मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

बुधवार, 21 सितंबर 2011

घोड़ी गई...... हुक्का रह गया


मैंने सुना है एक चुटकुला। कोई नया-नया चोर कहीं से एक बढ़िया, पानीदार, आभासम्पन्न, तेज घोड़ी चुरा लाया। सोचा कि ऐसी बढ़िया घोड़ी पर सवार करके गाँव में घूमूँगा तो लोग समझ जाएंगे और मैं पकड़ा जाऊँगा। ढोर बाजार में जाकर इसे बेच दूँ। पैसे मिलेंगे। एक दो-साथी बना लूँगा फिर दूसरी घोड़ियाँ ले आएँगे। खूब पैसे कमाएँगे।
कामना और संकल्प उसके बढ़ गये।
घोड़ी लेकर वह पहुँचा बाजार में। अपराधी मानस था। चोरी का माल था। रंगेहाथ पकड़े जाने का डर था। भीतर से खोखला हो गया था। दबी आवाज में धीरे-धीरे लोगों से बोलताः
"घोड़ी चाहिए घोड़ी ? पानीदार घोड़ी है।"
एक आदमी मामला समझ गया। रोब भरी आवाज में पूछाः
"कितने में देगा रे ?"
चोर तो सोचता रह गया। कितने में बेचूँ ? घोड़ों की लेन-देन उसके बाप दादों ने भी नहीं की थी। वह हक्का बक्का रह गया। वह आदमी बोलाः
"घोड़ी दिखती तो अच्छी है लेकिन सवारी करके देखना पड़ेगा। तू मेरा यह हुक्का पकड़। मैं एक चक्कर लगाकर आता हूँ।"
वह घोड़ी लेकर रवाना हो गया। चोर ने वापस बुलाया तो उसने कहाः "जिस भाव में तु लाया था उसी भाव में मैं लिये जा रहा हूँ। चिन्ता मत कर।"
चोर की घोड़ी तो गई, हाथ में हुक्का रह गया। घर पहुँचा तो किसी ने पूछाः "तू तो घोड़ी बेचने गया था ! क्या हुआ ?"
पोपला मुँह बनाकर चोर बोलाः "घोड़ी तो गई और मेरा कलेजा जलाने के लिय यह हुक्का रह गया हाथ में।"
ऐसे ही समय की धारा बहती चली जाती है और कलेजा जलाने वाली कामनाएँ अन्तःकरण में पड़ी रह जाती है। देह रूपी घोड़ा रवाना हो जाता है और सूक्ष्म शरीर में कामनारूपी हुक्का कलेजा जलाता रहता है। फिर जीव प्रेत होकर भटकता है।
देह छूट जाये और कोई कामना नहीं रहे तो जीव विदेही हो जाये, ब्रह्मस्वरूप हो जाय। कामना रह गई और देह छूट गई, दूसरी देह नहीं मिली तो जीव प्रेत होकर भटकता है। खाने- पीने की वासना है लेकिन बिना देह के खा-पी नहीं सकता। भोगने की वासना है लेकिन भोग नहीं सकता। फिर वासना तृप्त करने के लिए दूसरों के शरीर में घुसता है, वहाँ भी झाड़-फूँकवाले लोग उसकी पिटाई करते हैं।
पिटाई किसकी होती है ? इच्छा, कामना, वासना की ही पिटाई होती है। पूजा किसकी होती है ? निष्कामता की पूजा होती है। जिनके अन्तःकरण से वासना-कामना निवृत्त हो जाती है, वे महापुरूष होकर पूजे जाते हैं, वे साक्षात् शिवस्वरूप हो जाते हैं। ऐसे सत्पुरूषों के लिए ही कहा हैः
गुरूर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णुः गुरूर्देवो महेश्वरः।
गुरूर्साक्षात्परब्रह्म तस्मैं श्रीगुरवे नमः।।
गुरू ब्रह्म कैसे ? वे हमारे हृदय में ज्ञान भरते है। गुरू विष्णु कैसे ? वे हमारे ज्ञान की पुष्टि करते हैं। गुरू महेश कैसे ? वे हमारे चित्त में छुपी हुई कामनाओं को भस्म करते हैं।

स्रोत:- आश्रम से प्रकाशित पुस्तक " सामर्थ्य स्रोत" से लिया गया प्रसंग
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मंगलवार, 20 सितंबर 2011

पाँच रूपये और गधा..........


कोई वैश्य भक्त खूब आदर-भाव से साधु-संतो की सेवा करता था। घूमते-घामते कोई त्रिकाल ज्ञानी संत उसके घर में अतिथि हो गये। भक्त की भक्ति-भावना देखकर उनका चित्त प्रसन्न हुआ। उन्होंने भक्त के नन्हें-मुन्ने बेटे की हस्तरेखा देखी और कहाः "भक्तराज ! तुम्हारे बेटे की रेखाएँ ऐसा कह रही हैं कि इसके भाग्य में पाँच रूपये और गधा सदा रहेगा।"
भक्त ने कहाः "जो भी रहे, स्वामी जी ! प्रारब्ध वेग से हर जीव आता है। उसके भाग्य  जो हो, सो ठीक है। जैसी प्रभु की मर्जी !"
पन्द्रह साल के बाद वे बाबाजी घूमते घामते फिर उसी भक्त के द्वार पर पधारे। भक्त तो देव हो गये थे, उनका बेटा घर पर था। जवान हो गया था और धन्धा कर रहा था। बाबाजी ने कहाः
"तुम्हारे पिताजी बड़े साधुसेवी थे, भक्त थे। हम पहले भी आ चुके है। इस बार भी दो-चार दिन यहाँ रहना चाहते हैं।"
बेटा भी बड़ा संतप्रेमी था। उत्साह से वह बोलाः "हाँ हाँ महाराज ! खूब आनन्द से रहिए, कृपा कीजिए। यह घर आप ही की सेवा के लिए है। हमारा अहोभाग्य है कि आप जैसे संत- महात्मा की चरणरज से यह आँगन पावन हुआ।"
वह लड़का कुछ भी धन्धा करता, कमाता तो उसके पास आय-व्यय में जमा-उधार करके पाँच रूपये और एक गधा बचता था। बाबाजी आये, भोजन-पानी का खर्च बढ़ा फिर भी आखिर में पाच रूपये और गधा ही बचा।
बाबाजी ने कहाः "तेरे पास जो पाँच रूपये हैं उसका   भण्डारा कर दे। अन्य साधु-संतों को भोजन करा दे।"
उसने पाँच रूपये का भण्डारा कर दिया। दूसरे दिन भी कमाया और खर्च किया तो पाँच रूपये और गधा बचा। बाबाजी ने कहाः "यह गधा बेच दे और पाँच रूपये भी खर्च कर डाल।" उसने वैसा ही किया। शाम को उसके पास कुछ न रहा।
सुबह उठा तो सामने कोई व्यक्ति मिला और बोलाः
''रात को मुझे एक स्वप्न आया और किसी देव ने कहा कि सुबह-सुबह जो कोई मिले उसको पाँच रूपये और गधा भेंट कर दो। अब कृपा करके आप इसे स्वीकार करो।"
लड़के ने जाकर बाबाजी को बताया। बाबाजी बोलेः
"यह तो देव को करना ही पड़ेगा। तेरे भाग्य में लिखा है तो देव को व्यवस्था करनी ही पड़ेगी।"
"बाबाजी ! अब क्या करूँ ?"
"तेरे पास जो कुछ आवे उसे खर्च कर दे, दान कर दे। कुछ भी कर, लेकिन अपने पास कुछ मत रख।"
वह लड़का ऐसा ही करने लगा। वह रोज-रोज सब लुटा देता और दूसरे दिन पाँच रूपये और गधा उसे मिल ही जाता। प्रतिदिन ऐसा होने लगा। आखिर उस लड़के का भाग्य साकार रूप लेकर बाबाजी के सामने प्रकट हो गया और बोलाः
"यह कैसी युक्ति आपने लड़ाई ! हमारी नाक में दम आ गया इसके पाँच रूपये और गधे की व्यवस्था करने में। वह लुटा देता है और मुझे किसी-न-किसी को निमित्त बना कर उसे पाँच रूपये और गधा दिलाना पड़ता है। कृपा करके आप ऐसी सीख इसको मत दीजिए। लोगों को प्रेरणा करते-करते और इसका बैलेन्स ठीक रखते-रखते हम थक गये।"
बाबाजी ने कहाः "तो इसका इतना छोटा ‘बैलेन्स’ क्यों बनाया ? बड़ा बना दो।"
भाग्य ने अपनी हार स्वीकार कर ली। लड़के का भाग्य श्रीमंत सेठ की नाईं हो गया।
इस कहानी से पता चलता है कि जो अवश्यंभावी है, वह होकर ही रहता है। जो खान-पान, पत्नी-पुत्र-परिवार, धन-यश आदि जो प्रारब्ध में होगा, वह आकर ही रहेगा तो हम उसकी कामना क्यों करें ? कामना करके अपनी इज्जत क्यों बिगाड़ें ? जो होना है सो होना है, जो पाना है सो पाना है, जो खोना है सो खोना है। सब सूत्र प्रभु के हाथों में.... नाहक करनी का बोझ उठाना ? कबीर जी कहते है-
मेरो चिन्त्यो होत नहीं, हरि को चिन्त्यो होत।
हरि को चिन्त्यो हरि करे, मैं रहूँ निश्चिन्त।।
कई बार ऐसे प्रसंग देखे गये हैं: माता-पिता बहुत लालायित रहते हैं कि अपनी लड़की की मँगनी हो जाय, लेकिन नहीं होती। फिर थककर छोड़ देते हैं..... जैसी भगवान की मर्जी ! जो भी होगा, ठीक है। तब अपने आप कार्य निपट जाता है, अच्छी जगह घर मिल जाता है, बच्ची सुखी होती है।
अपने करने से सब कार्य अगर हो जाते, अपनी कामना के मुताबिक सब होता रहता तो संसार में कोई दुःखी रहता ही नहीं। कामनाओं और इच्छाओं से काम्य वस्तुएँ मिल जातीं और टिक जातीं तो सब लोग सुखी होते। संसार में देखा जाय तो आत्मज्ञानरहित जो भी हैं, वे दुःखी हैं।
कोई कार्य, कोई संकल्प पूरा हो भी जाता है तो उसमें केवल आपका पुरूषार्थ ही कारणभूत नहीं होता। कर्म की सिद्धि में कारणभूत पाँच बातें भगवदगीता में बताई गई हैं-
अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
विविधाश्च पृथ्कचेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम्।।
"कर्मों की सिद्धि में अधिष्ठान, कर्त्ता, करण, नाना प्रकार की चेष्टाएँ और देव ये पाँच हेतु हैं।"
(भगवद् गीताः 18.14)
कार्य की सिद्धि के लिए यत्न तो करो लेकिन सुख भोगने की कामना मत करो। कोई वस्तु मिलने वाली हो तो पहले प्रारब्ध का संयोग चाहिए, अपना पुरूषार्थ चाहिए, उचित दिशा में पुरूषार्थ का विवेक चाहिए।

स्रोत:- आश्रम से प्रकाशित पुस्तक "सामर्थ्य स्रोत" से लिया गया प्रसंग...
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सोमवार, 19 सितंबर 2011

आठ पापों का घड़ा...........


एक बार कवि कालिदास बाजार में घूमने निकले। एक महिला घड़ा और कुछ कटोरियाँ लेकर बैठी थी ग्राहकों के इंतजार में । कविराज को कौतूहल हुआ कि यह महिला क्या बेचती है ! पास जाकर पूछाः

"बहन ! तुम क्या बेचती हो ?"

"मैं पाप बेचती हूँ। मैं स्वयं लोगों से कहती हूँ कि मेरे पास पाप हैं, मर्जी हो तो ले लो। फिर भी लोग चाहपूर्वक पाप ले जाते हैं।" महिला ने कुछ अजीब सी बात कही। कालिदास उलझन में पड़ गये। पूछाः

"घड़े में कोई पाप होता है ?"

"हाँ... हाँ.... होता है, जरूर होता है। देखो जी, मेरे इस घड़े में आठ पाप भरे हुए हैं: बुद्धिनाश, पागलपन, लड़ाई-झगड़े, बेहोशी, विवेक का नाश, सदगुण का नाश, सुखों का अन्त और नरक में ले जाने वाले तमाम दुष्कृत्य।"

"अरे बहन ! इतने सारे पाप बताती है, तो आखिर है क्या तेरे घड़े में ? स्पष्टता से बता तो कुछ समझ में आवे।" कालिदास की उत्सुकता बढ़ रही थी।

वह महिला बोलीः "शराब ! शराब !! शराब !!! यह शराब ही उन सब पापों की जननी है। जो शराब पीता है वह उन आठों पापों का शिकार बनता है।"

कालिदास उस महिला की चतुराई पर खुश हो गये।


स्रोत:- आश्रम से प्रकाशित पुस्तक "सामर्थ्य स्रोत" से लिया गया प्रसंग..

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रविवार, 18 सितंबर 2011

पाँच आश्चर्य.............

महाभारत का युद्ध पूरा हुआ। पाण्डव विजयी हुए। कौरवों का संहार हुआ। भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहाः

"धर्मराज ! युद्ध पूरा हुआ है। धर्म कि विजय हुई है। अधर्मियों का नाश हुआ है। अब तुम राज्याभिषेक की तैयारी करो। राज्य की बागडोर सँभालो।"

युधिष्ठिर ने कहाः "प्रभु ! हजारों-लाखों क्षत्रिय युवकों का रक्त बहा है। अपने कितने ही स्वजन इस युद्ध में स्वाहा हो गये हैं। अब मुझे वैराग्य आ गया है। राजगद्दी पर बैठना मुझे रूचता नहीं। सोचता हूँ: कुछ दिन के लिए गंगा किनारे चला जाऊँ। एकान्त में रहकर तपस्या करूँ, ध्यान-भजन करूँ, प्रायश्चित करके अपने कल्मष धोऊँ। निर्मल होकर आऊँ फिर शांति से राज्य करूँ।"

श्रीकृष्ण मुस्कुराये। बोलेः "पाण्डुपुत्र ! फिर तुम शांति से राज्य नहीं कर सकते क्योंकि अब कलियुग का प्रवेश हो रहा है। उसके लक्षणों की झाँकी करनी हो तो तुम पाँचों भाई भिन्न-भिन्न दिशाओं में घूमने चले जाओ। वहाँ पाँचों को कुछ-न-कुछ अलग-अलग आश्चर्य दिखेंगे। जाकर आओ। शाम को इसके बारे में बात करेंगे।"

पाँचों पाण्डव घूमने चले गये।

युधिष्ठिर ने देखा कि एक हाथी खड़ा है। उसकी दो सूँड है। आश्चर्य ! दो सूँडवाला हाथी ! देखकर धर्मराज दंग रह गये।

अर्जुन ने दूसरा आश्चर्य देखा। उत्तर दिशा में एक पक्षी है। उसके पंख पर वेद के मंत्र और धर्म की गाथाएँ लिखी हैं, लेकिन वह पक्षी मुर्दे का मांस खा रहा है।

भीम ने तीसरा आश्चर्य देखा। एक गाय अपनी नवजात बछड़ी को इस प्रकार चाट रही है कि बछड़ी लहूलुहान हो रही है। फिर भी गाय चाटना छोड़ती नहीं।

सहदेव ने चौथा आश्चर्य देखा। पाँच-छः कुएँ हैं। इर्दगिर्द के सभी कुओं में छलोछल पानी भरा है और बीचवाला कुआँ बिल्कुल खाली है।

नकुल ने पाँचवाँ आश्चर्य देखा। एक पहाड़ से चट्टान गिर रही है। पेड़ों से टकराई लेकिन रूकी नहीं। दूसरी चट्टानों से आ लगी, लेकिन वे उसे रोक नहीं पाईँ।आखिर वह चट्टान लुढ़कती-लुढ़कती नीचे आते-आते एक तिनके के सहारे रूक गई। जिसे पेड़ न थाम सके, चट्टानें न थाम सकीं उसे एक छोटे-से तिनके ने थाम लिया। बड़ा आश्चर्य !

पाँचों भाई इस प्रकार पाँच आश्चर्य देखकर शाम को श्रीकृष्ण के पास आये और अपनी-अपनी बात बताई। युधिष्ठिर के द्वारा देखे गये दो सूँडवाले हाथी के बारे में बताते हुए श्रीकृष्ण बोलेः

"दो सूँडवाला हाथी माने कलियुग में दोनों तरफ से शोषण करने वाले शासक होंगे। दूसरा आश्चर्य कि पक्षी के पंख पर शास्त्र लिखे हों और वह पक्षी मुर्दे का मांस खा रहा हो। इसका मतलब है कि कलियुग में मत, पंथ, सम्प्रदाय आदि शास्त्र की बातें करनेवाले बहुत लोग होंगे, लेकिन वे मुर्दे विषयों की कामनावाले ज्यादा होंगे।

तीसरा आश्चर्य कि गाय अपनी बछड़ी को चाट-चाटकर लहूलुहान कर रही थी अर्थात् कलियुग में आदमी पुत्र-परिवार को इतना मोह करेगा, इतनी ममता करेगा कि बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जायें, अपने आत्मविश्वास में टिक जायें, ऐसी योग्यता ही नष्ट कर देगा। बच्चों को जरा छोड़ देना चाहिए, उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने देना चाहिए। मोह-ममता करके उनका जितना अधिक लालन-पालन करोगे, ऐश-आराम में रखोगे, उतनी ही उनकी जीवन-शक्ति कुण्ठित रह जाएगी।

चौथा आश्चर्य कि चारों ओर के कुओं में पानी और बीच का कुआँ खाली। इसका मतलब यह है कि कलियुग के धनवान, वैभववान, सत्तावान, साधन-सम्पन्न श्रीमान् लोग शादी-ब्याह, पार्टियों में लाखों रूपये खर्च कर डालेंगे लेकिन पड़ोस में ही कोई दीन-दुखिया रहता हो, अस्त-व्यस्त जीवन बिता रहा हो, भूखा-प्यासा दिन काट रहा हो तो उसके घर में सहयोग करने की बात नहीं सोचेंगे, सहायरूप नहीं बनेंगे। दिखावे में तो लाखों रूपये फूँक मारेंगे लेकिन बुझते हुए जीवनदीप में तेल नहीं डालेंगे। अपनी घर की दीवाली तो सब मनाते हैं, लेकिन कभी-कभी साधनों से रहित पड़ोसियों के घर में भी दीवाली मनाना चाहिए। उनके बच्चों से स्नेहकरना चाहिए, उनको मिठाई खिलाना चाहिए, आर्थिक सहाय करना चाहिए।

पाँचवाँ आश्चर्य यह था कि पहाड़ों से चट्टान गिरी जिसको बड़े-बड़े पेड़ न थाम सके, दूसरी चट्टाने न थाम सकीं और घास के छोटे से तिनके ने थाम लिया। इसका मतलब यह है कि कलियुग में आदमी के पास धन और सत्ता की व्यवस्था होगी फिर भी उसका पतन धन या सत्ता से रूकेगा नहीं। उसका मन नीचे के केन्द्रों में गिरता रहेगा। धन के ढेर उसे थाम नहीं सकेंगे, सत्ता का प्रभाव उसे थाम नहीं सकेगा, लेकिन रामनाम का छोटा-सा तिनका भी गिरते हुए मन को थाम लेगा।"

ईश्वर-नाम संकीर्तन की बड़ी महिमा है ! कीर्तन करते-करते फिर थोड़ी देर शान्त हो जाना चाहिए। जप करते-करते उसके अर्थ में लीन हो जाना चाहिए। सत्संग की पुस्तक पढ़ते-पढ़ते आनन्द आ जाये तो पढ़ना रोक दो, जप करना रोक दो और आनन्दस्वरूप ईश्वर में खो जाओ, अपने आत्मस्वरूप में गोता मारो।

रात्रि को सोते समय भी कोई अच्छी पुस्तक पढ़कर सोओ। तुम्हारे अचेतन मन में आत्मरस आयेगा। सत्संग-ध्यान की कैसेट सुनते-सुनते सो जाओ, तुम्हारी निद्रा योगनिद्रा में बदलने लगेगी। जीवन मधुर और सुख शांति से समृद्ध होने लगेगा।

सुबह उठते ही सदा उम्दा विचार करो। हम लोग तो दूसरों की चीजों को देखकर ईर्ष्या करते हैं और ऐसी चीजें हमारे पास आ जायें..... ऐसी कामना करते हैं। अरे भोले महेश ! प्रारब्ध में होगा और पुरूषार्थ जुड़ेगा तो वे नश्वर चीजें आकर ही रहेंगी। तू उनकी चिन्ता और कामना मत कर। तू तो अपने आपमें ही डट जा।

मानव ! तुझे नहीं याद क्या ? तू ब्रह्म का ही अंश है।

कुल गोत्र तेरा ब्रह्म है, सदब्रह्म तेरा वंश है।।

चैतन्य है तू अज अमल है, सहज ही सुखराशि है।

जन्मे नहीं मरता नहीं, कूटस्थ है अविनाशी है।।

जो आध्यात्मिक उन्नति करता है, उसकी भौतिक उन्नति सहज में होने लगती है। सुख भीतर की चीज है और भौतिक चीज बाहर की है। सुख और भौतिक चीजों में कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है।

दरिद्र कौन है ? जो दूसरों से सुख चाहता है, वह दरिद्र है। मूर्ख कौन है ? जो इस संसार को सत्य मानकर उस पर विश्वास करता है, वह मूर्ख है। संसार के स्वामी जगदीश्वर को नहीं खोजता है, वह महामूर्ख है।

अपनी मनोवांछित इच्छाओं के मुताबिक काम्य पदार्थ पाकर जो सुखी होना चाहता है वह सुख और विघ्न-बाधाओं के बीच दुःखी होते-होते जीवन पूरा कर देता है।

समय बीत जायेगा और काम अधूरा रह जायेगा। आखिर पश्चाताप हाथ लगेगा। उससे पहले ईश्वर के राह की यात्रा शुरू कर दो। रात्रि में चलते-चलते ठोकरें खानी पड़े, इससे अच्छा है कि दिन-दहाड़े चल लो । बुढ़ापा आ जाय, बुद्धि क्षीण हो जाय, इन्द्रियाँ कमजोर हो जायें, देह काँपने लगे, कुटुम्बीजन मुँह मोड़ लें, लोग अर्थी में बाँधकर 'राम बोलो भाई राम...' करते हुए श्मशान में ले जायें उससे पहले अपने आपको शाश्वत में पहुँचा दो तो बेड़ा पार हो जाय।


स्रोत:- आश्रम से प्रकाशित पुस्तक "सामर्थ्य स्रोत" से लिया गया प्रसंग..

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शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

यह तो गुरु का अधिकार है ! (ब्रह्मनिष्ठ पूज्य बापूजी की अमृतवाणी)


एक बड़ा भारी पंडित था, वामन पंडित। वह दिग्विजय की मशाल लेकर घूमा। जो भी उससे शास्त्रार्थ करे, उसको परास्त कर देता। चलते-चलते थकान के कारण एक वृक्ष के नीचे बैठा। संध्या का समय था। उस वृक्ष पर ब्रह्मराक्षस रहता था। दूसरा ब्रह्मराक्षस बैठने को आया तो पहले वाला बोलाः "ऐ ! हट जा, हट जा।"

दूसरा बोलाः "बैठने की जगह तो है और तू भी ब्रह्मराक्षस, मैं भी ब्रह्मराक्षस, फिर मुझे क्यों हटाता है भैया ?"

"अरे, तेरे को पता नहीं है। यह पंडित मरकर इधर आयेगा, ब्रह्मराक्षस होकर यहाँ रहेगा। यह उसकी जगह है।"

"क्यों ?"

"वह शास्त्रार्थ करके दूसरों को नीचा दिखाता है, अपने अहं को पोसता है। शास्त्र तो अच्छे हैं लेकिन उसने अहं पोसने का रास्ता अपनाया है। अहं पोसने के लिए जो धर्म का उपयोग करता है, वह ब्रह्मराक्षस होने के ही काबिल है न ! उसका स्थान यहीं है।"

पंडित वृक्ष के नीचे संध्या कर रहा था। उसकी कुछ पुण्याई होगी, संध्या का कुछ प्रभाव होगा। इन दोनों का संवाद वामन पंडित ने सुन लिया। उसने सोचा, "बाप रे ! मैं इतना भारी पंडित, मेरे नाम से सारे विद्वान कन्नी काटते हैं, और मैं मरूँगा तो ब्रह्मराक्षस होऊँगा ! जिसको विद्या का गर्व होता है वही तो ब्रह्म राक्षस होता है! क्या मेरा विद्या का गर्व मुझे ब्रह्मराक्षस की योनि में ले जायेगा !"

इसी भक्तिमार्ग में "मैं" को झुकाने के लिए पत्थर की मूर्ति के आगे भी लेटकर प्रणाम करना होता है। इस 'मैं' को ही मिटाने की यह व्यवस्था है, नहीं तो मूर्ति को तुम्हारे सिर झुकाने से क्या लेना है !

संध्याकाल में सुषुम्ना नाड़ी खुली रहती है। संध्याकाल कल्याणकारी कालों में से है। चार संध्याकाल होते हैं। सुबह सूर्योदय नहीं हुआ हो पर होने वाला हो और चन्द्रमा दिखाई देने बंद हुए हों तब संधिकाल होता है, वह मंत्र सिद्धि का योग है। उस समय देवता तो सोते हैं, देवता माने इन्द्रियों का आकर्षण सोता है और मंत्र देवता जाग्रत होते हैं। वह आपका शुभ संकल्प फलने की अवस्था होती है। दूसरा दोपहर को 12 बजने के कुछ मिनट पहले और कुछ मिनट बाद संधिकाल होता है। तीसरा सूर्य अस्ताचल को नहीं लेकिन सूर्य का प्रकाश दिन जैसा नहीं रहा, कुछ लालिमा रही। सूर्य जब विदा हो रहें वह संधिकाल है। चौथा रात्रि को 12 बजे संधिकाल होता है। इन संधिकालों को चतुर्मास में जो संभाल लें और ध्यान भजन करें, उसके ध्यान-भजन में विशेष सफलता, बरकत आदि की सम्भावना है।

अब उस पंडित के लिए चतुर्मास था कि कौन-सा मास था लेकिन पंडितक की वह वेला धनभागी वेला थी। जिस वेला में किसी के निमित्त आदमी का अहंकार विसर्जित हो, ममता विसर्जित हो, भगवान की प्रीति जगे, भगवान की शरण जाय, वह धनभागी घड़ियाँ होती हैं।

वामन पंडित ने सभी विजयपत्र फाड़ दिये, सारे शास्त्र वहीं विसर्जित कर दिये और हिमालय को चला गया। मैं वामन पंडित को खूब-खूब धन्यवाद दूँगा। ब्रह्मराक्षसों की बात सुनकर सर्वस्व त्यागने का कैसा सामर्थ्य था ! मनुष्य के पास यह बहुत बड़ी ईश्वरीय देन है – सर्वत्याग का सामर्थ्य। मौत तो सर्वत्याग करा देगी, जीते जी सर्वस्व-त्याग का सामर्थ्य बना रहे तो सर्व जिसका है, वह सर्वेश्वर आपका आत्मदेव है, वह प्रकट हो जायेगा।

त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्। (गीताः 12.12)

वामन पंडित ने वर्षों तपस्या की लेकिन भगवान प्रकट नहीं हुए और न तत्त्वरूप से ही अनुभव हुआ। तो उन्होंने सोचा कि 'इतना-इतना किया, कुछ नहीं हो रहा है तो अब जीकर क्या करेंगे ! इस अहंकारी शरीर को जिलाकर क्या करना !' ऐसा सोचकर पहाड़ की चोटी पर चढ़े और 'जय श्रीहरि' करके नीचे कूदने को गये। हरि तो हरि हैं। मेरे गुरु भी हरि हैं, हरि गुरु हैं। सर्वदेवमयो गुरुः। 'गु', 'र', 'उ',....'गु' माने सिद्धिदायक बीज, 'रू', माने अज्ञान हटाने वाले, उर में प्रकट होने वाले। भगवान का एक नाम 'गुरु' भी है। गुरु प्रकट हुए, हरि प्रकट हुए। हरि, गुरु – ये सब एक ही सदवस्तु के भिन्न-भिन्न नाम हैं। ईश्वर तो अंतरात्मा हैं, बाहर प्रकट होकर हाथों में ले लिया और वामन पंडित को रोक दिया। अपना बायाँ हाथ सिर पर रखकर बोलेः "वामन पंडित ! तेरा मंगल हो।"

"भगवान ! आप इतनी तपस्या और इतनी कसौटी के बाद मिले लेकिन फिर भी... शास्त्र ने तो कहा है कि दायाँ हाथ सिर पर रखते हैं, आपने बायाँ क्यों रखा?"

"अरे वामन ! तू इतना विद्वान होकर यह नहीं जानता कि सिर पर दायाँ हाथ रखना गुरु का अधिकार है, भगवान का नहीं। जब तक सिर पर गुरु का दायाँ हाथ नहीं आता, तब तक यात्रा पूरी नहीं होती।"

अब जरूरी नहीं है कि गुरु अपना दायाँ हाथ ऐसे ही रखें, मानसिक रूप से भी रख सकते हैं, दृष्टि से भी होता, वह तो गुरु जानते हैं।

"भगवान ! आपने गुरु के अधिकार की सुरक्षा करने के लिए मेरे सिर पर अपना दायाँ हाथ न रखकर बायाँ हाथ रखा ?"

"हाँ।"

"तो क्या गुरु का अधिकार आपसे भी बड़ा है ?"

"बड़ा है, मैं अवतार लेकर भी गुरु के शरणागत होता हूँ। गुरु तो गुरु ही हैं। वामन पंडित ! जब तक गुरु का ज्ञान नहीं मिलता, तब तक मेरा मायावी रूप दिखता है। वह बुलाने पर प्रकट होता है और बाद में अंतर्धान हो जाता है। कभी किसी निमित्त प्रकट हुआ थोड़ी देर के लिए, फिर अदृश्य हो जाता है लेकिन गुरु तो....।"

"दायाँ हाथ सिर पर रखने वाले गुरु मुझे कहाँ मिलेंगे ?"

"वामन ! सज्जनगढ़ में मिलेंगे।"

"अच्छा, समर्थ रामदास !"

प्रभु को प्रणाम किया। प्रभु तो अंतर्धान हो गये और ये भाई साहब पहुँचे महाराष्ट्र के सज्जनगढ़ में। समर्थ रामदास की स्तुति की। रामदास प्रसन्न हुए। उन्होंने अपना दायाँ हाथ पीठ पर रखा और बोलेः "वाह ! वाह ! आ गये, अपने घर आ गये, ठीक ! अपना अहंकार छोड़ने के लिए इतनी तपस्या की और भगवान ने तुम्हें दर्शन दिया, फिर इधर भेजा है, शाबाश !"

पंडित बोलाः "गुरुदेव ! आपने दायाँ हाथ तो रखा है लेकिन सिर पर क्यों नहीं रखते ?"

"अरे पगले ! सिर पर तो नारायण ने अपना बायाँ हाथ रख दिया न !"

"फिर आप दायाँ हाथ क्यों नहीं रखते ?"

"अरे, नारायण का बायाँ भी नारायण का है और दायाँ भी नारायण का है। जब नारायण ने रख दिया तो यहाँ भी तो नारायण है। सब नारायण ही नारायण है। नारायण में से समर्थ रामदास है।" दो वचन सुना दिये। वामन पंडित अहंकाररहित हो गये, आत्मजागृति हो गयी, ब्राह्मी स्थिति हो गयी। क्या महापुरुषों की कृपा और क्या सामर्थ्य है ! वामन पंडिति गदगद हो गये कि 'मेरे सारे शास्त्र और सारी तपस्या गुरुकृपा के आगे बहुत छोटी हो गयी।'

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2011, पृष्ठ संख्या 6,7 अंक 224

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