मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

रविवार, 18 सितंबर 2011

पाँच आश्चर्य.............

महाभारत का युद्ध पूरा हुआ। पाण्डव विजयी हुए। कौरवों का संहार हुआ। भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहाः

"धर्मराज ! युद्ध पूरा हुआ है। धर्म कि विजय हुई है। अधर्मियों का नाश हुआ है। अब तुम राज्याभिषेक की तैयारी करो। राज्य की बागडोर सँभालो।"

युधिष्ठिर ने कहाः "प्रभु ! हजारों-लाखों क्षत्रिय युवकों का रक्त बहा है। अपने कितने ही स्वजन इस युद्ध में स्वाहा हो गये हैं। अब मुझे वैराग्य आ गया है। राजगद्दी पर बैठना मुझे रूचता नहीं। सोचता हूँ: कुछ दिन के लिए गंगा किनारे चला जाऊँ। एकान्त में रहकर तपस्या करूँ, ध्यान-भजन करूँ, प्रायश्चित करके अपने कल्मष धोऊँ। निर्मल होकर आऊँ फिर शांति से राज्य करूँ।"

श्रीकृष्ण मुस्कुराये। बोलेः "पाण्डुपुत्र ! फिर तुम शांति से राज्य नहीं कर सकते क्योंकि अब कलियुग का प्रवेश हो रहा है। उसके लक्षणों की झाँकी करनी हो तो तुम पाँचों भाई भिन्न-भिन्न दिशाओं में घूमने चले जाओ। वहाँ पाँचों को कुछ-न-कुछ अलग-अलग आश्चर्य दिखेंगे। जाकर आओ। शाम को इसके बारे में बात करेंगे।"

पाँचों पाण्डव घूमने चले गये।

युधिष्ठिर ने देखा कि एक हाथी खड़ा है। उसकी दो सूँड है। आश्चर्य ! दो सूँडवाला हाथी ! देखकर धर्मराज दंग रह गये।

अर्जुन ने दूसरा आश्चर्य देखा। उत्तर दिशा में एक पक्षी है। उसके पंख पर वेद के मंत्र और धर्म की गाथाएँ लिखी हैं, लेकिन वह पक्षी मुर्दे का मांस खा रहा है।

भीम ने तीसरा आश्चर्य देखा। एक गाय अपनी नवजात बछड़ी को इस प्रकार चाट रही है कि बछड़ी लहूलुहान हो रही है। फिर भी गाय चाटना छोड़ती नहीं।

सहदेव ने चौथा आश्चर्य देखा। पाँच-छः कुएँ हैं। इर्दगिर्द के सभी कुओं में छलोछल पानी भरा है और बीचवाला कुआँ बिल्कुल खाली है।

नकुल ने पाँचवाँ आश्चर्य देखा। एक पहाड़ से चट्टान गिर रही है। पेड़ों से टकराई लेकिन रूकी नहीं। दूसरी चट्टानों से आ लगी, लेकिन वे उसे रोक नहीं पाईँ।आखिर वह चट्टान लुढ़कती-लुढ़कती नीचे आते-आते एक तिनके के सहारे रूक गई। जिसे पेड़ न थाम सके, चट्टानें न थाम सकीं उसे एक छोटे-से तिनके ने थाम लिया। बड़ा आश्चर्य !

पाँचों भाई इस प्रकार पाँच आश्चर्य देखकर शाम को श्रीकृष्ण के पास आये और अपनी-अपनी बात बताई। युधिष्ठिर के द्वारा देखे गये दो सूँडवाले हाथी के बारे में बताते हुए श्रीकृष्ण बोलेः

"दो सूँडवाला हाथी माने कलियुग में दोनों तरफ से शोषण करने वाले शासक होंगे। दूसरा आश्चर्य कि पक्षी के पंख पर शास्त्र लिखे हों और वह पक्षी मुर्दे का मांस खा रहा हो। इसका मतलब है कि कलियुग में मत, पंथ, सम्प्रदाय आदि शास्त्र की बातें करनेवाले बहुत लोग होंगे, लेकिन वे मुर्दे विषयों की कामनावाले ज्यादा होंगे।

तीसरा आश्चर्य कि गाय अपनी बछड़ी को चाट-चाटकर लहूलुहान कर रही थी अर्थात् कलियुग में आदमी पुत्र-परिवार को इतना मोह करेगा, इतनी ममता करेगा कि बच्चे अपने पैरों पर खड़े हो जायें, अपने आत्मविश्वास में टिक जायें, ऐसी योग्यता ही नष्ट कर देगा। बच्चों को जरा छोड़ देना चाहिए, उन्हें अपने पैरों पर खड़े होने देना चाहिए। मोह-ममता करके उनका जितना अधिक लालन-पालन करोगे, ऐश-आराम में रखोगे, उतनी ही उनकी जीवन-शक्ति कुण्ठित रह जाएगी।

चौथा आश्चर्य कि चारों ओर के कुओं में पानी और बीच का कुआँ खाली। इसका मतलब यह है कि कलियुग के धनवान, वैभववान, सत्तावान, साधन-सम्पन्न श्रीमान् लोग शादी-ब्याह, पार्टियों में लाखों रूपये खर्च कर डालेंगे लेकिन पड़ोस में ही कोई दीन-दुखिया रहता हो, अस्त-व्यस्त जीवन बिता रहा हो, भूखा-प्यासा दिन काट रहा हो तो उसके घर में सहयोग करने की बात नहीं सोचेंगे, सहायरूप नहीं बनेंगे। दिखावे में तो लाखों रूपये फूँक मारेंगे लेकिन बुझते हुए जीवनदीप में तेल नहीं डालेंगे। अपनी घर की दीवाली तो सब मनाते हैं, लेकिन कभी-कभी साधनों से रहित पड़ोसियों के घर में भी दीवाली मनाना चाहिए। उनके बच्चों से स्नेहकरना चाहिए, उनको मिठाई खिलाना चाहिए, आर्थिक सहाय करना चाहिए।

पाँचवाँ आश्चर्य यह था कि पहाड़ों से चट्टान गिरी जिसको बड़े-बड़े पेड़ न थाम सके, दूसरी चट्टाने न थाम सकीं और घास के छोटे से तिनके ने थाम लिया। इसका मतलब यह है कि कलियुग में आदमी के पास धन और सत्ता की व्यवस्था होगी फिर भी उसका पतन धन या सत्ता से रूकेगा नहीं। उसका मन नीचे के केन्द्रों में गिरता रहेगा। धन के ढेर उसे थाम नहीं सकेंगे, सत्ता का प्रभाव उसे थाम नहीं सकेगा, लेकिन रामनाम का छोटा-सा तिनका भी गिरते हुए मन को थाम लेगा।"

ईश्वर-नाम संकीर्तन की बड़ी महिमा है ! कीर्तन करते-करते फिर थोड़ी देर शान्त हो जाना चाहिए। जप करते-करते उसके अर्थ में लीन हो जाना चाहिए। सत्संग की पुस्तक पढ़ते-पढ़ते आनन्द आ जाये तो पढ़ना रोक दो, जप करना रोक दो और आनन्दस्वरूप ईश्वर में खो जाओ, अपने आत्मस्वरूप में गोता मारो।

रात्रि को सोते समय भी कोई अच्छी पुस्तक पढ़कर सोओ। तुम्हारे अचेतन मन में आत्मरस आयेगा। सत्संग-ध्यान की कैसेट सुनते-सुनते सो जाओ, तुम्हारी निद्रा योगनिद्रा में बदलने लगेगी। जीवन मधुर और सुख शांति से समृद्ध होने लगेगा।

सुबह उठते ही सदा उम्दा विचार करो। हम लोग तो दूसरों की चीजों को देखकर ईर्ष्या करते हैं और ऐसी चीजें हमारे पास आ जायें..... ऐसी कामना करते हैं। अरे भोले महेश ! प्रारब्ध में होगा और पुरूषार्थ जुड़ेगा तो वे नश्वर चीजें आकर ही रहेंगी। तू उनकी चिन्ता और कामना मत कर। तू तो अपने आपमें ही डट जा।

मानव ! तुझे नहीं याद क्या ? तू ब्रह्म का ही अंश है।

कुल गोत्र तेरा ब्रह्म है, सदब्रह्म तेरा वंश है।।

चैतन्य है तू अज अमल है, सहज ही सुखराशि है।

जन्मे नहीं मरता नहीं, कूटस्थ है अविनाशी है।।

जो आध्यात्मिक उन्नति करता है, उसकी भौतिक उन्नति सहज में होने लगती है। सुख भीतर की चीज है और भौतिक चीज बाहर की है। सुख और भौतिक चीजों में कोई विशेष सम्बन्ध नहीं है।

दरिद्र कौन है ? जो दूसरों से सुख चाहता है, वह दरिद्र है। मूर्ख कौन है ? जो इस संसार को सत्य मानकर उस पर विश्वास करता है, वह मूर्ख है। संसार के स्वामी जगदीश्वर को नहीं खोजता है, वह महामूर्ख है।

अपनी मनोवांछित इच्छाओं के मुताबिक काम्य पदार्थ पाकर जो सुखी होना चाहता है वह सुख और विघ्न-बाधाओं के बीच दुःखी होते-होते जीवन पूरा कर देता है।

समय बीत जायेगा और काम अधूरा रह जायेगा। आखिर पश्चाताप हाथ लगेगा। उससे पहले ईश्वर के राह की यात्रा शुरू कर दो। रात्रि में चलते-चलते ठोकरें खानी पड़े, इससे अच्छा है कि दिन-दहाड़े चल लो । बुढ़ापा आ जाय, बुद्धि क्षीण हो जाय, इन्द्रियाँ कमजोर हो जायें, देह काँपने लगे, कुटुम्बीजन मुँह मोड़ लें, लोग अर्थी में बाँधकर 'राम बोलो भाई राम...' करते हुए श्मशान में ले जायें उससे पहले अपने आपको शाश्वत में पहुँचा दो तो बेड़ा पार हो जाय।


स्रोत:- आश्रम से प्रकाशित पुस्तक "सामर्थ्य स्रोत" से लिया गया प्रसंग..

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शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

यह तो गुरु का अधिकार है ! (ब्रह्मनिष्ठ पूज्य बापूजी की अमृतवाणी)


एक बड़ा भारी पंडित था, वामन पंडित। वह दिग्विजय की मशाल लेकर घूमा। जो भी उससे शास्त्रार्थ करे, उसको परास्त कर देता। चलते-चलते थकान के कारण एक वृक्ष के नीचे बैठा। संध्या का समय था। उस वृक्ष पर ब्रह्मराक्षस रहता था। दूसरा ब्रह्मराक्षस बैठने को आया तो पहले वाला बोलाः "! हट जा, हट जा।"

दूसरा बोलाः "बैठने की जगह तो है और तू भी ब्रह्मराक्षस, मैं भी ब्रह्मराक्षस, फिर मुझे क्यों हटाता है भैया ?"

"अरे, तेरे को पता नहीं है। यह पंडित मरकर इधर आयेगा, ब्रह्मराक्षस होकर यहाँ रहेगा। यह उसकी जगह है।"

"क्यों ?"

"वह शास्त्रार्थ करके दूसरों को नीचा दिखाता है, अपने अहं को पोसता है। शास्त्र तो अच्छे हैं लेकिन उसने अहं पोसने का रास्ता अपनाया है। अहं पोसने के लिए जो धर्म का उपयोग करता है, वह ब्रह्मराक्षस होने के ही काबिल है न ! उसका स्थान यहीं है।"

पंडित वृक्ष के नीचे संध्या कर रहा था। उसकी कुछ पुण्याई होगी, संध्या का कुछ प्रभाव होगा। इन दोनों का संवाद वामन पंडित ने सुन लिया। उसने सोचा, "बाप रे ! मैं इतना भारी पंडित, मेरे नाम से सारे विद्वान कन्नी काटते हैं, और मैं मरूँगा तो ब्रह्मराक्षस होऊँगा ! जिसको विद्या का गर्व होता है वही तो ब्रह्म राक्षस होता है! क्या मेरा विद्या का गर्व मुझे ब्रह्मराक्षस की योनि में ले जायेगा !"

इसी भक्तिमार्ग में "मैं" को झुकाने के लिए पत्थर की मूर्ति के आगे भी लेटकर प्रणाम करना होता है। इस 'मैं' को ही मिटाने की यह व्यवस्था है, नहीं तो मूर्ति को तुम्हारे सिर झुकाने से क्या लेना है !

संध्याकाल में सुषुम्ना नाड़ी खुली रहती है। संध्याकाल कल्याणकारी कालों में से है। चार संध्याकाल होते हैं। सुबह सूर्योदय नहीं हुआ हो पर होने वाला हो और चन्द्रमा दिखाई देने बंद हुए हों तब संधिकाल होता है, वह मंत्र सिद्धि का योग है। उस समय देवता तो सोते हैं, देवता माने इन्द्रियों का आकर्षण सोता है और मंत्र देवता जाग्रत होते हैं। वह आपका शुभ संकल्प फलने की अवस्था होती है। दूसरा दोपहर को 12 बजने के कुछ मिनट पहले और कुछ मिनट बाद संधिकाल होता है। तीसरा सूर्य अस्ताचल को नहीं लेकिन सूर्य का प्रकाश दिन जैसा नहीं रहा, कुछ लालिमा रही। सूर्य जब विदा हो रहें वह संधिकाल है। चौथा रात्रि को 12 बजे संधिकाल होता है। इन संधिकालों को चतुर्मास में जो संभाल लें और ध्यान भजन करें, उसके ध्यान-भजन में विशेष सफलता, बरकत आदि की सम्भावना है।

अब उस पंडित के लिए चतुर्मास था कि कौन-सा मास था लेकिन पंडितक की वह वेला धनभागी वेला थी। जिस वेला में किसी के निमित्त आदमी का अहंकार विसर्जित हो, ममता विसर्जित हो, भगवान की प्रीति जगे, भगवान की शरण जाय, वह धनभागी घड़ियाँ होती हैं।

वामन पंडित ने सभी विजयपत्र फाड़ दिये, सारे शास्त्र वहीं विसर्जित कर दिये और हिमालय को चला गया। मैं वामन पंडित को खूब-खूब धन्यवाद दूँगा। ब्रह्मराक्षसों की बात सुनकर सर्वस्व त्यागने का कैसा सामर्थ्य था ! मनुष्य के पास यह बहुत बड़ी ईश्वरीय देन है – सर्वत्याग का सामर्थ्य। मौत तो सर्वत्याग करा देगी, जीते जी सर्वस्व-त्याग का सामर्थ्य बना रहे तो सर्व जिसका है, वह सर्वेश्वर आपका आत्मदेव है, वह प्रकट हो जायेगा।

त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्। (गीताः 12.12)

वामन पंडित ने वर्षों तपस्या की लेकिन भगवान प्रकट नहीं हुए और न तत्त्वरूप से ही अनुभव हुआ। तो उन्होंने सोचा कि 'इतना-इतना किया, कुछ नहीं हो रहा है तो अब जीकर क्या करेंगे ! इस अहंकारी शरीर को जिलाकर क्या करना !' ऐसा सोचकर पहाड़ की चोटी पर चढ़े और 'जय श्रीहरि' करके नीचे कूदने को गये। हरि तो हरि हैं। मेरे गुरु भी हरि हैं, हरि गुरु हैं। सर्वदेवमयो गुरुः। 'गु', '', '',....'गु' माने सिद्धिदायक बीज, 'रू', माने अज्ञान हटाने वाले, उर में प्रकट होने वाले। भगवान का एक नाम 'गुरु' भी है। गुरु प्रकट हुए, हरि प्रकट हुए। हरि, गुरु – ये सब एक ही सदवस्तु के भिन्न-भिन्न नाम हैं। ईश्वर तो अंतरात्मा हैं, बाहर प्रकट होकर हाथों में ले लिया और वामन पंडित को रोक दिया। अपना बायाँ हाथ सिर पर रखकर बोलेः "वामन पंडित ! तेरा मंगल हो।"

"भगवान ! आप इतनी तपस्या और इतनी कसौटी के बाद मिले लेकिन फिर भी... शास्त्र ने तो कहा है कि दायाँ हाथ सिर पर रखते हैं, आपने बायाँ क्यों रखा?"

"अरे वामन ! तू इतना विद्वान होकर यह नहीं जानता कि सिर पर दायाँ हाथ रखना गुरु का अधिकार है, भगवान का नहीं। जब तक सिर पर गुरु का दायाँ हाथ नहीं आता, तब तक यात्रा पूरी नहीं होती।"

अब जरूरी नहीं है कि गुरु अपना दायाँ हाथ ऐसे ही रखें, मानसिक रूप से भी रख सकते हैं, दृष्टि से भी होता, वह तो गुरु जानते हैं।

"भगवान ! आपने गुरु के अधिकार की सुरक्षा करने के लिए मेरे सिर पर अपना दायाँ हाथ न रखकर बायाँ हाथ रखा ?"

"हाँ।"

"तो क्या गुरु का अधिकार आपसे भी बड़ा है ?"

"बड़ा है, मैं अवतार लेकर भी गुरु के शरणागत होता हूँ। गुरु तो गुरु ही हैं। वामन पंडित ! जब तक गुरु का ज्ञान नहीं मिलता, तब तक मेरा मायावी रूप दिखता है। वह बुलाने पर प्रकट होता है और बाद में अंतर्धान हो जाता है। कभी किसी निमित्त प्रकट हुआ थोड़ी देर के लिए, फिर अदृश्य हो जाता है लेकिन गुरु तो....।"

"दायाँ हाथ सिर पर रखने वाले गुरु मुझे कहाँ मिलेंगे ?"

"वामन ! सज्जनगढ़ में मिलेंगे।"

"अच्छा, समर्थ रामदास !"

प्रभु को प्रणाम किया। प्रभु तो अंतर्धान हो गये और ये भाई साहब पहुँचे महाराष्ट्र के सज्जनगढ़ में। समर्थ रामदास की स्तुति की। रामदास प्रसन्न हुए। उन्होंने अपना दायाँ हाथ पीठ पर रखा और बोलेः "वाह ! वाह ! आ गये, अपने घर आ गये, ठीक ! अपना अहंकार छोड़ने के लिए इतनी तपस्या की और भगवान ने तुम्हें दर्शन दिया, फिर इधर भेजा है, शाबाश !"

पंडित बोलाः "गुरुदेव ! आपने दायाँ हाथ तो रखा है लेकिन सिर पर क्यों नहीं रखते ?"

"अरे पगले ! सिर पर तो नारायण ने अपना बायाँ हाथ रख दिया न !"

"फिर आप दायाँ हाथ क्यों नहीं रखते ?"

"अरे, नारायण का बायाँ भी नारायण का है और दायाँ भी नारायण का है। जब नारायण ने रख दिया तो यहाँ भी तो नारायण है। सब नारायण ही नारायण है। नारायण में से समर्थ रामदास है।" दो वचन सुना दिये। वामन पंडित अहंकाररहित हो गये, आत्मजागृति हो गयी, ब्राह्मी स्थिति हो गयी। क्या महापुरुषों की कृपा और क्या सामर्थ्य है ! वामन पंडिति गदगद हो गये कि 'मेरे सारे शास्त्र और सारी तपस्या गुरुकृपा के आगे बहुत छोटी हो गयी।'

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2011, पृष्ठ संख्या 6,7 अंक 224

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गुरुवार, 15 सितंबर 2011

उनको मैं बुद्धियोग देता हूँ......


आदमी जितना-जितना परमात्मा-रस का अनुभव करता है उतना-उतना निर्मल होता है, बलवान होता है। संसार का ऐसा कोई भोग नहीं जो भोगने के बाद आदमी थके नहीं, भोगने के बाद आदमी मलिनता का अनुभव करे नहीं। भोजन में भी अगर मलिनता न होती तो भोजन के बाद हाथ-मुँह क्यों धोते ? ऐसा कोई भोग नहीं जिसमें मलिनता का मिश्रण न हो। योग ऐसा कि सारी मलिनताओं को हटा देता है।
हरिबाबा हो गये वृन्दावन में। वे प्रतिदिन तीन लाख भगवन्नाम जप करते थे। मंत्र जप पूरे होते, बाद में भिक्षा लेने जाते। कभी दोपहर के तीन बजे जाते, कभी चार बजे जाते, साढ़े चार बजे जाते। भिक्षा में जो कुछ बचा हुआ रूखा-सूखा मिल जाता, ठाकुर जी को भोग लगाकर पा लेते।
एक दिन उनको लगा कि ठाकुर जी कह रहे हैं-
"तुम एकदम रूखा-सूखा बेस्वाद भोग लगाते हो। कम से कम सबरस (नमक) तो उसमें डाला करो।"
बाबाजी ठाकुरजी पर नाराज हो गये कि आज आपको नमक खाने की इच्छा हुई ? तुम्हारे लिए नमक माँगू ? फिर कल बोलोगे कि सब्जी चाहिए.... परसों बोलोगे खीर चाहिए। ऐसे ठाकुरजी मुझे नहीं रखने हैं। उठाया ठाकुरजी को और दूसरे किसी बाबाजी के वहाँ दे आये। फिर आये अपनी कुटिया में। भजन करने बैठे। संयोगवशात् सामने बहती हुई यमुना नदी में एक नाव जा रही थी नमक भरके। अभी तो नहरें निकाली हैं इसलिए यमुना दुबली-पतली हो गयी है। उस वक्त बहुत पानी रहता था। नावें चलतीं थी उसमें। किसी कारणवशात् नाव डूबने लगी। नाववालों ने मनौती मानी की अगर हम लोग बच जायें, नाव डूबे नहीं, किनारे सुरक्षित पहुँच जायें तो नाव का माल-सामान दान कर देंगे। दैवयोग से नाव बच गई। उन्होंने सारे नमक का ढेर लगा दिया हरिबाबाजी की कुटिया के पास। बाबाजी बाहर निकले तो देखा सब तमाशा। ठाकुर जी को उलाहना देने लगे कि नमक खाने की इतनी इच्छा हुई कि किसी को प्रेरणा करके नमक का ढेर लगवा दिया ? ऐसे सबरस के प्यासे भगवान का भजन हम नहीं करते। अपनी झोंपड़ी छोड़कर बाबाजी चले गये एकान्त में गहरी साधना करने के लिए।
भगवान के सच्चे भक्तों को संसार का सुख लेने की तनिक भ्राँति भी बाँध नहीं सकती। मन ही ठाकुरजी का बहाना बनाकर बोलता है कि नमक लाओ, आज बाल-भोग लगाओ, आज मोहनथाल लाओ। वास्तव में ठाकुरजी मोहनथाल खाना नहीं चाहते, अपना मन ही ठाकुर जी के नाम से धोखा करता है। पुजारी बोलता है कि आज ठाकुरजी को खीर-पूरी अर्पण करना है, आज ठाकुरजी को घड़ी पहनना है, ठाकुरजी को पान-बीड़ा खाना है। सचमुच ठाकुरजी की भोग की इच्छा नहीं। हमारा अनियंत्रित मन युक्ति करके ठाकुर जी के नाम से भोग चाहता है। ऐसे ही भोग की इच्छा तृप्त करे इसके बजाय ठाकुरजी को भोग लगाकर करे यह भी चलो ठीक है। पान-बीड़ा खाना है तो ठाकुरजी को भोग लगाकर खाओ।

भगवान वेदव्यास ने तामसी और आसुरी स्वभाव के लोगों के लिए भी शास्त्रों की रचना की है। जिन लोगों को मांस-मदिरा के बिना नहीं चलता था ऐसे लोगों को थोड़ी छूट-छाट दी। अगर मांस खाना है तो पहले यज्ञ करो, देवी को बलि चढ़ाओ, बाद में खाओ। एकदम जो काट-काटकर खाते थे उसके बदले यज्ञ करेंगे, बलि देंगे फिर बाँटकर खाएँगे। उस खाने में विलम्ब होगा। जहाँ दस बकरे स्वाहा हो सकते थे उतने समय में एक ही बकरे तक पहुँचेंगे, नौ की हिंसा कम होगी।

जैसे बच्चा पाँच घण्टे बेकार भटकता है उसे बाप कहता हैः "बेटा देख ! तू हर रोज एक घण्टा सुबह और दो घण्टे शाम को घूमा कर। हर रोज तीन घण्टे। जो हर रोज पच्चीस रूपये बिगाड़ता है उसको कहाः "दो रूपये सुबह, तीन रूपये शाम को खर्च कर। हर रोज पाँच रूपये तेरी खर्ची बाँध देता हूँ।" बाप ऐसे बच्चे को भटकने के लिए प्रेरित नहीं करता है लेकिन उसकी भटकान को नियंत्रित करने से लिए प्रेरित करता है। ऐसे ही शास्त्रों में जो आदेश दिया है वह हमारे अनियंत्रित बेलगाम मन को युक्ति से नियंत्रण में लाने के लिए दिया है।

शास्त्रों ने बताया कि शादी-विवाह करना चाहिए। जीव में जन्मों-जन्मों से कामरस का आकर्षण है। इसी आकर्षण में ही जीवन बरबाद न हो जाय इसलिए काम को नियंत्रित करने के लिए एक ही व्यक्ति से शादी का आदेश दिया। जब तक शादी हो जाय तब तक चुप रहो। फिर एक पत्नी व्रत। पत्नी मायके चली जाय तब संयम से रहे। पत्नी का पैर भारी हो जाय तब संयम से रहे। पत्नी का स्वभाव गड़बड़ रहे तब तक संयम से रहे। इस प्रकार इन्द्रिय भोग से बचने के लिए शास्त्रों ने शादी-विवाह का आयोजन किया। 'भगवानों ने भी शादी की थी..... श्रीकृष्ण को भी राधा थी। शिवजी को भी पार्वती थी..... चलो हम भी अपनी पार्वती लायें। ऐसा तर्क देकर भोगी 'पार्वती' लाते हैं और पिक्चर में धक्का खाते हैं। भोग में डूबने के लिए शास्त्रों ने आज्ञा नहीं दी लेकिन भोग में डूबने की आदतवालों को भोग से थोड़ा-थोड़ा बचाकर योग के तरफ मोड़ने का प्रयास किया है। इसी सिद्धान्त पर वेदव्यासजी ने आसुरी, तामसी लोगों के लिए बनाये गये शास्त्रों में मांस-मदिरा आदि की थोड़ी छूट-छाट दी। नीति नियम बनाये।
नारदजी पहुँचे वेदव्यास के पास और बोलेः "भगवन् ! आपने शास्त्रों की रचना तो की, यज्ञ-होम-हवन के साथ अन्य चीजों की छूट-छाट तो दी लेकिन आपका संयम का हिस्सा वे लोग नहीं पढ़ेंगे, छूट-छाटवाला हिस्सा जल्दी से ले लेंगे। अपने मन के अनुकूल जो होगा वह झट से अमल में लायेंगे। शास्त्रों में कहा है कि बलि चढ़ाकर मांस खाओ।' खाने लगेंगे। शराब पीने लगेंगे।"

लोगों ने शिवजी को भाँग पीने वाले बना दिये हैं। 'शिवरात्री आयी। पियो भाँग। शिवजी की बूटी है।' अरे ! शिवजी के लिए तो कहा गया हैः भुवन भंग व्यसनम्। यानी 'भगवान शिव को भुवनों का भंग करने का व्यसन है।' लोगों ने अर्थ लगाया कि शिवजी को भाँग पीने का व्यसन है। 'शिवजी की बूटी' कहकर लोग भाँग पीने लग गये।

नारद जी ने वेदव्यास जी से कहाः "महाराज ! आपने अति तामस प्रकृति के लोगों को मोड़ने के लिए थोड़ी छूट-छाट दी है। वे मुड़ेंगे तब मुड़ेंगे लेकिन और लोग इसका गैर फायदा उठाकर गिर सकते हैं। इसलिए आप भागवत जैसे ग्रन्थ की रचना करो, जिसमें भीतर का रस मिलता जाय। उसमें भगवान की कथा-वार्ता-चर्चा हो, भगवन्नाम की महिमा हो, भगवान के गुणगान हों। इससे भगवान में प्रीति जगेगी। भगवान में प्रीति जगेगी तब विषयों की प्रीति हटेगी।"

कायदे-कानून में विषयों की प्रीति नहीं हटती। कायदे से अगर आदमी ईमानदार बन जाता तो आज नेताओं के नौकर और स्वयं नेता भी ईमानदार हो जाते। कायदे तो ठीक हैं, उद्दण्ड और उच्छ्रंखल लोगों के लिए कायदों की आवश्यकता है लेकिन आदमी भीतर से ही अच्छा हो तो ईमानदार बन सकता है कायदे से नहीं। किसी आदमी पर चार चौकीदार रख दो निगरानी रखने के लिए कि वह अच्छी तरह व्यवहार करे, अच्छा जिये। फिर भी वह आदमी अच्छा ही है इस बात में सन्देह होगा। क्योंकि वे चार लोग कैसी निगरानी रखते हैं यह भी देखना पड़ेगा। उनके ऊपर भी और कोई रखना पड़ेगा। वस्तुओं का शोधन, परिमार्जन, परिवर्धन करना यह विज्ञान है। अन्तःकरण का शोधन, परिमार्जन और परिवर्धन करना यह धर्म हैं। धर्म से वासनाएँ निवृत्त होती हैं। योग से मन एकाग्र होता है। ज्ञान से अज्ञान दूर होता है और भगवान अपनी कृपा से प्राप्त की प्राप्ति का अनुभव करा देते हैं। जो भगवान को प्रीति पूर्वक भजते हैं, भगवन्नाम का जप करते-करते ध्यानस्थ होते हैं उनकी बुद्धि में भगवान योग मिला देते हैं जिससे वह भक्त भगवान को प्राप्त कर लेता है।
ददामी बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।
भगवान जीव पर प्रसन्न हो जाते हैं कि वह मुझे खोजता है। दया करके उसको बुद्धियोग दे देते हैं, जीव भगवान को पहचान लेता है। विषयों की खोज मिटाने के लिए धर्म की आवश्यकता है। फिर, विषयों के सुख के आकर्षण को मिटाने के लिए भक्तिरस की, योगरस की आवश्यकता है। भक्ति करेंगे, योग करेंगे तो भीतर का रस आयगा। भक्ति और योग छूट गये तो मन इधर-उधर चला जायेगा। इसलिये भगवान कहते हैं-
तेषां सततंयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्। ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।।
'जो सतत प्रीतिपूर्वक मेरा भजन करते हैं उनको मैं बुद्धियोग देता हूँ....'

स्रोत:- आश्रम से प्रकाशित पुस्तक "मुक्ति का सहज मार्ग" से
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बुधवार, 14 सितंबर 2011

जब तक जीना तब तक सीना.....


कई लोग भगवान के रास्ते चलते हैं। गलती यह करते हैं कि 'चलो, सबमें भगवान हैं।' ऐसा करके अपने व्यवहार का विस्तार करते रहते हैं। तत्त्वज्ञान के रास्ते चलने वाले साधक सोचते हैं कि सब माया में हो रहा है। ऐसा करके साधन-भजन में शिथिलता करते हैं और व्यवहार बढ़ाये चले जाते हैं।

अरे, माया में हो रहा है लेकिन माया से पार होने की अवस्था में भी तो जाओ साधन भजन करके ! साधन भजन छोड़ क्यों रहे हो ? 'जब तक जीना तब तक सीना।' जब तक जीवन है तब तक साधन-भजन की गुदड़ी को सीते रहो।

थोड़ा वेदान्त इधर-उधर सुन लिया। आ गये निर्णय पर 'सब प्रकृति में हो रहा है।' फिर दे धमाधम व्यवहार में। साधन भजन की फुरसत ही नहीं।

जो साधन-भजन छोड़ देते हैं वे शाब्दिक ज्ञानी बनकर रह जाते हैं। 'मैं भगवान का हूँ' यह मान लेते हैं और संसार की गाड़ी खींचने में लगे रहते हैं। अपने को भगवान का मान लेना अच्छा है। साधन-भजन का त्याग करना अच्छा नहीं। भगवान स्वयं प्रातःकाल में समाधिस्थ रहते हैं। शिवजी स्वयं समाधि करते हैं। रामजी स्वयं गुरू के द्वार पर जाते हैं, आप्तकाम पुरूषों का संग करते हैं। श्रीकृष्ण दुर्वासा ऋषि को गाड़ी में बिठाकर, घोड़ों को हटाकर स्वयं गाड़ी खींचते हैं। उनको ऐसा करने की क्या जरूरत थी ?

हम लोगों को थोड़े रूपये-पैसे, कुछ सुख-सुविधाएँ मिल जाती हैं तो बोलते हैं- 'अब भगवान की दया है। जब मर जायेंगे तब भगवान हमें पकड़कर स्वर्ग में ले जायेंगे।'

अरे भाई ! तू अपनी साधना की गुदड़ी सीना चालू तो रख ! बन्द क्यों करता है ? साधन-भजन छोड़कर बैठेगा तो संसार और धन्धा-रोजगार के संस्कार चित्त में घुस जायेंगे। 'जब तक जीना तब तक सीना।'जीवन का मंत्र बना लो इसे।

चार पैसे की खेतीवाला सारी जिन्दगी काम चालू रखता है, चार पैसे की दुकानवाला सारी जिन्दगी काम चालू रखता है, चार पैसे का व्यवहार सम्भालने के लिए आदमी सदा लगा ही रहता है। मर जाने वाले शरीर को भी कभी छुट्टी की ? श्वास लेने से कभी छुट्टी ली ? पानी पीने से छुट्टी की ? भोजन करने से छुट्टी की ? नहीं। तो भजन से छुट्टी क्यों ?

'जब तक जीना तब तक सीना.... जब तक जीना तब तक सीना।' यह मंत्र होना चाहिए जीवन का।


स्रोत:- आश्रम से प्रकाशित पुस्तक "मुक्ति का सहज मार्ग" से

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

कलियुग में परमात्मा प्राप्ति शीघ्र कैसे ?


कहते हैं कि सतयुग में वर्षों के पुण्यों से परमात्म प्राप्ति होती थी। द्वापर में यज्ञ से होती थी, ध्यान से होती थी। कलियुग के लिए कहा गया हैः

दानं केवलं कलियुगे।

अथवा

कलिजुग केवल हरि गुन गाहा।

गावत नर पावहिं भव थाहा।।

परंतु शास्त्र का कोई एक हिस्सा लेकर निर्णय नहीं लेना चाहिए। शास्त्र के तत्मत से वाकिफ होना चाहिए। यह भी शास्त्र ही कहता है कि

राम भगत जग चारि प्रकारा।

सुकृति चारिउ अनघ उदारा।।

चहू चतुर कहुँ नाम अधारा।

गयानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा।।

(श्री राम चरित. बा. कां. 21.3 व 4)

राम के, परमात्मा के भक्त चार प्रकार के हैं। चारों भगवन्नाम का आधार लेते हैं, श्रेष्ठ हैं परंतु ज्ञानी तो प्रभु को विशेष प्यारा है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।

'इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है।'

(गीताः 4.38)

दूसरे युगों में जप से, यज्ञ से परमात्म प्राप्ति होती थी तो श्रीकृष्ण ने अर्जुन को तत्त्वज्ञान का उपदेश क्यों दिया ? उद्धव को तत्त्वज्ञान क्यों दिया ?

जनसाधारण के लिए जप अपनी जगह पर ठीक है, हवन अपनी जगह पर ठीक है किंतु जिनके पास समझ है, बुद्धि है, वे अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार साधन करके पार हो जाते हैं। जनक अष्टावक्र से तत्त्वज्ञान सुनकर पार हो गये।

वह भी जमाना था कि लोग 12-12 वर्ष, 25-25 वर्ष जप तप करते थे, तब कहीं उनको सिद्धी मिलती थी पर कलियुग में सिद्धि जल्दी हो जाती है।

एक आदमी को पेट में कुछ दर्द हुआ। वह बड़ा सेठ था। वह वैद्य के पास दवा लेने गया। वैद्य ने देखा कि यह अमीर आदमी है, इसको सस्ती दवा काम में नहीं आयेगी।

वैद्य ने कहाः "ठहरो जरा ! दवा घोंटनी है, सुवर्णभस्म डालना है, बंगभस्म डालना है, थोड़ा समय लगेगा। बढ़िया दवा बना देता हूँ।"

काफी समय उसको रोका, बाद में दवा दी। उसने खायी और वह ठीक हो गया।

वैद्य ने पूछाः "अब कैसा है ?"

"अच्छा है... आराम हो गया। कितने पैसे ?"

"केवल ग्यारह सौ रूपये।"

सेठ ने दे दिये। वैसे का वैसा रोग एक गरीब को हुआ और वह भी उसी वैद्य के पास आया।

बोलाः "पेट दुःखता है।"

वैद्य ने नाड़ी देखकर कहाः "कोई चिंता की बात नहीं, यह लो पुड़िया। एक दोपहर को खाना, एक शाम को खाना, ठीक हो जायेगा।"

"कितने पैसे ?"

"पचास पैसे दे दो।"

उसने दे दिये। दो पुड़िया खाकर वह ठीक हो गया। मर्ज वही का वही, वैद्य भी वही का वही, लेकिन एक से ग्यारह सौ रूपये लिये और समय भी ज्यादा लगाया तो दूसरे से पचास पैसे लिए और तुरंत दवा दे दी। ऐसे ही वैद्यों का वैद्य परमात्मा वही का वही है। हमारे अज्ञान का मर्ज भी वही का वही है। पहले के जमाने में लोगों के पास इतना समय था, इतना शुद्ध घी, दूध था, इतनी शक्ति थी तो लम्बे-लम्बे उपचार करने के बाद उनका दर्द मिटता था। अभी वह दयालु भगवान कहता है कि आ जाओ भाई ! ले जाओ जल्दी जल्दी।

अष्टावक्र महाराज बोलते हैं कि 'श्रवण मात्रेण।' सुनते सुनते भी आत्मज्ञान हो सकता है। पहले कितना तप करने के बाद बुद्धि शुद्ध, स्थिर होती थी, वह अब तत्त्वज्ञान सुनते सुनते हो सकती है। ऐसा नहीं है कि केवल उस समय सतयुग था, अभी नहीं है। सत्त्वगुण में तुम्हारी वृत्ति है तो सतयुग है। रजोमिश्रित सत्त्वगुण में वृत्ति है तो त्रेतायुग है। तमोमिश्रित रजोगुण में वृत्ति है तो द्वापर है और तमोगुण में वृत्ति है तो कलियुग है।

सतयुग में भी कलियुग के आदमी थे। श्रीराम थे तब रावण भी था। श्रीकृष्ण थे तब कंस भी था। अच्छे युगों में सब अच्छे आदमी ही थे, ऐसी बात नहीं है। बुरे युग में सब बुरे आदमी हैं, ऐसी बात भी नहीं। अतः दैवी संपदा के जो सदगुण हैं- निर्भयता, अंतःकरण की सम्यक् शुद्धि, ज्ञान में स्थिति, स्वाध्याय, शुद्धि, सरलता, क्षमा आदि छब्बीस सदगुण अपने जीवन में लायें और आत्मवेत्ता महापुरुषों का संग करें तो कलियुग में शीघ्र परमात्म प्राप्ति हो जायेगी। दैवी सम्पदा के सदगुण अपने जीवन में लाने वाला आदमी धन ऐश्वर्य में आगे बढ़ाना चाहे तो बढ़ सकता है, यश-सामर्थ्य में चमकना चाहे तो भी चमक सकता है और भगवत्प्राप्ति करना चाहे तो भी कर सकता है।

स्रोतः लोक कल्याण सेतु, अक्तूबर 2010, पृष्ठ संख्या 3,4 अंक 160

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