मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

मंगलवार, 8 जून 2010

श्री राम नाम की महिमा

एक बार पार्वती जी ने भगवान शिवजी से श्री हरि की आराधना के बारे में पूछा तो भगवान शिव ने उनको भगवान श्री विष्णु की श्रेष्ठ आराधना, नित्य-नैमित्तिक कृत्य तथा भगवत्भक्तों की पूजा का वर्णन किया। जिसे सुन कर पार्वती जी ने कहा - नाथ ! आपने उत्तम वैष्णव धर्म का भलीभाँति वर्णन किया। वास्तव में परमात्मा श्री विष्णु का स्वरूप गोपनीय से भी अत्यन्त गोपनीय है। सर्वदेव वन्दित महेश्वर ! मैं आपके प्रसाद से धन्य और कृतकृत्य हो गयी। अब मैं भी सनातन देव श्री हरि का पूजन करूँगी।
श्री महादेव जी बोले - देवी ! बहुत अच्छा, बहुत अच्छा ! तुम सम्पूर्ण इन्द्रियों के स्वामी भगवान लक्ष्मीपति का पूजन अवश्य करो। भद्रे ! मैं तुम-जैसी वैष्णवी पत्नी को पाकर अपने को कृतकृत्य मानता हूँ।
वसिष्ठजी कहते है - तदनन्तर महादेव जी से उपदेशानुसार पार्वती जी प्रतिदिन श्रीविष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करने के पश्चात भोजन करने लगीं। एक दिन परम मनोहर कैलास शिखर पर भगवान श्री विष्णु की आराधना करके भगवान शंकर ने पार्वतीदेवी को अपने साथ भोजन करने के लिये बुलाया। तब पार्वति देवी ने कहा - "प्रभो ! मैं श्रीविष्णुसहस्त्रनाम का पाठ करने के पश्चात भोजन करूँगी, तब तक आप भोजन कर लें" यह सुन कर महादेव जी ने हँसते हुए कहा - "पार्वती ! तुम धन्य हो, पुण्यात्मा हो ; क्योकि भगवान श्रीविष्णु में तुम्हारी भक्ति है। देवि ! भाग्य के बिना भगवान श्रीविष्णु की भक्ति प्राप्त होना बहुत कठिन है। सुमुखि ! मैं तो "राम ! राम ! राम !" इस प्रकार जप करते हुये परम मनोहर श्रीराम नाम में ही निरन्तर रमण किया करता हूँ । राम-नाम सम्पूर्ण सहस्त्रनाम के समान है। पार्वती ! रकारादि जितने नाम हैं, उन्हें सुनकर रामनाम ही आशंका से मेरा मन प्रसन्न हो जाता है।

श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्त्रनाम ततुल्यं रामनाम वरानने ॥
रकारादीनि नामानि श्रृण्वतो म्म पार्वति । मनः प्रसप्रतां याति रामनामाभिशंकया ॥ (२८१ । २१-२२)

अतः महादेवि ! तुम राम-नाम का उच्चारण करके इस समय मेरे साथ भोजन करों ।" यह सुन कर पार्वती जी ने राम-नाम का उच्चारण करके भगवान शंकर के साथ बैठकर भोजन किया। इसके बाद उन्होने प्रसन्नचित होकर पूछा - ‘ देवेश्वर ! आपने राम-नाम को सम्पूर्ण सहस्त्रनाम के तुल्य बतलाया है यह सुन कर राम-नाम में मेरी बडी भक्ति हो गयी हैं अतः भगवान श्री राम के यदि और भी नाम हों तो बताइयें।’
श्री महादेव जी बोले - "पार्वती ! सुनो, मैं श्रीरामचन्द्र जी के नामों का वर्णन करता हूँ। लौकिक और वैदिक जितने भी शब्द हैं, वे सब श्रीरामचन्द्रजी के ही नाम हैं। किन्तु सहस्त्रनाम उन सबमें अधिक है और उन सहस्त्रनामों में भी श्रीराम के एक सौ आठ नामों की प्रधानता अधिक है। श्रीविष्णु का एक-एक नाम ही सब वेदों से अधिक माना गया है। वैसे ही एक हजार नामों के समान अकेला श्रीराम-नाम माना गया है। पार्वती ! जो सम्पूर्ण मन्त्रों और समस्त वेदों का जप करता है, उसकी अपेक्षा कोटिगुना पुण्य केवल राम-नाम से उपलब्ध होता है।"

[{( स्रोत - पद्मपुराण - उत्तरखण्ड, अध्याय २९१ (श्रीराम-नाम महिमा और श्रीरामचन्द्रजी के १०८ नाम का माहात्म्य )}]

यही नाम अगर गुरुदेव से गुरुमन्त्र के रूप में मिल जाये तो फिर उसकी बराबरी कोई नही कर सकता........

शनिवार, 5 जून 2010

मेरे साहिबा (जोगी) कौन जाने गुण तेरे....

सदगुरुओं के गुण कौन जान सकता हैं। सदगुरुओं ने कितने तारे उनको कौन जान सकता हैं। आकाश के तारे गिनें जा सकते है परन्तु सदगुरुओं ने कितने तारे कोई नही गिन सकता हैं।

तारे गिने जात है ना तारे गिने जात

ऐसे ही गुरु नानक जी थे जिन्होने कितनों को तारा ये किसी को नही पता।
एक बार गुरु नानक जी का एक शिष्य भगीरथ गुरु नानक जी के पास आया और पूछा कि गुरुजी ! मैं दूसरे शहर जा रहा हूँ, आप मुझे जाने की आज्ञा दीजिये। गुरुनानक जी ने कहा कि भगीरथा जा रहा है तो बेशक जा पर एक बात का ध्यान रखना कि एक रात से ज्यादा मत रुकना, जो तू एक रात से ज्यादा रुका तो तेरा जन्म बिगड़ जायेगा। भगीरथ ने विनती की कि हे मेरे सच्चे बादशाह ! मैं नही रुकुंगा। आपका हुक्म है कि एक रात रुकना तो मेरे सच्चे बादशाह मैं एक रात ही रुकुंगा। मेरा जन्म क्युं बिगडें, क्योकि गुरु के वचन से ही जनम सफ़ल होता हैं और वचन ना मानने से ही वचन बिगडता हैं। फ़िर गुरुनानक जी ने भगीरथ से कहा कि जो तू दूसरे शहर जा रहा है तो एक काम और करना कि मरदाने की बेटी की शादी है उसे जो सामान चाहिये वो लिखवा ले और लेते आना। भगीरथ आया मरदाना के पास और जो जो सामान मरदाना को चाहिये था लिख लिया, सुहाग का जोडा भी लिख लिया, सारा सामान लिख लिया और आज्ञा लेने गुरुनानक जी के पास आया कि सच्चे बादशाह मैं जाउं ! गुरुनानक जी बोले कि जा भगीरथा पर एक रात से ज्यादा मत रुकना, जो तू एक रात से ज्यादा रुका तो तेरा जन्म बिगड़ जायेगा। भगीरथ ने चरणों में माथा रखा और कहा कि सच्चे बादशाह मैं एक रात ही रुकुंगा। भगीरथ दूसरे शहर पहुंचा तो उसका एक व्यापारी मित्र रहता था भाई मनसुख, शाम को वो भाई मनसुख के घर पहुंचा और बोला "मित्रा ! आज की रात मैं तेरे घर रुकुंगा और कल मैं वापस जाउंगा क्योकि मेरे गुरु का हुक्म है जो मैं एक रात से ज्यादा रुकुंगा तो मेरा जनम बिगड जायेगा।" मनसुख ने पूछा कि "ऐसा कौन सा तेरा गुरु है कि जिसका वचन मानने से तेरा जन्म सफ़ल होता है और न मानने से जन्म बिगडता हैं" तब भगीरथ ने हाथ जोड़ कर कहा कि "मेरे गुरु गुरु नानक जी हैं।" जैसे ही मनसुख ने गुरु नानक जी का नाम सुना तो उसका मन खिंच गया, फ़िर भगीरथ ने कहा कि भाई ये सामान का पर्चा है ये सामान बांध दे क्योकि मुझे सुबह ही जाना हैं। सवेरा हुआ, भाई मनसुख ने सामान बांध दिया था। भगीरथ ने कहा कि "मनसुखा ! चल एक बार गुरुनानक जी के दर्शन कर ले पूर्ण पुरुष है गुरु नानक जी परमेश्वर का रूप है भाई मनसुख कहने लगा "कि चलता तो हूँ पर मेरी एक शर्त है कि जब मैं वहाँ पहुँचु तो गुरुनानक मेरा नाम पुकार कर मुझे बुलावे।" दोनों जब गुरुनानक जी के पास पहुचें तो भगीरथ ने गुरु नानक जी के चरणों में माथा टेका। मनसुख साथ में खडा रहा, तो गुरु नानक जी बोले भगीरथा ! आ गया हैं और साथ उसको भी लाया है जिसकी माँ ने इसका नाम मनसुख रखा है। लेकिन कभी इसने मन का सुख नही जाना कि मन का सुख क्या होता है। इसने तन के सुख को ही सदा सुख समझा है। तन का सुख तो इसने बहुत पाया पर मन का सुख आज तक इसको नही मिला। जैसे ही भाई मनसुख ने गुरुनानक जी के मुख से अपना नाम सुना तो वो चरणों में गिर पडा और बोला "सच्चे बादशाह ! मुझे माफ़ कर दो। मै आपकी परीक्षा रहा था कि आप पूर्ण हो की नही। चरणों में गिर कर मनसुख कहता है कि सच्चे बादशाह मुझे अपना सिख (शिष्य) बना लो। ये जब गुरुनानक जी ने सुना तो मनसुख से सिर पर हाथ रखा और बोले मनसुखा जप "श्री वाहेगुरु"। जैसे ही गुरुनानक जी के हाथ की शरण मनसुख को मिली मनसुख को इतना सुख मिला कि आज तक उसे वो सुख नही मिला था। इतना धन कमाकर आज तक मनसुख को जो सुख नही मिला था उससे ज्यादा सुख सिर्फ़ गुरुनानक जी के उसके सिर पर हाथ रखने से मिल गया। फ़िर मनसुख ने विनती की कि हे गरीब नवाज दया करों मुझे अपना सिख बना लो। तो गुरुनानक जी बोले कि मनसुखा जो तुने मेरा सिख बनना है तो तुझे सवेरे जल्दि उठना पडेगा, नियम करना पडेगा, साधसंगत के साथ बैठ कर नाम जप करना पडेगा जा मरदाने के पास जा और सबद लिख ले और रोज कीर्तन करना जो तू कीर्तन करेगा न तो हम तेरे साथ बैठे होंगे। क्योकि जो कर्ते (परमब्रह्म) का कीर्तन करता है तो सारा जग उसके साथ हो जाता है। भाई मनसुख ने मरदाना से सबद ले लिये और गुरुनानक जी से आज्ञा ले कर घर चला आया और रोज नियम करने लगा। वो व्यापारी था तो एक दिन दूर देश से वापस लौट रहा था तो उसका बेडा समुद्री तूफ़ान में फ़ँस गया मल्लाहों ने बहुत कोशिश की लेकिन जब कुछ नही हुआ तो उन्होने लंगर डाल दिये और भाई मनसुख के पास आकर बोले कि अब जहाज नही संभल रहा हैं क्योकि हवा विपरीत हो रही है और बेडा तेज समुद्री लहरों से टूट जायेगा, अब हम लोगों लो डूबने से कोई नही बचा सकता हैं। तो भाई मनसुख ने कहा कि तुम लोग चिन्ता क्यु करते हो जिसका गुरु गुरुनानक हो उसका बेडा कोई डुबा नही सकता वो तो हमेशा तरता ही है। फिर सब लोग बैठ कर गुरुनानक जी का नाम लेकर कीर्तन शुरु किया। कीर्तन में जब वे एक मन और एक चित्त हो गये तब जब आँख खुली तो सभी क्या देखा कि उनका बेडा किनारे लगा हुआ हैं। गुरु नानक जी ने भाई मनसुख का बेडा तार दिया डूबने नही दिया। क्योकि जिस बेडे के अन्दर कीर्तन होता है और जिसका कोई गुरु होता है उसका बेडा भी कभी डूब सकता है ? इस प्रकार से उन सब की जान बच गयी। सभी ने गुरुनानक जी को शुक्रिया अदा किया और सभी बोले

मेरे साहिबा कौन जाने गुण तेरे.... कौन जाने गुण तेरे....
कौन जाने गुण तेरे.... कौन जाने गुण तेरे.... कौन जाने गुण तेरे....
मेरे साहिबा कौन जाने गुण तेरे.... कौन जाने गुण तेरे....

रविवार, 1 मार्च 2009

आसक्ति मिटाने के ७ उपाय - स्वामी सुरेशानन्द जी

दिसम्बर २००८ पूनम दर्शन दिल्ली में आयोजित पूनम दर्शन सत्संग में स्वामी सुरेशानन्द जी ने आसक्ति मिटाने के ७ उपाय बताये जो कि इस प्रकार है

आसक्ति मिटाने के ७ सरल उपाय हैं

१- दृढ निश्चय कर लिया जाये कि जो गुरुजी कहेंगे वो मुझे करना ही है बस।

२- वासना पूर्ति के मार्ग में चलने वालों का हम संग नही करेंगे। चाहे कोई भी क्युं न हो, वासना पूर्ति के मार्ग में जो जा रहे है उनकी दोस्ती नही करेंगे।

३- कभी भी हम लोग ऐसा विचार नही करेंगे कि वासना पूर्ति करने वाले लोग सुखी है। बडे बंगले में रहते है , बडी कार में घूमते हैं, खाक सुखी है सुखी वो है भगवान कृष्ण ने गीता में बताया हैं काम के वेग को और क्रोध के वेग को सहन करते की शक्ति रखता है दम रखता है भगवान कहता है कि बो मेरे मत में सुखी है, "सहयोगी सहसुखी नरः" आप गीता में पढिये ५वे अध्याय में, भगवान नें यह नही कहा है कि काम विकार नही आयेगा क्रोध विकार आयेगा ही नही, लोभ कभी आयेगा ही नही, भगवान ने कहा कि काम का वेग क्रोध का वेग, इस वेग में जो बह नही जाता उसको सहन करने का दम अपने पास रखता है, भगवान श्रीकृष्ण कहते है कि वो मेरे मत में सुखी है और मेरे मत में वो योगी है।

४- अपने भोजन में पवित्रता सदैव रखी जाये। लहसुन प्याज निश्चित ही तमो गुण बढाने वाली चीजें है परन्तु कोई बुजुर्ग है किसी को शारीरिक कोई तकलीफ़ है, खाँसी की तकलीफ़ है या श्वास की बिमारी है वो अगर आदमी थोडा लहसुन, प्याज खा ले तो उसको कोई पाप नही लगेगा, घुटने का दर्द रहता है किसी को, वात प्रकोप रहता है न वायु का तो शरीर में दर्द रहता है घुटनों में कमर में तो किसी को ऐसा दर्द हो घुटनों आदि में तो वह औषधवश लहसुन खा सकता है, अंगेजी दवाई खाये इससे तो अच्छा है की वो थोडी सी हरी लहसुन खा ले, इसका मतलब से नही कि जो जवान है वो लोग सोचे कि हम भी लहसुन प्याज खाये हा शारीरिक तकलीफ़ है तो ठीक है। लोग बडे कमाल के है शरीर का नाश हो ऐसी चीज नही खाते है लेकिन बुद्धि नाश हो जाये ऐसी चीज पैसे देकर खाते हैं। इसलिये भगवत गीता के ६ठे अध्याय से १७वे श्लोक में और १७वें अध्याय से ८वे, ९वे, और १०वे श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने आहार सम्बन्धी बहुत बढिया बातें बताई है।

५- अपने जीवन में स्थान की पवित्रता रखी जाये, ऐसी जगह में न जाये जहाँ जाने से रजोगुण बढे और तमो गुण बढे। ऐसी जगह जाने में आग्रह रखें जहाँ जाने से सत्व गुण बढें, भक्ति बढें, भगवान के नाम में रुचि बढें।

६- कभी भी अपना समय बेकार की मेगजीन पढ्ने में, बेकार की टीवी सीरीयल देखने में, बेकार की बातों में न गँवाया जायें। समय मिल गया तो माला से या मन से जप शुरु कर दिया जाय। जप हो गया तो सत्संग की कोई पुस्तक पढी जाय। वो भी पढ ली तो शान्त बैठे और श्वास बाहर-भीतर जाये उस पर जप किया जाये,

७- भगवान कपिल बताते है माता देवहूति को कि माँ आसक्ति निश्चित रूप से दुखः देने वाली है परन्तु वही आसक्ति अगर भगवान और भगवत्प्राप्त गुरु में होती है तो वो तारने वाली होती हैं।

स्रोत: स्वामी सुरेशानन्द जी वीसीडी भाग ४ व ५ - पूर्णिमा दर्शन रोहिणी (दिल्ली)

शुक्रवार, 20 फ़रवरी 2009

गुरु-दक्षिणा

दुबईवासियों से पूज्य गुरुदेव ने मांगी गुरु-दक्षिणा

हम लोग अपनी संस्कृति गँवा रहे है। नही नही, यूरोप में चर्चा चली थी विद्वानों की कि हमारे देश की उन्नति और इज्जत, शान-बान कैसे बरकार रहे तो जब तक हम अपनी भाषा को पकडे रहेंगे, अपनी रीति, रस्मों-रिवाजों को पकडे रहेंगे तब तक हमें कोई नीचा दिखा सकता है और जिस दिन हम दूसरों की भाषा और दूसरों के रीति-रस्मों के गुलाम होंगे वह जाति धीरे-धीरे नष्ट हो गयी। वह जाति धीरे-धीरे गुलाम हो गई। कई ऐसे टापू है जो अभी भी अपनी भारतीय संस्कृति को संजोये हुये है। वहाँ विदेशों में पति को पति बोलती है नारी और पत्नी को धर्म-पत्नी बोलता है पति, पुत्र को पुत्र बोलता है पिता और पिता को पिताश्री बोलता है पुत्र और यहाँ पाप्पा, मम्मी, डैडी-डैडा़....... अब बदलो कुछ, जय राम जी की....... आप तो बदलोगें आपके संपर्क में आने वाले भी बदलेंगे।

मैं दुबई गया था। एक हिन्दु और एक मुसलमान दोस्त आपस में टेलीफोन में बात कर रहे हैं। मुसलमान फोन उठाता हैं तो बोलता है "वालेकम-अस-सलाम" और हिन्दु हरि ॐ नही बोलता है, राम राम नही बोलता है, जय भारत नही बोलता, जय हिन्दी नही बोलता है बोलता है "हाय.... हाय.... बाय..... बाय....." मैने दुबई के सत्संग में पूर्णाहुति के समय बोला कि दक्षिणा तो तुम से मैं लूँगा और दक्षिणा में तुमसे ये वचन लेता हूँ कि जब भी टेलीफोन करोगें बेटे या तुम तो "हरि ॐ" या "राम राम" से शुरुवात करना। हाय... बाय... छोडो, वो जब सलामालेकम नही छोडते तो तुम "हरि ॐ" या "राम-राम" क्यों छोड़तें हो भाई।

हिन्दु दोस्त के पास मुसलमान दोस्त पहुँचा है तो उसकी माँ ने कहा अरे ! मोहन ..... वो आयो थे हाफिज आया है। तो मोहन मिला हाफिज से, लेकिन मोहन जब हाफिज के घर गया तो उसकी अम्मा बोलती है कि बैठ जा इधर, मेरा बेटा कुरान पढ़ रहा है। जब जब मोहन गया अपने मित्र से पास उसकी माँ ने बैठा दिया कोने में कि मेरा बेटा मौलवी से कुरान सीख रहा है। लेकिन मुसलमान लडके को कभी किसी हिन्दु माँ ने नही बताया कि मेरा बेटा आज गीता पढ़ रहा हैं। ताली बजाने की बात नही है रोने की बात हैं। शर्म की बात हैं। जय राम जी की......

इन्सान का इतिहास उठाकर देख लो जो अपनी भाषा भूले है जो अपना रीत-रिवाज-रस्म भूले है और जो अपना धर्म-कर्म भूले है वे धीरे-धीरे-धीरे गुलाम हो गये है नष्ट से हो गये है और गुलामी के बीच भी जिन्होने अपनी संस्कृति बचाये रखी संजोये रखी भाषा और अपना उसूल तो उनमें हरियाणा में इसीलिये खुशी था कि जहाँ देखूँ गुरुओं की वाणी के माईक की आवाज आती है जय राम जी की ........ और गुरु की वाणी सुनने में, संत की वाणी सुनने में पंजाब अभी भी जिन्दादिल है जय राम जी की................

अब मै बात कर रहा था उन तीन देवियों की - दूसरी माई कहती है कि कभी-कभी वो आफिस को जाते है या दुकान जाते है तो जल्दीबाजी में पैंट पहनना भूल जाते है और मुझे कपडे लेकर जाने पड़ते है ऐसा भुल्लकड है वो तो तीसरी ने कहा ! छ्ड़ो यार ये गल, मेरा पति तो ग्जब के भुल्लकड है मैं कपडे बाजार में गई कपडे लेने बहु के लिये कपडे लेने थे तो मेरे पतिदेव आफिस से कही जल्दी छूट गये होंगे। बाजार से गुजरे तो दूर से देखा कि मै दुकान में बैठी थी देख रही थी तो खड़े हो गये मेरे नजदीक आकर, तो मैने उनको देख कर थोड़ा हँसी तो वो भी हँसे फिर मैं कपड़े देख रही थी फिर मेरे सामने देखे घूर घूर के देखे तो मेरे को हँसी आ गई मै हँसी तो वो भी हँसे फिर थोडा नजदीक आये मेरे तरफ़ देखा सिर से पैर तक मैने सोचा कि गजब का देख रहे है तो मुझे हँसी आयी तो वो भी हँसे फिर धीरे से और नजदीक आये और मेरे को बोलते है कि बहन जी ओ बहन जी मैने आपको देखा है, बहन जी मैने आपको कही देखा है मै तो दंग रह गई कि जीवन भर साथ रही और वो आज मुझको कहते है कि मुझे लगता है कि मैने आपको कही देखा है इस व्यक्ति पर आपको हँसी आयेगी और आप जिसको सुनायेंगे उसको भी हँसी आयेगी लेकिन उस पति ने उतनी गलती नही की जितनी आप लोग कर रहे हों वो तो पत्नी से २ घण्टे जुदा भी हो गया था, ४ घण्टे जुदा भी हो गया था और दूर गया तो मैने कही आपको देखा है लेकिन आप उस परमेश्वर से कभी जुदा नही हुये और अभी तक उसकी तरफ़ नजर नही जाती कि मैने कही पर तुझे देखा है सुबह तू जगाने वाला था मैने देखा है पत्नि चिल्ला रही है अलार्म बज रहा है लेकिन तू नही जगाता तो मैं नही जगता, तू नाश्ता उठाने के लिये सत्ता नही देता तो मैं नाश्ता नही कर सकता था। मैने वो भी देखा और अभी भी देख रहा हूँ कि तेरी सत्ता से धड़्कन चल रही है जो कुछ देख रहा हूँ तुझी से देख रहा हूँ। इस बात को भी हम भूल गया हूँ। जितना पति भुल्लकड़ था उससे ज्यादा तो हम भुल्लकड़ हो गये है उस व्यक्ति पर तो हमें हँसी आती है कि सुबह देखी पत्नी दोपहर को भूल गया कितना उल्लू का पट्ठा है, लेकिन हम उल्लू का पट्ठे को भी पीछे छोड दे ऐसे पट्ठे हो गये हम तो, क्या कभी सोचा कि सुबह जगाने वाले कितना भी जगाये लेकिन जब तक तू नही जगाता तब तक नही जगते हम, खिलाने वाले कितना भी खिलाये जब तक तू खाने की सत्ता नही देता तब तक खाना खराब हो गया है, समझाने वाले कितना भी समझाये लेकिन जब तक समझने की सत्ता तेरी नही तब तक समझा कुछ भी समझा नही जाता हैं। "सो साहिब सद सदा हूजुरे, अंधा जानत ताको दूरे" तो उस भुल्लकड़ पर हँसने की बजाये हमको अपने ऊपर हँसना चाहिये कि हम उससे भी ज्यादा भुल्लकड है और ऐसी भूल अब ना हो। उस भुल्लकड को याद शक्ति बढाने के लिये मैं कहुँगा कि तुलसी के पत्ते खाया करे। जय राम जी की ............. गाय के घी की मालिश किया करे मेमोरी बढाने के लिये। लेकिन तुम्हारे को इतने से ही नही तुमको तो ये कहना पड़ेगा कि तुम्हारे लिये ये ईलाज है कि हर रोज नियम से जप किया करो, और बार बार उसकी याद किया करो कि यह भूल की आदत मिट जाये। गुरुवाणी में आता है कि " भुलिया जबी आपको तभी हुआ खराब " कभी जाये केदार कभी जाये मक्के, अपना ख्याल नही तो खाये घर घर के धक्के।

स्रोत:- पूज्य गुरुदेव के सत्संग " मैने तुझे कही देखा है " में से लिये गये कुछ अमृत बिन्दु

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

भक्ति में बाधक ६ दोष - स्वामी सुरेशानन्द जी

भक्ति में बाधक ६ दोष और भक्ति में वर्धक ६ गुण

भक्ति में ६ दोष बाधक है, इनसे भक्ति में बाधा हो जाती हैं। इन ६ से बचना, आप भी बचों मैं भी बचु, तो हमारी भक्ति में खूब-खूब बरकत आयेगी।

१. अधिक आहार - अधिक खाओ नही भले ही कितना भी स्वादिष्ट हों तू जा दूसरा आओ चलो खा लो, नही-नही, स्वाद का ख्याल करके नही, स्वास्थ्य का ख्याल करके खाये, तो अधिक आहार से बचना। अधिक आहार का एक अर्थ ये भी होगा कि अधिक संग्रह, पैसा-पैसा-पैसा कितना भी इकट्ठा कर ले मरेगा तो, इसलिये मै भी भूखा न रहु साधू भी भूखा न जाय। तो अधिक आहार भक्ति में बाधक हैं।
२. भक्ति के प्रतिकूल चेष्टा - हम एक तरफ़ तो चाहते है कि इसी जन्म में हमें ईश्वर का साक्षात्कार हो जाये और एक तरफ़ हम थोडे समय तक टिकने वाले सुख की इच्छा करते हुये भटकते रहें या उसी की ईच्छा मन में करते रहें क्षणिक सुख की तो ये भक्ति में बाधक तत्व है दूसरा......

३. अपने नियम में आग्रहपूर्वक की दृढ़्ता - ये भक्ति में बाधक तीसरा तत्व हैं। जड़ होकर माला घुमा देते है। जड़ होकर पाठ कर लेते है। जड़्ता पूर्वक खाली एकादशी का व्रत किया, एकादशी का संकेत तो समझे पहले। खाली निराहार जो रहते है उनको मैनें देखा है कि एकादशी से पहले रात को खूब भारी खुराक खा लेंगे। लडडू, सुखडी, मालपुये, खीर, रबडी.... बोले कल एकादशी हैं और फिर कई लोग तो एकादशी की रात को १२:३० बजे और खा लेते है, एकादशी पूरी हो गई बोले १२:०० बज गये ना.... दूसरा दिन शुरु हो गया। तो ध्यान रहे कि अपने नियम में आग्रहपूर्वक की दृढ़्ता नही प्रेमपूर्वक की दृढ़्ता। आग्रहपूर्वक की दृढ़्ता ये भक्ति में बाधक है।

४. विषयी लोगों का संग - जिनकी भक्ति में रुचि नही है, भोगों में रुचि हैं ऐसे लोगों का संग भक्ति में बाधक हैं।

५. मन में रहा हुआ राग - किसी व्यक्ति के लिये या किसी वस्तु के लिये मन में रहा हुआ राग ये भक्ति में बाधक हैं। इससे मन चंचल हो जाता हैं। लोग कहते है कि मेरे मन की चंचलता कैसे मिटे ?.... हकीकत में मन में रहा हुआ राग मिट जाये तो चंचलता मिटाने का सवाल ही नही रहेगा। फिर आप हम बैठेंगें तो गहराई में चले जायेंगें। आपको बोलने की ईच्छा नही होगी। आँख खोलने की ईच्छा नही होगी। न बोलने की, न आँख खोलने की... शान्ति का संपादन सहज में होगा। जो साधना के शिखर हमसे अनछुये रह गये वो हम छूने लगेंगे। जिस गहराई का हमको पता नही चल पाया उसका पता चलने लगेगा और जीवन में से दुःख मिटने लगेंगे और हमारी जब विदा होगी शरीर से इस संसार से तब अस्तित्व राजी होगा, ईश्वर प्रसन्न होंगे कि आया कोई मेरा रूप, ऐसे भक्त की विदाई पर ईश्वर प्रसन्न होंगे। इन्द्रियों के देवता राजी होंगे कि धन्य है इसने अपने जीवन में इन्द्रियों के द्वारा भक्ति की। आँखों से, कानों से, सबसे जीभ से इस आदमी ने भक्ति की है।
६. प्रजल्प - प्रजल्प माने व्यर्थ की बातें बोलना, अतिश्योक्ति करते रहना। एक लडका आया भागता हुआ और बोला पिताजी मैनें आज रास्ते में २ दर्जन शेर देखें बाप ने कहा तेरा दिमाग तो खराब नही हो गया २ दर्जन शेर किसको बोलते है बोला हाँ पिताजी २ दर्जन शेर देखे, उसके पिता बोले हो नही सकते २ दर्जन शेर शहर में, तो बेटा बोला २ नही तो १ दर्जन तो होंगें ही, पिताजी बोले नही बेटे १ दर्जन शेर शहर में नही हो सकते। तो बोले पिताजी ५ तो थे, पिताजी बोले बेटे ५ शेर शहर में नही हो सकते हैं। तो वो बोला पिताजी १ तो था मुझे झूठा साबित मत करों। पिताजी बोले बेटा शहर में शेर नही होता बेटे तूने कुत्ता देखा होगा तूने, तो वो बोला हाँ कुत्ता जरूर था ... अब २ दर्जन शेर गये, १ दर्जन भी गये, ५ भी गये और १ भी गया और कुत्ते पे आ गया.... फिर बाप ने कहा कि मैनें तुझे करोडों बार कहा है कि अतिश्योक्ति मत किया कर तो मेहमान बैठे थे वो बोले आप भी तो अतिश्योक्ति कर रहे है बेटे की उम्र कितनी है वो बोले ५ साल, ५ साल बेटे की उमर है और आपने इसको करोडों बार कह दिया। १.५ साल तक तो वो बोलता ही नही, बाकी बचे ३.५ साल तो क्या ३.५ साल में तुमने इसको करोडों बार कह दिया अतिश्योक्ति तो आप भी कर रहे हो। तो कई बार प्रजल्प भी भक्ति में बाधक देता है। तो इन ६ बाधकों से बचे।

ये तो थे भक्ति के ६ बाधक अब भक्ति के ६ तत्व जो भक्ति में सहायक है भक्ति में अनुकूल ६ गुण है कौन-कौन से हैं।

उत्साहः, निश्चयात धैर्यात, तत तत कर्म प्रवृर्नात ।संग त्यागात सतो व्रते षडवीर भक्ति प्रसिद्धति ॥

१. उत्साह - भक्ति वर्धक नियमों के पालन में उत्साह, आनन्द, खुशी, जल्दी उठ्ने में उत्साह, ऐसा नही जल्दी उठने में आलस्य। उत्साह ये भक्ति वर्धक नियमों में जरूरी है। उत्साह बना रहे।
२. विश्वास - शास्त्र और गुरुदेव के वचनों में अटूट विश्वास होना चाहिये। गुरुदेव ने कहा है बस बात पूरी हो गई। शबरी ने कैसे गुरु की बात में विश्वास किया तो कैसे भगवान राम के दर्शन हो गये।
३. धैर्य - असंख्य विघ्न आने पर भी धैर्य रखें। अभीष्ट सिद्धि में विलम्ब होये तो भी धैर्य रखें कि ५ साल हो गये है मैं साधना कर रहा हूँ मेरे को कोई अभी ऊँचा अनुभव नही हुआ। ये धैर्य रखे। ५ साल हो गये साधना कर रहे है तो कमाई तो हो गई १० माला रोज जपते है वो कमाई किसकी हुई। आपकी ही तो हुई, जप करने वाले की हुई भले मन नही लगा। बिना मन लगे जप किया ये तो सुमिरण नाहि लेकिन ये तो जप नाहि ऐसा तो कही नही लिखा।

माला तो कर में फिरे, जीभ फिरे मुख माही,मनवा तो दसों दिश फिरे ये तो सुमिरण नाहि ॥

ये सुमिरण नही है पर ये तो जप नाहि ये तो किसी ग्रन्थ में नही लिखा है। जप तो हो ही गया कमाई तो हो ही गयी। ये कितना बडा़ लाभ हैं। इसलिये मेरा मन लग जाय या मेरा मन नही लगता ऐसा मत सोचों। धैर्य..... भक्ति में अनुकूल तीसरा गुण धैर्य हैं।

४. तत तत कर्म प्रवृतनात - मानें भक्ति को पोषने वाले कर्म विधि और निषेध दो प्रकार से होते हैं। एक तो सत्संग सुनना ये भक्ति वर्धक हैं। भक्ति में अनुकूल है और निषेध कि भाई संसारिक भोग सुखों का परित्याग ये निषेध, तत तत कर्म प्रवृतनात, अशुद्ध आहार ये निषेध में आया सात्विक आहार ये विधि में आया। तत तत कर्म प्रवृतनात, थियेटर में जाकर बैठे ये निषेध में आयेगा। उसमें कमी आयेगी संस्कार बिगडेगें। आँख बिगडेगी। आँखों की रोशनी खराब होना ठीक है पर दृष्टि खराब होना ये ठीक नही है। दृष्टि कमजोर होना ये तो चल जायेगा पर दृष्टि खराब होना ये नही चलेगा। दृष्टि कमजोर भले हो पर दृष्टि खराब न हो। दृष्टि में ऐसा तो अंजन लगाया जाय आँखों में कि जिस दृष्य को भी हम देखे उसे विकृत करके न देखें। हरिः हरिः हरिः हरिः हरिः ......... ॐ नमों नारायणाय ......... ॐ नमों नारायणाय ......... ॐ नमों नारायणाय ........ ये भक्ति में अनुकूल चौथा गुण है।

५. संग त्यागात - मायावादी, निर-ईश्वरवादी, ईश्वर में नही मानते है, ईश्वर प्राप्त सदगुरु में नही मानते हैं। उन मूर्खों का संग त्याग कर दें। संग त्यागात सतो व्रते, भक्तों जैसा व्यव्हार करें। सतो व्रते, एक भक्त कैसा व्यवहार करता हैं। सोचो कि मेरी जगह पर मीराबाई होती तो क्या करती, मेरी जगह पर विवेकानन्द जी होते तो क्या करते, मेरी जगह पर कबीरदास जी के शिष्य सलूका-मलूका होते तो क्या करते। क्या उनकी श्रद्धा-भक्ति कम होती, भक्तों जैसा व्यवहार करें। सतो व्रते, ये भक्ति वर्धक पाँचवा गुण हैं।

छटाँ गुण में सुन ना पाया इसलिये यहाँ पर नही लिख पाया आपसे क्षमा चाहता हूँ।

स्रोतः- स्वामी सुरेशानन्द जी सत्संग, सायन, मुम्बई वी.सी.डी भाग-१,२