मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

हर घर अमृत पहुँचाओ, हर दिल दीप जगाओ !...


एक बार विद्वानों की सभा में चर्चा हो रही थी कि जीवन का अमृत कहाँ है ?

एक विद्वान ने कहाः "पूछने की क्या जरूरत है, अमृत तो स्वर्ग में है।"

दूसरे ने कहाः "स्वर्ग में अमृत है तो वहाँ से पतन नहीं होना चाहिए। हम स्वर्ग में वास्तविक अमृत नहीं समझते हैं।"

तीसरे ने कहाः "अमृत चंद्रमा में है।"

चौथे ने कहाः "अगर चन्द्रमा में अमृत है तो उसका क्षय क्यों होता है ?"

किसी ने कहाः "सागर में अमृत है।"

"अगर सागर में अमृत होता तो वह खारा क्यों होता !"

बहुत देर चर्चा चली पर कोई निर्णय नहीं हो पाया। इतने में महाकवि कालिदास जी वहाँ आये। सबने कालिदासजी को प्रणाम किया और कहाः "इस समस्या का हल अब आप ही बताइये।"

उन्होंने कहाः "कंठे सुधा वसति वै भगवज्जनानाम्।

भगवान के प्यारे संतों के कंठ में, उनकी आत्मिक वाणी से ही वास्तविक अमृत होता है। स्वर्ग का अमृत तो क्षोभ से, मंथन से निकला था, वह वास्तविक अमृत नहीं है। संत के हृदय से जो परमात्म-अनुभव, आत्मानंद और ईश्वरीय शांति से ओतप्रोत अमृतवाणी का झरना फूट निकलता है, वही सच्चा अमृत है।"

हमारे जितने भी शास्त्र बने हैं, वे इसी अमृत से बने हैं इसलिए उनमें हर प्रकार के जागतिक लाभ के साथ-साथ आत्मलाभ कराने की भी शक्ति है। उन्हें शास्त्र नहीं, 'सत्शास्त्र' कहा जाता है और उनकी पूजा होती है। जीवन-निर्माण के महत्कार्य में सत्साहित्य नींव का मजबूत पत्थर है, जो भले दिखता न हो पर उसी के आधार पर सफल जीवनरूपी इमारत खड़ी हो सकती है। जैसा साहित्य हम पढ़ते हैं, वैसे ही विचार मन में चलते रहते हैं और उन्हीं विचारों से हमारा सारा व्यवहार प्रभावित होता है। अतः हमें ऐसे साहित्य का अध्ययन करना चाहिए जिससे हमारी शारीरिक, मानसिक, नैतिक, आध्यात्मिक – सर्वांगीण उन्नति हो।

सत्साहित्य की महत्ता को उजागर करती हुई नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के जीवन की एक घटना है। क्लंग की घाटी पर युद्ध में 100 अंग्रेजों का सामना आजाद हिन्द फौज के केवल 3 सैनिक कर रहे थे। सुभाष जी के पास समाचार भेजकर पूछा गया कि क्या सैनिक पीछे हटा लिये जायें ? वे असमंजस में पड़ गये परंतु घबराये नही। उनके जीवन में सत्शास्त्रों का बहुत प्रभाव था। जब भी कठिन परिस्थितियाँ आती थीं तो वे उनकी शरण जाते थे। उस दिन उन्होंने एक सत्साहित्य पढ़ा, जिसमें एक स्थान पर लिखा था - 'सिर पर संकटों के बादल मँडरा रहे हों, तब भी धैर्य नहीं खोना चाहिए।' यह पढ़कर उन्होंने उन तीनों सैनिकों को संदेश भेजाः "भारत माता के वीर सपूतो ! जब तक शत्रु का सफाया नहीं होता डटे रहो। परमात्मा हमारे साथ है।"

इन शब्दों ने सैनिकों के शरीर में जैसे जान ही फूँक दी। वे ऐसे जी-जीन से लड़े कि अंग्रेज सैनिकों के छक्के छूटने लगे। उनके हौंसले पस्त हो गये और वे चौकी छोड़ के भाग गये। यह परिणाम सत्साहित्य के कारण ही आया। इसलिए सत्साहित्य की तो जितनी महिमा गायी जाय उतनी कम है।

पूज्य बापू जी के गुरुदेव पूज्यपाद भगवत्प्राद श्री लीलाशाह जी महाराज का यह विश्वास था कि सत्साहित्य, धर्म एवं नीति के शास्त्र ही मानव-जीवन का निर्माण करने एवं जीवन को उन्नति के पथ पर ले जाने वाले हैं। साहित्य मनुष्य-जीवन, समाज एवं देश में नयी जागृति लाता है। लोगों को सच्ची राह बता के उन्नति के पथ पर चलने के लिए प्रेरित करता है। वे कहते थे कि "सच्चा साहित्य वही है जिसमें 'सत्यं शिवम् सुन्दरम्' के गीत गूँजते हों।"

सत्यम् अर्थात् जो निज स्वरूप का मार्ग बताये, शिवम् अर्थात् जो कल्याणकारी हो, सुंदरम् अर्थात् जो सुंदर जीवन जीने की कला बतायें।

पूज्य संत श्री आशारामजी बापू के कथनानुसार ऐसा साहित्य ही वास्तव में मानव-जीवन का अमूल्य खजाना है। इससे हमें बहुत अच्छा ज्ञान मिलता है, भगवान में प्रेम जागता है, आत्मकल्याण होता है। शरीर को निरोग बनाने, मन को प्रसन्न रखने और बुद्धि को दिव्य बनाने की अदभुत व्यवस्था हमारे सत्शास्त्रों में है। सत्साहित्य में महापुरुषों, गुरुभक्तों और भगवान के लाड़ले संतों की कथाओं व अनुभवों का वर्णन आता है, जिसका बार-बार पठन-मनन करके आप सचमुच महान बन जाओगे। जीवन में सत्साहित्य का महत्त्व बताते हुए युद्ध के मैदान में भगवान स्वयं कहते हैं-

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।

भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि।।

'(मेरे ज्ञान का जो कोई संसार में प्रचार करेगा) उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है तथा पृथ्वी भर में उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं।' (गीताः 18.61)

स्वामी विवेकानंद कहते थेः 'जिस घर में सत्साहित्य नहीं, वह घर नहीं वरन् श्मशान है।'

पूज्य बापू जी कहते हैं- "मेरे गुरुदेव अस्सी वर्ष की आयु में भी किताबों की गठरी बाँधकर नैनीताल की पहाड़ियों में जाते, सत्संग सुनाते, प्रसाद बाँटते और लोगों को सत्साहित्य पढ़ने को देते। उन्हीं महापुरुष के निष्काम कर्मयोग का फल आज हम लाखों लोगों को मिल रहा है। साधक दिन-रात एक करके सत्साहित्य को लोगों तक पहुँचाने की जो सेवा करते हैं, उससे उनके हृदय में निष्कामता का आनंद उभरने लगता है।"

पूज्य बापू जी के ओजपूर्ण पावन अमृतवचनों के संकलन से बनी पुस्तकें समाज के हर वर्ग के लोगों के सर्वांगीण विकास की कुंजियाँ संजोये हुए हैं। अत्यंत कम कीमत में मिलने वाला यह सत्साहित्य वैचारिक प्रदूषण मिटाने में अत्यधिक कारगर सिद्ध हुआ है। इसके प्रचार-प्रसार से कितने ही घर बरबाद होने से बच गये, कितने ही लोगों की आलसी-प्रमादी और पलायनवादी लोग कर्मनिष्ठ बन गये, व्यसनी-दुराचारी लोग सदाचारी व समाजसेवी हो गये, नास्तिक आस्तिक हो गये, पतन की राह जाने वाले नैतिक, आध्यात्मिक उन्नति की ओर चल पड़े.... इससे समाज, राष्ट्र एवं समग्र विश्व को कितना लाभ हो रहा है, वह लाबयान है ! वे धनभागी हैं, जो सांसारिक कार्यों से समय निकाल के भगवत्प्रसन्नता पाने हेतु पूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी को घर-घर पुण्यात्मा राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रसेवा का अमित पुण्य लाभ भी घर बैठे ही ले रहे हैं। पूज्य श्री का संदेश अब हमें हर घर में पहुँचाना है, हर दिल को जगाना है !

गुरुपूर्णिमा महापर्व पर हम सब संकल्प लें कि मानव-समाज को उन्नति के मार्ग पर ले जाने वाले आश्रम के सत्साहित्य को त्यौहार, जन्मोत्सव, शादी-विवाह आदि शुभ प्रसंगों पर अपने सगे-संबंधियों, मित्रों या अन्य लोगों में वितरित करेंगे। 'घर-घर सत्साहित्य पहुँचाओ' अभियान चलायेंगे और पूज्य श्री की अमृतवाणी से ओतप्रोत सत्साहित्य को घर-घर तक पहुँचाने के भगीरथ सेवाकार्य में अधिक-से-अधिक सहभागी बनेंगे।

(यह सत्साहित्य सभी आश्रमों व समितियों के सेवा-केन्द्रों पर उपलब्ध है।)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2011, पृष्ठ संख्या 8,9 अंक 223

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गुरुवार, 4 अगस्त 2011

वे पाप जो प्रायश्चितरहित हैं


धर्मराज (मृत्यु के अधिष्ठाता देव) राजा भगीरथ से कहते हैं- "भूपाल ! जो स्नान अथवा पूजन के लिए जाते हुए लोगों के कार्य में विघ्न डालता है, उसे ब्रह्मघाती कहते हैं। जो परायी निंदा और अपनी प्रशंसा में लगा रहता है तथा जो असत्य भाषण में रत रहता है, वह ब्रह्महत्यारा कहा गया है।

जो अधर्म का अनुमोदन करता है उसे ब्रह्मघात का पाप लगता है। जो दूसरों को उद्वेग में डालता है, चुगली करता है और दिखावे में तत्पर रहता है, उसे ब्रह्महत्यारा कहते हैं।

भूपते ! जो पाप प्रायश्चितरहित हैं, उनका वर्णन सुनो। वे पाप समस्त पापों से बड़े तथा भारी नरक देने वाले हैं। ब्रह्महत्या आदि पापों के निवारण का उपाय तो किसी प्रकार हो सकता है परंतु जो ब्राह्मण अर्थात् जिसने ब्रह्म को जान लिया है ऐसे महापुरुष से द्वेष करता है, उसका पाप से कभी भी निस्तार नहीं होता।

नरेश्वर ! जो विश्वासघाती तथा कृतघ्न हैं उनका उद्धार कभी नहीं होता। जिनका चित्त वेदों की निंदा में ही रत है और जो भगत्कथावार्ता आदि की निंदा करते हैं, उनका इहलोक तथा परलोक में कहीं भी उद्धार नहीं होता।

भूपते ! जो महापुरुषों की निंदा को आदरपूर्वक सुनते हैं, ऐसे लोगों के कानों में तपाये हुए लोहे की बहुत सी कीलें ठोक दी जाती है। तत्पश्चात कानों के उन छिद्रों में अत्यंत गरम किया हुआ तेल भर दिया जाता है। फिर ये कुंभीपाक नरक में पड़ते हैं।

जो दूसरों के दोष बताते या चुगली करते हैं, उन्हें एक सहस्र युग तक तपाये हुए लोहे का पिण्ड भक्षण करना पड़ता है। अत्यंत भयानक सँडसो से उनकी जीभ को पीड़ा दी जाती है और वे अत्यंत घोर निरुच्छवास नामक नरक में आधे कल्प तक निवास करते हैं।

श्रद्धा का त्याग, धर्म कार्य का लोप, इन्द्रियसंयमी पुरुषों की और शास्त्र की निंदा करना महापातक बताया गया है।

जो परायी निंदा में तत्पर, कटुभाषी और दान में विघ्न डालने वाले होते हैं वे महापातकी बताये गये हैं। ऐसे महापातकी लोग प्रत्येक नरक में एक-एक युग रहते हैं और अंत में इस पृथ्वी पर आकर वे सात जन्मों तक गधा होते हैं। तदनंतर वे पापी दस जन्मों तक घाव से भरे शरीर वाले कुत्ते होते हैं, फिर सौ वर्षों तक उन्हें विष्ठा का कीड़ा होना पड़ता है। तदनंतर बारह जन्मों तक वे सर्प होते हैं। राजन ! इसके बाद एक हजार जन्मों तक वे मृग आदि पशु होते हैं। फिर सौ वर्षों तक स्थावर (वृक्ष) आदि योनियों में जन्म लेते हैं। तत्पश्चात् उन्हें गोधा (गोह) का शरीर प्राप्त होता है। फिर सात जन्मों तक वे पापाचारी चाण्डाल होते हैं। इसके बाद सोलह जन्मों तक उनकी दुर्गति होती है। फिर दो जन्मों तक वे दरिद्र, रोगपीड़ित तथा सदा प्रतिग्रह लेने वाले होते हैं। इससे उन्हें फिर नरकगामी होना पड़ता है।

राजन् ! जो झूठी गवाही देता है, उसके पाप का फल सुनो। वह जब तक चौदह इंद्रों का राज्य समाप्त होता है, तब तक सम्पूर्ण यातनाओं को भोगता रहता है। इस लोक में उसके पुत्र-पौत्र भी नष्ट हो जाते हैं और परलोक में वह रौरव तथा अन्य नरकों को क्रमश भोगता है।" (नारद पुराणः पूर्व भाग-प्रथम पादः अध्याय 15)

स्रोत - ऋषि प्रसाद - जनवरी २००९

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बुधवार, 3 अगस्त 2011

विवेकशक्ति बढ़ाने के साधन...

(पूज्य बापू जी के सत्संग से)

दस वर्ष की उम्र से लेकर चालीस वर्ष की उम्र तक विवेकशक्ति बढ़ती रहती है। अगर इस उम्र में कोई विवेकशक्ति नहीं बढ़ाता है तो फिर चालीस वर्ष के बाद उसकी विवेकशक्ति क्षीण होती जाती है। जो दस से चालीस वर्ष की उम्र में विवेकशक्ति बढ़ाने की कोशिश करता है उसकी तो यह शक्ति बाद में भी बढ़ती रहती है। 40 वर्ष के बाद भी विवेकशक्ति बढ़ती रहे उसकी एक साधना है। इस साधना को सात विभागों में बाँट सकते हैं। एक तो सत्संग सुनता रहे।

बिन सतसंग बिबेक न होई।

खाने पीने का, इधर-उधर का, अतिथि मेहमान का विवेक नहीं, आत्मा क्या है, जगत क्या है और परमात्मा क्या है ? – इस बात का विवेक।

अविनासी आतम अचल, जग तातैं प्रतिकूल।

आत्मा अविनाशी है, हम अविनाशी हैं और जगत विनाशी है। हम शाश्वत हैं, शरीर और जगत नश्वर है – इस प्रकार का प्रखर विवेक। यह सारी साधनाओं का मूल है।

उसने सब अध्ययन कर लिया, उसने सब पढ़ाई कर ली और सारे अनुष्ठान कर लिये जिसने सांसारिक इच्छाओं का त्याग करके इच्छारहित आत्मा-परमात्मा में आने का ठान लिया – ऐसा तीव्र विवेक ! ईश्वरप्राप्ति के उस तीव्र विवेक को जगाने के लिये ये सात साधन हैं।

दूसरा है सत्शास्त्रों का अध्ययन। तीसरा साधन है प्रातः और संध्या के समय त्रिबन्ध प्राणायाम करके जप। भगवद् ध्यान, भगवत्प्राप्ति का जो साधन या मार्गदर्शन गुरु ने दिया है उसका अभ्यास, इससे विवेक जगेगा। चौथा साधन है कम बोलना, कम खाना और कम सोना, आलस्य छोड़ना। नींद के लिए तो 4-5 घंटे काफी हैं, आलसी की नाईं न पड़े रहें। अति नींद नहीं, आलस्य नहीं, अति आहार नहीं, अति शब्द विलास नहीं। पाँचवाँ है शुद्ध, सात्त्विक भोजन और छठा सारगर्भित साधन हैब्रह्मचर्य पालना, 'दिव्य प्रेरणा प्रकाश' पुस्तक पढ़ना। इसने तो न जाने कितनी उजड़ी बगियाँ गुले-गुलेजार कर दी हैं। कई युवक-युवतियों की जिंदगी मृत्यु के कगार से उठाकर बाहर कर दी। आप लोग भी 'दिव्य प्रेरणा-प्रकाश' पुस्तक पढ़ना और दूसरों तक पहुँचाने की सेवा खोज लेना। सातवाँ साधन है सादगी।

ये सात साधन संसार की चोटों से, मुसीबतों से तो क्या बचायेंगे और आपके जीवन में भगवत्प्राप्ति का दिव्य विवेक भी जगमगा देंगे।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2011, पृष्ठ संख्या 5, अंक 223

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मंगलवार, 2 अगस्त 2011

भगवद-उपासना के आठ स्थान...

पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से

भगवान श्रीकृष्ण ने भागवत में कहा कि मेरी उपासना के आठ स्थान हैं। उनमें से किसी में भी लग गये तो भगवदरस, भगवत्प्रीति, भगवत तृप्ति, भगवन्माधुर्य में प्रवेश मिल जाता है।

अर्चायां स्थण्डिलेऽग्नौ वा सूर्ये वाप्सु हृदि द्विजे।
द्रव्येण भक्तियुक्तोऽर्चेत् स्वगुरुं माममायया।।

'भक्तिपूर्वक निष्कपट भाव से अपने पिता एवं गुरूरूप मुझ परमात्मा की पूजा की सामग्रियों के द्वारा मूर्ति में, वेदी में, अग्नि में, सूर्य में, जल में, हृदय में अथवा ब्राह्मण में – चाहे किसी में भी आराधना करे।' (श्रीमद् भागवतः11.27.9)

मूर्तिः मुझ चैतन्य को पाने-जानने के लिए पूजा की सामग्रियों द्वारा देवी-देवता, भगवान, ब्रह्मज्ञानी गुरु आदि की जो मूर्ति है उसमें मेरी पूजा की जा सकती है। मेरी मूर्ति की सेवा पूजा करना और उसको एकटक देखते हुए एकाग्र होना, यह भी मेरी उपासना है।

वेदीः वेदी में आहूति देकर (यज्ञ के द्वारा) वातावरण में शुभ संकल्प फैलाना, ॐ इन्द्राय स्वाहा, इदं इन्द्राय इदं न मम। 'यह इन्द्र के लिए है, मेरा नहीं।' ॐ वरूणाय स्वाहा, इदं वरूणाय इदं न मम। "यह वरूण के लिए है, मेरा नहीं।" 'यह कुबेर के लिए है, मेरा नहीं...' इस प्रकार ममता हटायें। तो ममता हटाने की रीति जो यज्ञों में बतायी गयी, वह भी मेरी उपासना है।

'मेरा नहीं है'.... तो एक तो 'मैं' और दूसरा 'मेरा' ये दोनों माया है। 'वस्तु मेरी नहीं है, फिर शरीर को जो 'मैं' मानता हूँ वह 'मैं' मैं नहीं हूँ। शरीर के बाद भी जो ठहरता है, वह चैतन्य मेरा परमात्मा है।' – इस ढंग की समझ से विधि के द्वारा मेरी पूजा होती है।

अग्निः भगवान बोलते हैं कि अग्नि देवता के ध्यान के द्वारा घृतमिक्षित हवन-सामग्रियों से आहुति देकर की हुई पूजा भी मेरी पूजा है।

सूर्यः अर्घ्यदान, उपस्थान (उपासना, पूजा के निमित्त निकट जाना, सामने आना) तथा आँखें बंद करके सूर्यनारायण का ध्यान करना, इससे बुद्धि भी विकसित होती है और भगवत्साधना भी मानी जाती है।

जलः भगवान कहते हैं कि जलतत्त्व भी मेरा ही स्वरूप है। जल में तर्पण आदि से मेरी उपासना करनी चाहिए। जब मुझे कोई भक्त हार्दिक श्रद्धा से जल चढ़ाता है, तब मैं उसे बड़े प्रेम से स्वीकार करता हूँ। वह भक्त जल में एकदृष्टि (परमात्मदृष्टि) करता है अथवा 'गंगे च यमुने चैव...' कह के पुण्यनदियों का आवाहन करके उस जल से स्नान करता है, 'केशवाय नमः, नारायणाय नमः...' कहकर आचमन लेता है, पंचामृत आदि बनाता है तो जल में यह जो भगवदभाव है, आदरभाव है उससे शांति, पुण्याई होती है। यह भी मेरी पूजा का एक तरीका है।

हृदयः हृदय में मेरी पूजा करें। श्वासोच्छ्वास के साथ मेरा नाम जप करें।
बोलेः भगवान हृदय में हैं तो हृदय बड़ा और भगवान छोटे !

अरे ! भगवान हृदय में उतने लगते हैं लेकिन भगवान की सत्ता अनंत ब्रह्माण्डों में व्याप्त है। बीज छोटा लगता है पर उसमें संस्कार कैसे हैं कि बड़ा वटवृक्ष भी छुपा है उसमें ! एक बीज में कितने वृक्ष छिपे हैं, सारे विज्ञानी मिलकर उसका गणित नहीं लगा सकते, ब्रह्माजी भी नहीं लगा सकते। ऐसे ही एक मनुष्य से कितने मनुष्यों की परम्परा चलेगी, ब्रह्माजी नहीं बता सकते। हरि अनंत हैं तो हरि की हर चीज भी तो अनंत की खबर दे रही है। एक बीज का अंत हो जायेगा क्या ? एक गुठली बोयी आम की, उससे आम का वृक्ष बना और कल्पना करो कि हजार फल लगे उसमें। अब हजार फल खा लो और गुठलियाँ बो दो। फिर हजार पेड़ हुए। उन हजार पेड़ों की गुठलियाँ बो दो, अब उनकी संख्या कितने तक पहुँच सकती है ? एक आम का या एक वटवृक्ष का बीज कितने बीज दे सकता है, इसका कोई अंत है क्या? तो जैसे यह बीज है वैसे ही अनंत की हर चीज अनंत की खबर है। तो आप अपने को जन्मने-मरने वाला मत मानिये। जन्मने-मरने वाले शरीर को जो सत्ता दे रहा है, आप उस चैतन्य को 'मैं' रूप जानिये। इसलिए यह उपासना बताते हैं भगवान।

तो भगवान कहते हैं कि हृदय में मेरा ध्यान करे – चतुर्भुजी रूप का, द्विभुजी रूप का अथवा श्वास अंदर जाय तो उसको देखे, बाहर आये तो गिनती करे, इस प्रकार अंतरंग ध्यान करे। सुख आया, दुःख आया, काम आया, क्रोध आया.... इनको देखे, इनके साथ जुड़े नहीं तो यह भी एक प्रकार की मेरी अंतरंग उपासना है। एक-से-एक प्रभावशाली उपासनाएँ हैं भगवान की।

ब्राह्मणः ब्राह्मणों में मेरी भावना करे, उनमें मेरे स्वरूप को देखे। जो सदाचारी, संयमी ब्राह्मण हैं, वे भगवत्स्वरूप हैं। जो ब्रह्म को जानने का यत्न करते हैं और जिनका खानपान, व्यवहार सात्त्विक है, ऐसे ब्राह्मण देवता में भी मेरा भाव करे और उनके सदगुण ले।

सदगुरुः आठवाँ पूजा-स्थान बताते हुए भगवान बोलते हैं कि इन सब पूजाओं की पराकाष्ठा यह है कि जिन्होंने मुझ सच्चिदानन्द को पाया है, जिनको मेरा साक्षात्कार हुआ है, अवतार लेकर जिनको मैं पूजता हूँ, ऐसे आत्मवेत्ता सदगुरु तो मेरा स्वरूप ही हैं। सदगुरू मेरे भी आदरणीय-पूजनीय होते हैं। मैं अवतार लेकर उनका चेला बनता हूँ। ऐसे सदगुरु की आज्ञा में जिसने तन को, मन को, जीवन को लगा दिया, वह तो मेरे साथ एकाकारता कर लेता है।

पूर्ण गुरु किरपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान....

सदगुरू के वचन में शबरी लग गयी, पूरणपोड़ा लग गया और वे भगवान के साथ एकाकार हो गये। तारक सदगुरु मिल गये तो आप सारी उपासनाओं की ऊँचाई पर आ जाओगे। संत कबीर जी भी कहते हैं-

सदगुरु मेरा सूरमा, करे शब्द की चोट।
मारे गोला प्रेम का, हरे भरम की कोट।।


'मैं मराठा हूँ... मैं माई हूँ.... मैं भाई हूँ... मैं दुःखी हूँ..... मैं सुखी हूँ....' – यह भ्रम हो गया है। सुख-दुःख होते हैं मन को, मैं उनको जानने वाला हूँ। ऐसा दृश्य दिखे, ऐसा दिखे, ऐसा दिखे....' वह तो मन को दिखेगा, तेरे को क्या मिलेगा ? तो कभी-कभी मान्याताएँ और सामाजिक वातावरण ऐसा हमको उलझा देता है कि लगता है भगवान को पाना बड़ा कठिन है।

लोग सोचते हैं कि 'बापू जी ने बड़ी तपस्या की। महात्मा बुद्ध ने बड़ी तपस्या की।' नहीं पता था इसलिए बड़ी गधा-मजदूरी की, इधर-उधर भटके थे, पता चला तो यूँ है। मेरे बड़े बापू (भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज) को जो मेहनत करनी पड़ी, उसका सौवाँ हिस्सा मुझे मेहनत नहीं करनी पड़ी। लेकिन फिर भी जो मुझे अनजाने में पापड़ बेलने पड़े, उसका हजारवाँ हिस्सा भी तुम्हें मेहनत नहीं करनी पड़ती और मौज मार रहे हो ! (सामने बैठे सत्संगियों से) तुम्हारे लिए क्या कठिन है ?सारी तपस्याओं से जो न मिले वह ऐसे ही मिल रहा है हँसते-खेलते, सुनते।

हँसिबो खेलिबो धरिबो ध्यान, अहर्निश कथिबो ब्रह्मज्ञान।
खावे पीवे न करे मन भंगा, कहे नाथ मैं तिसके संगा।।

क्या कठिन है ? नहीं तो रावण सोने की लंका बनाने में सफल हो गया, हिरण्यकशिपु सोने का हिरण्यपुर बनाने में सफल हो गया, ऐसा उनका तप था लेकिन शरीर, मन और बुद्धि तक ही तो पहुँचे ! यह तपोमय बुद्धि, एकाग्रता तो उन्हें मिली किंतु स्वतः सिद्ध जो सुख है वह नहीं मिला। साठ हजार वर्ष तप करके जो पाया उसका आखिर नाश हो गया। अगर इन दोनों सज्जनों को साक्षात्कारी गुरु मिले होते और उनके नजरिये से चले होते तो साल दो साल में ऐसी चीज पाते की जिसका कभी नाश नहीं हो सकता। सदगुरु मिले तो चालीस दिनों में मैंने जो पाया है, उसका कभी नाश नहीं हो सकता। तो भगवान सदगुरू की महिमा बताते हुए कहते हैं कि ऐसे सदगुरु की आराधना, पूजा मेरी एकदम सीधी और सहजता में मेरी प्राप्ति कराने वाली पूजा है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2011, पृष्ठ संख्या 17,18,19 अंक 222

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भगवान के भी काम आ जाओ

(पूज्य बापू जी)

जिन्होंने भगवान के सत्स्वभाव को पाया है, चैतन्य स्वभाव को पाया है, आत्मानंद स्वभाव को पाया है, ऐसे सदगुरुओं के नजरिये से ही हमारी मान्यताओं के जाले कटते हैं। नहीं तो शास्त्र और सामाजिक व्यवस्था, हमारे रीति-रिवाज की व्यवस्था हमको ऐसे बंधनों में बाँध देती है कि उधर से निकले तो उधर फँसे, एक से निकले तो दूसरे में फँसे। जैसे मकड़ी जाल बना देती है और जीवों को फँसा देती है, ऐसे ही पत्नी का अपना जाल है, पुत्र का अपना जाल है।

बेटा कहेगाः "पिताजी ! आपका कर्तव्य है हमें पालना, अभी मैं छोटा हूँ, पढ़-लिख लूँ फिर आप भजन करने को जाइये।"

बाप का अपना जाल है कि 'पिता को छोड़कर कहाँ जा रहा बेटा ? पिता की सेवा करना तुम्हारा कर्तव्य है।' सब अपना-अपना उल्लू बनाकर, नोचकर छोड़ देंगे। नेता बोलेगाः 'तुम मेरे काम में आ आओ।' सब अपने-अपने काम में आपको लाकर, निचोड़कर छोड़ देंगे। जब सदगुरु मिलेंगे तो बतायेंगे कि 'दूसरों के काम तो आ गये लेकिन दूसरों के काम वास्तव में वही आता है जो अपना काम निपटाने में सजग रहता है।' नहीं तो जो अपना काम निपटाने में सजग नहीं है, वह दूसरों के काम आने वाला बनकर भी उनके प्रति वफादार नहीं रहेगा। महात्मा बुद्ध ने अपना काम निपटा लिया तो दूसरों के काम अच्छी तरह से आये। संत कबीर जी ने अपना काम निपटाया या हमने अपना काम निपटाया तो अच्छी तरह से दूसरों के काम आते हैं। अगर हम अपना काम भटका देते और किसी पदवी, प्रमाण-पत्र के पीछे लग जाते कि 'ऐसा बनूँ, ऐसा बनूँ...' तो दूसरों के काम हम इतना नहीं आ सकते थे। गरीबों में भंडारे होते हैं न, तो आदिवासी जब बाँटीक हुई सामग्री ले जा रहे होते हैं, तब उनके चेहरे की रौनक देखकर लगता है कि हम जिनके काम आये उनको खुशी हो रही है।

जब हम आपके बीच होते हैं तो चाहें तो आपसे मिलें, लाइन लगवायें। रूपये-पैसे ऐंठना हो तो खूब ऐंठ सकते हैं कि 'इस पर्व में दान का कयह महत्त्व है, वह महत्त्व है...।' लेकिन यह हम आपके धन के काम आये, आपके काम नहीं आये। हम तो आपके काम आने के लिए आपको लाइन में से, इससे-उसमें से रोककर आप जितने भी उन्नत हो सकते हैं, उतना सब प्रकार से यत्न करते हैं।

तो शरीर से समाज के मन से भगवान के और एकांत-सेवन, ईश्वर-उपासना व बुद्धियोग से मनुष्य अपने-आपके काम आता है।

शरीर से भले हम एक-दूसरे के, समाज के काम आये लेकिन अपने को इतना घिस-पिट न डालें कि भगवान के काम न आयें। मन से भगवान के काम आ पायें इसलिए तो शरीर को थोड़ा आराम भी चाहिए, मन को शांति भी चाहिए। भगवान से प्रीति करो तो भगवान के काम आ गये।

समाज के यथायोग्य काम आ जाओ, भूखे को अन्न, प्यासे को पानी, अविद्यावान को विद्या, नासमझ को समझ – कुल मिला के जिसको जैसे यहाँ अभी और बाद में लाभ हो, ऐसी कोशिश करना यह समाज के काम आना है। इसका मतलब यह नहीं कि 'शराबी को अंडे और मांस चाहिए तो उसके काम आ जाऊँ, कामी-विकारी को भोग चाहिए तो उसके काम आ जाऊँ।' यह अर्थ नहीं लगाना, शास्त्र-मर्यादा के अंदर रह के सेवा करना। किसी के काम आ जायें, तो दिवाली के दिन हैं और पाँच हजार रूपये आपको किसी को दान करते हैं। 'किसको दूँ, किसको दूँ ? अरे, पाँच हजार रूपये की फिल्म की टिकटें ले आता हूँ और रेलवे स्टेशन पर कुलियों में बाँट देता हूँ। वे बेचारे खुश हो जायेंगे, मजा आ जायेगा।' तुम्हारे पाँच हजार का तो सत्यानाश हुआ और उनके मन का, नेत्रों का और समाज का सत्यानाश हुआ। यह तुम उनके काम नहीं आये। देश, काल और पात्र देखकर दान करना चाहिए। उसको मजा आ जाय.... नहीं, उसकी उन्नति हो, उसका मंगल हो। मंगल के साथ मजा आता हो तो हरकत नहीं लेकिन अमंगल करके मजा न दिलाओ।

तो शरीर से हम समाज के काम आ गये, माता-पिता, पत्नी आदि लोगों के काम आ गये। मन से हम भगवान को प्रीति करें, उन्हें अपना मानें तो भगवान के काम आ गये और बुद्धि से हम अपने आत्मदेव को जानें। सात्त्विक बुद्धि, राजसी बुद्धि और तामसी बुद्धि – ये तीन गुणों वाली बुद्धि बदलती है लेकिन एक ऐसा तत्त्व है कि तीनों गुणों की बदलाहट को भी जानता है। ऐसा बुद्धियोग करके हम अपने-आपके काम आ जायें। और नित्य नवीन ज्ञान, नित्य नवीन आनंद....। फिर रस के लिए बाहर भटकना नहीं पड़ेगा। इन्द्र कहते हैं कि 'ऐसे आत्मवेत्ता सदगुरू मिल जायें तो परम सौभाग्य की बात है। मुझे सुख लेना है तो अप्सराएँ नाचें, गंधर्व गायें, साजी साज बजायें तब सुख मिलता है, लेकिन जिसने अपने-आपको पा लिया है, जो अपने-आपके काम आ गया है ऐसे महापुरुष की दृष्टि पड़ती है तो मनुष्य को आत्मा का नित्य नवीन रस मिलने लगता है। जैसे चन्द्रमा की नित्य नवीन शीतलता होती है, उससे अनंत गुना नित्य नवीन परमात्म-रस, परमात्म-ज्ञान, परमात्म-प्रेम उन महापुरुष के हृदय में उमड़ता रहता है। चन्द्रमा औषधि को पुष्ट करता है लेकिन महापुरुष की वाणी और दृष्टि हमको पुष्ट करती है।'

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2011, पृष्ठ संख्या 22,23 अंक 223

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