मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

बुधवार, 24 अगस्त 2011

परिवर्तन नहीं परिमार्जन....(परम पूज्य संत श्री आसाराम जी "बापू")


अर्जुन के सामने भगवान श्रीकृष्ण खड़े हैं, फिर भी उनका भय नहीं गया, शोक नहीं गया। जब उसने श्रीकृष्ण का सत्संग सुना और उस अनुसार अपने आत्मा का ज्ञान जगाया तो अर्जुन का भय भी नहीं रहा, शोक भी नहीं रहा, दुःख भी नहीं रहा और युद्ध जैसा घोर कर्म किया किंतु उसके ऊपर बंधन नहीं रहा, मुक्तात्मा हो गया।

तो गीता का ज्ञान तुम्हे ऐरी-गैरी चीजों में आसक्ति करके भोगी नहीं बनाना चाहता, ऐरी गैरी परिस्थितियों का गुलाम बनाकर तुम्हें जगत का पिट्ठू नहीं देखना चाहता। लोग क्या करते हैं कि परिवर्तन चाहते हैं। दुःख आया है.... अब दुःख मिटे, सुख आयें। रोग आया है... रोग मिटे, तंदुरूस्ती आये। निंदा आयी है, अभी सराहना आ जाय, परिवर्तन... परिवर्तन करते-करते खुद परिवर्तित होकर मौत के मुँह में चले जाते हैं लेकिन'गीता' कहती है कि परिवर्तन के चक्कर में मत आओ। दुःख को सुख से दबाओ मत। दुःख की जड़ उखाड़ के फेंक दो। निंदा को प्रशंसा से दबाओ मत, निंदा और प्रशंसा की गहराई में तुम एकरूप हो – ऐसी ज्ञान की समझ जगाओ। बीमारी में और तंदुरुस्ती में तुम एकरस हो। बचपन, जवानी, बुढ़ापा – यह सब बदलता है, फिर भी जो नहीं बदलता वह है तुम्हारा अपना आप, हर परिस्थिति का बाप ! गुरु की कृपा से ऐसे अनुभव की कुंजी पा लो। शब्दों की डींग मत हाँकना। वास्तविक अनुभव में सदगुरु का प्यारा सत्शिष्य ही पहुँच सकता है।

अपने जीवन में परिवर्तन की इच्छा मत करो। जैसे यूरोप, अमेरिका, और देश परिवर्तन, परिवर्तन में लगे हैं। नया पैक, नया फैशन, गाड़ी नयी, मॉडल नया, कार्पेट नया, रंग-रोगन नया.. नया, नया, नया... परिवर्तन, परिवर्तन..... यहाँ तक कि पत्नी बदलो, पति बदलो, मकान बदलो.... फिर भी अभागे लोग दुःखी हैं। 'गीता' कहती है प्रकृति के परिवर्तन में मत पड़ो। तुम तो अपनी बुद्धि का परिमार्जन करो। सारे परिवर्तन तुम्हें उलझा रहे हैं। तुम परिवर्तन के आधारस्वरूप परमात्मा में सुलझकर अभी सुखी हो जाओ, अभी निश्चिंत हो जाओ, अभी निर्णय हो जाओ।

मर जायेंगे फिर हमें श्मशान में, कब्र में डालकर आयेंगे। कोई पैगम्बर आकर हमारे लिए सिफारिश करेगा, फिर हमें बिहिश्त मिलेगा, अप्सराएँ मिलेंगी, शराब के चश्मे मिलेंगे। यहाँ शराब की बोतल तबाही कर देती है, अपनी पत्नी के सिवाय रावण जैसा भी यदि दूसरे की पत्नी के प्रति बुरी नजर करता है तो उसकी दुर्दशा होती है तो वे अप्सराएँ क्या दे देंगी ! सोचते हैं, 'यहाँ बुढ़िया है, मर जायेंगे तो अप्सराएँ मिलेंगी।' शराब के चश्मे, हूरें और हूरों का विलास तुम्हें नोच लेगा बेटे ! सावधान हो जाओ, ऐसी ख्वाहिश मत करो। इश्क मिजाजी, इश्क इलाही, इश्क नुरानी में अभी लग जाओ। जिसे प्रेमाभक्ति, अनुरागा भक्ति, पराभक्ति भी कहते हैं।

मदभक्तिं लभते पराम्।

श्रीकृष्ण के वचनों को रहीम खानखाना ने और अकबर की बेगम ताज ने अनुभव किया, मौलाना जलालुद्दीन रूमी ने, कबीर जी ने और लीलाशाह प्रभुजी ने, राजा जनक ने जो प्रेमाभक्ति का परम स्वाद पाया और बाँटा उसी में तुम आ जाओ।

सब दुःखों की एक दवाई,

पराभक्ति पा लो भाई।

वह प्रभु तुमसे दूर नहीं, तुम उससे दूर नहीं।

आदि सचु जुगादि सचु।

है भी सचु नानक होसी भी सचु।।

तो गीता परिवर्तन नहीं परिमार्जन करती है, समझ बदल देती है परिवर्तन प्रकृति में होगा।

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।

समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते।

'हे पुरुषश्रेष्ठ ! दुःख-सुख को समान समझने वाले जिस धीर पुरुष को ये इन्द्रिय और विषयों के संयोग व्याकुल नहीं करते, वह मोक्ष के योग्य होता है।'

(गीताः 2.15)

परमात्मा तो नित्य और एकरस है। जो भी होगा हमारे विकास के लिए होगा। सिनेमा में सुंदर मकान, बगीचे दिखते हैं। हो-हो के चले जाते हैं। जो मूर्ख है, उन्हें रोके रखना चाहता है वह दुःखी होगा। जो अपने ढंग का देखना चाहता है वह भी दुःखी होगा। जो दिख रहा है, दिख रहा है... बदल रहा है, बदल रहा है। जो आता है आने दो, जाता है जाने दो। बनता है बनने दो बिगड़ता है बिगड़ने दो। जो धन मिल गया, मिल गया। जो चला गया, उसके लिए रोते क्यों हो ! जो मान मिल गया मिल गया, चला गया तो चला गया। इसी का नाम तो दुनिया है।

खून पसीना बहाता जा, तान के चादर सोता जा।

यह नाव दो हिलती जायेगी, तू हँसता जा या रोता जा।।

तो काहे को रोयें ! वाह-वाह ! क्यों न करें ! अपनी बुद्धि में भगवान के ज्ञान का प्रकाश ले आओ। जो बीत गया उसको याद करके शोक मत करो। मैं पहले ऐसा सुखी था, यह दुःख मिला, अभी ऐसा है। नहीं, नहीं, जो बीत गया, अभी हमारे पास नहीं है उसके पीछे क्यों मरें !

भविष्य हमारे पास नहीं है, वर्तमान में आनंदित करो, परिमार्जित करो अपने मन को रसमय जीवन... जिह्वा में भगवदरस में, मन में भगवदरस भरो। मधुर बोलेंगे, सारगर्भित बोलेंगे, स्नेहयुक्त बोलेंगे, गीता के ज्ञान से भरकर वाणी बोलेंगे। हो गया परिमार्जन ! मन में किसी का बुरा नहीं सोचेंगे, किसी का बुरा नहीं चाहेंगे और कोई भी हमारा बुरा करे को वह व्यक्ति सदा के लिए ऐसा नहीं है, ऐसी समझ जाग्रत रखेंग। कोई किसी को दुःख देता है तो दुःख सामने वाले को मिले न मिले, दुःख देने वाले का दिल तो दुःख देने के विचार से गंदा होता है और कोई किसी को सुख देता है या भला करता है तो सामने वाले का कब-कितना भला हो भगवान जानें लेकिन भलाई के विचार से उसका खुद का दिल तो भला होता है न !

जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है अच्छा है, जो होगा वह भी अच्छा होगा यह नियम प्रभु का है। हम मन के चाहे पर अड़ जाते हैं इसीलिए दुःख होता है, तनाव होता है। बच्चा मनचाही चाहता है इसीलिए दुःखी होता है। माँ बच्चे को रगड़-रगड़ के शुद्ध करना चाहती है लेकिन बच्चे को अच्छा नहीं लगता, स्कूल भेजना चाहती है लेकिन अच्छा नहीं लगता फिर भी रोते-रोते भी स्नान तो करना पड़ता है, रोते-रोते भी स्कूल जाना तो पड़ता है। तो आप अपना मनचाहा परिवर्तन मत करो, परिमार्जन होने दो।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 18,19 अंक 213

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मंगलवार, 23 अगस्त 2011

विद्या क्या है ?... (पूज्य बापू जी)



विद्या ददाति विनयम्। विद्या से विनय प्राप्त होता है। यदि विद्या पाकर भी अहंकार बना रहा तो ऐसी विद्या किस काम की ! ऐसी विद्या न तो स्वयं का कल्याण करती है न औरों के ही काम आती है।

एक समय जयपुर में राजा माधवसिंह का राज्य था। राज्य-सिंहासन पर बैठने से पूर्व माधवसिंह एक सामान्य जागीरदार का पुत्र था। बाल्यकाल से ही वह बड़ा ऊद्यमी और शैतान था। पढ़ने लिखने में उसकी रूचि न थी।

उसके बाल्यकाल के गुरू थे संसारचन्द्र। यदि माधवसिंह को कोई पाठ नहीं आता तो वे उसे कठोर सजा देते। सच्चे गुरू शिष्य का अज्ञान कैसे सहन कर लेते ! बड़ा होने पर बचपन का वही ऊधमी माधवसिंह जयपुर का राजा बना।

एक दिन माधवसिंह बड़ा दरबार लगाकर बैठा था, तब किसी ने राजदरबार में आकर संसारचन्द्र की शिकायत की, जबकि वे बिल्कुल निर्दोष थे।

माधवसिंह ने संसारचन्द्र को राजदरबार को उपस्थित करने का आदेश दिया। संसारचन्द्र निर्भयतापूर्वक राजदरबार में आये।

माधवसिंह बोलाः "गुरूजी ! आपको याद होगा कि किसी जमाने में आप मेरे गुरु थे और मैं आपका शिष्य।"

संसारचन्द्र याद करने लगे तो माधवसिंह ने पुनः कहाः "जब मुझे कोई पाठ नहीं आता था तब आप मुझे डंडे से मारते थे।"

संसारचन्द्र के प्राण कंठ तक आ गये। उन्होंने सोचा कि 'अब माधवसिंह जरूर मुझे फाँसी पर लटकायेगा। इसकी क्रूरता तो प्रख्यात है।'किन्तु तभी स्वस्थ होकर संसारचन्द्र ने कहाः "महाराज ! सत्ता का नशा मनुष्य को खत्म कर देता है। यदि मुझे पहले से ही इस बात का पता होता कि आप जयपुर नरेश बनने वाले हैं तो मैंने आपको उससे भी ज्यादा कठोर सजाएँ दी होतीं। आपको राजा की योग्यता दिलाने के लिए मैंने ज्यादा दंड दिया होता। यदि मैं ऐसा कर पाता तो जो आज आप विद्या को लज्जित कर रहे है, उसकी जगह उसे प्रकाशित करते।"

सारी सभा मन-ही-मन संसारचन्द्र की निर्भयता की प्रशंसा करने लगी। माधवसिंह को भी अपनी क्रूरता के लिए पश्चाताप होने लगा। उसने गुरु संसारचन्द्र से क्षमा माँगी और उन्हें सम्मानपूर्वक विदा किया।

जो विद्या अहं को जगाकर विकृति पैदा करे, वह विद्या ही नहीं है। विद्या तो मनुष्य के व्यक्तित्व को निखारने का काम करती है और ऐसी विद्या प्राप्त होती है ब्रह्मज्ञानी महापुरुषों के चरणों में।

धन्य हैं स्पष्टवक्ता संसारचन्द्र और धन्य हैं गुरु को हितैषी मानकार राजमद छोड़ने व अपनी चतुराई चूल्हे में डालने वाला माधवसिंह !राजसत्ता का मद छोड़कर सदगुरू का आदर करने वाले छत्रपति शिवाजी की नाईं इस विवेकी ने भी अपनी उत्तम सूझबूझ का परिचय दिया।

क्या आप लोग भी अपने हितैषियों की कठोरता का सदुपयोग करेंगे ? या बचाव की बकवास करके अवहेलना करेंगे ?

स्रोतः ऋषि प्रसाद, मई 2010, पृष्ठ संख्या 9, अंक 209

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सोमवार, 22 अगस्त 2011

प्रीति और स्मृति...(पूज्य बापू जी की अमृतवाणी)


प्रीति और स्मृति में अन्तर है। देखो, जिससे प्रीति होती है उसकी स्मृति सतत बनी रहे यह कोई जरूरी नहीं। बेटे के लिए प्रीति होती है और कामकाज करते हैं तो क्या दिन भर बेटे की स्मृति करते हैं ? गहरी नींद में सो जाते हैं तो मैं कौन हूँ ? कहाँ हूँ ? बेटा कहाँ है ? – ये सब बातें विस्मृति की खाई में चली जाती हैं। फिर भी हृदय की गहरी कंदरा में अपने प्रिय की स्मृति बनी रहती है। सुबह उठे तो कामकाज में लगे लेकिन बेटे का फोन आया या बेटा आ गया तो आपकी प्रीति उभर आती है। स्मृति तो करनी पड़ती है लेकिन प्रीति एक बार हो जाय तो बनी रहती है। तो जिसको अपना मानते हैं उसमें प्रीति स्वाभाविक होती है। बेटे को अपना मानते हैं, वस्तु को अपनी मानते हैं... किसी के जूते पड़े हैं, कुत्ता उन पर पिचकारी लगा रहा है तो उसे हम नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन अपने जूते पर जब कुत्ता पिचकारी लगाने लगता है तो हम हटाते हैं क्योंकि जूता अपना है। तो जो अपनी चीज होती है, अपना जिसको मानते हैं उसमें प्रीति होती है।

मैं आपको हाथ जोड़कर प्रार्थना करता हूँ कि आप भगवान को अपना मानिये। वास्तव में भगवान आपके थे, हैं और रहेंगे। शरीर आपका पहले नहीं था, बचपन आपका नहीं था इसीलिए नहीं रहा। बचपन कौन-से दिन चला गया, बताओगे तुम ? जवानी भी आपकी नहीं है, नहीं रहेगी। बुढ़ापा भी आपका नहीं है। शरीर भी आपका नहीं है। आपका हो तो आपके कहने में रहे। आप नहीं चाहते कि यह बीमार हो जाय, नहीं चाहते मर जाय, नहीं चाहते बूढ़ा हो जाय तो भी हो जाता है। तो शरीर माया का है, प्रकृति का है, संसार का है। इसको संसार की सेवा में, कर्तव्य में लगा दो किंतु आपका आत्मा-परमात्मा है। वह एकरस है, नित्य है, सुखस्वरूप है। आपका बचपन असत् था, उसको जानने वाला सत् अभी भी है - 'बचपन में मैं ऐसा था, वैसा था....' वह आपका परमात्मा ज्ञानस्वरूप है। आपकी बुद्धि में ज्ञान उसी से आता है। वह आपका परमात्मा आनंदस्वरूप है इसीलिए हृदय में कभी-कभी प्रेम, खुशी, आनंद आता है। उस परमात्मा को अपना मान लो। जो सत् है, चेतन है, आनंदस्वरूप है, वह मेरा आत्मा-परमात्मा है। जो बदलने वाला है दुःख-सुख, वह मेरा नहीं है। मनुष्य ने यह ठान लिया है कि हमको जो मिलेगा उसको पकड़े रहेंगे। कोई छुड़ायेगा तो हम रोयेंगे। 'यह मिल गया, अब मेरा है। लेकिन यह देखते-देखते सड़ जायेगा, गल जायेगा फिर मुझे रोना पड़ेगा जो आ गया वह आ गया, उसका उपयोग किया परंतु जिसकी सत्ता से आया, जिसको दिखा वह आत्मा चैतन्य मैं हूँ। जो दिखा वह मेरा नहीं है, जो मिला वह मेरा नहीं है किंतु मिला हुआ जिससे दिखा वह सच्चिदानंद प्रभु मेरा है।' – ऐसा चिन्तन करने से आपके दुःख ऐसे मिटेंगे जैसे सूरज उगते ही अंधकार मिट जाता है। आपको दुःख और सुख स्वप्नवत् दिखेंगे और उनको जानने वाला परमेश्वर अपना महसूस होगा। प्रभु ऐसा नहीं कि कहाँ से आयेंगे, घूमकर दर्शन देंगे और चले जायेंगे। वह उपासना के अंतर्गत है, भावना के बल से है, वह प्रभु का अवतार आयेगा, जायेगा किंतु प्रभु तो वास्तव में सर्वत्र, सर्वव्यापक है और आपके आत्मा है। अंतर्यामी प्रभु इधर (हृदय में) होंगे तभी तो बाहर के मंदिर के प्रभु दिखेंगे अथवा आये हुए प्रभु दिखेंगे। आये हुए प्रभु तो चले जायेंगे किंतु जिससे दिखेंगे वे प्रभु कभी नहीं जाते।

तो भगवान में प्रीति बने रहे। प्रीति में स्मृति की शर्त नहीं है। स्मृति जब प्रीति बन जाती है, स्मृति जब अपनत्व दिखाती है फिर स्मृति की भी आवश्यकता नहीं रहती। भगवान कहते हैं-

मत्कर्मकृन्मत्परमो मदभक्तः संगवर्जितः।

निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव।।

'हे अर्जुन ! जो पुरुष केवल मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूर्तप्राणियों में वैरभाव से रहित है, वह अनन्य भक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है।'

(गीताः 11.55)

हे अर्जुन ! जो पुरुष केवल मेरे लिए ही सम्पूर्ण कर्तव्य-कर्मों को करने वाला है... माँ से मधुर व्यवहार, पत्नी का पालन अथवा पति की सेवा या बेटों का पालन, ये मुझे सुख देंगे – इस भावना से नहीं अपितु अब संसार में फँसे हैं तो भगवान के निमित कर्तव्य करते हैं – इस भावना से करें। तो भगवान के परायण होकर जो कर्म करता है, भगवान कहते हैं कि वह मेरा भक्त है। जिसके कर्म भगवान के निमित्त हों, जो आसक्तिरहित और सम्पूर्ण भूतप्राणियों में वैरभाव से रहित हो, वह मनुष्य, अनन्य भावयुक्त पुरुष मुझको (भगवान को) ही प्राप्त हो जाता है। एक तो मत्कर्मकृत्। भगवान के लिए कर्म। दूसरा मत्परमः। भगवान का ही भरोसा। भगवान के निमित्त कर्म और भगवान का भरोसा। बुढ़ापे में क्या होगा ? क्या खायेंगे ? अरे, माँ के गर्भ से आये तब उस परमात्मा ने हमारे लिए दूध बना दिया तो बुढ़ापे में भी कुछ-न-कुछ हो जायेगा। क्यों चिन्ता करके मरो !

मुर्दे को प्रभु देत है, कपड़ा लकड़ा आग।

जिंदा नर चिंता करे, ताके बड़े अभाग।।

मदभक्तः.... मेरे में भक्ति। भगवान का मैं अर्थात् जहाँ से मैं-मैं स्फुरता है। मैं, यह, वह सब भूल जाते हैं लेकिन वास्तविक 'मैं' ज्यों का त्यों रहता है। मदभक्तः.... मेरे में भक्ति, मेरे में प्रीति, मेरे में भरोसा तथा दूसरे से ममता नहीं और वैर नहीं। आदमी या तो ममता से फँसता है या तो वैर से फँसता है। भगवान के निमित्त कर्म करने से तो फँसान छूट जाती है।

तो रति भी भगवान में, प्रीति भी भगवान में। भगवान की महत्ता जान के उनको अपना जानें तो उनमें हमारी प्रीति स्वाभाविक है। बिना प्रीति के कोई व्यक्ति रह नहीं सकता। प्रीति जब मूल में (परमात्मा में) नहीं होती और विकारों के द्वारा भटकती है तो वह संसार बन जाती है और प्रीति निर्विकार नारायण के प्रति होकर व्यवहार करते हैं तो प्रीति भक्ति के रूप में चमकती है। भगवान सत्स्वरूप है उससे हमारा अस्तित्व है। भगवान चेतनस्वरूप हैं उससे जीव की बुद्धि में चेतना है और भगवान आनन्दस्वरूप हैं इसीलिए जीवों को किसी-न-किसी के प्रति प्रीति है। अगर जीव वह प्रीति नाम में, रूप में, आकृति में, वस्तु में ही आबद्ध कर लेता है तो संसार में फँसता है किंतु नाम में, रूप में, वस्तु में जिसके आधार से प्रीति होती है उस उदगम स्थान का सुमिरन करता है अथवा उसमें प्रीति करता है तो निर्लेप ब्रह्मज्ञानी संत बन जाता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 213

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रविवार, 21 अगस्त 2011

सन्देह और स्वीकार.. (पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)



एक बात आप समझ लेना कि संसार को जानना हो तो आपको संशय करना पड़ेगा – यह कैसे हुआ, वह कैसे हुआ ? और सत्य को जानना है तो आपको सदगुरुओं के वचन स्वीकार करने पड़ेंगे। संसार को जानना है तो संदेह चाहिए और सत्य को जानना है तो स्वीकार चाहिए।

अब तुम गये मंदिर में। भगवान बुद्ध की मूर्ति है तो भगवान समझकर तुमने प्रणाम किये। विष्णु की मूर्ति है तो.....


त्वमेव माता च पिता त्वमेव

त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव

त्वमेव सर्वं मम देवदेव।।


ऐसी प्रार्थना की। ऐसा नहीं सोचोगे कि 'ये तो कुछ बोलते नहीं, ये माता-पिता कैसे हो सकते हैं ? ये तो जयपुर से साढ़े आठ हजार रूपये के आये हुए हैं।' ऐसा नहीं, वहाँ तुम्हें संदेह नहीं करना होगा। 'ये भगवान हैं क्योंकि प्राण-प्रतिष्ठा की हुई है। ये भगवान हैं, इनसे मेरा मंगल होगा, इनसे मेरा कल्याण होगा।' – यह आपको मानना पड़ेगा। गये अम्बाजी। 'अम्बे मात की जय। लाखों आये, लाखों गये मेरी माँ, तेरे द्वारे ! तू दया करना। मेरे छोकरों को राजी रखना। मेरे छोकरे नहायें, धोयें, खायें, अभी तो बीमार पड़े हैं....' अब वहाँ संदेह नहीं करेगा कि माता जी को पुजारी नहलाता है। वहाँ मान लेना है कि माता जी की कृपा से छोकरे नहाते-धोते हो जायेंगे, छोकरे ऐसे हो जायेंगे। तो धर्म में तुम्हें संदेह नहीं बल्कि स्वीकार करना पड़ता है। स्वीकार करते-करते तुम एक ऐसी जगह पर आते हो कि तुम्हारी अपनी पकड़-जकड़ नहीं रहती और तुम स्वीकृति दे देते हो। जब स्वीकृति दे देते हो तो ऐसी तुम्हारे में जो समझ है वह श्रद्धा का रूप ले लेती है। श्रद्धा लेकर तुम जब सदगुरू के पास पहुँचते हो तो फिर श्रद्धा के बल से तुम ऊँची तात्त्विक बातें भी मानने लग जाते हो। तुम जो आज तक देह को मैं मान रहे थे, यह भी तो पुतला है, इस देह को मैं मान बैठे थे, मन में जो आता था वह मेरा मान बैठते थे। आँखों से दिखता था तो तुम बोलते थे, 'मैं देखता हूँ,' कानों से सुनाई पड़ता था तो तुम बोलते थे, 'मैं सुनता हूँ', नाक से सूँघते थे तो तुम बोलते थे, 'मैं सूँघता हूँ'.... वह जो तुम्हारा 'मैं' और 'मेरा' – मेरी नाक और मैं सूँघने वाला, मेरी आँख और मैं देखने वाला, मेरा कान और मैं सुनने वाला, मेरा पेट और मैं खाने वाला – यह जो तुम्हारी सदियों की मान्यता है, भ्रम है उसे सदगुरु हटा देंगे। अब श्रद्धा के बल से स्वीकार के रास्ते तुम चले हो तो गुरु समझायेंगे कि 'यह तुम नहीं करते हो, तुम्हारे शरीर में आँखें और मन का मेल होकर दिखता है। कान और मन का मेल होकर सुनाई पड़ता है। इन सबको जो देखता है.... जो मन को देखता है, जो बुद्धि के निर्णय को देखता है वह आत्मा तू है - 'तत्त्वमसि' , यह मान ले।'

जब तुम ये ऊँची बातें मानने लग जाते हो तो ऊँचे तत्त्व का साक्षात्कार हो जाता है, यह हुआ ज्ञानसहित विज्ञान।

मैं आत्मा हूँ। कैसे आत्मा हूँ ? ऐसा प्रश्न पूछ सकते हो पर तुम्हारे हृदय में यदि श्रद्धा है और स्वीकार करने की क्षमता है तो इस प्रश्न का उत्तर मिलेगा तो तुम्हारे हृदय में बैठेगा। नहीं तो प्रश्नों के उत्तर कितने भी मिलें, ऐसा कोई शब्द नहीं जिसका प्रत्यवाय (काट) न हो। ऐसा कोई प्रश्न का उत्तर नहीं है जिसका तर्क करके खंडन न हो। तो सत्य तर्क से सिद्ध नहीं होता, सारे तर्क जिससे सिद्ध होते हैं अथवा सारे तर्क पैदा होकर जिसमें लीन हो जाते हैं वह सत्यस्वरूप परमात्मा तर्कों का विषय नहीं और मान लेने का विषय नहीं अपितु सब विषय उसी से उत्पन्न होते हैं, उसी में लीन हो जाते हैं। इसमें जब श्रद्धा होती है, इसे स्वीकार करने की क्षमता होती है, ईश्वर में प्रीति होती है तो ईश्वर के समग्र स्वरूप को जान लेता है आदमी। नहीं तो क्या कि ईश्वर के एक-एक खंड को आदमी पकड़ लेता है। मेरा तो भगवान है – झूलेलाल। झूलेलाल ही भगवान है। तो 'झुलेलाल-झुलेलाल' करेंगे तो आनंद आयेगा और दूसरे किसी भगवान की जय कर दी तो मेरा आनंद गायब हो जायेगा। अथवा तो मेरा तो इष्ट है रामजी, अब रामजी की जय हुई तो ठीक और श्रीकृष्ण की जय हुई तो आनंद गायब ! जब राम तत्त्व को जाना, झुलेलाल-तत्त्व को जाना, कृष्ण-तत्त्व को जाना तो पता चलेगा कि सत्ता एक है, आकृतियाँ अनेक हैं। सत्ता एक है, रूप अनेक हैं। जैसे – तुम्हारे अंदर सत्ता एक है परंतु आँख देखती है उसके रूप अनेक हैं। अंदर सत्ता एक है किंतु कान सुनते हैं उनके शब्द अनेक हैं। गंध अनेक हैं पर सूँघने की सत्ता एक है। जैसे तुम्हारे शरीर में सत्ता एक है ऐसे सबके शरीरों में सत्ता एक है। मनुष्यों के शरीर में तो सत्ता एक हुई लेकिन उसी सत्ता से गाय की आँखें देखती हैं जिस सत्ता से तुम देखते हो, उस सत्ता से ही भैंस देखती है जिस सत्ता से तुम देखते हो। हाँ, भैंस की बुद्धि में और तुम्हारी बुद्धि में, गाय की बुद्धि में और भैंस की बुद्धि में फेर हो सकता है परंतु सत्ता में फेर नहीं होता। तो इस सत्ता का स्वरूप समझ में आ जाय....

इस प्रकार विशेष ज्ञान में विचित्रता होती है, सामान्य ज्ञान में विचित्रता नहीं होती है। सामान्य ज्ञान सर्वत्र सम है, एक जैसा है और वह सदा एकरस है। उस एकरस को जानकर साधक निर्द्वन्द्व हो जाता है, निःशंक हो जाता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2010, पृष्ठ संख्या 24,25 अंक 212

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शनिवार, 20 अगस्त 2011

स्वार्थ त्यागें, महान बनें....


मनुष्य को कभी भी स्वार्थ में आबद्ध नहीं होना चाहिए। व्यावहारिक वासनाओं को पोसने का स्वार्थ सुख का अभिलाषी है वह सच्ची सेवा नहीं कर सकता। जो संसारी वासनाओं का गुलाम है वह अपना ठीक से विकास नहीं कर सकता। जो अपने स्वार्थ का गुलाम है वह अपना कल्याण नहीं कर सकता। व्यक्तिगत स्वार्थ कुटुम्ब में कलह पैदा कर देगा, कुटुम्ब का स्वार्थ पड़ोस में कलह पैदा कर देगा, पड़ोस का स्वार्थ गाँव में कलह पैदा कर देगा, गाँव का स्वार्थ तहसील में कलह पैदा करेगा, तहसील का स्वार्थ जिले में कलह पैदा कर देगा, जिले का स्वार्थ राज्य में कलह पैदा कर देगा और राज्य प्रांतीयता का स्वार्थ राष्ट्र में कलह पैदा कर देगा, राष्ट्रीयता का स्वार्थ विश्व में कलह करेगा और वैश्विकता का स्वार्थ विश्वेश्वर के दूर पटक देगा। स्वार्थ में आकर मूर्खतावश जो कुप्रचार करते हैं, करवाते हैं मेरे दिल में उनके प्रति नफरत नहीं होती।

दूसरे लोग फोन पर फोन करते हैं 'बापू जी की सहनशक्ति कैसी है ! इतना कुप्रचार, इतना जुल्म पर जुल्म हो रहा है और बापू जी को देखो तो कोई दुःख नहीं ! जब देखो मुस्कराते रहते हैं। हमको तो बड़ा दुःख होता है।'

बेटा ! तुम जहाँ बैठकर देखते हो वहाँ तुम ठीक हो लेकिन वास्तविकता कुछ और है। जो अखण्ड भारत को तोड़ना चाहते हैं उनकी मुरादें हैं कि हम आपस में लड़ें-भिड़ें, झगड़े परन्तु हमारा ज्ञान कहता है किः

जो हम आपस में न झगड़ते।

बने हुए क्यों खेल बिगड़ते।।

लोग यह मानते हैं कि संघर्ष के बिना विकास नहीं होता, संघर्ष के बिना अपनी चाही हुई चीज नहीं मिलती। भाई साहब ! विदेशी लोग तो ऐसी बड़ी भारी गलती में पड़े हैं कि लड़ाओ और राज करो ()। हिन्दू हिन्दुओं को लड़ाओ, हिन्दूवादी सरकार को बदनाम करो, हिन्दू संस्थाओं को बदनाम करो। हिन्दुओँ को आपस में लड़ाकर उन पर राज करने की मुराद वालों ने, धर्मांतरण कराने वालों ने हिन्दू साधुओं और पुलिस के बीच में, हिन्दू संस्थाओं और मीडिया के बीच में एक खाई खड़ी कर दी। ये लोग सफल भी हो पाते हैं जब हम स्वार्थ के वशीभूत होकर आपस में लड़ने लग जाते हैं। हमें आपस में लड़ना नहीं चाहिए। लड़ाई-झगड़े से जो भी मिलेगा वह सुखद नहीं होगा और सात्त्विक ज्ञान, आत्मज्ञान, गीताज्ञान से जो मिलेगा वह कभी दुःखद नहीं होगा। संघर्ष से आपको कुछ मिल गया तो आप भोगी बन जाओगे, और अधिक संघर्ष करोगे, अपने से कमजोर लोगों का शोषण करने लग जाओगे।

संघर्ष से अपनी इच्छापूर्ति करो – यह स्वार्थियों की, संकीर्ण मानसिकतावालों की मान्यता बहुत छोटी जगह पर बैठकर होती है। वास्तव में संघर्ष करके अपनी इच्छापूर्ति करने के बाद भी दुःख नहीं मिटता, चिंता नहीं मिटती, विकार नहीं मिटते, अशांति नहीं मिटती। उस अशांति, विकार तथा बदले की भावना से मरने के बाद भी न जाने किस-किस रूप में एक-दूसरे से प्रतिशोध लेने के लिए न जाने किन किन योनियों में भटकते हैं, मारकाट करते रहते हैं, तपते-तपाते रहते हैं कुत्तों की नाईं।

स्वार्थी, नासमझ आपस में कुत्तों की नाईं लड़ मरते हैं परंतु समझदार मनुष्य तो बहुत ऊँचे ज्ञान के धनी होते हैं, दूरदृष्टिवाले होते हैं। लोग कहते हैं- 'बापू के करोड़ो शिष्य हैं। बापू जी आज्ञा करें तो देश को हिला देंगे, यह कर देंगे – वह कर देंगे।' मैंने कहाः 'नहीं बाबा ! देश को हिलाओगे तो भी अपने की ही घाटा है।'

षड्यंत्रकारियों के बहकावे में आकर समझदारी की कमीवाले कुछ की कुछ साजिशें करते हैं। जो षड्यंत्र करके दूसरें का बुरा सोचता है, बुरा चाहता है, बुरा करता है उसका तो अपनी ही बुरा हो जाता है। आप किसी का बुरा चाहोगे तो पहले अपने दिल में बुराई लायेंगे, इससे कुछ-न-कुछ आपकी बुद्धि मारी जायेगी। बुद्धि मारी जाती है तब लाखों करोड़ों की नजरों में आदरणीय व्यक्ति के लिए भी हलकी भाषा बोलते है। फिर उनको लोगों की बददुआएँ मिलती हैं। शास्त्र में आता है कि

अपूज्या यत्र पूज्यन्ते पूजनीयो न पूज्यते।

त्रीणि तत्र भविष्यन्ति दारिद्रयं मरणं भयम्।।

(शिव पुराण, रूद्र. सती. 35.9)

जहाँ पूजनीय माता-पिता, सदगुरुओं का आदर नहीं होता और अपूजनीय लोगों का आदर-सत्कार होता है, वहाँ भय, दरिद्रता और मृत्यु का तांडव होने लगता है। गलत निर्णय होने लगते हैं। अशांति के कारण अकाल मृत्यु हो जाती है, हार्टअटैक आ जाता है, एक्सीडेंट होने लगते हैं। इसका प्रत्यक्ष दृष्टान्त है – अफगानिस्तान में महात्मा बुद्ध की मूर्तियाँ तोड़ी गयीं, महापुरुषों के प्रति नफरत जगायी गयी तो वहाँ कितना कितना कहर हो रहा है !

स्वार्थ आदमी को गुमराह कर देता है। वे लोग सचमुच मूर्ख हैं जो अपनी ही संस्कृति की जड़ों को काटने में लगे रहते हैं। ये फिर भटक जाते हैं, स्वार्थ में अंधे होकर किसी भी तरीके से पैसा इकट्ठा करने लग जाते हैं। ऐसे लोग मरने के बाद नीच योनियों में जाते हैं।

लोगों में सुख शांति का प्रसाद बाँटने वाले संतों-महापुरुषों के प्रति जिनको वैरभाव है, समझ लो उनकी तो तौबा है ! वे न जाने कुत्ता बनकर कितने जन्मों तक दुष्कर्मों का फल भोगेंगे, मेंढक बनेंगे। रामायण में आता हैः

हर गुर निंदक दादुर होई।

जन्म सहस्र पाव तन सोई।।

एक बार नही, हजार जन्मों तक उनको मेंढक बनना पड़ता है, फिर ऊँट बनते हैं, बैल बनते हैं। लोग बोलते हैं- 'इनको दंड मिलना चाहिए।'अरे ! आप हम क्या दंड देंगे ! वे स्वयं दंड ले रहे हैं। अशांति का दंड ले रहे हैं और कई जन्मों में दंड भोगने वाला मन बना रहे हैं। अब उनको हम आप क्या दंड देंगे।

बहुत गयी थोड़ी रही व्याकुल मन मत हो।

धीरज सबका मित्र है करी कमाई मत खो।।

अगर कोई शुभकामना करनी है तो दो-दो माला भगवन्नाम का जप कर लो। स्वार्थ में अँधे बनकर आपस में लड़ाकर मारने वाले इन षड्यंत्रकारियों से बचकर अपनी संस्कृति की रक्षा के लिए, सीमा पर तैनात प्रहरी की तरह सदैव सावधान रहो। अपनी दृष्टि को व्यापक बनाने का अभ्यास करो। महापुरुषों का सत्संग सुनो।

भगवदसुमरिन का, परिस्थितियों में सम रहने की सजगता का, परमात्म-विश्रान्ति का, आकाश में एकटक निहारने का, श्वासोच्छवास में सोऽहं जप द्वारा समाधि-सुख में जाने का आदरसहित अभ्यास करना। कभी-कभी एकांत में समय गुजारना, विचार करना कि इतना मिल गया आखिर क्या ? अपने को स्वार्थ से बचाना। स्वार्थरहित कार्य ईश्वर को कर्जदार बना देता है और स्वार्थसहित कार्य इन्सान को गद्दार बना देता है। निष्काम कर्म, संस्कृति की सेवा, भगवान का सुमिरन और एकांत में आत्मविचार करके आत्मा के आनंद में आने वाला महान हो जाता है।

ऋषि प्रसाद, जून 2010, पृष्ठ संख्या 12,13 अंक 210

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