देवराज के सदृश हो गये हैं।।25-27।।
यदि बहुत परिश्रम की अपेक्षा नहीं है, तो पीछे पौरुष करेंगे, इसी समय उसकी क्या आवश्यकता है ? ऐसी शंका होने पर कहते हैं।
बाल्यावस्था से लेकर भलीभाँति अभ्यस्त शास्त्र, सत्संग आदि गुणों द्वारा पुरुषप्रयत्न से () स्वार्थ (तत्त्वसाक्षात्कार) प्राप्त होता है, सहसा किये गये शास्त्राभ्यास, सत्संग आदि से वह प्राप्त नहीं किया जा सकता।
जब तक आत्मसाक्षात्कार नहीं होता तभी तक पुरुषप्रयत्न करना अतीव आवश्यक है। आत्मतत्त्वसाक्षात्कार होने पर पुरुष के प्रयत्न की समाप्ति हो जाती है, इसलिए पुरुषप्रयत्न असीम नहीं है, किन्तु ससीम है।
वे तो कोमल काँटे के समान हैं। भाव यह कि जैसे कोमल काँटे से पैर में चुभा हुआ काँटा नहीं निकाला जा सकता वैसे ही सहसा अभ्यस्त शास्त्र आदि से तत्त्वसाक्षात्कार नहीं किया जा सकता। हम जीवन्मुक्त लोगों ने इस बात को प्रत्यक्षतः देखा है, उसका अनुभव किया है, सुना और साधनों से उपार्जित किया है, जो लोग उसे दैवाधीन कहते हैं, वे मन्दमति हैं और विनष्ट हैं।।28,29।।
यदि ऐसा है तो सभी लोग क्यों यत्न नहीं करते, इस पर कहते हैं।
अनर्थ (दुर्गति) का कारण होने या अर्थ (उन्नति) विघातक होने के कारण अनर्थकारी आलस्य यदि जगत में न होता, कौन पुरुष बड़ा धनी और विद्वान नहीं होता अर्थात् सभी धनी और विद्वान होते। आलस्य के कारण ही यह सागरपर्यन्त सम्पूर्ण पृथिवी निर्धनों और नरपशुओं से परिपूर्ण है। इसलिए आलस्य का परित्याग कर बाल्यावस्था से ही मनुष्य को सत्संग, शास्त्राभ्यास आदि में जुट जाना चाहिए, यही सर्वश्रेष्ठ मार्ग है।।30।।
यद्यपि अत्यन्त बाल्यावस्था से सत्संग आदि नहीं किये जा सकते फिर भी यौवनारम्भ से ही प्रयत्न करना उत्तम है, ऐसा कहते हैं।
चपल बालकों द्वारा की गई क्रीडाओं से अति चंचल बाल्यावस्था के बीत जाने पर गुरुसेव आदि में समर्थ भुजाओं से अलंकृत अवस्था से (यौवनावस्था से) लेकर पद-पदार्थ ज्ञान में निपुण (व्युत्पन्न) पुरुष गुरु, सतीर्थ्य, अपने से अधिक ज्ञाताओं के संग से अपने गुणों का (भक्ति, दया आदि का), दोषों का (राग-द्वेष आदि का) विचार (शान्ति आदि से अन्त में कल्याण होता है और राग आदि से अनर्थ की प्राप्ति होती है, इस प्रकार का पर्यालोचनरूप विचार) करें।।31।। श्रीवाल्मीकि जी ने कहाः महामुनि श्रीवसिष्ठजी के यों कहने पर दिन बीत गया और सूर्य भगवान अस्ताचल के शिखर पर गये। मुनिसभा महामुनि वसिष्ठजी को प्रणाम कर सायं सन्ध्योपासना, अग्निहोत्र आदि करने के लिए स्नानार्थ चली गई और रात्रि बीतने पर सूर्योदय होते-होते श्रीवसिष्ठजी के पास पुनः आ गई()।।32।।
इसकी व्याख्या यों भी है वाल्मीकि जी ने कहा, यह अरिष्टनेमी के प्रति देवदूत की उचित है, वाल्मीकि जी के उक्त प्रकार से भरद्वाज के प्रति कहने पर दिन अस्त हो गया, सूर्य भगवान् अस्ताचल के शिखर चले गये एवं मुनियों की सभा वाल्मीकि जी को नमस्कार कर सायंकालीन सन्ध्योपासना, अग्निहोत्र आदि करने के लिए स्नानार्थ चली गई और रात्रि के बीतने के अनन्तर सूर्योदय होने पर पुनः वाल्मीकि जी के पास आ गई। टीकाकार का कहना है कि यदि इस प्रकार अर्थ न किया जायेगा तो आगे तत्-तत् स्थलों में जो दशरथ सभा के उत्थान का वर्णन, आह्निक कर्मानुष्ठान वर्णन, रात्रि में राम आदि के साथ श्रुत अर्थ के चिन्तन का वर्णन, एवं प्रातः सूर्योदय आदि का वर्णन किया गया है, वह असंगत हो जायेगा।

पाँचवाँ सर्ग समाप्त
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बुधवार, 3 अक्टूबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 28 (मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण)


चौथा सर्ग
मुक्तों के अनुभव से सदेह और विदेह मुक्तियों में समानता वर्णन और ज्ञान की दृढ़ता के लिए शास्त्रीय पौरुष की प्रशंसा।
नित्यमुक्तस्वभाव आत्मा का अज्ञानरूप आवरण ही बन्धन है और ज्ञान से उसका विनाश ही मुक्ति है। जैसे यह चित्रलिखित बाघ है, सचमुच नहीं है, ऐसा ज्ञान हो जाने पर बाघ का डर नहीं रहता प्रत्युत उसे देखने में आनन्द ही आता है, वैसे ही अज्ञान के नष्ट हो जाने पर यह दृश्यमान व्यवहार कौतूहल का ही कारण होता है, अनर्थ का हेतु नहीं होता, इसलिए जीवन्मुक्ति और विदेहमुक्ति में कोई अन्तर नहीं है, इस प्रकार पूर्व शंका का समाधान करके प्रस्तुत आत्मतत्त्व का विस्तार से उपदेश देने के लिए पहले मूल की दृढ़ता के लिए पुरुषार्थ का समर्थन करते हैं।
वसिष्ठजी ने कहाः हे सौम्य, जैसे समुद्र में जलकी निश्चलावस्था में और तरंगित दशा में जलत्व एक-सा ही है, उसमें किसी प्रकार का अन्तर नहीं है वैसे ही विदेहमुक्त और जीवन्मुक्त मुनि की स्वस्वरूप में अवस्थिति तुल्य ही हैं।।1।।
मुक्ति चाहे सदेह हो अथवा विदेह हो, वह विषयाधीन तो कदापि नहीं है। यदि मुक्ति स्वर्ग आदि के समान विषयाधीन होगी, तो वह भी उसी प्रकार विषयों के वैषम्य से अवश्य विषम होगी। यह भाव है। यदि कोई कहे कि फिर भी उक्त दोनों मुक्तियों में भोक्तृत्व और अभोक्तृत्व से जनित अन्तर तो है ही, क्योंकि सदेह मुक्ति में देहस्थिति भोग के लिए ही है, इस पर कहते हैं।
जिसने सत्यत्वबुद्धि से भोगों का आस्वादन ही नहीं किया, उसमें भोग्य की अनुमति कहाँ से होगी अर्थात् भोगों में सत्यत्वबुद्धि से भोक्तृत्व के अभिमान से भोग का आस्वादन करने पर भोगकृत अन्तर होगा, किन्तु असंग उदासीन आत्मैकत्वदर्शी में उक्त अभिमान ही नहीं है।।2।।
तब ये सन्देह कैसे हैं, इस पर कहते हैं।
जीवनमुक्त मुनिश्रेष्ठ श्रीवेदव्यासजी को सदेह के सदृश केवल हम अपनी कल्पना से सामने देखते हैं, इन्हें अपने विदेहत्वनिश्चय के प्रति किसी प्रकार का विघ्न नहीं है। आशय यह कि यद्यपि हम लोग अपनी कल्पना से इन्हें सदेह-सा देखते हैं तथापि ये अपने निश्चय से विदेह ही हैं, अतएव अपने अनुभव से इनमें कोई अन्तर नहीं है। ज्ञानरूपी (चिन्मय) सदेहमुक्त (जीवन्मुक्त) और विदेहमुक्त में क्या भेद है ? अर्थात् अज्ञान ही भेदक है, उसके नष्ट होने पर केवल ज्ञान के अवशिष्ट रहने पर भेदक कौन है ? कोई नहीं। जल की तरंगावस्था में जो जल है, वही सौम्यावस्था में (निश्चलावस्था में) भी है, उसमें कोई अन्तर नहीं है।।3,4।।
जल में कदाचित अस्वच्छता, मलिनता आदि से जनित अन्तर भी हो सकता है, ऐसी शंका से दूसरे दृष्टान्त द्वारा उक्त अर्थ का समर्थन करते हैं।
सदेह और विदेह मुक्ति में तनिक भी भेद नहीं है जैसे कि वेगवान् और वेगरहित वायु वायु ही है उसमें कुछ भी अन्तर नहीं है()।।5।।
इस श्लोक में अनन्तर कुछ पुस्तकों में - 'मयोक्तं केवलीभावं तत्तत्स्मरणजीवनम्। सदेहस्य विदेहस्य समतैव सदा शिवा।।' यह श्लोक अधिक है। इसका यह अर्थ है – यदि कोई कहे कि वेगवान वायु शीतल, वृक्ष, लहर आदि के कम्पका (चंचलता का) हेतु है और त्वचा इन्द्रिय से जाना जाता है और वेगरहित वायु उससे विपरीत है, इस प्रकार उन दोनों में भेद है ही, इसलिए भेदशून्य सदेह और विदेह मुक्ति में सस्पन्द और निःस्पन्द वायु का दृष्टान्त कैसे देते हैं ? उस पर कहते हैं। और विदेह मुक्ति में सस्पन्द और निःस्पन्द वायु का दृष्टान्त कैसे देते हैं ? उस पर कहते हैं।
सदेहमुक्ति, विदेहमुक्ति, बन्धन, मुक्ति आदि व्यवहार भी कल्पना से ही होते हैं परमार्थ दृष्टि से नहीं होते – ऐसा कहते हैं।
हमारी और श्री व्यासजी की दृष्टि में सदेहमुक्ति अथवा विदेहमुक्ति परमार्थ वस्तु नहीं है, किन्तु द्वैतशून्य आत्मैक्य ही परमार्थ वस्तु है। उसकी प्राप्तिरूप ज्ञान-फल में कोई भेद नहीं है, इसलिए ज्ञान में अनित्यफलतारूप दोष की आशंका का अवसर ही नहीं है, ज्ञान का उदय होने पर देहपात की आपत्ति भी नहीं हो सकती, क्योंकि विरोधी अंश का ही ज्ञान से बाध होता है, प्रारब्ध कर्म का फल होने से देहधारण प्रारब्धकर्म-फल ज्ञान के सदृश है और ज्ञान का उपजीव्य है, इसलिए देहधारण का ज्ञान के साथ किसी प्रकार का विरोध नहीं है, जैसे उपादानभूत निद्रा का नाश होने पर भी स्वप्न के संस्कारों की कुछ का तक अनुवृत्ति देखी जाती है, वैसे ही अज्ञान का ज्ञान से विनाश होने पर जब तक प्रारब्ध कर्म रहता है तब तक देह आदि की स्थिति उपपन्न होती है, यह भाव है।।6।।
हे रामचन्द्र, आप सर्वत्र तत्-तत् द्रष्टान्तों के स्मरण का विवक्षित सारभूत अंश वस्तु की स्वरूप से अप्रच्युति हैं, ऐसा जानो, अविवक्षित कार्यभेदकृत विलक्षणता की कल्पना मत करो और कानों को अति प्रिय लगने वाले, अज्ञानरूपी अन्धकार का विनाश करने वाले, जिस उत्तम ज्ञान का मैं उपदेश दे रहा हूँ, उक्त प्रस्तुत ज्ञान को ही तुम सुनो।।7।।
भाव यह कि उक्त दृष्टान्त एक अंश में है, सब अंशों में नहीं। यहाँ पर सदेहमुक्ति की और विदेहमुक्ति की एकता उपमेय है, उनके सादृश्य के लिए कथित सस्पन्द और निःस्पन्द वायु की एकता उपमान है उसका विवक्षित सारभूत अंश उपमेय के सादृश्य को उल्लसित करने वाला केवली भाव है, परिस्पन्द के त्याग से केवल एक अंश से – ऐक्यसादृश्यरूप से – उपमेयको उपमा का विषय समझो। ऐसी अवस्था में सदेहमुक्त और विदेहमुक्त की सदा कल्याणकारिणी समता ही है। इस प्रकार अवान्तर सन्देह के निवृत्त होने पर प्रस्तुत कथा का अवसर दर्शाते हैं। श्री शुकदेव आदि शम, दम आदि साधनों से परिपूर्ण थे, अतएव उन्हें श्रवण का फल ज्ञान तदुपरान्त विदेहमुक्ति प्राप्त हुई, आधुनिक पुरुष उक्त साधनों का सम्पादन करने में समर्थ नहीं है, अतः उन्हें श्रवण का फल कैसे प्राप्त होगा ? ऐसी शंका होने पर संसार में ऐसा कोई पदार्थ नहीं है जो पुरुष के प्रयत्न से साध्य न हो, यह कहते हैं।
हे रघुनन्दन, इस संसार में भली भाँति निरन्तर किये गये प्रयत्न से सबको सदा सब पदार्थ मिल सकते हैं। जहाँ कहीं प्रयत्न में विफलता देखी जाती है, वहाँ पर निरन्तर प्रयत्न का अभाव ही कारण है। शास्त्रविहित शारीरिक, वाचिक और मानसिक कर्मों से होने वाली चित्तशुद्धि द्वारा जायमान ज्ञान की प्राप्ति होने पर हृदय में, चन्द्रमा के समान, काम, क्रोध आदि सन्ताप से शून्य जीवन्मुक्तिसुखमुद्रा उदित होती है। श्रुति भी कहती है-'स एको ब्रह्मणः आनन्दः। श्रोत्रियस्य चाकामहतस्य।' (कामनाशून्य ब्रह्म विद्वरिष्ठ का आनन्द और ब्रह्म का आनन्द एक ही है) और स्मृति भी है - 'यच्च कामसुखं लोके' (लोक में जो वैषयिक सुख है और जो महान् स्वर्गीय सुख है, वे दोनों तृष्णाक्षय से उत्पन्न परमानन्द की सोलहवीं कला को भी प्राप्त नहीं होते) उक्त सम्पूर्ण सुख पुरुषप्रयत्न से ही प्राप्त हो सकता है, अन्य से (दैव आदि से) नहीं, इसलिए पुरुष को प्रयत्न पर ही निर्भर रहना चाहिए।।8,9।।
भाग्य के प्रतिकूल होने पर पुरुषप्रयत्न व्यर्थ देखा जाता है और 'श्रेयांसि बहुविघ्नानि' ऐसा लोकप्रवाद भी है, अतः पुरुषप्रयत्न से फल की आशा करना दुराशा ही है, ऐसी शंका कर दैव का (भाग्य का) पौरुष में अन्तर्भाव और दुर्बलत्व के अभिप्राय से उसका खण्डन करते हैं।
क्रिया द्वारा दूसरे देश में पहुँचाता हुआ और तृप्ति कराता हुआ, गमन, भोजन आदि पुरुषप्रयत्न प्रत्यक्षतः क्रियारूप फलवाला देखा गया है। दैव को प्रत्यक्षतः किसी ने नहीं देखा। वस्तुतः वह कुछ है ही नहीं, अज्ञानमोहित मूढ़ पुरुषों की वह कोरी कपोलकल्पनामात्र है।।10।।
वह पौरुष (पुरुषप्रयत्न) क्या है, जिसकी आप इतनी बड़ी प्रशंसा करते हैं ? इस  प्रश्न पर कहते हैं।
शास्त्रज्ञ सज्जन पुरुषों द्वारा उपदिष्ट रीति से जो मानसिक, वाचिक और कायिक चेष्टा की जाती है, वही पौरुष है, वह सफल है, उससे भिन्न जो मन, वचन और शरीर की चेष्टा है वह उन्मत्त की चेष्टा है।।11।। जो मनुष्य जिस पदार्थ की अभिलाषा करता है, उसकी प्राप्ति के लिए भी यत्न करता है। यदि बीच में ही उसका त्याग न कर दे, तो वह क्रमशः उसको अवश्य प्राप्त करता है।।12।।
मूल में 'क्रमात्' पद कहीं पर विघ्नों द्वारा कार्य का विघात शास्त्रोक्त क्रम का त्याग करने से ही होता है, यह सूचित करने के लिए है। भाव यह कि सांगोपांग कर्म करने से अवश्य फलप्राप्ति होती है।
उक्त नियम को ही विविध दृष्टान्तों से दृढ़ करते हैं।
कोई एक प्राणी ही पुरुषप्रयत्न से तीनों लोकों के महा ऐश्वर्य से अतिरमणीय इन्द्रपदवी को प्राप्त हुआ है। कोई चिदुल्ला (चित् उत्कर्ष से उत्कृष्ट) () प्राणी ही पौरुष प्रयत्न से कमलासन में स्थित होकर ब्रह्मा के पद को प्राप्त हुआ है।
सत्वगुण की उत्कृष्टता से चैतन्य का उत्कर्ष होता है। ब्रह्माजी का सत्त्वगुण अन्यों की अपेक्षा उत्कृष्ट है, इसी कारण उनमें तन्मूलक चैतन्य भी सर्वोत्कृष्ट है। ब्रह्मा भी पूर्वकल्प में सामान्य जीव थे, तपस्या के बल से वे इस कल्प में ब्रह्मा हुए हैं।
सारभूत अपने पुरुषार्थ से ही कोई पुरुष गरूड़ध्वज होकर पुरुषोत्तमता को प्राप्त हुआ है। अपने पुरुषार्थ से ही, कोई देही, अर्धनारीश्वर बनकर चन्द्रशेखरता को प्राप्त हुआ है। पौरुष दो प्रकार का है, एक पूर्वजन्म का और दूसरा इस जन्म का। आधुनिक पुरुषार्थ द्वारा पूर्व जन्म का पुरुषार्थ शीघ्र तिरस्कार को प्राप्त होता है।।13-17।।
आधुनिक अल्प पुरुषार्थ अनेक करोड़ कल्पों से उपार्जित अनन्त प्राक्तन कर्मों पर विजय कैसे प्राप्त करता है ? इस पर कहते हैं।
निरन्तर प्रयत्न करने वाले, दृढ़ अभ्यासवाले एवं प्रज्ञा और उत्साह से युक्त पुरुष प्रलय में अधिकार रखने वाले देवताओं की पदवी को प्राप्त होकर महान् मेरू पर्वत तक को निगल जाते हैं, मटियामेट कर डालते हैं, प्राक्तन (पूर्व जन्म के) पौरुष की तो बात ही क्या है ? भाव यह कि यद्यपि प्राक्तन कर्म अनन्त हैं, फिर भी उनका मूल एक ही है उनके मूल का नाश करने से उन पर बड़ी आसानी से विजय प्राप्त की जा सकती है। श्रुति आदि से नियन्त्रित (श्रुत्यनुसारी) पुरुषार्थ का ही अवश्य सम्पादन करने वाली पुरुष की जो निरन्तर उद्योगशीलता है, वही अभीष्ट सिद्धि देने वाली होती है। शास्त्रविधि के प्रतिकूल पुरुषार्थ का उपार्जन करने वाली पुरुष की उद्योगशीलता अनर्थकारिणी होती है।।18,19।।
महाधनी, प्रबल और महामति लोगों को प्राप्त होने वाला पौरुष निर्धन, निर्बल और अल्पबुद्धिवाले लोगों को कैसे प्राप्त होगा ? ऐसी शंका पर उनको भी स्वशक्ति के अनुरूप निरन्तर पौरुष से इस जन्म में या जन्मान्तर में विपुल धन आदि सम्पत्ति से उक्त पौरुष शास्त्रीय प्रयत्न और शास्त्रीय प्रयत्न में ढिलाई करना-इन दोनों के फल में बड़ा अन्तर दिखलाते हैं।
पुरुष जब शास्त्रीय यत्न को शिथिल करता है, तब स्वाभाविक रागादि दोषों से असन्मार्ग में आसक्ति होने के कारण दारिद्रय, रोग, बन्धन आदि दुर्दशा में, जबकि अपने हाथ आदि भी अपने काबू में नहीं रहते, अंगुलियों को खूब तोड़ मरोड़कर बनाये गये चुल्लु के चुल्लूभर जल से मुँह में पड़े हुए एक बूँद जल को भी दुर्लभ होने के कारण अधिक समझता है, वही जब शास्त्रीय प्रयत्न में दृढ़ रहता है, तब धर्म के उत्कर्ष से प्रियव्रत महाराज के समान सात द्वीपों की एक छत्र आधिपत्य दशा में अवश्य पोषणीय पुत्र आदि के लिए यथायोग्य दायभाग का विभाग करने में समुद्र, पर्वत, नगर और द्वीपों से व्याप्त विशाल पृथ्वी को भी अधिक नहीं समझता।।20।।

चौथा वर्ग समाप्त
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सोमवार, 1 अक्टूबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 27 (मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण)


तीसरा सर्ग
श्रीरामचन्द्रजी की शंका के निराकरण के बहाने स्थूल आदि जगत के अध्यारोप और अपवाद से प्रत्यगात्मरूप विषय की सिद्धि।
इस प्रकार पूर्व वृत्तान्त का सम्पूर्णतया स्मरणकर विस्तारपूर्वक उसको कहने के लिए प्रस्तुत श्रीवसिष्ठजी सदगुरुस्मरणरूप मंगल करते हुए एवं विद्या के सम्प्रदाय की शुद्धि को दर्शाते हुए शिष्य श्रीरामचन्द्रजी के ध्यान को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए पुनः प्रतिज्ञा करते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहाः मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रजी, पहले सृष्टि के आरम्भ में भगवान् श्री ब्रह्माजी ने सांसारिक सकल दुःखों की निवृत्ति के लिए जिस ज्ञान का उपदेश दिया था, उसी को मैं कहता हूँ, उससे अन्य नहीं।।1।।
इससे संप्रदायशुद्धि कही।
इस प्रकार प्रतिज्ञापूर्वक अपने उपदेश श्रवण की ओर श्रीरामचन्द्रजी का ध्यान आकृष्ट किया गया, मन में अन्य जिज्ञासा के रहने पर श्रीगुरु के उपदेश पर ध्यान नहीं रहेगा, अतः सूचीकटाहन्याय से पहले उत्पन्न सन्देह की निवृत्ति के लिए प्रार्थना कर रहे श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः भगवन्, श्रीव्यासजी के अवशिष्ट लोगों के समान जीवभाव में दिखलाई देने से एवं शुकदेव जी की मुक्ति सुनने से उत्पन्न हुए इस सन्देह को पहले क्षणभर में दूर कर दीजिये, इस सन्देह की निवृत्ति के अनन्तर विस्तीर्ण मोक्षसंहिता को कहिएगा।।2।।
उक्त सन्देह को ही दर्शाते हैं।
श्रीशुकदेवजी के पिता और गुरु महामति सर्वज्ञ ये व्यासजी कैसे विदेहमुक्त न हुए और इनके पुत्र श्रीशुकदेवजी कैसे मुक्त हो गये ?।।3।।
यदि कहिए कि यह सन्देह ही नहीं बन सकता है, सो नहीं कह सकते, क्योंकि आत्यान्तिक दुःख विनाश से उपलक्षित (युक्त) निरतिशय स्वप्रकाशमात्र शेष रहना ही विदेहमुक्ति है और वही ज्ञान का फल है। वह यदि सर्वज्ञ श्रीव्यासजी को प्राप्त नहीं हुई, तो ज्ञान अनित्यफल हो जायगा अर्थात् ज्ञान से मुक्तिरूप फल अवश्यंभावी न होगा। दूसरी बात यह भी है कि यदि ज्ञान से अज्ञान निःशेष नष्ट हो गया, तो भृगु आदि के समान जीवन नहीं रह सकेगा, क्योंकि अज्ञानरूप उपादान के नष्ट होने से कार्य नहीं रह सकता और जीवन न रहने पर ब्रह्मविद्या के उपदेश न रहने से ब्रह्मविद्या का प्रवर्तक सम्प्रदाय ही विच्छिन्न हो जायेगा। यदि ज्ञान से अज्ञान उच्छिन्न न हुआ, तो मोक्षअभाव सिद्ध ही है। कर्म के तुल्य ज्ञान अदृष्ट के द्वारा मरण के पश्चात फल नहीं देता, क्योंकि वह कर्म के तुल्य विधेय नहीं है, कारण कि ज्ञान तीनों कालों में अखण्डरूप से स्थित है, इस प्रकार जीवन्मुक्ति की सिद्धि नहीं हो सकती, यह सारांश है। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी द्वारा पूछे गये भगवान् वसिष्ठ, जब तक श्रीरामचन्द्रजी बन्ध की अविद्याजन्यता, विद्या का स्वरूप और उसके साक्षी अपरिच्छिन्न सर्वाधार चैतन्यस्वरूप को नहीं जानते, तब तक जीवन्मुक्ति में इनका विश्वास नहीं हो सकता, इसलिए पहले उनका उपपादन कर, तदुपरान्त इनके प्रश्न का समाधार करूँगा, यों विचार कर सुबोध होने के कारण पहले साक्षी में स्थूलप्रपंचपरम्परा का अध्यारोप दिखलाते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहाः सम्पूर्ण जगत् का प्रकाशक सूर्य अर्क कहलाता है। सूर्य () आदि सम्पूर्ण जगत् का प्रकाशक परमात्मा परमार्क हुआ। उक्त परमार्क रूपी प्रकाश के अन्दर त्रिजगतरूपी (अनन्त कोटि ब्रह्माण्डरूपी) त्रसरेणु () स्थित हो होकर लीन हो गये हैं, उनकी गिनती नहीं हो सकती।।4।।
"यैन सूर्यस्तपति तेजसिद्धः", "न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम्" अर्थात् जिस परमात्मारूप तेजसे दीप्त होकर सूर्य तपता है और उस तेजस्वरूप परमात्मा में न सूर्य प्रकाशित होता है, न चन्द्रमा और न तारे ही प्रकाश को प्राप्त होते हैं, इत्यादि श्रुति-स्मृतियाँ हैं।
त्र्यणुक। परमाणुद्वयेनाणुस्त्रसरेणुस्तु ते त्रयः (ब्र. वै. पु.), अणुर्द्वौ परमाणुस्यात्त्रसरेणुस्त्रयः (भा.3/12/5) अर्थात् दो परमाणु = एक अणु और तीन अणु = त्रसरेणु।
जो कोटि कोटि त्रिजगते इस समय विद्यमान हैं, उनमें भी कोई किन्हीं की गिनती नहीं कर सकता।।5।।
परमात्मारूपी महासागर में जगतसृष्टिरूपी जो तरंग होंगे, उनकी गिनती करने के लिए भी वाणी में सामर्थ्य नहीं है। इस कथन से भूत, भविष्यत और वर्तमान जगत का अध्यारोप दर्शाया। पूछे गये विषय की उपेक्षा कर अन्य विषय को कह रहे श्रीगुरुजी का गूढ़ आशय मैंने भली-भाँति जान लिया, यों गुरु की उत्साहवृद्धि के लिए अपनी कुशलता को सूचित कर रहे श्रीरामचन्द्रजी उक्त भूत, भविष्यत और वर्तमान सृष्टियों में कुछ विलक्षणता कहते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः जो जगत्सृष्टिपरम्पराएँ अतीत हो गयी हैं और जो आगामी हैं, उनका विचार करना तो ठीक है, परन्तु वर्तमान जो सृष्टियाँ हैं वे किसके सदृश हैं, अर्थात् वे न भूत के सदृश हैं और न भविष्यत के सदृश हैं। वर्तमान सृष्टिपरम्परा में दोनों की समानता नहीं है, अतः उनकी श्रेणी में वर्तमान सृष्टि की विवेचना करना ठीक नहीं है। आशय यह कि यद्यपि वर्तमान सृष्टियाँ विशेषरूप से (तत्तदव्यक्तित्त्वरूप से) असंख्य हैं, तथापि कालतः न्यनूसंख्यक होने के कारण विदित ही हैं। इस प्रकार आपने यह दर्शाया कि अनन्त आगन्तुकों का उपादान आत्मतत्त्व अनन्त, अद्वितीय, अनागन्तुक और चैतन्यस्वरूप है। यह मैं जान गया हूँ।।6,7।।
इस प्रकार अतिगूढ़ अभिप्राय के परिज्ञान द्वारा उसमें विशेष बात के कथन से श्रीराम द्वारा प्रोत्साहित पूर्वोक्त स्थूल प्रपंच के मिथ्यात्वबोधन के लिए सूक्ष्म प्रपंचमात्रता ही है, यों दर्शाने वाले वसिष्ठजी कहते है।
पशु-पक्षी, मनुष्य, देवता आदि प्राणियों में से जो जिस स्थान पर और जब भी नाश को प्राप्त होता है, वह प्रत्यगात्मा उसी स्थान में तभी वक्ष्यमाण (कहे जाने वाले) त्रिजगत् को देखता है। अर्थात् न तो दूसरे स्थान में देखता है और न कालान्तर में।।8।।
वह किस सामग्री से और किस स्वरूप से युक्त होकर देखता है ? इस पर कहते हैं।
आतिवाहिक () नामक चित्त, अहंकार, मन, बुद्धि, दस इन्द्रियों और प्राण से घटित वासनामय सूक्ष्मशरीर से अपने हृदयरूपी आकाश  ही वासनामय त्रिजगत का अनुभव करता है और भ्रान्ति से वासनामय तत्-तत् शरीरों को क्रमशः प्राप्त होता है। वस्तुतः वह पूर्वोक्त चिदाकाशस्वरूप अतएव जन्मादिविविकाररहित है।।9।।
अतिवहनम्-अतिवाहः अर्थात् धूम, अर्चिरादि मार्गों के अभिमानी देवताओं द्वारा परलोक में पहुँचाना, उक्त कर्म में जो दक्षहै, वह आतिवाहिक कहलाता है।
शंका – तेन प्रद्योतेनैष आत्मा निष्कामति चक्षुषो वा मूर्घ्नो वाऽन्येभ्यो वा शरीरदेशेभ्यस्तमुत्क्रान्तं प्राणोऽनुत्क्रामति।
(उस हृदय के अग्रभाग के प्रकाशन के साथ निकलता हुआ आत्मा चक्षु से या मस्तक से अथवा अन्यान्य शरीर-प्रदेशों से निकलता है, उसके निकलने पर प्राण भी उसका अनुसरण करता है) और 'उत्क्रान्तं स्थितं वाऽपि' (निकल रहे या स्थित) इत्यादि अनेक श्रुति और स्मृतियों के विरूद्ध मृत का अपने हृदय में ही परलोकदर्शन कैसे कहते हैं ?
समाधान – कर्म और उपासना से होने वाले भावी व्यवहार दृष्टि से वे श्रुतियों और स्मृतियाँ हैं अर्थात् कर्म और उपासना से होने वाले भावी फल के अनुसार बाहर निकलने के मार्ग अनेक प्रकार के हैं, यह दर्शाने के लिए उक्त श्रुति और स्मृतियाँ हैं – जिसे सूर्यलोक में जाना होता है वह चक्षु से, जिसे ब्रह्मलोक में जाना होता है वह ब्रह्मरन्ध्र से और जिसे अन्यान्य स्थानों में जाना होता है वह अन्यान्य शरीर के अवयवों से निष्क्रान्त होता है। यहाँ पर तो परमार्थदृष्टि से 'अस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते' (इस हृदयाकाश में द्यौ और पृथिवी भली-भाँति स्थित हैं) इस श्रुतिवाद के समान हृदय में ही परलोककी कल्पना की जाती है। आत्मा के व्यापक होने से उसका आवास हृदय भी अपरिच्छिन्न हुआ, अतः हृदय-साक्षी में हृदयरूप परिच्छेद को दूरकर निष्क्रियत्व और प्रपंच में केवल वासनामयत्य का ज्ञान कराने के लिए, परलोक के समान उत्क्रमण और गमन की भी वहीं पर (हृदय में ही) कल्पनामात्र से उपपत्ति हो सकती है, अतः उक्त श्रुति और स्मृति से कोई विरोध नहीं है।
एक स्थान में दर्शाई गई युक्ति को सर्वत्र दर्शाते हैं।
इसी प्रकार करोड़ों प्राणी मर चुके हैं, मरते हैं और मरेंगे, वे मृत्यु के पहले जीवन-दशा में जिस सम्पूर्ण जगत का दर्शन करते हैं-दृश्यसमूह देखते हैं-उनमें से जिस दृश्य में उनकी वासना (संस्कार) जड़ पकड़ लेती है, मृत्युकाल में उनके हृदयाकाश में वही दृश्य उदित होता है, मरण के अनन्तर उन्हें वही दृश्य जगत् (योनि) प्राप्त होता है ()। सारांश यह कि यह सम्पूर्ण जगत वासनाविशेष के विलास से अतिरिक्त कुछ नहीं है।।10।।
'यद् यद् भवन्ति तदाभवन्ति' (व्याघ्र, सिंह आदि जो पहले हुए थे वे फिर आकर वे होते हैं।  करोड़ों युगों का व्यवधान पड़ने पर भी संसारी जीव की पहले भावित वासना नष्ट नहीं होती) 'यं यं स्मरन् भावम्' (जिस जिस भाव का स्मरण कर अन्त में जीवन त्याग करता है उस भाव को प्राप्त होता है) इत्यादि श्रुति और स्मृतियाँ इस विषय में प्रमाण हैं।
इस प्रकार जगत् के वासनामय होने पर जो फलित हुआ अर्थात् परमार्थ दृष्टि से उसमें भ्रमरूपता प्राप्त हुई, उसका वर्णन कहते हैं।
यह जगत् संकल्प से निर्मित की नाईं, मनोराज्य के विलास की नाईं, इन्द्रजाल से रचित माला की नाईं, उपन्यास के अर्थ के प्रतिभास की नाईं, वातरोग से प्रतीत होने वाले भूकम्प की नाईं, बालक को डराने के लिए कल्पित भूत की नाईं, निर्मल आकाश में कल्पित मुक्तावली की (मोतीमाला की) नाईं, नावकी गति से प्रतीत होने वाली वृक्षों की गति की नाईं, स्वप्न में देखे गये नगर की नाईं, अन्यत्र दृष्ट के स्मरण से आकाश में कल्पित पुष्प की नाईं भ्रमकल्पित है। मृत पुरुष इसका अपने हृदय में स्वयं अनुभव करता है।।11-13।।
ऐसी परिस्थिति में भगवान वेदव्यासजी का वैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत् (जाग्रत और स्वप्न आदि में अबाधितविषयत्व और बाधितविषयत्वरूप विलक्षणता है, अतएव जाग्रत-ज्ञान स्वप्नादिज्ञान के समा निर्विषय नहीं है) यह सूत्र कैसे संगत होगा एवं भोक्ता के जाग्रतकाल में स्वप्न से विपरीत जो चिरकाल तक नियत व्यवहार आदि होते हैं और जो उनमें सत्यता प्रतीत होती है, उसकी क्या गति होगी ? इस पर कहते हैं।
जीव ने जीवनावस्था में जो जगत् देखा था, मृत्यु के अनन्तर उसी का उसको स्मरण होता है और फिर जन्म होने पर उसी का वह अनुभव करता है। जगत् यद्यपि पूर्वोक्त प्रकार से असत् है, फिर भी अति परिचय से दृढ़ता को प्राप्त होकर जीवाकाश में प्रकाशित होता है।।14।।
अव्यवस्थितस्वभाव का होने के कारण भी जगत् मिथ्या है, ऐसा दर्शाने के लिए कहते हैं।
जन्म, जन्म से लेकर मरण तक की चेष्टाएँ और मरण का अनुभव करने वाला जीव उसी में इहलोक की कल्पना करता है, जैसा की ऊपर बतलाया गया है और मरण के अनन्तर उसी में परलोक की कल्पना करता है। वासना के अन्दर अन्य अनेक देह और उनके मध्य में और अन्यान्य देह इस संसार में, ये केले के तने त्वचा के समान एक के पीछे एक और एक के पीछे एक इस प्रकार शोभित होते हैं।।15,16।।
इस प्रकार मिथ्यात्व के सिद्ध होने पर प्रपंच के निषेध से अवशिष्ट आत्मा की सिद्धि है, इस अभिप्राय से कहते हैं।
न पृथिवी आदि पंच महाभूत हैं, न जगत् और जगत् का क्रम (सृष्टिक्रम) ही है अर्थात् ये सब मिथ्या है, फिर भी मृत और जीवित जीवों को इनमें जगत्-भ्रम होता है। ज्ञान के बिना इनका उच्छेद नहीं हो सकता। इस प्रकार प्रपंच के निषेध से अवशिष्य आत्मा की सिद्धि हुई।।17।।
मूलोच्छेद के बिना, केवल अपलापमात्र से, उसकी निवृत्ति नहीं हो सकती, ऐसा मन में रखकर अविद्या में उच्छेद्यत्व को बतलाने के लिए सूक्ष्मरूप से व्यत्पादित्त प्रपंच में कारणीभूत अविद्यामात्रता ही है, ऐसा कहते हैं।
मूढ़ों द्वारा तैरने के अयोग्य, विविध शाखा-प्रशाखाओं से युक्त अतएव अनन्त यह अविद्या लगातार हो रहे सृष्टिरूप तरंगों से युक्त विशाल नदी है।।18।।
अविद्या आदि सम्पूर्ण पदार्थों की कल्पना का अधिष्ठान कहते हैं।
हे राम, अतिविस्तृत परमार्थ सत्य (परमात्मा) रूपी महासागर में वे प्राचीन और नूतन सृष्टिरूपी तरंग बार-बार प्रचुरमात्र में चक्कर काटते हैं, उत्पत्ति और लय को प्राप्त होते हैं उनमें से कुछ तो कुल, क्रम, मन और गुणों से सर्वथा समान होते हैं, कुछ आधी समानता रखते हैं और कुछ बिल्कुल निराले (अत्यन्त विलक्षण) होते हैं।।19,20।।
प्रस्तुत शंका के समाधान के उपोदघात (भूमिका) रूप से जगत् की व्यवस्था और प्रस्तुत शास्त्र के विषय को कहकर शंका के समाधान का उपक्रम करते हैं।
अठारह पुराण और महाभारत आदि के निर्माणरूप कार्यों से प्रसिद्ध यथोचित्त जन्म, शास्त्रविज्ञान और ब्रह्मविद्या से उपलक्षित सर्वशास्त्रविशारद ये वेदव्यासजी उक्त सृष्टिरूपी तरंगों में बत्तीसवें हैं, ऐसा मैं स्मरण करता हूँ।।21।।
उन बत्तीसों में भी आवान्तर भेद कहते हैं।।
उन अनके तरंगों से ब्रह्मविद्, ब्रह्मविद्वर, ब्रह्मविद्वरीयान् और ब्रह्मविद्वरिष्ठ इस प्रकार प्रसिद्ध चार भेदों में चतुर्थ स्थान में न पहुँचने के कारण अल्पबुद्धि बारह तरंग कुल, आकार, जीवन, चेष्टा आयु सर्वांश में समान हैं, दस ज्ञानादि विषय में भी समान हैं, और शेष वंश में विलक्षण हैं()। पूर्वसदृश और उनसे विलक्षण व्यास तथा वाल्मीकि आगे होंगे, यही बात भृगु, अंगिरा और पुलस्त्य आदि अन्यान्य ऋषियों के विषय में दुहराई जा सकती है अर्थात् वे भी पूर्वसदृश और उनसे विलक्षण होंगे। मनुष्य, देवर्षि और देवता बार बार उत्पन्न और विलीन हुए हैं, होते हैं और होंगे।
तात्पर्य यह है कि सृष्टि के आरम्भ से श्रीरामचन्द्रजी के समय तक अनेक बार अनेक व्यास जन्मे हैं। उनमें सभी व्यास न द्वैपायन थे और न महाभारतआदि के कर्ता थे। इसलिए कहा जा सकता है कि कोई कोई वंश और कार्य के समान थे और कोई कोई अर्धसमान थे इत्यादि। महाभारत आदि ग्रन्थों के कर्ता द्वैपायन व्यास प्रत्येक द्वापर में अवतीर्ण होते हैं। पूर्व मन्वन्तर के आरम्भ से लेकर वर्तमान वैवस्वत मन्वन्तर के आरम्भ तक 32 द्वापर व्यतीत हो गये हैं, उनमें 32 व्यासावतार हुए हैं। उन बत्तीस अवतारों में से इनके दस अवतार हमारे प्रत्यक्ष हैं और अन्यान्य अवतार परोक्ष में हुए हैं।
ये लोग पहले भी इस प्रकार के आकार से सम्पन्न थे, इस समय भी वैसे ही हैं इसके पश्चात भी इस देह की अपेक्षा भिन्न-भिन्न देहों में जन्म ग्रहण करेंगे।।22-24।।
हे राम, ब्रह्मकल्प का अवयवरूप यह त्रेतायुग इस समय है। पहले अनेक बार हो गया है और आगे भी होगा। जैसे इन त्रेता युगों में कितनी ही बार तुमने रामरूप धारण किया था एवं आगे आने वाले त्रेतायुगों में कितनी बार तुम रामरूप में अवतार लोगे, इसकी कोई सीमा नहीं है। मैं भी कितनी बार वसिष्ठमूर्ति धारण कर चुका हूँ, इस समय भी वसिष्ठरूप में विद्यमान हूँ और आगे भी कितनी ही बार वसिष्ठरूप में अवतीर्ण होऊँगा। इन रूपों में कोई पूर्व के तुल्य होंगे और कोई उनसे भिन्न। यही बात अन्यान्य साधारण लोगों के विषय में कही जा सकती है। मैंने अदभुत कर्म करने वाले दीर्घदर्शी महामुनि इन श्रीव्यासजी का क्रमशः यह दसवाँ अवतार देखा है अर्थात् इन्हें दस बार जन्मते देखा है। हे राम, हम लोग कितनी ही बार व्यास, वाल्मीकि के साथ एकत्रित हुए और कितनी ही बार ये हम लोग पृथक-पृथक उत्पन्न हुए। हम लोगों ने कभी सदृशरूप में और कभी भिन्नरूप में जन्म ग्रहण किया। हम लोग आगे भी कितनी बार भिन्न आकारों में और समान अभिप्रायों में जन्म ग्रहण करेंगे। कभी हम लोगों ने अभिज्ञ होकर जन्म ग्रहण किया है और कभी अनभिज्ञ होकर। ये व्यासजी इस जगत् में और आठ बार उत्पन्न होकर महाभारतनामक इतिहास का प्रचार, वेदविभाग, कुलप्रथा का पालन और ब्रह्मा के अधिकार को प्राप्त कर विदेहमोक्ष को प्राप्त होंगे।।25-30।।
श्रीव्यासदेव जी की वर्तमान काल में भी जीवन्मुक्तता दिखलाते हैं।
इस समय भी ये श्रीव्यासजी वीतशोक, निर्भय, सब प्रकार की कल्पनाओं से शून्य, प्रशान्तचित्त, निर्वाण सुख को प्राप्त अर्थात् बन्धन से विनिर्मुक्त हैं, अतएव ये जीवनमुक्त कहे गये हैं। कभी जीवन्मुक्त प्राणी वित्त, बन्धु, बान्धव, अवस्था, कर्म, विद्या, विज्ञान और चेष्टाओं से तुल्य होते हैं और कभी तुल्य नहीं होते, कभी सैंकड़ों बार उनका जन्म होता है और कभी बहुत कल्पों में एक बार भी उनका जन्म नहीं होता। इस माया का अन्त नहीं है। जैसे तौलने के लिए पुनः पुनः बराबर तराजू में भरी जाती हुई धान्यराशि में पहले जिस क्रम से बीज रहे थे, उस क्रम से नहीं रहते, ऊपर नीचे हो जाते हैं वैसे ही यह बहुत से प्राणियों का समूह विपर्यासको (परिवर्तन को) – पूर्वजन्म के क्रम तथा अवयवसंनिवेश की अपेक्षा विपरीत क्रम और देहसंगठन को – प्राप्त होता है। कालरूप महासागर तरंग पूर्वजन्म के अवयव संगठन अथवा क्रम से भिन्न अवयवसंगठन अथवा क्रम से सृष्टि के रूप में आविर्भूत होते हैं।।31-35।।
जीवन्मुक्त पुरुष योगबल से आधिकारिक विविध शरीर धारण करने पर भी मुक्तिस्वरूप से च्युत नहीं होता, ऐसा कहते हैं।
अविद्यारूपी आवरण से रहित विद्वान समाहित चित्त, विकल्पविरहित स्वरूपभूत सार से ओतप्रोत अर्थात् चिन्मय एवं परम शान्तिरूपी अमृत से तृप्त रहता है। चंचलता, विकल्प, असार देहआदि रूपता, अशान्ति और अतृप्ति अविद्यारूपी आवरण से होती है उक्त आवरण के नष्ट हो जाने से चित्त समाहित हो जाता है विकल्प नष्ट हो जाते हैं, चिन्मयता प्राप्त हो जाती है और परमशान्तिरूपी सुधा से तृप्ति प्राप्त हो जाती है। निष्कर्ष यह कि जीवन्मुक्ति ही ज्ञान का फल है और वह ज्ञान से ही होती है, अन्य कर्म आदि से नहीं।।36।। 

तीसरा सर्ग समाप्त
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