मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

बुधवार, 26 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 23 (वैराग्य प्रकरण)


बत्तीसवाँ सर्ग
श्रीरामचन्द्रजी के वचनों को सुनने वाले लोगों के प्रचुर आश्चर्य का तथा देवताओं द्वारा की गई पुष्पवृष्टि का वर्णन।

श्रीवाल्मीकि जी ने कहाः कमल के सदृश नेत्रवाले राजकुमार श्रीरामचन्द्रजी के इस प्रकार मन के मोह को नष्ट करने वाले वचन कहने पर वहाँ पर बैठे हुए सब लोग आश्चर्य सागर में गोता खाने लगे, श्रीरामचन्द्रजी की वाणी सुनने के लिए मानों खड़े हुए उनके रोंगटों से उनके कपड़े छिद गये, वैराग्य की वासना से उनकी संसार की कारणभूत राग-द्वेष आदि सम्पूर्ण वासनाएँ नष्ट हो गईं और वे क्षणभर के लिए अमृतसागर की तरंगों में ओत-प्रोत से हो गये। श्रीरामचन्द्रजी की वे वाणियाँ सुनने में समर्थ लोगों ने ऐसे ध्यान से सुनीं कि वे निश्चलता के कारण चित्रलिखित से प्रतीत होते थे और हार्दिक आनन्द से उनका वदन प्रसन्न था। वे सुनने वाले थे, सभा में स्थित वसिष्ठ, विश्वामित्र आदि मुनि, मन्त्रणा करने में निपुण जयन्त, द्युष्टि आदि दशरथ आदि राजा महाराज, पर्शु आदि देशों के शासक, सामन्त, नगरवासी, भरत आदि राजकुमार, ब्रह्मवेत्ता ब्राह्मण, नौकर-चाकर, अमात्य, पिंजड़े में स्थित पक्षी, निश्चल क्रीडामृग (मनोविनोद के लिए पाले गये मृग), घास-दाना न चबा रहे घोड़े, अपने महल के झरोखे पर बैठी हुई, निश्चल अतएव आभूषणाओं के शब्दों से रहित कौशल्या आदि रानियाँ, बगीचे की लताओं में और महल के अग्रभाग में (कबूतर आदि के रहने के स्थान में) रहने वाले, पंखों को तनिक भी न हिला रहे एवं चुपचाप पक्षी, आकाशचारी सिद्ध, गन्धर्व, किन्नर एवं नारद, व्यास, पुलह आदि मुनिश्रेष्ठ उक्त महानुभावों ने और उनसे अतिरिक्त देवता, दिकपति देवराज आदि, विद्याधर तथा शेषनाग प्रभृति नागों ने श्री रामचन्द्रजी की विचित्र अर्थों से परिपूर्ण वे उदारतम वाणियाँ सुनीं।।1-11।।
रघुकुलरूपी आकाश के उज्जवल चन्द्रमा और चन्द्रमा के सदृश सुन्दर कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी जब उक्त गम्भीर वचन कहकर चुप हो गये तब चारों ओर से उनकी प्रशंसा के पुल बँध गये, वाह वाह से आकाश गूँज उठा और साथ ही साथ सिद्धों ने आकाश से ऐसी घनी पुष्पवृष्टि की कि पुष्पवृष्टि के कारण चारों ओर चँदवा सा बँध गया। उक्त मन्दार के पुष्पों के मध्य में विश्राम ले रही भँवरों की जोड़ी की गुनगुनाहट से गुलजार थी, पुष्पवृष्टि की मधुर सुगन्ध और सुन्दरता से मनुष्यों का चित्त उनके अधीन नहीं रह गया था। वह पुष्पवृष्टि क्या थी मानों आकाशवायु से गिराये गये तारों की पंक्ति थी, पृथिवी में गिरी हुई अप्सराओं के हास की छटा थी, बरस चुके अतएव तर्जन-गर्जन से रहित और बिजली से दैदीप्यमान मेघों के छोटे-छोटे टुकड़ों की झड़ी थी, फेंके गये मक्खन के पिण्डों की परम्परा थी, मोतियों के हारों की राशि के समान विशाल हिमवृष्टि थी, चन्द्रमा के किरणों की माला थी और क्षीरसागर के लहरों की श्रेणी थी। उस पुष्पवृष्टि में प्रचुर केसर से पूर्ण कमलों की अधिकता थी और उसके चारों ओर भँवर मँडराते थे तथा वह स्पर्शसुखसूचक लोगों की सीत्कार ध्वनि से गा रहे, अतिसुगन्धित और मन्द होने के कारण सुख स्पर्शवाले वायु से कुछ-कुछ हिल रही थी। उस पुष्पवृष्टि में कहीं पर केतकी के फूल लहलहा रहे थे, तो कहीं पर सफेद कमलों की छटा शोभित हो रही थी, तो कहीं पर कुन्द के फूल अधिक मात्रा में गिर रहे थे और कहीं पर केवल नीले कमलों की ही वृष्टि हो रही थी। फूलों की लगातार वृष्टि से आँगन, घर, छत और चौतरे सबके भर गये थे, नगर के सभी नर-नारी ऊपर गर्दनकर पुष्पवृष्टि की छटा को देखते थे। मेघरहित होने के कारण नीलकमल के सदृश स्वच्छ आकाश से गिरी हुई वह पुष्पवृष्टि अभूतपूर्व थी, अतएव उसने सभी के चित्त को आश्चर्यमग्न कर दिया था। आकाश में अदृश्य सिद्धों द्वारा की गई उक्त पुष्पवृष्टि आधी घड़ी तक लगातार होती रही। सभा और सभा में स्थित लोगों को आच्छन्न कर उक्त पुष्पवृष्टि के बन्द होने पर सभा में स्थित लोगों ने सिद्धों का आगे कहा गया वार्तालाप सुनाः हम लोग सृष्टि के आरम्भ से लेकर स्वर्ग के इस छोर से उस छोर तक अनेकानेक सिद्धों में विचर रहे हैं, पर हमने आज ही कानों को अमृत के समान प्रिय लगने वाले या वेदों के सारभूत ये वचन सुने हैं। विरक्त होने के कारण रघुवंशदीपक श्रीरामचन्द्रजी ने जो उदार वचन कहे, उन्हें वाचस्पति भी नहीं कह सकते हैं। खेद है कि जिन लोगों ने ऐसे वाक्य सुने उनका जन्म वृथा है। यह बड़े सौभाग्य की बात है कि हमें श्रीरामचन्द्रजी के मुखारविन्द से निर्गत एवं चित्त को अत्यन्त आह्लादित करने वाले ये वचन सुनने को मिले। श्रीरामचन्द्रजी ने शान्तिप्रद, अमृत के समान सुन्दर एवं जाति, कुल, चरित्र, धर्माभिज्ञता आदि द्वारा प्राप्त उत्तमता के द्योतक जो वचन आदरपूर्वक कहे, उनसे हमको भी तुरन्त 'स्वर्ग आदि के सुखों में कुछ भी सार नहीं है', यह ज्ञान हो गया है।।12-27।।

बत्तीसवाँ सर्ग समाप्त
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मंगलवार, 25 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 22 (वैराग्य प्रकरण)


इकतीसवाँ सर्ग
सासांरिक जीवन वर्षाऋतु के मेघ के समान कुत्सित है, अतः संसार निर्मुक्तिपूर्वक सुखपदप्रापक उपाय का प्रश्न।
पूछे जाने वाले प्रश्नों के उपोदघातरूप से संसार में जीवन की वर्षाऋतु के मेघरूप से कल्पना करते हैं।
ब्रह्मन, इस संसार में जीव की आयु ऊँचे वृक्षों के चंचल पत्तों में लटक रहे, जलकण (ओस बिन्दु) के सदृश क्षणभंगुर एवं शिवजी के आभूषणरूप चन्द्रकला के सदृश अत्यल्प है(Ǿ)(दुर्लक्ष्य होने के कारण यदि कहा जाय कि उसका अस्तित्व नहीं है, तो भी कोई अतिशयोक्ति न होगी), तुच्छ देह धानों के खेतों में बोल रहे मेंढकों के गले के चमड़े के समान अस्थिर है, इष्ट-मित्र और बन्धु-बान्धवों का समागम सदगति का प्रतिबन्धक होने के कारण जाल की नाईं तने हुए झाड़ियों के समूह के सदृश हैं, वासनारूपी पूर्वी वायु से वेष्टित, तुच्छ आशारूपी बिजली से विभूषित और मोहरूपी निविड कुहरे से जनित मेघों के खूब जोर से तर्जन-गर्जन, पूर्वक वज्रपात करने पर, अति उग्र और चंचल लोभरूपी मयूर के ताण्डव नृत्य करने पर, अनर्थरूपी कुटजवृक्षों की कलियों के चटचट शब्दपूर्वक खूब विकसित होने पर, अतिक्रूरतम यमरूपी वनबिलाव के सम्पूर्ण प्राणिरूपी चूहों का अविरत संहार करने पर एवं लगातार मूसलाधार वृष्टि के किसी अनिर्दिष्ट स्थान से अपने ऊपर गिरने पर इस संसार में किस उपाय का अवलम्बन करना चाहिए ? कौन गति है?
Ǿ वर्षाऋतु में पूर्ण चन्द्रमा का भी कठिनाई से यदा कदा ही दर्शन हो जाता है फिर कलामात्र अवशिष्ट कृष्णपक्ष की चतुर्दशी के चन्द्रमा की दुर्लक्ष्यता में तो कहना ही क्या है ? उसका दिखाई देना ही आश्चर्य है।
किसका स्मरण करना चाहिए और किसकी शरण में जाना चाहिए(*)? जिससे कि यह जीवनरूपी अरण्य भविष्य में अकल्याणकारी न हो।।1-6।।
* जैसे अरण्य में प्राप्त आँधी, वृष्टि आदि से उत्पन्न क्लेश की निवृत्ति के लिए छाता, छप्पर, चटाई आदि उपाय हैं, पारदगुटिका, औषधिलेप आदि द्वारा शीघ्र वृष्टिरहित दूर देश में गति (गमन) होती है, संकट से बचाने वाले मन्त्र या देवता आदि का स्मरण होता है, पर्वत की गुफा का आश्रय लिया जाता है वैसे ही सांसारिक क्लेश की निवृत्ति के लिए भी क्या कोई उपाय, गमन, स्मरण और आश्रयम आदि साधन है ? यह अभिप्राय है।
भगवन्, तपःशक्ति और ज्ञानशक्ति से जिनकी बुद्धि की कोई सीमा नहीं है, ऐसे आप सरीखे महात्मा अति तुच्छ वस्तु को भी दिव्य बना सकते हैं। यह सामर्थ्य पृथिवी में मनुष्यों में एवं स्वर्ग में देवताओं में कहीं भी नहीं है। देखिये न ! यह आपके ही तपोबल और ज्ञानबल का प्रभाव है कि त्रिशंकु को कुलगुरू श्रीवसिष्ठजी द्वारा दिया गया शाप आकल्पस्थायी स्वर्गरूप में परिणत हो गया एवं शुनः शेप की मृत्यु दीर्घायु में परिणत हो गई। मुनिवर, यह निन्द्य संसार निरन्तर दुःखप्राप्ति से परिपूर्ण है, अतएव इसमें कुछ भी रस (स्वाद) नहीं है, कृपया बतलाइये कि यह किस उपाय से अज्ञाननिवृत्ति द्वारा सुस्वाद (सरस) बनता है ? जैसे फूलों से अत्यन्त रमणीय वसन्त के आगमन से पृथिवी मनोहर हो जाती है वैसे ही सम्पूर्ण दुःखों की एकमात्र कारण आशा के प्रसिद्ध स्वभाव से प्रतिकूल परिणामरूपी (पूर्णकामतारूपी) दुग्धस्नान से संसार सुखमय हो जाता है।।7-9।। महर्षे, काम से कलंकित मनरूपी चन्द्रमा विद्वान जनों द्वारा अनुभूत किस धोवन से (क्षालन से) धोया जाय जिससे कि उससे निर्मल (काम आदि मल से रहित) आनन्दरूपी चाँदनी उदित हो। जिसे संसार की अनर्थकारिता का अनुभव है और जो ऐहिक और लौकिक भोगों का विवेकजनित व्यवहार करना चाहिए कृपया उसका निर्दश कीजिए। भगवन्, क्या करने से रागद्वेषरूपी महाव्याधियाँ एवं प्रचुर भोगों से परिपूर्ण दुःखदायिनी सम्पत्तियाँ संसाररूपी समुद्र में विहार करने वाले प्राणी को क्लेश नहीं देतीं, कृपया उसे हमसे कहिए। हे धीर श्रेष्ठ ब्रह्मन्, जैसे अग्नि में गिरने से भी पारद रस जलता नहीं, वैसे ही अग्नि के तुल्य सन्ताप देने वाले संसार में पड़ने पर भी ज्ञानामृत से सुशोभित पुरुष किस उपाय का अवलम्बन करने से सन्ताप को प्राप्त नहीं होता, कृपया उसको मुझसे कहिए।।10-13।।
यदि व्यवहार से दुःख होता है तो व्यवहार का त्यागकर दीजिए ऐसी शंका होने पर कहते हैं।
जैसे सागर में उत्पन्न हुए मछली आदि जलजन्तुओं के प्राण जल के बिना नहीं रह सकते हैं, वैसे ही व्यवहारों के सम्पादन के बिना इस संसार में स्थिति नहीं हो सकती।।14।।
जैसे अग्नि की ज्वाला दाहरहित नहीं हो सकती है, वैसे ही इस संसार में ऐसा कोई सत्कर्म नहीं है, जो राग-द्वेष से रहित हो तथा सुख-दुःख से वर्जित हो अर्थात् सम्पूर्ण सत्कर्मों में किसी न किसी प्रकार राग-द्वेष का सम्बन्ध और सुख-दुःख का संसर्ग है ही।।15।।
बाह्य व्यवहार रहे, वह हमारा क्या बिगाड़ सकता है, मन की चंचलता ही परम दुःख है अतएव जिससे उसकी चिकित्सा हो, वही उपाय कहिए, ऐसा कहते हैं।
मुनिश्रेष्ठ, तीनों भुवनों में मन का विषयों से संसर्ग होना ही मन की सत्ता (अस्तित्व) है और उसका विषयों से सम्पर्क न होना ही उसकी सत्ता का विनाश (मन के अस्तित्व का अभाव) है और मन की सत्ता का विनाश सम्पूर्ण विषयों के बाधक तत्त्वज्ञान की उत्पत्ति में कारणभूत युक्ति के उपदेश के बिना नहीं हो सकता, इसलिए जब तक मुझ में तत्त्वज्ञान का उदय न हो तब तक मुझे उक्त युक्ति का बार बार उपदेश दीजिए। अथवा जिस युक्ति से, मेरे लोकव्यवहार में रत रहने पर भी, मुझे दुःख प्राप्त न हो, व्यवहार की उस उत्तम युक्ति का आप मुझे उपदेश दीजिए। युक्ति से मोह का (अज्ञान का) निराकरण पहले किस उत्तम चित्तवाले ने किया और किस प्रकार किया ? जिससे चित्त पवित्र होकर परम शान्ति को प्राप्त होता है। मोह की निवृत्ति के लिए जो कुछ आपको जानकारी हो उसे कृपाकर कहिये, जिसके अवलम्बन से अनेक साधु-सन्त पुरुष निर्वाण को प्राप्त हो गये हैं।।16-19।।
यदि मुझे उक्त युक्ति प्राप्त न होगी तो मैं मरणान्त अनशन आरम्भ कर दूँगा, जीवन के उपयोगी व्यवहार कदापि न करूँगा, ऐसा कहते हैं।
ब्रह्मन्, यदि वैसी कोई युक्ति है ही नहीं अथवा उसके विद्यमान रहने पर भी कोई महात्मा पुरुष मुझको उसका स्पष्ट रीति से उपदेश नहीं करता है या मैं स्वयं ही विचार कर उस सर्वश्रेष्ठ शान्ति को नहीं पा सकता हूँ, तो सम्पूर्ण चेष्टाओं का त्यागकर निरहंकारता को प्राप्त हुआ मैं न तो भोजन करूँगा, न जल पीऊँगा, न वस्त्र पहनूँगा, न स्नान, दान, भोजन आदि कर्म ही करूँगा और न सम्पत्ति और आपत्ति की अवस्था में किसी प्रकार के कार्य का अवलम्बन करूँगा। मुनिवर, देहत्याग को छोड़कर मैं और कुछ भी नहीं चाहता हूँ। मैं सम्पूर्ण शंकाओं, मोह-ममता, डाह-द्वेष आदि से शून्य होकर भित्ति में लिखित चित्र की नाईं मौन रहता हूँ। तदुपरान्त क्रमशः श्वास-उच्छवास क्रिया का त्याग कर अवयव संगठनरूप देहनामक इस अनर्थ का त्याग करता हूँ, इस देहरूप अनर्थ का न मुझसे कोई सम्बन्ध है, न मेरा इससे सम्बन्ध है और न मेरा और किसी से सम्बन्ध है, मैं तेलरहित दीपक की नाईं शान्त होता हूँ। मैं सम्पूर्ण पदार्थों का परित्याग कर इस अनर्थरूप देह का त्याग करता हूँ। श्रीवाल्मीकि जी ने कहाः जैसे मयूर बड़े-बड़े मेघों के सन्मुख केकावाणी (मयूर की वाणी) बोलकर, थकावट होने के कारण चुप हो जाता है, वैसे ही निर्मल चन्द्रमा के सदृश मनोहर एवं तत्त्वविचार से उदार चित्तवाले श्रीरामचन्द्रजी यों कहकर वसिष्ठ आदि गुरुओं के सामने चुप हो गये।।20-27।।

इकतीसवाँ सर्ग समाप्त
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सोमवार, 24 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 21


तीसवाँ सर्ग
अपने चित्त का उद्वेग दर्शा रहे श्रीरामचन्द्रजी द्वारा उसके निरास एवं शांति के लिए उपदेश की प्रार्थना।

हेतुओं द्वारा अपने चित्त की उद्विग्नता का विस्तारपूर्वक वर्णन कर रहे श्रीरामचन्द्रजी चित्तविश्रान्ति के हेतुभूत उपदेश की प्रार्थना करते हैं।
उक्त रीति से सैंकड़ों अनर्थों से परिपूर्ण संसाररूपी अँधे कुँए के छिद्र में सम्पूर्ण प्राणियों को मग्न देखकर मेरा मन चिन्तारूपी कीचड़ में फँस गया है। मेरा मन घूम सा रहा है और मुझे भय भी हो रहा है, अतएव मेरे अंग प्रत्यंग पुराने वृक्ष के पत्तों की नाईं काँप रहे हैं। जैसे निर्जन अरण्य में रहने वाली दुर्बल भर्तृका मुग्धा नारी पद पद में भयभीत और शंकित रहती है, वैसे ही उत्कुष्ट सन्तोषदायक धैर्यरूपी माँ की गोद न मिलने के कारण व्याकुल हुई मेरी बालबुद्धि भी इस संसार में पद पद में भयभीत और सशंक हो रही है। जैसे मृगगण विषमस्थान में लटक रहे तुच्छ तृणों के लोभ से वंचित होकर गड्ढे में गिर पड़ते हैं, वैसे ही असार विषयों से वंचित ये अन्तःकरण वृत्तियाँ विक्षेपरूप दुःखों की प्राप्ति के लिए दुःखरूप गड्ढे में गिरती है। अविवेकी पुरुषों की नेत्र आदि इन्द्रियाँ चिरपरिचित होने के कारण संसार की ओर ही पूर्णरूप से आकृष्ट है (संसार में ही उनकी दृढ़ वासना है), परमार्थ वस्तु के प्रति उनका तनिक भी आकर्षण नहीं है। अतएव वे बेचारी नेत्र आदि इन्द्रियाँ आत्मा के उद्धार में समर्थ नहीं हैं और अन्धकूप में गिरे हुए जीवों की नाईं दुःखी हैं। जैसे पति के अधीन कान्ता न तो उपराम को प्राप्त होती है और न स्वेच्छा से कहीं मन चाहे प्रदेश को ही जाती है, किन्तु पति के घर में ही रहती है, वैसे ही जीवरूपी पति की कान्ता चिन्ता भी न तो उपराम को प्राप्त होती है और न मन चाहे विषयों को ही प्राप्त होती है, किन्तु स्वपति जीव के प्रियस्थान हृदय में ही निवास करती है। जैसे मार्गशीर्ष मास के अन्त में लताएँ तुषार गिरने के कारण जीर्ण पत्तों को गिरा देती हैं, कुछ हरे पत्तों को धारण भी करती है, वैसे ही विवेक से विषयों को तुच्छ समझकर उनका त्याग कर रही और रस के (ђ) (राग के) शेष रहने के कारण कुछ विषयों को धारण कर रही मेरी धृति संकट को प्राप्त हो गई है।।1-7।।
ђ 'रसोऽप्यस्य परं दृष्टवा निवर्तते' (परमात्मा का साक्षात्कार कर इसका रस भी निवृत्त हो जाता है) इस भगवद् वचन के अनुसार परमात्मादर्शन के बिना रस की निवृत्ति नहीं हो सकती।
क्लेशदायिनी अपनी उसी अन्तरालावस्था का वर्णन करते हैं।
मेरी उक्त चित्त की अस्थिरता सांसारिक और पारमार्थिक सम्पूर्ण सुखों को गँवाकर स्थित है, क्योंकि संसार स्थिति आत्मा के विवेकमात्र से अर्थ बोध होने के कारण मुझे आधा छोड़कर आधा पकड़े हुए है अर्थात् न तो मैं पूर्ण ज्ञानी ही हूँ और न पूरा अज्ञानी ही, इसलिए अन्तराल में स्थित मुझे न ऐहिक सुख ही प्राप्त है और न पारमार्थिक ही। जैसे कटे हुए वृक्ष के ठूँठ द्वारा (स्थानु द्वारा) अन्धकार में सत्य कोटि और असत्य कोटिरूप यह ठूँठ है या चोर है, इस प्रकार स्थिरत्व और अस्थिरत्व प्रकार के संशय से लोगों की बुद्धि वंचित (भ्रमित) होती है वैसे ही आत्मतत्त्व के निश्चय से रहित (आत्मतत्त्वनिश्चय में सन्देहयुक्त) मेरी बुद्धि भी यह तत्त्व है या यह तत्त्व है, इस प्रकार के सन्देह से वंचित हो रही है। जैसे देवता विविध भोगसामग्रियों से परिपूर्ण, भुवनों में विहार करने वाले एवं शीघ्रगामी अपने विमान का परित्यागनहीं करते वैसे ही स्वभावतः चंचल नानाभोगसामग्रियों से परिपूर्ण भुवनों में परिभ्रमण से अधिक चपलता को प्राप्त मेरा मन भी चंचलता को नहीं छोड़ता है। मैं उसे जबरदस्ती रोकना चाहता हूँ, पर तत्त्वज्ञान न होने के कारण मैं ऐसा नहीं कर सकता हूँ। इसलिए हे मुनिनायक, परमार्थ सत्य, जन्म मरण आदि दुःखों से शून्य, देहादि उपाधि से विरहित, भ्रम से रहित वह विश्रान्ति-स्थान कौन है, जिसे प्राप्त कर शोक नहीं होता। हमारे ही समान दृष्ट और अदृष्टरूप फलदायक सम्पूर्ण कर्मों के अनुष्ठाता एवं लौकिक व्यवहार में तत्पर जनक आदि महापुरुष कैसे उत्तम पद को प्राप्त हुए ? हे परसत्कारकारिन्, इस संसार में वह कौन सा उपाय है, जिससे कि संसाररूपी पंक अर्थात् पुण्य-पापरूपी पंक का या शोकमोहरूपी पंक का अनेक बार शरीर से सम्पर्क होने पर भी मनुष्य उससे लिप्त नहीं होता ? महामहिमाशाली, वीतराग एवं जीवन्मुक्त आप लोग किस दृष्टि का अवलम्बन कर इस संसार में विचरते हैं ? प्राणियों को भयभीत करने के लिए लुभा रहे नश्वर (ф) विषय सर्पों के सदृश हैं, भला वे कल्याणकारी कैसे हो सकते हैं ?
ф मूलस्थित 'भंगुराकारविभवाः' का विषयपक्ष में – विनाशशील आधार और विभववाले और सर्पपक्ष में कुटिक आकार और विषशक्ति से युक्त, यह अर्थ है।
मोहरूपी हाथी द्वारा विलोडित, काम आदिरूपी कीचड़ और सेवाल से व्याप्त प्रज्ञारूपी तालाब किस प्रकार तालाब किस प्रकार अत्यन्त निर्मलता को प्राप्त हो ? जैसे कमल के पत्ते से जल का सम्पर्क नहीं होता, वैसे ही संसारप्रवाह में व्यवहार करने पर भी पुरुष बन्धन को प्राप्त न हो, इसका क्या उपाय है ? इस सम्पूर्ण दृश्य प्रपंच को तत्त्वदृष्टि से आत्मा के समान और बाह्यदृष्टि से तृण के समान देख रहे एवं कामादि वृत्तियों का स्पर्श न कर रहे पुरुष कैसे श्रेष्ठता को प्राप्त होते हैं ? जिसने अज्ञानरूपी महासागर पार कर लिया है, ऐसे किस महापुरुष के चरित्र का स्मरणपूर्वक आचरण कर मनुष्य दुःखी नहीं होता ? अविनाशी होने के कारण प्राप्त करने के योग्य मोक्ष क्या है और कर्म उपासना आदि का उचित फल क्या है ? भला बतलाइय तो सही, इस विषम संसार में कैसे व्यवहार करना चाहिए ? प्रभो, मुझे तत्त्व का उपदेश दीजिए, जिससे मैं अव्यवस्थित ब्रह्मा की कृति जगत की पूर्वा पर वस्तु जानूँ अर्थात् जगत के आदि और अन्त में अवशिष्ट रहने वाला पारमार्थिक तत्त्व जानूँ। ब्रह्मन् जैसे मेरे हृदयरूपी आकाश के चन्द्ररूप साभार अन्तःकरण का मल (अज्ञान) हट जाय वैसा प्रयत्न आप निशंक होकर कीजिए। इस संसार में कौन वस्तु उपादेय (प्राप्त करने योग्य) है, कौन वस्तु अनुपादेय है और कौन वस्तु न उपादेय है और न अनुपादेय है। यह चंचल चित्त कैसे पर्वत के समान स्थिरता (शान्ति) को प्राप्त हो ? सैंकड़ों क्लेशों की सृष्टि करने वाली यह निन्दित संसाररूपी महामारी किस पवित्रतम मन्त्र से अनायास शान्ति को प्राप्त हो ? जैसे पूर्ण चन्द्रमा अत्यन्त आनन्द देने वाली शीतलता को प्राप्त करता है, वैसे ही मैं भी आनन्दरूपी वृक्ष की मंजरीरूप देशपरिच्छेद और कालपरिच्छेद से शून्य शीतलता को अपने हृदय में कैसे प्राप्त करूँ ? भगवन्, आप तत्त्वज्ञ और सज्जनशिरोमणि हैं, इसलिए अपने में पूर्णता को प्राप्त कर पूर्ण हुआ मैं जैसे इस लोक में फिर शोक को प्राप्त न होऊँ वैसा आप मुझे उपदेश दीजिए। महात्मन् जैसे वन में कुत्ते स्वल्प बल से युक्त जीवों की (क्षुद्र प्राणियों की) देह को अति पीड़ित करते हैं, वैसे ही विविध संशय सर्वोत्कृष्ट आनन्दमय ब्रह्मपद में आत्यान्तिक स्थिरता से रहित पुरुष को सदा अति पीड़ित करते हैं।।8-27।।
तीसवाँ सर्ग समाप्त
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रविवार, 23 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 20


उनतीसवाँ सर्ग
श्रीरामचन्द्रजी का दोषदर्शन से सम्पूर्ण पदार्थों में स्ववैराग्यवर्णन एवं चित्त की शांति के लिए तत्त्वोपदेश की प्रार्थना।

श्रीरामचन्द्रजी इस प्रकारदोषदर्शन से अपने चित्त में तत्त्वज्ञानजनक वैराग्य दर्शाते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः मुनिवर, इस प्रकार दोषदर्शनरूपी वनाग्नि से मेरा चित्त दग्धप्राय हो गया है अर्थात् उसमें पहले जो जगत के प्रति स्थायित्वबुद्धि भी थी या जगत् के प्रति प्रेम था, वह जल गया है, अतएव यह विवेक से परिपूर्ण है। जैसे जलाशयों में मृगजल का (सूर्य किरणों में जल बुद्धि का) उदय नहीं होता (मरूभूमि में ही मृगतृष्णा की प्रतीति होती है) वैसे ही उक्तरूप मेरे चित्त में भोग की आशा का उदय नहीं होता। जैसे छोटे-छोटे नीम के पेड़ काल की अधिकता से अर्थात् उत्तरोत्तर तिक्त, तिक्ततर और तिक्ततम होते हैं वैसे ही यह संसार भी हमारे प्रति दिन-प्रति दिन अधिकाधिक कटुता को प्राप्त होता है अर्थात् जैसे जैसे काल व्यतीत होता है, वैसे वैसे यह संसार हमारे प्रति कटुप्राय होता जाता है। भगवन्, मनुष्य का चित्त करंज वृक्ष (Ф) के फल के समान कठोरतम है।
Ф काँटेदार जंगली पेड़ है।
धर्म का अंशतः ह्रास और अधर्म की अंशतः वृद्धि होने के कारण उसमें दिन प्रतिदिन दुर्जनता बढ़ती जाती है और सज्जनता क्षीण होती जाती है। सूखी हुई उड़द की छीमी को तोड़ने में तो टंकार शब्द होता है पर संसार में दिन प्रतिदिन बिना टंकारशब्द के बड़ी शीघ्रता के साथ मर्यादा का भंग किया जा रहा है अर्थात् लोग संसार में उड़द की सूखी हुई छीमी के समान बड़ी शीघ्रता से मर्यादा भंग कर रहे हैं, केवल अन्तर इतना ही है कि छीमी को तोड़ने में शब्द होता है, पर मर्यादा को तोड़ने में शब्द भी नहीं होता। मुनिश्रेष्ठ, विविध मानसिक चिन्ताओं से परिपूर्ण प्रचुर भोगों से युक्त राज्यों की अपेक्षा चिन्ताशून्य महात्माओं द्वारा स्वीकृत एकान्तसेवन कहीं अच्छा है। उद्यान के दर्शन या विहार से मुझे प्रसन्नता नहीं होती, स्त्रियों से मुझे सुख नहीं होता और धनप्राप्ति से मुझे हर्ष नहीं होता। मैं मन के साथ उपशान्त होना चाहता हूँ, यही मेरी प्रबल इच्छा है।।1-6।।
शान्ति के सिवा दूसरा कोई भी सुख का साधन नहीं है, ऐसा कहते हैं।
पूज्यवर, यह संसार सुखरहित और विनाशी है, तृष्णा (विषयवासना) बड़ी तीव्र है और चित्त की चंचलता की कोई सीमा ही नहीं है, उससे शान्तिलाभ का आशा दुराशा ही है, मैं कैसे निवृत्तिलाभ करूँगा, यही मैं सदा विचार करता हूँ। न मैं मृत्यु का अभिनन्दन करता हूँ और न जीवन का ही अभिनन्दन करता हूँ। जिस अवस्था में स्थित होने से मैं लोकसन्ताप से निर्मुक्त हो जाऊँ, उसी अवस्था का मैं अवलम्बन करना चाहता हूँ वह चाहे जीवनावस्था में प्राप्त हो, चाहे मरने के पश्चात जब कभी हो, उसके लिए मैं व्यग्र नहीं हूँ। राज्य से मुझे क्या करना है, भोग से मेरा कौन प्रयोजन सिद्ध होगा, धन से मुझे क्या मतलब है, किसी प्रकार की चेष्टा से भी मेरा कोई प्रयोजन नहीं है। अहंकार वश इनकी उत्पत्ति होती है, मेरा वह अहंकार ही नष्ट हो गया है। इन्द्रियों का विषयों की आसक्ति से मुक्त होना बड़ा कठिन है, अतएव इन्द्रियाँ ठहरी कभी न सुलझने वाली दृढ़ ग्रन्थियाँ। उन ग्रन्थियों द्वारा जन्म की पंक्ति रूपी चमड़े की रस्सी में बाँधे गये जीवों से जो लोग उससे छुटकारा पाने के लिये यत्न करते हैं, वे ही श्रेष्ठ पुरुष हैं। जैसे हाथी अपने विशाल पैर के प्रहार से कमल को कुचल डालता है। वैसे ही कामदेव ने रमणियों द्वारा कोमल मन को मथ डाला है, नष्ट कर दिया है। मुनिश्वर, यदि इस बाल्यावस्था में निर्मल बुद्धि से चित्त की चिकित्सा नहीं की गई, तो फिर चित्त की चिकित्सा का अवसर कब आयेगा ? क्योंकि जब तक भलीभाँति जड़ न जमी हो तभी तक छोटा-सा वृक्ष उखाड़ा जा सकता, जब वह बद्धमूल हो जाता है, तब तो उसे उखाड़ना बड़ा कठिन हो जाता है, ऐसी लोकोक्ति है। कुटिल विषय ही विष है, प्रसिद्ध विष विष नहीं है, क्योंकि विष एक ही देह का अर्थात् जिस देह से उसका सम्बन्ध होता है, उसी का विनाश करता है मगर विषय तो अन्य जन्मों में भी देह को मृत्यु के मुँह में डालते हैं।।7-13।।
तत्त्वज्ञ पुरुष भी तो विषयों का भोग करते हुए सुखी आदि देखे जाते हैं, फिर उनमें कौन सी विशेषता है, ऐसी शंका होने पर कहते हैं।
सुख, दुःख, मित्र, बन्धु, बान्धव, जीवन और मरण ये सब यद्यपि बन्धन के कारण हैं, तथापि ये ज्ञानी के चित्त के बन्धक नहीं होते, इसका कारण यही है कि ज्ञानी इनके वश में नहीं होते।।14।।
अतः सम्पूर्ण दुःखों का मूलोच्छेदक होने के कारण ज्ञानी होना ही परम पुरुषार्थ है, अतः ज्ञानोपदेश की प्रार्थना करते हैं।
हे ब्रह्मन्, हे तत्त्वज्ञशिरोमणे, इसलिए जैसे मैं ज्ञानी होकर शोक, भय और खेद से शीघ्र मुक्त हो जाऊँ, वैसा उपदेश मुझे शीघ्र दीजिए।।15।।
शीघ्र उपदेश देने के लिए अपने में अतिशय दुःख की असहिष्णुता और वैराग्य में उत्कण्ठा दिखलाते हैं।
अज्ञाता भीषण अरण्य के सदृश हैं, जैसे अरण्य में मृगों को फँसाने के लिए जाल बिछे रहते हैं, चारों और काँटे बिखरे रहते हैं, जगह-जगह ऊँची-नीची भूमि रहती है, वैसे ही अज्ञता भी विषयवासनारूपी जालों से परिवेष्टित है, दुःखरूपी कण्टकों से आकीर्ण है और सम्पत्ति-विपत्ति से या स्वर्गनरकपरम्परा से पूर्ण है, इसलिए उससे मैं शीघ्र मुक्त होना चाहता हूँ। मुनिवर, यदि कोई मुझे आरे से चीरे, तो मैं आरे के दाँतों की रगड़ सहने के लिए समर्थ हूँ, लेकिन सांसारिक व्यवहार से उत्पन्न एवं आशा और विषयों से हुए संघर्ष को मैं सहने के लिए समर्थ नहीं हूँ। यह अभीष्ट है, यह सोचकर उसके निवारण में और यह इष्ट है, यह समझकर उसके सम्पादन में प्रवृत्ति-निवृत्तिव्यवहाररूप अविद्यारूप अंजन से उत्पन्न भ्रान्ति स्वभावतः चंचल चित्त को इस प्रकार कँपा डालती है जैसे वायु दीपक की लूर को कँपाती है। जीवसमूहरूपी मोती तृष्णारूपी अत्यन्त दैदीप्यमान मन ही उस माला में प्रधान (नायक) मणि है। वैराग्य आदि से सम्पन्न मैं जैसे रोषपूर्ण सिंह जाल को तोड़ डालता है, वैसे ही कालरूपी किटके आभूषण इस संसाररूपी हार को आपके उपदेश से उत्पन्न ज्ञान से-क्रोध, हिंसा आदि उग्र उपायों के बिना तोड़ता हूँ। तत्त्वज्ञशिरोमणे, हृदयकमल ही दुष्प्रवेश होने कारण अरण्य है, उसमें शीत और आवरण का हेतु होने के कारण कुहरे के तुल्य और उसमें आत्मतत्त्व के अन्वेषण के लिए प्रवृत्त हुए मन के अन्धकार की नाईं विवेकरूपी नेत्र को बन्द कर देने वाले अज्ञान को सुखकर उपदेशरूपी सूर्य से नष्ट कर दीजिए। महात्मन्, जैसे चन्द्रमा से रात्रि का अन्धकार नष्ट होता है, वैसे ही उत्तम पुरुषों की संगति से प्राप्त उपदेश से जिनका विनाश नहीं होता, ऐसी दुष्ट मानसिक चिंताएँ इस जगतीतल में हैं ही नहीं अर्थात् जैसे चन्द्रमा रात्रि के अन्धकार को नष्ट कर देता है, वैसे ही महात्मा पुरुषों की संगति से प्राप्त उपदेश भी सम्पूर्ण क्लेशों को नष्ट कर देता है।।16,22।।
अभी तुम बालक हो, इसलिए तुममें शम, दम आदि की दृढ़ता नहीं है। यदि तुम्हें हमने तत्त्वज्ञान का उपदेश दे भी दिया, तो वह फलीभूत नहीं होगा, ऐसी शंका की निवृत्ति के लिए श्रीरामचन्द्रजी अपने में शम की दृढ़ता दिखलाते हैं।
आयु वायु से टकराये हुए मेघों के समूह से टपक रहे जल के समान भंगुर है, भोग बादलों में चमक रही बिजली के समान चंचल हैं और यौवन में होने वाले चित्तविनोद जल के वेग के समान चपल हैं, ऐसा शीघ्र विचार कर अर्थात् आयु, भोग, यौवन आदि में तृष्णा, चंचलता आदि दोषों से दुःख, नाश आदि अनर्थ जानकर उनका त्यागकर मैंने इस बाल्यावस्था में भी सम्पूर्ण दोषों से रहित शान्ति के लिए अपने हृदय के विषय में अटल अधिकार की मुहर दे रक्खी है।।23।।
भाव यह है कि जैसे राजा अधिकार लोलुप बहुत से व्यक्तियों में से जिनसे लोभ, कायरता आदि दोषों के कारण राज्य में प्रजापीड़न, शत्रु द्वारा आक्रमण आदि की आशंका होती है, उन्हें छोड़कर किसी एक गुणवान और शक्तिशाली व्यक्ति को अधिकारमुद्रा सौंपता है, वैसे ही मैंने भी पूर्वोक्त प्रकार से समर्थ शान्ति के लिए अपने चित्त के विषय में दृढ़ अधिकार मुद्रा दे रक्खी है।

उनतीसवाँ सर्ग समाप्त
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