मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 5



सोलहवाँ सर्ग
श्रीरामचन्द्रजी द्वारा चित्त और मन के विविध दोषों का युक्तियों और दृष्टान्तों से विस्तारपूर्वक वर्णन।

अहंकार के समान चित्त और मन भी सुख हेतु नहीं हैं, किन्तु दुःख हेतु ही हैं, ऐसा कहते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः 'हे मुनिवर, महापुरुषों की सेवा मुक्ति का द्वार है' ऐसा वचन है इसलिए सज्जनों (मुमुक्षुओं) द्वारा अवश्य करणीय महात्माओं की सेवा के बिना काम आदि दोषों से चित्त की शिथिलता को (चंचलता को अर्थात् पुरुषार्थ साधन  अपटुता को) प्राप्त होता है। चंचल चित्त वायु प्रवाह में पतित मयूर की पूँछ के अग्रभाग की नाईं स्थिर नहीं रहता, इधर-उधर घूमता रहता है। मन भी प्राणवायु के अधीन और चंचल है, ऐसा आगे कहेंगे।।1।।
उपर्युक्त कथन को ही दृष्टान्त द्वारा स्फुट करते हैं।
अत्यन्त व्याकुल चित्त युक्त और अयुक्त विचार के बिना इधर-उधर दूर से भी दूर प्रदेश तक, ग्राम में कुत्ते की नाईं, घूमता है कहीं पर भी अपनी पूर्ति के उपाय को न पाकर दीन-हीन बना रहता है अर्थात् जैसे कुत्ते अपने उदर की पूर्ति के लिए व्यग्रचित्त होकर ग्राम में घूमते हैं, अभीष्ट वस्तु न पाकर दीन-हीन बने रहते हैं।।2।। पहले तो उसे कहीं पर कुछ मिलता ही नहीं। कदाचित दैवयोग से प्रचूर धन प्राप्त होने पर भी न पाये हुए के समान वह अतृप्त ही रहता है जैसे करण्डक (बांस या बेंत से बना हुआ पात्र) जल से नहीं भरता, वैसे ही अन्तःकरण भी पूर्ण नहीं होता अर्थात् जैसे बांस की शलाका और बेंत की सींकों से बनी हुई टोकरी आदि पात्र जल से भरने पर भी पूर्ण नहीं होता, छिद्रों से जल के निकल जाने से उसमें कुछ भी जल नहीं रहता, वैसे ही व्यग्रचित्तवाले अशान्त लोगों का अन्तःकरण भी पूर्ण नहीं होता।।3।। जैसे अपने सजातीयों के झुण्ड से बिछुड़ा हुआ एवं बन्धन में पड़ा हुआ मृग सुख को प्राप्त नहीं होता, वैसे ही सब प्रकार से शून्य (मिथ्या) नित्य दुराशारूप रज्जु से वेष्टित मन कभी सुख को प्राप्त नहीं होता।।4।। हे मुने, तरंगों के समान चंचल वृत्ति को धारम कर रहा मेरा मन स्थूल और सूक्ष्म अवयवों के छेद के सिवा एक क्षण के लिए भी अपने स्थान पर स्थिरता को प्राप्त नहीं होता। विषयों के अनुसन्धान से विविध क्षोभ को प्राप्त हुआ मेरा मन मथनकाल में मन्दराचल के आघात से उच्चलित क्षीरसागर के जल के समान दसों दिशाओं में दौड़ता है, किन्तु सुख कहीं पर भी नहीं पाता।।5,6।। भोगों की प्राप्ति के हेतुभूत उत्साहरूप कल्लोलों से जिसने डूबने लायक आवर्त बना रक्खे हैं, मायारूप भोगों की प्राप्ति के हेतुभूत उत्साहरूप कल्लोलों से जिसने डूबने लायक आवर्त बना रक्खे हैं, माया रूप (परंवंचनारूप) मगरों से परिवेष्टित मनरूप महासमुद्र को अपने वश में करने के लिए मैं असमर्थ हूँ।।7।। ब्रह्मन्, मनरूपी हरिण नरक की परवाह न कर भोगरूपी दूब के तिनकों की अभिलाषा से युक्त होकर तीव्र वेग से बहुत दूर तक दौड़ता है, अर्थात् जैसे मृग गर्त में गिरने की चिन्ता न कर दूबके तिनकों के लोभ से वेग के साथ बहुत देर तक दौड़ते हैं, वैसे ही मेरा मन नरकपतन का भय छोड़कर भोगलाभ की आशा से बहुत दूर तक दौड़ता है।।8।। जैसे समुद्र अपनी चंचलता का त्याग नहीं करता, वैसे ही चित्तासक्त और चंचलस्वभाव मेरा मन भी स्थूल और सूक्ष्म अवयवों के विनाश का त्याग नहीं करता।।9।। जैसे पिंजड़े में बँधा हुआ सिंह विविध चिन्ताओं से पूर्ण होकर चंचल चित्तवृत्ति से एक जगह स्थिर नहीं रह सकता, वैसे ही विविध चिन्ताओं से अतिचपल और चंचल वृत्ति से युक्त मेरा मन भी एक जगह धैर्य को नहीं प्राप्त हो रहा है।।10।।
चित्त स्वतः ही चपलस्वभाव है, विविध चिन्ताओं द्वारा और भी विचलित किया जाता है, इसलिए हठपूर्वक उसका विरोध करने पर भी वह धैर्य को प्राप्त नहीं होता, यह भाव है।
जैसे हंस जल से दूध को निकाल लेता है, वैसे ही मेरा मोह रूपी रथ पर सवार मन भी इस शरीर से उद्वेगरहित समतारूप सुख को हर लेता है। अर्थात् उत्कर्ष और अपकर्ष औपाधिक हैं (उपाधिकल्पित हैं) अतएव परमार्थरूप से सब प्राणियों में आत्मा एकरूप से(Ω) विद्यमान है।
Ω एकात्मविज्ञान की अभयपद और समतासुख है। साम्यसुख ही नित्य और निरतिशय है। उससे अतिरिक्त जो कुछ है वह सभी असार और दुःखप्रद है। देहात्मविज्ञान सबसे बढ़कर असार है। इस शरीर में सार और असार दोनों विद्यमान हैं, परंतु मोहग्रस्त मन असार का ही ग्रहण करता है, सार का ग्रहण नहीं करता।
जीवन्मुक्तों द्वारा उक्त प्रकार से अनुभूत आत्मा की एकरूपता ही समतासुख कही जाती है। मन के मोहाक्रान्त होने पर इस शरीर में पहले से प्राप्त भी उस समतासुख को मन ग्रस लेता है। और असार (तुच्छ) देहमात्र में आत्मभाव बच जाता है, यह भाव है।
हे मुनिनायक, चित्त की आत्माभिमुखी वृत्तियाँ (स्वभाव) विविध द्वैत विषयों में आसक्तिकल्पनारूप शय्या पर सोई हुई हैं, वे बोध देने वाले शास्त्र और आचार्य के उपदेश के बिना केवल अपनी बुद्धि से किये गये हजार बार के विचार से भी नहीं जागती। उन वृत्तियों के न जागने से व्याकुल हुआ मैं सन्तप्त हूँ।।12।। जिसमें 'यह मैं हूँ' और 'यह मेरा है' इस प्रकार अन्योन्यतादात्म्याध्यास और अन्योन्यसंसर्गध्यासरूप दृढ़ ग्रन्थियाँ पड़ी हैं, ऐसे भोगस्पृहारूपी जाल में स्थित मैं अपने-आप चित्त द्वारा बाँधा गया हूँ, जैसे की अनाज के दानों के लोभ से पक्षी बहलिए द्वारा जाल से बाँधा जाता है।।13।। मुने, जैसे दुःसह धूम और ज्वाला से युक्त अग्नि सूखे तृण को जला डालती है, वैसे ही विस्तारित कोपरूपी धूम से युक्त चिन्तारूपी ज्वाला से व्याप्त चित्त से मैं जलाया गया हूँ।।14।। जैसे क्रूर और तृष्णा के समान सदा भूखी कुत्ती के पीछे चलने वाला कुत्ता शव को खा जाता है, वैसे ही निष्ठुर और तृष्णारूपी भार्या के पीछे चलने वाला चित्त अज्ञता को  प्राप्त हुए मुझको खा गया है।।15।।
मुनिवर, जैसे तरंगों से चंचलवृत्तिवाला जल का वेग तट के वृक्ष को उखाड़ कर फेंक देता है, वैसे ही तरंग के समान चंचल वृत्तिवाले जड़ चित्त ने मेरी भी दशा कर रखी है। धर्मकर्मों से स्वर्ग के प्राप्त होने पर सुखलेश से शून्य इसी लोक में कीट, पतंग आदि योनियों में भ्रमण करने के लिए चित्त ने मेरी वह दशा कर रक्खी है, जैसे कि आँधी तृण की दशा करती है। आँधी भी आकाश मे उड़ रहे तृण को भूमि पर पटक देती है और भूमि पर स्थित तृण को इधर-उधर उड़ा देती है।।16, 17।। इस संसाररूपी सागर से पार होने के लिए नित्य उद्योग कर रहे मुझ को यह कुत्सित चित्त इस भाँति रोकता है, जैसे की जल के प्रवाह को बाँध रोकता है।।18।। पृथिवी से (उर्ध्व प्रदेश से) पाताल को (अधः प्रदेश को) और पाताल से (अधःप्रदेश से) पृथिवी को (उर्ध्व प्रदेश को) जा रही रस्सी से लपेटे हुए घटीयंत्र (रस्सी से जल आदि भार को खींचने के लिए एक ओर जिसमें रस्सी बँधी रहती है, दूसरी ओर पत्थर आदि भरी वस्तु बँधी रहती है, जिसे अरहट कहते हैं, कुएँ से जल निकालने का यन्त्र) के समान मैं इस कुत्सित चित्तरूप रस्सी से वेष्टित होकर कभी ऊपर जाता हूँ कभी नीचे गिरता हूँ।।19।। जैसे बालकों को डराने के लिए कल्पित वेताल (विकरालस्वरूप) बालक को सत्य प्रतीत होता है, किन्तु बाल्यावस्था के बीतने पर उसके लिए वह असत्य हो जाता है, वैसे ही अज्ञान से मुझे दुर्जय प्रतीत होने वाला और विचार करने पर असत्यस्वरूप मन से मैं गृहीत हूँ जैसे कि बालक वेताल से गृहीत होता है।।20।। ब्रह्मन्, मन अग्नि से भी अधिक उष्ण, पर्वत से भी दुरारोह, वज्र से भी बढ़कर कठोर है, इसलिए मनरूपी ग्रह दुःख से भी गृहीत (वश में) नहीं हो सकता।।21।। जैसे मांसभक्षी चील, कौए आदि पक्षी मांस को देखते ही उसे खाने के लिए दौड़ पड़ते हैं हित और अहित का विचार नहीं करते, वैसे ही मन भी इन्द्रिय द्वारा देखे गये विषयों में टूट पड़ता है, हित और अहित का विचार नहीं करता और क्षणभर में उससे विरत हो जाता है। जैसे बालक खिलौने को देखते ही उस पर टूट पड़ता है और थोड़ी देर के बाद उसे छोड़कर दूसरा खेल बालक खिलौने को देखते ही उस पर टूट पड़ता है और थोड़ी देर के बाद उसे छोड़कर दूसरा खेल खेलने लगता है।।22।। हे तात, जैसे समुद्र जड़स्वभाव (जलरूप), चंचल, बड़े बड़े आवर्ती से (भौंरियों से) भरा और अनेक सर्प आदि हिंस्र जन्तुओं से पूर्ण है वैसे ही यह मन भी जड़, चंचल, विस्तीर्ण आवर्तरूपी वृत्तियों से युक्त और काम आदि छः शत्रुरूपी सौंपों से व्याप्त है। जैसे समुद्र हाथी को दूर फेंक देता है वैसे ही मन भी मुझे दूर फेंक रहा है।।23।। हे साधो, समुद्र को पीने, सुमेरू पर्वत को लाँघने और अग्निभक्षण से भी चित्त को अपने वश में करना कठिन है अर्थात् समुद्रपान आदि महान कार्य हैं, पर उनके होने की सम्भावना हो सकती है, परन्तु मन का निग्रह करना उससे भी कठिन है।।24।। सम्पूर्ण पदार्थों का कारण चित्त ही है उसके अस्तित्व में तीनों लोकों का अस्तित्व है, उसके क्षीण होने पर तीनों लोक नष्ट हो जाते हैं। हे मुने, इसलिए प्रयत्नपूर्वक मन की चिकित्सा करनी चाहिए अर्थात् रोग की तरह चित्त का अवश्य परित्याग करना चाहिए। हे मुनिवर, जैसे विन्ध्याचल आदि श्रेष्ठ पर्वत से अनेक वनों की उत्पत्ति होती है वैसे ही मन से ही ये सैंकड़ों सुख-दुःख उत्पन्न हुए है। ज्ञान से चित्त के क्षीण होने पर वे अवश्य ही नष्ट हो जाते हैं, ऐसा मेरा निश्चय है।।25,26।। मुमुक्षु पुरुषों ने जिस चित्त के जीतने पर शम, दम आदि गुणों के स्वाधीन होने की, काम, कर्म और वासनारूप कलाओं से युक्त सत्त्व, रज और तम-इन तीन गुणों से सम्पन्न अविद्या के नाश की और निरतिशयानन्दरूप ब्रह्म की प्राप्ति की आशा की थी, उस शत्रुरूप चित्त को जीतने के लिए मैं तत्पर हुआ हूँ, अतएव वैराग्यसम्पत्ति से युक्त होने के कारण मैं जैसे चन्द्रमा मेघपंक्ति का अभिनन्दन नहीं करता वैसे ही जड़-मलिन-विलासवाली लक्ष्मी का अभिनन्दन नहीं करता हूँ।।27।।

सोलहवाँ सर्ग समाप्त
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बुधवार, 5 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 4

पन्द्रहवाँ सर्ग


इसी प्रकार अहंकार भी सुखकर नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण दोष अभिमान से ही होते हैं, ऐसा कहते हैं।

श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः मुनिवर, अज्ञानरूप निमित्त कारण से व्यर्थ ही अहंकार की उत्पत्ति हुई है और व्यर्थ ही वह चारों तरफ से बढ़ता है, उससे किसी पुरुषार्थ की सिद्धि नहीं होती। 'मिथ्यामयेन' ऐसे यह दर्शाते हैं कि उसका उपादान कारण भी अज्ञान ही है अर्थात् वह अज्ञानमय है या 'मिथ्यामयेन' ऐसे छेद करना चाहिए। दुष्ट अहंकार नामक शत्रु (काटने वाले) रोग से मैं भयभीत हूँ।।1।। संसार एक आकार वाला नहीं है। उसके विविध प्रकार हैं। साध्य, साधन, फ, प्रवृत्ति – ये सभी संसार के आकार हैं। उक्त विविध आकारवाला संसार अनादिकाल से लेकर जन्म, मरण, नरक आदि अनन्त दुःखपरम्परा का अनुभव करके भी फिर उक्त दुःख परम्परा के हेतु तुच्छ सुखों को अनेक कष्टों से चाहने वाले इसीलिए दीनों से भी दीन विषयलम्पट लोगों को निरन्तर राग-द्वेष आदि दोषों में विक्षिप्त और कलंकित करता है। यह सब अहंकार का ही प्रसाद है, दूसरे का नहीं।।2।। अहंकार से ही विविध आपत्तियाँ – (शारीरिक कष्ट) होती हैं, अहंकार से ही अनेक भीष्ण मानसिक क्लेश होते हैं और अहंकार से ही विषयनुराग अथवा दुष्चेष्टाएँ होती हैं। मेरा रोग अहंकार ही है।।3।। मुनिवर, चिरकालिक परम वैरी उक्त अहंकार का अवलम्बन करके न तो मैं भोजन करता हूँ और न जल पीता हूँ। विविध भोगों के भोग का तो कहना ही क्या है ?।।4।। जैसे बहेलिया वागुरा को (मृर्गों को बाँधने का फन्दा अर्थात् जाल को) बिछाकर मृगों को पकड़ता है, वैसे ही अहंकार रूपी दोष ने संसाररूपी अँधेरी रात्रि में फैलाकर मन को मोहित करने वाली यह माया बिछा रखी है।।5।। जैसे पर्वत से खैर के वृक्षों की उत्पत्ति होती है, वैसे ही संसार में जितने चिरकाल स्थायी भीषण महादुःख हैं, उनकी उत्पत्ति अहंकार से ही हुई है।।6।। अहंकार शमरूपी चन्द्रमा को निगलने के लिए राहू का मुँह है, गुणरूपी कमलों का विनाश करने के लिए तुषाररूप वज्र है और सब भूतों में समदर्शितारूपी मेघ के लिए शरदऋतु है अर्थात् जैसे चन्द्रमा को राहू, निगल जाता है जैसे कमलों को हिमवर्षा नष्ट कर देती है और शरद ऋतु मेघों का विध्वंस कर डालती है, वैसे ही अहंकार शम, दया, दाक्षिण्य आदि गुण और सब पर समदृष्टि को नष्ट कर देता है, इसलिए मैं इस अहंकार का त्याग करता हूँ।।7।।

अहंकार का त्याग करने पर देहाभिमान, ममता आदि दोष स्वयं ही शान्त हो जाते हैं, ऐसा दर्शाते हैं।

न मैं रामचन्द्र हूँ, न मुझे विषयों की अभिलाषा है और न मेरा मन ही है। मैं निर्वैर होकर बुद्ध के समान अपनी आत्मा में स्थित रहना चाहता हूँ। जैसे बुद्ध किसी को किसी प्रकार की पीड़ा नहीं पहुँचाते थे वैसे ही में भी किसी को किसी प्रकार की पीड़ा न पहुँचा कर आत्माराम होना चाहता हूँ।।8।।

'निन्द्येष्यपि गुणो ग्रह्यः' इस न्याय से बुद्ध् का उदाहरण दिया है या 'जितः' ऐसा पाठ समझना चाहिए।

अहंकार के वशीभूत होकर मैंने जो कुछ खाया-पिया, यज्ञ-याग आदि किया तथा इसके अतिरिक्त और जो कुछ कर्म किया, वह सब तुच्छ (असार) है, अहंकार से रहित होना ही सार वस्तु है।।9।। ब्रह्मन, यदि अहंकार रहता है, तो आपत्ति में मुझे दुःख होता है और अहंकार नहीं रहता, तो मैं सुखी रहता हूँ, इसलिए अहंकार रहित होना श्रेष्ठ है।।10।।

भोगसम्पत्ति से ही उद्वेगहीनता आदि क्यों नहीं होते इस शंका पर कहते हैं।

मुनिवर, मैं अहंकार को त्याग कर शान्तचित्त होकर, उद्वेग को छोड़कर बैठा हूँ। भोग-समूह, भंगुर देह, इन्द्रिय, विषय आदि के अधीन हैं, इसलिए इनमें किसी एक के भी नष्ट होने पर उद्वेग की प्राप्ति दुर्वार होती है।।11।। ब्रह्मन, जब तक अहंकाररूपी मेघ के शान्त होने पर तृष्णा बिजली की लकीर के तुल्य, बुझी हुई दीपशिखा (दीपक की लौ) की तरह, बड़ी शीघ्रता से कहीं विलीन हो जाती है। जैसे मेघ गड़गड़ाहट के साथ गर्जता है वैसे ही अहंकाररूपी विशाल विन्ध्याचल में मन रूपी मत्त गजेन्द्र युद्धोत्साह के साथ या निविड़ शिलाओं के टूटने की ध्वनि के साथ गर्जता है।।12-14।। इस देहरूपी महाअरण्य में उन-उन हेतुओं से वृद्धि को प्राप्त यह निविड़ अहंकार रूपी मत्त सिंह निरन्तर भ्रमण करता है, उसी ने इस जगत समुदाय को बनाया है उसी ने पुण्य-पापादिरूपी बीज की वृद्धि से इस जगत के विस्तार को प्राप्त किया है।।15।। जैसे लम्पट पुरुष मोतियों की माला गूंथकर गले में पहने रहते हैं, वैसे ही अहंकार ने भी तृष्णारूपी तागे में जन्म परम्परारूप मोतियों की माला, गूँथ कर गले में धारण कर रक्खी है।।16।। महामुने, इस अहंकाररूपी परम शत्रु ने ही इस संसार में मन्त्र-तन्त्र से शून्य पुत्र, मित्र, कलत्र आदि वशीकरण, उन्मादन आदि के उपाय फैला रक्खे हैं।।17।। प्रबल शत्रु अहंकार का मूलोच्छेद पूर्वक निरास करने पर ये सभी मानसिक कष्ट बड़ी जल्दी अपने आप विलीन हो जाते हैं, थोड़ी-थोड़ी करके हो या तीव्र वेग से हो, हृदयाकाश में स्थित अहंकाररूपी मेघ के शान्त होने पर शान्ति का विनाश करने वाला महामोह रूपी कुहरा न मालूम कहाँ विलीन हो जाता है।।18,19।। हे ब्रह्मन्, मैं निरहंकार होकर भी मूर्खतावश शोक से दुःखी हो रहा हूँ इसलिए मेरी प्रार्थना है कि मेरे लिए जो विहित और हित हो, उसका मुझे उपदेश दीजिए।।20।।

इस प्रकार अहंकार, उससे होने वाले अनर्थ और उसके उच्छेद के फल का वर्णन कर अहंकार के त्याग से उत्पन्न हुई अपनी श्रवणाधिकार-सम्पत्ति को कह रहे श्रीरामचन्द्रजी मुनि से उपदेश की प्रार्थना करते हैं।

हे महानुभव, सम्पूर्ण आपत्तियों के घर, शान्ति आदि गुणों से रहित हृदयस्थ अहंकार को मैं आश्रय नहीं देना चाहता। मैं विवेक की दृढ़ता से अहंकार रूपी लांछन को चारों ओर से दुःख से पूर्ण समझता हूँ। महामुने, जो कुछ मेरे सम्पादन के योग्य अवशिष्ट रह गया है, उसके साथ मुझे आत्मतत्त्व का उपदेश दीजिए।।21।।

पन्द्रहवाँ सर्ग समाप्त

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मंगलवार, 4 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 3

चौदहवाँ सर्ग

काम आदि दोषों से दूषित तथा व्याधि, रोग और जरावस्था से पीड़ित मूर्ख के जीवन, यौवन और आयु की निन्दा।

श्री के समान आयु भी सुखकर नहीं है, यह कहते हैं।

श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः मुनिवर, जीव की आयु पत्ते के सिरे पर लटक रहे जलबिन्दु के (ओस के) सदृश अस्थिर है, वह उन्मत्त के समान असमय में ही इस कुत्सित शरीर को छोड़कर चली जाती है, अर्थात् जैसे उन्मत्त पुरुष अपने अत्यन्त उपयोगी उपकरणों को, जब मन में आये, छोड़कर चला जाता है, वैसे ही आयु भी शरीर को छोड़कर चली जाती है।।1।। जिन लोगों के चित्त विषयरूपी सर्पों के संसर्ग से सर्वथा जर्जर (शिथिल) है और जिनमें दृढ़ आत्मविवेक नहीं है, उनकी आयु वृथा और क्लेशकर ही है।।2।।

क्या ब्रह्मवेत्ताओं की आयु भी व्यर्थ और क्लेशजनक है ? ऐसी शंका होने पर कहते हैं।

जो लोग ज्ञातव्य वस्तु को (ब्रह्म) को जान चुके हैं, असीम ब्रह्म में विश्रान्त हैं और जिनके जीवन में लाभ, हानि और सुख-दुःख में चित्तवृत्ति समान रहती है, उन महापुरुषों की आयु ही सुखदायक है।।3।। हे महामुने, हम लोग देह आदि को ही 'यह आत्मा है', ऐसा निश्चय कर बैठे हैं, हमें संसाररूपी मेघ में स्थित बिजली के समान चंचल आयु में सुख प्राप्त नहीं हुआ। वाय़ु का घेरा हो सकता है, आकाश के टुकड़े टुकड़े किये जा सकते हैं और लहरें एक दूसरे में माला की नाईं गूँथी जा सकती हैं पर आयु में विश्वास नहीं किया जा सकता। शरत् ऋतु के बादल के समान स्वल्प, तेल रहित दीपक और तरंग के समान चंचल आयु गई हुई ही देखी जाती है।।4-6।। तरंग को, जल आदि में प्रतिबिम्बित चन्द्रमा को, बिजली को और आकाशकमल को हाथ से पकड़ने का मुझे विश्वास है, पर अस्थिर आयु में मेरा विश्वास नहीं है। तरंग, प्रतिबिम्बित चन्द्र आदि का ग्रहण असंभव है फिर भी उक्त असंभव बातें भले ही हो जायें, पर अस्थिर आयु में मेरा विश्वास नहीं होता यह भाव है।।7।। जैसे खच्चरी दुःख के लिए ही गर्भ धारण करती है, (क्योंकि उसका पेट फाड़कर ही गर्भ निकलता है, ऐसी बात प्रसिद्ध है) वैसे ही जिसके मन की तृष्णाओं का विनाश नहीं हुआ है, ऐसे मूर्ख पुरुष व्यर्थ आयु को दुःख के लिए ही विस्तृत चाहता है। व्यर्थ आयु को विस्तृत खच्चरी के गर्भधारण के समान दुःखहेतु ही है, यह भाव है।।8।। इस संसार से संभ्रमण में वल्लीरूप शरीर सृष्टि में यह शरीर अत्यन्त अस्थिर है, इसलिए इसमें मुझे जीवन अच्छा नहीं लगता।।9।। जिससे अवश्य प्राप्तव्य वस्तु की (परम पुरुषार्थ रूप मुक्ति की) प्राप्ति की जाती है, जिससे पीछे शोक प्राप्त नहीं होता और जो परम निर्वृत्ति (जीवन्मुक्ति) का स्थान है, वही उत्तम जीवन कहा जाता है।।10।। वृक्ष भी जीते हैं और मृग-पक्षी भी जीतै हैं, पर उसी पुरुष का जीना जीना है जिसका मन मनन के फलस्वरूप तत्त्वज्ञान से या वासना के क्षय से तुच्छ हो जाता है। जगत में उनका ही उत्पन्न होना सफल है और वे ही प्रशंसनीय जीवन वाले हैं, जो फिर इस जगत में जन्म नहीं लेते, शेष जीव तो चिरकाल तक जीने वाले गदहे के समान हैं अर्थात् गदहे के जीवन के समान उनका जीवन गर्हित है।।11,12।। अपवित्र देह में आत्मबुद्धि करने वाले अविवेकी के लिए शास्त्रभाररूप है अर्थात् भार के समान व्यर्थ श्रम का ही कारण है। विषयानुरागी पुरुष के लिए तत्त्वज्ञान भार है, अशान्त पुरुष के लिए मन भार है और अनात्मवान् के लिए शरीर भार है।।13।। दुर्बुद्धि पुरुष के लिए आयु, मन, बुद्धि, अहंकार तथा चेष्टा ये सब भारवाहक के भार के समान दुःखदायक हैं। यह आयु श्रमनिवृत्ति से रहित, पूर्णकामता से शून्य, आपत्तियों के घर और रोग रूपी पक्षियों का घोसला है, इससे केवल सदा परिश्रम ही प्राप्त होता है।।14, 15।। जैसे चूहा प्रतिदिन आलस्य का त्यागकर लगातार धीरे-धीरे पुराने टीले को खोदकर नष्ट कर देता है। वैसे ही काल प्रतिदिन आलस्य का त्यागकर धीरे-धीरे आयु को क्षीण कर रहा है। जैसे बिल में आराम कर रहे, विष द्वारा सन्ताप देने वाले भीषण सर्प वन की आयु में पान करते हैं, वैसे ही शरीर रूपी बिल में आराम से बैठे हुए विष के समान दाह (सन्ताप) देने वाले भीषण सर्पों के सदृश घोर रोग जीव की आयु का पान करते हैं।।16,17।। सदा लकड़ी का बुरादा गिरा रहे वृक्ष के भीतर रहने वाले छोटे-छोटे दुष्ट दीमकों द्वारा पुराना पेड़ काटा जाता है, वैसे ही सदा पीब-रक्त और मल बहा रहे शरीर में रहने वाले तुच्छ और दुष्ट रोग आदि दुःखों द्वारा चारों ओर से आयु काटी जा रही है।।18।। जैसे बिल्ली शीघ्र निगलने के लिए उत्कट अभिलाषापूर्वक चूहे को देखती है वैसे ही मृत्यु शीघ्र निगलने के लिए उत्कट अभिलाषापूर्वक सदा जीव की आयु की ताक में बैठी रहती है। जैसे बहुत भोजन करने वाले पुरुष भक्षित अन्न को पचा डालता है, वैसे ही तुच्छ और गन्ध आदि गुण से युक्त वैश्यारूपी वृद्धावस्था जीव की शक्ति को क्षीण कर उसे जीर्ण कर देती है।।19,20।। जैसे कुछ ही दिनों में यह दुर्जन है, ऐसा जानकर सज्जन दुर्जन को अनादर पूर्वक छोड़ देता है, वैसे ही यौवनावस्था कुछ काल तक इस देह में वास कर थोड़े ही दिनों में प्राणी को निरादर के साथ छोड़ देती है।।21।। जैसे लम्पट लोग (महाविषयी पुरुष) सौन्दर्य के अभिलाषी होते हैं वैसे ही विनाश का मित्र और वृद्धावस्था तथा मृत्यु का सहायक काल भी पुरुष और पुरुष की आयु का सदा ग्राहक रहता है।।22।। हे मुनिवर, अधिक क्या कहें, जीवन्मुक्त पुरुषों द्वारा अनुभूत नित्य सुख और स्थिरता से सर्वदा के लिए त्यक्त, अति तुच्छ और गुणों से रहित संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जैसी कि मृत्यु की ग्रास की यह आयु है।।23।।

चौदहवाँ सर्ग समाप्त

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सोमवार, 3 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 2

तेरहवाँ सर्ग
इस प्रकार विषयों की असारता का प्रतिपादन कर विषय-सम्पादन में हेतुभूत श्री-धनसम्पत्ति-भी असार ही है, ऐसे प्रतिपादन करने के लिए इस सर्ग का आरम्भ करते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः हे मुनिश्रेष्ठ, इस संसार में धनसम्पत्ति स्थिर और विविध सुखों की हेतु होने के कारण उत्कृष्ट है, ऐसा मूढ़ व्यक्तियों ने ही मान रक्खा है, वस्तुतः वह न स्थिर है, और न उत्कृष्ट ही है। वह नितान्त अनर्थ देने वाली और मोह की हेतु है अर्थात वध, बन्धन, नरक आदि विविध क्लेश देती है, तनिक भी सुख नहीं देती अथवा प्राप्त होने पर मोह में डालती है, नष्ट होने पर क्लेश देती है या गर्हित धन ही देती है, विवेक नहीं देती।।1।। जैसे वर्षाकाल में नदी ऊपर को उछलने कूदने वाली बड़ी बड़ी अनेक मलिन तरंगों को धारण करती है, वैसे ही उक्त सम्पत्ति उत्साह से बढ़े हुए अनन्त मनोरथों से युक्त अतएव अत्यन्त आकुल अनेक मूढ़ लोगों को अपने वश में कर अपनी ओर खींचती है। हे मुनिवर, चिन्ताएँ श्री की पुत्रियाँ हैं। जैसे नदी से असंख्य तरंगे उत्पन्न होती हैं,  फिर वे वायु की सहायता से बढ़ती हैं वैसे ही श्री से असंख्य चिन्तारूपी पुत्रियों की उत्पत्ति होती है, तदुपरान्त विविध दुश्चेष्टाओं द्वारा उनकी वृद्धि होती है।।2,3।। जैसे अज्ञान से आग को पैर से कुचल कर जली हुई कोई अभागिन एक जगह चरण नहीं रख सकती, किन्तु हाथ पैर पटकती हुई इधर-उधर घूमती है, उसकी चेष्टा एक सी नहीं रहती, वैसे ही श्री भी शास्त्रप्रतिपादित सदाचार से रहित पुरुष को प्राप्त कर इधर-उधर घूमती-फिरती है, कभी एक जगह स्थिर नहीं रहती।।4।। जैसे दिये की लौ छूने से दाह उत्पन्न करती है और काजल को धारण करती है, वैसे ही यह श्री भी जुआ, चोरी आदि से इसके कुछ हिस्से का क्षय होने पर श्रीमानों को सन्तप्त करती है, वैसे ही यह श्री भी जुआ, चोरी आदि से इसके कुछ हिस्से का क्षय होने पर श्रीमानों को सन्तप्त करती है और बीच में ही (अनवसर में ही) अपना या अपने उपभोक्ता का नाश कर डालती है।।5।। दुःख से उपार्जित भी यह मूढ़ श्री राजाओं की प्रकृति के समान गुण और अवगुणों को विचार के बिना ही जो कोई उसके समीप में रहता है, उसी का अवलम्बन कर लेती है अर्थात जैसे प्रायः मूढ़ राजा लोग धार्मिक गुणवानों के साथ प्रीति नहीं करते, जिस किसी समीपस्थ के साथ प्रीति कर लेते हैं, वैसे ही दुःख से उपार्जित यह श्री गुणवान धार्मिकों के ही उपभोग के लिए नहीं होती, किन्तु गुण और अवगुणों के विचार के बिना जिसको समीप में पाती है उसी से लिपट जाती है।।6।। जिन कर्मों का फल धन, राज्यलाभ आदि और लोभ, हिंसा, मिथ्याभाषण आदि दोषरूप सर्पविष के वेगों के विस्तार के लिए होता है उन्हीं युद्ध जुआ, व्यापार आदि कर्मों से यह बढ़ती है – यज्ञ, दान आदि से नहीं, उनसे तो बढ़ने के बदले घटती है, क्योंकि उनमें इसका व्यय होता है।।7।। तभी तक लोग अपने और पराये लोगों पर दया, दक्षिण्य, स्नेह आदि करते हैं, जब तक कि जैसे वायु से बर्फ कड़ा हो जाता है, वैसे ही श्री द्वारा वे कठोर नहीं हो जाते। सम्पत्ति प्राप्त होते ही लोग अपने और पराये जनों पर दया और स्नेह का भाव छोड़कर कठोर बन जाते है, यह भाव है।।8।। जैसे धूलि की मुट्ठी मणियों को मलिन कर देती है, वैसे ही बड़े-बड़े विद्वान शूरवीर, दूसरे के उपकार न भूलने वाले, दक्ष और मृदुभाषी पुरुषों को भी धन-सम्पत्ति मलिन कर देती है।।9।। भगवन् सम्पत्ति की वृद्धि से दुःख ही होता है सुख नहीं होता अर्थात् जैसे विषलता केवल मृत्यु का ही कारण होती है, वैसे ही श्री भी सुख की कारण न होकर दुःख की ही कारण होती है। रक्षा करने पर भी वह मृत्यु के साधनों को जुटाती है। अर्थात् जैसे विषलता के समीप रक्षण, अवेक्षण आदि करने के लिए जाने पर भी मृत्यु लाभ की संभावना रहती है, वैसे ही सम्पत्ति की रक्षा करने पर भी अपने विनाश की पूरी सम्भावना है।।10।।
कोई-कोई श्रीमान लोग भी बड़े धार्मिक और यशस्वी देखे जाते हैं ऐसी परिस्थिति में श्री की प्राप्ति होने तक ही गुणियों में गुण रहते हैं, यह कैसे कहा ? इस पर कहते हैं।
हे मुने, इस लोक में लोग जिसकी निन्दा नहीं करते ऐसा श्रीमान्, आत्मश्लाघा न करने वाला शूरवीर पुरुष और सब पर समानभाव से दृष्टि रखने वाला स्वामी ये तीन पुरुष दुर्लभ है, अर्थात् श्रीमान् की किसी न किसी तरह लोग अवश्य निन्दा करते हैं शूर अवश्य ही अपनी प्रशंसा करता है, निग्रह और अनुग्रह में समर्थ स्वामी सब पर समदृष्टि नहीं हो सकता।।11।। हे मुनिवर, अज्ञ लोगों ने जिस श्री को सुख की हेतु समझ रक्खा है, वह दुःखरूप सर्पों की दुर्गम और भीषण गुफा है एवं महामोहरूपी हाथियों का आवास रूप विन्ध्याचल का मैदान है अर्थात् यह श्री महादुःखदायिनी और महामोह से आवृत्त करने वाली है।।12।। सत्कर्मरूपी कमल के लिए रात्रि है। (जैसे रात्रि में कमल संकुचित हो जाते हैं, वैसे ही श्री प्राप्त होने पर सत्कर्मों का ह्रास हो जाता है), दुःख रूपी कुँई (कमलिनी) के लिए चन्द्रिका (चाँदनी) अर्थात् जैसे चाँदनी में कमलिनी (नीलोत्पल) विकसित होती है, वैसे ही श्री के प्राप्त होने पर दुःखों का खूब विकास होता है और दयादृष्टिरूपी या परमार्थदृष्टिरूपी दीपक के लिए झकझोर वायु और बड़ी-बड़ी तरंगों से युक्त नदी हैं। (जैसे झंझावात औऱ तरंगों से युक्त नदीं को झोंकों से दीपक बुझ जाता है, वैसे ही श्री की प्राप्ति होने पर दयादृष्टि या परमार्थदृष्टि बन्द हो जाती है।)।।13।। यह भय और भ्रान्तिरूपी मेघ के लिए पुरोवात (पूर्वी हवा) है, (जैसे पूर्वी हवा मेघ की वृद्धि की हेतु है, वैसे ही श्री भी भय और भ्रान्ति की जननी है) विषादरूपी (खेदरूपी) विष को बढ़ाने वाली है, संशय और संक्षोभ आदि की क्षेत्र है और दुःखदायक भय को पैदा करने में सर्पिणी है या खेद के लिए भयरूपी भोग से (सर्पशरीर से) युक्त सर्पिणी है।।14।। वैराग्यरूपी लताओं के लिए तुषार है, काम आदि चित्तविकार रूपी उल्लुओं के लिए अँधेरी रात है, विवेकरूपी चन्द्रमा के लिए राहू की दाढ़ है और सौजन्यरूपी कमल के लिए चाँदनी है अर्थात् जैसे तुषार से लताएँ सूख जाती हैं वैसे ही सम्पत्ति प्राप्त होने पर सौजन्य का संकोच हो जाता है।।15।। यह श्री इन्द्रधनुष के समान चंचल (अचिरस्थायी) रंगों से मनोहर एवं बिजली के समान चपल और उत्पन्न होते ही नष्ट होने वाली है और प्रायः जड़ (मूर्ख) ही इसके आश्रय है।।16।। यह चपलता में जंगली नेवलियों से भी बढ़कर है, दुष्कुल में सम्पन्न हुई है, अच्छे कुल में संपन्न नहीं है। वंचना में उग्र मृगतृष्णिका को जीतने वाली है अर्थात् यह वंचना में इतनी दक्ष है कि क्षण भर भी एक स्थान पर न रहने वाली यह जलतरंग और दीपशिखा से (दीये की लौ से) भी बढ़कर भंगुर है और अनगिनत दुर्दशाओं की जननी है।।18।। यह युद्ध के लिए उत्सुक मनुष्यरूपी गजेन्द्रों का विनाश करने वाली सिंहनी के समान है। बड़ी शीतल तथा स्वयं तीक्ष्ण और तीक्ष्णहृदयवाले (क्रूर हृदय वाले) लोगों के पास रहने वाली तलवार के समान है।।19।। मृत्यु द्वारा हरे गये लोगों को चाहने वाली, अनेक मानसिक व्यथाओं से व्याप्त (अनेक मानिसक व्यथाएँ जिसमें चोर के समान छिपी रहती हैं) अभव्य लक्ष्मी से दुःख को छोड़कर कुछ भी सुख नहीं देखता।।20।। जिस पुरुष की अलक्ष्मी द्वारा (सप्तनीरूप दरिद्रता द्वारा) स्वयं दूर निकाली गई चिरकाल तक सपत्नी द्वारा उपभुक्त उसी को फिर आदर से आलिंगन सा करती है, यह बड़े खेद की बात है, यह मानवती नहीं है, किन्तु निर्लज्ज और दुष्टता इसकी कभी जाती नहीं।।21।। यह लक्ष्मी मनोहर है, अतएव चित्तवृत्ति को अपनी ओर खींचती है, मरण, पतन आदि के कारण साहसिक कर्मों से प्राप्त होती है और बिजली के समान क्षण भर में नष्ट हो जाती है, अतः यह सर्पों से लिपटी हुई गड्डे में उत्पन्न हुई पुष्पलता के समान है।।22।।
तेरहवाँ सर्ग समाप्त
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रविवार, 2 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 1

वैराग्य प्रकरण
बारहवाँ सर्ग
भोगों की दुःखरूपता, विषय आदि की असत्यता तथा सम्पत्ति की अनर्थहेतुता का वर्णन।
वाल्मीकि जी ने कहाः हे भरद्वाज, मुनिन्द्र विश्वामित्रजी के यों पूछने पर रामचन्द्रजी धैर्य धारण कर उत्तम अर्थ से परिपूर्ण सुन्दर, वचन बोले।।1।। रामजी ने कहाः भगवन् यद्यपि मैं अज्ञानी हूँ, तथापि इस समय आपके पूछने पर मैं सब कुछ कहूँगा, क्योंकि सत्पुरुषों के वचनों का कौन उल्लंघन कर सकता है ?।।2।।
यों अपनी विनीत वाणी से मुनि को अपने वश में करके रामचन्द्रजी अपने वृत्तान्त के अनुवाद के बहाने से धर्मानुष्ठानजनित चित्त की शुद्धि से विवेक और वैराग्य होने पर मुझमें विचार का उदय हुआ, ऐसा कहते हैं।
मैं यहाँ अपने पिताजी के घर में उत्पन्न हुआ, क्रम से बढ़ा और विद्या भी प्राप्त की। उसके बाद के मुनिनायक, सत् आचरणों के अनुष्ठान में तत्पर होकर तीर्थयात्रा के लिए समुद्रपर्यन्त पृथ्वी के चारों ओर विचरा।।3,4।। इस बीच में संसार पर आस्था को हरने वाला यह विचार मेरे मन में उत्पन्न हुआ, जिसे मैं आपके सामने उपस्थित करता हूँ।।5।। तीर्थयात्रा करने के अनन्तर मेरा मन उक्त विवेक से पूर्ण हो गया। उससे सब विषय परिणाम में नीरस हैं, ऐसी बुद्धि हुई और उस बुद्धि से मैंने विचार किया कि यह जो संसार का प्रवाह है, यह क्या सुख का हेतु हो सकता है ? अर्थात् इस विस्तृत संसार से कभी सुख नहीं मिल सकता, क्योंकि इसमें जो जीव उत्पन्न होते हैं, वे मरने के लिए ही उत्पन्न होते हैं और जो मरते हैं वे जन्म के लिए ही मरते हैं, उनको कुछ भी सुख नहीं मिलता।।6,7।।
(शास्त्रकारों ने भी 'मृतिबीजं जन्म बीजं भवेन्मृतिः' यानि मरण में जन्म कारण है और जन्म में मरण कारण है, ऐसा कहा है।)
इस विषय में यदि शंका हो कि भले ही जन्म और मरण दुःखरूप हैं, परन्तु उनके बीच में जीवनदशा में सुख मिलता ही है, तो इस पर कहते हैं।
चर और अचरों की चेष्टाओं से युक्त वैभवकाल में रहने वाले ये जितने भोग के साधन पदार्थ हैं, ये सबके-सब अस्थिर यानि क्षणिक हैं, ये आपत्तियों के ही स्वामी यानि मूल हैं और पाप के हेतु हैं पाप स्वरूप हैं।।8।।
(तात्पर्यार्थ यह है कि इस जगत में दो प्रकार के प्राणी होते हैं एक चर यानि चलने फिरने वाले और दूसरे अचर यानि जो चल फिर नहीं सकते – वृक्षादि। उनमें फिर चलने फिरने वालों की भोग में प्रवृत्ति ही अपनी प्रवृत्ति और निवृत्ति से प्राप्त साधनों द्वारा प्राप्त होती है। और अचरों की भोग में प्रवृत्ति दैव (प्रारब्ध) से प्राप्त साधनों द्वारा होती है। इस भोगवृत्तिरूप चेष्टा से युक्त होने पर भी स्त्रक (पुष्पमाला), चन्दन, अन्न, पान आदि जितने विषय हैं, वे सब शाश्वत सुख नहीं दे सकते, क्योंकि वे खुद ही  अस्थिर हैं, अर्थात् जिस समय उनकी प्राप्ति होगी, उस समय सुख देते हैं और जिस समय उनसे वियोग होता है, उस समय दुःख देते हैं, इसलिए उनसे एक प्रकार के सुख की आशा ही नहीं की जा सकती, अधिक क्या कहें, ये विषय आपत्तियों के स्वामी हैं अर्थात् राग-द्वेष आदि बड़ी-बड़ी आपत्तियाँ उन्हीं से प्राप्त होती हैं और शास्त्रों में जो निषिद्ध विषय हैं, वे तो स्वयं पापरूप ही हैं, अतः इन अस्थिर विषयों से सुख की अभिलाषा करना सर्वथा मूर्खता ही है।)
लोहे की शलाकाओं के समान ये विषय परस्पर एक दूसरे से मिले जुले नहीं हैं, किन्तु केवल मन की कल्पना से उनका सम्बन्ध जबर्दस्ती माना जाता है अर्थात् यह मेरे उपभोग का साधन है, इससे मैं यह काम करूँगा, इस प्रकार की मन की कल्पना से उन विषयों का परस्पर क्रिया-कारणभाव से सम्बन्ध माना जाता है, इसलिए लोगों को सुखकारकरूप से उनका जो भान होता है, वह केवल अज्ञानमूलक मन से कल्पित ही है, इसलिए विषय दुःखरूप ही हैं, सुखरूप नहीं हैं।।9।।
केवल विषयों का सम्बन्ध ही मन के द्वारा कल्पित नहीं है, किन्तु जीव के जन्म आदि भी मन के द्वारा ही कल्पित हैं, इसलिए दृश्यमान सम्पूर्ण जगत मन से कल्पित ही  हैं, यह कहते हैं।
कृत्रिम वेष के समान दीखने वाला यह सारा जगत् मन की कल्पनामात्र है और वह मन भी विवेकज्ञान होने पर शून्य-सा ही प्रतीत होता है, अतः मन से भी हम सुख की आशा नहीं कर सकते, फिर हम लोगों को इतने समय तक 'सुख होगा' इस प्रकार मोह में किसने डाल रक्खा है ?।।10।। जैसे मरीचिका को जल समझकर मुग्ध मृग वन में बड़ी दूर तक इधर-उधर भटकते रहते हैं, फिर भी कुछ नहीं मिलता, वैसे ही मूढ़बुद्धि हम लोग इस संसार में असत् पदार्थों को सुख के साधन समझकर इधर-उधर खूब भटकते रहते है, पर हाथ कुछ नहीं लगता। यद्यपि हम लोग किसी के द्वारा बेचे नहीं गये हैं, तथापि बेचे गये प्राणियों के समान परवश होकर बैठे हुए हैं, अत्यन्त खेद है कि माया को जानते हुए भी हम मूढ़ ही हैं, क्योंकि उसकी कुछ चिन्ता नहीं करते।।11,12।। इस संसाररूप प्रपंच में ये जो अभागे भोग हैं, वे कौन चीज हैं कि हम लोग उनके व्यर्थ मोह से या भ्रान्ति से बद्ध होकर अवस्थित हैं ?।।13।। जैसे अरण्य में किसी गड्ढे में गिरे हुए मूढ़ मृग बहुत काल के बाद यह जाना कि हम व्यर्थ मोह में गिरे हुए हैं।।14।। मुझे राज्य से क्या? इन भोगों से क्या? मैं कौन हूँ और किसलिए आया हूँ? जो मिथ्या है, वह मिथ्या ही रहे, क्योंकि उसके मिथ्या होने से किसका क्या बिगड़नेवाला है ?।।15।। हे ब्रह्मन्, जैसे यत्रतत्र भ्रमण करने वाले पथिक की मरुभूमि से आस्था हट जाती है, वैसे ही मेरे इन सब विचारों से सभी भोग-साधन पदार्थों से मेरा चित्त हट गया है। इसलिए भगवन्, आप यह बतलाइये कि यह दिखने वाला जगत सर्वात्मना नष्ट अर्थात् असत् इसलिए हो जाता है कि सत् और असत् का विरोध है ? यदि जगत् असत् है, तो फिर कभी सत् होता है ? उसकी क्या वृद्धि होती है? क्या जरा, मरण, आपत्ति, जन्म और सम्पत्ति ये सब आविर्भाव और तिरोभाव से पुनः पुनः बढ़ते रहते हैं ? मुनिवर ! देखिये, हम लोग उन तुच्छ भोगों से ऐसे जर्जर हो गये हैं, जैसे की पर्वत के ऊपर के वृक्ष आँधी से जर्जर हो जाते हैं। जो बुद्धिमान लोग हैं, वे भी कुछ नहीं कर रहे हैं, इसलिए विवेकी और अविवेकी सभी प्राणी जैसे अचेतन बाँस की वेणु पवन के द्वारा शब्द करती है, वैसे प्राण नामक वायु से प्रेरित होकर व्यर्थ ही शब्द करते है, उनसे कुछ भी नहीं होता। जैसे पुराना वृक्ष अपने खोखले में रहने वाली उग्र अग्नि से जल जाता है, वैसे ही मुनिश्रेष्ठ मेरा इस दुःख से छुटकारा कैसे होगा, ऐसी चिन्तारूप अग्नि से मैं सदा जलता रहता हूँ।।16-21।। संसार के विविध दुःखरूप पाषाण से मेरा अन्तःकरण जर्जर हो गया है, मैं अपने मित्रों और लोक से डरकर अश्रुपूर्ण नेत्रों से नहीं रो रहा हूँ, क्योंकि यदि मैं रोना आरम्भ करूँ तो वे भी रोने लगेंगे।।22।। अश्रुरहित शुष्क रोदन से प्रीतिशून्य अतएव हर्षादिशून्य मेरे मुख के कृत्रिम स्मित, अभिलाप आदि वृत्तियों को एकान्त में मेरा अन्तःकरणस्थ विवेक ही देखता है।।23।। जैसे कोई पूर्व अवस्था में अनेक प्रकार की सम्पत्तियों से सम्पन्न भाग्यवान पुरुष दैव से आई हुई दरिद्रावस्था में अपनी पूर्वीय समृद्धि का स्मरण कर मुग्ध होता है। वैसे ही मैं भी प्रियतम विषयों की विनाशप्राय अवस्था का या सब प्रकार के दुःखों के उपशमरूप परमानन्द के अज्ञान की विकारभूत अवस्था का विचार कर इस सांसारिक चेष्टा से अत्यन्त मुग्ध हो रहा हूँ।।24।। वंचना से भरपूर यह लक्ष्मी अन्तःकरण की वृत्तियों को मुग्ध करती है, गुणों को नष्ट करती है और अनेक तरह के दुःखों को देती है।।25।। धनियों को चिन्तारूप धार से खण्डशः काटने के लिए प्रवृत्त चक्ररूपी से विविध धन मुझे आनन्द नहीं देते और स्त्री, पुत्रादि परिवार से परिपूर्ण घर उग्र आपत्तियों के घरों के समान मुझे आनन्द नहीं दे रहे हैं।।26।। जैसे भंगुर काष्ठ आदि से आच्छादित छोटे गर्त में गिरने के कारण प्राप्त क्षुधा, पिपासा आदि दोषों के और गिरना, बाँधा जाना आदि दुर्दशाओं के विचार से बन्धन में पड़े हुए हाथी को सुख नहीं होता, वैसे ही देह आदि पदार्थों के भंगुरत्वरूप हेतु से जनित अनेक प्रकार के दोषों और दुर्दशाओं का स्मरणकर मुझे सुख नहीं होता।।27।। अज्ञानरूपी रात्रि में अविचाररूपी निविड़ कुहरे से लोगों की ज्ञानरूपी ज्योति के नष्ट होने पर दूसरों को दुःख देने वाले बड़े चतुर सैंकड़ों विषयरूपी चोर सदा चारों ओर विवेकरूपी मुख्य रत्न को चुराने के लिए जीजान से लगे हुए हैं। युद्ध में उन्हें विनष्ट करने के लिए विद्वानों को (तत्त्वज्ञानियों को) छोड़कर कौन से योद्धा समर्थ हो सकते है? तत्त्वज्ञानी ही उनका विनाश करने में समर्थ हैं, दूसरे नहीं, क्योंकि तम (अज्ञान और अन्धकार) का विनाश हुए बिना उनका वध होना असंभव है, यह भाव है।।28।।
बारहवाँ सर्ग समाप्त
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