मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 33 (मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण)


नौवाँ सर्ग
दैव के अपलाप की सिद्धि के लिए सफल कर्मों की मनोमात्रता और मन की चिदात्मता का वर्णन।

पुरुषप्रयत्न की स्वतन्त्रता की सिद्ध करने के लिए पहले कहीं पर 'दैव असत् है' ऐसा कहा और कहीं पर प्राक्तन प्रयत्न जनित कर्म ही दैव एवं पुरुष प्रयत्न कहलाता है, ऐसा कहीं पर यह ठीक नहीं है, क्योंकि 'दैव असत् है' इस प्रथम पक्ष को मानने से लोक और वेद में दैव की जो प्रबल प्रसिद्धि है, उसकी असंगति हो जायेगी और दुर्बल दैव के अभाव में उसकी अपेक्षा पुरुषप्रयत्न की प्रबलता का प्रतिपादन करनेवाली उक्ति के साथ विरोध होगा। प्राक्तन प्रयत्न जनित कर्म ही दैव है, इस द्वितीय पक्ष में तो 'दैव असत् है' इस प्रकार की दैव में असत्त्वप्रतिज्ञा का भंग हो जायेगा, आधुनिक प्रवृत्तियाँ भी पूर्वकर्म की फलरूपा हैं, अतः प्राक्तन कर्मों के अनुकूल होने के कारण उनका विरोध न होने से 'आधुनिक प्रवृत्तियों से पूर्वकर्मों का जय होता है, यह कथन भी विरुद्ध होगा एवं कर्मपरतन्त्र होने पर पुरुष की स्वतन्त्रता का भी विघात होगा, इस प्रकार के गूढ़ अभिप्राय वाले श्रीरामचन्द्रजी उसके तात्पर्य की जिज्ञासा से वसिष्ठजी से पूछते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः भगवन्, आप सम्पूर्ण धर्मों के ज्ञाता हैं, लोक में अत्यन्त विख्यात जो दैव है, वह क्या है ? यानी वह सत् है, या असत् ? उसे आप कृपया मुझसे कहिए।।1।।
रामचन्द्रजी के पूछने पर उनके अभिप्राय को जानकर श्रीवसिष्ठजी भी दैव का अपलाप करने वाली युक्तियों से ही जगत् के अपलाप द्वारा अद्वितीय आत्मतत्त्व को समझाने की इच्छा से 'पूर्वोक्त दोनों पक्षों में फलतः कोई भेद नहीं है, इस गूढ़ अभिप्राय से प्रथम पक्ष का अवलम्बन कर उक्त अर्थ को ही कहते हैं।
वसिष्ठजी ने कहाः हे राघव, सम्पूर्ण कार्यों को करने वाला पौरुष ही है, अन्य नहीं है एवं सम्पूर्ण फलों का उपभोक्ता भी पुरुषप्रयत्न है, उसमें दैव कारण ही नहीं है। वस्तुतः आत्मा स्वयं उदासीन है, अतः उसमें कर्तृत्व और भोक्तृत्व की किसी प्रकार भी उपपत्ति नहीं होती।।2।।
ऐसा बोधन करने के लिए करणभूत पुरुषप्रयत्न में फलकर्तृत्व का कथन किया गया है, यह तात्पर्य है।
दैव न कुछ करता है, न भोग करता है, न उसका अस्तित्व है, न दिखाई देता है, एवं न तो विवेकी पुरुष द्वारा उसका आदर किया जाता है, पर अनादि रूढ़ भ्रान्ति से केवल मूढ़ों ने उसकी कल्पना कर रखी है।।3।।
निरालम्बत्वरूप अनुपपत्तिका परिहार करते हैं।
फल को अवश्य देने वाले पुरुष प्रयत्न से सिद्ध वनिता आदि को पति और सपत्नी आदि से जो कुछ और अशुभ फल प्राप्त होता है, उसी का अवलम्बन कर दैवशब्द का लोक में व्यवहार होता है। अथवा पुरुषप्रयत्न द्वारा प्राप्त इष्ट और अनिष्ट वस्तु की जो इष्ट और अनिष्टरूपा प्राप्ति है, वह भी सदा लोगों द्वारा दैवशब्द से कही जाती है।।4,5।।
श्रीवसिष्ठजी चार्वाक मत का प्रदर्शन करते हैं।
पुरुषप्रयत्न से होने वाला जो अवश्य फल का भोग है, वही इस लोक में दैवशब्द से कहा जाता है।।6।।
अब महामुनि वसिष्ठजी सिद्धान्त बतलाते हैं।
हे रामचन्द्रजी, किसी पुरुष का कोई दैव ही भ्रान्त दृष्टि से आकाश को शून्य के सदृश या नील के सदृश बना देता है और विवेक दृष्टि से वैसा नहीं बनाता है अर्थात् दैव की सिद्धि भ्रान्ति से ही है, विवेक से नहीं। सिद्ध पुरुषार्थ से शुभ और अशुभ फल का उदय होने पर 'यह फल इस बीज के स्वरूप में पहले रहा' इस प्रकार जो कहा जाता है, वही दैव है। मेरी ऐसी बुद्धि थी और ऐसा मेरा निश्चय था यों कर्मफल के प्राप्त होने पर जो कहा जाता है, वही दैव है। इष्ट और अनिष्ट फल के प्राप्त होने पर प्राक्तन कर्म ही इस प्रकार था। इस अभिप्राय को बतलाने वाला केवल आश्वासनमात्र ही दैव है।।7-10।।
दोनों कल्पों के अभेद का कथन करने से आशय को न जान रहे एवं प्रथम कल्प का उपक्रम कर द्वितीय कल्प से उपसंहार करने में विरोध को जान रहे श्रीरामचन्द्रजी अपने अभिप्राय को प्रकट करते हुए बोले। श्री रामचन्द्रजी ने कहाः भगवन्, हे सर्वधर्मज्ञ, जो प्राक्तन कर्म है वही दैव है, ऐसा आपने बार बार कहा, फिर दैव है ही नहीं, इस प्रकार उसका आप अपलाप कैसे करते हैं यानी उसके अपलाप करने में आपका क्या अभिप्राय है ?।।11।। श्रीवसिष्ठजी ने कहाः हे रामचन्द्र, ठीक है, आप उन दोनों कल्पों के विरोध को जानते हैं, सुनिये, मैं आपसे सम्पूर्ण वृत्तान्त को कहूँगा, जिससे दैव है ही नहीं, यह आपकी बुद्धि स्थिर हो जायेगी। मनुष्यों के मन में पहले जो अनेक प्रकार की वासनाएँ हुई थीं, वे ही कायिक और वाचिक कर्मरूप से परिणत हुई क्योंकि 'यद्धि मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति तत्कर्मणा करोति ' यानि जिसका मन चिन्तन करता है उसको वाणी से बोलता है और उसको कर्म से करता है। हे राम जी, प्राणी में जिस प्रकार की वासना होती है, वह शीघ्र ही वैसा कर्म करता है। अन्य प्रकार की वासना हो और अन्य कर्म करे यह बात नहीं बन सकती। गाँव में जाने की जिसकी इच्छा होती है वह गाँव में पहुँचता है और शहर में जाने की जिसकी इच्छा होती वह शहर में पहुँचता है, जिसकी जिस विषय में अभिलाषा होती है वह उस विषय में प्रयत्न करता है। पूर्वजन्म में फल की उत्कट अभिलाषा से जो कर्म प्रबल प्रयत्न से किया जाता है वही इस जन्म में दैव शब्द से कहा जाता है अर्थात् पूर्व जन्म में फल की उत्कट अभिलाषा से किये गये कर्म का ही दूसरा नाम दैव है, अतः दैव कर्म से अतिरिक्त नहीं है।।12-16।। कर्मकर्ताओं के सभी कर्म इसी प्रकार के होते हैं। अपनी प्रबल वासना ही कर्म है और वासना भी आपने कारणभूत मन से पृथक नहीं है।।17।।
क्योंकि 'वाचारम्भणं विकारों नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्' (विकार और नाम केवल वाचारम्भणमात्र है, मृत्तिका ही (कारण ही) सत्य है) श्रुति में उक्त ऐसा न्याय है। यद्यपि वाचिक और कायिक भी कर्म देखे जाते हैं तथापि विचार करने पर भी केवल मनोवासनारूप ही हैं, ऐसा आगे कहा जायेगा, उसी के अनुसार सकल कर्म मनोवासनामात्र हैं, ऐसा कहा गया है।
मन पुरुष (परमात्मारूप) ही है, उससे पृथक नहीं है, क्योंकि 'तन्मनोऽकुरुत आत्मन्वी स्याम्' (मैं मनस्वी होऊँ, इस अभिप्राय से उसने मन को बनाया) इस श्रुति से मन पुरुष का विवर्तरूप ही है, यह सिद्ध है।
हे सज्जनशिरोमणि श्रीरामजी, जो दैव है, वही कर्म है, दैव कर्म से पृथक नहीं है, कर्म मन से पृथक नहीं है और मन पुरुषरूप है और पुरुष परमार्थरूप से निर्विकार चैतन्यमात्ररूप ही है, इससे मन असत् ठहरा, मन के असत् होने से कर्म भी असत् ठहरा और असत् कर्मरूप दैव भी असत् हुआ, अतएव दैव नहीं है, यह फलितार्थ है।।18।।
'प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति वदन् वाक्, पर्श्यैश्चक्षुः श्रोत्रं मन्वानो मनः' इस श्रुति से अध्यास से मन आदि भाव से स्थित आत्मा की ही कर्म और कर्म के फलरूप से भी स्थिति है इसलिए वही दैव है, ऐसा यदि कहो, तो वह दैव रहे उससे पुरुष की स्वतन्त्रता का विनाश नहीं होगा, इस आशय से कहते हैं।
मन आदि भाव को प्राप्त हुआ यह प्राणी ही अपने हित के लिए जैसा प्रयत्न करता है दैवनाम से प्रसिद्ध अपने कर्म से वैसा ही फल पाता है।।19।।
यदि मन अत्यन्त असत् है, तो उससे व्यवहार की सिद्धि कैसे होगी ? अत्यन्त असत् वन्ध्यापुत्र आदि से किसी व्यवहार की सिद्धि नहीं देखी जाती, ऐसी आशंका कर युक्ति से उसकी अनिर्वचनीयता को दर्शा रहे 'तदेतद्धृहयं मनश्चैतात्संज्ञानमाज्ञानं विज्ञानं प्रज्ञानम्' (वही हृदय, मन, संज्ञान, अज्ञान, विज्ञान और प्रज्ञान है) इत्यादि श्रुति के अनुसार मन की ही दैव आदि संज्ञाएँ हैं ऐसा कहते हैं।
हे श्रीरामजी, मन, चित्त, वासना, कर्म, दैव और निश्चय से सब सत्त्व था असत्त्व, चित्त्व या जडत्व, भेद या अभेद आदि से तत्त्वतः जिसका निश्चय नहीं हो सकता ऐसा मिथ्याभूत मन की (मनोरूपता को प्राप्त हुए पुरुषकी) संज्ञाएँ कही गई हैं। यों पुरुष की स्वतन्त्रता सिद्ध हुई, ऐसा कहते हैं। हे रामचन्द्र, पूर्वोक्त नामों वाला (मन, चित्त आदि संज्ञाओंवाला) पुरुष दृढ़ वासना से जैसा नित्य प्रयत्न करता है वैसा ही उसे पर्याप्त फल मिलता है। हे रघुकुलतिलक, इस प्रकार पौरुष से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है उससे अन्य से कुछ भी नहीं मिलता, इसलिए पौरुष से सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है उससे अन्य से कुछ भी नहीं मिलता, इसलिए आपका पुरुषप्रयत्न शुभ फल देने वाला हो।।20-22।। श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः मुनिवर, पूर्वजन्म की वासनाएँ जैसे मुझे कार्य में लगाती है, वैसे ही मैं रहता हूँ, परवश मैं कर ही क्या सकता हूँ। अर्थात् पूर्वजन्म की वासनाओं के अधीन हुए मुझे स्वतन्त्रतापूर्वक कुछ करने की शक्ति कहाँ है, वासना मुझसे जैसा नाच-नचा रही है, वैसा नाच मैं नचाता हूँ।।23।।
इस समय प्राप्त हो रहे फल में भले ही तुम्हारी स्वतन्त्रता न हो, पर भावी फल के अनुकूल यत्न में तो स्वतन्त्रता है ही। सदविद्या से संयुक्त जन्म से अनुमित पूर्वजन्म के सत्प्रयत्न की फलभूत पूर्व वासना केवल अपने विरुद्ध फलों की अवरोधिका है, अतएव उससे युक्त जन्म में भी यदि पुरुष की सत्प्रवृत्ति में स्वतन्त्रता न हुई, तो कर्म और ब्रह्मविद्यापरक शास्त्र ही व्यर्थ हो जायेंगे। अपने मन में ऐसा अभिप्राय रखकर श्रीवसिष्ठजी ने कहा।
श्रीवसिष्ठजी ने कहाः हे रामजी, आप प्रस्तुत जन्म की हेतुभूत वासनाओं की अनुकूलता से ही अपने प्रयत्न से प्राप्त पौरुष द्वारा अक्षय श्रेय को प्राप्त होओगे, अन्यथा नहीं।।24।।
उक्त अर्थ का ही समर्थन करने के लिए वासनाओं का भेद दर्शा कर कहते हैं।
पूर्वजन्म की वासनाएँ, दो प्रकार की होती हैं, एक शुभ और दूसरी अशुभ। उनमें से आपकी पूर्वजन्म की वासनाएँ या शुभ हो सकती है या अशुभ हो सकती हैं।।25।।
प्रथम पक्ष में कहते हैं।
यदि आपकी पूर्वजन्म की वासनाएँ शुभ हों, तो पूर्वजन्म की शुभ वासनाओं द्वारा इस समय भी आप शुभ वासना में प्राप्त कराये जा रहे हैं, ऐसी अवस्था में शुभ वासनाओं द्वारा ही क्रमशः अविनश्वर पद को प्राप्त होंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं है।।26।।
दूसरे पक्ष में कहते हैं।
यदि आपकी पूर्वजन्म की वासनाएँ अशुभ हैं और वे आपको संकट की ओर ले जाती हैं, तो उन प्राक्तन अशुभ वासनाओं पर आपको प्रयत्नपूर्वक दृढ़ता से विजय प्राप्त करनी चाहिए। भाव यह कि वासनाओं का उदबोध स्वतन्त्ररूप से नहीं होता, किन्तु किसी उदबोधक के अनुसार ही होता है। यदि असज्जन की संगति आदि से कदाचित् एक आध अशुभ वासना उठे, तो उसका, उसके विरोधी साधु संगति, सत्-शास्त्र के अभ्यास आदि से विरोधी शुभ वासना की उत्पत्ति कराकर, तिरस्कार कर देना चाहिए।।27।।
'यो मनसि तिष्ठन्मनोऽन्तरो यं मनो न वेद' इस श्रुति से मन को प्रेरित करने वाला प्रज्ञानामक आत्मा दूसरा सुना जाता है उसके अधीन ही मनोवासनाएँ होती हैं, ऐसी परिस्थिति में सद्वासनाओं के उत्पादन में मेरी स्वतन्त्रता कहाँ है ? ऐसी शंका उठने पर कहते हैं।
जो चेतनमात्र प्राज्ञ श्रुति में कहा गया है, वही आप हैं। आप जड़रूप सूक्ष्म, स्थूल देह नहीं हैं जिससे उससे अपने को पृथक समझें, इसलिए चेतनरूप आपकी अन्य चेतन से भास्यता कहाँ है ? भाव यह कि यदि प्राज्ञ आप से पृथक हो, तो चेतन का अन्य चेतन से प्रकाश न होने के कारण आपको प्रकाशित न करता हुआ वह सर्वज्ञ न होगा, इसलिए आप ही प्राज्ञ हो, इस प्रकार प्राज्ञ और आपमें अभेद सिद्ध हुआ।।28।।
चेतनरूप आपको कोई दूसरा चेतन प्रकाशित करता है, ऐसा यदि मानो, तो उसको भी दूसरा चेतन प्रकाशित करेगा, यों अनवस्था भी होगी, ऐसा कहते हैं।
यदि आपको कोई दूसरा चेतन प्रकाशित करता है, ऐसा यदि मानो, तो उसको भी दूसरा चेतन प्रकाशित करेगा, यो अनवस्था भी होगी, ऐसा कहते हैं।
यदि आपको अन्य कोई प्रकाशित करता है, तो उस प्रकाशित करने वाले को कौन प्रकाशित करेगा और उस दूसरे प्रकाशित करने वाले को कौन प्रकाशित करेगा ? उसको भी अन्य करेगा और उसको भी अन्य प्रकाशित करेगा, ऐसा माना जय, तो अनवस्था होगी। अनवस्था किसी भी वस्तु को सिद्ध नहीं कर सकती। यों सदवासनाओं का उदबोध करने में आपकी स्वतन्त्रता अक्षुण्ण है।।29।।
पुरुष की स्वतन्त्रता के साधन का फल कहते हैं।
सन्मार्ग और असन्मार्ग से बह रही वासनारूपी नदी को अपने पुरुषप्रयत्न से अशुभ मार्ग से हटाकर शुभ मार्ग में लगाना चाहिए। हे बलवानों में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी, असत् मार्गों में उलझे हुए अपने मन को अपने पुरुषार्थ से बलपूर्वक शुभ मार्गों में लगाओ।।30,31।।
चित्तरूपी नदी दो प्रकार से बहती है पाप के लिए और पुण्य के लिए उन दो स्रोतों में से एक का निरोध होने पर दूसरे स्रोत में चित्तनदी दुगुने प्रवाह से बहती है, यह बात योगशास्त्र के अनुसार कहते हैं।
अशुभ कर्म से (पापमार्ग से) निवारित मनुष्य का चित्त बालक की नाईं शुभ कर्म में (पुण्यमार्ग में) जाता है और पुण्य मार्ग से निवारित पापमार्ग में जाता है, इसलिए प्रयत्न के साथ पापमार्ग से चित्त को हटाना चाहिए।।32।। इस प्रकार पूर्वोक्त क्रम से चित्तरूपी बालक को शीघ्र रागादि दोषों के विश्लेषण से और स्वाभाविक समता में स्थापन से निर्दोष बनाकर धीरे-धीरे आत्मस्वरूप में निरोधरूप पौरुषप्रयत्न से लगावे।।33।।
शीघ्र हठपूर्वक उसका निरोध न करें, ऐसा करने से उद्वेग से समाधि के टूटने का भय रहता है। भगवान ने भी श्रीमुख से कहा हैः 'शनैः शनैरुपरभेद् बुद्धया धृतिगृहीतया।' (धारणा से वश में की गई बुद्धि से मन को शनैः शनैः (अभ्यासक्रम के अनुसार न कि सहसा) बाह्य विषयों से विरत करे।)
आपने पहले अभ्यास से चाहे शुभ वासनाओं को चाहे अशुभ वासनाओं को निविड़ बना रक्खा हो, किन्तु इस समय तो आप शुभ वासनाओं को ही दृढ़ कीजिए। भाव यह कि पूर्वजन्मों में यदि आपके अभ्यास से शुभ वासनाओं को ही दृढ़ किया होगा, तो इस समय में भी शुभ वासनाओं को दृढ़ करने का शीघ्र फल प्राप्त होगा। यदि पूर्वजन्म में अशुभ वासनाओं को निविड़ बना रक्खा होगा, तो विरोधी वासनाओं के विनाश के लिए भी शुभ वासनाओं के दृढ़ीकरण की आवश्यकता है।।34।।
वासनाओं के अभ्यास की विफलता की शंका नहीं करनी चाहिए, क्योंकि पूर्ववासनाओं के अभ्यास का फल प्रत्यक्ष है, ऐसा कहते हैं।
हे शत्रुनाशन, जब आपकी पूर्वजन्म की वासनाएँ अभ्यासवश घनीभाव को (निविडता को) प्राप्त हुई हैं, तब आप अभ्यास की सफलता को जानिये। हे पुण्यचरित, पूर्व की भाँति इस समय भी अभ्यासवश आपकी वासना घनीभाव को प्राप्त हो रही है, इसलिए शुभवासनाओं का ही अभ्यास कीजिए।।35,36।।
पूर्वजन्म की वासनाओं के घनीभाव में भी सन्देह कर रहे श्रीरामचन्द्रजी से कहते हैं।
हे प्रिय, यदि पूर्वजन्म में अभ्यास से आपकी वासना घनीभाव को प्राप्त नहीं हुई, तो इस समय भी वह वृद्धि को प्राप्त नहीं होगी, इसलिए आप सुखी होइये। भाव यह कि पूर्वजन्म में अभ्यासवश वासनाएँ वृद्धि को प्राप्त नहीं हुई, इस जन्म में भी वे अभ्यासवश दृढ़ नहीं होगी, ऐसी अवस्था में आप राजकुमारोचित सुख पूर्वक व्यवहार कीजिए, दुर्वासनाओं की अभिवृद्धि से जनित अनर्थ की संभावना से आपको विषाद नहीं होना चाहिए।।37।।
यदि ऐसा है, तो शुभ और अशुभ वासनाओं की अभिवृद्धि के लिए मुझे क्यों उपदेश देते हैं ?
राजकुमार, 'शुभ और अशुभ वासनाओं की सफलता में सन्देह होने पर भी आप अत्यन्त शुभ वासनाओं का ही संग्रह कीजिए। शुभ कर्मों के आचरण से शुभ वासना की अभिवृद्धि होने पर कोई दोष नहीं है।।38।।
जैसा की न्याय हैः शुभाशुभफलारम्भे सन्दिग्धेऽपि शुभं चरेत्। यदि न स्यात्तदा किं स्याद्यदि स्यान्नास्तिको हतः।। शुभ और अशुभ कर्मों की फलदातृता में सन्देह होने पर भी शुभ का ही आचरण करना चाहिए। यदि फल नहीं हुआ, तो क्या बिगड़ा, यदि हुआ, तो नास्तिक के मुँह में कालिख लगी।
वस्तुतः तो इस विषय में सन्देह का अवसर ही नहीं है, क्योंकि अन्य स्थलों से भी अभ्यास में अभ्यस्यमान की (जिसका अभ्यास किया जाता है उसकी) दृढ़ता की हेतुता देखी जाती है, ऐसा कहते हैं।
लोक में मनुष्य जिस-जिस विषय का अभ्यास करता है, उसी मैं निःसन्देह तन्मय हो जाता है, यह बात बाल कों से लेकर बड़े-बड़े विद्वानों तक में देखी गई है। हे श्रीरामचन्द्रजी, इसलिए आप परम ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए परम पुरुषार्थ का अवलम्बन कर और पाँचों इन्द्रियों को अपने वश में कर शुभ वासना से युक्त होइए।।39,40।।
कितने समय तक शुभ वासना का अभ्यास करना चाहिए ?
भद्र जब तक गुरु के उपदेश, शास्त्राभ्यास और युक्ति, अनुभव आदि प्रमाणों से तत्पद का निर्णय न हो जाय और जब तक अव्युत्पन्न चित्तवाले आपको तत्पद का ज्ञान न हो जाय, तब तक शुभवासनाओं का आचरण कीजिए। तदुपरान्त जब जैसे क्षार में पकाने से वस्त्र आदि में लगे हुए मल आदि शिथिल हो जाते हैं वैसे ही आपके राग आदि दोष नष्ट हो जाय, परम तत्त्व का परिज्ञान हो जाय और मानसिक व्यथाएँ नष्ट हो जाय तब आपको निश्चय इस शुभ वासनासमूह का भी परित्याग कर देना चाहिए।।41,42।।
पूर्वोक्त अर्थ का ही संक्षेप से उपसंहार कर रहे महर्षि वसिष्ठजी आचरण करने के योग्य शुभ का ही निर्देश करते हैं।
महाभाग, आप श्रेष्ठतम पुरुषों द्वारा सेवित अति सुन्दर उन शुभ वासनाओं का अनुसरण कर, शुभ वासना से सम्पन्न बुद्धि से परमार्थ वस्तु का ( परब्रह्म का ) साक्षात्कार कीजिए और तदन्तर शुभ वासनाओं के अनुसरण का भी त्याग कर परम सत्य में स्थित होइय।।43।।
नौवाँ सर्ग समाप्त
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बुधवार, 10 अक्टूबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 32 (मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण)


आठवाँ सर्ग
पूर्व सर्ग में प्रचुर उदाहरणों द्वारा वर्णित दैवमिथ्यात्व का, उपजीव्यविरोध आदि युक्तियों से भी, समर्थन।
इस प्रकार दैव का निराकरण कर पौरुष की स्वतन्त्रता का समर्थन करने पर भी विश्वास न होने के कारण भ्रम में पड़ रहे और पहले स्वयं विस्तार से वर्णित (►) एवं अनेक श्रुति, स्मृति, पुराण और इतिहास में प्रसिद्ध दैव का अपलाप करना कठिन ही नहीं असंभव है यों कि समझ रहे श्रीरामचन्द्रजी को मुखाकृति आदि से ताड़कर जब तक श्रीरामचन्द्रजी को दैव की स्वतन्त्रता में उपजीव्यविरोध नहीं दिखलाता जायेगा तब तक उन्हें विश्वास नहीं होगा, इसलिए उसको दिखलाने की इच्छा से श्रीवसिष्ठजी ने कहाः
हे श्रीरामचन्द्र, जिसकी न जाति है या न अनुगत शरीर के अवयवों का संगठन ही है, न कर्म हैं, न चेष्टाएँ और न किसी प्रकार का पराक्रम ही है उस दैव का कैसा स्वरूप है इस बात को निर्णयपूर्वक यथार्थरूप से कोई नहीं बतला सकता, चूँकि उसे बताना कठिन ही नहीं असम्भव है, इसलिए मिथ्याज्ञान के समान उसकी केवल लोकप्रसिद्धिमात्र है।।1।।
► वैराग्य प्रकरण सर्ग 25 में –
अत्रैव दुर्विलासानां चूड़ामणिरिहाऽपरः । करोत्यत्तीति लोकेऽस्मिन् दैवं कालश्च कथ्यते।।
तेनेयमखिला भूतसन्ततिः परिपेलवा। तापेन हिममालेव नीते विधुरतां मृशम्।।
नृत्यतो हि कृतान्तस्य नितान्तमिव रागिणः। नित्यं यितिकान्तायां मुने परमकामिता।।
(सर्ग 25)
किस अधिष्ठान को लेकर दैव भ्रान्ति होती है ? ऐसी शंका होने पर अधिष्ठान को दिखलाते हुए परस्पर व्यवहार का स्पष्टीकरण करते हैं। अपने कर्मफल की प्राप्ति होने पर इस कर्म का इस क्रम से अनुष्ठान किया था, इसलिए इस प्रकार फल प्राप्त हुआ, ऐसे जो वाग्व्यवहार होते हैं, वे ही दैवनाम से लोक में प्रसिद्धि को प्राप्त हुए हैं। उन वाग व्यवहारों में मन्दबुद्धि पुरुष यह दैव है, इस प्रकार का भ्रान्ति से निश्चय करते हैं जैसे कि भ्रान्ति से रस्सी में यह सर्प है, ऐसा निश्चय गृहीत होता है। जैसे अतीत काल के दुष्कर्म वर्तमान काल के शुभ कर्मों से शोभा को प्राप्त होते हैं, वैसे ही पूर्वजन्म के दुष्कर्म इस जन्म के शुभ कर्मों से शुभफलप्रद हो जाते हैं, इसलिए पुरुष को प्रयत्नपूर्वक उद्योगी होना चाहिए। जिस मन्दमतिका मूढ़ों द्वारा अनुमान से सिद्ध दैव है, अर्थात् जो दुर्मति मूढ़ों द्वारा कल्पित दैव को मानता है, उस दुर्मति को मैं भाग्य से नहीं ही जलूँगा ऐसा निश्चय कर अग्निकुण्ड में कूद पड़ना चाहिए। यदि कर्ता धर्ता सब कुछ दैव ही है, तो पुरुष की चेष्टा से क्या प्रयोजन है ? स्नान, दान, उठना, बैठना, बोलना आदि सभी व्यापारों को दैव ही कर देगा। मनुष्य को शास्त्रों का उपदेश देने से किस फल की सिद्धि होगी, क्योंकि यह पुरुष तो बोलने के लिए भी स्वतन्त्र नहीं है दैव जैसा चाहता है वैसा उससे नाच नचाता है, फिर इस संसार में किस को क्या उपदेश दिया जाय ? इस लोक में शव को छोड़कर अन्य किसी में भी चेष्टा का अभाव नहीं देखा गया है, चेष्टा से ही फलप्राप्ति होती है, दैव से नहीं, इसलिए दैव निरर्थक है। जैसे लिखना, काटना आदि कार्यों में लेखनी, छुरा आदि और अंग परस्पर सम्बद्ध होते हैं, सम्बद्ध हुए दोनों में से एक में ही क्रियाकारिता देखी जाती है, दूसरे में नहीं, वैसे ही हस्त आदि के रहने पर उनसे ही ग्रहण आदि क्रिया होगी दैव उनसे अन्यथा सिद्ध होने के कारण करण नहीं हो सकता और अतएव हाथ, पैर, मन, बुद्धि आदि के सदृश क्रिया के करणत्वरूप से भी दैव की कल्पना की आशा नहीं करनी चाहिए। बच्चे से लेकर विद्वानों तक को मन और बुद्धि के सदृश भी इस दैव का अनुभव नहीं होता, इसलिए भी दैव सदा असत् ही है, क्योंकि उस के अस्तित्व का किसी को भी अनुभव नहीं होता। किंच, दैव की सिद्धि में कर्ता आदि ही दैव शब्द से कहे जायें तो दैव केवल कर्ता आदि का दूसरा नाम ही ठहरा। द्वितीय पक्ष में क्रिया में उपयोग रहित किसी दूसरे की दैव इस नाम से व्यर्थ ही कल्पना करनी होगी। यदि कहिए कि सभी पाण्डित्य आदिरूप समान फल की अभिलाषा से पढ़ते हैं, उनमें से कुछ ही को अध्ययनफल पाण्डित्य आदि प्राप्त होते हैं सबको नहीं, इस विषमता में किसी न किसी निमित्त की अवश्य कल्पना करनी चाहिए। कार्य की जो विषमता देखी जाती है वह दैव की कल्पना में प्रमाण है, यह कथन भी ठीक नहीं है, क्योंकि कार्यवैषम्य को दैव की कल्पना में प्रमाण मानो, तो कार्यवैषम्य से पूर्व जन्म के पौरुष की ही कल्पना क्यों नहीं करते ? अप्रसिद्ध दैव की कल्पना क्या आवश्यकता है ? जैसे मूर्तियुक्त हम लोगों का अमूर्त आकाश से संयोग नहीं हो सकता वैसे ही अमूर्त दैव का अन्य कारण के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता, अतः मूर्त का ही परस्पर संयोग दिखाई देता है, अतः दैव कोई पदार्थ नहीं है। यदि प्राणियों को व्यापार में लगाने वाला दैव नामक कोई होता तो तीनों लोकों में सब प्राणी दैव ही सब कुछ करेगा ऐसा निश्चय करके सो जाते। दैव से प्रेरित हुआ मैं दैव के संकल्प से सिद्ध ऐसा कार्य करता हूँ, यह वचन आश्वासनमात्र है परमार्थतः दैव कोई पदार्थ नहीं है। मूर्ख लोगों ने अपने मन से दैव की कल्पना कर रखी है, जो लोग दैव पर निर्भर रहे उनका सर्वनाश ही हुआ है, बुद्धिमान पुरुष तो पौरुष का अवलम्बन कर उत्तम पद को प्राप्त हुए हैं। भला कहिए तो सही जो लोग शूरवीर हैं, जो पराक्रमशाली हैं, जो बुद्धिमान हैं और जो विद्वान हैं क्या वे इस लोक में दैव की प्रतीक्षा करते हैं ?।।2-17।।
यदि कहिए ज्योतिषी जो ग्रहों का वर्णन करते हैं, वही दैव है, सो ठीक नहीं, क्योंकि ग्रह तो अपनी गतिविशेष से पौरुष और उसके फल का सूचन ही करते हैं, फल के कारण नहीं है, इस अभिप्राय से कहते हैं।
ज्योतिषियों द्वारा जिसकी बहुत बड़ी आयु का निर्णय किया गया है, यदि वह सिर फटने पर भी जीवित रहे, तो दैव उत्तम कारण है। हे रामचन्द्रजी, ज्योतिषियों ने जिसके विषय में यह बड़ा भारी विद्वान होगा ऐसा निर्णय किया है, वह यदि बिना पढ़ाये ही विद्वान हो जाय, तब दैव को उत्तम कारण कहना चाहिए। हे राम, देखो, इन महामुनि श्रीविश्वामित्रजी ने दैव को दूर फेंककर पौरुष के अवलम्बन से ही ब्राह्मणत्व प्राप्त किया, अन्य उपाय से नहीं। हम लोगों ने एवं अन्यान्य और लोगों ने जो कि मुनि बने हैं, चिरकाल के प्रयत्न से ही आकाशगति प्राप्त की है।।18-21।।
जो इन्द्र आदि देव हैं, वे भी पौरुष से पराजित हुए थे, यह बात प्रसिद्ध है।
हिरण्यकशिपु आदि दैत्यराजों ने अपने पुरुषप्रयत्न से ही देवताओं को तहस नहस कर तीनों भुवनों में साम्राज्य किया था और इन्द्र आदि देवराजों ने पौरुष के अवलम्बन से ही शत्रुसेना को काटकर और जर्जरितकर इस विशाल जगत् को दानवों से छीना था। हे रामजी, राल एवं मधुमक्खी का छत्ता आदि के लेपन आदिरूप प्रसिद्ध पौरुषयुक्ति से बाँस की टोकरी में चिरकाल तक बड़ी खूबी के साथ पानी रक्खा जाता है, इसमें पौरुष ही कारण है, दैव नहीं। आत्मीयजनों का भरण-पोषण, जबरदस्ती दूसरे के राष्ट्र को छीन लेना, क्रोध से दूसरे को दण्ड देना, भोग-विलास एवं अन्यान्य रोगादिनिवृत्ति आदिरूप परिश्रमसाध्य पुरुषार्थों के प्रति पराक्रम, मणि, मन्त्र और औषधि में जैसी शक्ति देखी जाती है वैसी दैव में शक्ति नहीं है, वे सब पौरुष से ही सिद्ध होते हैं। हे साधुचरित श्रीरामजी, सम्पूर्ण कारणों और कार्यों से रहित अपने भ्रम से बने हुए के सदृश मिथ्यारूप असत्य दैव की उपेक्षा कर तुम उत्तम पौरुष का अवलम्बन करो।।22-26।।
आठवाँ सर्ग समाप्त
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मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 31 (मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण)


सातवाँ सर्ग
प्रचुर उदाहरण और प्रत्युदाहरणों तथा युक्तियों से पौरुष की प्रधानता का समर्थन।

दैव का निराकरण कर पहले जो पौरुषप्रधानता का समर्थन किया गया था, उसी को उदाहरण और प्रत्युदाहरण द्वारा दृढ़ करने वाले श्रीवसिष्ठजी उपपत्तिपूर्वक हितोपदेशद्वारा अधिकारियों को पुरुषार्थ की ओर आकृष्ट करते हैं।
श्रीवसिष्ठजी ने कहाः श्रीरामजी, रोगरहित, स्वल्प मानसिक पीड़ा से युक्त देह को प्राप्त कर आत्मा में इस प्रकार चित्त की एकाग्रता करे कि जिससे फिर जन्म ही न हो। जो पुरुष पौरुष से दैव को जीतने की इच्छा करता है, उसके इस लोक में और परलोक में सम्पूर्ण मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। जो लोग उद्यम का परित्याग कर दैव पर निर्भर रहते हैं, वे आत्मशत्रु अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष का विनाश करते हैं। पुरुषार्थ और उसके साधनों की स्फूर्ति संवित्स्पन्द है उससे उनके साधन की इच्छा से जन्य प्रयत्न मनःस्पन्द है अर्थात् दृढ़संकल्प, उससे कर्मेन्द्रियों और अंगों के संचालन की प्रवृत्ति इन्द्रियस्पन्द है अर्थात् कार्यप्रवृत्ति या अनुष्ठान में रत होना। बुद्धि, मन और कर्मेन्द्रियों की उक्त चेष्टाएँ पौरुष के रूप हैं उक्त पुरुषप्रयत्नों से ही संकल्पित फल की प्राप्ति होती है। साक्षी चेतन में पहले जैसी विषयाभिव्यक्ति (विषय़ ज्ञान) होती है, वैसी ही मन में क्रिया होती है, मन के व्यापार के अनुसार कर्मेन्द्रियों में व्यापार होता है, कर्मेन्द्रियों के व्यापार के अनुरूप शारीरिक क्रिया के अनुसार ही फल की सिद्धि होती है। लोक में लौकिक या वैदिक फल के लिए जहाँ जैसे जैसे पुरुषप्रयत्न की आवश्यकता होती है वहाँ वैसे ही पुरुषप्रयत्न के उपयोग से फल की सिद्धि होती है यह बात बच्चों तक को विदित है। जैसे ध्यान आदि में मानसिक प्रयत्न ही प्रधान है, आसन तथा मौन उसके अंग हैं, स्तुति करने में वाचिक प्रयत्न प्रधान हैं, एकाग्रता और ध्येय देवता की अभिमुखता उसके अंग हैं, यात्रा आदि में कायिक प्रयत्न ही प्रधान है, वाणी और मन का नियन्त्रण उसके अंग हैं। कहीं पर दो दो प्रयत्न प्रधान रहते हैं, कहीं पर तीन प्रयत्न प्रधान रहते हैं, इस प्रकार सब जगह पौरुष ही देखा जाता है, दैव तो कहीं देखा नहीं गया, इसलिए वह असत् है। हे श्रीरामजी, पुरुषप्रयत्न से ही बृहस्पति देवताओं के गुरु बने और पुरुषार्थ से ही शुक्राचार्य ने दैत्यराजों का गुरुत्वपद प्राप्त किया था। दीनता, दरिद्रता आदि दुःखों से पीड़ित हुए भी अनेक महापुरुष अपने पौरुष से (प्रयत्न से) ही महेन्द्र के सदृश ऐश्वर्यशाली हो गये हैं। हरिश्चन्द्र, नल, युधिष्ठिर आदि का इतिहास इस बात का साक्षी है। महासम्पत्तियों का उपभोग करने वाले तथा उन विपुल वैभवों के अधिपति जिनका कि स्मरण करने में आश्चर्य होता है, नहुष आदि महापुरुष अपने ही पौरुषदोष से नरकगामी हुए, उत्कट पद से भ्रष्ट हुए। सभी प्राणी हजारों सम्पत्तियों और विपत्तियों को और विविध दशाओं को अपने भले बुरे पुरुषप्रयत्न से ही पार करते हैं। हे रामचन्द्रजी, शास्त्राभ्यास,गुरुउपदेश और अपना परिश्रम इन तीनों से ही पुरुषार्थ की सिद्धि देखी जाती है, लौकिक पुरुषार्थ अपने परिश्रम से ही सिद्ध होते हैं, यज्ञ, याग आदि अपने परिश्रम और शास्त्र की सहायता से सिद्ध होते हैं और ज्ञान अपने परिश्रम, शास्त्र की सहायता तथा गुरु के उपदेश से सिद्ध होता है, इस प्रकार की तीन सिद्धियाँ पुरुषार्थ से ही देखी जाती हैं, दैव से सिद्धियाँ कभी नहीं देखी गई। अपना अभ्युदय चाहने वाला पुरुष अशुभ कर्मों में संलग्न मन को प्रयत्न से शुभ कर्मों में लगाये, यह सम्पूर्ण शास्त्रों के सारांश का संग्रह है। वत्स, जो वस्तु कल्याणकारी है, तुच्छ नहीं है (सर्वोत्कृष्ट है), जो विनाश रहित (अविनाशी) है, उसी का प्रयत्न से सम्पादन करो, ऐसा उपदेश गुरुजन सदा देते हैं। जैसे-जैसे मैं प्रयत्न करूँगा, वैसे वैसे ही मुझे शीघ्र फल प्राप्त होगा, ऐसा निश्चय करके मैं प्रयत्न से शुभ फल का भाजन हुआ हूँ, दैव से मेरा कुछ भी उपकार नहीं हुआ। पौरुष से पुरुषों को अभीष्ट पदार्थ प्राप्त होते हैं और पौरुष से बुद्धिमान जनों के पराक्रम की वृद्धि होती है। दैव तो दुःखसागर मे डूबे हुए दुर्बल चित्त वाले लोगों के आँसू पोंछना मात्र है और कुछ नहीं है, भाव यह कि दुःखी लोगों को समझाने बुझाने और ढाढ़स बाँधने के लिए लोग दैव-दैव पुकारते हैं। लोक में प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से पुरुषप्रयत्न का फल अन्य देश में गमन आदि सब लोगों को सदा दिखाई देता है। यदि पुरुष पौरुष का अवलम्बन नहीं करे, तो उसका अन्य देश में गमन कैसे हो सकता है ? जो पुरुष भोजन करता है वही तृप्त होता है, जो भोजन नहीं करता वह कभी भी तृप्त नहीं हो सकता, जो चलता है वही अन्य देश में पहुँचता है, गमन न करने वालों की कदापि अन्यदेश में गति नहीं हो सकती, जो वक्ता है, वही बोल सकता है, जो अवक्ता है वह क्या बोलेगा ? इससे सिद्ध है कि पुरुषों का पुरुषप्रयत्न ही सफल है, दैव नहीं। पौरुष से ही बुद्धिमान पुरुष बड़े भीषण संकटों को बात ही बात में पार कर जाते हैं, न कि पौरुषरहित (अकर्मण्यतारूप) दैव पर निर्भर होकर। जो पुरुष जैसा-जैसा प्रयत्न करता है, उसे वैसा-वैसा फल प्राप्त होता है, इस लोक में जो हाथ पर हाथ रखकर चुपचाप बैठा रहता है, उसे तनिक भी फल नहीं मिल सकता। हे राम, पुरषार्थ से (पौरुष से) शुभ फल मिलता है और अशुभ पुरुषार्थ से अशुभ फल मिलता है, तुम्हें जैसे फल की अभिलाषा हो वैसे पुरुषार्थ का अवलम्बन कर उस फल के भागी बनो। पुरुषार्थी पुरुषों को देश और काल के अनुसार पुरुषप्रयत्न से कभी शीघ्र और कभी कुछ विलम्ब से जिस फल की प्राप्ति होती है, उसी को अज्ञानी उद्यमहीन व्यक्ति 'दैव' कहते हैं। न तो 'दैव' का नयनों से दर्शन होता है, न वह कहीं स्वर्ग आदि अन्य लोक में ही स्थित है। पुरुषार्थी का स्वर्गलोक में स्थित कर्मफल ही दैवनाम से पुकारा जाता है। इस लोक में पुरुष पैदा होता है, बढ़ता है, फिर वृद्ध होता है, पर उस पुरुष में जैसे वृद्धावस्था, यौवन और बाल्यावस्था दिखाई देती हैं, वैसे दैव नहीं दिखाई देता। अपने अभीष्ट को प्राप्त कराने वाली कार्यमात्रतत्परता को विद्वान लोग पौरुष कहते हैं, उसी से सब कुछ प्राप्त किया जाता है। एक स्थान से दूसरे स्थान की प्राप्ति पैरों के पुरुषार्थ से होती है, हाथ का किसी वस्तु को पकड़ना हाथ के पौरुष से होता है और इसी प्रकार अन्यान्य अंगों के अन्यान्य व्यापार (चेष्टाएँ) पौरुष से ही होते हैं, दैव से नहीं। अनभीष्ट पदार्थ की प्राप्ति कराने वाले कार्य में जो संलग्नता है, वह उन्मत्त की चेष्टा है, उससे कोई भी शुभ फल प्राप्त नहीं होता, अशुभ (नरकपात आदि) फल ही प्राप्त होता है। देहचालनपरम्परारूप गुरुसेवा और श्रवण आदि क्रिया से तथा सज्जन संगति और शास्त्रपरिशीलन आदि से तीक्ष्ण हुई बुद्धि से जो स्वयं अपनी आत्मा का उद्धार किया जाता है, वही स्वार्थसाधकता है। अज्ञानकृत विषमता की निवृत्ति से उपलक्षित अनन्त आनन्दरूप अपने परमार्थ को जो जानते हैं और जिनसे उक्त आनन्द प्राप्त किया जाता है, उन शास्त्र और महात्माओं की प्रणिपातपूर्वक सेवा करनी चाहिए। बार-बार सज्जन संगति का फल उनके तुल्य शील स्वभाव की प्राप्ति है और शास्त्राभ्यास का फल शास्त्र तात्पर्यज्ञान है। बुद्धि से सत् शास्त्राभ्यासरूप गुण होता और सत् शास्त्र के अभ्यास से बुद्धि की वृद्धि होती है। जैसे वर्षाकाल में तालाब और कमल परस्पर की शोभा बढ़ाते हैं, वैसे ही चिरकाल के अभ्यास से मति और मति से शास्त्राभ्यास की वृद्धि होती है। भाव यह कि मनुष्य जैसे जैसे गुरुसेवा और शास्त्राभ्यास में तत्पर होता है वैसे वैसे उसका बोध बढ़ता है और जैसे जैसे बोध की अभिवृद्धि होती है वैसे वैसे गुरु और शास्त्र में विश्वास बढ़ता है। उनकी वृद्धि होने पर सुख की वृद्धि होती है, तदनन्तर उत्तरोत्तर भूमिका में आरूढ़ होता है।।1-29।।
तत्त्वबोध की वृद्धि के लिए बहुत काल तक यत्न करना चाहिए ऐसा कहने के लिए उक्त बात को ही पुनः कहते हैं।
बाल्यावस्था से लेकर पूर्णरूप से अभ्यस्त शास्त्र एवं सत्संग आदि गुणों से पौरुष द्वारा अपना हितकारी स्वार्थ सिद्ध होता है। भगवान विष्णु ने पौरुष से ही दैत्यों के ऊपर विजय प्राप्त की, पौरुष से ही लोकों कि क्रियाएँ नियत की और पौरुष से ही लोकों की रचना की, दैव से नहीं। हे रघुनन्दन, इस जगत् में केवल पुरुषप्रयत्न ही पुरुषार्थ का हेतु है। यहाँ आप चिरकाल तक वैसा पौरुष कीजिए जैसे कि हे सौम्य, आप वृक्ष, सर्प आदि योनियों को प्राप्त न हों।।30-32।।

सातवाँ सर्ग समाप्त
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रविवार, 7 अक्टूबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 30 (मुमुक्षु-व्यवहार प्रकरण)


छठा सर्ग
जहाँ प्रयत्न करने पर भी कार्य विनाश होने पर प्रबल दैव कार्य विनाशक माना जाता है, वहाँ पर विघातक अन्य पुरुष का प्रयत्न ही 'दैव' शब्द से कहा जाता है अथवा अपना प्राक्तन बलवान पौरुष ही दैव कहा जाता है।
श्रीवसिष्ठजी ने कहाः श्रीरामचन्द्र पौरुष से अतिरिक्त दैव कोई वस्तु नहीं है, इसलिए पूर्वजन्म में किया गया पुरुषप्रयत्न ही दैव है। अतएव मैं दैव के आधीन हूँ, स्वतन्त्र नहीं हूँ, ऐसी बुद्धि का सज्जन संगति एवं सत्शास्त्र के अभ्यास से सर्वथा परित्याग कर अधिकारी मनुष्य को इस संसार सागर से अपना उद्धार करना चाहिए। जैसा जैसा प्रयत्न होगा वैसा वैसा शीघ्र फल होगा, इसी का नाम पौरुष है और उसी को दैव भी कहते हैं, दैव और पौरुष में कोई अन्तर नहीं है। जैसे दुःख के समय में दुःख से 'हा कष्ट' कहा जाता है, वैसे ही 'हा कष्ट' शब्द से कहा जाता है और वही 'दैव' है। दैव अपने प्राक्तन कर्म से भिन्न नहीं है। जैसे प्रबल पुरुष बालक को जीत लेता है, वैसे ही वह भी प्रबल पौरुष से जीता जा सकता है। जैसे कल का दुराचरण आज के सुन्दर सदाचरण से शुभता को प्राप्त होता है, वैसे ही प्राक्तन अशुभ कर्म की अशुभता वर्तमान शुभ कर्म से नष्ट हो जाती है। जो लोग तुच्छ विषयसुख के लोभ में पड़कर प्राक्तन कर्मरूपी दैव को जीतने के लिए प्रयत्न नहीं करते तथा सदा दैव के भरोसे बैठे रहते हैं, वे बेचारे पामर और मूर्ख हैं।।1-6।।
जहाँ कहीं दैव की प्रबलता प्रसिद्ध है, वहाँ पर भी पौरुष की ही प्रबलता है, यह कहते हैं।
यदि कहीं पर पुरुषप्रयत्न से किया गया कर्म दैव से (भाग्य से) विनष्ट हो जाय, तो वहाँ पर भी नाश करने वाले को पौरुष को बलवत्तर समझना चाहिए।।7।।
पुरुष के अधीन जो विषय हैं, उन्हीं में ऐसा हो सकता है, जो पुरुष के अधीन नहीं है, वे तो दैव पर ही निर्भर हैं – इस पर कहते हैं।
जहाँ एक टहनी में लगे हुए दो फलों में एक फल खोखला (रसशून्य) होता है वहाँ पर उसके रस का उपभोग करने वाले मनुष्य या कीड़े आदि का, पूर्वजन्म का या इस जन्म का प्रयत्न ही (पौरुष ही) उसके रस का विनाशक होता है। यहाँ पर जगत में संसिद्ध पदार्थ भी विनाश को प्राप्त हो जाते हैं, वहाँ पर विनाश करने वाले का प्रयत्न अधिक बलवान है, यह समझना चाहिए। पूर्वजन्म के और इस जन्म के कर्म (पौरुष) दो भेड़ों की भाँति परस्पर लड़ते हैं, उनमें जो बलवान होता है, वही दूसरे को क्षणभर में पछाड़ देता है। राजवंश के न रहने पर मन्त्री आदि द्वारा प्रेरित अलंकृत हाथी किसी भिक्षुक को लाकर जो बलात् राजा बना देता है, वह मन्त्री, हाथी और नगरवासियों के प्रयत्न का महान् बल है। भाव यह कि भिक्षुक का राज्य प्राप्ति के अनुकूल पूर्वजन्म का पुण्य होने पर भी मन्त्री आदि का पौरुष भी उसमें अन्यतर कारण कहा जा सकता है। यदि मन्त्री लोक हाथी को भेजना आदि उद्योग न करते, तो भिक्षुक का लड़का कदापि राजा न हो सकता। निस्सन्देह मंत्रियों को पुरुषप्रयत्न भिक्षुक के राज्यलाभ में सहकारी कारण है और भिक्षुक का बलवान पुण्य मुख्य कारण है। यह अवश्य स्वीकार करना होगा कि पुरुषप्रयत्न ही एक ऐसी चीज है जो साधारण व्यक्ति को भी बड़ा से बड़ा पद प्रदान कर सकती है। जैसे पुरुषप्रयत्न से भक्षण करने योग्य अन्न को मुँह में दबाकर फिर दाँतों से चूर चूर किया जाता है वैसे ही बलवान पुरुष पौरुष का अवलम्बन कर दुर्बल को पीस डालता है। अतः प्रयत्नशील महाबली पुरुषों के अल्प बलवाले पुरुष उपभोग होते हैं, इसलिए वे उनको ढेले के सदृश अपनी इच्छानुसार कर्म में नियुक्त करते हैं। असमर्थ और अल्पबुद्धि पुरुष बलवान् और बुद्धिमान् पुरुष के पौरुष को तत् तत् पुरुषप्रयत्न को, चाहे वह दृश्य हो चाहे अदृश्य, अपनी अज्ञानता के वश उसे 'दैव' या अदृष्ट समझता है। उन समर्थ प्राणियो में जो अधिक बलवान प्राणी होता है, वह औरों का नियन्ता होता है, यह बात सभी विद्यमान प्राणियों में परस्पर स्पष्ट है, दैव कोई वस्तु नहीं है, यह निश्चित है। भाव यह कि पूर्वोक्त समर्थ पुरुषों की अपेक्षा अधिक समर्थ अन्य पुरुष भी हैं, वे उनके ऊपर शासन करते हैं। अतएव वर्तमान प्राणियों में इस प्रकार पुरुषप्रयत्न ही दिखाई देता है, उससे अन्य कुछ नहीं दिखाई देता। अतः दैव कोई पदार्थ नहीं है, यही समझना युक्तियुक्त है। शास्त्र, मन्त्री, हाथी और नगरवासियों की एकमत्य को प्राप्त हुई स्वाभाविक बुद्धि ही भिक्षुक को राजा बनाने वाली और प्रजा की रक्षिका है।।8-16।।
अन्य के पौरुष से अन्य को फल की प्राप्ति होने पर व्यभिचार की आशंका कर कहते हैं।
अथवा, जहाँ कहीं अलंकृत हाथी से भिक्षुक राजा बनाया जाता है, वहाँ पर भिक्षुक का पूर्वजन्म का प्रबल पौरुष भी कारण है। इस जन्म में किया गया प्रबल पुरुषप्रयत्न अपने बल से पूर्वजन्म के पौरुष को नष्ट कर देता है और पूर्वजन्म का प्रबल पौरुष इस जन्म के पौरुष को अपने बल से नष्ट कर देता है। वही पौरुष सदा विजयी होता है, जो उद्वेग से रहित है। इसी जन्म का ही पौरुष उद्वेगशून्य हो सकता है, पूर्वजन्म का नहीं, क्योंकि वह पहले ही विच्छिन्न हो चुका है, यह भाव है।।17,18।। दोनों (ऐहिक और प्राक्तन) पौरुषों में से ऐहिक पौरुष ही प्रत्यक्षतः बलवान है, इसलिए जिस प्रकार युवक द्वारा बालक जीता जा सकता है, वैसे ही इस जन्म के प्रयत्नों द्वारा दैव (पूर्वजन्म का प्रयत्न) जीता जा सकता है।।19।।
ओले आदि गिरने से खेती के विनाश आदि में इससे विपरीत ही (पौरुष से दैव ही प्रबल) देखा जाता है, ऐसी आशंका करके उक्त दृष्टान्त भी हमारे अभीष्ट की ही सिद्धि करता है, ऐसा कहते हैं।
जैसे मेघ किसानों द्वारा वर्ष भर में कमाई गई खेती को एक ही दिन में विनष्ट कर देता है, यह मेघ का ही पुरुषार्थ है, वैसे ही और जगह भी समझना चाहिए जो अधिक प्रयत्न करता है, उसकी जीत होती ही है। वस्तुतः तो वहाँ पर भी किसान का पूर्व जन्म का पुरुषप्रयत्न ही अदृष्ट कारण है। क्रमशः उपार्जित धन का विनाश हो जाने पर भी खेद नहीं करना चाहिए जहाँ पर अपना कुछ वश नही चलता, वहाँ पर क्या खेद करना ? वहाँ पर पुनः उद्योग करना ही उचित है। जिस कार्य को हम लोग कर नहीं सकते, जो हमारी शक्ति के बाहर है, उसके लिए यदि हम दुःख करें, तो हमने मृत्यु का विनाश नहीं किया, वह कभी न कभी हमें मार डालेगा, यों सोच कर प्रतिदिन रोना चाहिए। इस संसार के सम्पूर्ण पदार्थ देश, काल, क्रिया और द्रव्य के अनुसार स्फूर्ति को प्राप्त होते हैं, जिस विषय में मनुष्य अधिक प्रयत्न करता है, उसमें विजयी होता है।।20-23।।
जिस देश में जिस काल में प्रयत्न विफल हो जाय, उसका त्याग कर दूसरे देश में, दूसरे काल में, दूसरी क्रिया से और दूसरे द्रव्य से पुनः प्रयत्न करना चाहिए, क्योंकि पूर्व आदि दिशाओं में विघ्न आने पर भी श्रीविश्वामित्रजी के तप की उत्तर दिशा में सिद्धि हुई थी, यह तात्पर्य है।
इसलिए अधिकारी मनुष्य को पुरुषार्थ का अवलम्बन कर, सत् शास्त्रों के अभ्यास और सत्संगति द्वारा बुद्धि को निर्मल बना कर संसाररूप सागर से अपना उद्धार करना चाहिए। ये इस जन्म और पूर्व जन्म के दोनों पौरुष पुरुषरूपी अरण्य में उत्पन्न फल देने में समर्थ वृक्ष हैं, उनमें से जो अधिक बलवान होता है, वह विजयी होता है। यहाँ पर जड़ का उच्छेद होने से एक के सूखने पर दूसरे का उगना जय है। जो पुरुष अपने ऐहिक शुभ कर्मों से पूर्वजन्म के तुच्छ कर्म का विनाश नहीं करता, वह अज्ञानी जीव अपने सुख और दुःख में असमर्थ है, भाव यह कि ऐसे लोग अपने दुःख के परिहार  और सुख के उत्पादन में अत्यन्त उदासीन हैं। वह पुरुष ईश्वर की प्रेरणा से पुण्य और पाप के बिना ही स्वर्ग अथवा नरक को जाता है, वह सदा पराधीन रहता है, वह सचमुच पशु ही है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है। जो पुरुष उदार स्वभाव से प्रयत्न करने में कुशल और सदाचारी हैं, वे पुरुष जैसे सिंह अपने उद्यम से पिंजड़े से निकल जाता है, वैसे ही जगन्मोह से निकल जाते हैं। जो पुरुष कर्म का त्यागकर कोई पुरुष (ईश्वर) मुझे प्रेरित कर रहा है, इस प्रकार अनर्थकारिणी कुकल्पना में स्थित है, उसका दूर से ही त्याग कर देना चाहिए, वह नराधम है।।24-29।।
(शंका- एष ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेम्यो लोकेभ्य उन्निनीषते (यही उस पुरुष से अच्छे कर्म करवाता है, जिसका इस लोक से उद्धार करने की इच्छा करता है) य आत्मनि तिष्ठन् आत्मनमन्तसे यमयति (जो अन्तर्यामी आत्मा में स्थित होकर आत्मा का नियन्त्रण करता है), ईश्वरः सर्वभूतानां हृदेशेऽर्जुन तिष्ठति (हे अर्जुन, ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में स्थित है) इत्यादि श्रुति और स्मृतियों से विरुद्ध ईश्वर का अपलाप कर जीव की स्वतन्त्रता कैसे कहते हैं ?
समाधान- आप भी 'यथाकारी यथाचारी तथा भवति तथा भवति साधुकारी साधुर्भवति पापकारी पापो भवति (जैसा करता है वैसा होता है, साधुकर्मकारी साधु होता है और पापकर्मकारी पापी होता है), 'यजेत् जुहुयाद् दद्यात्' (यज्ञ करें, हवन करें, दान दें) 'कर्त्ता, शास्त्रार्थवत्वात्' (आत्मा कर्त्ता है, क्योंकि कर्त्ता को अपेक्षित उपायों का बोध कराने वाला विधिशास्त्र निरर्थक हो जायगा), 'न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः' (ईश्वर जीवों के न कर्तृत्व की सृष्टि करते हैं और न कर्मों की सृष्टि करते हैं) इत्यादि श्रुति और स्मृति से विरुद्ध जीव की परतन्त्रता का प्रतिपादन कैसे करते हैं ? अस्वतन्त्र जीव कर्ता नहीं हो सकता, क्योंकि यदि अस्वतन्त्र को कर्ता मानेंगे, तो 'स्वतन्त्रः कर्ता' इस शास्त्र से विरोध होगा। बलवान ईश्वर की अधीनता में स्थित पुरुष सैंकड़ों विधियों और हजारों निषेधों से न तो किसी कर्म में प्रवृत्त किया जा सकता है और न निवृत्त किया जा सकता है। दूसरी बात यह भी है कि ईश्वर द्वारा जबरदस्ती ब्रह्महत्या आदि दुष्कर्मों में प्रवृत्त कराया गया जीव कैसे अपराधी होगा और स्वयं ही लोगों को बुरे कर्मों में प्रवृत्त कराकर उन्हें नरक में गिरा रहे भगवान वैषम्य और नैर्घृण्य दोष के भागी क्यों न होंगे ? और अन्तर्यामी ब्राह्मण के अन्त में 'नान्योऽतोऽसि द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता नान्योऽतोऽस्ति मन्ता' इत्यादि से जीव के अपलाप द्वारा ईश्वरस्वातन्त्र्यका समर्थन कैसे संगत होगा ?
यदि कहिये केवल अज्ञ पुरुष की दृष्टि का अवलम्बन कर कर्मकाण्डप्रवृत्ति में जीवस्वातन्त्र्यवाद है, उसको शिथिल कर सम्पूर्ण भूतों में एकात्म्यज्ञान के लिए प्रवृत्त विवेकदृष्टि का अवलम्बन कर ईश्वरस्वातन्त्र्यावाद है, उसके फलभूत ज्ञान से प्राप्त विवेकदृष्टि का अवलम्बन करके 'तदेतद् ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः' (यह ब्रह्म कारण शून्य, कार्यरहित, अनन्तर, अबाह्य, सर्वरूप से सबका अनुभव करने वाला है), 'न कर्तृत्वं न कर्माणि' इत्यादि श्रुतिवाद और स्मृतिवाद है। जैसे स्वप्न और दर्पण आदि में काष्ठहस्ती के धावन को हस्ती की दृष्टि से देखने पर हस्ती ही दौड़ता है न कि काष्ठ, काष्ठ की दृष्टि से देखने पर काष्ठ ही दौड़ता है न कि हस्ती, परमार्थदृष्टि से देखने पर तो न हस्ती है, न काष्ठ है और न धावन क्रिया ही है, केवल अविकृत पुरुष, दर्पण आदि ही हैं, वैसे ही ये वाद है, तो मोक्ष के उपाय के प्रवर्तक श्रीवसिष्ठ जी का प्रस्तुत उपदेश अज्ञ पुरुषों के लिए  है, इसलिए यहाँ पर ईश्वरस्वातन्त्र्यवाद का निराकरण उचित ही है। भगवान श्रीशंकराचार्यजी का भाष्य भी है - 'तमेतमविद्याख्यमात्मनोशास्त्राणि विधिनिषेधमोक्षपराणि' (इस अविद्यारूप आत्मा और अनात्मा के अन्योन्याध्यास का अवलम्बन कर सभी प्रमाण, प्रमेय आदि लौकिक व्यवहार और विधि, निषेध तथा मोक्षपरक सम्पूर्ण शास्त्र भी प्रवृत्त हैं)।
इस प्रकार अज्ञानी जीव की दृष्टि से सिद्ध जीवस्वातन्त्र्य – पक्ष में प्राप्त कर्मों के अनुसार नियन्त्रण करने वाले ईश्वर में वैषम्य और नैर्घृण्य दोष नहीं है, यह भाव है।
संसार में हजारों जो व्यवहार हैं, उनमें लाभ और हानि हुआ करते हैं। उनमें राग और द्वेष का त्यागकर शास्त्रानुसार प्रयत्न करना चाहिए। कभी विच्छिन्न न हुई शास्त्रानुकूल अपनी मर्यादा का त्याग न कर रहे पुरुष को जैसे सागर में रत्न प्राप्त होते हैं, वैसे ही सम्पूर्ण अभीष्ट प्राप्त होते हैं। जिनसे सुखप्राप्ति और दुःखनिवृत्ति होती है, उन अवश्य कर्तव्य कार्यों में प्रयत्नपूर्वक सदा तत्पर रहने को ही विद्वान लोग पौरुष कहते हैं, उक्त तत्परता यदि शास्त्रानुसार हो, तो वह परमपुरुषार्थ की साधक होती है। देहसंचालनरूप क्रिया से (गुरु सेवारूप कार्य से), सज्जनों के समागम एवं आत्मस्वरूप का प्रतिपादन करने वाले सत्शास्त्रों के अभ्यास से असंभावना, विपरीत भावना आदि दोषों के निराकरणपूर्वक तीक्षण हुई बुद्धि से आत्मा का जो स्वयं उद्धार किया जाता है, वह स्वार्थसाधकता है। विद्वान लोग अन्तरहित एवं अज्ञानकृत विषमता से शून्य परमार्थ वस्तु को (ब्रह्म) जानते हैं। उक्त परमार्थ वस्तु जिनसे प्राप्त हो, उन शास्त्र और साधुओं की सदा सेवा करनी चाहिए। जो दोनों लोकों में हित करने वाला पुरुष प्रयत्न है, देवलोक के भोग से अवशिष्ट वही पूर्वजन्म का पौरुष देवलोक से यहाँ आये हुए पुरुष का 'दैव' कहलाता है। यह ठीक है, इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है और इसकी हम निन्दा भी नहीं करते हैं। जो लोग मूढ़ों द्वारा अपनी कपोलकल्पना से गढ़े हुए 'दैव' को मानते हैं, वे विनाश को प्राप्त हो गये हैं, यों हम उनकी निन्दा करते हैं। सदा अपने पुरुषप्रयत्न से ही दोनों लोकों में हित होता है, जैसे कलका दुष्कर्म आज के सत्कर्म से शोभा को प्राप्त होता है, वैसे ही वर्तमान जन्म के शुभ कर्मों से पूर्वजन्म के दुष्कर्म शोभा को प्राप्त हो जाते हैं। जो मनुष्य प्रयत्नपूर्वक शुभ कार्य में संलग्न होता है, उसका फल हाथ में रक्खे हुए आँवले के समान पौरुष से ही साफ देखा गया है। जो प्रत्यक्ष का त्यागकर दैवरूप मोह में निमग्न होता है वह परम मूढ़ है। हे श्रीरामचन्द्र, इसलिए अपनी कोरी कपोलकल्पना से उत्पन्न अतएव मिथ्याभूत सम्पूर्ण कारण और प्रयोजनों से रहित 'दैव' की उपेक्षा कर अपने पौरुष का अवलम्बन करो।।30-39।।
वह पौरुष क्या है, जिसके अवलम्बन के लिए आप उपदेश देते हैं ? इस पर कहते हैं।
वेद-शास्त्रों द्वारा और महापुरुषों के शुभ आचार से अति विस्तृत विविध देश धर्मों द्वारा समर्थित जो चित्तशुद्धिरूप और ज्ञानरूप अति प्रसिद्ध फल है, उसकी हृदय में अति उत्कट अभिलाषा होने पर उसको प्राप्त करने की इच्छा से चित्त में क्रिया होती है, उसके अनन्तर इन्द्रिय, हाथ, पैर आदि में क्रिया होती है, तब पुरुष श्रवण, मनन आदि करता है, इसी को पौरुष कहते हैं। अधिकारी पुरुष का जन्म पुरुषार्थ की सिद्धि होने पर ही सफल होता है, अन्यथा नहीं, यह जानकर सदा आत्मप्रयत्न में संलग्न रहना चाहिए। तदुपरान्त इस प्रयत्नपरायणता को सत्शास्त्रों के अभ्यास, सन्त महात्माओं और विद्वानों की सेवा द्वारा आत्मज्ञानरूप फलप्राप्ति से सफल बनाना चाहिए। यदि पौरुष का अवलम्बन किया जाय, तो वह अवश्य दैव को जीत लेता है, इस प्रकार दैव और पौरुष के बलाबल के विचार से भव्य शम, दम आदि साधनों से सम्पन्न एवं श्रेष्ठ पुरुषों की सेवा में नित्य संलग्न अधिकारी पुरुषों का श्रवण, मनन आदि करता है, इसी को पौरुष कहते हैं। अधिकारी पुरुष का जन्म पुरुषार्थ की सिद्धि होने पर ही सफल होता है, अन्यथा नहीं, यह जानकर सदा आत्मप्रयत्न में संलग्न रहना चाहिए। तदुपरान्त प्रयत्नपरायणता को सत्शास्त्रों के अभ्यास, सन्त महात्माओं और विद्वानों की सेवा द्वारा आत्मज्ञानरूप फलप्राप्ति से सफल बनाना चाहिए। यदि पौरुष का अवलम्बन किया जाय, तो वह अवश्य दैव को जीत लेता है, इस प्रकार दैव और पौरुष के बलाबल के विचार से भव्य, शम, दम आदि साधनों से सम्पन्न एवं श्रेष्ठ पुरुषों की सेवा में नित्य संलग्न अधिकारी पुरुषों को श्रवण, मनन आदि द्वारा तत्त्वज्ञान की प्राप्ति के लिए उद्यम करना चाहिए। यह अधिकारी जीव को इस जन्म में सम्पादन करने योग्य सहज पौरुष ही परम पुरुषार्थलाभ का हेतु है, ऐसा निश्चय कर सदा आनन्दमग्न सर्वोत्कृष्ट ब्रह्मवेत्ताओं की शुश्रुषारूप अमोघ मधुर उत्तम औषधि से विविध जन्ममरणपरम्परारूप भवरोग को शान्त करें।।40-43।।

छठा सर्ग समाप्त
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