मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

सोमवार, 17 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 15


चौबीसवाँ सर्ग
मृगया में कौतूहल करने वाले राजकुमार के रूपक से अपनी प्रियतमा कालरात्रि से युक्त काल का वर्णन।


श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः मुनिश्रेष्ठ, यह काल राजकुमार (▓) के अनुरूप है। संसार में इसकी लीलाएँ बड़ी विकट है, इसके समीप एक भी आपत्ति नहीं फटक सकती और इसका पराक्रम विचार शक्ति के बाहर है। इस सर्ग में उक्त काल के ही चरित्र का वर्णन किया जाता है।।1।।
▓ परब्रह्म सूर्य, चन्द्र आदि को भी प्रकाशित करता हुआ प्रदीप्त होता है अतः वह राजा कहलाता है। काल उसकी पटरानीरूप अनादि माया से उत्पन्न हुआ है और जगत-रूपी युवराज सम्पत्ति का भोक्ता है अतः यह उक्त राजारूपी परब्रह्म का पुत्र-कुमार कहलाता है।
इस जीर्ण-शीर्ण जगतरूपी वनराजि में दीन-हीन और अज्ञानी प्राणीरूपी मृगों का शिकार कर रहे इस राजकुमाररूपी काल के लिए प्रलयकाल का महासागर क्रीड़ार्थ बनाई गई रमणीय बावड़ी है, जिसके एक भाग में बड़वानलरूपी सुन्दर कमल लहलहा रहे हैं। दधिसागर, क्षीरसागर सहित तथा कड़ुवे, तीखे और खट्टे विविध खाद्यों से पूर्ण सदा एकरूप से रहने वाले चिरकाल से स्थित अनेक जगत इस राजकुमाररूपी काल के कलेवे (नाश्ते के पदार्थ) हैं।(▒)।।2-4।।
▒ कड़वा तीखा एवं दही से युक्त वासी कलेवा द्राविड़ों में प्रसिद्ध है।
चलने में बड़ी दक्ष अर्थात् शीघ्र चलने वाली सब मातृगणों से युक्त और बाघिन के समान प्राणियों का नाश करने वाली इस राजकुमाररूपी काल की प्रिय पत्नी कालरात्रि संसाररूपी वन में विहार करने के लिए नियुक्त है।।5।। चंचल श्वेतकमल, नीलकमल और रक्तकमलों से परिवेष्ठित मधुर जल से युक्त विशाल पृथ्वी ही इसके हाथ में मधुर (╬) मद्य से पूर्ण विशाल पानपात्री (मद्य पीने का पात्र) है। गर्जने वाले, भीषण ताल ठोंकने वाले और केसरों से (गर्दन के बालों से) जिनका कन्धा ढका हुआ है वे नृसिंहदेव (विष्णु के अवतार) इसके भुजारूपी पिंजड़े में हिरण्यकशिपु आदि दानवों के हिंसारूपी क्रीडा के लिए बाज पक्षी बनाये गये हैं।।6,7।।
╬ मद्य को सुगन्धित बनाने के लिए एवं उसको सुशोभित करने के लिए मद्यपात्र भी कमलों से परिवेष्ठित होता ही है।
ब्रह्माण्डों की माला को धारण करने के कारण तुम्बों से बनाई गई  वीणा के समान सुन्दर रूप और ध्वनि से युक्त(░) और शरद ऋतु के आकाश के तुल्य स्वच्छ नीली कान्तिवाला संहार भैरव इसकी क्रीड़ा के लिए कोकिल का बच्चा बनाया गया है।।8।।
░ यद्यपि उसका स्वरूप और शब्द औरों को भीषण प्रतीत होते हैं, तथापि काल उससे भी भयानक है उसकी दृष्टि में वे मधुर ही हैं, यह दर्शाने के लिए वह सुन्दर रूप और ध्वनि से युक्त कहा गया है।
सदा टंकार शब्द करने वाला और लगातार दुःखरूपी बाणों को उगलने वाला उसका संहार नाम का धनुष चारों ओर चमचमा रहा है।।9।। ब्रह्मन्, इस काल से बढ़कर विलास करने में प्रवीण कोई नहीं है, यह राजपुत्र रूपी काल स्वयं भी दौड़ता है और इसके लक्ष्यभूत प्राणी भी निरन्तर दौड़ते रहते हैं फिर भी इसका लक्ष्य (निशाना) नहीं चूकता। यह सबको ही दुःखरूपी बाणों से विदीर्ण करता रहता है। यह काल ही सबकी अपेक्षा श्रेष्ठ लक्ष्यवेधी (निशानेबाज) है। यह जीर्ण जगत में बन्दर की भाँति चंचलवृत्तिवाले विषयलोलुप जनों को व्याकुल बनाता है और स्वयं उक्त प्रकार से विराजमान रहकर मृगया का आनन्द लेता है।।10।।

चौबीसवाँ सर्ग समाप्त
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रविवार, 16 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 14


तेईसवाँ सर्ग
प्राणियों के पुण्य और पाप के बल  उत्कृष्ट अपनी चेष्टाओं द्वारा प्राणियों से कर्म करा रहे काल का वर्णन।
इस प्रकार भोग्य श्री, भोगतृष्णा और भोगकाल के बाल्यावस्था, युवावस्था और वृद्धावस्था के दोषों का विस्तारपूर्वक वर्णन कर और ये अन्त में केवल असीम दुःख के ही कारण होते हैं, ऐसा उपादान कर श्रीरामचन्द्रजी ने ऐहिक और परलौकिक पदार्थ और उनके फलों में अपना वैराग्य दर्शाया। अब काल आदि के स्वभाव के वर्णन द्वारा नित्य और अनित्य पदार्थों का विवेक दर्शाने के लिए भूमिका बाँधते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः ब्रह्मन, मेरी यह भोग्य वस्तु है, मैं इसका भोग करने वाला हूँ, ये भोग के उपकरण हैं, इस उपकरण से (साधन से) इस वस्तु को हस्तगत कर मैं चिरकाल तक इसका भोग करूँगा, मेरा यह मनोरथ आज पूर्ण हो गया, मुझे आशा है कि इस दूसरे मनोरथ को भी मैं शीघ्र प्राप्त कर लूँगा इत्यादि असंख्य मानसिक संकल्पविकल्पों द्वारा अनन्त व्यावहारिक वचनों से पूर्ण एवं तुच्छ शरीर में आत्मबुद्धि करने वाले या अल्प वैषयिक सुख में पुरुषार्थ-बुद्धि करने वाले मूढ़ों ने शत्रु, मित्र, उदासीन आदि भेदों से, हेय, उपादेय और उपेक्षणीय आदि भेदों से और तत्प्रयुक्त राग-द्वेषादि भेदों से संसाररूपी छिद्र में अन्यथाग्रहरूपी भ्रम को दुश्चछेद्य बना दिया है।।1।। जाल के समान दूर से ही आकृष्ट कर बाँधने वाले विषयों तथा पिंजड़े के समान परिच्छिन्न स्थान में बाँधने वाले देह के समूह रूप इस अवस्तुभूत संसार के प्रति विवेकियों को कैसे आदर हो सकता है ? दर्पण में प्रतिबिम्बित फल को खाने की इच्छा करना मूर्खता है, वैसे ही अवस्तुभूत इस संसार में आस्था करना मूर्खता ही है।।2।। इस तृण के सिरे से कुएँ में लटक रहे मकड़ी के जाले को चूहा पूर्णतया काट देता है वैसे ही, निःशेषरूप से काट देता है।।3।। जैसे बडवाग्नि चन्द्रोदय आदि से उमड़े हुए समुद्र को नष्ट करती है, वैसे ही इस संसार में उत्पन्न हुई ऐसी कोई भी वस्तु नहीं है, जिसे वह सर्वभक्षी काल भी प्रत्येक वस्तु को निगलता है।।4।। भयंकर रूद्ररूपी काल सर्वसाधारणरूप से इस सम्पूर्ण दृश्य प्रपंच को निगलने के लिए सदा उद्यत रहता है। असंख्य ब्रह्माण्डों को अपने उदरस्थ करने के कारण सर्वात्मता को प्राप्त हुआ, यह काल बल, बुद्धि और वैभव आदि से महान् भूतों के लिए एक क्षणभर भी नहीं ठहरता अर्थात् सबको तुरन्त नष्ट कर देता है।।5,6।। युग, वर्ण और कल्प नाम क्रियोपाधिक (क्रिया द्वारा प्राप्त) रूपों से काल अंशतः ही प्रकट है, उसका वास्तविक रूप कोई नहीं देख सकता। वह संसार की सम्पूर्ण वस्तुओं को अपने वश में करके बैठा है।।7।। जैसे गरुड़ साँपों को निगल जाता है, वैसे ही काल भी जो अनुपम रूप से सम्पन्न थे, जो पुण्यात्मा थे और जो सुमेरु पर्वत के समान गौरवान्वित थे, उन्हें हड़प कर गया। यह काल बड़ा निर्दय, पत्थर के समान कठोर, बाघ आदि के समान क्रूर आरे के तुल्य कर्कश, कृपण और अधम है। आज तक ऐसी कोई वस्तु नही देखीं गई, जिसे इस काल ने अपने गाल में न समा लिया हो।।8,9।। इसका चित्त सदा निगलने में ही लगा रहता है, यह एक को निगलता हुआ दूसरे को निगलता है। असंख्य लोग उसके उदर में समा चुके हैं, पर यह ऐसा पेटू है कि इसे तृप्ति ही नहीं हुई अर्थात् अब भी यह अपने उसी स्वाभाविक वेग से जीवों को लगातार निगलता जा रहा है।।10।। जैसे ऐन्द्रजालिक अपने विविध खेलों को आरम्भ करता है, उनका अन्त कर डालता है, उनको बिगाड़ देता है, कोई खाद्य पदार्थ बनाकर उसे खा जाता है और बरबाद कर देता है, वैसे ही यह काल भी अपने विविधरूपवाले संसाररूपी नृत्य को आरम्भ करता है, बन्द कर देता है, बिगाड़ देता है, खा जाता है और नष्ट कर देता है अर्थात् धन सम्पत्ति आदि में जो कुछ भी हरण, नाश, व्यय आदि होते है, उन सबको हरणकर्त्ता, नाशकर्त्ता आदि के रूप से स्थित काल ही करता है, दूसरा नहीं।।11।। जैसे तोता दाड़िम के फल को तोड़कर उसके भीतर के बीजों को खा जाता है, वैसे ही यह काल भी इस जगत् में व्याकृतावस्था में स्थित भूतों को (जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज भेद से चार प्रकार के प्राणियो को) नाश द्वारा असत् बनाकर, तोड़-मरोड़कर खा जाता है।।12।। शुभ और अशुभ (पुण्य और पाप) रूप दाँतों से मनुष्यरूपी पत्तों को छिन्न भिन्न करने वाला अभिमानपूर्ण जनता के जीवसमूहरूपी महाअरण्य में रहने वाला गजरूप यह काल बड़े जोर से चिंघाड़ता है अर्थात् जैसे महाअरण्य में रहने वाला और अपने दाँतों से वृक्षों के पत्तों को छिन्न भिन्न करने वाला हाथी जोर से दहाड़ मारता है, वैसे ही पुण्य पापरूपी अपने दाँतों से प्राणियों को चबा डालने वाला और दर्पपूर्ण जनता के जीवसमूहरूपी महाअरण्य का यह गज यह बड़े जोर से दहाड़ता है, गरजता है।।13।। अपंचीकृत पंचभूतों से उत्पन्न ब्रह्माण्डरूपी महान् और देवतारूपी फलों से युक्त वृक्षों से पूर्ण (अर्थात् ब्रह्मरूपी वन में अपंचीकृत पंचभूतों से उत्पन्न अनेक ब्रह्माण्ड ही महान वृक्ष हैं, और देवता ही ब्रह्माण्डरूपी महावृक्षों के फल हैं) और मायिक जगत् रूप से युक्त (सप्रपंच) ब्रह्मरूपी महावन को (दुस्तर होने के कारण ब्रह्म को महावन कहा) पूर्णरूप से आवृत्त करके (ढँककर) यह काल बैठा है, क्योंकि काल के उदर में ही सब वस्तुओं की उत्पत्ति, स्थिति और विनाश देखा जाता है, यह भाव है।।14।। यह काल रात्रिरूपी भँवरों से चारों ओर व्याप्त और दिनरूपी मंजरियों से शोभित वर्ष, कल्प (ब्रह्मा का दिन) और कालरूपी(♥) लताएँ बराबर बनाता रहता है पर इसे कभी कुछ भी परिश्रम नहीं होता, जिससे कि यह अपने व्यापार से विरत हो।।15।।
♥ 18 निमेष की एक काष्ठा, 30 काष्ठा की एक कला, 20 कला का 1 क्षण, 12 क्षण का 1 मुहूर्त, 30 मुहूर्त का एक अहोरात्र (रात्रि-दिन) इस प्रकार आजकल के मान से एक कला = 2/15 मिनट या 8 सेकेण्ड है।
मुनिवर, यह काल धूर्तों का सिरताज है, इसे कितना ही तोड़ो पर यह टूटता नहीं, जलाने पर जलता नहीं और दृश्य होने पर भी स्वरूप से नहीं दिखाई देता इसकी धूर्तता की सीमा नहीं है।।16।। सर्वव्यापक यह काल मनोराज्य के अनुरूप है। जैसे मनोराज्य एक पलक में किसी वस्तु के स्वरूप को हूबहू खड़ा कर देता है और किसी को बिल्कुल विनष्ट कर डालता है, वैसे ही यह काल भी एक ही पलक में किसी वस्तु को सर्वांगपूर्ण बनाकर खड़ा कर देता है और किसी वस्तु को निःशेष विनष्ट कर देता है, इसलिए इन दोनों में कोई अन्तर नहीं है।।17।। यह काल अपने दुर्विलासों में विलास करने वाली प्राणियों के कष्ट से ही परिपुष्ट हुई चेष्टारूपी भार्या द्वारा भौतिक देह, इन्द्रिय आदि द्रव्यों में तादात्म्याध्यास होने के कारण अपने वास्तविक स्वरूप को न जानने वाले जीव को स्वर्ग और नरक में घुमा रहा है। यह काल बड़ा पेटू है, इसको सदा अपने पेट भरने की ही चिन्ता रहती है, चाहे तिनका हो, चाहे धूलि हो, चाहे इन्द्र हो, चाहे सुमेरु हो, चाहे पत्ता हो, सभी को अपने आधीन करने के लिए निगलने के लिए उद्यत रहता है।।18,19।। यह काल इतना क्रूर है मानों संसारभर की सम्पूर्ण क्रूरता इसी में कूट-कूट कर भरी गई है, यह लोभी इतना है कि संसारभर की लुब्धता इसे अपना घर बनाये है, सम्पूर्ण दुर्भाग्यों का यह आगार है और दुःसह चपलता भी इसी में है अर्थात् यह सबसे अधिक क्रूर बेजोड़ लोभी, नितान्त अभागा और महाचपल है।।20।। जैसे बालक अपने आँगन में खेल के गेंदों को बारबार उछालता है, वैसे ही यह क्रूरतम काल खेल के (मन बहलाव) लिए सूर्य और चन्द्रमा को आदेश देकर आकाश में मानों खेलता है।।21।। प्रलयकाल में यह काल सब प्राणियों को नष्टकर और अपने शरीर को उनकी (सब प्राणियों की) हड्डियों की मालाओं से पैर तक ढाँककर खूब शोभित होता है।।22।। प्रलय के समय निरंकुश चरित्रवाले इस काल के अंगों से निकले हुए वायुओं से विशाल सुमेरू पर्वत भूर्जपत्र के समान आकाश में फड़फड़ाता है अर्थात् चारों ओर से टूटने फूटने लगता है। बात यह है कि जैसे वायु से अतिकोमल भूर्जपत्र फटकर नष्ट हो जाता है, वैसे ही इस निरंकुशशिरोमणि के शरीर से निर्गत वायुओं से विशालतम सुमेरू पर्वत आकाश में उड़कर विशीर्ण हो जाता है।।23।। यह काल रूद्र का रूप धारण कर महेन्द्र का रूप धारण करता है, फिर ब्रह्मा का रूप धारण करता है, फिर इन्द्र होता है और फिर कुबेर होता है, और अन्त में कुछ भी नहीं अर्थात् पर्यवसित हो जाता है।।24।। जैसे सदा परिपूर्ण सागर रात-दिन अपने में विलीन कर देता है, वैसे ही तत्परतापूर्वक रात दिन अन्य की नई-नई सृष्टियों को करता हुआ यह काल पूर्व की अति दैदीप्यमान सृष्टियों को नष्टकर देता है।।25।। यह काल महाकालरूपी वृक्षों से देवता, मनुष्य और राक्षसरूपी पके हुए फलों को गिरा रहा है।।26।। यह काल प्राणिरूपी बहुत छोटे छोटे मच्छरों से धुम्, धुम् ऐसा शब्द कर रहे और शीघ्र गिरने वाले ब्रह्माण्डरूपी गूलर के फलों का बड़ा भारी वृक्ष है अर्थात् जैसे छोटे छोटे मच्छरों से गूँज रहे शीघ्र गिरने वाले गूलर के फल गूलर के पेड़ में होते हैं, वैसे ही प्राणियों के शब्दों से गूँज रहे और शीघ्र गिरने वाले ब्रह्माण्डरूपी फलों का आश्रयभूत वृक्ष है, वैसे ही उक्त ब्रह्माण्डों का उत्पादक यह काल है, यह भाव है।।27।। तत्-तत् प्राणियों के शुभाशुभक्रिया (पुण्य-पाप) रूप प्रियतमा से युक्त काल सब के अधिष्ठानभूत चित्तरूप (चैतन्यरूप) चाँदनी के केवल सन्निधान से प्रकट हुई जगत की सत्तारूपी कुमुदिनीयों से प्राणियों की क्रियारूप अपनी स्त्री अपने अद्वितीय स्वरूप को विनोदित करता है। विहारकौतुक से कालयापन ही विनोद है। यहाँ पर काल ही विहार करने वाले है। विहार करने वाला काल जिस काल का यापन करे ऐसादूसरा काल प्रसिद्ध नहीं है, अतः स्वशरीर को ही विनोदित करता है, यह भाव है।।28।। जैसे महापर्वत (हिमालय) पृथिवी में पूर्व और उत्तर की सीमा से शून्य प्रदेश में स्थित अपने शरीर का अवलम्बन करके खड़ा है वैसे ही यह काल भी अपरिच्छिन्न, आदि-अन्तरहित ब्रह्म में प्रतिष्ठित अपने स्वरूप का अवलम्बन करके स्थित है।।29।। यह काल कहीं पर (रात्रि आदि काले पदार्थों में) काल अन्धकार के तुल्य श्यामल, कहीं पर (दिन, चाँदनी, मणि आदि प्रकाशमान पदार्थों में) कान्ति से परिपूर्ण औऱ कहीं पर (भण्डार और भीत आदि में) अन्धकार और कान्ति से शून्य अपने कार्य को करता हुआ स्थित है। विलीन हुए असंख्य प्राणिपूर्ण संसारों के सारभूत और सबका आधार होने से अत्यन्त भार से युक्त अपने स्वरूप से पृथिवी के समान ऐसा स्थित है कि इसकी जड़ कभी हिल नहीं सकती।।30,31।। सैंकड़ों महाकल्पों से न तो इसे खेद होता है, न प्रसन्नता होती है, न यह आता है, न जाता है, न अस्त को प्राप्त होता है और न उदित होता है। यह काल अत्यन्त अनादरपूर्वक जगत् की रचनारूप लीला से अहंकार रहित और सर्वत्र व्याप्त अपनी आत्मा का पालन करता है, उसका विनाश कभी नहीं करता।।32,33।। यह काल लगातार रात्रि रूपी पंक से उत्पन्न हुई और मेघरूपी भँवरी से युक्त दिनरूपी लाल कमलों की श्रेणी का अपने आत्मरूपी तालाब में रोपण करता रहता है।।34।। यह लोभी काल पुरानी सम्मार्जनी (बुहारी) रूपी काली रात्रि को लेकर कनकाचल के (सुमेरू के) चारों ओर उससे गिरे हुए आलोकरूपी सुवर्ण के कणों को बटोरता रहता है। एक बार झाड़ू से बटोरने पर बहुत सा सुवर्ण मिलने पर भी यह सन्तुष्ट नहीं होता और लोभी इतना बड़ा है कि नई सम्मार्जिनी भी नहीं ले सकता, यह भाव है।।35।। लोभी होने के  कारण ही कार्यरूपी उँगली से दिशाओं के कोनों में सूर्यरूपी दीपक ले जाता हुआ यह काल जगतरूपी घर में कहाँ पर क्या है ? यह देखता है।।36।। दिनरूपी पलकों से युक्त सूर्यरूपी नेत्र से ये बहुत अच्छी तरह पक गये हैं, यह देखकर जगतरूपी पुराने वन से यह लोकपालरूपी फलों को तोड़कर खाता है।।37।। जगतरूपी पुराने झोंपड़े में प्रमाद से इधर-उधर गिरे हुए गुणवान जनरूपी मणियों को यह काल महान् उदरवाले मृत्युरूपी सन्दूक में क्रमशः डालता है।।38।। जो जनरूपी रत्नावली गुणों से (सूत्रों से) अत्यन्त पूर्ण हो जाती है, मानों अलंकार के लिए उसको अपने अवयवरूप सत्य, त्रेता आदि युगों में रखकर फिर उन्हें नष्ट कर देता है।।39।। यह चंचल काल बीच-बीच में दिनरूपी हंसों से गुँथी हुई तारारूपी केसर से पूर्ण रात्रिरूपी नीलकमलों की माला को पाँच ऋतुरूपी अंगुलियों से युक्त वर्षरूपी हाथ के प्रकोष्ठ में कंकण के समान नित्य धारण करता है।।40।। पर्वत, समुद्र, द्युलोक और पृथिवीरूप चार श्रृंगवाले जगतरूपी भेड़ों का हिंसक यह काल आकाशरूपी आँगन में बिखरे हुए तारारूपी रक्त के बिन्दुओं को भी देखकर प्रतिदिन उन्हें चाटता है।।41।। यह काल यौवनरूपी कमलिनी के लिए चन्द्रमारूप और आयुरूपी गज के लिए सिंहस्वरूप है। इस संसार में अत्यन्त तुच्छ या महान् ऐसी वस्तु नहीं है, जिसका कि यह काल नाश न करता हो।।42।। जैसे जीव सुषुप्तिकाल में सब दुःखों का संहाकर अज्ञानमात्र के अवलम्बन से स्थिति करता है, वैसे ही जिसने जन्तुओं को पीसकर मृत्यु के मुँह में गिरा दिया है, ऐसे प्रलयरूपी क्रीड़ा के विलास से पदार्थों का अभावरूप यह काल भी अज्ञानावभासक अपने अधिष्ठानभूत ब्रह्म चैतन्य का अवलम्बन कर आत्मभूत उसी में रमण करता है उसके पृथक नहीं होता। इस प्रकार प्रलयकाल में विश्राम लेकर यह काल ही फिर सृष्टिकाल में संसार का कर्त्ता, भोक्ता, संहारक, स्मर्ता आदि सब पदार्थों के स्वरूप को प्राप्त हुआ है अर्थात् यह स्वयं ही कर्त्ता, भोक्ता, संहारक, सुभग, दुर्भग आदि बना है।।43,44।। बुद्धिकौशल से इस काल के रहस्य का किसी ने निश्चय नहीं कर पाया है, पुण्य फल के उपभोग के अनुकूल सुन्दर रूप और पाप फल के भोग के अनुरूप कुरूप को धारण करने वाले सम्पूर्ण शरीरों की सहसा सृष्टि, रक्षा और संहार करता हुआ यह प्रदीप्त हो रहा है। इस संसार के सम्पूर्ण जीवों में काल सबसे अधिक बलवान हैं।।45।।

तेईसवाँ सर्ग समाप्त
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शनिवार, 15 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 13



बाईसवाँ सर्ग 
शोक, मोह, इष्टवियोग का दुःख, रोग आदि से परिपूर्ण तथा चिन्ता और तिरस्कार के घर वृद्वावस्था की निन्दा।
युवावस्था में काम आदि दोष बड़े प्रबल रहते हैं, इसलिए युवक को भले ही सुख न हो, किन्तु वृद्धावस्था में काम आदि दोषों के शान्त हो जाने पर एवं विनीत पुत्र, पौत्र आदि द्वारा घर में सेवा होने पर वृद्ध को अति आनन्द होता है, ऐसी शंका कर वृद्धावस्था में अनन्त दुःखों का विस्तार से वर्णन करने की इच्छा से पहले 'अपने बच्चों का नाश करने वाले साँपों को दूसरे के बच्चों पर दया कैसे हो सकती है' इस न्याय से वृद्धावस्था अति कठोर है, यह कहते हैं।
खेल-कूद कौतूहल आदि की अभिलाषा के पूर्ण न होने पर ही युवावस्था आकर जबर्दस्ती बाल्यावस्था को निगल जाती है, तदुपरान्त स्त्रीसंभोग आदि की इच्छा की पूर्ति न होने पर ही वृद्धावस्था आकर युवावस्था को स्वाहा कर देती है अतः इन दोनों की (युवावस्था और वृद्धावस्था की) परस्पर कठोरता को देखिये अर्थात् उसी शरीर में होने वाली बाल्यावस्था को यौवन निगल गया अतएव यौवन कठोरतर हुआ, उक्त कठोरतर यौवन को निगलने वाली वृद्धावस्था कठोरतम न होगी तो क्या होगी ?।।1।।
पामर लोगों के परम प्रेमपात्र विषयसुख के गृहभूत शरीर को ही जो वृद्धावस्था नष्ट-भ्रष्ट कर देती है, उसमें सुख की आशा कहाँ ?
जैसे तुषाररूपी वज्र कमलों को नष्ट-भ्रष्ट कर देता है, जैसे आँधी शरदऋतु की ओस को (पत्तों के सिरे पर लटक रहे जलकण को) नष्ट कर देती है और जैसे नदी तटके वृक्ष को उखाड़ देती है, वैसे ही वृद्धावस्था शरीर को नष्ट कर डालती है।।2।। यदि विष का छोटा सा टुकड़ा खा लिया जाय, तो वह जैसे थोड़ी देर में ही देह को कुरूपकर देता है, वैसे ही अंग-प्रत्यंग को शिथिल करने वाली एवं वृद्धकेसे स्वरूप वाली वृद्धावस्था देह को शीघ्र (आते ही) कुरूप कर देती है। यदि वृद्धावस्था स्वयं वृद्धरूप न होती तो अन्यों को वृद्धरूप कैसे करती, ऐसे तर्क करके लोक में जरठरूपिणी कहा है।।3।। जिनके सब अंग शिथिल और छिन्न भिन्न हो गये हैं, और वृद्धावस्था से शरीर जर्जरित हो गया है, ऐसे सभी पुरुषों को स्त्रियाँ ऊँट के समान समझती हैं।।4।। अनायास दीनता को प्राप्त कराने वाली वृद्धावस्था जब मनुष्य को पकड़ती है तब सौत से तिरस्कृत (पिटी गई) स्त्री के समान बुद्धि भागकर कहीं अन्यत्र चली जाती है।।5।। नौकर-चाकर, पुत्र, स्त्रियाँ, बन्धु-बान्धव और सगे सम्बन्धी सभी लोग वृद्धावस्था से काँप रहे मनुष्य को घृणित उन्मत पुरुष की नाईं उपहास करते हैं।।6।। जैसे गीध फलयुक्त शाखा और टहनियों के फैलाव के कारण अन्य पक्षियों के आक्रमण से रहित अति उन्नत पुराने वृक्ष पर आता है, वैसे ही कुरूप, वृद्ध, गुण और सामर्थ्य से शून्य अतएव दीन वृद्ध पुरुष में बड़ी अभिलाषा आती है।।7।। दीनतारूपी दोष से परिपूर्ण, हृदय में सन्ताप पहुँचाने वाली और सम्पूर्ण आपत्तियों की एकमात्र सहचरी बड़ी भारी तृष्णा वृद्धावस्था में बढ़ती जाती है।।8।। खेद है, परलोक में मैं क्या करूँगा, इस प्रकार का अतिभीषण भय, जिसका कोई प्रतीकार नहीं हो सकता, वृद्धावस्था में बढ़ता जाता है।।9।। हे महर्षे, मैं कौन हूँ, बड़ा दुःखी-दीन हूँ, मैं क्या करूँ, कैसे करूँ, अच्छा चुपचाप मौन ही रहूँ, ऐसी दीनता वृद्धावस्था में प्राप्त होती है अर्थात् वृद्धावस्था में मैं दुःखी हूँ, मैं अकर्मण्य हूँ, मैं नितान्त हेय और तुच्छ हूँ, मैं क्या करूँ, मुझ में सामर्थ्य ही क्या है, किस प्रकार मैं अपना जीवन निर्वाह करूँ, मेरा बोलने से क्या प्रयोजन है, अच्छा, मैं मौन ही रहता हूँ, इत्यादि प्रकार की दीनता उदित होती है।।10।। वृद्धावस्था में अपने आत्मीय जनों से मुझे किस प्रकार कब कुछ स्वादिष्ट भोजन प्राप्त होगा, ऐसी चिन्तारूपी दूसरी जरा सदा चित्त को जलाती रहती है।।11।। वृद्धावस्था में भोजन की शक्ति होने पर पचाने की अशक्ति, पचाने की शक्ति होने पर भोजन की अशक्ति इत्यादि शक्तिह्रास से भोग की इच्छा तो बड़ी प्रबल हो उठती है, पर उपभोग नहीं किया जा सकता और हृदय सदा जलता रहता है।।12।। मुनिवर, जब विविध दुःखों से शरीर का अपकार करने वाली, रोगरूपी साँपों से व्याप्त वृद्धावस्थारूपी जीर्ण बगुली शरीररूपी वृक्ष की चोटी पर बैठकर बासती है, उसी समय निबिड़ मूर्च्छारूपी अन्धकार को चाहने वाला मृत्युरूपी उल्लू झटपट कहाँ से आया हुआ ही दिखाई देता है।।13,14।। जैसे सायंकाल की सन्ध्या के उत्पन्न होने पर अन्धकार उसके पीछे दौड़ता है अर्थात् सायंकाल होने के बाद अन्धकार इधर-उधर व्याप्त हो जाता है, वैसे ही शरीर में वृद्धावस्था को देखकर ही काल लेने के लिए समीप में दौड़ कर आता है।।15।। मुनिश्रेष्ठ वृद्धावस्था से कपास की नाईं फूले हुआ (सफेद केश और मूँछ-दाढ़ी से युक्त) देहरूपी वृक्ष को दूर से ही देखकर कालरूपी बन्दर बड़े वेग से  उसकी और दौड़ता है अर्थात् जैसे फूलों से युक्त वृक्ष को दूर से ही देखकर बन्दर उसकी ओर दौड़ता है, वैसे ही वृद्धावस्था से सफेद हुए शरीर की ओर काल दौड़ता है।।16।। निर्जन नगर की यथा कदाचित् कुछ शोभा हो भी सकती है, जिसकी सब लताएँ कट चुकी है, वह वृक्ष भी कुछ शोभित हो सकता है, अनावृष्टि से पीड़ित देश की भी कुछ न कुछ शोभा हो सकती है, मगर वृद्धावस्था से जर्जरित शरीर की कुछ भी शोभा नहीं है, अर्थात् वह इन सब दृष्टान्तों से बढ़कर अभद्र है।।17।। जैसे शब्द करने वाली गृधी (गीध की स्त्री) निगलने के लिए ही शीघ्र मांस के टुकड़े को पकड़ लेती है, वैसे ही खाँसीरूप शब्द करने वाली वृद्धावस्था मनुष्य को निगलने के लिए ही वेग से पकड़ लेती है।।18।। जैसे बालिका उत्सुकता के साथ देखकर और सिर पकड़कर कमल के फूल को तोड़ लेती है, वैसे ही वृद्धावस्था भी बड़ी उत्सुकता के साथ देखकर और सिर पकड़कर देह को काट देती है, नष्ट कर देती है।।19।। जैसे धूलि के कणों से कठोर और सी-सी कार कराने वाली (सी-सी शब्द कराने वाली) शिशिर ऋतु के तेज वायु वृक्ष के पत्तों को धूलि से ध्वस्त कर छिन्न-भिन्न कर देती है, वैसे ही शरीर में कम्प कराने वाली रूसी से कठोर यह वृद्धावस्था शरीर को नष्ट कर देती है।।20।। वृद्धावस्था से तहस-नहस और जर्जरित शरीर तुषार (हिम) के कणों से व्याप्त अतएव म्लान (मुरझाये हुए) कमल की समानता को धारण करता है अर्थात् जैसे हिम समूह से आक्रान्त कमल मुरझा जाता है वैसे ही वृद्धावस्था से आक्रान्त शरीर भी जीर्ण-शीर्ण हो जाता है।।21।। यह वृद्धावस्थारूपिणी चाँदनी सिररूपी पर्वत के शिर से उदित होते ही वातरोग और खाँसीरोगरूपी कुमुदिनी को बड़े प्रयत्न से विकसित करती है अर्थात् जैसे उदयाचल से उदित होते ही चाँदनी यत्नपूर्वक कुमुदिनीको विकसित करती है वैसे ही प्रथम सिर में आविर्भूत हुई वृद्धावस्था वातरोग और खाँसी को खूब बढ़ा देती हैं।।22।। भगवन्, कालरूपी स्वामी वृद्धावस्थारूपी लवणादि चूर्ण से धूसर पुरुषों के सिररूपी कूष्माण्ड (कोहड़ा) को पका हुआ जानकर खा जाता है अर्थात् जैसे स्वामी (किसान या अन्य कोई गृहस्थ, क्योंकि वही उसको पैदा करता है, अतः वह स्वामी है) क्षार चूर्ण से धूसर कोहड़े को पका हुआ जानकर खा जाता है, वैसे ही काल भी मनुष्यों के सिर को वृद्धावस्था से सफेद हुआ देखकर खा जाता है।।23।। आयुरूपी प्रवाह के शीघ्र चलने पर वृद्धावस्थारूपी गंगा लगातार प्रयत्नपूर्वक इस शरीररूपी तटवृक्ष की जड़ों को काट डालती है, अर्थात् जैसे प्रवाह तेज होने पर गंगा तीरस्थित वृक्ष की जड़ों को काटकर उसे गिरा देती है, वैसे ही आयु के पूर्ण होने पर वृद्धावस्था लगातार शरीर की जड़ों को काट कर उसे गिरा देती है, वैसे ही आयु के पूर्ण होने पर वृद्धावस्थारूपी गंगा लगातार शरीर की जड़ों (शरीर के आधार बल आदि) को काटकर उसे गिरा देती है।।24।। पहले वृद्धावस्थारूपी बिल्ली यौवनरूपी चूहे को खाती है, फिर उद्धत होकर उसे शरीर का मांस खाने की इच्छा हो जाती है, तब तो उसकी उद्दण्डता का ठिकाना नहीं रहता।।25।। इस संसार में ऐसी अमंगलकारिणी कोई नहीं है, जैसे कि रोदन करने वाली (शब्द करने वाली) देहरूपी जंगल की सियारिन यह वृद्धावस्था है अर्थात् जैसा जंगल की सियारिन के वासने से अमंगल होता है वैसा किसी से नहीं होता। यह वृद्धावस्था भी ठीक सियारिन के समान है, यह भी रोदन करने वाली है और सबसे बढ़कर दुःखदायिनी है।।26।। खाँसी और साँस के साँय-साँय शब्द से युक्त दुःखरूपी धुआँ और कालिख से पूर्ण यह वृद्धावस्थारूपी ज्वाला जलती है, जिसने इस देह को जला ही डाला अर्थात् गीली लकड़ियों के जलने पर ज्वाला सीं-सीं शब्द से युक्त और धूममय करती है और उसमें धुआँ और कालिख भी रहती है, अतएव जैसे सीं-सीं शब्द से युक्त और धूममय और कालिखपूर्ण ज्वाला काष्ठ को जला देती है वैसे ही कास श्वास की साँय-साँय से युक्त और दुःखमय यह(♦) वृद्धावस्था भी देह को जला देती है।।27।।
♦ वृद्धावस्था में नेत्रों की ज्योति के कुछ कम क्षीण होने पर धूममय प्रकाश दिखाई देता है और बहुत अधिक क्षीण होने पर अन्धकार हो जाता है, अतः धूममय और अन्धकारमय विशेषण भी जरा में लग सकते हैं।
जैसे सफेद पत्तों वाली और फूलों से लदी हुई छोटी लता, फूलों के बोझ को न सह सकने के कारण, टेढ़ी हो जाती है, वैसे ही सफेद सम्पूर्ण अंगों से युक्त मनुष्यों का छोटा सा शरीर वृद्धावस्था से टेढ़ा हो जाता है।।28।। वृद्धावस्था रूपी कपूर से सफेद देहरूपी केले के पेड़ को हाथी अनायास उखाड़कर फेंक देता है वैसे ही मृत्यु भी वृद्धावस्था से सफेद देह को निःसन्देह क्षणभर में उखाड़कर फेंक देती है।।29।। पीछे से आने वाले मृत्युरूपी राजा की वृद्धावस्थारूपी सफेद चँवरों से युक्त चिन्ता-व्याधिरूपी अपनी निजी सेना पहले निकलती है। अर्थात् जैसे कोई राजा जब कहीं जाता है, तब चँवर से युक्त उसकी सेना पहले निकलती है वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिए।।30।। मुनिवर, बड़े धैर्य से दुर्गम पहाड़ों की गुफाओं में बैठे हुए जिन लोगों को रण में शत्रु हरा नहीं सके, उन्हें भी वृद्धावस्थारूपी वृद्ध राक्षसी ने शीघ्र हरा दिया, यह आश्चर्य देखिये।।31।। वृद्धावस्थारूपी हिम से संकुचित (चारों और हिम से पूर्ण हो जाने के कारण कम आकाश वाले) शरीररूपी गृह से मध्य में इन्द्रियरूपी बच्चे तनिक भी हिलने-डुलने को समर्थ नहीं हो सकते अर्थात् जैसे हिम से परिपूर्ण घर के अन्दर बालक इधर-उधर चल-फिर नहीं सकते, वैसे ही वृद्धावस्था से पूर्ण शरीर में इन्द्रियाँ अपना कुछ भी व्यापार नहीं कर सकती।32।। लाठीरूपी तीसरे पैर से युक्त, बारबार लड़खड़ा रही तथा खाँसी और अधोवायुरूपी मुरजसे (पखावज से) युक्त वृद्धावस्थारूपी स्त्री नाच कर रही है।।33।। गन्ध अर्थात् रागद्वेष आदि से चित्त को (दूसरे पक्ष में सभा को) वासित करने वाला विषयभोग (और कस्तूरी आदि सुगन्धित पदार्थ) इस संसाररूपी राजा के व्यवहार से सम्बन्ध रखने वाली और विषयभोग की कुटी आश्रय देहरूपी यष्टि के सिर पर बैठी हुई वृद्धावस्था नामक चँवरशोभा विराजमान है अर्थात् जैसे राजा के व्यवहार से सम्बन्ध रखने वाली और कस्तूरी आदि सुगन्धि पदार्थों को रखने की यष्टि के ऊपर स्थित चमरश्री अपने अनुपम सौन्दर्य सुगन्धित और मन्द मन्द वायु के प्रसार से शोभित होती है, वैसे ही विषय भोग की आश्रयभूत इस देह में सिर पर बैठी हुई वृद्धावस्था भी शोभित होती  है।।34।। मुनीश्वर, वृद्धावस्थारूपी चन्द्रोदय से से शुभ्र (सफेद और प्रकाशमय) शरीररूपी नगर में स्थित जीविताशारूप तालाब में मृत्युरूपी कुमुदिनी क्षणभर में विकास को प्राप्त होती है अर्थात् जैसे चन्द्रमा के उदित होने से प्रकाशमय नगर में स्थित तालाब में कुमुदिनी शीघ्र विकसित हो जाती है, वैसे ही वृद्धावस्था से सफेद हुए शरीर में स्थित जीविताशा में शीघ्र मृत्यु का आविर्भाव हो जाता है।।35।। वृद्धावस्थारूपी चूने के लेप से (पुताई से) शुभ्र शरीररूपी अन्तःपुर के (रनवास के) भीतर अशक्ति (सामर्थ्य का अभाव), पीड़ा और आपत्तिरूपी महिलाएँ बड़े चैन से रहती हैं।।36।। जिन जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्जरूप चार प्रकार के शरीरों में पहले वृद्धावस्था आक्रमण करती है और उसके आगे मृत्यु अवश्य आने वाली है, उन्हीं शरीरों में से एक इस शरीर में (उन शरीरों के सजातीय इस शरीर में) मुझ अतत्त्वज्ञ का क्या विश्वास हो सकता है? पहले वृद्धावस्था का तदन्तर मृत्यु का ग्रास होने वाले इस शरीर में मेरी तनिक भी आस्था नहीं है, यह भाव है।।37।। हे तात्, जो वृद्धावस्था को प्राप्त होकर भी बना रहता है, उस दुष्ट जीवन के दुराग्रह से (दुरभिलाषा से) क्या प्रयोजन है अर्थात् कुछ भी नहीं, वह व्यर्थ ही है क्योंकि वृद्धावस्था इस पृथिवी में मनुष्यों की सम्पूर्ण एषणाओं का तिरस्कार कर देती है। अर्थात् वृद्धावस्था के आने पर कोई भी पुरुष अपनी किसी इच्छा को पूर्ण नहीं कर सकता, इसलिए दुःखप्रद दुष्ट जीवन की दुराग्रहपूर्वक इच्छा करना निष्फल ही है, यह भाव है।।38।।


बाईसवाँ सर्ग समाप्त
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