मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

रविवार, 11 सितंबर 2011

आपका भाव कैसा है ? (पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)


आप भगवान का स्मरण करोगे तो भगवान आपका स्मरण करेंगे क्योंकि वे चैतन्यस्वरूप हैं। आप पैसों का, बँगले का स्मरण करोगे तो जड़ पैसों का, बँगले का स्मरण करोगे तो जड़ पैसों को, जड़ बँगले को पता नहीं है कि आप उनका स्मरण कर रहे हो। आप गाड़ी का स्मरण करोगे तो वह अपने-आप नहीं मिलेगी लेकिन भगवान का स्मरण करोगे तो वे स्वयं आकर मिलेंगे। शबरी ने भगवान का स्मरण किया तो वे पूछते-पूछते शबरी के द्वार पर आ गये। भावग्रही जनार्दनः..... मीरा ने स्मरण किया तो जहर अमृत हो गया। वह हृदयेश्वर आपके भाव के अनुसार किसी भी रूप में कहीं भी मिलने में सक्षम है, अगर सोऽहंस्वरूप में मिलना चाहो तो सोऽहंस्वरूप में भी अपना अनुभव कराने में समर्थ है। केवल अपनी बुद्धि में उसके प्रति भाव होना चाहिए। देवी देवता का, मूर्ति का आदर-पूजन, माता-पिता अथवा गुरु का आदर-पूजन यह हमारी बुद्धि में भगवदभाव को, भगवदज्ञान को, भगवदरस को प्रकट करने का मार्ग है।

भाव की बड़ी महिमा है। मान लो, एक सुपारी है। एक को उसे खाने का भाव है, दूसरे को उससे कमाने का भाव है, तीसरे को उसे पूजने का भाव है। तो फायदा किसने लिया ? खाने वाले ने, कमाने वाले ने कि पूजने वाले ने ? सुपारी तो जड़ है, प्रकृति की चीज है, उसमें भगवदबुद्धि करने से भगवदभाव पैदा होता है और खाने की भावना करते हैं तो तुच्छ लाभ होता है। बेचकर कमाने की भावना करते हैं तो ज्यादा लाभ होता है लेकिन उसमें गणेश जी का भाव करके पूजा करते हैं तो और ज्यादा लाभ होता है। सुपारी तो वही-की-वही है परंतु खाना है तो भोग, कमाना है तो लोभ और पूज्यभाव, भगवदभाव है तो भगवदरस देके भगवान के समीप कर देगी। अब सुपारी को खाके मजा लो, बेचके मजा लो या उसका पूजन करके मजा लो तुम्हारी मर्जी। खाके मजा लिया तो भोगी, बेचके मजा लिया तो लोभी और सुपारी में गणपति-बुद्धि की तो आप उपासक हो गये, भक्त हो गये और सुपारी का तत्त्व जान के अपना तत्त्व और सुपारी का तत्त्व 'एकमेव अद्वितीयं' कर दिया तो हो गये ब्रह्म !

ऐसे ही अगर आप गुरु से संसारी फायदा लेते हैं तो यह भोगबुद्धि हुई लेकिन गुरु चिन्मय हैं, दिव्य हैं, ब्रह्मस्वरूप हैं, ज्ञानस्वरूप हैं, तारणहार हैं, व्यापक हैं, सबके अंतरात्मा, भूतात्मस्वरूप हैं, प्राणिमात्र के हितैषी हैं, सुहृद हैं – ऐसा अहोभाव करते हैं और उनके वचनों में विश्वास करते हैं, उनके अनुसार चलते हैं तो कितना फायदा होता है !

आप सुपारी में गणपति का भाव करो तो सुपारी उसी समय आपके लिए ऐसा भाव नहीं कर सकती कि 'यह मुक्तात्मा हो जाय, चिंतारहित हो जाये...।' ऐसा सोचकर सुपारी उपदेश नहीं देगी। आपके अपने भाव के अनुसार अंतःकरण की वृत्ति बनेगी लेकिन गुरू के प्रति भगवदभाव, ब्रह्मभाव, अहोभाव करोगे तो गुरूदेव के अंतःकरण से भी आपके उद्धार के लिए शुभ संकल्प की, विशेष कृपा की वर्षा होने लगेगी, उनके द्वारा ऊँचा सत्संग मिलेगा, आनंद-आनंद हो जायेगा। सुपारी वही की वही लेकिन नजरिया बदलने से लाभ बदल जाता है। गुरु वही के वही लेकिन नजरिया बदलने से लाभ बदल जाता है।

कर्मों में भी अलग-अलग भाव अलग-अलग फल देते हैं। जहाँ राग से, द्वेष से सोचा जाता है, वहाँ कर्म बंधनकारक हो जाता है। जहाँ करने का राग मिटाने के लिए सबकी भलाई के, हित के भाव से सोचा और किया जाता है, वहाँ कर्म बंधन से छुड़ाने वाला हो जाता है। जैसे कोई दुष्ट है, धर्म का, संस्कृति का, मानवता का हनन कर-करके अपना कर्मबन्धन बढ़ाने वाले दुष्कर्म में लिप्त है और न्यायाधीश उसकी भलाई के भाव से उसे फाँसी देता है तो न्यायाधीश को पुण्य होता है। 'हे प्रभु जी ! अब इस शरीर में यह सुधरेगा नहीं, इसलिए मैं इसे फाँसी दे दूँ यह आपकी सेवा है' – इस भाव से अगर न्यायाधीश फाँसी देता है तो उसका अंतःकरण ऊँचा हो जाता हो जायेगा लेकिन 'यह फलाने पक्ष का है, अपने पक्ष का नहीं है.... इसलिए फाँसी दे दो' – ऐसा भाव है तो फिर न्यायाधीश का फाँसी देना अथवा सजा देना बंधन हो जायेगा।

आपके कर्मों में हित की भावना है, समता है तो आपके कर्म आपको बंधनों से मुक्त करते जायेंगे। अगर स्वार्थ, अधिकार और सत्ता पाने की या द्वेष की भावना है तो आपके कर्म से किसी को लाभ मिलता है तो अपनी संसार का आसक्ति मिटती है, दूसरे की भलाई का, हृदय की उदारता का आनंद आता है लेकिन दूसरे का हक छीना तो संसार की आसक्ति और कर्मबन्धन बढ़ता है।

आप जैसा देते हैं वैसा ही आपको वापस मिल जाता है। आप जो भी दो, जिसे भी दो भगवदभाव से, प्रेम से और श्रद्धा से दो। हर कार्य को ईश्वर का कार्य समझकर प्रेम से करो, सबमें परमेश्वर के दर्शन करो तो आपका हर कार्य भगवान का भजन हो जायेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2010, पृष्ठ संख्या 17,18 अंक 206

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शनिवार, 10 सितंबर 2011

मधुर चिंतन (आत्ममाधुर्य से ओतप्रोत बापू जी की अमृतवाणी)


वशीभूत अंतःकरण वाला पुरुष राग-द्वेष से रहित और अपनी वशीभूत इन्द्रियों के द्वारा विषयों मे विचरण करता हुआ भी प्रसन्नता को प्राप्त होता है। वह उनमें लेपायमान नहीं होता, उसका पतन नहीं होता। जिसका चित्त और इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं, वह चुप होकर बैठे तो भी संसार का चिंतन करेगा। ज्ञानी संसार में बैठे हुए भी अपने स्वरूप में डटे रहते हैं।

भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. श्री राधाकृष्णन् अच्छे चिंतक माने जाते हैं। उन्होंने एक कहानी लिखी हैः

एक भट्ठीवाला था। उसको हररोज स्वप्न आता कि मैं चक्रवर्ती सम्राट हूँ। वह अपना काम निपटाकर जल्दी जल्दी सो जाता, उस मधुर स्वप्नलोक में जाने के लिए। बाहर के जगत में तो वह भट्ठीवाला था, उसके पास खाने-पीने को भी पर्याप्त नहीं था। गुजारा चलाने के लिए उसे बड़ा परिश्रम करना पड़ता था परंतु धीरे-धीरे वह स्वप्न में सुखी होना लगा तो बाहर के जगत में रूचि कम होने लगी।

प्रतिदिन स्वप्न में देखता कि 'मैं चक्रवर्ती सम्राट बन गया हूँ। छोटे-छोटे राजा लोग मेरी आज्ञा में चलते हैं। छनन छनन करते हीरे जवाहरात के गहनों से सजी ललनाएँ चँवर झुला रही हैं।

एक दिन स्वप्न में वह पेशाब करने के लिए उठा तो पास में जलती हुई भट्ठी में पैर पड़ गया। जलन के मारे वह चिल्ला उठा। सो तो रहा था भट्ठियों के बीच लेकिन स्वप्न देख रहा था कि सम्राट है, इसलिए वह सुखी था।

किसी भी परिस्थिति में आदमी का मन जैसा होता है, सुख-दुःख उसे वैसे ही प्रतीत होते हैं। ज्ञानी का मन परब्रह्म में होता है तो वे संसार में रहते हुए, सब व्यवहार करते हुए भी परम सुखी हैं, ब्रह्मज्ञान में मस्त हैं।

मनुष्य का शरीर कहाँ है, इसका अधिक मूल्य नहीं है। उसका चित्त कहाँ है, इसका अधिक मूल्य है। चित्त परमात्मा में है और आप संसार में रहते हैं तो आप संसार में नहीं हैं, परमात्मा में हैं। प्रभातकाल में जब उठो तब आँख बंद करके ऐसा चिंतन करो कि 'मैं गंगा किनारे गया। पवित्र गंगा मैया में गोता लगाया। किसी संत के चरणों में सिर झुकाया। उन्होंने मुझे मीठी निगाहों से निहारा।

पाँच मिनट ऐसा मधुर चिंतन करो। आपका हृदय शुद्ध होने लगेगा, भाव पवित्र होने लगेंगे। सुबह उठकर देखे हुए सिनेमा के दृश्य याद आयें- 'आहाहा.... वह मेरे पास आयी, मुझसे मिली....' आदि-आदि तो देखो, सत्यानाश हो जायेगा। कल्पना तो मन से होगी किंतु तन पर भी प्रभाव पड़ जायेगा। कल्पना में कितनी शक्ति है ! संत-महात्मा-सदगुरु परमात्मा के साथ विचरते हैं, समाधि लगाते हैं, उनका स्मरण-चिंतन करते हैं तो हृदय आनंदित होता है।

बुल्ला साहब नाम के एक बड़े प्रसिद्ध संत हो गये। जब वे घर में रहते थे तब उनका नाम था बुलाकीराम। गरीब, अनपढ़ बुलाकीराम उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में जमींदार गुलाल साहब के यहाँ हल चलाने का काम करते थे।

बुलाकी राम ने भगवान को पाने का इरादा बना लिया। जिसे भगवान को पाना हो उसे संतों का दर्शन, सत्संग व उनकी सेवा करनी चाहिए।

बुलाकी राम खेत में हल चलाते-चलाते थोड़ी देर रुकते ताकि बैलों को आराम मिले। एक दिन दोपहर का समय था। वे खेत के किनारे मेंड़ पर बैठे आँखें बंद करके ध्यान कर रहे थे। गुलाल साहब आये तो देखा कि 'बैल तो ऐसे ही खड़े हैं ! इन हल में जुते बैलों की छुट्टी करके, उन्हें बाँध के बुलाकीराम कहाँ चला गया ?' जैसे नौकर काम के समय काम न करे, और कहीं बैठा हो तो सेठ को गुस्सा आता है, ऐसे ही गुलाल साहब को गुस्सा आया। वे चिल्लाने लगेः "बुलाकीराम ! बुलाकीराम !! ओ बुलाकी राम !!!..." अब बुलाकीराम तो ध्यानमग्न थे। इधर-उधर देखते-देखते गुलाल साहब जब निकट पहुँचे तो देखा कि बुलाकीराम मेंड़ पर बैठा है और हाथ में लोटा पकड़े हुए हैं। जमींदार को आया गुस्सा कि 'मैं इतना चिल्लाता हूँ तो भी जवाब नहीं देता है !' उसने उनकी पीठ पर जोर से एक लात मारी तो लोटा टेढ़ा हो गया, 'अरे ! मैंने लात मारने से पहले देखा था तो लोटे में पानी था। फिर यह अचानक दही कैसे बन गया !'

बुलाकीराम ने आँखें खोलीं और देखा कि मेंड़ पर दही गिरा हुआ है। जमींदार ने पूछाः

"बुलाकीराम ! यह क्या है ?"

बोलेः "मैं ध्यान-ध्यान में संतों को मानसिक भोजन करा रहा था। दाल बनायी, रोटी सब्जी बनायी फिर सोचा कि गर्मी है तो संतों को दही चाहिए। यह पानी लेकर इस भावना से कि यह दही है, मन नही मन मैं संतों के पास दही परोसने जाना चाहता था। दही परोसना ही चाहता था कि इतने में आपकी लात लगी और दही ढुल गया।"

भगवान का चिंतन करने वाले के मन में यह कैसा सामर्थ्य है कि पानी में से दही बना दे ! लोफर में से भक्त बना दे ! चंचल में से साधक बना दे ! भगवान में मन लगाने वाले के मन में बड़ी अदभुत कला, लीला, योग्यता होती है।

वह जमींदार गुलाल साहब बुलाकीराम के चरणों पर गिर पड़ा और बुलाकीराम का शिष्य बन गया। नौकर बुलाकीराम फिर नौकर नहीं रहे, भगवान की तरफ ऐसे चले की संत बुल्ला साहब हो गये। यह घटित घटना है।

कहाँ तो हल चलानेवाला, रूखी रोटी खाने वाला एक गरीब और भक्तिभाव से भगवान को, संतों को भोग लगात है तो पानी में से दही बन जाता है ! जो भगवान को चाहता है, भगवान उनके अनुकूल हो जाते हैं और उनके पाँच भूत भी उसके अनुकूल हो जाते हैं। हो गये न पाँच भूत अनुकूल ! हुए कि नहीं हुए ? लेकिन हम भगवान से चाहते हैं कि 'फैशन से, आराम से रहें। यह हो जाये, वह हो जाय.....' तो वह तो हो जाता है लेकिन फिर वही आदत पड़ जाती है और भगवान छूट जाते हैं। हम भगवान से संसारी चीजें माँगकर संसार के खड्ढे में गिर जाते हं। आप तो प्रभु में रहो और दूसरों को प्रभु में लगाओ। जब एक गरीब इतना महान संत बन सकता है तो तुम नहीं बन सकते क्या ! अवश्य बन सकते हो ! संकल्प में, शुद्ध चिंतन में अमोघ शक्ति है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2010, पृष्ठ संख्या 16,17 अंक 214

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शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

परमात्मा उसी का है..... (पूज्य बापू जी के सत्संग प्रवचन से)


मनुष्य को वस्तुओं की कद्र करना सीखना ही चाहिए। काम में आने वाली वस्तुएँ इधर-उधर पड़ी रहें, यह ठीक नहीं है। किसी घर में वर्षों से एक पुराना साज पड़ा था। उसने घर के कोने में जगह रोक रखी है, ऐसा सोचकर दिवाली के दिनों में घरवालों ने उसे निकालकर जहाँ कूड़ा फैंका जाता था वहाँ डाल दिया। कोई संगीतज्ञ फकीर वहाँ से गुजरा तो उसने देखा कि पुराना साज कूड़े में पड़ा है। उसने साज उठाया, साफ किया और उस पर उँगलियाँ घुमायीं तो साज से मधुर स्वर निकलने लगा। लोग आकर्षित हुए, भीड़ हो गयी। यह वही साज था जो वर्षों तक घर में पड़ा था। घरवाले भी मुग्ध होकर बाहर निकले और बोलेः "यह साज तो हमारा है।"

तब उस संगीतज्ञ ने कहाः "यदि यह तुम्हारा होता तो घर में ही रखते। तुमने तो इसे कूड़े में फैंक दिया, अतः अब यह तुम्हारा नहीं है।"

साज उसी का है जो बजाना जानता है।

गीत उसी का है जो गाना जानता है।

आश्रम उसी का है जो रहना जानता है।

परमात्मा उसी का है जो पाना जानता है।।

मनुष्य-जीवन बहुत अनमोल है, हमें इसकी कीमत का पता नहीं है। जो आया सो खा लिया.... जो आया सो पी लिया.... जिस-किसी के साथ उठे-बैठे... स्पर्श किया... इन सबसे जप-ध्यान में तो अरुचि होती ही है, साथ ही विषय विकारों में, मेरे-तेरे में, निंदा-स्तुति में व्यर्थ ही अपना समय खो देते हैं। फिर हम न तो अपने किसी काम में आ पाते हैं और न ही समाज के। मनुष्य अगर अपने तन-मनरूपी साज को बजाना सीख जाय तो मृत्यु के पहले आत्मानंद के गीत गूँजेंगे।

यदि आध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर होना है तो साधक को विशेष सावधानी रखने की जरूरत है। जिसे आध्यात्मिक लाभ की कद्र नहीं, जिसके जीवन में दृढ़ व्रत नहीं है, दृढ़ता नहीं है और जो भगवान का महत्त्व नहीं जानता, उसको भगवान के धाम में भी रहने को मिल जाय फिर भी वहाँ से गिरता है बेचारा। जय-विजय भगवान के धाम में रहते थे किंतु भगवान के महत्त्व को नहीं जानते थे तो गिरे। जो अपने जीवन का महत्त्व जितना जानता है, उतना ही सत्संग का, महापुरुषों का महत्त्व जानेगा। जिसको मनुष्य-जन्म की कद्र नहीं है, वह अभागा महापुरुषों की, सत्संग की भी कद्र नहीं कर सकता। जिसको अपनी मनुष्यता की कद्र है, उसको संतों की भी कद्र होगी, सत्संग की भी कद्र होगी, वह अपनी वाणी को व्यर्थ नहीं जाने देगा, अपने समय को व्यर्थ नहीं जाने देगा, अपनी सेवा में निखार लायेगा, अपना कोई दुराग्रह नहीं रखेगा, गीता के ज्ञान में दृढ़व्रती होगा। भजन्ते मां दृढ़व्रताः। और वह समता बनाये रखेगा, अपने जीवनरूपी साज पर कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग से 'सोऽहम्' स्वरूप के गीत गुँजाएगा। इस अमूल्य मानव-देह को पाकर भी इसकी कद्र न की तो फिर मनुष्य जन्म पाने का क्या अर्थ है ? फिर तो जीवन व्यर्थ ही गया। यह मनुष्य-जन्म फिर से मिलेगा कि नहीं, क्या पता ? अतः सदैव याद रखें कि यह मनुष्य-जन्म आत्मज्ञान, आत्मदर्शन, मुक्ति एवं अखंड आनंद की प्राप्ति के लिए ही मिला है। ब्रह्मानंद की मधुर वंशी बजाने के लिए मिला है इसे व्यर्थ न खोयें। जीवनरूपी साज टूट जाये, इसकी मधुर धुन निकालने की क्षमता समाप्त हो जाय उसके पहले इसे किसी समर्थ सदगुरु को सौंपकर निश्चिंत हो जाओ।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, दिसम्बर 2009, अंक 204, पृष्ठ संख्या 21,23

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गुरुवार, 8 सितंबर 2011

विष में और विषय में अन्तर ....


परमात्मा को छोड़कर जो विषयों का चिन्तन करते हैं उनके बड़े दुर्भाग्य हैं। विष में और विषय में अन्तर है। विष का चिन्तन करने से मौत नहीं होती, विष का चिन्तन करने से पतन नहीं होता, विष जिस बोतल में रहता है उस बोतल का नाश नहीं करता लेकिन विषय जिस चित्त में रहता है उसको बरबाद करता है, विषय का चिन्तन करने मात्र से पतन होता है, साधना की मौत होती है। विषय इस जीव के लिए इतने दुःखद हैं कि समुद्र में डूबना पड़े तो डूब जाना, आग में कूदना पड़े तो कूद पड़ना, विषधर को आलिंगन करना पड़े तो कर लेना लेकिन लीलाशाह बापू जैसे महापुरुष कहते हैं किः "भाइयों ! अपने को विषयों में मत गिरने देना। आग में कूदोगे तो एक बार ही मृत्यु होगी, समुद्र में डूबोगे तो एक बार ही मृत्यु होगी लेकिन विषयों में डूबे तो न जाने कितनी बार मृत्यु होगी इसका कोई हिसाब नहीं।"
शाम को सरिता के किनारे शांत वातावरण में बैठे थे साधकों के बीच। सत्सग शुरु ही हो रहा था कि एक कौवा मेंढक को चोंच में पकड़कर उड़ा। मेंढक का क्या करुण क्रन्दन था। ट्रें... ट्रें... ट्रें....। कौवे ने उसे चोंच में बुरी तरह दबाया था। मैंने साधकों से कहाः यह मेंढक भी कभी मनुष्य बना होगा। इसके भी कहीं पत्नी, पुत्र, परिवार, धन, सत्ता, साम्राज्य... कुछ-न-कुछ डिमडिम अपने ढंग का रहा ही होगा। वह सारा डिमडिम आज उसको कौवे की चोंच से नहीं छुड़ा सकता है। हाय रे विधि तेरी लीला ! हाय रे प्रारब्ध ! हाय रे जीव तेरी बेवकूफी ! तू मनुष्य बना था उस समय परमात्मा का चिन्तन करके बच जाता जन्म मरण के चक्र से। आज कौवे की चोंच से अपने को नहीं छुड़ा सकता है। उस मेंढक को हम भी नहीं छुड़ा पाये। कौवा तो उसको लेकर उड़ गया। हम कौवों के पीछे कितना भागेंगे? कौवा उसे छोड़ भी देता तो वह तड़प-तड़पकर मरता अथवा दूसरे कौवे पकड़ लेते।

ऐसी वैराग्य जगानेवाली घटनाएँ तो प्रतिदिन, प्रतिक्षण घटती रहती हैं लेकिन हमारा चित्त विषयों से इतना आक्रान्त कर देते हैं। कई लोग अर्थी को देखकर बोल पड़ते हैं- 'हाय ! बेचारा मर गया।' समझते नहीं कि अपने को भी मर जाना है यार ! जगते नहीं और उसी विषय-सेवन की पुरानी पटरियों पर जीवन की गाड़ी दौड़ाये जा रहे हैं।

भोजू कुल्फी बेचने का धन्धा करता था। बड़ा लोभी था। कभी धन्धे से छुट्टी नहीं करता था। कुल्फी का डिब्बा कन्धे पर उठाता और चिल्लाताः "कुल्फी.... मावेवाली ठण्डी मीठी कुल्फी....!" वह न कभी रविवार देखता न एकादशी देखता, न पूर्णिमा देखता न अमावस्या देखता। सोचता दौ पैसे मिलेंग, अपने काम में आयेंगे। उस नादान को पता नहीं था कि रूपये काम नहीं आते, तेरा परमात्म-चिन्तन काम आयेगा। परमात्म-चिन्तन यदि दृढ़ है तो पैसे उसके दासों के भी दास हैं। एक बार भोजू के पड़ोस में किसी की मृत्यु हुई। पत्नी ने लोभी भोजू को खूब समझा-बुझाकर छुट्टी करवाई। भोजू स्मशान-यात्रा में शामिल हुआ। उसके कन्धे पर अर्थी आते ही वह चिल्ला उठाः "कुल्फी..... मावेवाली ठण्डी मीठी कुल्फी....."
पासवाले ने उसे हिलाया कि यह क्या बोल रहे हो पागल? चित्त की गहराई में जो चिन्तन होता है वही उभर आता है।

राजा भोज के दरबार में एक धुरन्धर विद्वान आया। वह हर भाषा इतनी सफाई से बोल सकता था मानों वह उसकी मातृभाषा ही हो। उसकी असल मातृभाषा कौन-सी है यह बता पाना कठिन था। उसने राजदरबार में चुनौतीपूर्ण घोषणा कर दी कि जो विद्वान मेरी मातृभाषा बता देगा उसे मैं लाख रूपये इनाम दूँगा, अन्यथा प्रतिदिन राज्य की ओर से मुझे लाख रुपये मिलते रहें। राजा भोज विद्वानों की कद्र करता था। उस विद्वान की शर्त मान ली गई। लेकिन दरबार का कोई विद्वान तय नहीं कर पाया कि उसकी मातृभाषा कौन-सी है। राजदरबार हार गया। वह विद्वान लाख रुपये लेकर चलता गया। दूसरे तीसरे और चौथे दिन भी यही हुआ। राज्य के रूपये तो जा रहे थे, साथ में राजदरबार की प्रतिष्ठा भंग हो रही थी।
आखिर कालिदास के पास बात पहुँची। वे बोलेः अच्छा ! मैं उसकी मातृभाषा का पता लगा दूँगा।" उस दिन भी वह विद्वान लाख रूपये जीतकर दरबार से जाने लगा तो बाहर सीढियाँ उतरते समय कालिदास ने उसके घुटनों पर प्रहार किया। वह लड़खड़ाकर गिर पड़ा। आगबबूला होकर गिरते-गिरते अपनी मातृभाषा में चिल्लाया, बड़बड़ाया। कालिदास उसके पास बैठ गये। उसके घुटने दबाते हुए बोलेः ''क्षमा करना, आपकी मातृभाषा फलानी है। और कोई उपाय न था यह जानने का। इसलिए यह धृष्टता की है। क्षमा करना, मैं आपके पैर को चंपी कर देता हूँ।"

आपके अचेतन मन में क्या छुपा है, ऐन मौके पर उसका पता चल जाता है। जब एकदम कोई मुसीबत आती है तब 'हाय....!' निकलती है कि 'हरि....' निकलता है यह देखना जरा। ठोकर लगती है, चोट लगती है तब डॉक्टर याद आता है कि अपना सच्चिदानन्दस्वरूप याद आता है? 'ठोकर भी मैं हूँ, ठोकर खाने वाला भी मैं हूँ और ठोकर को देखने वाला भी मैं हूँ.... शिवोऽहम्... ऐसा निकलता है कि और कोई कचरा निकलता है? यदि कचरा निकलता है जल्दी से नदी में डाल देना, बहा देना।

आकार में निराकार दिखता है कि निराकार में आकार दिखता है? आकृति में सत्यता दिखती है कि आकृति में विकृति दिखती है यह जरा अपने भीतर निहारना। गहरा चिन्तन करना। आप गायत्री मंत्र का जप करते हैं तो कोई सासांरिक चीजें माँगते हैं कि बुद्धि पवित्र हो ऐसी प्रार्थना करते हैं? पवित्र बुद्धि में ही आत्म-साक्षात्कार की क्षमता आती है।

स्रोत्र: - आश्रम से प्रकाशित पुस्तक "अलख की ओर" से
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बुधवार, 7 सितंबर 2011

सुख-दुःख का सदुपयोग.....


मुस्कुराकर गम का जहर जिनको पीना आ गया।
यह हकीकत है कि जहाँ में उनको जीना आ गया।।


सुख और दुःख हमारे जीवन के विकास के लिए नितान्त आवश्यक है। चलने के लिए दायाँ और बायाँ पैर जरूरी है, काम करने के लिए दायाँ और बायाँ हाथ जरूरी है, चबाने के लिए ऊपर का और नीचे का जबड़ा जरूरी है वैसे ही जीवन की उड़ान के लिए सुख व दुःखरूपी दो पंख जरूरी हैं। सुख-दुःख का उपयोग हम नहीं कर पाते, सुख-दुःख से प्रभावित हो जाते हैं तो जीवन पर आत्मविमुख होकर स्थूल-सूक्ष्म-कारण शरीर से बँधे ही रह जाते हैं। अपने मुक्त स्वभाव का पता नहीं चलता। इसलिए रोटी की जितनी जरूरत है, कपड़ों की जितनी जरूरत है, मकान की जितनी जरूरत है उससे हजार गुनी ज्यादा जरूरत है सच्ची समझ की। सच्ची समझ के बिना हमारा जीवन सुख का और दुःखों का शिकार हुआ जा रहा है। लोग बोलते हैं-

'बापू ! बेटा नहीं है इसलिए दुःख हो रहा है। रोना आता है....!'

किसी का बेटा नहीं है तो दुःख हो रहा है, किसी को पति नहीं है, पत्नी नहीं है, मकान नहीं है तो दुःख हो रहा है लेकिन जिनके आगे हजारों बेटों की, हजारों पतियों की, हजारों पत्नियों की, हजारों मकानों की, हजारों दुकानों की कोई कीमत नहीं है ऐसे परमात्मा हमारे साथ हैं, भीतर हैं फिर भी आज तक उनकी पहचान नहीं हुई इस बात का दुःख नहीं होता। आनंदस्वरूप अन्तर्यामी परमात्मा का अनुभव नहीं होता इसके लिए रोना नहीं आता।

जो आदमी जितना सुख चाहता है, जितनी तीव्रता से चाहता है उतना दुःखी होता है। दुःख का सदुपयोग करने की कला नहीं आयी तो कमजोर होता है। फिर देवी देवताओं को मनाता है, मंदिरों में दौड़ता है, मस्जिदों में दौड़ता है, गिरजाघरों में गिड़गिड़ाता है। मंदिर मस्जिद में जाने का फल यही है कि कोई आपके दिल का मन्दिर खोल दे, आपके हृदय का द्वार खटखटा दे, आपके भीतर छुपी हुई अथाह शक्ति का दीदार आपको करा दे। फिर बारहों मेघ गर्जें, प्रलयकाल के सूर्य तपें, आपका बाल बाँका नहीं होगा। आप ऐसी चीज हैं आपको पता नहीं। पूरी सृष्टि का प्रलय हो जाय तब भी आपका कुछ नहीं बिगड़ता। सारी दुनिया के लोग आपके विरोध में खड़े हो जाएँ, सारे देवी देवता कोपायमान हो जायें फिर भी आपका कुछ नहीं बिगड़ सकता ऐसी महान् विभूति आप हैं, लेकिन...? आपको पता नहीं।

वेदान्त की बात आपके अनुभव में आने से सारे दुःख ओस की बूँद की तरह लुप्त हो जायेंगे। मैं नितान्त सत्य कह रहा हूँ। यह बात समझने से ही परम कल्याण होगा।

अपनी समझ जब तक इन्सान को आती नहीं।
दिल की परेशानी तब तक जाती नहीं।।


......तो कृपानाथ ! अपने ऊपर कृपा करो। सुख का भी सदुपयोग और दुःख का भी सदुपयोग। सुख-दुःख आपके दास हो जायें। आप उनके स्वामी हो जाओ। फिर, आप कौन हो यह जानने की जिज्ञासा जागृत होगी। जीवन की जिज्ञासा में जीवन के कल्याण के बीज निहित हैं। कल्याण भी ऐसा किः

रिद्धिसिद्धि जाँ के आगे हाथ जोड़ खड़ी है।
सुन्दर कहत ताँ के सब ही गुलाम हैं।।


मनुष्य के पास क्या नहीं है? उसके पास क्या क्या है यह प्रश्न नहीं है। अपितु उसके पास क्या नहीं है यह प्रश्न है। आपको लगेगा कि अपने पास बँगला नहीं है, गाड़ी नहीं है, फ्रिज नहीं है। अरे खाक! अभी आपने अपना आपा देखा ही कहा हैं? अपने मन से जरा ऊपर उठो, अपने आत्म-सिंहासन पर जा बैठो तो पता चले असलियत का।

....और जिनके पास बँगला है, गाड़ी है, फ्रिज है उनको पूछोः 'क्या हाल है? सुखी हो?' रोज के चालीस-पचास हजार रूपये कमाने वाले लोगों को मैं जानता हूँ और रोज के तीस रूपये लाने वाले लोगों को भी मैं जानता हूँ। दोनों रोटी खाते हैं। दोनों को मरते देखा है और दोनों की राख एक जैसी। फर्क क्या पड़ा?

मेरा कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि तीस रूपये कमाने वाला अच्छा है और पचास हजार रूपये कमाने वाला बुरा है। मैं यह कहना चाहता हूँ कि दोनों ने अपने आपसे अन्याय कर लिया। एक दुःख में फँसा तो दूसरा सुख में बँधा। दोनों बन्धन बनाकर चले गये, बन्धन काटे नहीं। जीवन की जिज्ञासा खुली नहीं, अपनी महानता के द्वार पर पहुँचे नहीं। दिव्यता का ताला खुला नहीं।

अज्ञानी के रूप में जन्म लेना कोई पाप नहीं, मूर्ख के रूप में पैदा होना कोई पाप नहीं लेकिन मूर्ख बने रहकर सुख-दुःख की थप्पड़े खाना और जीर्ण-शीर्ण होकर मर जाना महा पाप है।

जो चीज मिलती है उसका सदुपयोग नहीं होता तो दुबारा वह चीज नहीं मिलती। मानव देह मिली, बुद्धि मिली और उसका सदुपयोग नहीं किया, सुख-दुःख की लपटों में स्वाहा हो गये तो दुबारा मानव देह नहीं मिलेगी। इसीलिए तुलसीदास जी कहते हैं-

जौ न तरै भवसागर नर समाज अस पाई।
सो कृत निन्दक मन्दमति आतमहन अधोगति जाई।


मानव तन पाकर जो भवसागर नहीं तरता वह क्या कुत्ता होकर तरेगा? बिल्ला होकर तरेगा? गधा होकर तरेगा कि घोड़ा होकर तरेगा? इन योनियों में तो डण्डे ही खाने हैं। घोड़ा बन गये। दिन भर गाड़ी खींची। रात को गाड़ीवान् ने पौवा (दारू) पी लिया, नशा कर लिया। चारा-पानी देना भूल गया। नशे में चूर होकर पड़ा रहा। आप सारी रात तड़पते रहे बिना चारा-पानी के। कई रातें ऐसी गुजरती हैं। तब किसको शिकायत करेंगे? कौन हमें सुनेगा? किसको डाँटेगे? मूक होकर सहन करना ही पड़ेगा। रात को भूखामरी हुई, जन्तु काटे, दिन को कौओं की चोंचें खाओ, गाड़ीवान् के चाबुक खाओ और गाड़ी खींचो। ऐसी एक नहीं 84 लाख योनियाँ हैं। कभी पौधे बन गये। माली ने पानी नहीं दिया तो सूख रहे हैं। बरसाती पौधे बने। वर्षा ऋतु गई तो मुरझा रहे हैं तब क्या करेंगे?

इसलिए सावधान हो जाओ। अपने ऊपर कृपा करो। भोजन मिले न मिले, पानी मिले न मिले, कपड़े मिले न मिले लेकिन जीवन में अच्छी समझ अवश्य मिलनी चाहिये। अच्छी समझ का उपयोग करने का उत्साह अवश्य होना चाहिए। अगर वह उत्साह आपमें नहीं होगा तो भगवान आपका कितना भी मंगल चाहें, सत्पुरुष आपका कितना भी कल्याण चाहें लेकिन आपके उत्साह के बिना वे लाचार हो जाते हैं आपको ऊपर उठाने में। बरसात कितनी भी हो, सूर्य के किरण कितने भी पड़ें लेकिन खेती करने की तड़प आप में नहीं है तो क्या होगा? धूप व पानी व्यर्थ चले जायेंगे। ऐसे ही शास्त्रकृपा करके अपनी जीवन की खेती में साधना की बुआई नहीं करोगे तो क्या होगा?

स्रोत्र: - आश्रम से प्रकाशित पुस्तक "अलख की ओर" से
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