मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

बुधवार, 19 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 17


छब्बीसवाँ सर्ग
वैराग्य की उत्पत्ति के लिए विविध दोषों द्वारा कालाधीन संसार की अनेक दुर्दशाओं का वर्णन।

काल ऐसा करे उससे तुम्हारा क्या बिगड़ता है, ऐसी आशंका कर काल आदि सब वस्तुओं में आगे अपनी दोषदृष्टि दर्शाने वाले श्रीरामचन्द्रजी उसके फलभूत वैराग्य को दिखलाते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः मुनिश्रेष्ठ, जब इस संसार में पूर्वोक्त काल आदि का इस प्रकार का चरित्र है तब भला बतलाइये तो सही इसमें मेरे जैसे मनुष्यों का विश्वास कैसे हो सकता है ? मुनिवर, यह बड़े दुःख का विषय है कि शब्द आदि विषयों के विस्तार में दक्ष इन दैव आदि (पूर्व जन्म के कर्म आदि) से प्रपंच-रचनाओं द्वारा मोहित हुए हम लोग विक्रीत पुरुषों (गुलामों) के समान एवं वनमृगों के समान स्थित हैं अर्थात् जैसे विक्रीत पुरुष (क्रीतदास) अपनी इच्छा से कोई काम भी नहीं कर सकता और जैसे व्याधों द्वारा मधुर ध्वनि से विमोहित मृग कुछ भी चेष्टा नहीं कर सकते हैं वैसे ही दैव आदि द्वारा मोहित हम लोगों की अवस्था है। यह काल सदा अपना पेट भरने में ही लगा है और इसका चरित्र बड़ा गर्हित है, यह जिन लोगों की भोगतृष्णा और जीविततृष्णा पूर्ण नहीं हुई है, उन्हें आपत्तियों से परिपूर्ण संसार में गिराता है। मुनिश्रेष्ठ, जैसे अग्नि उष्ण और प्रकाशपूर्ण ज्वालाओं से दाह्य पदार्थों को जला देती है, वैसे ही यह संहारकारी काल भी दुराशाओं से हृदय को जलाता है और दुष्ट चारित्र्य से बाहर भी जलाता है। कालमर्यादारूप कृतान्त की प्रिय भार्या इन्द्रियों की विषयों में प्रवृत्ति कराने वाली यह नियति, स्त्री होने के कारण, स्वभावतः चंचल है, यह समाधि में तत्पर लोगों के ऊपर भी हाथ फेर लेती है और उनके धैर्य की तो यह महाशत्रु  है, उसे टिकने नहीं देती। जैसे साँप वायु को निगल जाता है, वैसे ही यह क्रूर कर्म करने वाला कृतान्त तरुण शरीर को बुढ़ापे में पहुँचाकर सब प्राणियों को निरन्तर निगलता रहता है। यह काल निर्दयों का राजा है, किसी आर्त प्राणी के ऊपर भी दया नहीं करता। सब प्राणियों पर दया करने वाला उदार पुरुष तो इस संसार में दुर्लभ हो गया है।।1-6।। मुनिवर, संसार में जितने भी प्राणी हैं, उनमें किसी का भी ऐश्वर्य पूर्ण नहीं है, सभी तुच्छ ऐश्वर्य वाले हैं। जितने भी विषय हैं, वे सभी भयानक हैं। उनसे अनन्त दुःख की ही प्राप्ति होती है। आयु अत्यन्त चंचल है, उसके जाने में कुछ भी विलम्ब नहीं होता और बाल्यावस्था मोह में ही बीत जाती है। सभी संसारी पुरुष विषयों के अनुसन्धान से ही कलंकित (मलिनचित्त) है, बन्धु-बान्धव संसाररूप बन्ध के लिए रज्जूरूप हैं। सभी भोग संसाररूपी महारोग हैं, अर्थात् जैसे अपथ्यसेवन से रोग नष्ट नहीं होता, वैसे ही भोगों के सेवन से संसाररूपी महारोग बना रहता है, अतएव उन्हें मूर्तिमान महारोग ही समझना चाहिए। सुख आदि की तृष्णाएँ मृगतृष्णा के अनुरूप हैं। इन्द्रियाँ ही अपनी शत्रु हैं, सत्य, ज्ञान आदिरूप वस्तु (ब्रह्म) अज्ञानवश असत्यता (देहादिता) को प्राप्त हो गयी है। बन्धन का हेतु होने से मन आत्मा का शत्रु है एवं मन में अहम् ऐसा अभिमान करने से मनोभूत हुआ उक्त आत्मा आत्मा को आत्मभूत मन से ही दुःखी करता है। अहंकार (अभिमानप्रधान अन्तःकरण) आत्मा के कलंक का कारण है, अर्थात् स्वरूप को दूषित कर देता है, बुद्धियों (अध्यवसायात्मक वृत्तियाँ) बड़ी मृदु हैं, आत्मनिष्ठा की दृढ़ता से रहित हैं, क्रिया अर्थात् शारीरिक प्रवृत्तियाँ क्लेशकारिणी हैं। लीलाएँ (मानसिक चेष्टाएँ) स्त्री पर ही केन्द्रित हो गई हैं, अर्थात् उनकी विषय केवल स्त्री ही हो गई हैं। वासनाओं के विषय ही लक्ष्य हो गये हैं याने विषयों की ओर ही वासनाएँ दौड़ती हैं। आत्मस्फूर्तिरूप चमत्कार नष्ट हो गये हैं, स्त्रियाँ दोषों की पताका के सदृश हो गई हैं और सम्पूर्ण विषय नीरस हो गये हैं। मुनिवर, सत् पदार्थ ब्रह्म कार्यकारण-संघातरूप से (देह, इन्द्रिय आदि रूप से) जाना जाता है, अर्थात् संसारी लोग देह, इन्द्रिय आदि को ही आत्मा समझते हैं, चित्त अहंकार में प्रविष्ट किया गया है अर्थात् लोगों का चित्त अहंकार से परिपूर्ण है, जितने पदार्थ हैं वे नाश से ग्रस्त हैं (विनाशी हैं)। उक्त अनित्य पदार्थों का जिसमें लय होता है, उस आत्मा को कोई नहीं जानता। श्रेष्ठतम बुद्धि ने सभी के अन्तःकरण को व्याकुल कर रक्खा है, किसी का अन्तःकरण सुखी नहीं है, केवल दुःख ही दुःख छाया है, रागरूपी रोग दिन-दिन बढ़ रहा है, वैराग्य का कोई पता नहीं। आत्मदर्शनशक्ति रजोगुण से नष्ट हो गई है और तमोगुण बढ़ रहा है, सत्वगुण का कोई पता नहीं एवं तत्त्वपदार्थ अत्यन्त दूर है। जीवन अत्यन्त अस्थिर है, मृत्यु आने के लिए तत्पर ही है, धैर्य का सर्वथा विनाश हो गया है और लोगों का तुच्छ विषयों में अनुराग नित्य बढ़ता जा रहा है। मति मूर्खता से मलिन  हो गई है, शरीर का अन्तिम परिणाम एकमात्र नाश ही है अर्थात् उसको अवश्य नष्ट होना है, शरीर में बुढ़ापा मानों प्रकाशित हो रहा है और पाप खूब दमदमा रहा है। दिन-प्रतिदिन जवानी प्रयत्नपूर्वक भाग रही है, सत्संगति का कहीं पता नहीं है, जिससे दुःख से छुटकारा प्राप्त हो जाये, ऐसी कोई गति नहीं है और सत्यता का उदय तो किसी में भी नहीं दिखाई देता। अन्तःकरण मोहजाल से अत्यन्त आच्छादित सा हो गया है, दूसरे को सुखी देखकर होने वाले सन्तोष का कहीं पता ही नहीं है, उज्जवल करूणा का कहीं उदय नहीं होता और नीचता न मालूम कहाँ से चली आ रही है। धीरता अधीरता में परिणत हो गई है, सम्पूर्ण जीवों का जन्म और मरण या उर्ध्वगमन और अधोगमन ही एकमात्र काम है, दुर्जन का संग पद-पद पर अतिसुलभ है, सज्जन की संगति अतिदुर्लभ है। सम्पूर्ण पदार्थ उत्पत्ति-विनाशशील हैं और वासना पदार्थों के नष्ट होने पर भी नष्ट नहीं होती। वही संसार में बन्धन कराने वाली है। काल नित्य प्राणियों के झुण्ड के झुण्ड को न मालूम कहाँ ले जाता है। दिशाएँ भी जिन्हें काल से हरे जाने का भय नहीं है, नहीं दिखाई देती, नष्ट हो जाती हैं, देश भी अदेश हो जाता है अर्थात नष्ट हो जाता है और पर्वत भी टूट जाते हैं, फिर मेरे सदृश जन्तु की स्थिरता में क्या विश्वास है ? सन्मात्रस्वभाववावाला ईश्वर आकाश को भी खा जाता है, चौदहों भुवनों को नष्ट कर देता है और पृथिवी भी उसी से नष्ट हो जाती है, फिर मेरे जैसे जीव की स्थिरता में क्या विश्वास है ? समुद्र भी सूख जाते हैं, तारे भी टूट पड़ते हैं और सिद्ध भी नष्ट कर देता है, फिर मेर जैसे जन की स्थिरता में क्या विश्वास है ? बड़े-बड़े पराक्रमी दैत्यों को भी ईश्वर नष्ट कर देता है, ध्रुव के जीवन का भी कोई निश्चय नहीं है और अमर भी (देवता भी) मारे जाते हैं, फिर मेरे जैसे जीव की स्थिरता में क्या विश्वास हो सकता है ? वह इन्द्र को भी अपने मुँह से चबा डालता है, यम को भी अपने कार्य से विरत कर देता है याने नष्ट कर देता है और उसी से वायु भी अभाव को प्राप्त हो जाता है, फिर मेरे जैसे प्राणी में स्थिरता की क्या आशा ? चन्द्रमा भी शून्यता को (अभाव को) प्राप्त हो जाता है, सूर्य के भी खण्ड-खण्ड हो जाते हैं, अग्नि भी भग्न हो जाती है अर्थात् शान्त हो जाती है, फिर मेरे जैसे प्राणी में स्थिरता की क्या आशा ? ब्रह्मा की भी अवधि है अर्थात् ब्रह्मा की भी समाप्ति का अवसर नियत है, अजन्मा विष्णु का भी संहार होता है और शिवजी भी नहीं रहते, फिर मेरे जैसे मनुष्य की स्थिरता की आशा केवल दुराशा ही है। काल का भी जो विनाश करता है, नियति को भी नष्ट कर डालता है, और अनन्तआकाश को नष्ट कर देता है, वह भला मुझे कहाँ छोड़ेगा, इसलिए मेरे जैसे जीवों की स्थिरता का कभी भी विश्वास नहीं हो सकता। जिसका कानों से श्रवण नहीं होता, वाणी से कथन नहीं होता और नेत्रों से दर्शन नहीं होता ऐसे अज्ञातस्वरूप एवं भ्रान्ति उत्पन्न करने वाले किसी सूक्ष्म तत्त्व से चौदहों भुवन अपनी आत्मा में माया द्वारा दिखलाये जा रहे हैं। अहंकारांश को प्राप्त होकर सबके मध्य में निवास करने वाला वह तत्त्व तीनों लोकों में स्थित प्राणियों में से जिसे नष्ट नहीं करता, ऐसी कोई वस्तु है ही नहीं।।7-32।।
उसकी सर्वनाशकता का उपपादन करने के लिए निरंकुश स्वतन्त्रता कहते हैं।
जैसे पर्वत शिखर से वेगपूर्वक बहता हुआ जल गोल पत्थरों को नीचे की ओर ले जाता है, वैसे ही अवश (ξ) रथभूत सूर्य को ईश्वर चट्टान, पर्वत और परिखाओं में हाँकता है। जैसे पका हुआ अखरोट का फल कठिन छिलके से घिरा रहता है, वैसे ही वह मध्य में स्थित देवता, असुर आदि का निवास पृथ्वीरूप गेंद को देवताओं के निवासभूत ज्योतिश्चक्र से चारों ओर से व्याप्त किये हुए हैं।
ξ 'य आदित्ये तिष्ठन्' इत्यादि श्रुति से अपने में अधीष्ठित ईश्वर से प्रेरित होने वाला एवं चट्टान, पहाड़ आदि दुर्गम स्थानों में किरणरूपी घोड़े के पैरों से चलते हुए सूर्य में रथ की कल्पना की गई है।
स्वर्ग में देवता, भूलोक में मनुष्य और पाताल में सर्पों की उसी ने कल्पना कर रक्खी है, वह जब इच्छा होती है, तभी उन्हें जीर्ण-शीर्ण दशा को प्राप्त करा देता है। भाव यह है कि इस जगत् का अत्यन्त पराधीन होना बड़ा भारी दोष है, ऐसे अन्याधीन जगत् में आस्था करना मूर्खता ही है। जगत् के अधिपति के साथ हुए रण में विजयी अतएव पराक्रम पूर्ण कामदेव अनुचित रूप से जगत को अपने वश में कर अपना प्रभाव दिखा रहा है। जैसे मत्त गजराच मद से चारों ओर दिशाओं को सुगन्धित करता है, वैसे ही वसन्तऋतु पुष्पवृष्टि द्वारा चारों ओर दिशाओं को सुगन्धित कर चित्त को चंचल कर देती है। अनुरागयुक्त महिलाओं के चंचल लोचनों के कटाक्ष विक्षेप के लक्ष्य बने हुए मन को महान विवेक भी स्वस्थ नहीं कर सकता। दूसरों का उपकार करने वाली, दूसरों के दुःख से अति सन्तप्त और अपनी आत्मा को शान्ति देने वाली शीतल बुद्धि से युक्त ज्ञानी पुरुष ही सुखी है, ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है। उत्पन्न होकर नष्ट होने वाले कालरूपी बड़वाग्नि के मुँह में गिरने वाले जीवनरूपी सागर के तरंग के समान पदार्थों को कौन गिन सकता है ? जैसे सागर में उत्पन्न होकर बड़वाग्नि के मुँह में गिरकर नष्ट होने वाले अनेक कल्लोलों को कोई नहीं गिन सकता वैसे ही संसार में उत्पन्न होकर काल के मुँह में गिरने वाले असंख्य जीवों को गिन सकने की किसमें शक्ति है ? दोषरूपी झाड़ियों में स्थित मृगों या पक्षियों के तुल्य सभी मनुष्य अज्ञान से दुराशारूपी जाल में बँधकर जन्मरूपी जंगल में विनष्ट हो गये हैं अर्थात् जैसे झाड़ियों में बैठे हुए मृग या पक्षी स्वाद लोलुपता के कारण अज्ञान से जाल में फँस कर नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही दोषपूर्ण मनुष्य अज्ञान से दुराशाबद्ध होकर जन्मरूपी जंगल में नष्ट हो जाते हैं। इन संसारी लोगों की आयु विविध जन्मों में पूर्वोक्त दोषों से होने वाले कुकर्मों से (काम्य और निषिद्ध कर्मों से) नष्ट हो जाती है। उनका फल जो स्वर्ग, नरक आदि है वह आकाश में वृक्ष हो और उस वृक्ष में लता भी हो, उस लता से गले में फाँसी देकर मनुष्य लटका दिया जाये, उसके समान अन्त में पतन कराने वाला ही है। उसकी निवृत्ति के लिए उपाय करना तो दूर रहा, परन्तु उसका विचार करने वाले लोग भी हमें नहीं दिखलाई देते।।33-42।। ऋषिवर, इस संसार में चंचल और मंद बुद्धि से युक्त लोग आज उत्सव है, यह सुहावनी ऋतु है, इसमें यात्रा करनी चाहिए, ये हमारे बान्धव हैं, विशिष्ट भोगों से युक्त यह सुख है, यों वृथा ही अनेक संकल्प-विकल्प कर नष्ट हो जाते हैं।।43।।

छब्बीसवाँ सर्ग समाप्त
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मंगलवार, 18 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 16


पचीसवाँ सर्ग
कर्म और कर्मफलरूप दूसरे काल के अदभुत नृत्यों का वर्णन।


इस प्रकार महाकाल का राजपुत्र के रूपक द्वारा वर्णन कर उसके उपाधिभूत कर्मरूप काल का, उसके मनोविनोद के लिए, दो प्रकार के नर्तकरूप से कल्पना कर वर्णन करते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः मुनिवर, इस संसार में दुश्चरित्रों के शिरोमणि पूर्वोक्त महाकाल से अन्य एक दूसरा काल है, अन्य काल होने पर भी यह पूर्वोक्त काल का अवस्थाभेद है, उसका यहाँ पर वर्णन किया जाता है। वह इस लोक में प्राणियों की सृष्टि और संहार करता है, लोग उसे दैव (भाग्य) और काल भी कहते हैं।।1।।
सूचीकटाह न्याय से पहले दूसरे का वर्णन करते हैं।
मुनिश्रेष्ठ, स्वकर्मरूपी जिसका फलसिद्धि से अतिरिक्त न कोई दूसरा रूप देखा जाता है, न कर्म देखा जाता है और न कोई अभिलाषा देखी जाती है, उसी ने, जैसे सूर्य का प्रखर ताप बरफ को पिघला कर नष्ट कर देता है, वैसे ही सुकुमार इन सम्पूर्ण प्राणियों को सर्वथा नष्ट कर दिया है। भाव यह है कि सभी अनर्थों की जड़ अपना कर्म ही है। जो यह विस्तीर्ण संसाररूपी मण्डल दिखाई दे रहा है, वह उस काल की नृत्यशाला है, वह इसमें खूब जी भर कर नृत्य करता है।।2-4।।
उक्त दो कालों में से प्रथम केवल शास्त्र से ही जाना जा सकता है, उस पर विश्वास दृढ़ करने के लिए उसका विस्तार से वर्णन करते है।
यह दैव पूर्वोक्त महाकाल की अपेक्षा  तीसरा है। यह बड़ा उन्मत्त है, कृतान्त इस अतिभीषण नाम को धारण कर नरमुण्डधारी वेष में संसार में नृत्य करता है। मुनिजी, इस संसार में नृत्य कर रहे इस कृतान्त का नियतिरूप प्रिय भार्या में अत्यन्त अनुराग है।।5।। किये हुए कर्मों के फल की अवश्यम्भावितारूप नियम में बड़ा अनुराग है। यह किये हुए कर्मों का फल(☻) अवश्य देता है, यह भाव है।।6।।
☻दैव प्राणियों को शुभ-अशुभ कर्म का फल देने वाला अर्थात् फलोन्मुख भाग्य और काल-जो अवश्य फल को उत्पन्न करता है अर्थात् क्रियावस्था काल। यों एक ही काल का उत्तरावस्था और पूर्वावस्था के भेद से दो प्रकारों से वर्णन किया गया है।
चन्द्रमा की कला के समान सफेद शेषनाग और तीन धाराओं में विभक्त गंगा का प्रवाह ये दोनों उसके संसाररूपी वक्षस्थल में उपवीत और अवीत यज्ञोपवीतरूप (●) में विद्यमान है।
● गंगा की एक धारा स्वर्ग में बहती है, दूसरी पृथ्वी में और तीसरी पाताल में। ये तीन धाराएँ काल के गले में उपवीत यज्ञसूत्र के सदृश प्रतीत होती हैं। बाये कन्धे में स्थित यज्ञोपवित को उपवित कहते हैं और दक्षिण स्कन्ध में स्थित यज्ञोपवित को अवीत कहते हैं। शेषनाग उसका अवीतरूप में स्थित यज्ञसूत्र है।
सूर्यमण्डल और चन्द्रमण्डल उसके हस्ताभरण हैं और सुमेरू पर्वत उसके हाथ में स्थित लीलाकमल है। प्रलयकाल के सागर में धोया गया असीम आकाश उसका एकमात्र वस्त्र है। वह तारारूपी चित्र-विचित्र बिन्दुओं से व्याप्त है और प्रलय के पुष्कर और आवर्त नाम के मेघ उसके चंचल छोर हैं। इस प्रकार के कृतान्तरूप काल के सामने उसकी भार्या नियति आलस्यरहित होकर लगातार प्राणियों के समुचित भोगानुरूप कार्यारम्भ द्वारा नाचती है। नियति की क्रियाशक्ति कभी क्षीण नहीं होती और नृत्य करने के कारण उसके अंग प्रत्यंग सदा चंचल रहते हैं। उसका नाच देखने वाले प्राणियों के जन्म और नाश से चंचल जगत-मण्डलरूपी कोठरी में नाच रही उस नियति के अंगों में देवलोक सहित अन्य लोकों की पंक्ति सुन्दर भूषण हैं और पातालपर्यन्त आकाश उसका लम्बमान बड़ा भारी केशों का जूड़ा है। प्राणियों के रोदन के कोलाहल से गुलजार और नरक की अग्नियों से दैदीप्यमान नरकों की पंक्ति उसके पातालरूप चरण में स्थित मंजीरमाला पाजेब है और वह पाप रूपी तागे से पिरोई गई है।।7-13।। चित्रगुप्त प्राणियों के कर्मरूपी सुगन्ध को प्रकट करता है, अतः वह कस्तूरीस्वरूप है। उक्त कस्तूरीभूत चित्रगुप्त से क्रियारूपी सखी द्वारा उसके यमरूप कपाल में सुन्दर तिलक बनाया गया है। भाव यह है कि यम इस नियति का ललाट(▪) है और चित्रगुप्त उसमें स्थित कस्तूरी तिलक है, उसे क्रियारूपी सखी ने तैयार किया है।
▪ यहाँ पर काल के ललाट और पैर इन आदि और अन्त अंगों की भूषणकल्पना का ही वर्णन किया गया है, इसी से उसके शरीर के अन्य अवयवों की भूषणकल्पना का भी यथायोग्य स्वयं अनुमान कर लेना चाहिए।
प्रलयकाल में काल की प्रिय पत्नी यह नियतिदेवी अपने पति काल के इंगितपूर्ण मुख के अभिप्राय को जानकर बड़ी चंचलता के साथ फिर नाचना आरम्भ कर देती है। इसके नाचने में चट्टानों के टूटने का सा घोर शब्द होता है। वह नियतिदेवी महाप्रलयों में नाचने के समय पृष्ठ भाग में गले से सीधी लटक रही माला में चंचल कार्तिकेय के वाहनरूप मृत मयूरों से शोभित होती है। लम्बमान चंचल जटाओं में चन्द्रमा से लांछित महादेव जी के मुण्डों से, जो तीन नेत्रों के बड़े बड़े छिद्रों से निकल रहे विपुल भाँय-भाँय शब्द से भयंकर प्रतीत होते हैं, विकसित मन्दार के पुष्पों से शोभित श्रीपार्वती जी के केशरूपी चँवरों से, ताण्डव के समय पर्वताकार हुए संहारभैरव के उदररूपी तुम्बों से और एक हजार सात छेदों(‡) से युक्त इन्द्र की देहरूपी भिक्षापात्रों से (खप्परों से) जो नाचने के समय खनखन शब्द करते हैं, बड़ी शोभित होती है।
‡ अन्य देहियों के शरीरों में नौ छिद्र प्रसिद्ध हैं, परन्तु इन्द्र सहस्रक्ष (हजार नेत्र वाले) हैं। उनके शरीर में एक हजार छिद्र तो नेत्रों के हैं तथा सात छिद्र और हैं, इस प्रकार नौ छिद्र वाले प्रसिद्ध अन्य शरीरों से एक हजार सात छिद्र वाला इन्द्र का शरीर विलक्षण है।
सबका संहार करने वाली यह नियति देवी सूखे हुए नर-कंकालरूपी खट्वांगों से (पाटियों से) आकाशमण्डल को पूर्णकर अपने को आप ही भयभीत करती है। नाचने के समय हिल रही जीवों के भाँति भाँति के मस्तक रूपी सुन्दर कमलों की माला से इसकी शोभा की सीमा नहीं रहती। प्रलय के समय नियति देवी के उद्धत प्रलयकाल के मेघरूपी डमरू के भीषण शब्दों से तुम्बुरु आदि गन्धर्व भागते हैं।।14-21।।
नियति देवी के नृत्य और नृत्य की सामग्री का वर्णन कर उसके पति के भी नृत्य का वर्णन करते हुए उसके भूषणों को कहते हैं।
पूर्वोक्त नृत्यशाला के अन्दर नियति देवी का पति कृतान्त नृत्य करता है। कुण्डलभूत चन्द्रमण्डल से वह अति शोभित होता है और उसके केश तारे और चाँदनी से मनोहर आकाशरूपी पिच्छ से (मोरपंख से) अलंकृत है। उसके दाहिने कान में हिमालयरूपी हड्डी का बना अँगूठी के आकार का चमकदार कुण्डल है और बाँए कान में महान् सुमेरु पर्वत ही सोने का सुन्दर कुण्डल है। उसके चन्द्रमा और सूर्य ही उक्त दोनों ही कानों में गालों की शोभा को बढ़ाने वाले चंचल कुण्डल हैं। लोकालोकाचल पर्वत की श्रेणी उसकी कमर के चारों ओर लगी हुई मेखला (करधनी) है। बिजली उसके हाथ का गोलाकार कंकण है और वह नृत्य के समय कभी इधर कभी उधर सरकता है। मेघ ही उसके रंग-बिरंग के वस्त्रों से टुकड़ों से बनी हुई कन्था है और वह वायु से सदा हिलती-डुलती हुई शोभित होती है। इसके गले में मुसल, पट्टिश, प्रास, शूल, तोमर और मुदगरों से बनी हुई माला शोभा पा रही है, वे मूसल आदि ऐसे तीक्ष्ण हैं कि मानों पूर्व-पूर्व की जितनी सृष्टियाँ नष्ट हुई थी, उनसे निकले हुए मृत्यु ही इकट्ठे हो गये हों। यह माला शेषनाग के शरीररूपी महारस्सी से बँधे हुए, पूर्वोक्त राजपुत्ररूप काल के हाथ से गिरे हुए और जन्म-मरणशील जीवरूपी मृगों के बन्धन के लिए बिछाए गये जाल में गुँथी हुई है। सात समुद्रों की श्रेणी ही इसके बाहुओं के कंकण हैं, वे रत्नों की कान्ति से खूब चमकते हैं और सजीव मछलियाँ उनमें विद्यमान हैं।।22-28।।
अन्य लोगों के कंकणों में निर्जीव मछलियों की आकृति बनाई जाती है, पर इसके कंकणरूपी समुद्रों में सजीव मछलियाँ विद्यमान हैं, यह भाव है।
शास्त्रीय और स्वाभाविक आवर्त से (भँवर से) युक्त, रजोगुण पूर्ण तमोगुण से काली सुख-दुःखपरपम्परा उसकी रोमावली के रूप में विराजमान हैं। इस प्रकार का वह कृतान्त प्रलय काल में ताण्डव को उत्पन्न करने वाली नृत्येच्छा (नाचने की इच्छा) का परित्याग करता है, अर्थात् उक्त नृत्यचेष्टा से विरत होकर चिरकाल तक विश्राम करता है। तदनन्तर ब्रह्मा आदि के साथ भूतों की फिर सृष्टि कर पुनः नृत्यलीला का विस्तार करता है। उसकी उक्त नृत्यलीला अंग-प्रत्यंग के अभिनय से पूर्ण है और वृद्धता, शोक, दुःख और तिरस्कार उसके आभूषण हैं। जैसे बालक गीली मिट्टी को लेकर नाना प्रकार के खिलौने आदि बनाता है और थोड़ी देर में उन्हें नष्ट-भ्रष्ट कर देता है, वैसे ही काल भी आलस्य रहित होकर चौदह भुवन, विविध देश, वन और असंख्य तथा विविध जीव और उनके सुन्दर श्रौतस्मातार्दिरूप आचार-विचारों की सृष्टि कर फिर उन्हें नष्ट कर देता है उक्त आचार-विचार सत्ययुग और त्रेतायुग में निश्चल रहते हैं तथा कलियुग और द्वापरयुग में चल हैं।।21-32।।

पचीसवाँ सर्ग समाप्त
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सोमवार, 17 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 15


चौबीसवाँ सर्ग
मृगया में कौतूहल करने वाले राजकुमार के रूपक से अपनी प्रियतमा कालरात्रि से युक्त काल का वर्णन।


श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः मुनिश्रेष्ठ, यह काल राजकुमार (▓) के अनुरूप है। संसार में इसकी लीलाएँ बड़ी विकट है, इसके समीप एक भी आपत्ति नहीं फटक सकती और इसका पराक्रम विचार शक्ति के बाहर है। इस सर्ग में उक्त काल के ही चरित्र का वर्णन किया जाता है।।1।।
▓ परब्रह्म सूर्य, चन्द्र आदि को भी प्रकाशित करता हुआ प्रदीप्त होता है अतः वह राजा कहलाता है। काल उसकी पटरानीरूप अनादि माया से उत्पन्न हुआ है और जगत-रूपी युवराज सम्पत्ति का भोक्ता है अतः यह उक्त राजारूपी परब्रह्म का पुत्र-कुमार कहलाता है।
इस जीर्ण-शीर्ण जगतरूपी वनराजि में दीन-हीन और अज्ञानी प्राणीरूपी मृगों का शिकार कर रहे इस राजकुमाररूपी काल के लिए प्रलयकाल का महासागर क्रीड़ार्थ बनाई गई रमणीय बावड़ी है, जिसके एक भाग में बड़वानलरूपी सुन्दर कमल लहलहा रहे हैं। दधिसागर, क्षीरसागर सहित तथा कड़ुवे, तीखे और खट्टे विविध खाद्यों से पूर्ण सदा एकरूप से रहने वाले चिरकाल से स्थित अनेक जगत इस राजकुमाररूपी काल के कलेवे (नाश्ते के पदार्थ) हैं।(▒)।।2-4।।
▒ कड़वा तीखा एवं दही से युक्त वासी कलेवा द्राविड़ों में प्रसिद्ध है।
चलने में बड़ी दक्ष अर्थात् शीघ्र चलने वाली सब मातृगणों से युक्त और बाघिन के समान प्राणियों का नाश करने वाली इस राजकुमाररूपी काल की प्रिय पत्नी कालरात्रि संसाररूपी वन में विहार करने के लिए नियुक्त है।।5।। चंचल श्वेतकमल, नीलकमल और रक्तकमलों से परिवेष्ठित मधुर जल से युक्त विशाल पृथ्वी ही इसके हाथ में मधुर (╬) मद्य से पूर्ण विशाल पानपात्री (मद्य पीने का पात्र) है। गर्जने वाले, भीषण ताल ठोंकने वाले और केसरों से (गर्दन के बालों से) जिनका कन्धा ढका हुआ है वे नृसिंहदेव (विष्णु के अवतार) इसके भुजारूपी पिंजड़े में हिरण्यकशिपु आदि दानवों के हिंसारूपी क्रीडा के लिए बाज पक्षी बनाये गये हैं।।6,7।।
╬ मद्य को सुगन्धित बनाने के लिए एवं उसको सुशोभित करने के लिए मद्यपात्र भी कमलों से परिवेष्ठित होता ही है।
ब्रह्माण्डों की माला को धारण करने के कारण तुम्बों से बनाई गई  वीणा के समान सुन्दर रूप और ध्वनि से युक्त(░) और शरद ऋतु के आकाश के तुल्य स्वच्छ नीली कान्तिवाला संहार भैरव इसकी क्रीड़ा के लिए कोकिल का बच्चा बनाया गया है।।8।।
░ यद्यपि उसका स्वरूप और शब्द औरों को भीषण प्रतीत होते हैं, तथापि काल उससे भी भयानक है उसकी दृष्टि में वे मधुर ही हैं, यह दर्शाने के लिए वह सुन्दर रूप और ध्वनि से युक्त कहा गया है।
सदा टंकार शब्द करने वाला और लगातार दुःखरूपी बाणों को उगलने वाला उसका संहार नाम का धनुष चारों ओर चमचमा रहा है।।9।। ब्रह्मन्, इस काल से बढ़कर विलास करने में प्रवीण कोई नहीं है, यह राजपुत्र रूपी काल स्वयं भी दौड़ता है और इसके लक्ष्यभूत प्राणी भी निरन्तर दौड़ते रहते हैं फिर भी इसका लक्ष्य (निशाना) नहीं चूकता। यह सबको ही दुःखरूपी बाणों से विदीर्ण करता रहता है। यह काल ही सबकी अपेक्षा श्रेष्ठ लक्ष्यवेधी (निशानेबाज) है। यह जीर्ण जगत में बन्दर की भाँति चंचलवृत्तिवाले विषयलोलुप जनों को व्याकुल बनाता है और स्वयं उक्त प्रकार से विराजमान रहकर मृगया का आनन्द लेता है।।10।।

चौबीसवाँ सर्ग समाप्त
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रविवार, 16 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 14


तेईसवाँ सर्ग
प्राणियों के पुण्य और पाप के बल  उत्कृष्ट अपनी चेष्टाओं द्वारा प्राणियों से कर्म करा रहे काल का वर्णन।
इस प्रकार भोग्य श्री, भोगतृष्णा और भोगकाल के बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था के दोषों का विस्तारपूर्वक वर्णन कर और ये अन्त में केवल असीम दुःख के ही कारण होते हैं, ऐसा उपादान कर श्रीरामचन्द्रजी ने ऐहिक और परलौकिक पदार्थ और उनके फलों में अपना वैराग्य दर्शाया। अब काल आदि के स्वभाव के वर्णन द्वारा नित्य और अनित्य पदार्थों का विवेक दर्शाने के लिए भूमिका बाँधते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः ब्रह्मन, मेरी यह भोग्य वस्तु है, मैं इसका भोग करने वाला हूँ, ये भोग के उपकरण हैं, इस उपकरण से (साधन से) इस वस्तु को हस्तगत कर मैं चिरकाल तक इसका भोग करूँगा, मेरा यह मनोरथ आज पूर्ण हो गया, मुझे आशा है कि इस दूसरे मनोरथ को भी मैं शीघ्र प्राप्त कर लूँगा इत्यादि असंख्य मानसिक संकल्पविकल्पों द्वारा अनन्त व्यावहारिक वचनों से पूर्ण एवं तुच्छ शरीर में आत्मबुद्धि करने वाले या अल्प वैषयिक सुख में पुरुषार्थ-बुद्धि करने वाले मूढ़ों ने शत्रु, मित्र, उदासीन आदि भेदों से, हेय, उपादेय और उपेक्षणीय आदि भेदों से और तत्प्रयुक्त राग-द्वेषादि भेदों से संसाररूपी छिद्र में अन्यथाग्रहरूपी भ्रम को दुश्चछेद्य बना दिया है।।1।। जाल के समान दूर से ही आकृष्ट कर बाँधने वाले विषयों तथा पिंजड़े के समान परिच्छिन्न स्थान में बाँधने वाले देह के समूह रूप इस अवस्तुभूत संसार के प्रति विवेकियों को कैसे आदर हो सकता है ? दर्पण में प्रतिबिम्बित फल को खाने की इच्छा करना मूर्खता है, वैसे ही अवस्तुभूत इस संसार में आस्था करना मूर्खता ही है।।2।। इस तृण के सिरे से कुएँ में लटक रहे मकड़ी के जाले को चूहा पूर्णतया काट देता है वैसे ही, निःशेषरूप से काट देता है।।3।। जैसे बडवाग्नि चन्द्रोदय आदि से उमड़े हुए समुद्र को नष्ट करती है, वैसे ही इस संसार में उत्पन्न हुई ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जिसे वह सर्वभक्षी काल भी प्रत्येक वस्तु को निगलता है।।4।। भयंकर रूद्ररूपी काल सर्वसाधारणरूप से इस सम्पूर्ण दृश्य प्रपंच को निगलने के लिए सदा उद्यत रहता है। असंख्य ब्रह्माण्डों को अपने उदरस्थ करने के कारण सर्वात्मता को प्राप्त हुआ, यह काल बल, बुद्धि और वैभव आदि से महान् भूतों के लिए एक क्षणभर भी नहीं ठहरता अर्थात् सबको तुरन्त नष्ट कर देता है।।5,6।। युग, वर्ण और कल्प नाम क्रियोपाधिक (क्रिया द्वारा प्राप्त) रूपों से काल अंशतः ही प्रकट है, उसका वास्तविक रूप कोई नहीं देख सकता। वह संसार की सम्पूर्ण वस्तुओं को अपने वश में करके बैठा है।।7।। जैसे गरुड़ साँपों को निगल जाता है, वैसे ही काल भी जो अनुपम रूप से सम्पन्न थे, जो पुण्यात्मा थे और जो सुमेरु पर्वत के समान गौरवान्वित थे, उन्हें हड़प कर गया। यह काल बड़ा निर्दय, पत्थर के समान कठोर, बाघ आदि के समान क्रूर आरे के तुल्य कर्कश, कृपण और अधम है। आज तक ऐसी कोई वस्तु नही देखीं गई, जिसे इस काल ने अपने गाल में न समा लिया हो।।8,9।। इसका चित्त सदा निगलने में ही लगा रहता है, यह एक को निगलता हुआ दूसरे को निगलता है। असंख्य लोग उसके उदर में समा चुके हैं, पर यह ऐसा पेटू है कि इसे तृप्ति ही नहीं हुई अर्थात् अब भी यह अपने उसी स्वाभाविक वेग से जीवों को लगातार निगलता जा रहा है।।10।। जैसे ऐन्द्रजालिक अपने विविध खेलों को आरम्भ करता है, उनका अन्त कर डालता है, उनको बिगाड़ देता है, कोई खाद्य पदार्थ बनाकर उसे खा जाता है और बरबाद कर देता है, वैसे ही यह काल भी अपने विविधरूपवाले संसाररूपी नृत्य को आरम्भ करता है, बन्द कर देता है, बिगाड़ देता है, खा जाता है और नष्ट कर देता है अर्थात् धन सम्पत्ति आदि में जो कुछ भी हरण, नाश, व्यय आदि होते है, उन सबको हरणकर्त्ता, नाशकर्त्ता आदि के रूप से स्थित काल ही करता है, दूसरा नहीं।।11।। जैसे तोता दाड़िम के फल को तोड़कर उसके भीतर के बीजों को खा जाता है, वैसे ही यह काल भी इस जगत् में व्याकृतावस्था में स्थित भूतों को (जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज भेद से चार प्रकार के प्राणियो को) नाश द्वारा असत् बनाकर, तोड़-मरोड़कर खा जाता है।।12।। शुभ और अशुभ (पुण्य और पाप) रूप दाँतों से मनुष्यरूपी पत्तों को छिन्न भिन्न करने वाला अभिमानपूर्ण जनता के जीवसमूहरूपी महाअरण्य में रहने वाला गजरूप यह काल बड़े जोर से चिंघाड़ता है अर्थात् जैसे महाअरण्य में रहने वाला और अपने दाँतों से वृक्षों के पत्तों को छिन्न भिन्न करने वाला हाथी जोर से दहाड़ मारता है, वैसे ही पुण्य पापरूपी अपने दाँतों से प्राणियों को चबा डालने वाला और दर्पपूर्ण जनता के जीवसमूहरूपी महाअरण्य का यह गज यह बड़े जोर से दहाड़ता है, गरजता है।।13।। अपंचीकृत पंचभूतों से उत्पन्न ब्रह्माण्डरूपी महान् और देवतारूपी फलों से युक्त वृक्षों से पूर्ण (अर्थात् ब्रह्मरूपी वन में अपंचीकृत पंचभूतों से उत्पन्न अनेक ब्रह्माण्ड ही महान वृक्ष हैं, और देवता ही ब्रह्माण्डरूपी महावृक्षों के फल हैं) और मायिक जगत् रूप से युक्त (सप्रपंच) ब्रह्मरूपी महावन को (दुस्तर होने के कारण ब्रह्म को महावन कहा) पूर्णरूप से आवृत्त करके (ढँककर) यह काल बैठा है, क्योंकि काल के उदर में ही सब वस्तुओं की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश देखा जाता है, यह भाव है।।14।। यह काल रात्रिरूपी भँवरों से चारों ओर व्याप्त और दिनरूपी मंजरियों से शोभित वर्ष, कल्प (ब्रह्मा का दिन) और कालरूपी(♥) लताएँ बराबर बनाता रहता है पर इसे कभी कुछ भी परिश्रम नहीं होता, जिससे कि यह अपने व्यापार से विरत हो।।15।।
♥ 18 निमेष की एक काष्ठा, 30 काष्ठा की एक कला, 20 कला का 1 क्षण, 12 क्षण का 1 मुहूर्त, 30 मुहूर्त का एक अहोरात्र (रात्रि-दिन) इस प्रकार आजकल के मान से एक कला = 2/15 मिनट या 8 सेकेण्ड है।
मुनिवर, यह काल धूर्तों का सिरताज है, इसे कितना ही तोड़ो पर यह टूटता नहीं, जलाने पर जलता नहीं और दृश्य होने पर भी स्वरूप से नहीं दिखाई देता इसकी धूर्तता की सीमा नहीं है।।16।। सर्वव्यापक यह काल मनोराज्य के अनुरूप है। जैसे मनोराज्य एक पलक में किसी वस्तु के स्वरूप को हूबहू खड़ा कर देता है और किसी को बिल्कुल विनष्ट कर डालता है, वैसे ही यह काल भी एक ही पलक में किसी वस्तु को सर्वांगपूर्ण बनाकर खड़ा कर देता है और किसी वस्तु को निःशेष विनष्ट कर देता है, इसलिए इन दोनों में कोई अन्तर नहीं है।।17।। यह काल अपने दुर्विलासों में विलास करने वाली प्राणियों के कष्ट से ही परिपुष्ट हुई चेष्टारूपी भार्या द्वारा भौतिक देह, इन्द्रिय आदि द्रव्यों में तादात्म्याध्यास होने के कारण अपने वास्तविक स्वरूप को न जानने वाले जीव को स्वर्ग और नरक में घुमा रहा है। यह काल बड़ा पेटू है, इसको सदा अपने पेट भरने की ही चिन्ता रहती है, चाहे तिनका हो, चाहे धूलि हो, चाहे इन्द्र हो, चाहे सुमेरु हो, चाहे पत्ता हो, सभी को अपने आधीन करने के लिए निगलने के लिए उद्यत रहता है।।18,19।। यह काल इतना क्रूर है मानों संसारभर की सम्पूर्ण क्रूरता इसी में कूट-कूट कर भरी गई है, यह लोभी इतना है कि संसारभर की लुब्धता इसे अपना घर बनाये है, सम्पूर्ण दुर्भाग्यों का यह आगार है और दुःसह चपलता भी इसी में है अर्थात् यह सबसे अधिक क्रूर बेजोड़ लोभी, नितान्त अभागा और महाचपल है।।20।। जैसे बालक अपने आँगन में खेल के गेंदों को बारबार उछालता है, वैसे ही यह क्रूरतम काल खेल के (मन बहलाव) लिए सूर्य और चन्द्रमा को आदेश देकर आकाश में मानों खेलता है।।21।। प्रलयकाल में यह काल सब प्राणियों को नष्टकर और अपने शरीर को उनकी (सब प्राणियों की) हड्डियों की मालाओं से पैर तक ढाँककर खूब शोभित होता है।।22।। प्रलय के समय निरंकुश चरित्रवाले इस काल के अंगों से निकले हुए वायुओं से विशाल सुमेरू पर्वत भूर्जपत्र के समान आकाश में फड़फड़ाता है अर्थात् चारों ओर से टूटने फूटने लगता है। बात यह है कि जैसे वायु से अतिकोमल भूर्जपत्र फटकर नष्ट हो जाता है, वैसे ही इस निरंकुशशिरोमणि के शरीर से निर्गत वायुओं से विशालतम सुमेरू पर्वत आकाश में उड़कर विशीर्ण हो जाता है।।23।। यह काल रूद्र का रूप धारण कर महेन्द्र का रूप धारण करता है, फिर ब्रह्मा का रूप धारण करता है, फिर इन्द्र होता है और फिर कुबेर होता है, और अन्त में कुछ भी नहीं अर्थात् पर्यवसित हो जाता है।।24।। जैसे सदा परिपूर्ण सागर रात-दिन अपने में विलीन कर देता है, वैसे ही तत्परतापूर्वक रात दिन अन्य की नई-नई सृष्टियों को करता हुआ यह काल पूर्व की अति दैदीप्यमान सृष्टियों को नष्टकर देता है।।25।। यह काल महाकालरूपी वृक्षों से देवता, मनुष्य और राक्षसरूपी पके हुए फलों को गिरा रहा है।।26।। यह काल प्राणिरूपी बहुत छोटे छोटे मच्छरों से धुम्, धुम् ऐसा शब्द कर रहे और शीघ्र गिरने वाले ब्रह्माण्डरूपी गूलर के फलों का बड़ा भारी वृक्ष है अर्थात् जैसे छोटे छोटे मच्छरों से गूँज रहे शीघ्र गिरने वाले गूलर के फल गूलर के पेड़ में होते हैं, वैसे ही प्राणियों के शब्दों से गूँज रहे और शीघ्र गिरने वाले ब्रह्माण्डरूपी फलों का आश्रयभूत वृक्ष है, वैसे ही उक्त ब्रह्माण्डों का उत्पादक यह काल है, यह भाव है।।27।। तत्-तत् प्राणियों के शुभाशुभक्रिया (पुण्य-पाप) रूप प्रियतमा से युक्त काल सब के अधिष्ठानभूत चित्तरूप (चैतन्यरूप) चाँदनी के केवल सन्निधान से प्रकट हुई जगत की सत्तारूपी कुमुदिनीयों से प्राणियों की क्रियारूप अपनी स्त्री अपने अद्वितीय स्वरूप को विनोदित करता है। विहारकौतुक से कालयापन ही विनोद है। यहाँ पर काल ही विहार करने वाले है। विहार करने वाला काल जिस काल का यापन करे ऐसादूसरा काल प्रसिद्ध नहीं है, अतः स्वशरीर को ही विनोदित करता है, यह भाव है।।28।। जैसे महापर्वत (हिमालय) पृथिवी में पूर्व और उत्तर की सीमा से शून्य प्रदेश में स्थित अपने शरीर का अवलम्बन करके खड़ा है वैसे ही यह काल भी अपरिच्छिन्न, आदि-अन्तरहित ब्रह्म में प्रतिष्ठित अपने स्वरूप का अवलम्बन करके स्थित है।।29।। यह काल कहीं पर (रात्रि आदि काले पदार्थों में) काल अन्धकार के तुल्य श्यामल, कहीं पर (दिन, चाँदनी, मणि आदि प्रकाशमान पदार्थों में) कान्ति से परिपूर्ण औऱ कहीं पर (भण्डार और भीत आदि में) अन्धकार और कान्ति से शून्य अपने कार्य को करता हुआ स्थित है। विलीन हुए असंख्य प्राणिपूर्ण संसारों के सारभूत और सबका आधार होने से अत्यन्त भार से युक्त अपने स्वरूप से पृथिवी के समान ऐसा स्थित है कि इसकी जड़ कभी हिल नहीं सकती।।30,31।। सैंकड़ों महाकल्पों से न तो इसे खेद होता है, न प्रसन्नता होती है, न यह आता है, न जाता है, न अस्त को प्राप्त होता है और न उदित होता है। यह काल अत्यन्त अनादरपूर्वक जगत् की रचनारूप लीला से अहंकार रहित और सर्वत्र व्याप्त अपनी आत्मा का पालन करता है, उसका विनाश कभी नहीं करता।।32,33।। यह काल लगातार रात्रि रूपी पंक से उत्पन्न हुई और मेघरूपी भँवरी से युक्त दिनरूपी लाल कमलों की श्रेणी का अपने आत्मरूपी तालाब में रोपण करता रहता है।।34।। यह लोभी काल पुरानी सम्मार्जनी (बुहारी) रूपी काली रात्रि को लेकर कनकाचल के (सुमेरू के) चारों ओर उससे गिरे हुए आलोकरूपी सुवर्ण के कणों को बटोरता रहता है। एक बार झाड़ू से बटोरने पर बहुत सा सुवर्ण मिलने पर भी यह सन्तुष्ट नहीं होता और लोभी इतना बड़ा है कि नई सम्मार्जिनी भी नहीं ले सकता, यह भाव है।।35।। लोभी होने के  कारण ही कार्यरूपी उँगली से दिशाओं के कोनों में सूर्यरूपी दीपक ले जाता हुआ यह काल जगतरूपी घर में कहाँ पर क्या है ? यह देखता है।।36।। दिनरूपी पलकों से युक्त सूर्यरूपी नेत्र से ये बहुत अच्छी तरह पक गये हैं, यह देखकर जगतरूपी पुराने वन से यह लोकपालरूपी फलों को तोड़कर खाता है।।37।। जगतरूपी पुराने झोंपड़े में प्रमाद से इधर-उधर गिरे हुए गुणवान जनरूपी मणियों को यह काल महान् उदरवाले मृत्युरूपी सन्दूक में क्रमशः डालता है।।38।। जो जनरूपी रत्नावली गुणों से (सूत्रों से) अत्यन्त पूर्ण हो जाती है, मानों अलंकार के लिए उसको अपने अवयवरूप सत्य, त्रेता आदि युगों में रखकर फिर उन्हें नष्ट कर देता है।।39।। यह चंचल काल बीच-बीच में दिनरूपी हंसों से गुँथी हुई तारारूपी केसर से पूर्ण रात्रिरूपी नीलकमलों की माला को पाँच ऋतुरूपी अंगुलियों से युक्त वर्षरूपी हाथ के प्रकोष्ठ में कंकण के समान नित्य धारण करता है।।40।। पर्वत, समुद्र, द्युलोक और पृथिवीरूप चार श्रृंगवाले जगतरूपी भेड़ों का हिंसक यह काल आकाशरूपी आँगन में बिखरे हुए तारारूपी रक्त के बिन्दुओं को भी देखकर प्रतिदिन उन्हें चाटता है।।41।। यह काल यौवनरूपी कमलिनी के लिए चन्द्रमारूप और आयुरूपी गज के लिए सिंहस्वरूप है। इस संसार में अत्यन्त तुच्छ या महान् ऐसी वस्तु नहीं है, जिसका कि यह काल नाश न करता हो।।42।। जैसे जीव सुषुप्तिकाल में सब दुःखों का संहाकर अज्ञानमात्र के अवलम्बन से स्थिति करता है, वैसे ही जिसने जन्तुओं को पीसकर मृत्यु के मुँह में गिरा दिया है, ऐसे प्रलयरूपी क्रीड़ा के विलास से पदार्थों का अभावरूप यह काल भी अज्ञानावभासक अपने अधिष्ठानभूत ब्रह्म चैतन्य का अवलम्बन कर आत्मभूत उसी में रमण करता है उसके पृथक नहीं होता। इस प्रकार प्रलयकाल में विश्राम लेकर यह काल ही फिर सृष्टिकाल में संसार का कर्त्ता, भोक्ता, संहारक, स्मर्ता आदि सब पदार्थों के स्वरूप को प्राप्त हुआ है अर्थात् यह स्वयं ही कर्त्ता, भोक्ता, संहारक, सुभग, दुर्भग आदि बना है।।43,44।। बुद्धिकौशल से इस काल के रहस्य का किसी ने निश्चय नहीं कर पाया है, पुण्य फल के उपभोग के अनुकूल सुन्दर रूप और पाप फल के भोग के अनुरूप कुरूप को धारण करने वाले सम्पूर्ण शरीरों की सहसा सृष्टि, रक्षा और संहार करता हुआ यह प्रदीप्त हो रहा है। इस संसार के सम्पूर्ण जीवों में काल सबसे अधिक बलवान हैं।।45।।

तेईसवाँ सर्ग समाप्त
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