मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

सोमवार, 31 जनवरी 2011

नियम में निष्ठा...


केवल मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो उन्नति कर सकता है, मगर सावधान नहीं रहा तो अवनत भी हो सकता है। या तो उसका उत्थान होता है या पतन होता है, वहीं का वहीं नहीं रहता। अगर मनुष्य उन्नति के कुछ नियम जान ले और निष्ठापूर्वक उनमें लगा रहे तो पतन से बच जायेगा और अपने कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ता जायेगा। आध्यात्मिक पतन न हो, इसलिए हर रोज कम से कम भगवन्नाम जप की दस माला करनी ही चाहिए।
दूसरी बात, त्रिबंध प्राणायाम करने चाहिए। इससे माला करने में एकाग्रता बढ़ेगी और चब करने में आनंद आयेगा। माला आसन पर बैठकर ही करनी चाहिए, जिससे मंत्रजप से उत्पन्न होने वाली विद्युतशक्ति जमीन में न चली जाये। अर्थिंग मिलने से तुम्हारी साधना का प्रभाव क्षीण हो जाता है।
यदि आसन पर बैठकर जप करते हो और अर्थिंग नहीं होने देते हो तो भजन के बल से आध्यात्मिक विद्युत के कण पैदा होते हैं, जो तुम्हारे शरीर के वात, पित्त और कफ के दोषों को क्षीण करके स्वास्थ्य की रक्षा करते हैं। यही कारण है कि हमारे ऋषि-मुनि प्रायः ज्यादा बीमार नहीं पड़ते थे। नियम में अडिग रहने से अपना बल बढ़ता है, जिससे हम अपने जीवन की बुरी आदतों को मिटा सकते हैं। जैसे – कईयों की आदत होती है ज्यादा बोलने की। उन बेचारों को पता ही नहीं होता कि ज्यादा बोलने से उनकी कितनी शक्ति नष्ट होती है। वाणी का अपव्यय नहीं करना चाहिए।
गुजराती में कहावत है
न बोलवामां नव गुण। अर्थात् न बोलने में नौ गुण होते हैं।
कम बोलने से या नहीं बोलने से ये लाभ हैं- झूठ बोलने से बचेंगे, निंदा करने से बचेंगे, द्वेष से बचेंगे, ईर्ष्या से बचेंगे, क्रोध और अशांति से बचेंगे। इस प्रकार छोटे-मोटे नौ लाभ होते हैं।
अधिक बोलने की आदत साधक तो बहुत हानि पहुँचाती है। साधक से बड़े में बड़ी गलती यह होती है कि यदि उसमें कुछ शक्ति आ जाती है या कुछ अनुभव होते हैं तो वह उसका उपयोग करने लगता है, दूसरों को बता देता है। इससे वह एकदम गिर जाता है। फिर वह अवस्था लाने में बहुत मेहनत करनी पड़ती है। इसलिए साधकों को अपना अनुभव किसी को नहीं कहना चाहिए। अगर साधक किसी को ईश्वर की ओर मोड़ने में सहयोगी होता है, अपने अनुभव से उसकी श्रद्धा में बढ़ोतरी होती है तो फिर थोड़ा बहुत ऊपर ऊपर से बता देना चाहिए।
जिस तरह वाणी पर संयम लाया जा सकता है उसी तरह ज्यादा खाने का, काम विकार का या शराब आदि का दोष है तो उसे भी दूर किया जा सकता है और बुरी आदतें भी मिटायी जा सकती हैं।
जब कामुकता जग रही हो तो उससे होने वाली हानियों पर नजर डालनी चाहिए व संयम से होने वाले लाभ पर विचार करना चाहिए। मन को समझाना चाहिए कि शरीर में क्या है ? कुछ आड़ी और कुछ खड़ी हड्डियाँ, माँस, मल-मूत्र, रक्त और ऊपर से चमड़े का आवरण (कवर)। फिर भी यह हाड़-मांस का शरीर परम सुन्दर चैतन्य के कारण ही सुंदर लगता है। तू उसी चैतन्य से प्रेम कर, अपने आत्मा में आ। हे मेरे प्रभु ! अब मैं विकारों में नहीं गिरूँगा, वरन् मैं तो तेरे शुद्ध चैतन्यस्वरूप में, राम में रहूँगा.....ॐ....ॐ....ॐ....
इस तरह एक सप्ताह तक काम विकार में न गिरने का नियम ले लिया और सप्ताह पूरा होने के पहले ही आगे एक सप्ताह बढ़ा दिया।
अपने मस्तिष्क में दिव्य विचार भरना और उनका पोषण करना नितांत आवश्यक है। डण्डे के बल से या पुचकार से बंदर, शेर आदि पशुओं को भी वश किया जा सकता है। इसी तरह अपने मन को कभी कठोर प्रतिज्ञा तो कभी पुचकार से वश में करने के संस्कार रोज डालते रहो।
लोभ के विचार आने पर विचार करोः आखिर में कौन अपने साथ क्या ले गया ?
क्या करिये क्या जोड़िये थोड़े जीवन काज।
छोड़ि छोड़ि सब जात है देह गेह धन राज।।
जो लोभ की दलदल में फँसे, उन्होंने शांति, आनंद, माधुर्य खोया। अतः लोभ से बचने के लिए दान-पुण्य आदि सत्कर्म करो। औदार्य सुख पाने में मन को लगाओ।
छोटी-छोटी बातों में भय सताता हो तो प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर शांत मन से चिंतन करो कि 'निर्भय नारायण मेरे साथ हैं। अब मैं जरा जरा बात में भयभीत न होऊँगा। पाप से, दुश्चारित्र्य से भय कर लेकिन हे मेरे मन ! अच्छे रास्ते पर चलने में किस बात का भय ? ॐ....ॐ.....ॐ.... मैं निर्भय हूँ। ॐ.....ॐ......ॐ..... मैं निर्भय नारायण का अंग हूँ।' ये विचार बार-बार मन में भरो।
चटोरेपन, स्वादलोलुपता की आदत अकारण रोग लाती है, स्वास्थ्य बिगाड़ती है और आयुष्य क्षीण करती है। जो जिह्वा एक दिन जल जाने वाली है, उसके पीछे मैं अपना जीवन क्यों नष्ट करूँ ? नमक मिर्च मसाले वाला सादा, सात्त्विक भोजन ही करूँगा। चटोरेपन का शिकार होकर अकाल नहीं मरूँगा। - ऐस दिव्य विचार भरने के लिए थोड़ा समय अवश्य निकालना चाहिए, अन्यथा पुरानी आदतें साधन-भजन में बरकत नहीं आने देंगी और अपने को असमर्थ समझकर हम दैवी लाभ से वंचित होते रहेंगे।
बीड़ी सिगरेट, गाँजा, शराब आदि के सेवन की बुरी आदतें एक दिन में नहीं आतीं अपितु बार-बार इनके प्रयोग से ये बुराइयाँ जीवन का अंग बन जाती हैं। ऐसे ही बुराइयों को निकालते हुए अच्छाइयों को अपनाओ तो अच्छाइयाँ भी जीवन का अंग हो जायेंगी। जो भी दुर्गुण हो, उनसे होने वाली हानियों पर नजर डालो और सदगुणों के महान फायदों पर नजर डालो। केवल मंदिरों में जाने से या माला घुमाने से ही काम नहीं चलता, अपितु रोज थोड़े दुर्गुण हटाते जाओ और सदगुण भरते जाओ। इससे आप शांति, प्रसन्नता, संतोष, आरोग्यता, उत्साह आदि सदगुणों के धनी बन जाओगे।
जैसे खेत में निराई-गुड़ाई करते हैं, वैसे ही मनरूपी खेत में से हलके विचार निकालकर दिव्य विचार भरने का रोज अभ्यास करो। मस्तिष्क की तिजोरी में जितने दिव्य विचार भरते जाओगे, उन्हें दृढ़ बनाते जाओगे, उतने ही सच्चे अर्थों में आप धनवान बनते जाओगे। वास्तव में तुम ईश्वर की सनातन संतान हो। बुरी आदतों में फँस मरने के लिए तुम्हारा जन्म नहीं हुआ है। ॐ.....ॐ.....ॐ.....

स्रोतः लोक कल्याण सेतु, जुलाई-अगस्त 2009
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

गुरुवार, 23 दिसंबर 2010

स्वदेशी, विदेशी गौवंश का अन्तर



विदेशी गौवंश ‘ए-1’

अनेक खोजो से साबित हुआ है कि अधिकांश विदेशी गौवंश विषाक्त है। आॅकलैण्ड की ‘ए-2, कार्पोरेशन तथा प्रसिद्ध खोजी विद्वान ‘डा. कोरिन लेक् मैकने’ की खोजों के अनुसार ‘ए-1’ प्रकार की गौ के दूध में ‘बीटा कैसीन ए-1, पाया गया है जिससे हमारे शरीर में ‘आई जी एफ-१, इन्सुलिन ग्रोथ हार्मोन-१० तरह अधिक निर्माण होने लगता है। यह पहले ही बताया जा चुका है कि ‘आई जीएफ-1’ से कई प्रकार के कैंसर होने के प्रमाण मिल चुके हैं।

इसके ईलावा-

‘ हैल्थ जनरल’ न्यूजीलैण्ड के अनुसार ‘ए-1’ दूध से हृदय रोग मानसिक रोग, मधुमेह, गठिया, आॅटिज्म (शरीर के अंगो पर नियंत्रण न रहना) आदि रोग होते हैं। सन् 2003 में ‘ए-2’ ‘कार्पोरेशन’ द्वारा किए सर्वेक्षण से पता चला है कि इन गऊओं के दूध् से स्वीडन, यूके, आस्ट्रेलिया, न्यूजिलेंड में हृदय रोग, मधुमेह रोगों में वृद्धि हुई है। फ्रांस तथा जापान में ‘ए-2’ दूध् से इन रोगों में कमी दर्ज की गई है। प्रशन है कि हानिकारक ‘ए-1’ तथा लाभदायक ए-2 दूध् किन गऊओं में है ?

पश्चिमी वैज्ञानिकों के अनुसार ७०% हालिस्टीन, रेड डैनिश और फ्रिजियन गऊएं हानिकारक ‘ए-1’ प्रोटीन वाली है। जर्सी की अनेक जातियां भी इसी प्रकार की है। पर यह स्पष्ट रूप से कोई नहीं बतला रहा कि लाभदायक ‘ए-2’ प्रोटीन वाली गऊएं कौन सी है, कहां है स्वयं जरा ढूंढ़ें। विचार करें!!

ब्राजील में लगभग 40 लाख भारतीय गौवंश तैयार किया गया हैं और पूरे यूरोप में उसका निर्यात हो रहा है।

इनमें अधिकांश गऊएं भारतीय गीर नस्ल और शेष रैड सिंधी तथा सहिवाल हैं। क्या अब बताने की जरूरत है पड़ेगा कि उपयोगी ‘ए-2’ प्रोटीन वाली गऊएं भारतीय है ?

क्या पशुपालन विभाग का दुरूपयोग करके, करोड़ रु. अनुदान देकर, पशु कल्याण के नाम पर भारतीय गौवंश को नष्ट करने की गुप्त योजना पश्चिमी ताकतें चला रही हैं. भोले भारतीयों को उनका आभास तक नहीं है। दूध् बढ़ाने और वंश सुधार के नाम पर भारतीय गौवंश का बीज नाश ‘कृत्रिम गर्भाधन’ करके कत्लखानों से कई गुणा अधिक भारतीय गौवंश का विनाश आपकी सहमति, सहयोग से, आपके अपने द्वारा हो रह है। गौवंश विनाश यानी भारत का विनाश। धन व्यय करके कृत्रिम गर्भाधन से अपने अमूल्य ‘ए-2’ गौवंश को हम स्वयं नष्ट कर रहें हैं।

विषाक्त विदेशी गौवंश से बने संकर भारतीय गौवंश से प्राप्त किया घी, दूध्, दही ही नही, गोबर, गौमुत्रा, स्पर्श और निश्वास भी विषाक्त होगा न? दुग्ध् पदार्थो से हमारा स्वास्थ्य बरबाद नही हो रहा क्या? इनके गोबर, गौमूत्रा से बनी खाद और पंचगव्य औषधिया भी परम हानिकारक प्रभाव वाली होगी। हमारी खेती नष्ट होने, पंचगव्य औषधियों के असफल होने, घी, दूध्, दहीं खाने-पीने पर भी स्वास्थय में सुधार होने की बजाए बिगाड़ का बड़ा कारण यह संकर गौवंश हो सकता है।

समाधान सरल है:

वर्तमान संकर नसल का गौवंश ‘ए-1’ तथा ‘ए-2’ के संयुक्त गुणों वाला है। इनमें ५०% से ६०% दोनो गुण हों तो स्वदेशी गर्भधन की व्यवस्था से अगली पीढ़ी में ‘ए-1’ २५% दूसरी बार १२% तथा तीसरी बार ६% रह जाएगा। बिगाड़ने वालों ने सन् 1700 से आज तक 300 साल धैर्य से काम किया, हम 10-12 साल प्रयास क्यों नही कर सकते? करने में काफी सरल है।

स्वदेशी विदेशी का अन्तर- विदेशी गौवंश तथा भारतीय गौवंश में कुछ मौलिक अंतर हमने जो जाने हैं वे निम्न है। पर यह सूचि अन्तिम नही, विद्वान और अनुभवी महानुभव इसमें संशोधन-संर्वधन करने की कृपा करें।

शनिवार, 11 दिसंबर 2010

है को मित्र बना लो नहीं को शत्रु

संसार में दो मुख्य तथ्य हैं- है या नहीं।
इसको आप यूं भी कह सकते हैं कि आपके पास है या आपके पास नहीं है।
है को धनात्मक और नहीं को ऋणात्मक कह सकते हैं। है के पार्श्व में आशा छिपी है और नहीं के पार्श्व में निराशा छिपी है।
प्रायः मनुष्य जो वस्तुएं उसके पास है उसको देखें तो वह सुखी रहता है और जो वस्तुएं उसके पास नहीं है उसके लिए दुःखी रहता है और रोता है।
है और नहीं, धनात्मक और ऋणात्मक, आशा और निराशा आदि के विषय में विद्धानों एवं महापुरुषों ने अनेक सूक्ति लिखी हैं।
हम तो आपसे यही कहेंगे कि है को जानो नहीं को मत जानो। है में सफलता और सुख व प्रसन्नता परिणाम के रूप में मिलेगी जबकि नहीं को जानने में दुःख एवं अप्रसन्नता ही हाथ में लगेगी।
एक बार की बात है कि एक व्यक्ति रोता हुआ चला जा रहा था। उसके साथ एक व्यक्ति और भी चल रहा था। जो व्यक्ति रो रहा था वह थोड़ी देर में हंसने लगा। उसे हंसता देखकर जो व्यक्ति उसके साथ जा रहा था उसने सोचा ऐसा क्या हो गया जो रोता हुआ व्यक्ति अचानक हंसने लगा। न उसको कोई मिला और न उसने किसी से कुछ पूछा। उसके मन में उठने वाली जिज्ञासा ने उसे उससे पूछने के लिए प्रेरित किया तो वह उस व्यक्ति से बोला-'तुमने एकदम रोते-रोते हंसना क्यों प्रारम्भ कर दिया?' उसकी बात सुनकर वह व्यक्ति बोला-'मैं अपने नंगे पांव को देखकर रो रहा था कि भगवान्‌ ने सभी को अच्छे-अच्छे जूते, चप्पल पहनने के लिए दिए हैं और मेरे लिए जूता खरीदने के लिए भी धन नहीं है। यह सोचकर मन बोझिल हो रहा था और तरह-तरह के विचार आ रहे थे। मन दुःखी होकर रोने लगा तो मैं भी अचानक रोने लगा।'

'लेकिन फिर हंसने क्यों लगे?'-उस व्यक्ति ने फिर पूछा।

बात यह है कि जब मैंने सामने वाले व्यक्ति को देखा जिसके पैर नहीं हैं तो मन में सोचा कि मेरे तो पैर हैं और कभी न कभी तो जूते आ ही जाएंगे। पर उसके तो पैर ही नहीं हैं और पैर तो आएंगे नहीं। यह सोचकर मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया कि तूने मेरे पैर तो सही रखे उसके तो हैं ही नहीं। यह सोचकर हंसने लगा था।'-उसकी बात सुनकर रोने वाले व्यक्ति ने कहा।

जो है उसके लिए ईश्वर को सदैव धन्यवाद देना चाहिए। जो आपके पास नहीं है उसके लिए परेशान नहीं होना चाहिए। कर्मशील रहकर अधिकाधिक करके पाने का प्रयास करना चाहिए। सदैव आशावान्‌ रहना चाहिए। निराशा का दामन कदापि नहीं पकड़ना चाहिए। आशा में पाने की संभावना छिपी रहती है। आशा ही कुछ करने के लिए प्रेरित करती है। धनात्मक सोचना चाहिए नाकि ऋणात्मक। धनात्मक पथ पर चलने वाले सदैव उन्नति करते हैं और आगे ही बढ़ते रहते हैं। इसके विपरीत ऋणात्मक पथ पर चलने वाले सदैव अवनति ही पाते हैं और कई काल का ग्रास बन जाते हैं जिसके लिए वे आत्महत्या तक को अपना लेते हैं।

है के लिए प्रसन्न होना चाहिए और नहीं के लिए अप्रसन्न नहीं होना चाहिए। न होने पर जिसके पास है उससे ईर्ष्या भी नहीं करनी चाहिए क्योंकि यह भी आपके लिए तनाव और कुपथ पर चलने के लिए एक सड़क बना देगी जिस पर चलकर या तो आप अपराधी बन जाएंगे अथवा तनाव से ग्रस्त होकर रोगी या आत्महत्यारे बन जाएंगे।

है को जानो जिसके पीछे आशा और धनात्मक सोच छिपी है। आशा ही आपको स्वप्न दिखाती है। स्वप्न देखते हैं तो पूरे भी अवश्य होंगे। पूरे करने के लिए आपको कुछ नहीं करना है बस प्रयास भर करना है। है के लिए प्रभु का सदैव धन्यवाद अदा करें।

नहीं के पीछे निराशा छिपी है, वह तुरन्त आपको अपने अधिकार में ले लेगी और आपका निर्बल मन तुरन्त निराश होकर दुःखी हो जाएगा। जीवन अस्त-व्यस्त हो जाएगा। कुछ भी करने का मन नहीं करेगा। सबकुछ के पीछे नहीं जो आ गया है। नहीं ने आपके अन्दर ऋणात्मकता कूट-कूट कर भर दी है। इसी ऋणात्मकता के बल पर आप सबकुछ उल्टा-पुल्टा करने लगते हैं तो फलस्वरूप असफलता और हानि ही हाथ में लगती है।

मन में ठान लो कि आशा से परिचय बढ़ाना है। आशा ही धनात्मकता की संगत करेगी। धनात्मकता की संगत में सफलता मिलने की सम्भावना शत-प्रतिशत हो जाती है।

कुछ न करने से कुछ करना बेहतर है। बहुत से कार्य तो ऋणात्मकता के कारण कर्त्ता को निराश कर देते हैं और हानि के भय से वह उस कार्य को प्रारम्भ ही नहीं कर पाता है और कार्य प्रारम्भ होने से पूर्व ही असफलता के दर्शन करा देता है।

आपको असफलता से घबराना नहीं चाहिए। आपको आशा और धनात्मकता का कवच ओढ़ना है। असफलता की कोख से सफलता का सूत्र उत्पन्न होता है। इसी सूत्र के बल पर सफलता को अपनी दासी बनाया जा सकता है।

नहीं को कदापि मत पहचानो। अपनी मित्रता है से रखो।

है ही आपको आगे ले जाएगा और धनात्मक सोच के बल पर ही आप आशा को वर लेंगे। आशा ही आपके स्वप्नों के पूर्ण होने की प्रेरणा बनेगी जिसके बल पर आप सफलता को पा ही लेंगे और आपकी मनोकांक्षाएं पूर्ण हो जाने से सब आपके उदाहरण का अनुसरण करने के लिए लालायित होने लगेंगे।

तब उनके लिए यह रहस्य होगा कि आपने यह सब कैसे किया तो आप गर्व से बता सकेंगे कि हमने तो मात्र है को जाना है और नहीं को तो पहचानते भी नहीं हैं। है कि मित्रता ने और नहीं से की गई शत्रुता ने सफलता का सूत्र दे दिया जिससे समस्त भौतिक सुख थोड़े प्रयास के बल पर मिल गए।

आप भी है से मित्रता करके देखें और नहीं को शत्रु बना लें, फिर सफलता आपके साथ ही होगी।

मंगलवार, 12 अक्टूबर 2010

सत्कर्म करो

महाभारत के युद्ध की एक घटना है। भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से कहते हैं-
"हे युधिष्ठिर ! अब तुम विजेता हुए हो तो अब राजतिलक का दिन निश्चित कर तुम राज्य भोगो।"
तब युधिष्ठिर कहते हैं- "मुझसे अब राज्य नहीं भोगा जाएगा। मैं अब तप करना चाहता हूँ। मुझे राज्यसुख की आकांक्षा नहीं है। तप करके फिर आकर राज्य सँभालूँगा।"
तब भगवान श्री कृष्ण कहते हैं-
"नहीं, तुमसे फिर राज्य नहीं होगा क्योंकि अब कलियुग का प्रभाव शुरू हो चुका है। इसलिए तुम थोड़े समय राज्य करो, फिर तप करना।"
युधिष्ठिर को यह बात समझ में नहीं आयी। वे कहने लगेः "पहले तप करूँगा, बाद में राज्य करूँगा।"
तब श्रीकृष्ण पुनः बोलेः "फिर राज्य नहीं हो सकेगा।"
युधिष्ठिर के चित्त में राज्य करने की रूचि न थी। तब श्रीकृष्ण कहते हैं- "तुम पाँचों भाई वन में जाओ और जो कुछ भी दिखे वह आकर मुझे बताओ। मैं तुम्हें उसका प्रभाव बताऊँगा।"
पाँचों भाई वन में गये।

युधिष्ठिर महाराज ने देखा कि किसी हाथी की दो सूँड है। यह देखकर आश्चर्य का पार न रहा।
अर्जुन दूसरी दिशा में गये। वहाँ उन्होंने देखा कि कोई पक्षी है, उसके पंखों पर वेद की ऋचाएँ लिखी हुई हैं पर वह पक्षी मुर्दे का मांस खा रहा है। यह भी आश्चर्य है !
भीम ने तीसरा आश्चर्य देखा कि गाय ने बछड़े को जन्म दिया है और बछड़े को इतना चाट रही है कि बछड़ा लहुलुहान हो जाता है।
सहदेव ने चौथा आश्चर्य देखा कि छः सात कुएँ हैं और आसपास के कुओं में पानी है किन्तु बीच का कुआँ खाली है। बीच का कुआँ गहरा है फिर भी पानी नहीं है।
पाँचवे भाई नकुल ने भी एक अदभुत आश्चर्य देखा कि एक पहाड़ के ऊपर से एक बड़ी शिला लुढ़कती-लुढ़कती आती और कितने ही वृक्षों से टकराई पर उन वृक्षों के तने उसे रोक न सके। कितनी ही अन्य शिलाओं के साथ टकराई पर वह रुक न सकीं। अंत में एक अत्यंत छोटे पौधे का स्पर्श होते ही वह स्थिर हो गई।

पाँचों भाईयों के आश्चर्यों का कोई पार नहीं ! शाम को वे श्रीकृष्ण के पास गये और अपने अलग-अलग दृश्यों का वर्णन किया।

1 :-- युधिष्ठिर कहते हैं- "मैंने दो सूँडवाला हाथी देखा तो मेरे आश्चर्य का कोई पार न रहा।"

तब श्री कृष्ण कहते हैं-
"कलियुग में ऐसे लोगों का राज्य होगा जो दोनों ओर से शोषण करेंगे। बोलेंगे कुछ और करेंगे कुछ। ऐसे लोगों का राज्य होगा। इससे तुम पहले राज्य कर लो।

2 :-- अर्जुन ने आश्चर्य देखा कि पक्षी के पंखों पर वेद की ऋचाएँ लिखी हुई हैं और पक्षी मुर्दे का मांस खा रहा है। इसी प्रकार कलियुग में ऐसे लोग रहेंगे जो बड़े-बड़े कहलायेंगे। बड़े पंडित और विद्वान कहलायेंगे किन्तु वे यही देखते रहेंगे कि कौन-सा मनुष्य मरे और हमारे नाम से संपत्ति कर जाये। संस्था के व्यक्ति विचारेंगे कि कौन सा मनुष्य मरे और संस्था हमारे नाम से हो जाये। पंडित विचार करेंगे कि कब किसका श्राद्ध है ? चाहे कितने भी बड़े लोग होंगे किन्तु उनकी दृष्टि तो धन के ऊपर (मांस के ऊपर) ही रहेगी।

"परधन परमन हरन को वैश्या बड़ी चतुर।"

ऐसे लोगों की बहुतायत होगी, कोई कोई विरला ही संत पुरूष होगा।

3 :-- भीम ने तीसरा आश्चर्य देखा कि गाय अपने बछड़े को इतना चाटती है कि बछड़ा लहुलुहान हो जाता है। कलियुग का आदमी शिशुपाल हो जायेगा। बालकों के लिए ममता के कारण इतना तो करेगा कि उन्हें अपने विकास का अवसर ही नहीं मिलेगा। किसी का बेटा घर छोड़कर साधु बनेगा तो हजारों व्यक्ति दर्शन करेंगे किन्तु यदि अपना बेटा साधु बनता होगा तो रोयेंगे कि मेरे बेटे का क्या होगा ? इतनी सारी ममता होगी कि उसे मोहमाया और परिवार में ही बाँधकर रखेंगे और उसका जीवन वहीं खत्म हो जाएगा। अंत में बिचारा अनाथ होकर मरेगा। वास्तव में लड़के तुम्हारे नहीं हैं, वे तो बहुओं की अमानत हैं, लड़कियाँ जमाइयों की अमानत हैं और तुम्हारा यह शरीर मृत्यु की अमानत है। तुम्हारी आत्मा-परमात्मा की अमानत हैं। तुम अपने शाश्वत संबंध को जान लो बस !

4 :-- सहदेव ने चौथा आश्चर्य यह देखा कि पाँच सात भरे कुएँ के बीच का कुआँ एक दम खाली ! कलियुग में धनाढय लोग लड़के-लड़की के विवाह में, मकान के उत्सव में, छोटे-बड़े उत्सवों में तो लाखों रूपये खर्च कर देंगे परन्तु पड़ोस में ही यदि कोई भूखा प्यासा होगा तो यह नहीं देखेंगे कि उसका पेट भरा है या नहीं। दूसरी और मौज-मौज में, शराब, कबाब, फैशन और व्यसन में पैसे उड़ा देंगे। किन्तु किसी के दो आँसूँ पोंछने में उनकी रूचि न होगी और जिनकी रूचि होगी उन पर कलियुग का प्रभाव नहीं होगा, उन पर भगवान का प्रभाव होगा।

5 :-- पाँचवा आश्चर्य यह था कि एक बड़ी चट्टान पहाड़ पर से लुढ़की, वृक्षों के तने और चट्टाने उसे रोक न पाये किन्तु एक छोटे से पौधे से टकराते ही वह चट्टान रूक गई। कलियुग में मानव का मन नीचे गिरेगा, उसका जीवन पतित होगा। यह पतित जीवन धन की शिलाओं से नहीं रूकेगा न ही सत्ता के वृक्षों से रूकेगा। किन्तु हरिनाम के एक छोटे से पौधे से, हरि कीर्तन के एक छोटे से पौधे मनुष्य जीवन का पतन होना रूक जायेगा।

इसलिए पांडवो ! तुम पहले थोड़े समय के लिए राज्य कर लो। कलियुग का प्रभाव बढ़ेगा तो तुम्हारे जैसे सज्जनों के लिए राज्य करना मुश्किल हो जाएगा। फिर तप करते-करते सीधे स्वर्ग में जाना, स्वर्गारोहण करना।"

"अभी पवित्र पुरूषों के लिए भगवन्नाम कीर्तन, सत्संग ध्यान, निर्भयता और नारायण की प्रसन्नता के कार्यों को करते-करते स्वर्गारोहण करना जरूरी है। जुल्म करना तो पाप है किन्तु जुल्म सहना दुगना पाप है। पाप करना तो पाप है किन्तु पापी और हिंसकों से घबराकर उन्हें छूट देना महापाप है।"
हरि ॐ

गुरुवार, 7 अक्टूबर 2010

मूर्तिपूजा - भगवद्भाव जगाने का प्रभावी रास्ता...

नास्तिक सुधारक के घर में पनपी हुई एक फैशनेबल लड़की हार-शृंगार से देह को सजाकर मंदिर में गई। मंदिर का द्वार आते ही वह चीखी।
"मैं मर गई रे... मुझे बचाओ.... बचाओ... बड़ा डर लगता है !"
सास ने पूछाः "आखिर क्या हुआ ?"
"मुझे बहुत डर लगता है। मैं अंदर नहीं आ सकती। मुझे घर ले चलो। मेरा दिल धड़कता है... मेरा तन काँपता है।"
"अरे ! बोल तो सही, है क्या ?"
"वह देखो, मंदिर के द्वार पर दो-दो शेर मुँह फाड़कर खड़े हैं। मैं कैसे अंदर जाऊँगी ?"
सास ने कहाः "बेटी ! ये दो शेर हैं, लेकिन पत्थर के हैं। ये काटेंगे नहीं... कुछ नहीं करेंगे।"
वह लड़की अकड़कर बोलीः "जब पत्थर के शेर कुछ नहीं करेंगे तो मंदिर में तुम्हारा पत्थर का भगवान भी क्या करेगा ?"

उस पढ़ी लिखी मूर्ख स्त्री ने तर्क तो दे दिया और भोले-भाले लोगों को लगेगा कि बात तो सच्ची है। पत्थर के सिंह काटते नहीं, कुछ करते नहीं तो पत्थर के भगवान क्या देंगे ? जब ये मारेंगे नहीं तो वे भगवान सँवारेंगे भी नहीं। उस कुतर्क करने वाली लड़की को पता नहीं कि पत्थर के सिंह बिठाने की और भगवान की मूर्ति प्रतिष्ठित करने की प्रेरणा जिन ऋषियों ने दी है, वे ऋषि-महर्षि-मनीषियों की दृष्टि कितनी महान और वैज्ञानिक थी ! पत्थर की प्रतिमा में हम भगवद् भाव करते हैं तो हमारा चित्त भगवदाकार होता है। पत्थर की प्रतिमा में भगवद भाव हमारे चित्त का निर्माण करता है, चैतन्य के प्रसाद में जागने का रास्ता बनाता है।

मूर्तिपूजा करते-करते, परमात्मा के गीत गाते-गाते मीरा परम चैतन्य में जाग गई थी। आखिर उस मूर्ति में समा गई थी। गौरांग समा गये थे जगन्नाथजी के श्रीविग्रह में। एक किसान की लड़की नरो श्रीनाथ जी के आगे दूध धरती थी। श्रीनाथ जी उसके हाथ से दूध लेकर पीते थे। थी तो वह भी मूर्ति।

तुम्हारे अन्तःकरण में कितनी शक्ति छिपी हुई है ! मूर्ति भी तुमसे बोल सकती है। इतनी तो तुम्हारे चित्त में शक्ति है और चित्त के अधिष्ठान में तो अनंत-अनंत ब्रह्माण्ड विलसित हो रहे हैं। यह ज्ञान जगाने के लिए मंदिर का देवदर्शन प्रारंभिक कक्षा है। भले बाल मंदिर है, फिर भी अच्छा ही है।

उस मूर्ख लड़की से कहना चाहिएः "जब तू चलचित्र देखकर हँसती है, नाचती है, रोती है, हालाँकि प्लास्टिक की पट्टी के सिवाय कुछ भी नहीं है, फिर भी ‘आहा..... अदभुत...’ कहकर तू उछलती रहती है। परदे पर तो कुछ नहीं, सचमुच में गुन्डा नहीं, पुलिस नहीं... पुलिस के कपड़े पहन कर अभिनय किया है। रिवोल्वर भी सच्ची नहीं होती। फिर भी गोली मारते हैं, किसी को हथकड़ियाँ लगती हैं, डाकू डाका डालकर भागता है, उसके पीछे पुलिस की गाड़ियाँ दौड़ती हैं। ड्रायवर स्टीयरिंग घुमाते हैं..... ॐऽऽऽऽ.....ॐ, तब तुम सीट पर बैठे-बैठे घूमते हो कि नहीं घूमते हो ?जबकि पर्दे पर प्रकाश के चित्रों के अलावा कुछ नहीं है।

ऐसा झूठा चलचित्र का माहौल भी तुम्हारे दिल को और बदन को घुमा देता है तो ऋषियों के ज्ञान और उनके द्वारा प्रचलित मूर्तिपूजा भक्तों के हृदयों को भाव से, प्रार्थना से, परमात्म-प्रेम से भर इसमें क्या आश्चर्य है ?

ब्रह्मवेत्ता ऋषि-महर्षियों द्वारा रचित शास्त्रों के अनुसार मंत्रानुष्ठान पूर्वक विधि सहित मंदिर में भगवान की मूर्ति स्थापित की जाती है। फिर वेदोक्त-शास्त्रोक्त विधि के अनुसार प्राण-प्रतिष्ठा होती है। वहाँ साधु-संत-महात्मा आते जाते हैं। मूर्ति में भगवदभाव के संकल्प को दुहराते हैं।
हजारों-हजारों भक्त अपनी भक्ति-भावना का अभिषेक उस देव मूर्ति में करते हैं ।ऐसी मूर्ति से भाविक भक्तों को अमूर्त तत्त्व का आनन्द मिल जाय, तो इसमें क्या सन्देह है ?

बड़े बड़े मकानों में रहने वाले सभी लोग सही माने में बड़े नहीं होते। बड़ी-बड़ी कब्रों के अन्दर सड़ा गला मांस और बदबू होती है, बिच्छू और बैक्टीरिया ही होते हैं। बड़ी गाड़ियों में घूमने आदमी बड़ा नहीं होता, बड़ी कुर्सी पर पहुँचने से भी वह बड़ा नहीं होता। अगर बड़े से बड़े परमात्मा के नाते वह सेवा करता है, उसके नाते ही अगर बंगले में प्रारब्ध वेग से रहता है तो कोई आपत्ति नहीं। लेकिन इन चीजों के द्वारा जो परमेश्वर का घात करके अपने अहं को पोसता है, वह बड़ा नहीं कहा जाता।

-परम पूज्य संत श्री आसाराम जी "बापू" की "योगयात्रा" पुस्तिका से