मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

अहंकार और प्रेम.... पूज्य बापू जी की पावन अमृतवाणी



जो जगत से सुखी होना चाहता है वह अकड़ने का मजा लोग - 'मेरे पास इतनी गाड़ियाँ हैं, इतनी मोटरें हैं, इतना अधिकार है, और अधिकार हथिआऊँ....' यह रावण का रास्ता है और गुरु के प्रसाद से जो तृप्त हुए हैं, उनका राम जी का रास्ता है। सब कुछ देकर नंगे पैर जंगलों में घूमते हैं फिर भी राम जी संतुष्ट हैं, प्रसन्न हैं और रावण के पास सब कुछ है फिर भी असंतुष्ट है, अप्रसन्न है। अपनी पत्नी और लंका की सुंदरियाँ मिलने पर भी अहंकार चाहता है कि इतनी सुंदर सीता को लंका की शोभा बढ़ाने को ले आऊँ। अहंकार ले-ले के, बड़ा बनकर सुखी होना चाहता है और प्रेम दे-देकर अपने-आप में पूर्णता का एहसास करता है।
अहंकार क्रोध में, लोभ में, विकारों में बरसकर, दूसरों को परिताप पहुँचाकर सुखी होना चाहता है लेकिन प्रेम अपनी मधुमय शीतलता से बरसते हुए दूसरों के दुःख, रोग, शोक हरकर उनकी शीतलता में अपनी शीतलता का एहसास करता है। अहंकार की छाया ऐसी है कि अहंकार छायामात्र शरीर को 'मैं' मानेगा और अपने आत्मा को 'मैं' रूप में न सुनेगा, न मानेगा, न जानेगा। जबकि प्रेम शरीर को क्षणभंगुर जानता है व मन परिवर्तनशील, तन परिवर्तनशील, चित्त परिवर्तनशील.... उन सबका साक्षी जो है अपरिवर्तनशील, उस अपने आत्मदेव को 'मैं' मानता है, जानता है।
जो सबका साक्षी है, उसमें तृप्त होने का यत्न करता है तो जिज्ञासु है। तृप्त हो गया तो व्यासजी है, कृष्णजी है, रामजी है, नारायणस्वरूप है। अहंकार तोड़ता है और महापुरुष जोड़ते हैं। अहंकार अपनी छाया से हमें विक्षिप्त और वासनावान करता है लेकिन प्रेम अपनी प्रभा से हमें विकसित, संतुष्ट, तृप्त, दानी और निरभिमानी करता है। अहंकार संग्रह से संतुष्ट होता है और प्रेम बाँटकर तृप्त होता है।
अहंकार बाह्य शक्ति, सामग्री से बड़ा होना चाहता है और प्रेम परमात्म-प्रीति से पूरे बड़प्पन में अपने 'मैं' को मिलाने में राजी रहता है। तरंग कितनी भी बड़ी बने फिर भी सागर नहीं हो सकती है लेकिन छोटी-सी तरंग अपने को पानी माने तो सागर तो वह खुद ही है। ऐसे ही यह जीव शरीर को 'मैं' मानकर, कुछ पा के जो बड़ा बनता है, ये उसके बड़प्पन के ख्वाब रावण की दिशा के हैं। एम.बी.ए. पढ़े हुए बच्चों को सिखाया जाता है कि गंजे आदमी को कंघी बेचनी है और नंगे लोगों को कपड़े धोने का साबुन बेचना है। चाहे उनको काम आये या न आये, उनसे पैसे बनाओ। साधन इकट्ठे करो और सुखी रहो। जो भी ऐसा रास्ता लेते हैं, वे खुद परेशान रहते हैं और दूसरों का शोषण करते हैं लेकिन जो शबरी का, मीरा का, रैदासजी का, राजा जनक का रास्ता लेते हैं वे खुद भी तृप्त होते हैं, दूसरों को भी तृप्त करते हैं।
स तृप्तो भवति। सः अमृतो भवति।
स तरति लोकांस्तारयति।
अहंकार लेने का अवसर खोजता है और प्रेम देने का अवसर खोजता है। चाहे निगाहों से पोसे, वाणी से पोसे, हरड़ रसायन से पोसे, पंचगव्य से पोसे अथवा हरि ॐ करके, प्रणाम करके पोसे, नम्रता के गुण देकर उनकी उन्नति करे.... प्रेम अवसर खोजता रहता है कि मेरे सम्पर्क में आने वाले पोषित हों। मेरे शिष्य जायेंगे, भण्डारा करेंगे, सेवाएँ करेंगे। सरकार का एक करोड़ निकलता है तो लोगों तक कितने पहुँचते होंगे भगवान जाने..... लेकिन हमारे यहाँ से एक करोड़ निकलता है तो लोगों तक तीन करोड़ होकर पहुँचता है। हमारे यहाँ से एक रूपया निकलता है तो शिष्यों द्वारा उसमें और सहयोग मिलता है। कोई सर्विस चार्ज नहीं, कोई हड़प चार्ज नहीं क्योंकि जो प्रेमी गुरु के प्यारे हैं, वे पहुँचाने में अपना भी सहयोग कर देते हैं। अहंकारी सबसे आगे और विशेष होने में मानता है और प्रेमी सबके पीछे रहकर, सेवा खोज के, मिटकर अमिट को पाने में सफल हो जाता है। राजा चतुरसिंह के उदयपुर राज्य में सत्संग होता था। वे संत-महात्मा के चरणों में जाते, पीछे बैठ जाते।
प्रेम गली अति साँकरी, ता में दो न समाहिं।
अहंकार और प्रेम..... एक म्यान में दो तलवारें नहीं रहतीं। अहंकार सब कुछ पा के, कुछ बनकर सुखी होने की भ्रान्ति में टकराते-टकराते हार जाता है, थक जाता है और प्रेम सब कुछ देते-देते अपने पूर्ण स्वभाव को जागृत कर लेता है।
ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर, कार्य रहे न शेष।
मोह कभी न ठग सके, इच्छा नहीं लवलेश।।
जो संसार में सुखी होना चाहता है, वह बड़े दुःख को बुलाता है। संसार दुःखालय है। संसार की सुविधा पाकर जो सुखी रहना चाहता है, वह किसी-न-किसी से धोखा, शोषण और कई वस्तुओं की पराधीनता करेगा और जो संसार की सेवा खोजकर निर्वासनिक होता है, उसका प्रेम-स्वभाव स्वतः जागृत होता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 225
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
print

गुरुवार, 29 सितंबर 2011

तुम लगे रहो........ पूज्य बापू जी



समत्व योग बड़ा महत्त्वपूर्ण योग है। इस योग को समझने के लिए, इसमें प्रवेश करने के लिए धारणा, ध्यान, समाधि करो। समाधि करना अच्छा है, ध्यान करना अच्छा है, जप करना अच्छा है, सेवा करना अच्छा है लेकिन इन सबका फल यह है कि तुम विदेही की नाईं शोभा पा लो।

एक महात्मा बड़े सूक्ष्म विषय पर प्रवचन करते थे। वेदांत की गूढ़ बातें साधकों को समझाते थे। एक भक्त खोमचा लेकर साधकों की ग्राहकी भी कर लेता था और महात्मा का प्रवचन भी सुन लेता था। भक्त और साधक जब सत्संग सुनते थे तो वह भी सत्संग में एकतान हो जाता। कई महीने सत्संग सुनने के बाद एक बार वह बाबाजी के चरणों में दंडवत प्रणाम करके कहता हैः "गुरु महाराज ! मैंने वेदान्त को सुन लिया, समझ लिया कि यह (संसार) सरकने वाली चीज है। अन्वय(संबंध) और व्यतिरेक(असमानता) का सिद्धान्त मैंने जान लिया। जाग्रत का व्यतिरेक स्वप्न में हो जाता है, स्वप्न का व्यतिरेक सुषुप्ति में हो जाता है लेकिन आत्मा का तीनों अवस्थाओं में अन्वय है। दुःख है, दुःख आया तो सुख गायब का हो गया। सुख आया तो दुःख गायब हो गया। चिंता आयी तो आनंद गायब हो गया, हर्ष गायब हो गया और हर्ष आया तो चिंता गायब हो गयी किंतु इनमें आत्मा ज्यों का तयों है। यह मैं जान तो गया। बचपन आया, चला गया लेकिन बचपन का द्रष्टा रहा। जवानी आयी, चली गयी लेकिन उसको देखने वाला रहा। बुढ़ापा आया, मौत आयी परंतु मौत के बाद भी मैं रहता हूँ। मर जाने के बाद भी सुखी रहूँ – ऐसा भाव हम लोगों का होता है। यह बात आपकी मैंने गुरु महाराज ! अच्छी तरह से समझ ली, लेकिन आत्मा की मुक्तता का अनुभव मुझे नहीं हो रहा है। आत्मा मुक्त है, शरीर संसारी है। शरीर की संसार के साथ और आत्मा की परमात्मा के साथ एकता अनुभव करने की आप श्री की तरफ से जो वाणी थी, वह वाणी मैं समझ तो गया किंतु गुरु महाराज ! हे कृपानाथ ! हे प्राणिमात्र के परम मित्र, परम हितैषी गुरुवर ! मैं तो एक छोटा-सा धंधेवाला दिख रहा हूँ, खोमचे वाला, चना बेचने वाला। आपके वचन समझ तो गया हूँ लेकिन आत्मा का आनंद प्रकट नहीं हुआ।"

बाबा जी ने कहाः "कोई प्रतिबंधक प्रारब्ध, रूकावट का कोई प्रारब्ध होगा, इसीलिए तुम समझ गये फिर भी आनंद प्रकट नहीं होता है। तुम लगे रहना।"

गर्मियों के दिन थे, धूप तड़ाके की थी, लू चल रही थी। एक मोची उस गर्मी में, लू में नंगे पैर, नंगे सिर कष्ट का शिकार होता हुआ लथड़ता-लथड़ता आकर एक पेड़ के करीब बेहोश होकर गिरा। खोमचे वाले ने देखा कि गर्मी के मारे इसके प्राण सूख रहे हैं, कंठ सूख गया है। उसने उसके सिर पर हलकी-सी तेल की मालिश की। शर्बत बना कर उसके मुँह में थोड़ा-थोड़ा डाला। फिर चने वने खिलाकर उसको जरा तसल्ली दी। वह आदमी उठ खड़ा हुआ। जब वह जाने लगा तो धन्यवाद से, कृतज्ञता से उसकी आँखें भर गयीं। बार-बार उसकी आँखों से कुछ टपक रहा है। कुछ आशीर्वाद का भाव टपक रहा है। वह मोची तो चला गया लेकिन मोची के द्वारा वह अंतर्यामी परमात्मा इस पर बरस पड़ा। इसके हृदय में वह आनंद छलकने लगा। 'मोची के वेश में, खोमचेवाले के वेश में, श्रोताओं के वेश में, धनवान के वेश में और निर्धन के वेश में यह जो दिख रहा है, वह उसकी माया है लेकिन इसको जो चला रहा है वह महेश्वर है। वह सच्चिदानंद सोऽहम् है। वही मैं हूँ।' – ऐसा बोध प्रकट होने लगा। चित्त में बड़ी शांति, बड़ी निर्मलता, बड़ी आध्यात्मिक पूँजी प्रकट होने लगी। गुरु जी के पास गया। प्रणाम करके अपनी स्थिति का वर्णन करने लगा कि थोड़ी-सी सेवा करने से यह आत्मानंद प्रकट हुआ है।

बाबा ने कहा कि "निष्काम भाव से किये हुए कर्म अंतःकरण को शुद्ध करते हैं और शुद्ध हृदय में अपना मुख दिखता है। जैसे साफ आईने में अपना चेहरा दिखता है, ऐसे ही शुद्ध हृदय में अपने स्वरूप का बोध होता है। तेरा प्रतिबंधक प्रारब्ध हट गया।"

घटना घट जाय तो घड़ी भर में काम हो जात है। लगे रहें, कोई-न-कोई ऐसी घड़ी आती है जब सुने हुए उस तत्त्वज्ञान का, उसकी गरिमा का हम प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। ॐ... ॐ..... ॐ.....

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 13,14 अंक 225

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

बुधवार, 28 सितंबर 2011

मोटर कार की चार अवस्थाएँ...


मोटर कार की चार अवस्थाएँ होती हैं-

पहली अवस्थाः गाड़ी पड़ी है गैरेज मे, साफ-सुथरी, ज्यों-की-त्यों। गाड़ी भी शांत, पहिए भी स्थिर और इंजिन भी चुप। पड़ी हुई गाड़ी को जंग लग रहा है, समय बरबाद हो रहा है।

दूसरी अवस्थाः इंजिन को चालू किय लेकिन गाड़ी को गियर में नहीं डाला। अभी वह गैरेज में ही है। गति नहीं करती। पहिये घूमते नहीं। केवल इंजिन चल रहा है। पेट्रोल जल रहा है बेकार में। कुछ कार्य सिद्ध नहीं हो रहा है।

तीसरी अवस्थाः गाड़ी का गियर घुमाया, गाड़ी गैरेज से बाहर आयी और सड़क पर भाग रही है। इंजिन भी चल रहा है, पहिये भी घूम रहे हैं, गाड़ी भी दौड़ रही है, पेट्रोल भी जल रहा है। मशीन चल-चलकर जीर्ण हो रही है।

चौथी अवस्थाः रास्ते में लम्बी ढलान आयी। चतुर ड्राइवर न गियर 'न्यूट्रल' कर दिया, इंजिन बन्द कर दिय फिर भी गाड़ी आगे भाग रही है, मंजिल तय कर रही है, इंजिन की कोई आवाज नहीं, पेट्रोल का खर्च नहीं। मधुर यात्रा हो रही है।

ऐसे ही अन्तःकरणरूपी गाड़ी की चार अवस्थाएँ हैं-

पहली अवस्थाः कुछ जीव अन्तःकरण की घनीभूत सुषुप्त अवस्था में जी रहे हैं, जैसे कि वृक्ष, पाषाण आदि। कोई कामना नहीं, कोई संकल्प नहीं फिर भी दुःख भोग रहे हैं बेचारे। पड़े-पड़े तप रहे हैं।

दूसरी अवस्थाः कुछ लोग ऐसे होते हैं कि संकल्प-पर-संकल्प, विकल्प-पर-विकल्प करते रहते हैं, पलायनवादी होते हैं। चाहिए तो बढ़िया खाने को, बढ़िया पहनने को, बढ़िय रहने को लेकिन कर्म नहीं करते। भीतर संकल्प-विकल्प का इंजिन धमाधम चलता रहता है लेकिन पहिये घूमते नहीं, हाथ-पैर उचित दिशा में उचित समय पर चलते नहीं। पड़े हैं आलसी-पलायनवादी होकर।

तीसरी अवस्थाः कुछ लोग जैसे संकल्प और कामनाएँ होती हैं, वैसे कर्म करते हैं। उनका आयुष्यरूपी पेट्रोल जल रहा है, शक्ति खर्च हो रही है, जीवनरूपी गाड़ी घिस रही है।

चौथी अवस्थाः कोई कोई विरले ज्ञानीजन होते हैं जिनके भीतर काम और संकल्प निवृत्त हो चुके हैं। प्रारब्ध वेग के ढलान में जीवन की गाड़ी मधुरता से सरक रही है। बड़े मजे से यात्रा हो रही है।

ज्ञानी में कोई कामना और संकल्प नहीं होता इसलिए कार्यों का बोझ उनको नहीं लगता। उनके द्वारा बड़े-बड़े कार्य संपन्न होते रहते है, फिर भी वे निर्लेप नारायण। अपने सहज स्वाभाविक आत्मानन्द में मस्त। संसारीजन की एकाध दुकान भी होती है तो दिवाली के समय सिर पर हाथ देकर चिन्ता करने लगता है, बोझे से दब जाता है।

जो लोग कामना से आक्रान्त हैं, उनको बड़ी परेशानी होती है। रावण का अधःपतन क्यों हुआ ? कामना से आक्रान्त होकर सीताजी को ले गया। देवता लोग जिसके यहाँ चाकर की नाईं सेवा करें, ऐसे बलवान् रावण का अधःपतन कामना ने कराया।

हनुमानजी जब बन्धन में बँधकर लंकेश के सामने खड़े हुए, तब लंकेश ने पूछाः

"तुम कौन हो ?"

"रामजी का दूत हूँ।"

"सागर पार करके कैसा आया ?"

"गोपद की तरह उसे लाँघकर।"

"मेरे पुत्र को मार डाला ?"

"ऐसे ही भून डाला। मारने की मेहनत नहीं करनी पड़ी।"

"इतना वीर होकर भी तू बँधा कैसे ?"

"मैं अखण्ड बाल ब्रह्मचारी हूँ। अशोक वाटिका में उन राक्षसियों पर अनजाने में दृष्टि पड़ गई, इसलिए बँध गया। मेरी तो अनजाने में नारियों पर दृष्टि पड़ी और मैं फँस गया और तू कामना से प्रेरित होकर जान-बूझकर सीता जी को उठा लाया है तो तेरा क्या हाल होगा यह भी तो जरा पूछ ले ! चाहे तो मैं अकेला तुझे चूर्ण कर सकता हूँ, लेकिन रामजी ने मेरे स्वामी ने कहा है कि पता लगाकर आओ, इसलिए मैं पता लगाने को ही आया हूँ।"

"श्रीयोगवाशिष्ठ महारामायण" में मुनिशार्दूल वशिष्ठजी कहते हैं- "हे रामजी ! ऐसा कौन सा दुःख है जो कामना वाले को नहीं भोगना पड़ता ? ऐसा दुःख नर्क में भी नही है जैसा कामना वाले के हृदय में होता है। ऐसा सुख स्वर्ग में भी नहीं है जैसा निष्कामी व्यक्ति के हृदय में छलकता है।"

अपने स्वरूप का ज्ञान नहीं है तब तक कर्म जोर मारते हैं। आत्मस्वरूप का ज्ञान होते ही कर्म जल जाते है। ऐसे ज्ञानी बड़े-बड़े विशाल आयोजनों का आरम्भ करते हुए दिखते हैं, बड़ी-बड़ी प्रवृत्तियाँ करते हुए दिखते हैं फिर भी अपनी दृष्टि में वे कुछ नहीं करते। सदा अकर्त्ता पद में शान्त प्रतिष्ठित हैं। बाहर से सुख लेने की लालचवाली कामनाएँ ज्ञानाग्नि में जल गई हैं। कर्त्तृत्त्व-भोक्तृत्त्व भाव दग्ध हो जाता है। पहले की चली हुई गाड़ी अब प्रारब्धवेग से ऐसे ही मजे से चल रही है। पेट्रोल का खर्च नहीं, इंजिन की शांति।....

आश्रम द्वारा प्रकाशित पुस्तक " सामर्थ्य स्रोत" से लिया गया प्रसंग

ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ


मंगलवार, 27 सितंबर 2011

ऊँची समझ......


एक संत के पास बहरा आदमी सत्संग सुनने आता था। उसे कान तो थे पर वे नाड़ियों से जुड़े नहीं थे। एकदम बहरा, एक शब्द भी सुन नहीं सकता था। किसी ने संतश्री से कहाः
"बाबा जी ! वे जो वृद्ध बैठे हैं, वे कथा सुनते-सुनते हँसते तो हैं पर वे बहरे हैं।"
बहरे मुख्यतः दो बार हँसते हैं – एक तो कथा सुनते-सुनते जब सभी हँसते हैं तब और दूसरा, अनुमान करके बात समझते हैं तब अकेले हँसते हैं।
बाबा जी ने कहाः "जब बहरा है तो कथा सुनने क्यों आता है ? रोज एकदम समय पर पहुँच जाता है। चालू कथा से उठकर चला जाय ऐसा भी नहीं है, घंटों बैठा रहता है।"
बाबाजी सोचने लगे, "बहरा होगा तो कथा सुनता नहीं होगा और कथा नहीं सुनता होगा तो रस नहीं आता होगा। रस नहीं आता होगा तो यहाँ बैठना भी नहीं चाहिए, उठकर चले जाना चाहिए। यह जाता भी नहीं है !''
बाबाजी ने उस वृद्ध को बुलाया और उसके कान के पास ऊँची आवाज में कहाः "कथा सुनाई पड़ती है ?"
उसने कहाः "क्या बोले महाराज ?"
बाबाजी ने आवाज और ऊँची करके पूछाः "मैं जो कहता हूँ, क्या वह सुनाई पड़ता है ?"
उसने कहाः "क्या बोले महाराज ?"
बाबाजी समझ गये कि यह नितांत बहरा है। बाबाजी ने सेवक से कागज कलम मँगाया और लिखकर पूछा।
वृद्ध ने कहाः "मेरे कान पूरी तरह से खराब हैं। मैं एक भी शब्द नहीं सुन सकता हूँ।"
कागज कलम से प्रश्नोत्तर शुरू हो गया।
"फिर तुम सत्संग में क्यों आते हो ?"
"बाबाजी ! सुन तो नहीं सकता हूँ लेकिन यह तो समझता हूँ कि ईश्वरप्राप्त महापुरुष जब बोलते हैं तो पहले परमात्मा में डुबकी मारते हैं। संसारी आदमी बोलता है तो उसकी वाणी मन व बुद्धि को छूकर आती है लेकिन ब्रह्मज्ञानी संत जब बोलते हैं तो उनकी वाणी आत्मा को छूकर आती हैं। मैं आपकी अमृतवाणी तो नहीं सुन पाता हूँ पर उसके आंदोलन मेरे शरीर को स्पर्श करते हैं। दूसरी बात, आपकी अमृतवाणी सुनने के लिए जो पुण्यात्मा लोग आते हैं उनके बीच बैठने का पुण्य भी मुझे प्राप्त होता है।"
बाबा जी ने देखा कि ये तो ऊँची समझ के धनी हैं। उन्होंने कहाः "आप दो बार हँसना, आपको अधिकार है किंतु मैं यह जानना चाहता हूँ कि आप रोज सत्संग में समय पर पहुँच जाते हैं और आगे बैठते हैं, ऐसा क्यों ?"
"मैं परिवार में सबसे बड़ा हूँ। बड़े जैसा करते हैं वैसा ही छोटे भी करते हैं। मैं सत्संग में आने लगा तो मेरा बड़ा लड़का भी इधर आने लगा। शुरुआत में कभी-कभी मैं बहाना बना के उसे ले आता था। मैं उसे ले आया तो वह अपनी पत्नी को यहाँ ले आया, पत्नी बच्चों को ले आयी – सारा कुटुम्ब सत्संग में आने लगा, कुटुम्ब को संस्कार मिल गये।"
ब्रह्मचर्चा, आत्मज्ञान का सत्संग ऐसा है कि यह समझ में नहीं आये तो क्या, सुनाई नहीं देता हो तो भी इसमें शामिल होने मात्र से इतना पुण्य होता है कि व्यक्ति के जन्मों-जन्मों के पाप-ताप मिटने एवं एकाग्रतापूर्वक सुनकर इसका मनन-निदिध्यासन करे उसके परम कल्याण में संशय ही क्या !

आश्रम से प्रकाशित पुस्तक " सत्संग अमृत " से लिया गया प्रसंग
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

सोमवार, 26 सितंबर 2011

तमाचे की करामात.....


पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से
मुंबई के नजदीक गणेशपुरी है। गणेशपुरी, वज्रेश्वरी में नाना औलिया नाम के एक महापुरुष रहा करते थे। वे मुक्तानंदजी के आश्रम के नजदीक की सड़क पर मैले कुचैले कपड़े पहने पड़े रहते थे अपनी निजानंद की मस्ती में। वे दिखने में तो सादे-सूदे थे पर बड़ी ऊँची पहुँच के धनी थे।
उस समय घोड़ागाड़ी चलती थी, ऑटोरिक्शा गिने गिनाये होते थे। एक बार एक डिप्टी कलेक्टर (उपजिलाधीश) घोड़ागाड़ी पर कहीं जा रहा था। रास्ते में बीच सड़क पर नाना औलिया टाँग पर टाँग चढ़ाये बैठे थे।
कलेक्टर ने गाड़ीवान को कहाः "हॉर्न बजा, इस भिखारी को हटा दे।"
गाड़ीवान बोलाः "नहीं, ये तो नाना बाबा हैं ! मैं इनको नहीं हटाऊँगा।"
कलेक्टरः "अरे ! क्यों नहीं हटायेगा, सड़क क्या इसके बाप की है ?" वह गाड़ी से उतरा और नाना बाबा की डाँटने लगाः "तुम सड़क के बीच बैठे हो, तुमको अच्छा लगता है ? शर्म नहीं आती ?" बाबा दिखने में दुबले पतले थे लेकिन उनमें ऐसा जोश आया कि उठकर खड़े हुए और उस कलेक्टर का कान पकड़कर धड़ाक से एक ने तमाचा जड़ दिया। आस पास के सभी लोग देख रहे थे कि नाना बाबा ने कलेक्टर को तमाचा मार दिया। अब तो पुलिस नाना बाबा का बहुत बुरा हाल करेगी।
लेकिन ऐसा सुहावना हाल हुआ कि 'साधूनां दर्शनं लोके सर्वसिद्धकरं परम्।' की तरह 'साधूनां थप्पड़ं सर्वसिद्धिकरं परं... महापातकनाशनं... परं विवेकं जागृतम्।' पंजा मार दिया तो उसके पाँचों विकारों का प्रभाव कम हो गया। कलेक्टर ने सिर नीचे करके दबी आवाज में गाड़ीवान को कहाः "गाड़ी वापस लो।" जहाँ ऑडिट करने जा रहा था वहाँ न जाकर वापस गया अपने दफ्तर में और त्यागपत्र लिखा। सोचा, "अब यह बंदों की गुलामी नहीं करनी है। संसार की चीजों को इकट्ठा कर-करके छोड़कर नहीं मरना है, अपनि अमर आत्मा की जागृति करनी है। मैं आज से सरकारी नौकरी को सदा के लिए ठुकराता हूँ और अब असली खजाना पाने के लिए जीवन जीऊँगा।' बन गये फकीर एक थप्पड़ से।
कहाँ तो एक भोगी डिप्टी कलेक्टर और नाना साहब औलिया का तमाचा लगा तो ईश्वर के रास्ते चलकर बन गया सिद्धपुरुष !
तुम में से भी कोई चल पड़े ईश्वर के रास्ते, हो जाय सिद्धपुरुष ! नानासाहब ने एक ही थप्पड़ मारा और कलेक्टर ने अपना काम बना लिया। अब मैं क्या करूँ ? थप्पड़ से तुम्हारा काम होता हो तो मैं उसके लिए भी तैयार हूँ और कहानी-कथा, सत्संग सुनाने से तुम्हारा काम होता हो तो भी मैं तैयार हूँ लेकिन तुम अपना काम बनाने का इरादा कर लो। लग जाय तो एक वचन भी लग जाता है।

आश्रम से प्रकाशित पुस्तक " सत्संग अमृत " से लिया गया प्रसंग
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ