मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

गुरुवार, 18 अक्टूबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 37 (मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण)


तेरहवाँ सर्ग
जीवनमुक्तिरूप फल के हेतु वैराग्य आदि गुणों का एवं शम का विशेषरूप से वर्णन।

वैराग्य, शान्ति आदि साधनों का आगे वर्णन करने वाले श्रीवसिष्ठजी इस समय प्रस्तुत जीवन्मुक्तिस्थिति का वर्णन करते हैं।
श्रीवासिष्ठजी ने कहाः हे श्रीरामजी, इस  दृष्टि का अवलम्बन कर सुबुद्धिमान् तत्त्वज्ञ महापुरुष इस संसार में ऐसे विचरते हैं, मानों उन्हें महान् साम्राज्य प्राप्त हो गया हो। वे लोग न तो अशुभ के लिए शोक करते हैं और न शुभ की कामना करते हैं अतएव वे उनके साधनें की भी याचना नहीं करते। वे सब कुछ करते भी हैं फिर भी कुछ नहीं करते। हेय और उपादेय के पक्षपात से रहित एवं अपनी आत्मा में स्थित वे असंग आत्मा के साक्षात्कार से निर्लेप रहते हैं, शास्त्रीय स्वच्छ कर्म करते हैं और सन्मार्ग में जाते हैं।।1-3।। वे अन्य लोगों की दृष्टि से आते हें और जाते हैं पर अपनी दृष्टि से न आते हैं और न जाते हैं, अन्य की दृष्टि से करते हुए एवं बोलते हुए भी अपनी दृष्टि से न करते हैं और न बोलते हैं।।4।।
क्योंकि 'सचक्षुरचक्षुरिव सकर्णोऽकर्ण इव समना अमना इव' (तत्त्वज्ञ पुरुष अन्य की दृष्टि में चक्षुयुक्त होता हुआ भी अचक्षु के सदृश है और अन्य की दृष्टि से कर्णयुक्त होता हुआ भी कर्णरहित है, अन्य की दृष्टि से मनयुक्त होता हुआ भी मन से रहित-सा है) ऐसी श्रुति है।
हेय और उपादेय से जो कोई यज्ञ-याग आदि कार्य हैं और जो कोई प्रमाण, प्रमेय आदि व्यवहार हैं, वे सब परमतत्त्व के ज्ञात होने पर क्षीण हो जाते हैं।।5।। सम्पूर्ण अभिलाषाओं से रहित शान्तिपूर्ण तथा ब्रह्माकारत्व को प्राप्त मन चन्द्रबिम्ब में बैठे हुए स्वर्गी के समान चारों ओर से सुख प्राप्त होता है।।6।। विषयों का बार-बार स्मरण करना और विषयों की प्राप्ति में कुतूहल ही विक्षेप के हेतु हैं, उनके अभाव में विक्षेपरहित सुख होता है। जैसे चन्द्रमा में अमृत नहीं समाता वैसे ही विषय मननरहित और सम्पूर्ण विषयकौतुक से शून्य सुखरूपता को प्राप्त हुआ मन आत्मा में नहीं समाता।।7।। सुखरूपता को प्राप्त हुआ मन न तो मायिक विक्षेपों करता है और न विक्षेपों की जननी वासना के प्रति दौड़ता है, किन्तु बालकों जैसी भ्रममूलक चंचलता का त्याग कर अनादिसिद्ध आत्मसुखरूप हो विराजमान होता है। इस प्रकार की स्थिति आत्मतत्त्व के साक्षात्कार से ही प्राप्त होती है, अन्य उपायों से नहीं।।8,9।। इसलिए पुरुष को जीवनपर्यन्त विचार द्वारा आत्मा का ही पुनः पुनः श्रवण और मनन करना चाहिए, आत्मा का ही निदिध्यासन करना चाहिए एवं श्रवण और मनन तथा निदिध्यासन द्वारा आत्मा का साक्षात्कार करना चाहिए, इसके सिवा पुरुष का और कुछ कर्तव्य नहीं है। जिस अधिकारी को अपने अनुभव, शास्त्रवचन और गुरु के उपदेश की एकार्तनिष्ठता का निश्चय हो, उसे नित्य निरन्तर किये गये श्रवण, मनन आदि के अभ्यास से आत्मा का साक्षात्कार होता है। शास्त्र और उसके अर्थ की अवहेलना करने वाले, तत्त्वज्ञानी पूज्य पुरुषों की उपेक्षा करने वाले मूढ़ों की तुलना को कभी प्राप्त नहो, चाहे कितने ही बड़े क्लेश क्यों न भुगतने पड़ें। पृथ्वी में मनुष्यों को ज्वर आदि शारीरिक क्लेश से, विष से, आपत्तियों से और मानसिक चिन्ताओं से वैसा क्लेश नहीं होता जैसाकि अपने शरीर में स्थित एक मूर्खता से क्लेश होता है। जिन लोगों की बुद्धि में थोड़ी बहुत भी बहुत्पत्ति हो गई है, इस शास्त्र के सुनने से जिस प्रकार उनकी मूर्खता की निवृत्ति होती है वैसे अन्य किसी शास्त्र के श्रवण से नहीं होती। यह शास्त्र अतिसुखदायी है, यथायोग्य अनेक दृष्टान्तों से इसकी सुन्दरता कहीं अधिक बढ़ गई है और किसी भी शास्त्र से यह विरूद्ध नहीं है। जिसे आत्मा का साक्षात्कार अभीष्ट है, उस नरश्रेष्ठ को अवश्य इसका श्रवण करना चाहिए।।10-15।। हे राम जी, जो दुस्तर आपत्तियाँ हैं और ज अति नीच कुत्सित योनियाँ हैं वे सब, जैसे खदिर से काँटे उत्पन्न होते हैं वैसे ही, मूर्खता से पैदा होती हैं। मिट्टी के पात्र को (सकोरे को) हाथ में लेकर चाण्डालों की टोली में भीख माँगने के लिए दर-दर घूमना अच्छा है, पर मूर्खतापूर्ण जीवन अच्छा नहीं है। निर्जन स्थान में, अति भयानक अन्धकूप में एवं पेड़ों के खोखलों में अन्धा कीड़ा होना अच्छा है, पर अतिदुःखदायी मूर्खता अच्छी नहीं है। यह संसारी पुरूष मोक्ष के उपायभूत इस शास्त्ररूप प्रकाश को पा कर फिर मोहान्धकार में भी अन्धता को प्राप्त नहीं होता। तभी तक तृष्णा मनुष्यरूपी कमल को संकुचित करती है जब तक विवेकरूपी सूर्य की निर्मल प्रभा का उदय नहीं होता। हे राघव, संसारदुःख से छुटकारा पाने के लिए मेरे सदृश आत्मीयों के साथ गुरुपदेश और शास्त्र के प्रमाण से अपने स्वरूप को जानकर जैसे इस संसार में जीवन्मुक्त हरि, हर आदि विचरण करते हैं और जैसे अन्यान्य जीवन्मुक्त महर्षि विचरण करते हैं वैसे ही आपभी विचरण कीजिए। हे रघुकुलतिलक, इस संसार में, अनन्त दुःख हैं, सुख तिनके के टुकड़े के बराबर बिल्कुल नगन्य हैं, इसलिए दुःखों से सराबोर (परिपूर्ण) सुखों में कभी भी आदर नहीं करना  चाहिए। ज्ञानवान पुरुष को पुरुषार्थ की सिद्धि के लिए जो वस्तु असीम और क्लेशलवविरहित है, उस ज्ञानरूप वस्तु को प्रयत्नपूर्वक प्राप्त करना चाहिए। हे रामजी, वे ही सज्जन परम पुरुषार्थ के भाजन हैं और वे ही पुरुष श्रेष्ठ हैं, जिनका सर्वोत्कृष्ट वस्तु में (परब्रह्म) में लीन मन परमशान्त है। जो दुरात्मा राज्य आदि सुखों में उत्तम भोगों के आस्वादमात्र से सन्तुष्ट हैं, उन्हें आप अन्धे मेढक समझिए। मेढक कुएँ में रहने से बाहर नहीं देख पाता, उसमें भी यदि अन्धा हो, तो कहाँ से देखेगा, यह भाव है। जो लोग वंचक, प्रबल दुराचियों, वैषयिक सुखों का भोग करने वाले और मित्र जैसे दिखाई देने वाले वास्तव में शत्रुओं पर आसक्त हैं, वे लोग संकट से संकट को, दुःख से दुःख को, भय से भय को और नरक से नरक को प्राप्त होते हैं। वे लोग मूर्ख हैं और अज्ञान से उनकी बुद्धि मन्द पड़ गई है। 'सुख के पश्चात दुःख होता है और दुःख के पश्चात सुख होता है, घटीयन्त्र के समान लगातार भ्रमण कर रहा पुरुष पुनः पुनः सुख और दुःख को प्राप्त होता है' इत्यादि वाक्यों से सुख और दुःख की परस्पर विनाशिता कही गई है, अतः यह संसारी पुरुष कभी विश्रान्ति को प्राप्त नहीं होता। सुख और दुःख की अवस्था बिजली की चमक के समान क्षणभंगुर है। जो लोग आपके सदृश वैराग्ययुक्त, सम्यक् विवेकी और महात्मा हैं, भोग और मोक्ष के एकमात्र भाजन व पुरुष वन्दनीय हैं। परम विवेक का अवलम्बन कर वैराग्य और अभ्यास से आपत्तिरूप यह भीषण संसार नदी पार करनी चाहिए। विष के समान तीव्र मूर्छा देने वाले इन मिथ्याभूत वंचनोपायों में नहीं सोना चाहिए। इस संसार को प्राप्त कर जो पुरुष अवहेलना से रहता है वह जल रहे तृणमय घर के विस्तार में गहरी नींद सोता है।।16-33।।
संसार के सिवा कोई अन्य स्थान ही नहीं है, फिर किसका अवलम्बन करके संसार में अरति करनी चाहिए ? ऐसी आशंका कर कहते हैं।
जिसको प्राप्त कर पुनः नहीं लौटते और जिसे प्राप्त कर फिर शोक नहीं होता, वह उत्तम पद केवल बुद्धिमात्र से प्राप्य है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है।।34।।
पुराणों में भी कहा है – असत्यस्मिन् जगन्नाथे अन्धीभूतमिदं भवेत्। सूर्पेणेव विहीनत्वान्निरालोकं जगद् यथा। (यदि जगदधिपति परमात्मा न होते, तो सूर्य से विहीन अन्धकारपूर्ण जगत् के समान यह सब प्रपंच अन्धकारमय हो जाता।) श्रुति भी है – असन्नेव स भवति' (वह असत् ही हो जाता है जो ब्रह्म को असत् जानता है जो ब्रह्म है यों ब्रह्म की सत्ता को जानता है, उसे सत् कहते हैं।) सन्दिग्धे परलोकेऽपि वरं श्रुतिपथाश्रयः। यदि न स्यात् तदा किं स्याद्यदि स्यान्नास्तिको हतः।। (परलोक के सन्देहास्पद होने पर भी श्रुतिप्रतिपादित मार्ग का अवलम्बन करना उत्तम है, यदि परलोक न हो, तो उत्तम कर्म करने से अपना क्या बिगड़ा, यदि हो, तो नास्तिक के मुँह में थप्पड़ लगा।) इस न्याय से सन्देह करने वाले के प्रति कहते हैं।
यदि थोड़ी देर के लिए मान भी लिया कि ब्रह्म नहीं है तो भी उसके विचार से आपका कौन दोष होगा, यदि है, तो उसके विचार से आप संसारसागर को पार कर जायेंगे।।35।।
ऐसी अवस्था में सभी लोग मोक्ष के लिए प्रवृत्त क्यों नहीं होते, ऐसी शंका कर 'यावन्नाऽनुग्रहः साक्षाज्जायते परमेशितुः। तावन्न सदगुरूं कश्चित् सच्छास्त्रं वाऽपि विन्दति।।' (जब तक साक्षात् परमेश्वर की असीम अनुकम्पा नहीं होती तब तक वह सदगुरू या सतशास्त्र को नहीं पाता) इत्यादि वचन से ईश्वर के अनुग्रह से प्राप्त होने वाली मोक्षभाजनता से शोभित महान लोगों की ही प्रवृत्ति मोक्षसाधन में होती है, सबकी नहीं, ऐसा कहते हैं।
इस लोक में जब पुरुष की मोक्ष के उपाय के विचार में प्रवृत्ति होती है तब वह शीघ्र मोक्षभागी कहा जाता है। प्रवृत्ति का फल मोक्षाभागिता प्रवृत्तिरूप लिंग से अनुमेय है, यह भाव है।।36।।
देह, इन्द्रिय और विषय से शून्य केवलीभाव (अद्वैतभाव) में हेतु इस शास्त्र से क्या प्रयोजन है, देह आदि के रहने पर ही दूसरे उपायों से भी स्वर्गादिसुख हो सकता है, ऐसी शंका कर कहते हैं।
विनाशरहित, किसी प्रकार की अशुभ आशंका से रहित, स्वस्थतायुक्त एवं विशिष्ट भ्रम से रहित सुख केवलीभाव के बिना तीनों भुवनों में कहीं नहीं है। स्वर्ग आदि विनाशी है, उनमें पतन की शंका सदा बनी रहती है और दूसरे के उत्कर्ष में चित्त अस्वस्थ भी बना रहता है, इसलिए केवली भाव ही पुरुषार्थ है। प्रवृत्ति होने पर केवलीभाव की प्राप्ति होती है। केवलीभाव की प्राप्ति होने पर क्लेश नहीं होता। न धनसम्पत्ति उपकार करती है, न मित्र उपकार करते हैं और न बन्धुबान्धव ही उपकार करते हैं। न प्रणाम आदि, न तीर्थयात्रा आदि, न उपवास, तीर्थवास उपकार करते हैं, केवल एकमात्र श्रवण, मनन तथा निदिध्यासनरूप पुरुषप्रयत्न से एवं द्वैतवासनाविरोधी ब्रह्माकार दृढ़वासना के तुल्य विषयवाले कर्म से साध्य साक्षात्कार से हुए केवल मनोमात्ररूप द्वैत के मूलोच्छेदरूप जय से वह पद प्राप्त किया जाता है। देह, इन्द्रिय आदि से आत्मा का पृथक्करणरूप विवेकमात्र से प्राप्त होने वाला एवं श्रवण, मनन, निदिध्यासन से असम्भावनादिका निराकरणरूप विचार और एकाग्रता से निश्चय करने के योग्य वह उत्तम पद विषयों का त्याग कर रहे पुरुष द्वारा प्राप्त किया जाता है। सुखसेव्य आसन पर बैठे हुए और स्वयं उसका विचार कर रहे पुरुष को उक्त पद प्राप्त करके न तो शोक होता है और न फिर वह उत्पन्न ही होता है। उसको विद्वान लोग संसार में साररूप से प्रसिद्ध सुखों के आसारों का (वेगवती वृष्टियों का) मेघरूप परम अवधि कहते हैं और ध्यान करने वालों में जिससे अत्युत्तम आनन्द रस का आविर्भाव होता है। -ऐसा परम रसायन कहते हैं।।37-43।। स्वर्ग और मनुष्यलोक में सम्पूर्ण भावों के विनाशशील होने से जैसे मृगतृष्णा में जल नहीं होता, वैसे इन दोनों में सुख है ही नहीं। इसलिए शान्ति और सन्तोष का एकमात्र साधन मन के विजय का विचार करना चाहिए। उससे परमात्मा में एकरसतारूप आनन्द प्राप्त होता है। राक्षस, दानव, देवता या मनुष्य को बैठते, चलते, गिरते, घूमते मन के विजय से उत्पन्न तथा प्रफुल्ल (विकसित) शमरूपी (शान्तिरूपी) पुष्पों से युक्त विवेकरूपी उत्कृष्ट वृक्ष का (कल्पवृक्ष का) फल (परम सुख) प्राप्त करना चाहिए।।44-47।।
उक्त सुख के प्राप्त होने पर भी फिर व्यवहार में प्रसक्ति होने पर वह नष्ट हो जायेगा, इस शंका पर कहते हैं।
व्यवहार में संलग्न होने पर  भी कार्यजन्य फल को न प्राप्त हो रहे पुरुष द्वारा आकाशस्थित सूर्य के समान परिपूर्ण होने पर भी हेय न होने के कारण उक्त परम सुख न तो छोड़ा जाता है और परिपूर्ण होने के कारण न चाहा जाता है अर्थात् जैसे आकाशस्थित सूर्य द्वारा परिपूर्ण होने पर भी कल्पवृक्ष का फल हेय न होने के कारण नहीं छोड़ा जाता और परिपूर्ण होने के कारण वे उसकी अभिलाषा भी नहीं करते, वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिए।।48।।
मन के रहने पर चाह क्यों न होगी ? इस पर कहते हैं।
प्रशान्त, अतिनिर्मल, विश्रान्ति-सुख से पूर्ण, भ्रमरहित, स्पृहारहित और अभीष्टशून्य मन न तो किसी वस्तु की अभिलाषा करता है और न किसी का त्याग करता है। श्रीरामजी, पूर्व में उक्त भी इस समय विस्तारपूर्वक कहे जा रहे मोक्ष के द्वार पर स्थित इन द्वारपालों को क्रमशः सुनिये, उनमें से एक पर भी आसक्ति होने से मोक्ष के द्वार में प्रवेश प्राप्त हो जाता है।।49-50।।
सर्ग की समाप्ति तक शम का वर्णन करने के लिए भूमिका बाँधते हैं।
सुख की आशारूप तृषाताप के तुल्य दोषदशा से दीर्घ संसाररूपी मरूमण्डली शम से चन्द्रमा की प्रभा के समान शीतलता को प्राप्त होती है। शम से कल्याण प्राप्त होता है, शम परम पद है, शम शिव है, शम भ्रान्ति का निरास है। शम से तृप्त, शीतल और निर्मल आत्मावाले एवं शम से जिसका चित्त विभूषित है, उसका शत्रु भी मित्र बन जाता है, शमरूपी चन्द्रमा जिनका आशय अलंकृत है, क्षीरसागरों की नाईं उनमें परमशुद्धता उत्पन्न होती है अर्थात् जैसे क्षीरसागरों में अतिशुभ्रता विराजमान रहती है वैसे ही उनमें शुद्धता का साम्राज्य रहता है। जिन सज्जनों के हृदय रूपी कमलकोषों में शमरूपी कमल विकसित है, दो हृदयकमल वाले वे लोग भगवान श्रीविष्णु के तुल्य हैं। भाव यह कि विष्णु भगवान का हृदयकमल ही बाहर ब्रह्मा का आसन है, अतः वह दो प्रकार का है। जिनके कलंकरहित मुखचन्द्र में शम श्री शोभित होती है, अपने सौन्दर्यरूप गुणों से जिन्होंने अन्य लोगों के नेत्र, मन आदि इन्द्रियाँ अपने वश में कर ली हैं, वे कुलीनशिरोमणि हैं और वन्दनीय हैं। तीनों लोकों के मध्य में स्थित राज्यलक्ष्मी वैसे आनन्द के लिए नहीं होती जैसे कि (केवल आकार से ही) साम्राज्यसम्पत्ति के सदृश (न कि अन्य गुणों से) शम-सम्पत्ति आनन्द के लिए होती है। जो विविध दुःख हैं, दुःसह तृष्णाएँ हैं और दुष्ट मानसिक चिन्ताएँ हैं, वे सब शान्तचित्तवाले पुरुषों में इस प्रकार नाश को प्राप्त होते हैं, जैसे कि अनेक सूर्यों के प्रकाश में अन्धकार विनष्ट हो जाता है। शान्त (शमवान) पुरुष के दर्शन से सब प्राणियों का मन जैसी कौतुकपूर्ण प्रसन्नता को प्राप्त होता है, चन्द्रमा के दर्शन से वैसी प्रसन्नता प्राप्त नहीं होती। शान्तियुक्त और सब प्राणियों में प्रेम करने वाले सज्जनतम पुरुष में परम तत्त्व स्वयं ही (अनायास) प्रसन्नता को (निर्मलता को) प्राप्त होता है। हे रामजी, जैसे प्राणियों का अपनी माता पर विश्वास होता, वैसे ही क्रूर, कुटिल और मृदु सब प्राणियों का शमवान पुरुष पर विश्वास होता है। पुरुष को इन्द्रपद प्राप्त होने पर अमृत के पान से और भगवान विष्णु का पद प्राप्त होने पर लक्ष्मी के आलिंगन से वैसा सुख प्राप्त नहीं हो सकता, जैसा कि शम से अन्तःकरण में सुख प्राप्त होता है।।59-62।।
हे रामचन्द्रजी, सम्पूर्ण आधि और व्याधियों से ग्रस्त और तृष्णारूपी रस्सी से आक्रान्त मन को शमरूपी अमृत के सेकों से प्रकृतिस्थ कीजिए। शम से शीतल बुद्धि से जो कुछ कार्य करते हो, जो कुछ भोजन करते हो वह मन को अत्यन्त स्वादु लगता है। उक्त बुद्धि से भिन्न बुद्धि से जो कुछ कर्म किया जाता है एवं भोजन किया जाता है, वह स्वादु नहीं लगता है। हे रामचन्द्रजी, शमरूपी अमृतरस से आप्लावित मन ऐसे आनन्द को प्राप्त होता है कि उससे कटे हुए अंग भी उग जाते हैं, ऐसा मेरा निश्चय है। शमवान पुरुष का न पिशाच, न राक्षस, न दैत्य,  न शत्रु, न बाघ और साँप कोई भी द्वेष नहीं करते। जैसे बाण हीरे को नहीं छेद सकते, वैसे ही उत्कृष्ट शमरूपी अमृतकवच से जिसके सम्पूर्ण अंग-प्रत्यंग सुरक्षित है, उसे सम्पूर्ण दुःख पीड़ित नहीं कर सकते। अपने राजमहल में विराजमान राजा को भी वह शोभा प्राप्त नहीं हो सकती, जो शोभा स्वच्छ और शम से शोभायमान समबुद्धि से युक्त पुरुष को प्राप्त होती है। शान्त अन्तःकरण वाले पुरुष का दर्शन कर मनुष्य को जो अलौकिक आनन्द होता है, वह आनन्द अपने प्राणों से भी प्रियतरजन को देखकर नहीं होता। इस संसार में जो महात्मा शम से शोभित एवं सब लोगों द्वारा प्रशंसित समवृत्ति से सबके साथ सुन्दर बर्ताव करता है, उसी का जीवन सार्थक है, दूसरे का नहीं। शम से परिपूर्ण तथा उद्धतताशून्य मन वाला साधु पुरुष जो कुछ भी कर्म करता है, ये सम्पूर्ण प्राणी उसके उस कर्म की प्रशंसा करते हैं। जो पुरुष प्रिय और अप्रिय को सुनकर, छूकर, देखकर, खाकर और सूँघकर क्रमशः न तो प्रसन्न होता है और न खिन्न होता है, वह शान्त कहा जाता है। जो पुरुष प्रयत्न से इन्द्रियों को जीतकर सब प्राणियों में समान बर्ताव करता है और सुख आदि की न तो इच्छा करता है और न प्राप्त प्रारब्ध का त्याग करता है, वह शान्त कहा जाता। दूसरे लोगों की कुटिलता को जानकर भी जिसमें बाहर-भीतर एक सी निर्मल बुद्धि से मोक्ष के उपायरूप कर्तव्य कार्य देखे जाते हैं, वह शान्त कहा जाता है। चन्द्रबिम्ब के समान कान्तिवाला जिसका मन मृत्यु, उत्सव और युद्ध में क्रमशः भय, अनुराग और क्रोध से सन्तापरहित रहता है, वह शान्त कहा जाता है। हर्ष और कोप से निमित्तवाले प्रदेशों में स्थित बी जो पुरुष वहाँ स्थित न हुए के तुल्य न हर्ष को प्राप्त होता है और न कोप करता है, किन्तु सुषुप्त पुरुष के समान स्वस्थ रहता है, वह पुरुष शान्त कहा जाता है। जिसकी अमृत के झरने के समान सुखप्रद और प्रसन्न दृष्टि सब जन्तुओं के ऊपर पड़ती है, वह शान्त कहलाता है। अतिशीतल अन्तःकरण वाला जो पुरुष व्यवहार करता हुआ भी सांसारिक विषयों में आसक्त नहीं होता और मूढ़ नहीं है, वह शान्त कहा जाता है। बड़ी-से-बड़ी आपत्तियों में भी दीर्घ कालतक रहने वाले बड़े-बड़े प्रलय में भी जिसकी नश्वर देह आदि में अहंबुद्धि नहीं होती, वह पुरुष शान्त कहा जाता है। व्यवहार करते हुए भी जिस पुरुष की ब्रह्म के समान समरस या आकाश के समान विकार को प्राप्त न होने वाली बुद्धि राग द्वेष आदि के सम्पर्क को प्राप्त नहीं होती, वह पुरुष शान्त कहा जाता है।।63-80।।
लोक में सम्पूर्ण गुणों में शम सर्वाधिक श्रेष्ठता से प्रसिद्ध है, ऐसा कहते हैं।
तपस्वियों में, विद्वानों में, यज्ञकर्ताओं में, राजाओं में, बलवान पुरुषों में एवं अन्यान्य प्रचुर गुणों से विभूषित लोगों में शमयुक्त (शान्त) पुरुष ही अधिक शोभित होता है। जैसे चन्द्रमा से चाँदनी उदित होती है वैसे ही जिन गुणशाली सज्जनों का चित्त शमपूर्ण है, उनके हृदय से आनन्द का स्रोत उदभूत होता है। सम्पूर्ण गुणों की अवधि (सीमा), पुरुषों का मुख्य भूषण एवं सम्पूर्ण गुणों की सम्पत्ति से युक्त शम संकटों में और भयपूर्ण स्थानों में भी विराजमान रहता है – संकट और भय से पुरुष को मुक्त कर देता है। हे रघुनन्दन, दूसरों के द्वारा न चुराया जा सकने वाला तथा पूज्यजनों द्वारा बड़ी सावधानता से सुरक्षित परम साधनभूत शमरूपी  अमृत के अवलम्बन से अनेक महानुभाव जिस क्रम से परम पद को प्राप्त हुए हैं, आप भी सिद्धि के लिए उसी क्रम का अवलम्बन कीजिए।।81-84।।
तेरहवाँ सर्ग समाप्त
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मंगलवार, 16 अक्टूबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 36 (मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण)


बारहवाँ सर्ग
संसारप्राप्ति की अनर्थरूपता, ज्ञान का उत्तम माहात्म्य और राम में प्रश्नकर्ता के गुणों की अधिकता का वर्णन।

अन्य लोगों के प्रति भी विवेक वैराग्य की अभिवृद्धि के लिए संसारप्राप्ति की अनर्थरूपता और ज्ञान के माहात्म्य को कहने के इच्छुक श्रीवसिष्ठजी श्रीरामचन्द्रजी को प्रवृत्त करने के लिए आप में केवल विकासयुक्त बुद्धि ही नहीं है, किन्तु और भी अनेक गुण हैं तथा प्रश्नकर्ता के सम्पूर्ण लक्षण आप में घटते हैं, इस प्रकार प्रशंसा द्वारा प्रोत्साहित करते हुए बोलेः
हे रघुकुलकमलदिवाकर, आपका मन पूर्वोक्त गुणों से परिपूर्ण है और आप हमारे सामान्य हैं तथा आप प्रश्न करना जानते हैं, साधारणरूप से उक्त बात को भी विशेषरूप से आप जानते हैं, इसलिए मैं आदरपूर्वक आपको उपदेश देने के लिए उद्यत हुआ हूँ। रजोगुण और तमोगुण से रहित (रजोगुण से बुद्धि में चंचलता आती है और तमोगुण से आवरण होता है, इसलिये उक्त दोनों गुणों से शून्य होना आवश्यक है), इसलिए शुद्ध सत्त्वगुणवाले परमात्मा की ओर प्रवृत्त होने वाली बुद्धि को आत्मा में स्थापित कर अर्थात् स्वस्थ कर सुनने के लिए प्रवृत्त होइये। हे रामचन्द्रजी, जैसे समुद्र में रत्नसम्पत्ति (रत्नों से परिपूर्ण लक्ष्मी) रहती है वैसे ही प्रश्नकर्त्ता के सभी गुण आपमें विद्यमान हैं और वक्ता के (उपदेशक के) गुण मुझमें विद्यमान हैं।।1-3।। हे वत्स, जैसे चन्द्रमा के किरणों के संसर्ग से चन्द्रकान्त मणि आर्द्रता को प्राप्त होती है, वैसे ही विवेक के संसर्ग से उत्पन्न वैराग्य को आप प्राप्त हुए हैं। जैसे कमल का चारों और फैले हुए एवं कभी नष्ट न होने वाले दीर्घ तन्तुओं और सुगन्ध आदि से सम्बन्ध रहता है वैसे ही बाल्यावस्था से लेकर ही चिरकाल से शुद्ध आपका सब दिशाओं में फैले हुए एवं अविच्छिन्न शुद्ध सदगुणों से सम्बन्ध है। इसलिए हे राघव, सुनिये, मैं आपसे यह मोक्षकथा कहूँगा, क्योंकि आप ही इस कथा के योग्य पात्र हैं अर्थात् श्रवणजनित प्रकृष्ट बोध के आधार हैं। शुद्ध (शुभ्र) कुमुदिनी चन्द्रमा के बिना विकासयुक्त नहीं हो सकती अर्थात् जैसे शुद्ध कुमुदिनी चन्द्रमा में ही (चन्द्रमा के उदित होने पर ही) विकसित होती है वैसे ही यह मोक्षकथा आप में ही विकास को प्राप्त होती है।।4-6।।
इस कथा श्रवणरूप कार्य की अवधि कौन है ? ऐसी आशंका होने पर परम पदसाक्षात्कार रूप विश्रान्ति ही उसकी विश्रान्ति है, इस अभिप्रायः से कहते हैं।
जो कोई कार्य हैं और जो कोई प्रमाण, प्रमेय आदि व्यवहार हैं, वे सब कार्य और वे सब व्यवहार परब्रह्म परमात्मा के दर्शन होने पर सर्वथा शान्त हो जाते हैं।।7।।
उक्त विश्रान्ति में अविश्वास का निराकरण करते हैं।
यदि विशुद्ध चित्तवाले पुरुष को विज्ञानरूप विश्रान्ति प्राप्त न हो, तो कौन विवेकशील पुरुष इस संसार में अनेक चिन्ताओं को सहेगा अर्थात् उनका सहन न हो सकने से आपकी नाईं देहत्याग के लिए उद्यत हो जायेगा। केवल बाह्य व्यवहार ही शान्त नहीं होते, किन्तु मानसिक व्यवहार भी शान्त हो जाते हैं। जैसे हिरण्यगर्भ की आयु की समाप्ति को प्राप्त होकर हिमालय आदि कुलपर्वतों की बड़ी-बड़ी चट्टानें कल्पान्त के सूर्यों के संसर्ग से चूर्ण-चूर्ण हो जाती हैं वैसे ही परमात्मा का साक्षात्कार होन पर सम्पूर्ण मानसिक प्रवृत्तियाँ लीन हो जाती हैं।।8।।
भगवती श्रुति भी कहती है - 'भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंश्याः। क्षीयन्ते चाऽस्य कर्माणि तस्मिन दृष्टे परावरे।।' (परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार होने पर हृदय की ग्रन्थियाँ (काम आदि) टूट जाती हैं, सम्पूर्ण सन्देहें की निवृत्ति हो जाती है और सब कर्म क्षीण हो जाते हैं।)
हे श्रीरामचन्द्रजी, संसाररूपी विष के आवेश से हुई विषूचिका (हैजा) बड़ी कष्टदायिनी है, वह पवित्रतम जीव और ब्रह्म के ऐक्यज्ञानरूपी गारूड़मन्त्र से शान्त होती है। विषभक्षण से भी विषूचिका होती है और वह विषसंशोधन से शान्त हो जाती है। उक्त मन्त्ररूपी परमार्थज्ञान (जीवब्रह्मैक्यज्ञान) संतों के साथ शास्त्रचिन्तन करने से प्राप्त होता है, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है। इस अधिकारी जन्म में विचार करने पर अवश्य ही सम्पूर्ण दुःखों का विनाश होता है, ऐसा समझना चाहिए, इसलिए विचारवान लोगों को अनादर दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। जैसे साँप अपनी जीर्ण त्वचा का परित्याग कर सन्तापरहित और शान्त हो जाता है वैसे ही विचारवान पुरुष मानसिक व्यथाओं की पेटी के समान इस सम्पूर्ण जगत् का त्याग कर सन्तापरहित और शान्तहृदय हो जाता है। सम्यगदर्शनवान् पुरुष इस सम्पूर्ण जगत् को विनोद से इन्द्रजाल की नाईं देखता है, जिसे सम्यक ज्ञान नहीं हुआ है, उसी के लिए यह जगत् परम दुःखदायी है। यह संसारानुराग अत्यन्त विषम (क्लेशदायक) है। यह निःशंक ही संसार में आये हुए पुरुषों को साँप के समान डँसता है, तलवार के समान काटता है, भाले के समान बेधता है, रस्सी के समान जकड़ देता है – हाथ-पैर बाँध देता है, अग्नि के समान जलाता है, रात्रि के समान अन्धा बना डालता है, सिर पर गिरे हुए पत्थर के समान मूर्छित कर देता है, विचारदृष्टि को हर लेता है, मर्यादा को नष्ट कर डालता है, पुरुष को मोहरूप अन्धकूप में गिरा देता है, इस संसार में तृष्णा मनुष्य को जर्जर कर डालती है अर्थात् जैसे रस निकालने के लिए सोम रगड़कर निचोड़ा जातात है वैसे ही मनुष्यों के अंग-प्रत्यंग को शिथिल कर डालती है। बहुत क्या कहें, ऐसा कोई दुःख नहीं है, जो संसारी पुरुष को प्राप्त न हो।।7-14।। मल-मूत्र आदि के नगररूप शरीरों में (पुत्र, कलत्र आदि पोष्य जनों में) पुरुष को अनुराग से बाँधने वाली यह विषयविषूचिका दुरुच्छेद्य (अकाट्य) है। यदि इसकी चिकित्सा न की जाय, तो आगे कही जाने वाली हजारों नारकीय दुर्गतियों को प्राप्त कराती है। जहाँ जीवों को पत्थर खाने पड़ते हैं, तलवारों से उनके टुकड़े-टुकड़े किये जाते हैं, बर्फ से सदा तर रक्खे जाते हैं, अंग-प्रत्यंग कुल्हाड़े, कैंची आदि से काटे जाते हैं, चन्दन की नाईं पत्थरों पर घिसे जाते हैं, तलवार के समान तीक्षण पत्तेवाले वृक्षों के वन में दौड़ना पड़ता है, घुनों का सा व्यवहार होता है अर्थात् सर्वांग में काठ के यन्त्रों से पीड़ा पहुँचाई जाती है, तपाई गई लोहे की बड़ी-बड़ी जंजीरें से शरीर को लपेटा जाता है, काँटेदार झाड़ुओं से शरीर बुहारा जाता है (त्वचा रहित किया जाता है), जिनसे सदा आग की लपटें निकलती रहती हैं, ऐसे युद्ध में छोड़े गये बाणों की धारावाहिक दृष्टि होती है, छाया और पानी के बिना ग्रीष्मकाल बिताना पड़ता है, अतिशीत धारागृहों में लगातार झरनों की दृष्टि होती है, पहले काटे गये सिर के पुनः उगने पर फिर-फिर उसका काटना होता है, सुखपूर्वक नींद की तो वहाँ बात भी नहीं होती, मुँह को ढककर श्वास प्रश्वास रोक दिया जाता है, अंगों की निम्नता और उन्नतता से विसंष्ठुल (विषम अवयव) होने के कारण व्यवहार की अयोग्यता होती है, यह सब महासम्पत्ति की अभिवृद्धि के समान सहना पड़ता है(▌)।।15,16।।
▌ इस श्लोक का दूसरा अर्थ टीकाकारों ने यों किया है – पत्थर खाना, तलवार द्वारा अंगछेदन, पर्वत के शिखर से निपातन और पत्थरें की मान को हिमसेक की नाईं सहन करना पड़ता है, कुल्हाड़े और कैंची द्वारा हाथ, पैर आदि अंगें का कर्तन चन्दनलेप की भाँति सहना पड़ता है, असिपत्रवाले वृक्षों के वन में दौड़ना, घुन के समान काठ के यन्त्र में जकड़ा जाना तथा लोहे की गर्म जंजीरों से शरीर को लपेटना देहसंस्कार की नाईं सहना पड़ता है, अग्नि की ज्वाला को बरसा रहे भयानक बाणों की लगातार दृष्टि ग्रीष्मकाल में विनोद के लिए बनाये गये धारा-गृहों की वृष्टि के समान सहनी पड़ती है, शिर के कटने से हुई मृत्यु निद्रासुख के समान सहनी पड़ती है, मुँह बन्द करने से बलपूर्वक किया गया मूकीभाव स्वाभाविक मूकमुद्रा के समान सहना पड़ता है एवं अंगों की छोटाई-बड़ाई से उत्पन्न अकिंचित्करता महती सम्पत्ति की वृद्धि के समान सहनी पड़ती है।
दुःख देने के स्थान तो अनन्त हैं, उनकी तो गणना ही नहीं कही जा सकती, यह तो केवल दिङमात्र का प्रदर्शन है, यो दर्शाकर उसका उपसंहार करते हुए प्रकृत में उनके वर्णन की उपयोगिता कहते हैं।
हे राघव, नश्वर देहों, परतन्त्रापूर्ण एवं इस प्रकार की हजारों कष्टप्रद चेष्टाओं से अतीव क्लेशकारक इस संसार में अवहेलना (अनादर) नहीं करना चाहिए, आगे कही जाने वाली रीति से विचार करना चाहिए और वक्ष्यमाण रीति से ही निश्चय करना चाहिए कि शास्त्र के विचार से कल्याण होता है।।17।।
शास्त्र के विचार से कल्याण होता है, यह निश्चय कैसे हो? क्योंकि शास्त्रविचार में परायण माण्डव्य आदि की भी हजारों दुर्दशाएँ देखी गई हैं, इस शंका का परिहार करते हुए विद्या की दृष्टफलता का प्रतिपादन करते हैं।
हे रघुकुलनन्दन, ज्ञानरूपी कवच से गुप्त शरीरवाले अतएव दुःख के सर्वथा अयोग्य भी ये ध्यानपरायण महामुनि, मन्त्रजपनिरत ऋषि, यज्ञ-याग आदि करने वाले ब्राह्मण एवं जनक आदि राजा अज्ञानियों के समान मनोवृत्ति से होने वाली पूर्वोक्त अनेक प्रकार की संसारपीड़ा का अनुभव करते हुए रहते हैं, ऐसा यदि तुम्हारा ख्याल है, तो वे कैसे सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं ?।।18।।
उनकी स्थिति कैसी है ?
इस लोक में कौतुकरहित (कौतुक से विषय के दर्शन और उपभोग में उत्साह से – शून्य), विविध विकल्पों से होने वाले चित्तविक्षेपों से भी रहित, आत्मरूपी दीपक जिन्हें प्राप्त हो गया है, अतएव विशुद्ध बुद्धि वाले नरश्रेष्ठ जगत में इस प्रकार पूर्णकामरूप से स्थित हैं, जिस प्रकार कि हरि, हर और ब्रह्मा आदि देवता स्थित हैं।।19।। गुरु आदि के साथ विचार कर पदार्थ का परिशोधन होने पर पहले स्थूल आदि शरीरों में तादात्म्याध्यास से जो आत्मसादृश्य था, वह जिसका निवृत्त हो गया है, उस अधिकारी पुरुष को 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों के अर्थ के विचार से तत्त्व के ज्ञात होने पर, मनन द्वारा असंभावना और विपरीत भावनाशून्य बुद्धि से ब्रह्म का साक्षात्कार होने पर मोह के नष्ट होने एवं अति निविड़ भ्रम ज्ञान के विलीन होने पर यह जगत् का भ्रमण मनोविनोद (आनन्दसाधन) ही है, दुःखकारी नहीं है।।20।। हे रामचन्द्रजी, और भी सुनिये, चैतन्यमात्रस्वभाव परमार्थ वस्तु के प्रसन्न होने और हृदय में उत्कृष्ट शान्ति का आविर्भाव होने पर सम्पूर्ण बुद्धिवृत्तियों के शान्तिरसास्वादरूप होने पर अन्तःकरण ब्रह्मरसास्वादपूर्वक विषमतारहित स्वभाव को प्राप्त होता है। तब बुद्धि से तत्त्व का साक्षात्कार होने पर यह जगत् का भ्रमण आनन्दमय हो जाता है, अतः जो आनन्दसाधनता कही, वह ठीक ही है। कटे हुए वृक्ष के समान जड़ शरीर रथ है, इन्द्रियों की विषयाभिमुख प्रवृत्ति घोड़ों की गतिचातुरी है, जिससे घोड़ों का इधर उधर परिचालन किया जाता है अर्थात् लगाम प्राणप्रधान मन है ऐसे रथ आदि के प्रापण से जिसे आनन्दरूप विषयप्राप्त होते हें वह देही (आत्मा) समाधि में परमात्मा ही है। व्यवहारकाल में बुद्धि आदि के परिच्छेद से भले ही रथी सूक्ष्म हो। तत्त्व का साक्षात्कार होने पर इस प्रकार का शुद्ध, बुद्ध, आनन्दघन में विहार कर रहा हूँ, यों विशुद्ध दृष्टि से जगत् का भ्रमण रमण ही है – क्लेशकर नहीं है।।21,22।।
बारहवाँ सर्ग समाप्त
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सोमवार, 15 अक्टूबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 35 (मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण)


ग्यारहवाँ सर्ग
ज्ञानप्राप्ति का विस्तार, श्रीरामचन्द्रजी के वैराग्य की स्तुति और वक्ता तथा प्रश्नकर्ता के लक्षण आदि का प्रधानतः वर्णन।

श्रीवसिष्ठजी ने कहाः हे पुण्यचरित, ज्ञान का पृथिवी पर अवतरण, अपने जन्म, ज्ञानावरोध, पुनः ज्ञानप्राप्ति आदि और श्री ब्रह्माजी का कार्य यह सब मैं आपसे कह चुका हूँ। अब आपका चित्त महान् पुण्य के उदय से उस ज्ञान के सुनने के लिए अति उत्कण्ठित हो रहा होगा।।1,2।।
उक्त पुण्यपरिपाक की किन लक्षणों से पहचान करनी चाहिए एवं उस लक्ष्यभूत पदार्थ के उपदेश की प्रणालियाँ कैसी हैं? इस बात को प्राचीन कथा के विस्तार के श्रवण द्वारा जानने के इच्छुक श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः
ब्रह्मन्, सृष्टि करने के अनन्तर भगवान् ब्रह्मजी की बुद्धि इस लोक में ज्ञान के अवतारण के लिए किस प्रकार हुई ? कृपया उस प्रकार को विस्तार से कहिए।।3।। श्रीवसिष्ठजी ने कहाः राजकुमार, जैसे सागर में तरंग बार बार उत्पन्न होती है वैसे ही प्रचुर क्रियाशक्ति से सम्पन्न ब्रह्मा अपने पूर्वजन्म की विद्या, कर्म और वासनाओं के प्रकर्ष से परम ब्रह्म में उत्पन्न हुए। उन्होंने विविध प्राणियों की सृष्टि करने के अनन्तर सृष्ट लोगों को इस प्रकार जन्म, मरण, नरकक आदि से अपने अज्ञान के कारण दुःखी देखकर वर्तमान सृष्टि के दृष्टान्त से अतीत, वर्तमान और भविष्यकाल की सृष्टि की सम्पूर्ण अवस्थाओं का अनुमान कर लिया। विशेषरूप से स्वर्ग और मोक्ष के साधनों के अनुष्ठान के योग्य सत्ययुग आदि समय के क्षीण होने पर लोगों में सिक्का जमाने वाले अज्ञान का प्राबल्य देखकर भगवान ब्रह्माजी को बड़ी दया आई। तदुपरान्त भगवान ब्रह्माजी ने मेरी सृष्टि कर और बार बार उपदेश द्वारा मुझे ज्ञानसम्पन्न बनाकर लोगों के अज्ञान की शान्ति के लिए मुझे पृथिवी में भेजा। भगवान ब्रह्मा ने इस लोक में जैसे मुझे भेजा वैसे ही सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, नारद आदि अनेक अन्यान्य महर्षियों को अधिकार के अनुसार पुण्य कर्मकाण्ड के उपदेश और ज्ञानकाण्ड के उपदेश द्वारा मन और अज्ञान रूपी महाव्याधि के वशीभूत लोगों का उद्धार करने के लिए भेजा। प्राचीन काल में सत्ययुग के बीतने पर कालक्रम से पृथ्वी पर वैदिक या राग, लोभ आदि से अनुपहत कर्मकाण्ड का ह्रास होने पर कर्मकाण्ड के संचालन और मर्यादा के रक्षण के लिए पृथक पृथक देशों का विभाग कर राजाओं की कल्पना की गई। पृथवी में राजाओं की कल्पना होने पर राजाओं और प्रजाओं के धर्म का नियन्त्रण करने में समर्थ स्मृतिशास्त्र और यज्ञ की विधि के प्रतिपादक श्रोतसूत्र और गृह्यसूत्र तथा श्रौतगृह्यप्रयोगों का धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि के लिए निर्माण किया गया। इस कालचक्र के परिवर्तित होने पर फिर कर्मकाण्डक्रम नष्टभ्रष्ट हो गया, प्रतिदिन लोग भोजनमात्रपरायण और विषयों के अर्जन में तत्पर हो गये। ऐसी अवस्था में राजाओं के देश या भोग्यपदार्थों के लिए परस्पर युद्ध होने लगे, इस प्रकार पृथ्वी में अनेक प्राणियोंको दण्ड भोगना पड़ा(◄)।
◄ अथवा मूलस्थित 'द्वन्द्व' शब्द का अर्थ शीतोष्ण आदि द्वन्द्व करना चाहिए। उनके परिहार में उपायभूत विषयों के सम्पादन के लिए प्राणी राजाओं के दण्डनीय हुए, कारण कि विषयों की सिद्धि धनमूलक है और धन के लिए राजाओं ने प्रजा पर कर लगाया।
पहले युद्ध के बिना ही पृथ्वी के पालन में समर्थ होते हुए भी तदनन्तर राजा युद्ध के बिना पृथ्वी पर शासन करने के लिए समर्थ नहीं हुए, इसका फल यह हुआकि प्रजाओं के साथ राजा दीनता को प्राप्त हो गये। भाव यह कि देह में आत्मत्त्वबुद्धि से युद्ध आदि में देह का नाश होने पर आत्मा का नाश हो जायेगा, इस भय से वे दीनता को प्राप्त हो गये। तदनन्तर उन लोगों की दीनता को दूर करने के लिए और आत्मज्ञान के प्रचार के लिए हम लोगों ने ज्ञानवर्धक बड़े-बड़े दर्शनों का उपदेश किया। इस अध्यात्म विद्या का पहले राजाओं में उपदेश हुआ तदनन्तर इसका और लोगों में प्रसार हुआ, इस कारण श्रीवेदव्यास आदि ने इसको राजविद्या कहा है। हे राघव, राजा लोग राजविद्या, राजगुह्य आदि नामों से प्रसिद्ध उत्तम अध्यात्मज्ञान को जानकर अत्यन्त आनन्द को प्राप्त हुए, तदनन्तर उनमें किंचित भी दुःख नहीं रहा। कालक्रम से निर्मल कीर्ति वाले अनेक राजाओं के कीर्तिशेष होने पर इन महाराज श्रीदशरथजी से आप श्रीरामचन्द्र इस पृथ्वी में उत्पन्न हुए हैं।।4-19।।
परन्तप, आपके अतिनिर्मल मन में 'श्मशानमापदं दैन्यम्' इत्यादि से आगे कहे जाने वाले दृष्ट निमित्तों के बिना ही पवित्रतम ज्ञानोत्पादन समर्थ वह उत्तम वैराग्य उत्पन्न हुआ है।।20।।
हे श्रीरामचन्द्र, सम्पूर्ण विवेकी पुरुषों में सर्वश्रेष्ठ रूप से विख्यात साधु का सब विषयों में दृष्टनिमित्तपूर्वक ही राजस(╧) वैराग्य होता है। श्रीरामजी, सत्पुरुषों को भी आश्चर्य में डालने वाला अपने विवेक से उत्पन्न आपका यह सात्त्विक (╪) वैराग्य किसी निमित्त के बिना ही उत्पन्न हुआ है, ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया है।
╧ रजोगुण का कार्य दुष्ट दुःख के अनुभव से होता है अतएव राजस कहलाता है।
╪ केवल विवेकमात्र से उत्पन्न हुआ है अतएव सात्विक है।
बीभत्स (घृणाजनक) विषयों को देखकर किसको वैराग्य नहीं होता, किन्तु सत्पुरुषों का का उत्तम वैराग्य विवेक से ही होता है। वे महापुरुष हैं, वे महाविद्वान हैं और उन्हीं का चित्त गंगाजल के समान निर्मल है, जिन्हें निमित्त के बिना ही वैराग्य होता है।।21-24।। हे परन्तप, केवल अपने विवेक से उत्पन्न तत्त्वपदार्थ के प्रति अभिमुखता से अन्य विषयों से विरक्त बुद्धि से युक्त पुरुष वैसा शोभित होता है जैसे कि वरमाला से युवा पुरुष शोभित होता है। विवेक से  इस संसार रचना की दुःखरूपता का विचार कर जो लोग वैराग्य को प्राप्त होते हैं, वे श्री श्रेष्ठ पुरुष हैं। अपने विलक्षण विवेक से ही इस इन्द्रजालतुल्य प्रपंच का पुनः पुनः विचार कर हठपूर्वक इस मायिक बाह्य जगत के साथ देह, इन्द्रिय, प्राण, मन, बुद्धि और अविद्या का परित्याग करना चाहिए। श्मशानभूमि, आपत्तियों और दीनता को देखकर किसे वैराग्य न होगा ? वही वैराग्य परम श्रेय का साधन है, जो स्वतः उत्पन्न होता है। जैसे खूब जोता गया अतएव कोमल हुआ खेत बीज बोने के योग्य होता है वैसे ही स्वाभाविक वैराग्यरूपी अत्यन्त महत्त्व को प्राप्त हुआ आप आत्मज्ञान के उपदेश के योग्य पात्र हैं।।25-29।।
'तपः प्रभावाद् देवप्रसादाच्च' (तप के प्रताप से और देवता की प्रसन्नता से 'यस्य देवे परा भक्तिः' (जिसकी देवता पर परम भक्ति होती है) और ईश्वरानुग्रहादेव पुसामद्वैतवासना। प्रसादादेव रूद्रस्य भवानीसहितस्य तु। अध्यात्मविषयं ज्ञानं जायते बहुजन्मभिः।' (ईश्वर की अनुकम्पा से लोगों की अद्वैतवासना होती है। श्रीभगवती पार्वती जी सहित भगवान् महादेवजी के प्रसाद से ही बहुत जन्मों के पश्चात् अध्यात्म ज्ञान होता है) इत्यादि श्रुति और स्मृतियों का अनुसरण करते हुए कहते हैं।
परम प्रभु भगवान श्रीमहादेव जी की प्रसन्नता से आप जैसे सज्जनों की शुभ बुद्धि विवेक की ओर अग्रसर होता है।।30।।
'तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन' (उस परमात्मतत्त्व को ब्राह्मण लोग वेदाध्ययन, यज्ञ, दांन और अविनाशी तप से जानने की इच्छा करते हैं) इत्यादि श्रुति के अनुसार कहते हैं। गर्भाधान, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, अन्नप्राशन, चूड़ाकारण, उपनयन, चार वेदव्रत, समावर्तन, विवाह, पाँच महायज्ञों का अनुष्ठान, अष्टका, पार्वण, श्राद्ध, उपाकरण, उत्सर्जन, चैत्र और आश्विन में होने वाली नवसस्येष्टि – ये सात पाकयज्ञ, अग्न्याधान, अग्निहोत्र, दर्श – पौर्णमास, चातुर्मास्य, आग्रयणेष्टि, निरूढ पशुबन्ध, सौत्रामणी – ये सात हविर्यज्ञ, अग्निष्टोम, अत्यग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडसी, वाजपेय, अतिरात्र, आत्मोर्याम – ये सात सोमयज्ञ, ये चालीस संस्कार और सब भूतों में दया, क्षान्ति, अनसूया, शौच, आयासाभाव, मांगल्य, कार्पण्यका अभाव, अस्पृहा – ये आठ गुण जिसके हों वह सायुज्य को प्राप्त होता है – यों गौतमस्मृति में दर्शाये गये।
कर्मकाण्ड के क्रम से, विपुल तपस्या से, इन्द्रिय, प्राण और मन के नियमन से, दान से, तीर्थयात्राओं से और चिरकाल तक विचार करने से पापराशि के क्षीण होने के अनन्तर परमात्मचिन्तन करने पर काकतालीयन्याय से (कौए के आने और ताल के गिरने के समान) संयोगतः सम्पन्न साधनों के संमिलन से प्राणी की बुद्धि विवेक की ओर अग्रसर होती है।।31,32।।
ऐसी परिस्थिति में ब्रह्मजिज्ञासा के प्रयोजक विचार का उदय ही दुर्लभ है, यह भाव है।
जब तक परमपदका साक्षात्कार नहीं करते तब तक चक्र के समान लोगों को घुमाने वाले राग-द्वेष आदि से आवृत्त लोग कर्मकाण्डपरायण होकर इस संसार में पुनः पुनः जन्म-मरणरूप परम्परा को प्राप्त होते हैं।।33।।
श्रुति भी है 'मन्तरे वर्तमान स्वयं धीराः' (अविद्या में स्थित अपने को पण्डित मानने वाले मूढ जन अन्धों से ले जाये जा रहे अन्धों की नाईं पतन को प्राप्त होते हैं)।
इस संसार को असार और दुःखरूप जानकर और संसारमयी बुद्धि का परित्याग कर विद्वान लोग बन्धन-स्तम्भ से निर्मुक्त हाथियों की नाईं परब्रह्म को प्राप्त होते हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, वह संसार सृष्टि-विषम और असीम है। देहाध्यास से युक्त महान जीव भी कृमि, कीट आदि के सदृश ही है। ज्ञान के बिना परम पद को प्राप्त नहीं हो सकते। रघुवंशशिरोमणे, विवेकी लोग ज्ञानरूपी नौका से ही सुदुस्तर संसार सागर को एक पलकभर में पार कर गये हैं। संसाररूपी सागर से जीव को पार कराने वाले वक्ष्यमाण (आगे कहे जाने वाले) ज्ञानरूप उपाय को विचाराभ्यासपरायण तथा विवेक, वैराग्य आदि से युक्त बुद्धि से एकाग्र होकर सुनिये। इस अनिन्दित ज्ञानयुक्ति के बिना अनन्त विक्षेपों से पूर्ण ये सांसारिक दुःखभीतियाँ चिरकाल तक हृदय को सन्तप्त करती हैं। हे राघव, साधुजनों में शीत, वात, धूप आदि दुःखद्वन्द्व ज्ञानयुक्ति को छोड़कर किस उपाय से सह्य होते हैं ? अर्थात् ज्ञान से अतिरिक्त किसी उपाय से सह्य नहीं होते  ? जैसे अग्नि की ज्वालाएँ तृण को जला डालती है, वैसे ही मूढ़ पुरुष को पदपद में (क्षण-क्षण में) दुःख-चिन्ताएँ प्राप्त होती हैं और जला डालती है। जैसे वर्षाकाल में सींचे गये वन को अग्नि जला नहीं सकती, वैसे ही जिसने ज्ञातव्य वस्तु को जान लिया है, ऐसे विवेकशील प्राज्ञ पुरुष को मानसिक व्यथाएँ सन्ताप नहीं पहुँचा सकती। शारीरिक और मानसिक पीड़ारूपी बवंडर से परिपूर्ण संसाररूपी मरूस्थल में प्रसिद्ध वायु के तेज चलने पर भी तत्त्वज्ञानी पुरुष कल्पवृक्ष की नाईं उखाड़ा नहीं जा सकता यानी पीड़ित नहीं होता। इसलिए तत्त्वपदार्थ के ज्ञान के लिए बुद्धिमान पुरुष को श्रुति आदि प्रमाण देने में अतिकुशल आत्मतत्त्वज्ञ बुद्धिमान पुरुष से ही अनुगमन, साष्टांग प्रणाम, सेवा आदिरूप प्रयत्न से विनयपूर्वक प्रश्न करना चाहिए। जिज्ञासु द्वारा पूछे गये, श्रुति आदि प्रमाण देने में निपुण और विशुद्ध चित्त वाले वक्ता के वाक्य वैसे ग्रहण करने चाहिए जैसे कि रँगने के लिए घोले गये पक्के रंग में डुबाया गया वस्त्र रंग को पकड़ लेता है फिर उसे कभी नहीं छोड़ता।।34-44।।
हे वक्ताओं में श्रेष्ठ श्रीरामजी, जो पुरुष तत्त्ववस्तु को नहीं जानता अतएव जिसका वचन ग्राह्य नहीं है, ऐसे पुरुष से जो प्रश्न करता है, उससे बढ़कर मूर्ख दूसरा कोई नहीं है। पूछे गये तत्त्वज्ञ प्रामाणिक वक्ता के उपदेश का जो प्रयत्न से आचरण नहीं करता, उससे बढ़कर नराधम दूसरा नहीं है। व्यवहार से वक्ता की अज्ञता और तत्त्वज्ञाता का पहले निर्णय कर जो पुरुष प्रश्न करता है, वह प्रश्नकर्ता महामति है। जो मूर्ख (परीक्षा द्वारा) प्रकृष्ट वक्ता का निर्णय किये बिना प्रश्न करता है, वह अधम प्रश्नकर्ता है और वह आत्मज्ञानरूप महान अर्थ का पात्र नहीं हो सकता अर्थात् उसे कभी तत्त्वज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। प्राज्ञ पुरुष को चाहिए कि उक्त और अनुक्त का विवेचन कर निश्चय करने में जिसकी बुद्धि समर्थ हो और जो निन्दनीय न हो ऐसे पुरुष के लिए पृष्ट वस्तु का उपदेश दे पशु के जाड्य आदि धर्मों से युक्त अधम को कभी तत्त्व का उपदेश न दे।।45-49।। प्रश्नकर्ता की श्रुति आदि प्रमाणों से निर्णीत पदार्थ के ग्रहण की योग्यता का विचार किये बिना जो तत्त्व का उपदेश देता है, उसको प्राज्ञ पुरुष मूढ़तर कहते हैं।।50।। हे रघुनन्दन, आप अत्यन्त श्रेष्ठ प्रश्नकर्ता है और मैं उपदेश देना जानता हूँ, इसलिए हमारा यह समागम सदृश है। हे शब्दार्थ के ज्ञाता श्रीरामजी, जिस पदार्थ का मैं उपदेश देता हूँ उसको आप 'यह तत्त्व वस्तु है' ऐसा निश्चय कर प्रयत्नपूर्वक अपने हृदय में ज्यों-का-त्यों पूर्णरूप से धारण कीजिए। हे श्रीरामचन्द्रजी, आप कुल, दया, दाक्षिण्य आदि गुणों और सदाचार आदि से महान हैं, विरक्त हैं एवं तत्त्वज्ञ हैं, मुझसे जो कहा जायेगा वह जैसे वस्त्र में घोला हुआ रंग बैठ जाता है वैसे आपके हृदय के अन्तस्तर में बैठ जायेगा। आपकी उक्त पदार्थ के ग्रहण में निपुण मेघा है और परम तत्त्व का विचार करने वाली प्रतिभा भी है। मेघा और प्रतिभा से सम्पन्न आपकी प्रज्ञा जैसे सूर्य की किरणें जल के अन्दर प्रवेश कर जाती हैं, वैसे ही प्रतिपाद्य अर्थ (तत्त्वज्ञान) में प्रवेश करती है। मैं जो कुछ कहूँ, उसे आप ग्रहण कीजिए और प्रयत्नपूर्वक उसे अपने हृदय में स्थान दीजिए। यदि ऐसा आप न कर सकें, तो आपको मुझसे पूछना ही नहीं चाहिए, क्योंकि ऐसा पूछना निरर्थक है।।51-55।।
हे श्रीरामचन्द्रजी, संसाररूपी वन का बन्दर मन बड़ा ही चपल है, उसको संस्कार द्वारा अपने वश में कर परमार्थतत्त्व का श्रवण करना चाहिए और फिर उसको प्रयत्न से हृदय में धारण करना चाहिए। विवेकशून्य, शास्त्र के अभ्यास से उत्पन्न ज्ञान से रहित एवं असाधु पुरुषों में प्रीति रखने वाले पुरुष से अति दूर होकर चिरकालतक महात्माओं की सेवा करनी चाहिए। सदा सन्त-महात्माओं की संगति से विवेक उत्पन्न होता है। भोग और मोक्ष विवेकरूपी वृक्ष के ही फल कहे गये हैं। मोक्षद्वार के चार द्वारपाल कहे गये हैं – शम, विचार, सन्तोष और चौथा साधुसंगम। पहले तो इन चारों का ही प्रयत्नपूर्वक सेवन करना चाहिए। यदि चारों को सेवन की शक्ति न हो तो तीन का सेवन करना चाहिए। तीन का सेवन न हो सकने पर दो का सेवन करना चाहिए। इनका भली भाँति सेवन होने पर ये मोक्षरूपी राजगृह में मुमुक्षु का प्रवेश होने के लिए द्वार खोलते हैं। यदि दो के सेवन की भी शक्ति न हो, तो सम्पूर्ण प्रयत्न से प्राणों की बाजी लगाकर भी इनमें से एक का अवश्य आश्रय लेना चाहिए। यदि एक वश में हो जाता है, तो शेष ती भी वश में हो जाते हैं। जैसे अन्य तेजस्वियों में सूर्य सर्वश्रेष्ठ है वैसे ही विवेकवान पुरुष सब लोगों में सिर के आभूषण के समान आदरणीय है। वह शास्त्र के श्रवण, मनन और निदिध्यासन का और ज्ञान का योग्य पात्र है। जैसे अधिक शीत पड़ने से जल घनीभूत होकर बर्फ बन जाता है, वैसे ही अविवेकियों की मूर्खता घनता को प्राप्त होकर अति कठिन हो जाती है।।56-63।। हे रघुकुलतिलक, आप तो जैसे सूर्य का उदय होने पर कमल विकसित होता है, वैसे ही सौजन्य आदि गुण एवं शास्त्रार्थ की दृष्टि से विकसित अन्तःकरणवाले हैं। हे सदबुद्धि श्रीरामजी, जैसे मृग आदि जन्तु ऊपर कान करके (कान खड़े करके) वीणा के शब्द को सुनते हैं वैसे ही आप इस ज्ञानमय वाणी को सुनने और समझने के योग्य हैं। हे श्रीरामचन्द्रजी, आप वैराग्य के अभ्यास आदि से सम्पूर्ण विनय आदि रूप सम्पत्तियों का उपार्जन कीजिए, जिनके प्राप्त होने पर नाश नहीं होता। पहले संसाररूप बन्धन से छुटकारा पाने के लिए शास्त्राभ्यास और सज्जन संगतिपूर्वक तपस्या और इन्द्रियनिग्रह से प्रज्ञा को (विवेक के ग्रहण और धारण में निपुण बुद्धि को) ही बढ़ावें।।56-67।।
प्रज्ञा की अभिवृद्धि में शास्त्राभ्यास ही उपाय है, इस अभिप्राय से कहते हैं।
संस्कृत (विशुद्ध) बुद्धि से जो कुछ शास्त्र का अवलोकन, चिन्तन आदि किया जाता है, उसी को इस मूर्खता के विनाश का हेतु समझो। यह संसाररूपी विषवृक्ष आपत्तियों का एकमात्र घर है यह अज्ञानी पुरुष को सदा मोह में डालता है, इसलिए अज्ञान का यत्न से विनाश करना चाहिए। दुराशा से साँप की-सी कुटिल गति को धारण करने वाली हृदय में हजारों विक्षेपरूप से व्याप्त मूर्खता से बुद्धि अग्नि में सबसे रक्खे हुए चमड़े की भाँति संकोच को प्राप्त होती है अर्थात् संकुचित कमल की नाईं मलिनता को प्राप्त होती है। जैसे मेघरहित और सम्पूर्ण निर्मल मण्डलवाले चन्द्रमा में दृष्टि प्रसन्नता को प्राप्त होती है वैसे ही यह पूर्वोक्त वस्तुदृष्टि (वस्तु यानी परमार्थरूप तत्त्व जिसमें देखा जाता है) अर्थात् सूक्ष्मबुद्धि प्राज्ञ में, यथार्थवस्तु की एकरसता को प्राप्त होकर प्रसन्नता को प्राप्त होती है। जिसकी पूर्वापर के विचार से और अतिसूक्ष्म अर्थ के ग्रहण में अत्यन्त पटु तथा चतुरता से शोभित बुद्धि विकासयुक्त हो, इस लोक में वही 'पुरुष' कहा जाता है।।68-72।।
मेरी बुद्धि विकासयुक्त है या नहीं, यों सन्देह कर रहे श्रीरामचन्द्रजी को आश्वासन देते हुए श्रीवसिष्ठजी कहते हैं।
हे श्रीरामजी, आप भी विकसित, अज्ञान का त्याग कर रहे अतएव विशुद्ध शान्ति आदि गुणों से शोभित एवं परमतत्त्व के विचार से शीतल बुद्धि से विराजमान है।।73।।
ग्यारहवाँ सर्ग समाप्त
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