मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

विष में और विषय में अन्तर ....


परमात्मा को छोड़कर जो विषयों का चिन्तन करते हैं उनके बड़े दुर्भाग्य हैं। विष में और विषय में अन्तर है। विष का चिन्तन करने से मौत नहीं होती, विष का चिन्तन करने से पतन नहीं होता, विष जिस बोतल में रहता है उस बोतल का नाश नहीं करता लेकिन विषय जिस चित्त में रहता है उसको बरबाद करता है, विषय का चिन्तन करने मात्र से पतन होता है, साधना की मौत होती है। विषय इस जीव के लिए इतने दुःखद हैं कि समुद्र में डूबना पड़े तो डूब जाना, आग में कूदना पड़े तो कूद पड़ना, विषधर को आलिंगन करना पड़े तो कर लेना लेकिन लीलाशाह बापू जैसे महापुरुष कहते हैं किः "भाइयों ! अपने को विषयों में मत गिरने देना। आग में कूदोगे तो एक बार ही मृत्यु होगी, समुद्र में डूबोगे तो एक बार ही मृत्यु होगी लेकिन विषयों में डूबे तो न जाने कितनी बार मृत्यु होगी इसका कोई हिसाब नहीं।"
शाम को सरिता के किनारे शांत वातावरण में बैठे थे साधकों के बीच। सत्सग शुरु ही हो रहा था कि एक कौवा मेंढक को चोंच में पकड़कर उड़ा। मेंढक का क्या करुण क्रन्दन था। ट्रें... ट्रें... ट्रें....। कौवे ने उसे चोंच में बुरी तरह दबाया था। मैंने साधकों से कहाः यह मेंढक भी कभी मनुष्य बना होगा। इसके भी कहीं पत्नी, पुत्र, परिवार, धन, सत्ता, साम्राज्य... कुछ-न-कुछ डिमडिम अपने ढंग का रहा ही होगा। वह सारा डिमडिम आज उसको कौवे की चोंच से नहीं छुड़ा सकता है। हाय रे विधि तेरी लीला ! हाय रे प्रारब्ध ! हाय रे जीव तेरी बेवकूफी ! तू मनुष्य बना था उस समय परमात्मा का चिन्तन करके बच जाता जन्म मरण के चक्र से। आज कौवे की चोंच से अपने को नहीं छुड़ा सकता है। उस मेंढक को हम भी नहीं छुड़ा पाये। कौवा तो उसको लेकर उड़ गया। हम कौवों के पीछे कितना भागेंगे? कौवा उसे छोड़ भी देता तो वह तड़प-तड़पकर मरता अथवा दूसरे कौवे पकड़ लेते।

ऐसी वैराग्य जगानेवाली घटनाएँ तो प्रतिदिन, प्रतिक्षण घटती रहती हैं लेकिन हमारा चित्त विषयों से इतना आक्रान्त कर देते हैं। कई लोग अर्थी को देखकर बोल पड़ते हैं- 'हाय ! बेचारा मर गया।' समझते नहीं कि अपने को भी मर जाना है यार ! जगते नहीं और उसी विषय-सेवन की पुरानी पटरियों पर जीवन की गाड़ी दौड़ाये जा रहे हैं।

भोजू कुल्फी बेचने का धन्धा करता था। बड़ा लोभी था। कभी धन्धे से छुट्टी नहीं करता था। कुल्फी का डिब्बा कन्धे पर उठाता और चिल्लाताः "कुल्फी.... मावेवाली ठण्डी मीठी कुल्फी....!" वह न कभी रविवार देखता न एकादशी देखता, न पूर्णिमा देखता न अमावस्या देखता। सोचता दौ पैसे मिलेंग, अपने काम में आयेंगे। उस नादान को पता नहीं था कि रूपये काम नहीं आते, तेरा परमात्म-चिन्तन काम आयेगा। परमात्म-चिन्तन यदि दृढ़ है तो पैसे उसके दासों के भी दास हैं। एक बार भोजू के पड़ोस में किसी की मृत्यु हुई। पत्नी ने लोभी भोजू को खूब समझा-बुझाकर छुट्टी करवाई। भोजू स्मशान-यात्रा में शामिल हुआ। उसके कन्धे पर अर्थी आते ही वह चिल्ला उठाः "कुल्फी..... मावेवाली ठण्डी मीठी कुल्फी....."
पासवाले ने उसे हिलाया कि यह क्या बोल रहे हो पागल? चित्त की गहराई में जो चिन्तन होता है वही उभर आता है।

राजा भोज के दरबार में एक धुरन्धर विद्वान आया। वह हर भाषा इतनी सफाई से बोल सकता था मानों वह उसकी मातृभाषा ही हो। उसकी असल मातृभाषा कौन-सी है यह बता पाना कठिन था। उसने राजदरबार में चुनौतीपूर्ण घोषणा कर दी कि जो विद्वान मेरी मातृभाषा बता देगा उसे मैं लाख रूपये इनाम दूँगा, अन्यथा प्रतिदिन राज्य की ओर से मुझे लाख रुपये मिलते रहें। राजा भोज विद्वानों की कद्र करता था। उस विद्वान की शर्त मान ली गई। लेकिन दरबार का कोई विद्वान तय नहीं कर पाया कि उसकी मातृभाषा कौन-सी है। राजदरबार हार गया। वह विद्वान लाख रुपये लेकर चलता गया। दूसरे तीसरे और चौथे दिन भी यही हुआ। राज्य के रूपये तो जा रहे थे, साथ में राजदरबार की प्रतिष्ठा भंग हो रही थी।
आखिर कालिदास के पास बात पहुँची। वे बोलेः अच्छा ! मैं उसकी मातृभाषा का पता लगा दूँगा।" उस दिन भी वह विद्वान लाख रूपये जीतकर दरबार से जाने लगा तो बाहर सीढियाँ उतरते समय कालिदास ने उसके घुटनों पर प्रहार किया। वह लड़खड़ाकर गिर पड़ा। आगबबूला होकर गिरते-गिरते अपनी मातृभाषा में चिल्लाया, बड़बड़ाया। कालिदास उसके पास बैठ गये। उसके घुटने दबाते हुए बोलेः ''क्षमा करना, आपकी मातृभाषा फलानी है। और कोई उपाय न था यह जानने का। इसलिए यह धृष्टता की है। क्षमा करना, मैं आपके पैर को चंपी कर देता हूँ।"

आपके अचेतन मन में क्या छुपा है, ऐन मौके पर उसका पता चल जाता है। जब एकदम कोई मुसीबत आती है तब 'हाय....!' निकलती है कि 'हरि....' निकलता है यह देखना जरा। ठोकर लगती है, चोट लगती है तब डॉक्टर याद आता है कि अपना सच्चिदानन्दस्वरूप याद आता है? 'ठोकर भी मैं हूँ, ठोकर खाने वाला भी मैं हूँ और ठोकर को देखने वाला भी मैं हूँ.... शिवोऽहम्... ऐसा निकलता है कि और कोई कचरा निकलता है? यदि कचरा निकलता है जल्दी से नदी में डाल देना, बहा देना।

आकार में निराकार दिखता है कि निराकार में आकार दिखता है? आकृति में सत्यता दिखती है कि आकृति में विकृति दिखती है यह जरा अपने भीतर निहारना। गहरा चिन्तन करना। आप गायत्री मंत्र का जप करते हैं तो कोई सासांरिक चीजें माँगते हैं कि बुद्धि पवित्र हो ऐसी प्रार्थना करते हैं? पवित्र बुद्धि में ही आत्म-साक्षात्कार की क्षमता आती है।

स्रोत्र: - आश्रम से प्रकाशित पुस्तक "अलख की ओर" से
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बुधवार, 7 सितंबर 2011

सुख-दुःख का सदुपयोग.....


मुस्कुराकर गम का जहर जिनको पीना आ गया।
यह हकीकत है कि जहाँ में उनको जीना आ गया।।


सुख और दुःख हमारे जीवन के विकास के लिए नितान्त आवश्यक है। चलने के लिए दायाँ और बायाँ पैर जरूरी है, काम करने के लिए दायाँ और बायाँ हाथ जरूरी है, चबाने के लिए ऊपर का और नीचे का जबड़ा जरूरी है वैसे ही जीवन की उड़ान के लिए सुख व दुःखरूपी दो पंख जरूरी हैं। सुख-दुःख का उपयोग हम नहीं कर पाते, सुख-दुःख से प्रभावित हो जाते हैं तो जीवन पर आत्मविमुख होकर स्थूल-सूक्ष्म-कारण शरीर से बँधे ही रह जाते हैं। अपने मुक्त स्वभाव का पता नहीं चलता। इसलिए रोटी की जितनी जरूरत है, कपड़ों की जितनी जरूरत है, मकान की जितनी जरूरत है उससे हजार गुनी ज्यादा जरूरत है सच्ची समझ की। सच्ची समझ के बिना हमारा जीवन सुख का और दुःखों का शिकार हुआ जा रहा है। लोग बोलते हैं-

'बापू ! बेटा नहीं है इसलिए दुःख हो रहा है। रोना आता है....!'

किसी का बेटा नहीं है तो दुःख हो रहा है, किसी को पति नहीं है, पत्नी नहीं है, मकान नहीं है तो दुःख हो रहा है लेकिन जिनके आगे हजारों बेटों की, हजारों पतियों की, हजारों पत्नियों की, हजारों मकानों की, हजारों दुकानों की कोई कीमत नहीं है ऐसे परमात्मा हमारे साथ हैं, भीतर हैं फिर भी आज तक उनकी पहचान नहीं हुई इस बात का दुःख नहीं होता। आनंदस्वरूप अन्तर्यामी परमात्मा का अनुभव नहीं होता इसके लिए रोना नहीं आता।

जो आदमी जितना सुख चाहता है, जितनी तीव्रता से चाहता है उतना दुःखी होता है। दुःख का सदुपयोग करने की कला नहीं आयी तो कमजोर होता है। फिर देवी देवताओं को मनाता है, मंदिरों में दौड़ता है, मस्जिदों में दौड़ता है, गिरजाघरों में गिड़गिड़ाता है। मंदिर मस्जिद में जाने का फल यही है कि कोई आपके दिल का मन्दिर खोल दे, आपके हृदय का द्वार खटखटा दे, आपके भीतर छुपी हुई अथाह शक्ति का दीदार आपको करा दे। फिर बारहों मेघ गर्जें, प्रलयकाल के सूर्य तपें, आपका बाल बाँका नहीं होगा। आप ऐसी चीज हैं आपको पता नहीं। पूरी सृष्टि का प्रलय हो जाय तब भी आपका कुछ नहीं बिगड़ता। सारी दुनिया के लोग आपके विरोध में खड़े हो जाएँ, सारे देवी देवता कोपायमान हो जायें फिर भी आपका कुछ नहीं बिगड़ सकता ऐसी महान् विभूति आप हैं, लेकिन...? आपको पता नहीं।

वेदान्त की बात आपके अनुभव में आने से सारे दुःख ओस की बूँद की तरह लुप्त हो जायेंगे। मैं नितान्त सत्य कह रहा हूँ। यह बात समझने से ही परम कल्याण होगा।

अपनी समझ जब तक इन्सान को आती नहीं।
दिल की परेशानी तब तक जाती नहीं।।


......तो कृपानाथ ! अपने ऊपर कृपा करो। सुख का भी सदुपयोग और दुःख का भी सदुपयोग। सुख-दुःख आपके दास हो जायें। आप उनके स्वामी हो जाओ। फिर, आप कौन हो यह जानने की जिज्ञासा जागृत होगी। जीवन की जिज्ञासा में जीवन के कल्याण के बीज निहित हैं। कल्याण भी ऐसा किः

रिद्धिसिद्धि जाँ के आगे हाथ जोड़ खड़ी है।
सुन्दर कहत ताँ के सब ही गुलाम हैं।।


मनुष्य के पास क्या नहीं है? उसके पास क्या क्या है यह प्रश्न नहीं है। अपितु उसके पास क्या नहीं है यह प्रश्न है। आपको लगेगा कि अपने पास बँगला नहीं है, गाड़ी नहीं है, फ्रिज नहीं है। अरे खाक! अभी आपने अपना आपा देखा ही कहा हैं? अपने मन से जरा ऊपर उठो, अपने आत्म-सिंहासन पर जा बैठो तो पता चले असलियत का।

....और जिनके पास बँगला है, गाड़ी है, फ्रिज है उनको पूछोः 'क्या हाल है? सुखी हो?' रोज के चालीस-पचास हजार रूपये कमाने वाले लोगों को मैं जानता हूँ और रोज के तीस रूपये लाने वाले लोगों को भी मैं जानता हूँ। दोनों रोटी खाते हैं। दोनों को मरते देखा है और दोनों की राख एक जैसी। फर्क क्या पड़ा?

मेरा कहने का तात्पर्य यह नहीं है कि तीस रूपये कमाने वाला अच्छा है और पचास हजार रूपये कमाने वाला बुरा है। मैं यह कहना चाहता हूँ कि दोनों ने अपने आपसे अन्याय कर लिया। एक दुःख में फँसा तो दूसरा सुख में बँधा। दोनों बन्धन बनाकर चले गये, बन्धन काटे नहीं। जीवन की जिज्ञासा खुली नहीं, अपनी महानता के द्वार पर पहुँचे नहीं। दिव्यता का ताला खुला नहीं।

अज्ञानी के रूप में जन्म लेना कोई पाप नहीं, मूर्ख के रूप में पैदा होना कोई पाप नहीं लेकिन मूर्ख बने रहकर सुख-दुःख की थप्पड़े खाना और जीर्ण-शीर्ण होकर मर जाना महा पाप है।

जो चीज मिलती है उसका सदुपयोग नहीं होता तो दुबारा वह चीज नहीं मिलती। मानव देह मिली, बुद्धि मिली और उसका सदुपयोग नहीं किया, सुख-दुःख की लपटों में स्वाहा हो गये तो दुबारा मानव देह नहीं मिलेगी। इसीलिए तुलसीदास जी कहते हैं-

जौ न तरै भवसागर नर समाज अस पाई।
सो कृत निन्दक मन्दमति आतमहन अधोगति जाई।


मानव तन पाकर जो भवसागर नहीं तरता वह क्या कुत्ता होकर तरेगा? बिल्ला होकर तरेगा? गधा होकर तरेगा कि घोड़ा होकर तरेगा? इन योनियों में तो डण्डे ही खाने हैं। घोड़ा बन गये। दिन भर गाड़ी खींची। रात को गाड़ीवान् ने पौवा (दारू) पी लिया, नशा कर लिया। चारा-पानी देना भूल गया। नशे में चूर होकर पड़ा रहा। आप सारी रात तड़पते रहे बिना चारा-पानी के। कई रातें ऐसी गुजरती हैं। तब किसको शिकायत करेंगे? कौन हमें सुनेगा? किसको डाँटेगे? मूक होकर सहन करना ही पड़ेगा। रात को भूखामरी हुई, जन्तु काटे, दिन को कौओं की चोंचें खाओ, गाड़ीवान् के चाबुक खाओ और गाड़ी खींचो। ऐसी एक नहीं 84 लाख योनियाँ हैं। कभी पौधे बन गये। माली ने पानी नहीं दिया तो सूख रहे हैं। बरसाती पौधे बने। वर्षा ऋतु गई तो मुरझा रहे हैं तब क्या करेंगे?

इसलिए सावधान हो जाओ। अपने ऊपर कृपा करो। भोजन मिले न मिले, पानी मिले न मिले, कपड़े मिले न मिले लेकिन जीवन में अच्छी समझ अवश्य मिलनी चाहिये। अच्छी समझ का उपयोग करने का उत्साह अवश्य होना चाहिए। अगर वह उत्साह आपमें नहीं होगा तो भगवान आपका कितना भी मंगल चाहें, सत्पुरुष आपका कितना भी कल्याण चाहें लेकिन आपके उत्साह के बिना वे लाचार हो जाते हैं आपको ऊपर उठाने में। बरसात कितनी भी हो, सूर्य के किरण कितने भी पड़ें लेकिन खेती करने की तड़प आप में नहीं है तो क्या होगा? धूप व पानी व्यर्थ चले जायेंगे। ऐसे ही शास्त्रकृपा करके अपनी जीवन की खेती में साधना की बुआई नहीं करोगे तो क्या होगा?

स्रोत्र: - आश्रम से प्रकाशित पुस्तक "अलख की ओर" से
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मंगलवार, 6 सितंबर 2011

नूरे - इलाही, शाहों के शाह...




न गुरोरधिकं तत्त्वं न गुरोरधिकं तपः।

न गुरोरधिकं ज्ञानं तस्मै श्रीगुरवे नमः।।

'आत्मवेत्ता गुरु से श्रेष्ठ कोई तत्त्व नहीं है, गुरु से अधिक कोई तप नहीं है और गुरु से विशेष कोई ज्ञान नहीं है। ऐसे श्री गुरुदेव को मेरा नमस्कार है।'

गुरुतत्त्व में जगे हुए महापुरुष परमात्मा का प्रकट रूप होते हैं। अंतर्यामी परमात्मा के अंतर्यामित्व का दर्शन करना हो तो ऐसे महापुरुषों के जीवन में ही उसे देख सकते हैं। एक तेजस्वी महापुरुष किसी जंगल में एकांतवास के लिए ठहरे हुए थे। तब एक मुसलमान माली उन्हें रोज देखता था। उनके असाधारण व्यक्तित्व से प्रभावित होकर माली के मन में होता कि 'इन साधु को कुछ खिलाऊँ।' परंतु मन ही मन शंका होती कि क्या पता, ये हिन्दू साधु मुसलमान के हाथ का कुछ खायेंगे कि नहीं !' इस प्रकार कितने ही दिन बीत गये।

एक दिन वह मूली धो रहा था। इतने में तो वे साधु उसके आगे आकर खड़े हो गये और बोलेः "जो खिलाना हो, खिला। रोज-रोज सोचता रहता है तो आज अपनी इच्छा पूरी कर।"

वह मुसलमान माली तो आश्चर्यचकित हो उठा कि 'इन साधु को मेरे मन की बात का पता कैसे चला !' वह तो उन महापुरुष के श्रीचरणों में मस्तक नवाकर कहने लगाः "सचमुच, आप नूरे इलाही हो ! आप शाहों के शाह हो ! मुझे दुआ करो।" ऐसा कहकर उसने बड़ी श्रद्धा और भावपूर्ण हृदय से दो मूली साफ करके, धोकर महाराज को दीं। संत श्री ने भी बड़े प्रेम से उन मूलियों को खाया। वह दृश्य देखने वालों को तो भगवान श्रीरामजी और शबरी भीलन के बेरों की याद आ गयी।

जानते हैं, वे अंतर्यामी, आत्मारामी स्वामी कौन थे ? वे थे भक्तवत्सल योगिराज स्वामी श्री श्री लीलाशाहजी महाराज !

(भगवत्पाद स्वामी श्री श्री लीलाशाहजी महाराज महानिर्वाण तिथिः 15 नवम्बर)

यदि वह संकल्प चलाये....

संसार-ताप से तप्त जीवों में शांति का संचार करने वाले, अनादिकाल से अज्ञान के गहन अन्धकार में भटकते हुए जीवों को ज्ञान का प्रकाश देकर सही दिशा बताने वाले, परमात्म-प्राप्तिरूपी मंजिल को तय करने के लिये समय-समय पर योग्य मार्गदर्शन देते हुए परम लक्ष्य तक ले जाने वाले सर्वहित चिंतक ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों की महिमा अवर्णनीय है।

वे महापुरुष केवल दिशा ही नहीं बताते वरन् चलने के लिए पगडंडी भी बना देते हैं, चलना भी सिखाते हैं, उंगली भी पकड़ाते हैं। जैसे माता पिता अपने बालक को कंधे पर उठाकर यात्रा पूरी करवाते हैं, वैसे ही वे कृपालु महापुरुष हमारी आध्यात्मिक यात्रा को पूर्ण कर देते हैं। भगवत्पाद स्वामी श्री लीलाशाह जी महाराज के जीवन की एक कृपापूर्ण घटना इस प्रकार हैः

स्वामी लीलाशाहजी ने स्वामी राम अवतार शुक्ला के गीता-व्याख्यान की बड़ी प्रशंसा सुनी थी। अतः एक दिन वे उनसे मिलने उनके घर चल दिये। स्वामी राम अवतार जी की आयु 75 वर्ष के आसपास थी और उस दिन वे इस दुनिया से विदा लेने की तैयारी में थे। कुछ डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था तो कुछ उस समय वहाँ मौजूद थे। स्वामी जी उनके सम्मुख खड़े होकर कहने लगेः "राम अवतारजी ! मैं इस विचार से आया हूँ कि आपके मुखारविंद से श्रीमद् भगवदगीता सुनूँ।"

उनकी नाजुक हालत देखकर स्वामी जी ने उनके परिवारवालों से कहाः "इन्हें एक गिलास पानी में नींबू का रस व शहद मिलाकर पिलाओ, ठीक हो जायेंगे।"

वहाँ पर खड़े डॉक्टरों ने कहाः "इनका अंतिम समय आ चुका है, नींबू शहद का पानी पीने से तो ये और जल्दी दुनिया से चले जायेंगे।"

राम अवतार जी ने धीरे से कहाः

"ठीक है, पिलाओ।"

लीलाशाहजी महाराज ने कमण्डलु से थोड़ा जल हाथ में लिया, उसमें निराहार संकल्प करके दे दिया। पानी में नींबू-शहद मिलाकर पिलाया गया। स्वामी जी ने चलते चलते राम अवतार जी से कहाः "परसों सुबह मेरे पास आना।" और आश्चर्य ! वे कुछ ही घंटों में एकदम ठीक हो गये।

संत जब अपने ब्रह्मस्वभाव में स्थित होकर कुछ कह दें तो वह बाह्यदृष्टि से विपरीत परिणामवाला होने पर भी श्रद्धावान के लिए अनुकूल हो जाता है। आज्ञानुसार राम अवतारजी श्रीचरणों में पहुँचे और स्वामी जदी को अष्टांग प्रणाम करके गीता पर व्याख्यान किया। उस दिन से राम अवतार जी प्रतिदिन नियम से पूज्यपाद स्वामी श्रीलीलाशाहजी महाराज को श्रीमद भगवदगीता सुनाने आते थे।

ब्रह्मनिष्ठा प्राप्त करने के बाद संतों को शास्त्र पढ़ने-सुनने की आवश्यकता ही नहीं होती। वे जो बोलते हैं, वह शास्त्र बन जाता है। फिर भी दूसरों के कल्याण के निमित्त जो घटना घटती ह, वह उनकी लीला होती है। फिर चाहे वह लीला सत्संग सुनने की हो या सुनाने की हो, मौज है उनकी ! माता पिता की तरह कदम-कदम पर हमारी सँभाल रखने वाले, सर्वहितचिंतक, समता के सिंहासन पर बैठाने वाले ऐसे परम दयालु ब्रह्मनिष्ठ महापुरुषों को कोटि-कोटि वंदन....

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2010, पृष्ठ संख्या 14,15,17 अंक 214

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सोमवार, 5 सितंबर 2011

चिंता और चिंतन... (पूज्य बापू जी की विवेक जगाती अमृतवाणी)


साधनकाल में एकांतवास अत्यंत आवश्यक है। बुद्ध ने छः साल तक अरण्य में एकांतवास किया था। श्रीमद् आद्य शंकराचार्य ने नर्मदा तट पर सदगुरू के सान्निध्य में एकांतवास में रहकर ध्यानयोग, ज्ञानयोग इत्यादि के उत्तुंग शिखर सर किये थे। उनके दादागुरु गौड़पादाचार्य ने एवं सदगुरू गोविंदपादाचार्य ने भी एकांत-सेवन किया था, अपनी वृत्तियों को इन्द्रियों से हटाकर अंतर्मुख किया था।

अंतःकरण की दो धाराएँ होती हैं- एक होती है चिंता की धारा और दूसरी होती है चिंतन की धारा, विचार की धारा। जिसके जीवन में दिव्य विचार नहीं हैं, दिव्य चिंतन नहीं वह चिंता की खाई में गिरता है। चिंता से बुद्धि संकीर्ण होती है, कुण्ठित होती है, विकार पैदा होते हैं। चिंता से बुद्धि का विनाश होता है।

जो निश्चिंत हैं वे शराब नहीं पीते। जो विचारवान हैं वे फिल्म की पट्टियों में अपना समय बर्बाद नहीं करते।

स्वामी माधवतीर्थ कहते थे कि सौ वेश्याओं के पास जाना उतना हानिकर्ता नहीं जितना फिल्म में जाना हानिकर्ता है वेश्या के संग में तो दिखेगा कि हानि है लेकिन फिल्म से पड़ने वाले गहरे संस्कारों से पता ही नहीं चलता कि हानि हो रही है। फिल्म में जो दिखता है वह सच्चा नहीं है, फिर भी हृदय में जगत की सत्यता और आकर्षण पैदा कर देता है। फिर हृदय में अभाव खटकता रहेगा। अभाव खटकता रहेगा तो चिंता के शिकार बन जायेंगे। चलचित्र विचार करने नहीं देंगे, भोगेच्छा बढ़ा देंगे। भोगेच्छा से आदमी का विनाश होता है।

विचारवान पुरुष अपनी विचारशक्ति से विवेक-वैराग्य उत्पन्न करके वास्तव में जिसकी आवश्यकता है उसे पा लेगा। मूर्ख आदमी जिसकी आवश्यकता है उसे समझ नहीं पायेगा और जिसकी आवश्यकता नहीं है उसको आवश्यक मानकर अपना अमूल्य जीवन खो देगा। उसे चिंता होती है कि 'रूपये नहीं होंगे तो कैसे चलेगा ?गाड़ी नहीं होगी तो कैसे चलेगा ? अमुक वस्तु नहीं होगी तो कैसे चलेगा ?' उसे लगता है कि 'अपने रूपये हैं, अपनी गाड़ी है, अपने साधन हैं.... हम स्वतन्त्र हैं।' आपके पास गाड़ी नहीं है तो आप परतंत्र हो गये ! रूपये-पैसे नहीं हैं तो आप परतंत्र हो गये!!

उन बेचारे मंद बुद्धिवाले लोगों को पता ही नहीं चलता कि रूपये-पैसे से स्वतन्त्रता नहीं आती। रूपये-पैसे हैं तो आप स्वतन्त्र हो गये.... तो क्या यह रूपये-पैसे की परतंत्रता नहीं हुई ? यह तो गाड़ी की, बँगले की, फ्लैट की, सुविधाओं की परतन्त्रता ही हुई। इन चीजों की परतंत्रता पाकर कोई अपने को स्वतन्त्र माने तो यह नादानी के सिवाय और क्या है ! वास्तव में रूपये-पैसे, गाड़ी, मकान आदि सब तुम्हारे शरीररूपी साधन के लिए चाहिए। आपके लिए इन चीजों की कोई आवश्यकता नहीं है। तुम्हारा वास्तविक स्वरूप परम स्वतंत्र है। तुमको अपने ज्ञान की ही आवश्यकता है। अपना ज्ञान जब तक नहीं होगा तब तक तुम अपने साधन (शरीर) की आवश्यकता को अपनी आवश्यकता मान लोगे। अतः विवेक, वैराग्य एवं एकांत-सेवन कर ध्यान एवं ज्ञानयोग द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त करने को ही अपने जीवन का ध्येय बनाना चाहिए।

स्रोतः लोक कल्याण सेतु, दिसम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 6, अंक 162

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शनिवार, 3 सितंबर 2011

दोषों को दूर भगायें, सदगुणों से जीवन महकायें....


ईश्वर भी उन्हीं की मदद करता है जो पुरुषार्थ करके स्वयं अपनी कमियों को दूर करने का प्रयत्न करते हैं, अपने दोष आप मिटाने के लिए जो कृत-संकल्प होते हैं। हमारे अन्दर कौन-से दोष हैं यह हम अच्छी तरह जानते हैं। उन्हें निकालने के लिए जब तक हम स्वयं प्रयास नहीं करेंगे तब तक वे दूर नहीं होंगे।

क्रोधः जरा-जरा सी बात पर झुँझला जाना, क्रोधित हो जाना बड़ा भारी दोष है। क्रोधी व्यक्ति की स्मृति का लोप हो जाता है, उसकी बुद्धि भ्रमित और प्रतिभा कुण्ठित हो जाती है। जब लगे कि क्रोध आने वाला है तो मौन होकर वहाँ से दूसरी जगह चले जाइये। प्रतिदिन एक-दो घंटा मौन रखिये और भोजन चबा-चबाकर कीजिए, इससे क्रोध पर नियंत्रण आयेगा। (अन्य प्रयोग देखें- आरोग्यनिधि भाग-2, पृष्ठ संख्या 191 पर)

घृणा तथा ईर्ष्याः जब आप किसी के प्रति घृणा या ईर्ष्या रखते हैं तो वह आपको ही हानि करती हैं क्योंकि इससे सबसे पहले आपका ही चित्त मलिन होता है। सबमें ईश्वर का भाव रखकर सबके प्रति प्रेम का व्यवहार कीजिए – इस प्रकार घृणा, ईर्ष्या तथा असहिष्णुता पर विजय प्राप्त कीजिए।

भयः भय, चिंता और क्रोध मनुष्य की सम्पूर्ण शक्तियों का ह्रास करते हैं। भय के कारण कभी-कभी व्यक्ति सफल होते होते भी चूक जाता है। भ्रूमध्य में ध्यान करते हुए ॐकार का जप व्यक्ति को निर्भय बनाता है। महाभारत जैसे सदग्रन्थ, जिनमें भीम, अर्जुन तथा अन्य योद्धाओं के शौर्य का वर्णन है, पढ़ने चाहिए। असंयमित व्यक्ति ज्यादा भयभीत होते हैं, ब्रह्मचर्य प्रचुर शक्ति और साहस प्रदान करता है।

निराशा व आत्महीनताः निराश व्यक्ति किसी भी वस्तु के सकारात्मक पक्ष को न देखकर उसके अवगुणों को ही देखता है। आशावादी व्यक्ति प्रत्येक वस्तु के सदगुण को ही देखेगा। निराशावादी मनुष्य अपने को हमेशा हीन व असहाय महसूस करता है। जिनके जीवन में सदगुरु की दीक्षा, गुरुमंत्र का बल नहीं है वे ज्यादा निराश-हताश होते देखे गये हैं। परम सुहृद परमात्मा आपके साथ हैं तो अपने को निराश-हताश और दुर्बल क्यों मानना ? ॐकार की टंकार से निराशा व आत्महीनता के विचारों को दूर भगायें। पूज्य बापूजी द्वारा बताया गया 'देव-मानव हास्य-प्रयोग' सुबह उठने के बाद व रात्रि को सोने से पहले करें, इससे आत्महीनता व निराशा को दूर करने में बहुत मिलेगी।

आलस्य, असावधानी और विस्मृतिः आलसी विद्यार्थी अपना काम समय पर नहीं कर पाता और हँसी का पात्र बनता है। आलस्य दूर करने में सूर्यनमस्कार व त्रिबन्ध प्राणायाम बहुत मदद करते हैं। इसी प्रकार असावधानी और लापरवाही भी एक बड़ा दोष है। असावधान विद्यार्थी कोई भी कार्य ठीक से नहीं कर पाता। वह सदा पेन, कापी, चाबियाँ इत्यादि खोता रहता है। समय पर जब उसे कोई चीज नहीं मिलती तो वह परेशान होता है।
अतः अपने दैनिक कार्यों व उपयोगी वस्तुओं की सूची बनायें और समय-समय पर उसका अवलोकन करते रहें। सूर्यदेव को रोज जल चढ़ायें। नियमित भ्रामरी प्राणायाम करने व प्रातः खाली पेट तुलसी के पाँच-सात पत्ते चबा-चबाके खाकर ऊपर से आधा गिलास पानी पीने से विस्मृति रोग दूर होता है। (अन्य यौगिक प्रयोगों के लिए देखें पुस्तक 'दिव्य प्रेरणा प्रकाश', पृ. 35)

कुसाहित्य एवं सिनेमाः इन दोनों से आज हमारी युवा पीढ़ी का जितना पतन हो रहा है उतना और किसी चीज से नहीं। जिस विद्यार्थी को महान बनना हो उसे इन दोनों से दूर ही रहना चाहिए। गंदे साहित्य व फिल्मों से मन में कुसंस्कार भर जाते हैं, फिर जैसे ऊसर भूमि में अनाज नहीं उगता वैसे ही उसमें दिव्य सदगुणों का विकास नहीं होता।

इन्द्रिय लोलुपताः इन्द्रिय लोलुपता विकास के मार्ग में एक बड़ा भारी अवरोध है, अतः अपनी इन्द्रियों पर कड़ी निगरानी रखें। जिसने अपनी इन्द्रियों को अनुशासित कर लिया है, उसका संकल्प बलवान तथा मन शांत होगा। वह अच्छी तरह ध्यान कर सकता है व एकाग्र हो सकता है। उसमें अपार आंतरिक बल प्रकट होता है। उसे हर किसी क्षेत्र में सफलता मिलती है। इन्द्रिय-दमन से आपको सदगुणों के विकास तथा दुर्गुणों के उन्मूलन में बहुत सहायता प्राप्त होगी और बुरी आदतों का निवारण आपके लिए बड़ा सरल हो जायेगा। बुरी आदत को एक ही झटके से छोड़ देना चाहिए, धीरे धीरे कम करके छोड़ने का विचार प्रायः सफल नहीं हुआ करता। जो बुरी आदतों के शौकीन हों उनके संग से हमेशा बचें। जब पुरानी आदत जोर करे तो सावधान हो जायें। जब कभी तनिक सा भी प्रलोभन उपस्थित हो तो दृढ़ता से अपना मुख फेर ले। भगवन्नाम का जप करें। मन को किसी कार्य में पूर्णतया व्यस्त कर दें। दृढ़ संकल्प करें कि 'मैं अवश्य महान बनूँगा।' इस संसार में तुम्हारे लिए कुछ भी असंभव नहीं है। जहाँ चाह है, वहाँ राह है।

स्रोतः लोक कल्याण सेतु, मार्च अप्रैल 2009
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