मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

गुरुवार, 28 जून 2012

जागो अपनी महिमा में.............

स्वामी रामतीर्थ के बोलने का स्वभाव था किः "मैं बादशाह हूँ, मैं शाहों का शाह हूँ।" अमेरिका के लोगों ने पूछाः "आपके पास है तो कुछ नहीं, सिर्फ दो जोड़ी गेरूए कपड़े हैं। राज्य नहीं, सत्ता नहीं, कुछ नहीं, फिर आप शाहों के शाह कैसे ?"
रामतीर्थ ने कहाः "मेरे पास कुछ नहीं इसलिए तो मैं बादशाह हूँ। तुम मेरी आँखों में निहारो.... मेरे दिल में निहारो। मैं ही सच्चा बादशाह हूँ। बिना ताज का बादशाह हूँ। बिना वस्तुओं का बादशाह हूँ। मुझ जैसा बादशाह कहाँ ? जो चीजों का, विषयों का गुलाम है उसे तुम बादशाह कहते हो पागलों ! जो अपने आप में आनन्दित है वही तो बादशाह है। विश्व का सम्राट तुम्हारे पास से गुजर रहा है। ऐ दुनियाँदारों ! वस्तुओं का बादशाह होना तो अहंकार की निशानी है लेकिन अपने मन का बादशाह होना अपने प्रियतम की खबर पाना है। मेरी आँखों में तो निहारो ! मेरे दिल में तो गोता मार के जरा देखो ! मेरे जैसा बादशाह और कहाँ मिलेगा ? मैं अपना राज्य, अपना वैभव बिना शर्त के दिये जा रहा हूँ.... लुटाये जा रहा हूँ।"
जो स्वार्थ के लिए कुछ दे वह तो कंगाल है लेकिन जो अपना प्यारा समझकर लुटाता रहे वही तो सच्चा बादशाह है।
'मुझ बादशाह को अपने आपसे दूरी कहाँ ?'
किसी ने पूछाः "तुम बादशाह हो ?"
"हाँ...."
"तुम आत्मा हो ?"
"हाँ।"
"तुम God  हो?"
"हाँ....। इन चाँद सितारों में मेरी ही चमक है। हवाओं में मेरी ही अठखेलियाँ हैं। फूलों में मेरी ही सुगन्ध और चेतना है।"
"ये तुमने बनाये ?"
"हाँ.... जबसे बनाये हैं तब से उसी नियम से चले आ रहे हैं। यह अपना शरीर भी मैंने ही बनाया है, मैं वह बादशाह हूँ।"
जो अपने को आत्मा मानता है, अपने को बादशाहों की जगह पर नियुक्त करता है वह अपने बादशाही स्वभाव को पा लेता है। जो राग-द्वेष के चिन्तन में फँसता है वह ऐसे ही कल्पनाओं के नीचे पीसा जाता है।
मैं चैतन्यस्वरूप आत्मा हूँ। आत्मा ही तो बादशाह है.... बादशाहों का बादशाह है। सब बादशाहों को नचानेवाला जो बादशाहों का बादशाह है वह आत्मा हूँ मैं।
अहं निर्विकल्पो निराकार रूपो
विभुर्व्याप्य सर्वत्र सर्वेन्द्रियाणाम्।
सदा मे समत्वं न मुक्तिर्न बन्धः
चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्।।
मुक्ति और बन्धन तन और मन को होते है। मैं तो सदा मुक्त आत्मा हूँ। अब मुझे कुछ पता चल रहा है अपने घर का। मैं अपने गाँव जाने वाली गाड़ी में बैठा तब मुझे अपने घर की शीतलता आ रही है। योगियों की गाड़ी मैं बैठा तो लगता है कि अब घर बहुत नजदीक है। भोगियों की गाड़ियों में सदियों तक घूमता रहा तो घर दूर होता जा रहा था। अपने घर में कैसे आया जाता है, मस्ती कैसे लूटी जाती है यह मैंने अब जान लिया।
मस्तों के साथ मिलकर मस्ताना हो रहा हूँ।
शाहों के साथ मिलकर शाहाना हो रहा हूँ।।
कोई काम का दीवाना, कोई दाम का दीवाना, कोई चाम का दीवाना, कोई नाम का दीवाना, लेकिन कोई कोई होता है जो राम का दीवाना होता है।
दाम दीवाना दाम न पायो। हर जन्म में दाम को छोड़कर मरता रहा। चाम दीवाना चाम न पायो, नाम दीवाना नाम न पायो लेकिन राम दीवाना राम समायो। मैं वही दीवाना हूँ।
ऐसा महसूस करो कि मैं राम का दीवाना हूँ। लोभी धन का दीवाना है, मोही परिवार का दीवाना है, अहंकारी पद का दीवाना है, विषयी विषय का दीवाना है। साधक तो राम दीवाना ही हुआ करता है। उसका चिन्तन होता है किः
चातक मीन पतंग जब पिया बन नहीं रह पाय।
साध्य को पाये बिना साधक क्यों रह जाय ?
हम अपने साध्य तक पहुँचने के लिए जेट विमान की यात्रा किये जा रहे हैं। जिन्हें पसन्द हो, इस जेट का उपयोग करें, नहीं तो लोकल ट्रेन में लटकते रहें, मौज उन्हीं की है।
यह सिद्धयोग, यह कुण्डलिनी योग, यह आत्मयोग, जेट विमान की यात्रा है, विहंग मार्ग है। बैलगाड़ीवाला चाहे पच्चीस साल से चलता हो लेकिन जेटवाला दो ही घण्टों में दरियापार की खबरें सुना देगा। हम दरियापार माने संसारपार की खबरों में पहुँच रहे हैं।
ऐ मन रूपी घोड़े ! तू और छलांग मार। ऐ नील गगन के घोड़े ! तू और उड़ान ले। आत्म-गगन  के विशाल मैदान में विहार कर। खुले विचारों में मस्ती लूट। देह के पिंजरे में कब तक छटपटाता रहेगा ? कब तक विचारों की जाल में तड़पता रहेगा ? ओ आत्मपंछी ! तू और छलांग मार। और खुले आकाश में खोल अपने पंख। निकल अण्डे से बाहर। कब तक कोचले में पड़ा रहेगा ? फोड़ इस अण्डे को। तोड़ इस देहाध्यास को। हटा इस कल्पना को। नहीं हटती तो ॐ की गदा से चकनाचूर कर दे।.......
******] पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू के सत्संग-प्रवचन से [******

बुधवार, 27 जून 2012

परिप्रश्नेन (2)...... ( पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू से)

प्र. – इन्द्रियों को रस लेने की आदत पड़ गई है तो क्या करना चाहिए ?
उ. – बार-बार भगवान से ईमानदारी से प्रार्थना करनी चाहिए किः "हे प्रभु ! इन्द्रियाँ मुझे घसीटकर भोगों में ले जाती हैं। हे नाथ ! तू दया कर। मैं जन्मों से भटका हूँ। अभी भी आदत ऐसी ही गन्दी है। देखने के पीछे, चबाने के पीछे, वाह-वाह सुनने के पीछे मेरा समय बरबाद हो रहा है। हे प्रभु ! तू मुझे कृपा-प्रसाद दे।'' ऐसा करके भगवान के शरण चले जाओ। विकार उठे उसी समय भगवान से प्रार्थना करने लगो। ऐसा करने से बच जाओगे और कभी फिसल भी जाओ तो निराश मत हो। फिर से उठो। फिर से प्रार्थना करो। हजार बार गिर जाओ तो भी निराश मत हो। आखिर तुम्हारी ही विजय होगी। भीतर का रस मिलने लग जायगा। वह रस ठीक से मिल गया फिर विकारों में ताकत नहीं तुम्हें बाँध सकें।
जिन्दा चूहा बिल्ली को नहीं मार सका तो मरा हुआ चूहा बिल्ली को क्या मारेगा ? ज्ञानी की बुद्धि को संसाररूपी चूहा नहीं फँसा सकता। साधक था तभी भी नहीं फँसा, तभी तो साधक हुआ। साधक अवस्था में नहीं फँसा तभी तो यहाँ आया। फँसता तो संसार के चक्कर में जाता। संसार में जन्म लिया, संसार में रहा, माँ-बाप, भाई-बहन, कुटुम्बी-पड़ोसियों के बीच रहा फिर भी मोह ममता को चीरता हुआ सत्संग में पहुँचा, गुरू के पास पहुँचा। अभी आप यहाँ पहुँचे हैं न ? जिन्दा संसाररूपी चूहा आपकी बुद्धिरूपी बिल्ली को फँसा नहीं सका। तभी तो आप ब्रह्मज्ञान के सत्संग में पहुँचे। ज्ञान हो जाय, बोध हो जाय फिर संसार क्या बाँधेगा आपकी बुद्धि को ? जगत का मिथ्यात्व पक्का हो गया तो फिर वह बुद्धि को दबा नहीं सकता। अभी भी जगत सच्चा लग रहा है फिर भी वह बुद्धि को दबा नहीं सकता इससे ईश्वर के मार्ग पर पहुँचे हो। इसीलिए सत्संग और वेदान्त में रूचि हो रही है। जगतरूपी चूहे का प्रभाव ज्यादा होता तो बुद्धिरूपी बिल्ली दबी रहती है।
जिसकी इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं उसकी बुद्धि परमात्मा में प्रतिष्ठित हो जाती है।

मंगलवार, 26 जून 2012

ना करो नींद से प्यार...................

राजा भर्तृहरि कहते हैं कि मैंने भोग नहीं भोगे, भोगों ने मुझे भोग लिया। समय ने मुझे काट लिया। बीमारी का इलाज तो हो सकता है परन्तु वृद्धावस्था को आने से कोई भी नहीं रोक सकता। सारा दिन निराकार से ही लेन देन है। सुख भी निराकार है और दुःख भी निराकार है। कच्चे क्षणिक वैराग्य से तो कल्याण नहीं हो सकता। जैसे अधकच्ची चीजें खाने से कष्ट होता है।
आग जलानी है तो फूँकने वाली जला, सेंकने वाली न जला।
जब तक खुदी नहीं आती तब तक खुदा का पता नहीं लगता। स्वामी राम को उसकी आत्मा की लगन खींच रही थी। उन्होंने अनारकली के भरे बाजार में अपने बच्चों के हाथों से उँगलियाँ खींच लीं और आत्मदेव की मस्ती में मस्त हो गये। चले जाने की ताकत आ गई।
काल का ज्ञात और अज्ञात रूप हमें फाड़े निगल रहा है। हम सभी नासमझ बनकर बेरहम दुनिया की वस्तुओं से प्रेम का नाटक खेल रहे हैं।
एक बार एक साहित्यकार साथी से पूछा गयाः
"भाई ! तुम आज इतने परेशान क्यों दिखाई देते हो ?"
"जीवन-संगिनी के निर्वाचन में घरबार छोड़ चुका हूँ क्योंकि वह जीवन और मृत्यु में भी मेरा साथ निभायेगी। संसार की कोई शक्ति मेरे समीप आने से उसे नहीं रोक सकेगी ?"
कुछ दिनों के बाद वे भावुक कलाकार पागलखाने में ही भगवान के प्यारे हो गये। क्योंकि जीवन संगिनी ने अपना घर उनके लिये नहीं छोड़ा। इसीलिए तो बुद्ध ने संपूर्ण सत्य के लिये घर छोड़ा। यशोधरा और राहुल को छोड़ दिया। यह कहते-कहते किः ओ क्षणभंगुर भव ! राम-राम। भर्तृहरि ने राज्य सिंहासन छोड़ा इसी सत्य-अन्वेषण के लिए कि प्रेम का अमर संदेश कहाँ है। और वह अन्त में मिला आत्म-साक्षात्कार में।
भला इस संसार के स्वार्थ भरे कण-कण में भी राहत है ? नहीं। कोमलता है ? नहीं। सत्यता है ? नहीं। यह जानते हुए भी मोहपाश में मानव की महाकाया क्यों समाहित है ? क्यों आबद्ध है ? इसका एक ही कारण है। मनुष्य अपने चिर सनातन विचाररूपी धन को इस संसार में भूल बैठा है। अभाव भी बिना विचार के मृत्यु है और वैभव भी मौत की ही निशानी है।
मानव बिना आत्मबोध के संसार में, संसार के कण-कण में मौत का बुलावा दे रहा है।
विवेक जागने का मार्ग है, गुरू के दर पर झुक जाओ और अन्तर्मुख हो जाओ। संत नुस्खा बताते हैं कि संसार का शहंशाह बनने के लिए उस अनिष्ट को स्वीकार करो। विचार करके अगर परिस्थिति नहीं सँभलती तो अनिष्ट होना ही है।
जो मुस्कुरा सकता है वह अमीर है। जो रोता है वह गरीब है। बाहर कमरा तो वातानुकूल है पर दिल चिन्तातुर है। तुमने तो दिल में अंगीठी सुलगाई हुई है। ऐ परमेश्वर की जात ! तू तो रूहानी नूर है। शुक्र कर कि तू है। तू है तो जवान है और अभी मौत के वारन्ट जारी नहीं हुए। मिट्टी के दीपक में तेल जल रहा है और तेल में बत्ती है। तू फटे पुराने कपड़ों में भी परमेश्वर की ओर भाग सकता है।
जिनकी टाँगें टूटी हुई हैं, हाथ टूटे हुए हैं उन्होंने ही अनिष्ट स्वीकार कर लिया है। चिन्ता परिस्थिति के अधीन नहीं, चिन्ता आदत है।
या कोई दीवाना हँसे, या जिसे तू तौफिक दे।
वरना इस दुनियाँ में रहके, मुस्कुरा सकता है कौन ?
या तो पागल हँसता है या जिसको तू भक्ति की मस्ती दे वह हँसता है। नहीं तो संसार में हँसना बड़ा कठिन है।
तूने तो यूँ ही ख्यालों का बोझा सिर पर उठाया हुआ है। जैसे गाड़ी पर बैठे आदमी ने सिर पर बोझा रक्खा हो। इसलिए अन्तर से शून्य होकर आत्मा का ध्यान, चिन्तन कर, तेरा भला होगा।
  
********] आश्रम द्वारा प्रकाशित पुस्तक "अनन्य योग" के लिया गया [*********

रविवार, 18 मार्च 2012

अभ्यास में रूचि क्यों नहीं होती ?...


15 जनवरी 1958, कानपुर।
सत्संग-प्रसंग पर एक जिज्ञासु ने पूज्य बापू से प्रश्न कियाः
"स्वामीजी ! कृपा करके बताएँ कि हमें अभ्यास में रूचि क्यों नहीं होती?"
पूज्य स्वामीजीः "बाबा ! अभ्यास में तब मजा आयेगा जब उसकी जरूरत का अनुभव करोगे।
एक बार एक सियार को खूब प्यास लगी। प्यास से परेशान होता दौड़ता-दौड़ता वह एक नदी के किनारे पर गया और जल्दी-जल्दी पानी पीने लगा। सियार की पानी पीने की इतनी तड़प देखकर नदी में रहने वाली एक मछली ने उससे पूछाः
'सियार मामा ! तुम्हें पानी से इतना सारा मजा क्यों आता है? मुझे तो पानी में इतना मजा नहीं आता।'
सियार ने जवाब दियाः 'मुझे पानी से इतना मजा क्यों आता है यह तुझे जानना है?'
मछली ने कहाः ''हाँ मामा!"
सियार ने तुरन्त ही मछली को गले से पकड़कर तपी हुई बालू पर फेंक दिया। मछली बेचारी पानी के बिना बहुत छटपटाने लगी, खूब परेशान हो गई और मृत्यु के एकदम निकट आ गयी। तब सियार ने उसे पुनः पानी में डाल दिया। फिर मछली से पूछाः
'क्यों? अब तुझे पानी में मजा आने का कारण समझ में आया?'
मछलीः 'हाँ, अब मुझे पता चला कि पानी ही मेरा जीवन है। उसके सिवाय मेरा जीना असम्भव है।'
इस प्रकार मछली की तरह जब तुम भी अभ्यास की जरूरत का अनुभव करोगे तब तुम अभ्यास के बिना रह नहीं सकोगे। रात दिन उसी में लगे रहोगे।
एक बार गुरु नानकदेव से उनकी माता ने पूछाः
'बेटा ! रात-दिन क्या बोलता रहता है?'
नानकजी ने कहाः 'माता जी ! आखां जीवां विसरे मर जाय। रात-दिन मैं अकाल पुरुष के नाम का स्मरण करता हूँ तभी तो जीवित रह सकता हूँ। यदि नहीं जपूँ तो जीना मुश्किल है। यह सब प्रभुनाम-स्मरण की कृपा है।'
इस प्रकार सत्पुरुष अपने साधना-काल में प्रभुनाम-स्मरण के अभ्यास की आवश्यकता का अनुभव करके उसके रंग में रंगे रहते हैं

--- स्रोत्र :- आश्रम द्वारा प्रकाशित पुस्तक "जीवन सौरभ" के लिया गया प्रसंग --- 


मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

दुःख कारण और निवारण


(पूज्य बापूजी की ज्ञानमयी अमृतवाणी)
सात सौ करोड़ लोग धरती पर हैं। कोई ऐसा नहीं कह सकता कि "मैंने फलाना काम दुःखी होने के लिए किया था अथवा फलाना काम दुःखी होने के लिए करता हूँ।" सारे जीव, सभी मनुष्य सुबह से शाम तक, जीवन से मौत तक, जीवन भर सुख को थामने और दुःख को भगाने में लगे हैं। फिर भी देखा जाता है कि जीवन में कहीं-कहीं थोड़ा-सा सुख आया, बाकी तो दुःख ही दुःख है।
ऋषि से उनके शिष्यों ने प्रश्न कियाः "मनुष्य रोते हुए जन्मता है, फरियाद करते हुए जीता है निराश होकर मरता है, इसके पीछे क्या कारण है।"
ऋषि ने उत्तर दियाः "प्रश्न तो बढ़िया है, मानवमात्र का मंगल करने वाला है। मनुष्य का वास्तविक सुखस्वभाव, चेतनस्वभाव अकालपुरुष से स्फुरित है। जैसे हर तरंग का मूल स्थान पानी है, ऐसे ही हर जीव का मूल स्थान सच्चिदानंद चैतन्य आत्मा है। वह उस आत्मदेव की प्रीति, आत्मदेव के ज्ञान से स्फुरित होता है। लेकिन बाहर के दृश्य जगत को, माया को सत्य मानकर यह पा लूँ, यह भोग लूँ, यह कर लूँ तो मैं सुखी हो जाऊँ, इस वहम से, इस नासमझी से जीव एक दुःख से दूसरे दुःख, दूसरे दुःख से तीसरे दुःख में भटकता रहता है।"
"तो इसका उपाय "
बोले, जिसके जीवन में बाह्य सुख और दुःख, बाह्य अनुकूलता और प्रतिकूलता का ज्यादा महत्व है, वह छोटे मन का आदमी है। लेकिन जो बाहर की अनुकूलता का बहुजनित में लगा देता है, प्रतिकूलता में सम रहता है, दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। (गीताः 2.56) जो दुःख में उद्विग्न नहीं होता, सुख में आसक्ति नहीं रखता, ऐसा समत्वयोग को जानने वाला पुरुष सुख-दुःख के बीच के सत्तास्वरूप साक्षी चैतन्य में टिकता है, वह बाजी मार लेता है।
सत्संग के बिना एक तो कान के द्वारों से संसार घुसता है, दूसरा आँख के दरवाजों से घुसता है। आँख से कम कान से ज्यादा घुसता है। किसी की निंदा कान से सुनकर उसके प्रति नफरत हो जाती है। किसी स्थान की प्रशंसा कान से सुनकर उससे आसक्ति हो जाती है। नफरत और आसक्ति हमारी आध्यात्मिक उन्नति में खलबली करती रहती है। जैसे पानी में उठ रही तरंग-पर-तरंग शांत पानी की गहराई नहीं देखने देती हैं, ऐसे ही जीव शांत, सुखस्वरूप, चेतनस्वरूप है लेकिन अनुकूलता के लिए तड़प और प्रतिकूलता से भागाभागी की दौड़ में जीव का हौसला खो गया है। भगवदाश्रय, सत्संग का आश्रय लेने से खोये हुए हौंसले को फिर पा सकते हैं।
दक्ष ने बाहर की सफलता को सर्वोपरि माना। हालाँकि दक्ष कोई साधारण राजा नहीं था, कई लोकपालों का अध्यक्ष था। कई राजे-महाराजे जिनके अधीन रहें, ऐसे लोकपालों का भी परम अध्यक्ष और भगवान शिवजी का ससुर था। फिर भी बाहर की चीजों को महत्व दिया और अंतरात्मा में गोता मारने से विमुख हो गया तो दक्ष की सारी करी-कमाई चौपट हो गयी, यज्ञ-विध्वंस हुआ, सिर कटा और बकरे का सिर लगा। अभी भी शिवालय में लोग बैं-बैं... करके याद दिलाते हैं कि ईश्वर की प्रीति के बिना, ईश्वर की शांति के बिना तुम बाहर कितनी भी मैं-मैं... करोगे, आखिर थक के संसार से रवाना हो जाओगे।
हमारे लिए माँ के शरीर में दूध बनाने की सत्ता उसी की है। माँ की जेर से नाभि जोड़ने की सत्ता, करुणा उसी की है। उस परमात्मा के चिंतन से हमारी बुद्धि से परमात्म-रस, परमात्म-ज्ञान, परमात्म-समता आ जाय तो हम संसार में आसानी से सफल हो सकते हैं।
राजा उत्तानपाद की दो पत्नियाँ थीं, सुरुचि और सुनीति। ध्रुव की माँ थी सुनिती। जो सामने दिखे मन उसके लिए ललक जाय और आगे-पीछे का विचार किये बिना उसके पीछे लग जाय, वह है सुरुचि। आज के जमाने में सुरुचि की दौड़ में लोग बड़े परेशान हो रहे हैं। अनिद्रा का रोग, आत्महत्या की मुसीबत, प्रेमी-प्रेमिकाओं को एड्स, यह सब सुरुचि का ही परिवार है। जिसमें रुचि हुई, वह कैसे भी करके करने लगो। चोरी, बेईमानी, कपट कुछ भी करके रुचि के अनुसार पाओ, खाओ, मजा करो - यह दुःख का कारण है। परिणाम का विचार करके और परिणामों को सफलता देने वाले परमात्मा में गोता मारकर निर्णय करना, भोगना या पाना यह हो गयी सुमति।
सुमति की धनी सुनिती का बेटा ध्रुव था और सुरुचि का बेटा उत्तम था। सुरुचि के जीवन में कलह, अशांति रही और उसके पुत्र के जीवन में भी देख लो। वह यक्षों से मारा गया, राजपाट चला गया। सुनिती के बेटे ध्रुव को भगवान के प्यारे संत नारदजी का सत्संग मिला, भगवन्नाम की दीक्षा मिली। सुनिती के पुत्र की मति सुमति हुई, राज्य  भी अच्छी तरह से सँभाला और ब्रह्मज्ञान भी पाया। जहाँ सुरुचि है वहाँ आदमी एक दुःख से निकलता है तो दूसरे दुःख आता है तो भी उसकी शक्ति बढ़ाता है। सुमतिवाला दुःख का भोगी न बनकर दुःखहारी में अपनी गति-प्रीति बढ़ाता है। उसका दुःख भी तपस्या और समता का सुख-साधन बन जाता है। सुमतिवाले के पास दुःख भी साधन बन जाता है और सुख भी साधन बन जाता है। सुरुचिवाले को सुख भोग-विलास करा के खोखला बना देता है और दुःख दूसरों पर दोषारोपण व राग-द्वेष करा के और भी कमजोर कर देता है, रागी-द्वेषी-मोही बना देता है। सुख-दुःख तो सभी के जीवन में आते हैं लेकिन सुमति वाला इनका सदुपयोग करके परमात्मा तक पहुँचता है और सुरुचिवाला इनमें उलझकर खप जाता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 227
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