मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

गुरुवार, 1 सितंबर 2011

पाँच इन्द्रियों का मौन..


अद्वैत भाव की चरम अवस्था में पहुँचने हेतु प्रत्यक्ष सहायरूप होने वाला एक 'मौन' ही मित्र है। मौन से जो शक्ति उत्पन्न होती है उसकी तुलना में कोई दूसरी शक्ति नहीं है। मौन के ज्ञानपूर्वक अभ्यास से और उसके अनुशीलन-परिशीलन से जीवन में तेजस्विता आती है। जीवन अधिक विशाल, शांत और समभावी बनता है।

मौन के अभ्यास से जीवन में सर्वांगीण शुचिता का संचार होने लगता है। परम तत्त्व की झलक पाने में जो तत्त्व अनिवार्य है वह मौन। परंतु मौन का अर्थ केवल वाणी का ही मौन नहीं, यह तो मौन का स्थूल अर्थ हुआ। मौन का सच्चा अर्थ है पाँचों इन्द्रियों का अपने अपने विषयों से उपराम हो जाना।

'उपवास' अर्थात् रसनेन्द्रिय का मौन, न बोलना, वाणी का मौन, अंतर के ध्यान में चक्षु, कर्ण, त्वचा आदि इन सभी को समेट लेना यह भी मौन है। अनेक के बीच रहते हुए भी एक में लीन रहना मौन है।

स्थूल देह भले ही किसी भी स्थिति में हो पर सूक्ष्म रूप से निरंतर एक (आत्मा) के ही ध्यान में रहने से, सभी इन्द्रियों की एक साथ एकाग्रता के केन्द्रीभूत बल से जीवन में अपार शक्ति एकत्र होती है। ऐसी अवस्था उत्पन्न होते ही जीवन में नवचेतना का संचार हो जाता है। नम्रता, शांति, धैर्य, गांभीर्य आदि सदगुण स्वाभाविक ही प्रकट होने लगते हैं। मन विशाल व उदात्त बनने लगता है। इन्द्रियों के अपने-अपने प्राकृत धर्म अपने-आप छूट रहे हैं – ऐसा महसूस होने लगता है।

मौन के गर्भ में अपार शक्ति है। महासागर का उपरी स्तर भले ही तूफानी दिखायी देता हो परंतु उसके अंदर परम गांभीर्य और शांति विराजमान है। इसी प्रकार मौन के ज्ञान-भक्तिपूर्वक सेवन से बड़ा भारी मनोभंजन होता है परंतु बाद में अंतरतम में अपार शांति और समता अनुभूत होती है। मौन से जीवन की सूक्ष्म प्रवृत्तियों में भी शांति आ जाती है। मौन-सेवन से मानव प्रशांत-मूर्ति बन जाता है।

मौन के सतत अनुशीलन-परिशीलन से बुद्धि में योग, विवेक और धर्म का प्राकट्य होता है। प्रतिक्षण जो अपनी संपूर्ण जीवनशक्ति को परम कल्याण की दृष्टि से ही समर्पित करता है, उसकी सारी समर्पणशक्ति का जो मूल है वह एक 'मौन' ही है। जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में यथायोग्य व्यवहार करते हुए मौन का आश्रय लेने से परम शांति एवं धैर्य की प्राप्ति होती है।

स्रोतः लोक कल्याण सेतु, जून, जुलाई 2009

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बुधवार, 31 अगस्त 2011

गणेश चतुर्थी या कलंकी चौथ


गणेश चतुर्थी को कलंकी भी कहते हैं। इस चतुर्थी को चाँद देखना वर्जित है।

इस वर्ष गणेश चतुर्थी (1 सितम्बर) के दिन चन्द्रास्त रात्रि 9-15 बजे हैं। इस समय तक चन्द्रदर्शन निषिद्ध है।

यदि भूल से भी चौथ का चन्द्रमा दिख जाये तो 'श्रीमद् भागवत' के 10 वें स्कन्ध के 56-57वें अध्याय में दी गयी 'स्यमंतक मणि की चोरी'की कथा का आदरपूर्वक श्रवण करना चाहिए। भाद्रपद शुक्ल तृतिया या पंचमी के चन्द्रमा का दर्शन करना चाहिए, इससे चौथ को दर्शन हो गये हों तो उसका ज्यादा खतरा नहीं होगा।

अनिच्छा से चन्द्रदर्शन हो जाय तो......

निम्न मंत्र से पवित्र किया हुआ जल पीना चाहिए। मंत्र का 21, 54 या 108 बार जप करें। मंत्र इस प्रकार हैः

सिंहः प्रसेनमवधीत् सिंहो जाम्बवता हतः।

सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः।।

'सुन्दर, सलोने कुमार ! इस मणि के लिए सिंह ने प्रसेन को मारा है और जाम्बवान ने उस सिंह का संहार किया है, अतः तुम रोओ मत। अब इस स्यमंतक मणि पर तुम्हारा ही अधिकार है।'

(ब्रह्मवैवर्त पुराण, अध्यायः78)

चौथ के चन्द्रदर्शन से कलंक लगता है। इस मंत्र प्रयोग अथवा उपर्युक्त पाठ से उसका प्रभाव कम हो जाता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2010, पृष्ठ संख्या 27, अंक 212

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मंगलवार, 30 अगस्त 2011

लापरवाही नहीं तत्परता ! (पूज्य बापू जी की सत्संग सुधा)


साधक के जीवन में, मनुष्यमात्र के जीवन में अपने लक्ष्य की स्मृति और तत्परता होनी ही चाहिए। संयम और तत्परता सफलता की कुंजी है, लापरवाही और संयम का अनादर विनाश का कारण है। जिस काम को करें, उसे ईश्वर का कार्य मानकर साधना का अंग बना लें। उस काम में से ही ईश्वर की मस्ती का आनंद आने लग जायेगा।

तत्परता व सजगता से काम करने वाला व्यक्ति कभी विफल नहीं होता। आलस्य और प्रमाद मनुष्य की योग्यताओं के शत्रु हैं। लापरवाही सारी योग्यताओं को खा जाती है, इसलिए अपनी योग्यता विकसित करने के लिए भी तत्परता से कार्य करना चाहिए। जिसकी कम समय में सुंदर, सुचारू रूप से व अधिक से अधिक कार्य करने की कला विकसित है, वह आध्यात्मिक जगत में जाता है तो वहाँ भी सफल हो जायेगा और लौकिक जगत में भी, परंतु समय बर्बाद करने वाला, टालमटोल करने वाला तो व्यवहार में भी विफल रहता है और परमार्थ में तो सफल हो ही नहीं सकता।

लापरवाह, पलायनवादी लोगों को सुख-सुविधा और भजन का स्थान भी मिल जाय तो भी उनकी कार्य करने में तत्परता नहीं होती, ईश्वर में, जप में प्रीति नहीं होती। ऐसे व्यक्तियों को ब्रह्माजी भी आकर सुखी करना चाहें तो नहीं कर सकते। ऐसे व्यक्ति दुःखी ही रहेंगे। कभी-कभी दैवयोग से उन्हें सुख मिलेगा तो आसक्त हो जायेंगे और दुःख मिलेगा तो बोलेंगेः 'क्या करें, जमाना ऐसा है !' ऐसा कहकर वे फरियाद ही करेंगे।

काम-क्रोध तो मनुष्य के वैरी हैं ही परंतु लापरवाही, आलस्य, प्रमाद – ये मनुष्य की योग्यता के वैरी हैं, इसलिए अपने कार्य में तत्पर होना चाहिए। रावण, सिकंदर, हिरण्यकशिपु, हिटलर – ये तत्पर तो थे लेकिन अहं को पोसने में, विषय-विकारों को पाने में विनाश की तरफ चले गये। आत्मा परमात्मा को पाने का उद्देश्य बना के धर्म-मर्यादा के अनुरूप तत्परता होनी चाहिए। कई लोग तत्पर भी पाये जाते हैं पर भोग-विलास और अहं पोसने में लगते हैं तो विनाश की तरफ जाते हैं। तत्परता अविनाशी की तरफ होनी चाहिए। जो कर्मयोग में तत्पर नहीं है वह भक्तियोग और ज्ञान योग में तत्पर नहीं होगा। जप करेगा तो व्यग्रचित्त होकर बंदरछाप जप करेगा, इससे उसका फल क्षीण हो जायेगा। अतः जो भी काम करो तत्परता से करो। भोजन करो तो चबा-चबाकर करो। इधर-उधर देखते-देखते, बातें करते हुए, जल्दी-जल्दी, लापरवाही से भोजन करते हैं तो भोजन पचता नहीं, आँते खराब होती हैं, तबीयत खराब होती है। यात्रा करनी है और देर से गये, गाड़ी छूट गयी तो यह लापरवाही है। रोटी बनाते बनाते रोटी पर काले दाग कर दिये, जला दी तो लापरवाह है, मूर्ख है। सब्जी बना रहा है तो सब्जी को छौंक लगाकर इतना सेंका कि उसके बहुत सारे विटामिन नष्ट हो गये या नमक मिर्ची ज्यादा डाल दी अथवा तो फीकी बना दी। ऐसे लोग लापरवाह होते हैं। चावल ठीक से साफ नहीं किये, खाते समय कंकड़ आते हैं तो साफ करने वाला लापरवाह है, मूर्ख है। चाहे कितना भी बड़ा सेठ हो, साहब हो... साहब है, वेतन लेता है इसलिए उसकी जिम्मेदारी है कि दफ्तर का काम तत्परता से करे। झाड़ू लगाने वाला है तो झाड़ू ठीक से लगाये, यह उसकी जिम्मेदारी है।

संचालक लोग लापरवाह होते हैं तो स्वामी को बहुत कष्ट सहना पड़ता है। मुनीम, मैनेजर, सहायक लापरवाह होता है तो उसके मालिक को बहुत दुःख देखना पड़ता है। लापरवाह आदमी से भगवान नाराज रहते हैं। शबरी कर्म करने में कैसी तत्पर, रैदासजी कितने तत्पर, ध्रुव और प्रह्लाद काम करने में कितने तत्पर..... भगवान को प्रसन्न कर लिया, पा लिया। धिक्कार है लापरवाह लोगों को जो अपने स्वामी को दुःख देते हैं, समाज के लोगों से धोखा करते हैं ! खाना-पीना समाज का और समाज के कार्य में लापरवाही करना, ऐसे लोग कुत्ते से भी बेकार होते हैं। लापरवाह आदमी को 'कुत्ता' बोलो तो कुत्ता भी नाराज हो जायगा, 'गधा' बोलो तो गधा नाराज हो जायेगा। बोलेगाः 'मैं तो रूखा-सूखा खा लेता हूँ और मालिक का खाता हूँ और काम विलम्ब में डालता है, ऊपर से सफाई देता है।' पलायनवादी, लापरवाह व्यक्ति घर, दुकान, दफ्तर, आश्रम जहाँ भी जायेगा देर-सवेर असफल हो जायेगा। कर्म के पीछे भाग्य बनता है, हाथ की रेखाएँ बदल जाती हैं, प्रारब्ध बदल जाता है।

सुविधा पूरी चाहिये लेकिन जिम्मेदारी नहीं, इससे लापरवाह व्यक्ति खोखला हो जाता है। जो तत्परता से काम नहीं करता, उसे कुदरत दुबारा मनुष्य शरीर नहीं देती। कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनसे काम लिया जाता है परंतु तत्पर व्यक्ति को कहना नहीं पड़ता, वह स्वयं कार्य करता है। समझ बदलेगी तब व्यक्ति बदलेगा और व्यक्ति बदलेगा तब समाज और देश बदलेगा।

जो मनुष्य-जन्म में काम से कतराता है, वह पेड़-पौधा, पशु बन जाता है, फिर कुल्हाड़े मारकर, डंडे मारकर उससे काम लिया जाता है। सूर्य दिन रात कार्य कर रहा है, हवाएँ दिन-रात कार्य कर रही हैं, प्रकृति दिन रात कार्य कर रही है, परमात्मा दिन रात चेतना दे रहा है और हम अगर कार्य से भागते फिरते हैं तो स्वयं ही अपने पैर पर कुल्हाड़ा मारते हैं।

काम की अधिकता नहीं अनियमितता आदमी को मार डालती है। विद्यार्थी है तो 'आज पढ़ने का पाठ कल पढ़ेंगे, बाद में करेंगे....' ऐसा नहीं करे। जिस समय का जो काम है वह उस समय ही कर लेना चाहिए, बाद के लिए नहीं रखना चाहिए। बढ़िया समय आयेगा तब कुछ करेंगे या बढ़िया समय था तब कुछ कर लेते....' नहीं, अभी जो समय है वही बढ़िया है।

जो काम, जो बात अपने बस की है उसे ईमानदारी, तत्परता और कुशलतापूर्वक करो। अपने प्रत्येक कार्य को ईश्वर की पूजा समझो। राज-व्यवस्था में भी अगर तत्परता नहीं है तो वह बिगड़ जाती है। रिश्वत मिल जाती है तो जो काम अधिकारियों से तत्परता से लेना है वह नहीं लेते और वे लापरवाह हो जाते हैं। इस देश में 'ऑपरेशन' की जरूरत है। जो कामचोर हैं, लापरवाह हैं, समाज का शोषण करते हैं, खूब रिश्वत ले के देश विदेशों में जमा करते हैं, ऐसे लोगों को तो कड़ी सजा मिलनी चाहिए, तभी देश सुधरेगा। आप लोग जहाँ भी हों, अपने जीवन को संयम और तत्परता के ऊपर उठाओ। परमात्मा हमेशा उन्नति में साथ देता है, पतन में नहीं। पतन में हमारी वासनाएँ, लापरवाही काम करती है। मुक्ति के रास्ते भगवान साथ देता है, प्रकृति साथ देती है, बंधन के लिए तो हमारी बेवकूफी, इन्द्रियों की गुलामी, लालच और हलका संग ही कारणरूप होता है। हम तो ईश्वर का संग करेंगे, संतों शास्त्रों की शरण जायेंगे, श्रेष्ठ संग करेंगे और संयमी व तत्पर होकर अपना कार्य करेंगे – यही भाव रखना चाहिए।

लापरवाही के दुर्गुण से बचने में 'लं' बीजमंत्र का जप सहायक है, लाभदायी है।

रोज ॐ लं लं लं लं लं.... इस प्रकार आदर से, तत्परता से कम से कम हजार बार जप करने वाला लापरवाह भी सुधर जायेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2010, पृष्ठ संख्या 11,12 अंक 214

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सोमवार, 29 अगस्त 2011

मनुष्य की विलक्षणता


एक होती है कामना, जो जीवमात्र में होती है – खाने की, पीने की, भोगने की, रखने की। कुत्ते का भी जब पेट भर जाता है तब उसे कोई बढ़िया चीज मिलती है तो वह उसे उठाकर ले जाता है और गड्ढा खोदकर गाड़ देता है कि 'कल खायेंगे', यह कामना है। 'पैसे अभी हैं पर थोड़े बैंक में पड़े रहे हैं, फिर काम आयेंगे' – यह कामना है। पेड़-पौधों को भी कामना होती है परंतु उनकी कामना और होती है, मनुष्य की कामना और होती है, कुत्ते की कामना और होती है पर कामना सभी जीवों में होती है। मनुष्य में दो चीजें ऐसी होती हैं जो और जीवों में नहीं होतीं। पेड़ पौधों में कामना होती है खाद-पानी की, कीट-पतंग में कामना होती है अपने आहार की, अपने बच्चों को सुरक्षित रखने की लेकिन मनुष्य में कामना के साथ लालसा भी होती है और जिज्ञासा भी होती है। यह बहुत ऊँची चीज है। इस ऊँची चीज को महत्त्व दे और कामना को प्रारब्ध के, भगवान के हवाले छोड़ दे तो देखते-देखते मनुष्य महान आत्मा बन जायेगा, दिव्यात्मा बन जायेगा। इसीलिए कहते हैं कि मनुष्य-जीवन देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। देवताओं में भी लालसा और जिज्ञासा तो होती है परंतु देवताओं के यहाँ इतनी सुविधा, इतना सुख-वैभव है कि कामना-कामना में वे इतने मशगूल हो जाते हैं कि इन दो चीजों का फायदा उठाने से रह जाते हैं। जब पुण्य नष्ट होते हैं तो फिर मनुष्य शरीर में आते हैं परंतु मनुष्य-जन्म में ये चीजें ज्यों-की-त्यों बरकरार रहती हैं – लालसा और जिज्ञासा।

लालसा होती है भगवान का रसपान करने की, भगवान का माधुर्य पाने की। कितना भी धन हो जाये फिर भी अंदर से धनी भी भगवान की तरफ जाते हैं, किसी-न-किसी को मानते हैं। लगभग सभी लोग भगवान को मानते हैं, कोई-कोई नहीं मानता होगा। जो नहीं मानते, समझो उनकी मनुष्यता ही खो गयी।

मनुष्य में यह लालसा रहती है कि भगवत्सुख मिले, भगवत्प्रीति मिले, भगवदरस मिले, भगवदधाम मिले। हम लोग स्वर्ग बोलते हैं, कोई बिहिश्त बोलता है, कोई पैराडाइज बोलता है, कोई कुछ बोलता है किंतु यह लालसा मनुष्य में रहती है।

जिज्ञासा होती है 'हम वास्तव में कौन हैं ?' इसे जानने की। शरीर मर जाता है फिर भी हम तो रहते हैं। अगर हम नहीं रहते तो स्वर्ग में कौन जाता है, नरक में कौन जाता है ? मरने के बाद भी हम तो हैं न ! तो हम कौन हैं और भगवान क्या हैं ? हमारे और भगवान के बीच क्या संबंध है, क्या दूरी है और वह कैसे मिटे, कैसे जानें ? यह जो जानने की भावना होती है वह जिज्ञासा है। भगवदरस पाने का जो लालच होता है उसे लालसा बोलते हैं और संसारी चीजों को पाने की इच्छा को वासना बोलते हैं।

तो मनुष्य में तीनों होती हैं – वासना, लालसा और जिज्ञासा। अगर वासना-ही-वासना है तो मनुष्य और कुत्ते में कोई ज्यादा फर्क नहीं है। दुःख आया तो मनुष्य दुःखी हो गया, घबड़ा गया... कुत्ता भी दुःख में घबड़ाता है, पूँछ दबा देता है और सुख आया तो पूँछ हिलाता है, खुशी दिखाता है, मनुष्य भी दिखाता है लेकिन कुत्ते से मनुष्य बहुत ऊँचा है। बैल, घोड़े, गधे, - सभी प्राणियों से मनुष्य ऊँचा है क्योंकि दो रत्न और भी हैं – लालसा और जिज्ञासा। मनुष्य उन रत्नों को महत्त्व दे दे तो वह देवताओं से भी आगे निकल जायेगा। देवता भगवान के बाप नहीं बने हैं परंतु मनुष्य भगवान के बाप भी बने हैं। देवता भगवान के गुरु नहीं बने हैं पर मनुष्य भगवान के गुरु भी बने हैं।

मनुष्यैः क्रियते यत्तु तन्न शक्यं सुरासुरैः।

'जो ऊँचाई मनुष्य पा सकता है, वह सुर और असुर भी नहीं पा सकते।'

(ब्रह्म पुराणः 27.70)

मनुष्य अपनी जिज्ञासा और लालसा को महत्त्व देकर इतना ऊँचा उठ सकता है, इतना ऊँचा उठ सकता है कि जहाँ ऊँचाई की हद हो जाय! यदगत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम। जहाँ जाने के बाद पतन ही नहीं होता। न तदभासयते सूर्यो न शशांको न पावकः। वहाँ सूर्य का प्रकाश, चन्द्रमा का प्रकाश या अग्नि का प्रकाश नहीं। अग्नि, चंदा और सूर्य को भी जो प्रकाशित करता है उस प्रकाशमय सत्त्व को, तत्त्व को, आत्मा को जानकर मनुष्य जीवन्मुक्त हो जाता है। बाहर से इतनी गरीबी है कि शरीर पर केवल लँगोटी है, तीन थिगली (पैवंद) लगी हैं, सब्जी में नमक डालने के पैसे नहीं हैं किंतु जिज्ञासा और लालसा बढ़ गयी तो ऐसे पद को पाता है कि इन्द्र भी उसके आगे बबलू हो जाता है।

जिज्ञासा से ब्रह्मज्ञान हो जाता है, लालसा से ब्रह्म-परमात्मा का रस पैदा होता है। मैं तो आपको सलाह देता हूँ कि आपके अंदर ये दो दिव्य शक्तियाँ हैं, उनको सहयोग करो। लालसा और जिज्ञासा को बढ़ाओ। कामना में समय बर्बाद मत करो। कामनाएँ क्षीण होती जायें तथा जिज्ञासा और लालसा सफल होती जायें तथा जिज्ञासा और लालसा सफल होती जायें, यह सच्ची सफलता है।

कामनावाले से तो वृक्ष भी डरते हैं। आप बस-स्टैंड पर खड़े हैं और कोई भिखमंगा कामना करके आता है तो आपको अच्छा नहीं लगता है। जान छुड़ाने के लिए कुछ पैसे डाल देते हो। औज जिनको कामना नहीं है ऐसे संत को हाथ जोड़कर, माथा टेककर भी पीछे-पीछे घूमते हो कि"बाबाजी ! जरा यह फल-फूल ले लो।" बाबाजी बोलते हैं- "नहीं चाहिए बेटे !" आप फिर से 'बाबा ! बाबा !!' करते हैं, मानो उन्होंने लिया तो हम पर मेहरबानी कर दी। कामना रहित पुरुष को कुछ देते हैं तो वह महापुण्य बन जाता है और कामनावाले को देते हो तो जान छुड़ाने के लिए। आप भगवान से, समाज से या प्रकृति से भिखमंगे होकर कामनापूर्ति के गुलाम मत बनो तो प्रकृति आपके पीछे-पीछे घूमेगी। मैंने अपने आश्रमों में बोर्ड लगा रखे हैं कि 'चीज-वस्तु, रूपये पैसे की कोई जरूरत नहीं है। आश्रम के नाम पर कोई रूपया-पैसा माँगता है तो मुख्यालय को खबर करो।' आज तक मैंने कोई आश्रम बनाने के लिए चंदा नहीं किया, फिर भी आपको पता है कि कितने सारे आश्रम चल रहे हैं। कितनी गौशालाएँ चल रही हैं, कितने औषधालय चल रहे हैं और गरीबों को रोजी-रोटी नहीं मिलती, काम-धंधा नहीं मिलता तो आश्रमों में, समितियों में 'भजन करो, भोजन करो, दक्षिणा पाओ' केन्द्र चल रहे हैं। मैंने कामना नहीं की आप मुझे यह चीज दो, रूपया दो। अरे, जो प्रारब्ध में होगा, आयेगा। बच्चा माँ के गर्भ से जन्म लेता है तो क्या कामना करता है कि मेरे लिए दूध बन जाय, दूध बन जाय ? प्रकृति और परमात्मा की व्यवस्था है, अपने आप दूध बन गया न ! तो प्रारब्ध-वेग से सब मिलता रहता है। क्या आप कामना करते हो कि श्वास मिल जाय, मिल जाय ? अरे, आपकी आवश्यकता है तो श्वास मिलता रहता है। इसलिए कामना करके अपनी इज्जत मत बिगाड़ो, लालसा और जिज्ञासा करके, उनको बढ़ाकर अपना खजाना पा लो बस !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2010, पृष्ठ संख्या 20,21 अंक 212

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रविवार, 28 अगस्त 2011

ज्ञान की दृष्टि बना लो.. (परम पूज्य संत श्री आसाराम जी "बापू")


जान लिया कीचड़ में कोई सार नहीं, जान लिया तरंग बनकर किनारों से टकराने में सार नहीं, अब तो मुझे जलराशि में ही अच्छा लगता है। भीड़भाड़ में विकारी लोगों के बीच रहना अच्छा नहीं लगता। एकांत में या तो फिर भगवान की मस्ती में जीनेवाले मस् साधकों के बीच रहना अच्छा लगता है, बाकी फिर हमें और कहीं अच्छा नहीं लगता। अब इन्द्रियों के प्रदेश में ज्यादा जीना, घूमना अच्छा नहीं लगता। इन्द्रियातीत आत्मभाव में, आत्मज्ञान में ही सुख का अनुभव है। 'आओ सेठ ! बैठो सेठ ! फलाना सेठ !' – ऐसे लोगों के पास अब सेठपने का अहं को पोसने में मजा नहीं आता। अब तो मजा आता है कि मिट जायें....

मिल जाये कोई पीर फकीर, पहुँचा दे भवपार।

जीवन की शाम हो जाय उसके पहले अपने जीवनतत्त्व में विश्रांति मिल जाय बस ! अब 'फलानी जगह का यह चेयरमैन है, फलाने का यह है....' – यह सब देख लिया खिलवाड़। अपने को सता के देख लिया, खपा के देख लिया। अभी देखना बाकी है तो फिर जरा करके देख लो। अब तक तो करके देख लिया आजीवन। अनुभवी आदमी एक थप्पड़ से चेत जाता है, नहीं तो फिर दूसरा मिलता है, तीसरा मिलता है।

संसार में प्रकृति थप्पड़ मार-मार के भी तुम्हें परमेश्वर पद में पहुँचाना चाहती है। अगर समझ के पहुँचते हो तो आराम से तुम्हें खेलते-कूदते ले जाने के लिए वह प्रकृति देवी तैयार है। नहीं मानते हो, मोह ममता करते हो तो वह चीज छीन के थप्पड़ मार के भी तुमको जगाने के लिए उत्सुक रहती है वह महामाया, क्योंकि वह तो आखिर परमेश्वर की आह्लादिनी शक्ति ! कोई तुम्हारे शत्रु की तो है नहीं। माया कहो, प्रकृति कहो, है तो परमेश्वर की आह्लादिनी शक्ति, है तो उसी का अभिन्न अंग ! जैसे जल की चाहे कैसी भी तरंगें हो सागर में, है तो जल का ही विवर्त। परिणाम नहीं विवर्त, परिणाम तो बदल जाता है, विवर्त नहीं बदलता। जैसे दही दूध का परिणाम है, ऐसे ही भगवान का परिणाम जगत नहीं है। भगवान का विवर्त है जगत। वस्तु में अपने मूल स्वभाव को छोड़े बिना ही अन्य वस्तु की प्रतीति होना यह विवर्त है। सीपी में रूपा दिखना रस्सी में साँप दिखना विवर्त है।

ताना बुनते हैं न सूत का, तो कपड़े के एक छेड़े से दूसरे छेड़े तक अनेक आड़े-सीधे, गोलाकार, चौरसाकार या लम्बचौरस, जो भी तानाबुनी है सब सूत ही सूत होता है। ऐसे ही जगत में जो भी कुछ तानाबुनी है, सब ब्रह्म ही ब्रह्म की है। फिर मृत्यु कहाँ है ? जन्म भी कहाँ है ? अपना कहाँ ? पराया कहाँ ?

एक जगह महात्मा गाँधी का सूत के कपड़े में सूत का बना हुआ चित्र देखा गया। अब महात्मा गाँधी की वह चप्पल भी सूत है तो हाथ में डंडा भी सूत है और आँख पर चश्मा भी सूत है, जो धोती पहनी है वह भी सूत है और जो हड्डियाँ दिख रही हैं वे भी सूत ही सूत हैं। ऐसे ही सब ब्रह्म ही ब्रह्म है।

खाँड का खिलौना राजा बना है और महाराजा ! ताज पहना है, रथ पर बैठा है। वाइसराय बना है, ट्रेन के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में बैठा है, टोपा पहना है। अब महाराज ! टिकट चेकर भी बना है खाँड का। उस वाइसराय को थप्पड़ मारकर टोपा तोड़ दो और मुँह में डालो तो स्वाद खाँड का आयेगा और टिकट चेकर का टिकट माँगने का हाथ उठा के मुँह में डालो तो स्वाद खाँड का ही आयेगा। उन खिलौनों में से घोड़ा, गधा, कुत्ता, बिल्ला, ऊँट, हाथी, साहब-साहिबा.... कोई भी मुँह में डालो तो स्वाद खाँड का आयेगा। ऐसे ही ब्रह्मज्ञान की दृष्टि बना लो, फिर जहाँ भी दृष्टि जायेगी परमेश्वर का ही ब्रह्मानंद आयेगा। जिसको एक जगह अपना प्रियतम, प्रिय मिलता है तो कितना आनंदित होता है ! कभी-कभी अपना प्रिय मिलता है, अपनी प्रिय वस्तु मिलती है, प्रिय व्यक्ति मिलता है, प्रिय जगह मिलती है तो कितना सुखद लगता है ! ज्ञानी को तो सब जगह अपना परम प्रिय मिलता रहता है, इसलिए वे परमानंद में मस्त रहते हैं। ज्ञान से तो आपको सदा सर्वत्र प्रिय-ही-प्रिय मिलेगा, जबकि वस्तुओं में तो कभी प्रिय वस्तु मिली तो भी छूट जायेगी। प्रिय वस्तु भोगते-भोगते शरीर दुर्बल हो जायेगा, निराशा आ जायेगी लेकिन ज्ञान की दृष्टि जगी, प्रेम की सरिता बही तो आपको सर्वत्र अपना प्यारा ही प्यारा दिखेगा।

एक आदमी जो अपने-आपको विषय विकार विलास में, सम्पूर्ण शरीर के सुखों में खर्च रहा है वह भी गलत जगह पर है, गलत जगह पर उसके पैर पड़े हैं। भविष्य उसका दुःखद और अँधकारमय होगा। दूसरा आदमी वह है जो सब कुछ छोड़कर निर्जन जंगल में रहता है। अपने शरीर को सुखाता है, मन को तपाता है, 'संसार खराब है, यह मायाजाल है.... यह ऐसा है, यह वैसा है.... इससे बचो' – ऐसा करके जो बिल्कुल त्याग करता है, ज्ञानसहित नहीं लेकिन एक धारा में बहते हुए त्याग करता है, वह भी कहीं गलत रास्ते की यात्रा करता है। बुद्धिमान तो वह है जो सबमें सब होकर बैठा है उस सर्वाधिष्ठान पर दृष्टि डाले। मोह-ममता का त्याग, संकीर्णता का त्याग, अहंकार का त्याग, उद्वेग-आवेश का त्याग... और वह त्याग तब सिद्ध होगा जब ज्ञान की दृष्टि से देखोगे, संकीर्णता मिटेगी। परमात्मा की दृष्टि से देखोगे तो मोह-ममता मिटेगी और सर्वेश्वर के ज्ञान से पल्लवित, पावन होकर तुम्हारा हृदय और मस्तिष्क जब तालबद्ध होंगे, तब तुम सब कुछ देते, लेते, खाते महात्यागी और महाभोगी, महान एकांती और महान-महान प्रवृत्ति करने वाले – दोनों की अनुभूतियाँ एक साथ करोगे।

त्यागी एक अलग छोर पर है, भोगी दूसरे छोर पर है लेकिन बुद्धिमान, ज्ञानवान, सत्शिष्य और साधक त्याग और भोग दोनों को साधन बनाकर जिससे त्याग और भोग दिखते हैं उस परम पद में जग जाते हैं। त्याग भोग जाके नहीं, सो विद्वान अरोग। भोग का रोग भी नहीं और त्याग का आवेश भी नहीं, ऐसे जो ज्ञानी हैं वे विद्वान निरोग होते हैं। 'मैं त्यागी हूँ' – ऐसा भाव भी जिनको नहीं है, 'मैं भोगी हूँ' – ऐसा भाव भी जिनको नहीं है, जो भोग और त्याग दोनों को इन्द्रियों का खिलवाड़ समझते हैं, मन का फुरना समझते हैं और सर्वत्र व्याप्त अपने सर्वेश्वर की सत्ता को अपने से अभिन्न मानते हैं, ऐसे धीर ज्ञानी के जो सत्शिष्य होते हैं, वे हर हाल में हर स्थिति में सुखद अनुभव, सुखद दृष्टि पा लेते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2010, पृष्ठ संख्या 12,13 अंक 212

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