मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

शनिवार, 15 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 13



बाईसवाँ सर्ग 
शोक, मोह, इष्टवियोग का दुःख, रोग आदि से परिपूर्ण तथा चिन्ता और तिरस्कार के घर वृद्वावस्था की निन्दा।
युवावस्था में काम आदि दोष बड़े प्रबल रहते हैं, इसलिए युवक को भले ही सुख न हो, किन्तु वृद्धावस्था में काम आदि दोषों के शान्त हो जाने पर एवं विनीत पुत्र, पौत्र आदि द्वारा घर में सेवा होने पर वृद्ध को अति आनन्द होता है, ऐसी शंका कर वृद्धावस्था में अनन्त दुःखों का विस्तार से वर्णन करने की इच्छा से पहले 'अपने बच्चों का नाश करने वाले साँपों को दूसरे के बच्चों पर दया कैसे हो सकती है' इस न्याय से वृद्धावस्था अति कठोर है, यह कहते हैं।
खेल-कूद कौतूहल आदि की अभिलाषा के पूर्ण न होने पर ही युवावस्था आकर जबर्दस्ती बाल्यावस्था को निगल जाती है, तदुपरान्त स्त्रीसंभोग आदि की इच्छा की पूर्ति न होने पर ही वृद्धावस्था आकर युवावस्था को स्वाहा कर देती है अतः इन दोनों की (युवावस्था और वृद्धावस्था की) परस्पर कठोरता को देखिये अर्थात् उसी शरीर में होने वाली बाल्यावस्था को यौवन निगल गया अतएव यौवन कठोरतर हुआ, उक्त कठोरतर यौवन को निगलने वाली वृद्धावस्था कठोरतम न होगी तो क्या होगी ?।।1।।
पामर लोगों के परम प्रेमपात्र विषयसुख के गृहभूत शरीर को ही जो वृद्धावस्था नष्ट-भ्रष्ट कर देती है, उसमें सुख की आशा कहाँ ?
जैसे तुषाररूपी वज्र कमलों को नष्ट-भ्रष्ट कर देता है, जैसे आँधी शरदऋतु की ओस को (पत्तों के सिरे पर लटक रहे जलकण को) नष्ट कर देती है और जैसे नदी तटके वृक्ष को उखाड़ देती है, वैसे ही वृद्धावस्था शरीर को नष्ट कर डालती है।।2।। यदि विष का छोटा सा टुकड़ा खा लिया जाय, तो वह जैसे थोड़ी देर में ही देह को कुरूपकर देता है, वैसे ही अंग-प्रत्यंग को शिथिल करने वाली एवं वृद्धकेसे स्वरूप वाली वृद्धावस्था देह को शीघ्र (आते ही) कुरूप कर देती है। यदि वृद्धावस्था स्वयं वृद्धरूप न होती तो अन्यों को वृद्धरूप कैसे करती, ऐसे तर्क करके लोक में जरठरूपिणी कहा है।।3।। जिनके सब अंग शिथिल और छिन्न भिन्न हो गये हैं, और वृद्धावस्था से शरीर जर्जरित हो गया है, ऐसे सभी पुरुषों को स्त्रियाँ ऊँट के समान समझती हैं।।4।। अनायास दीनता को प्राप्त कराने वाली वृद्धावस्था जब मनुष्य को पकड़ती है तब सौत से तिरस्कृत (पिटी गई) स्त्री के समान बुद्धि भागकर कहीं अन्यत्र चली जाती है।।5।। नौकर-चाकर, पुत्र, स्त्रियाँ, बन्धु-बान्धव और सगे सम्बन्धी सभी लोग वृद्धावस्था से काँप रहे मनुष्य को घृणित उन्मत पुरुष की नाईं उपहास करते हैं।।6।। जैसे गीध फलयुक्त शाखा और टहनियों के फैलाव के कारण अन्य पक्षियों के आक्रमण से रहित अति उन्नत पुराने वृक्ष पर आता है, वैसे ही कुरूप, वृद्ध, गुण और सामर्थ्य से शून्य अतएव दीन वृद्ध पुरुष में बड़ी अभिलाषा आती है।।7।। दीनतारूपी दोष से परिपूर्ण, हृदय में सन्ताप पहुँचाने वाली और सम्पूर्ण आपत्तियों की एकमात्र सहचरी बड़ी भारी तृष्णा वृद्धावस्था में बढ़ती जाती है।।8।। खेद है, परलोक में मैं क्या करूँगा, इस प्रकार का अतिभीषण भय, जिसका कोई प्रतीकार नहीं हो सकता, वृद्धावस्था में बढ़ता जाता है।।9।। हे महर्षे, मैं कौन हूँ, बड़ा दुःखी-दीन हूँ, मैं क्या करूँ, कैसे करूँ, अच्छा चुपचाप मौन ही रहूँ, ऐसी दीनता वृद्धावस्था में प्राप्त होती है अर्थात् वृद्धावस्था में मैं दुःखी हूँ, मैं अकर्मण्य हूँ, मैं नितान्त हेय और तुच्छ हूँ, मैं क्या करूँ, मुझ में सामर्थ्य ही क्या है, किस प्रकार मैं अपना जीवन निर्वाह करूँ, मेरा बोलने से क्या प्रयोजन है, अच्छा, मैं मौन ही रहता हूँ, इत्यादि प्रकार की दीनता उदित होती है।।10।। वृद्धावस्था में अपने आत्मीय जनों से मुझे किस प्रकार कब कुछ स्वादिष्ट भोजन प्राप्त होगा, ऐसी चिन्तारूपी दूसरी जरा सदा चित्त को जलाती रहती है।।11।। वृद्धावस्था में भोजन की शक्ति होने पर पचाने की अशक्ति, पचाने की शक्ति होने पर भोजन की अशक्ति इत्यादि शक्तिह्रास से भोग की इच्छा तो बड़ी प्रबल हो उठती है, पर उपभोग नहीं किया जा सकता और हृदय सदा जलता रहता है।।12।। मुनिवर, जब विविध दुःखों से शरीर का अपकार करने वाली, रोगरूपी साँपों से व्याप्त वृद्धावस्थारूपी जीर्ण बगुली शरीररूपी वृक्ष की चोटी पर बैठकर बासती है, उसी समय निबिड़ मूर्च्छारूपी अन्धकार को चाहने वाला मृत्युरूपी उल्लू झटपट कहाँ से आया हुआ ही दिखाई देता है।।13,14।। जैसे सायंकाल की सन्ध्या के उत्पन्न होने पर अन्धकार उसके पीछे दौड़ता है अर्थात् सायंकाल होने के बाद अन्धकार इधर-उधर व्याप्त हो जाता है, वैसे ही शरीर में वृद्धावस्था को देखकर ही काल लेने के लिए समीप में दौड़ कर आता है।।15।। मुनिश्रेष्ठ वृद्धावस्था से कपास की नाईं फूले हुआ (सफेद केश और मूँछ-दाढ़ी से युक्त) देहरूपी वृक्ष को दूर से ही देखकर कालरूपी बन्दर बड़े वेग से  उसकी और दौड़ता है अर्थात् जैसे फूलों से युक्त वृक्ष को दूर से ही देखकर बन्दर उसकी ओर दौड़ता है, वैसे ही वृद्धावस्था से सफेद हुए शरीर की ओर काल दौड़ता है।।16।। निर्जन नगर की यथा कदाचित् कुछ शोभा हो भी सकती है, जिसकी सब लताएँ कट चुकी है, वह वृक्ष भी कुछ शोभित हो सकता है, अनावृष्टि से पीड़ित देश की भी कुछ न कुछ शोभा हो सकती है, मगर वृद्धावस्था से जर्जरित शरीर की कुछ भी शोभा नहीं है, अर्थात् वह इन सब दृष्टान्तों से बढ़कर अभद्र है।।17।। जैसे शब्द करने वाली गृधी (गीध की स्त्री) निगलने के लिए ही शीघ्र मांस के टुकड़े को पकड़ लेती है, वैसे ही खाँसीरूप शब्द करने वाली वृद्धावस्था मनुष्य को निगलने के लिए ही वेग से पकड़ लेती है।।18।। जैसे बालिका उत्सुकता के साथ देखकर और सिर पकड़कर कमल के फूल को तोड़ लेती है, वैसे ही वृद्धावस्था भी बड़ी उत्सुकता के साथ देखकर और सिर पकड़कर देह को काट देती है, नष्ट कर देती है।।19।। जैसे धूलि के कणों से कठोर और सी-सी कार कराने वाली (सी-सी शब्द कराने वाली) शिशिर ऋतु के तेज वायु वृक्ष के पत्तों को धूलि से ध्वस्त कर छिन्न-भिन्न कर देती है, वैसे ही शरीर में कम्प कराने वाली रूसी से कठोर यह वृद्धावस्था शरीर को नष्ट कर देती है।।20।। वृद्धावस्था से तहस-नहस और जर्जरित शरीर तुषार (हिम) के कणों से व्याप्त अतएव म्लान (मुरझाये हुए) कमल की समानता को धारण करता है अर्थात् जैसे हिम समूह से आक्रान्त कमल मुरझा जाता है वैसे ही वृद्धावस्था से आक्रान्त शरीर भी जीर्ण-शीर्ण हो जाता है।।21।। यह वृद्धावस्थारूपिणी चाँदनी सिररूपी पर्वत के शिर से उदित होते ही वातरोग और खाँसीरोगरूपी कुमुदिनी को बड़े प्रयत्न से विकसित करती है अर्थात् जैसे उदयाचल से उदित होते ही चाँदनी यत्नपूर्वक कुमुदिनीको विकसित करती है वैसे ही प्रथम सिर में आविर्भूत हुई वृद्धावस्था वातरोग और खाँसी को खूब बढ़ा देती हैं।।22।। भगवन्, कालरूपी स्वामी वृद्धावस्थारूपी लवणादि चूर्ण से धूसर पुरुषों के सिररूपी कूष्माण्ड (कोहड़ा) को पका हुआ जानकर खा जाता है अर्थात् जैसे स्वामी (किसान या अन्य कोई गृहस्थ, क्योंकि वही उसको पैदा करता है, अतः वह स्वामी है) क्षार चूर्ण से धूसर कोहड़े को पका हुआ जानकर खा जाता है, वैसे ही काल भी मनुष्यों के सिर को वृद्धावस्था से सफेद हुआ देखकर खा जाता है।।23।। आयुरूपी प्रवाह के शीघ्र चलने पर वृद्धावस्थारूपी गंगा लगातार प्रयत्नपूर्वक इस शरीररूपी तटवृक्ष की जड़ों को काट डालती है, अर्थात् जैसे प्रवाह तेज होने पर गंगा तीरस्थित वृक्ष की जड़ों को काटकर उसे गिरा देती है, वैसे ही आयु के पूर्ण होने पर वृद्धावस्था लगातार शरीर की जड़ों को काट कर उसे गिरा देती है, वैसे ही आयु के पूर्ण होने पर वृद्धावस्थारूपी गंगा लगातार शरीर की जड़ों (शरीर के आधार बल आदि) को काटकर उसे गिरा देती है।।24।। पहले वृद्धावस्थारूपी बिल्ली यौवनरूपी चूहे को खाती है, फिर उद्धत होकर उसे शरीर का मांस खाने की इच्छा हो जाती है, तब तो उसकी उद्दण्डता का ठिकाना नहीं रहता।।25।। इस संसार में ऐसी अमंगलकारिणी कोई नहीं है, जैसे कि रोदन करने वाली (शब्द करने वाली) देहरूपी जंगल की सियारिन यह वृद्धावस्था है अर्थात् जैसा जंगल की सियारिन के वासने से अमंगल होता है वैसा किसी से नहीं होता। यह वृद्धावस्था भी ठीक सियारिन के समान है, यह भी रोदन करने वाली है और सबसे बढ़कर दुःखदायिनी है।।26।। खाँसी और साँस के साँय-साँय शब्द से युक्त दुःखरूपी धुआँ और कालिख से पूर्ण यह वृद्धावस्थारूपी ज्वाला जलती है, जिसने इस देह को जला ही डाला अर्थात् गीली लकड़ियों के जलने पर ज्वाला सीं-सीं शब्द से युक्त और धूममय करती है और उसमें धुआँ और कालिख भी रहती है, अतएव जैसे सीं-सीं शब्द से युक्त और धूममय और कालिखपूर्ण ज्वाला काष्ठ को जला देती है वैसे ही कास श्वास की साँय-साँय से युक्त और दुःखमय यह(♦) वृद्धावस्था भी देह को जला देती है।।27।।
♦ वृद्धावस्था में नेत्रों की ज्योति के कुछ कम क्षीण होने पर धूममय प्रकाश दिखाई देता है और बहुत अधिक क्षीण होने पर अन्धकार हो जाता है, अतः धूममय और अन्धकारमय विशेषण भी जरा में लग सकते हैं।
जैसे सफेद पत्तों वाली और फूलों से लदी हुई छोटी लता, फूलों के बोझ को न सह सकने के कारण, टेढ़ी हो जाती है, वैसे ही सफेद सम्पूर्ण अंगों से युक्त मनुष्यों का छोटा सा शरीर वृद्धावस्था से टेढ़ा हो जाता है।।28।। वृद्धावस्था रूपी कपूर से सफेद देहरूपी केले के पेड़ को हाथी अनायास उखाड़कर फेंक देता है वैसे ही मृत्यु भी वृद्धावस्था से सफेद देह को निःसन्देह क्षणभर में उखाड़कर फेंक देती है।।29।। पीछे से आने वाले मृत्युरूपी राजा की वृद्धावस्थारूपी सफेद चँवरों से युक्त चिन्ता-व्याधिरूपी अपनी निजी सेना पहले निकलती है। अर्थात् जैसे कोई राजा जब कहीं जाता है, तब चँवर से युक्त उसकी सेना पहले निकलती है वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिए।।30।। मुनिवर, बड़े धैर्य से दुर्गम पहाड़ों की गुफाओं में बैठे हुए जिन लोगों को रण में शत्रु हरा नहीं सके, उन्हें भी वृद्धावस्थारूपी वृद्ध राक्षसी ने शीघ्र हरा दिया, यह आश्चर्य देखिये।।31।। वृद्धावस्थारूपी हिम से संकुचित (चारों और हिम से पूर्ण हो जाने के कारण कम आकाश वाले) शरीररूपी गृह से मध्य में इन्द्रियरूपी बच्चे तनिक भी हिलने-डुलने को समर्थ नहीं हो सकते अर्थात् जैसे हिम से परिपूर्ण घर के अन्दर बालक इधर-उधर चल-फिर नहीं सकते, वैसे ही वृद्धावस्था से पूर्ण शरीर में इन्द्रियाँ अपना कुछ भी व्यापार नहीं कर सकती।32।। लाठीरूपी तीसरे पैर से युक्त, बारबार लड़खड़ा रही तथा खाँसी और अधोवायुरूपी मुरजसे (पखावज से) युक्त वृद्धावस्थारूपी स्त्री नाच कर रही है।।33।। गन्ध अर्थात् रागद्वेष आदि से चित्त को (दूसरे पक्ष में सभा को) वासित करने वाला विषयभोग (और कस्तूरी आदि सुगन्धित पदार्थ) इस संसाररूपी राजा के व्यवहार से सम्बन्ध रखने वाली और विषयभोग की कुटी आश्रय देहरूपी यष्टि के सिर पर बैठी हुई वृद्धावस्था नामक चँवरशोभा विराजमान है अर्थात् जैसे राजा के व्यवहार से सम्बन्ध रखने वाली और कस्तूरी आदि सुगन्धि पदार्थों को रखने की यष्टि के ऊपर स्थित चमरश्री अपने अनुपम सौन्दर्य सुगन्धित और मन्द मन्द वायु के प्रसार से शोभित होती है, वैसे ही विषय भोग की आश्रयभूत इस देह में सिर पर बैठी हुई वृद्धावस्था भी शोभित होती  है।।34।। मुनीश्वर, वृद्धावस्थारूपी चन्द्रोदय से से शुभ्र (सफेद और प्रकाशमय) शरीररूपी नगर में स्थित जीविताशारूप तालाब में मृत्युरूपी कुमुदिनी क्षणभर में विकास को प्राप्त होती है अर्थात् जैसे चन्द्रमा के उदित होने से प्रकाशमय नगर में स्थित तालाब में कुमुदिनी शीघ्र विकसित हो जाती है, वैसे ही वृद्धावस्था से सफेद हुए शरीर में स्थित जीविताशा में शीघ्र मृत्यु का आविर्भाव हो जाता है।।35।। वृद्धावस्थारूपी चूने के लेप से (पुताई से) शुभ्र शरीररूपी अन्तःपुर के (रनवास के) भीतर अशक्ति (सामर्थ्य का अभाव), पीड़ा और आपत्तिरूपी महिलाएँ बड़े चैन से रहती हैं।।36।। जिन जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्जरूप चार प्रकार के शरीरों में पहले वृद्धावस्था आक्रमण करती है और उसके आगे मृत्यु अवश्य आने वाली है, उन्हीं शरीरों में से एक इस शरीर में (उन शरीरों के सजातीय इस शरीर में) मुझ अतत्त्वज्ञ का क्या विश्वास हो सकता है? पहले वृद्धावस्था का तदन्तर मृत्यु का ग्रास होने वाले इस शरीर में मेरी तनिक भी आस्था नहीं है, यह भाव है।।37।। हे तात्, जो वृद्धावस्था को प्राप्त होकर भी बना रहता है, उस दुष्ट जीवन के दुराग्रह से (दुरभिलाषा से) क्या प्रयोजन है अर्थात् कुछ भी नहीं, वह व्यर्थ ही है क्योंकि वृद्धावस्था इस पृथिवी में मनुष्यों की सम्पूर्ण एषणाओं का तिरस्कार कर देती है। अर्थात् वृद्धावस्था के आने पर कोई भी पुरुष अपनी किसी इच्छा को पूर्ण नहीं कर सकता, इसलिए दुःखप्रद दुष्ट जीवन की दुराग्रहपूर्वक इच्छा करना निष्फल ही है, यह भाव है।।38।।


बाईसवाँ सर्ग समाप्त
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गुरुवार, 13 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 12



इक्कीसवाँ सर्ग
प्रत्यक्ष नरकसमूह सम्पूर्ण अंगोवाली तथा मनुष्यों के नरकपतन की हेतु स्त्रियों की निन्दा।

जिन स्त्री शरीरों में युवकों को रमणीयता की भ्रान्ति होती है, उनके स्वरूप को विवेचनपूर्वक दर्शाने के लिए इस सर्ग का आरम्भ करते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः मुनिवर, नस और हड्डियों के ग्रथन से शोभित मांसमयी स्त्री के रथ, गाड़ी आदि के समान चंचल शरीररूपी पिंजड़े में, जिसे युवक रमणीय-सा समझते हैं, वह कौन वस्तु है अर्थात् कुछ नहीं है।।1।।
उक्त अर्थ को ही विस्तार से विशद करते हुए युवकों को जिन नेत्रों में हावभावरूप विलास की भ्रान्ति होती है, विवेक के होने पर उन नेत्रों की असारता (निन्दनीयता) दिखलाते हैं।
हे प्रियजन, त्वचा, मांस, रक्त और अश्रुजल को अलग करके नेत्र को देखो, यदि वह रमणीय है तो उस पर आसक्ति करो। यदि रमणीय नहीं है, तो क्यों व्यर्थ ही उस पर मोहित होते हो, अर्थात नेत्र, त्वचा, मांस, रक्त और आँसू इनसे अतिरिक्त वस्तु नहीं है, इन्हीं के समुदाय का नाम नेत्र है, भला बतलाओ तो, त्वचा आदि में गर्हितता के सिवा रमणीयता क्या है ?।।2।। स्त्री का शरीर क्या है ? उसका कुछ अंश केश है, कुछ अंश रक्त है और कुछ अंश मांस आदि हैं, इन सबमें रम्यता कहाँ हैं ? ये सब नितान्त घृणास्पद और हेय हैं, इस कारण विवेकसम्पन्न प्राज्ञ पुरुष को स्त्री के शरीर से क्या काम है ? अर्थात् वह उसे निन्दनीय ही समझते हैं, रमणीयता का लेश भई उसमें नहीं देखते।।3।। हे बन्धुगण, बहुमूल्य वस्त्र और कस्तूरी, केसर आदि के लेप से (उबटन, तेल आदि के मर्दन से) जो सम्पूर्ण मनुष्यों के शरीर कभी बार-बार सुशोभित हुए थे, उन्हें समय पाकर गीध, सियार आदि मांसाहारी जीव नोच दबोच कर खाते हैं। यही उनका अंतिम परिणाम है।।4।। जिस स्तनमण्डल पर सुमेरू पर्वत के शिखर से बहने वाले गंगाजल के प्रवाह के सदृश मोतियों के हार की शोभा देखी गई थी और देखी जाती है, वही स्त्रीस्तन समय पाकर शीघ्र श्मशान-भूमि में एवं ग्राम और नगर से दूर निर्जन स्थानों में भात के छोटे पिण्ड के समान कुत्तों का ग्रास बनता है।।5,6।। जैसे वन में चरने वाले ऊँट या गदहे के अंग रक्त, मांस और हड्डियों द्वारा बने हैं, वैसे ही स्त्री के अंग भी उन्हीं उपकरणों द्वारा बने हैं, फिर उसी के लिए इतना आग्रह (आदर) क्यों ? अर्थात् गदहे का शरीर जिस सामग्री से बना है, स्त्री का शरीर भी तुच्छ और घृणित सामग्री से बना है, अतः वह भी उक्त जीवों के समान ही घृणित है।।7।। केवल अविचार से ही लोगों ने स्त्री में रमणीयता की कल्पना कर रक्खी है, परन्तु मेरे मत से स्त्रीशरीर में अविचारजनित रमणीयता भी नहीं है, क्योंकि स्त्री में जो रमणीयता की प्रतीति होती है, उसका कारण एकमात्र मोह है। सीप में जो चाँदी की कल्पना होती है, वहाँ पर सीपरूप अधिष्ठान और अज्ञान दोनों रहते हैं, किन्तु यहाँ पर अधिष्ठान का अभाव है, अतएव यह केवल अज्ञानजनित ही है।।8।। हे मुनीश्वर, मद से अनेक प्रकार का आनन्द देने वाली और पतन, दंगा, फसाद आदि विविध अनर्थ करानेवाली मदिरा में और काम से विविध आनन्द देने वाली और स्वयं काम विकार से युक्त स्त्री में क्या अन्तर है ? यह भाव है कि स्त्री काम द्वारा विविध प्रकार के उल्लासों को देती है, और स्वयं कामविकार से युक्त रहती है और मदिरा मादकशक्ति द्वारा विविध प्रकार के उल्लासों को देती है और स्वयं जव आदि के विकार से या स्खलन, कलह आदि विकार से युक्त है, इसलिए दोनों समान हैं, अर्थात् जैसे श्रेय चाहने वाले पुरुष के लिए मदिरा हेय है, वैसे ही स्त्री भी हेय है।।9।। मुनि जी, ललनारूपी आलान में (हाथी को बाँधने के स्तम्भ में) मदरूपी मोह से सोये जैसे मनुष्यरूपी हाथी परिपक्व (अंकुश के पक्ष में कठोर) शमरूपी अंकुश के प्रहारों से विवेक (हाथी के पक्ष में जागरण) को प्राप्त नहीं होते हैं। अर्थात् जैसे बन्धन-स्तम्भ में मद से सुप्तप्राय हाथी कठोर अंकुश के प्रहारों से नहीं जागता, वैसे ही स्त्री के समीप मोहवश सुप्तप्राय मनुष्य तीव्र शम, दम आदि से विवेक को प्राप्त नहीं होते।।10।। जैसे काजल को धारण करने वाली अग्नि की ज्वाला, दाहक होने के कारण छूने के अयोग्य है और नेत्रों को प्रिय लगने वाली अग्नि की ज्वाला तिनकों को जला डालती है, वैसे ही केश और काजल को धारण करने वाली, छूने के अयोग्य, नेत्रों को सुखदायक (मनोहर) पापरूपी अग्नि की ज्वालारूप स्त्रियाँ मनुष्य को जला डालती हैं।।11।। वासनाओं से पूर्ण होने के कारण आपाततः सरस मालूम पड़ने वाली लेकिन वास्तव में तो नीरस यहाँ स्थित स्त्रियाँ अतिदूरवर्तिनी यमपुरी में भीषण रूप से धधक रहीं नरकाग्नियों की उत्तम लकड़ियाँ हैं।।12।।
स्त्री लम्बी रात्रि के समान व्यर्थ है। जैसे रात्रि के चारों और व्याप्त अन्धकार ही केशों का जूड़ा है, चंचल तारे ही नेत्र हैं, पूर्ण चन्द्रबिम्ब ही मुख है, विकसित पुष्पराशि ही मन्द हास है, श्रृंगार आदि लीला से उसमें पुरुष चंचल रहते हैं, सोये रहने के कारण धर्म, विवेक, वैराग्य आदि का विनाश होता है और वह लोगों की बुद्धि को गाढ़ मोह में डालती है, वैसे ही स्त्री के भी चारों और बिखरे हुए अन्धकार के समान श्याम केशों को जूड़ा रहता है, चंचल कनीनिकाओं से युक्त नेत्र होते हैं, पूर्ण चन्द्रमा के समान आह्लादक होने से अपनी और आकृष्ट करने वाला मुख रहता है, पुष्पराशि के समान विशद हास रहता है, श्रृंगारादि की लीला से पुरुष उसमें विशेष रूप से आसक्त रहते हैं, वह धर्म विवेक, वैराग्य आदि कार्यों की विघातक है और बुद्धि को मोहित करने में तो वह बेजोड़ है, अतः सचमुच स्त्री लम्बी रात्रि के समान केवल आयु का नाश करती है, उससे किसी प्रयोजन की सिद्धि नहीं होती।।13,14।।
स्त्री केवल पुरुषार्थ का ही नाश नहीं करती, किन्तु अनर्थकारिणी भी है, ऐसा कहते हैं।
स्त्री विष की लता के समान युवावस्था से रसीली (लता के पक्ष में फूलों से मनोहर) हाथरूपी पत्तों से (कल्लों से) सुशोभित, भ्रमरूपी नेत्रों के हावभाव से पूर्ण, फूलों के गुच्छे रूपी स्तनों को धारण करने वाली फूलों के केसर के समान गौर वर्णवाली मनुष्यों की हत्या के सदृश अधःपतन में तत्पर और कामोन्माद से अपना सेवन करने वाले लोगों को मूर्छा, मरण आदि विवशता को प्राप्त कराती है। आशय यह है कि जैसे विष की लता फूलों से मनोहर लगती है, नये नये लाल पत्तों से सुशोभित रहती है, भँवरों से व्याप्त रहती है, फूलों के गुच्छों को धारण करती है, फूलों के केसर से पीतवर्ण हो जाती है, मनुष्यों को मार डालती है और जो लोग कामजनित उन्माद से उसका सेवन करते हैं उन्हें मूर्छा, मृत्यु के वश में कर देती है, वैसे ही स्त्री भी युवावस्था से रसीली, सुन्दर हाथों से सुशोभित, भँवर की भाँति चंचल नयनों के कटाक्ष आदि से सम्पन्न, गुच्छों के समान मनोज्ञ स्तनों को धारण करने वाली, फूलों के केसर के समान कांचनवर्णा, मनुष्यों के विनाश के लिए तत्पर है और स्वसेवियों को मूर्छा, मृत्यु आदि के वश में कर देती है। जैसे टुकड़े-टुकड़े करने की इच्छावाली रीछन (भालू की स्त्री) अपनी साँस से बिल में स्थित साँप को बिल से निकाल कर खा जाती है, वैसे ही लम्पट लोगों का धन और मन हरकर विनाश करने के लिए उत्कण्ठित स्त्री दिखावे के लिए किये गये मिथ्याभूत सत्कार द्वारा आश्वासन देकर मनुष्य को अपने वश में कर लेती है।।15-17।। हे मुनिश्रेष्ठ, कामरूपी व्याध ने मूढ़बुद्धि मनुष्यरूपी पक्षियों को फँसाने के लिए स्त्रीरूपी जाल रक्खे हैं, अर्थात् जैसे व्याध दाना चरने के लिये लालायित पक्षियों को फँसाने के लिए जाल बिछाते हैं, वैसे ही कामदेव ने मूढमति (सांसारिक असत् विषयों को सच समझने वाले) लोगों को फँसाने के लिए स्त्रियाँ, जाल की नाईं, इधर उधर बिखेर रक्खी हैं।।18।। स्त्रीरूपी विशाल आलान में (हाथी को बाँधने के खूँटे में) रतिरूपी (प्रेमरूपी) जंजीर से बँधा हुआ मन रूपी मदोन्मत हाथी गूँगे के समान चुपचाप बैठा रहता है, अर्थात् असमर्थ होने के कारण अपने छुटकारे के लिए किसी उपाय का अवलम्बन नहीं कर सकता।।19।। दुष्ट वासनारूपी रस्सी  से बँधी हुई स्त्री धनरूपी कीचड़ में विचरने वाले संसाररूपी छोटे तालाब के मछलीरूपी पुरुषों को फँसाने के लिए बंशी में (मछलियों का पकड़ने का काँटे में) लगी हुई आटे की गोली है। अर्थात् जैसे मछुवे की बंसी में लगी गोली कीचड़ में इधर उधर चलने वाली छोटे बरसाती तालाब की मछलियों को बन्धन में डालकर नष्ट कर देती है।।20।। जैसे घोड़ों के लिए अश्वशाला बन्धन है, हाथियों के लिए आलान बन्धन है और साँपों के लिए मंत्र बन्धन है, वैसे ही पुरुषों के लिए नारी बन्धन है।।21।। हे मुनिवर, विविध रसों से पूर्ण भोग की भूमि यह विचित्र पृथिवी स्त्रियों के ही सहारे दृढ़ स्थिति को प्राप्त हुई है, इस संसार की हेतु स्त्री ही है, यदि स्त्री न होती, तो संसार कभी का विलीन हो गया होता।।22।। दुःख रूपी जंजीर से युक्त सम्पूर्ण दोषरूपी रत्नों की पेटी (सन्दूक) रूप स्त्री से मुझे कुछ भी प्रयोजन नहीं है। स्त्री के मांसमय स्तन, नेत्र, नितम्ब (कमर का पिछला उभरा हुआ भाग) और भौंह में मैं क्या करूँ ? वे सब अतितुच्छ हैं, केवल मांस जैसी घृणित वस्तु से बने हैं।।24।। ब्रह्मन, स्त्री के किसी भाग में मांस की अधिकता है, किसी भाग में खून अधिक है और कहीं पर हड्डियाँ प्रचुर मात्रा है, ऐसे घृणित उपादानों से उसका निर्माण हुआ है, वह भी चिरकाल तक रहे सो बात नहीं है, किन्तु थोड़े ही दिनों में वह जीर्ण-शीर्ण हो जाती है। पूज्यवर जिन्हें अदूरदर्शी पुरुषों ने बड़े लाड़-प्यार से पाला-पोसा वे प्रियतमाएँ समय पाकर श्मशान में छिन्न भिन्न होकर सोती हैं, अर्थात् कहीं उनका सिर पड़ा है, तो कहीं हाथ पड़े हैं, कहीं पैर पड़े हैं और कहीं दूसरे अंग।।25,26।। ब्रह्मन्, प्रिया के जिस मुख में प्रियतम पति ने बड़े प्रेम से कपूर, कस्तूरी, गोरोचन, केसर, चन्दन आदि से भाँति-भाँति के तिलक आदि बनाये थे, वही मुख थोड़े दिनों में निर्जन वन में सूखता है।।27।। उनके सिर के बार राख से घूसर होने के कारण श्मशान के वृक्षों में चँवर जैसे मालूम पड़ते हैं और उनकी मांस और रक्त से शून्य सफेद हड्डियाँ पृथिवी में तारों के समान चमचमाती मालूम होती है।।28।। उनके शरीर के रक्त को धूलि सुखाती है और मांसाहारी जीव भी झुण्ड के झुण्ड उनपर टूटते हैं, उनके चाम को सियार नोच-नोचकर खाते हैं और उनका प्राणवायु आकाश में चला जाता है।।29।। हे संसारस्थित लोगों, स्त्री के अंगों का थोड़े ही काल में होने वाला यह परिणाम मैंने आप लोगों से कहा, उसमें आप लोग क्यों मोह रहे हैं ? ऐसे नाशवान स्त्री के शरीर की सुन्दरता और सत्यता का भ्रम निर्मूल है।।30।। स्त्री क्या है ? पांच भूतों के समुदाय से बना हुआ अंगों का संगठन ही स्त्री है। तनिक भी विवेक-बुद्धिवाला पुरुष राग का वशवर्ती होकर उस पर कैसे आसक्त हो सकता है, अर्थात् जो अज्ञानी है, वे भले ही उसे सत् या उपादेय समझें पर ज्ञानी उसको कैसे उपादेय समझेगा ?।।31।। जैसे शाखा-प्रशाखा से जटिल बहुत से कड़वे (कच्चे) और खट्टे (सूखे)  फलों से लदी हुई सुताला लता (एक प्रकार की जंगली लता) बड़ी ऊँचाई तक फैलती है, वैसे ही मनुष्यों की कान्तानुसारिणी (स्त्री के कारण होने वाली) चिन्ता अनेक खट्टे (कुछ सुख से मिश्रित ऐहिक दुःख फलों से पूर्ण होती हुई बहुत बड़े विस्तार को प्राप्त होती है। जैसे अपने यूथ से बिछुड़ा हुआ हाथी मोह को प्राप्त होता है। (किंकर्तव्य विमूढ़ हो जाता है), वैसे ही उक्त चिन्ता से व्याकुल अतएव उत्कट धनाभिलाषा से अन्ध कहाँ जाऊँ, कहाँ घन मिलेगा, यों चिन्ताग्रस्त होकर मनुष्य अत्यन्त मोह को प्राप्त होता है। जैसे हथिनी को चाहने वाला (हस्तिनी पर आसक्त) हाथी विन्ध्याचल के गड्ढे में (हाथियों को पकड़ने के लिए बनाये गये गड्ढे में) बाँधा जाता है, वैसे ही स्त्रीलम्पट पुरुष वध, बन्धनरूप बड़ी शोचनीय अवस्था को प्राप्त होता है।।32-34।। जिसकी स्त्री है, उसको भोग की इच्छा होती है, जिसकी स्त्री नहीं है, उसे भोग की संभावना ही कहाँ है, स्त्री का यदि त्याग कर दिया तो जगत का त्याग कर दिया, जगत का त्याग करके सुखी होवे।।35।। ब्रह्मन, आपाततः (विचार के बिना) भले प्रतीत होने वाले, भँवरे के पंखों की जड़ के समान चंचल और जिनसे मुक्त होना बड़ा कठिन है, ऐसे भोगों की, जन्म, मरण बुढ़ापा आदि के भय से, मुझे तनिक भी इच्छा नहीं है, मैं इनसे विरत होता हूँ और ऐसा प्रयत्न करूँगा जिससे कि मुझे परम पद प्राप्त हो जाये।।36।।

इक्कीसवाँ सर्ग समाप्त
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बुधवार, 12 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 11



बीसवाँ सर्ग


बाल्यावस्था अतिमूर्खता, असामर्थ्य और परतन्त्रता आदि से दुःखपूर्ण भले ही हो, पर यौवन अवस्था में ये बातें नहीं है, उसमें नानाभोग भोगने से उत्पन्न आनन्द ही आनन्द रहता है, इसलिए वह सुख की कारण है, ऐसी शंका करके यौवन की अत्यन्त अनर्थकारिता का वर्णन करने के लिए कहते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः मुनिवर, बाल्यावस्था के अनन्तर पुरुष बाल्यावस्था के अनर्थों को त्यागकर भोग भोगने के उत्साह से या आने वाले कामरूप पिशाच से दूषितचित्त होकर नरकपात के लिए ही यौवानरूढ़ होता है। मूर्ख पुरुष यौवनावस्था में अनन्त चेष्टावाले अतएव चंचल अपने चित्त की राग, द्वेष आदि वृत्तियों का अनुभव करता हुआ एक दुःख से दूसरे दुःख को प्राप्त होता है अर्थात् दुःख परम्परा का भोग करता है।।1,2।।
माण्डव्य ऋषि ने व्यवस्था कर रक्खी है कि चौदह वर्ष तक किये गये दुष्कर्मों से नरक प्राप्ति नहीं होती, इसलिए बाल्यावस्था से नरकपतन नहीं होता, लेकिन यौवनावस्था तो नरकपतन की ही हेतु है, यह भाव है। चित्तरूपी बिल में वास करने वाला तथा अनेक प्रकार के भ्रमों को पैदा करने वाला कामरूपी पिशाच विवश पुरुष के विवेक का तिरस्कार कर उसे अपने वश में कर लेता है।।3।। जैसे निधि आदि को देखने के लिए बालकों के हाथ में रक्खा हुआ सिद्धांजन चंचल वृत्तिवाली नेत्रप्रभाओं के अनावरण को – भूमि, शिला आदि के व्यवधान को हटाकर निधि देखने की सामर्थ्य देता है, वैसे ही यौवनावस्था में अवश चित्त युवतियों के चित्त से भी चंचल नाना प्रकार की चिन्ताओं के कपाट खोल देता है अर्थात् यौवनावस्था में पुरुष को विविध चिन्ताओं का सामना करना पड़ता है।।4।। मुनिवर, यौवनावस्था में स्त्री, जुआ, कलह आदि व्यसनों को उत्पन्न करने वाले राग, लोभ आदि दोष – काम, चिन्ता आदि के वशीभूत चित्तवाला होने से काममय और चिन्तामय पुरुष को नष्ट कर डालते हैं और वे दोष यौवन द्वारा ही प्राप्त होते हैं। महानरक की हेतुभूत और सदा भ्राँति पैदा करने वाली यौवनावस्था से जिन लोगों का विनाश नहीं हुआ, उनका दूसरा किसी से विनाश नहीं हो सकता। श्रृंगार आदि नौ रसों से और कटु, तिक्त आदि छः रसों से पूर्ण आश्चर्यजनक अनेक वृत्तान्तों से परिपूर्ण भीषण यौवनभूमिको जिसने पार कर लिया, वही पुरुष धीर कहा जाता है।।5-7।। क्षण भर के लिए दैदीप्यमान, चंचल मेघों के गर्जन से गूँज उठती, वैसे ही यौवनावस्था भी स्वल्पकाल के लिए उज्जवल है। घोर गर्जनाओं के समान अभिमानपूर्ण उक्तियों से युक्त अमंगलमय यह यौवन मुझे भला नहीं लगता। मुनिवर, भोग के समय मीठा अतएव बड़ा भला लगने वाला, अन्त में दुःखदायी होने के कारण नीम के समान कडुवा, दोषरूप, निन्दा के हेतुभूत सम्पूर्ण दोषों का भूषण (सब दोषों में श्रेष्ठ), शराब के नशे सदृश यौवन मुझे अच्छा नहीं लगता।।8,9।। यौवन है तो निरा असत्य पर सत्य – सा प्रतीत होता है, शीघ्र ही लोगों को अपनी वंचना का शिकार बना डालता है – धोखा दे देता है – और स्वप्न  दुष्ट स्त्री के समान है, इसलिए यौवन मुझे नहीं रूचता।।10।। यौवन एक क्षणभर के लिए सुन्दर प्रतीत होने वाली सम्पूर्ण वस्तुओं में, गन्धर्वनगर (♣) के सदृश, सर्वश्रेष्ठ है और सभी लोगों को क्षणमात्र के लिए अच्छा लगता है, इसलिए यह मुझे अच्छा नहीं लगता।।11।।
♣ जिसे गन्धर्वनगर दिखाई देता है उसकी मृत्यु हो जाती है। इससे गन्धर्वनगर का दर्शन मृत्यु का चिह्न है, यह सिद्ध है। इसलिए गन्धर्वनगर के पक्ष में 'सम्पूर्ण आयु के अन्त में' ऐसा अर्थ करना चाहिए।
प्रत्यंचा से छोड़ा गया बाण जितने समय  लक्ष्य का वेध करता है, केवल उतने समय तक सुखदायक, शेष सम्पूर्णकाल में दुःख देने वाला और नित्य सन्तापरूपी दोष देने वाला यौवन मुझे अच्छा नहीं लगता।।12।। यौवन केवल आपाततः जब तक विचार न किया जाय तभी तक रमणीय प्रतीत होता है, इसमें शुद्धचित्तता का सर्वथा अभाव रहता है। यह वेश्या स्त्री के समागम के समान नीरस है, इसलिए मुझे अच्छा नहीं लगता।।13।। जैसे प्रलय काल में सबको दुःख देने वाले बड़े-बड़े उत्पात चारों ओर से उमड़ पड़ते हैं वैसे ही युवावस्था में भी, सबको दुःख देने वाले जो कोई कार्य हैं, वे सब समीप में आ जाते हैं अर्थात् युवावस्था में परदुःखदायी अनेक दुष्कर्म होते हैं।।14।। हृदय में अन्धकार करने वाली यौवनयुक्त अज्ञान-रात्रि से विशाल आकारवाले भगवान महादेवजी भी निश्चय भयभीत रहते हैं, इसीलिए ही वे सदा विवेक ज्ञान-रूपी चन्द्रमा को धारण करते हैं। यदि नहीं डरते, तो क्यों धारण करते ? यह भाव है।।15।। यह यौवनकालीन मोह शुभ आचरण को भुलाने वाली एवं बुद्धि को कुण्ठित करने वाली (बुद्धिनाश करने वाली) भ्रान्ति की प्रचुरमात्रा में सृष्टि करता है।।16।। जैसे वनाग्नि से वृक्ष जलाया जाता है, वैसे ही युवावस्था में प्रियतमा के वियोग से उत्पन्न दुःसह शोकाग्नि से जीव जलाया जाता है।।17।। बुद्धि दोषों के निराकरण से कितनी ही निर्मल क्यों न हो, कितनी ही उदार क्यों न हो और गुणों के आधान से कितनी ही पवित्र क्यों न हो, पर जैसे वर्षा ऋतु में नदियाँ मलिन हो जाती हैं, वैसे ही यौवन में मलिन हो जाती है अर्थात् जैसे निर्मल पवित्र, शीतल और मधुर जलवाली नदी वर्षा ऋतु में मलिन हो जाती है, वैसे ही निर्मल, उदार और पवित्र बुद्धि भी युवावस्था में मलिन हो जाती है।।18।। बड़ी-बड़ी लहरों से युक्त भीषण नदी लाँघी जा सकती है, पर भोगतृष्णा से चंचल इन्द्रियोंवाली यौवन से अस्थिर चित्तवृत्ति वश में नहीं की जा सकती है।।19।। वह मनोहारिणी कान्ता, उसके वे विशाल स्तन, वे मनोज्ञ हावभाव और वह सुन्दर मुख युवावस्था में ऐसी-ऐसी अनेक चिन्ताओं से मनुष्य शिथिल हो जाता है।।20।। इस संसार में सज्जन लोग चंचल भोगतृष्णा से प्रपीड़ित युवा पुरुष का आदर सत्कार नहीं करते, केवल यही बात नहीं है, किन्तु वे कटे हुए और सूखे तिनके के समान उसका तिरस्कार करते हैं।।21।।
मनस्वियों के लिए मानहानि मरण के समान क्लेशकारक है, इस अभिप्राय से कहते हैं।
यौवन अभिमान से महाराज के समा जड़ और दोषरूप मोतियों को धारण करने वाले अविवेकी पुरुष के अधःपतन के लिए नित्य बन्धन का स्तम्भ है या वैसे ही यौवन भी अभिमान से मत्त और विविध दोषों से पूर्ण पुरुष का अधःपतन कर देता है। मुनिवर, खेद है कि मनुष्यों का यौवन वनस्वरूप है, प्रियतम स्त्री, पुत्र आदि इष्ट पदार्थों की अप्राप्ति और वियोग-जनित सन्ताप से पैदा हुआ शोष और रोदन उसके वृक्ष हैं, मन उक्त वृक्षों की बड़ी जड़ है और दोषरूपी साँप उन वृक्षों के खोखलों में निवास करते हैं।।22,23। मुनिवर, आप यौवन को दुष्ट चिन्तारूपी भ्रमरों का आवासभूत कमल समझिय। वह विषय सुखकणरूपी मधु-बिन्दुओं और रागादिरूपी केसरों से भरा हुआ है, और दुष्ट संकल्परूपी पंखुड़ियों से व्याप्त है। अर्थात् जैसे कमल के ऊपर भ्रमर मँडराते हैं, वह मकरन्द और केसर से खचाखच भरा रहता है और चारों ओर से पंखुड़ियों से घिरा रहता है, वैसे ही युवावस्था में मनुष्य के चित्त में अनेक दुष्ट चिन्ताएँ मँडराती हैं, बुरे संकल्प घेरे रहते हैं और विषयसुखकण और राग का साम्राज्य छाया रहता है।।24।। यौवन पुण्य और पाप रूपी या लौकिक कार्यरूपी, पतन के हेतु होने से, कुत्सित पंखवाले, हृदयरूपी तालाब के तीरपर विचरने वाले आधि-व्याधिरूपी पक्षियों का निवासस्थान है। नवयौवन असंख्य एवं वृद्धि को प्राप्त होने वाली तुच्छ संकल्प-विकल्परूप लहरों का अवधिरहित (असीम) या अन्त में जरा आदि दुःख देने वाला सागर हैं। अर्थात् जैसे असीम समुद्र असंख्य और क्रमशः वृद्धि को प्राप्त होने वाली जलमय तरंगों का एकमात्र आश्रय है, वैसे ही अन्त में जरा, मरण आदि दुःख का स्थान नवयौवन भी असंख्य और लगातार बढ़ने वाली संकल्प-विकल्प-परम्परा का एकमात्र आश्रय है। जैसी संकल्प-विकल्प-परम्पराएँ यौवनकाल में होती हैं, वैसी अन्यकाल में नहीं होती, यह आशय है। यौवन आँधी के समान है। जैसे धूलि से अन्धकारपूर्ण आँधी मकड़ी के सम्पूर्ण जालों को तहस-नहस करने में सिद्धहस्त होती है, वैसे ही रजोगुण और तमोगुण से पूर्ण विषम यौवन सत्संगति, शास्त्राभ्यास आदि अनेक प्रयत्नों से उत्पन्न होने वाले सदगुणों की (प्रसाद, प्रकाश, विवेकदृष्टि की अभिवृद्धि आदि की) स्थिरता को नष्ट करने में बड़ा दक्ष है। यौवन अतिरूक्ष पांसुओं के (आँधी में उड़ने वाले धूलकणों के) समान है। जैसे इधर-उधर उड़ रहे अपवित्र तृण-पत्तों से अधिक दुःखदायक अतिरूक्ष धूलिकण लोगों के मुँह को धूलि-धूसर कर देते हैं और आकाश में बहुत ऊँचे स्थान में चढ़ते हैं, वैसे ही विषयोन्मुख चंचल इन्द्रियों द्वारा अधिक कष्टदायक रूक्ष यौवन भी विषयवासना से उत्पन्न रोगों से लोगों के मुँह को घूसर (रक्तशून्य सफेद) कर देता है और दोषों की परम सीमा में आरूढ़ होता है।।25-28।। मनुष्यों का यौवनोल्लास (यौवन की अभिवृद्धि) दोषों को जगाता है, उत्पन्न करता है और गुणों का मूलोच्छेद करता है। अतएव वह पापों की वृद्धि करने के कारण पापों का विलास है।।29।। मुनिवर, मनुष्यों का नवयौवन चन्द्रमा के सदृश है। जैसे चन्द्रमा कमल के पराग में आसक्त भँवरी को कमल में बाँधकर मोहित कर देता है।।30।। शरीररूपी छोटे बन में उत्पन्न हुई बड़ी रमणीय यौवनरूपी मंजरी जब उत्कर्ष को प्राप्त होती है बढ़ती है तब अपने से संबद्ध मनरूपी भ्रमर को उन्मत्त कर डालती है। अर्थात् जैसे छोटी वाटिका या कुंज में उत्पन्न रमणीय फूलों का गुच्छा जब बढ़ता है, तब उसमें बैठे भँवरों को मोहित कर देता है।।31।। मुनिवर, शरीररूपी मरूभूमि में कामरूपी सूर्य के ताप से प्रतीत हो रही यौवनरूपी मृगतृष्णा के प्रति जल की इच्छा से दौड़ रहे मृग गड्ढे  गिर पड़ते हैं, वैसे ही शरीर में काम के सन्ताप से भासित यौवन के प्रति दौड़ रहा मन विषयों में फँस जाता है।।32।। शरीररूपी रात्रि की चाँदनी, मनरूपी सिंह की अयाल (गर्दन के बाल) और जीवनरूपी समुद्र की लहरी युवावस्था से मुझे सन्तोष नहीं होता।।33।। जो यह युवावस्था है, यह देहरूपी जंगल में कुछ दिनों के लिए फली-फूली शरद ऋतु है, यह शीघ्र ही क्षय को प्राप्त हो जायेगी। अतएव इस पर आप लोगों को विश्वास नहीं करना चाहिए। (भगवान श्रीरामचन्द्रजी का अपने अनुचरों के प्रति यह कथन है)।।34।।
उक्त अर्थ का ही छः श्लोकों से विशदरूप से वर्णन करते हैं।
जैसे अभागे पुरुष के हाथ से चिन्तामणि (अभीष्ट पदार्थ देने वाला रत्न) तत्काल चला जाता है, वैसे ही शरीर से युवावस्थारूपी पक्षी जल्दी भाग खड़ा होता है।।35।। जब यौवन अपनी चरम सीमा में आरूढ़ हो जाता है, तब केवल नाश के लिए ही सन्तापयुक्त कामनाएँ वृद्धि को प्राप्त होती है।।36।। तभी तक राग-द्वेषरूपी पिशाच विशेषरूप से इधर-उधर घूमते फिरते है, जब तक यह यौवनरूपी रात्रि सम्पूर्णतया नष्ट नहीं हो जाती। राग-द्वेष आदि सम्पूर्ण दोषों की जननी युवावस्था ही है, यह भाव है।।37।। जैसे विविध बालक्रीडाएँ करने वाले, क्षणभर में नष्ट होने वाले मरणासन्न पुत्र में लोगों की करूणा होती है, वैसे ही विविध चित्तविकारों (मनोरथों) से बढ़ी-चढ़ी, थोड़े समय तक रहकर नष्ट हो जाने वाली बेचारी युवावस्था पर भी करूणा करो। जो मनुष्य क्षणभर में विनष्ट होने वाले यौवन से मूढ़तावश फूला नहीं समाता, वह मनुष्य होता हुआ भी निरा पशु ही है, क्योंकि वह महामूढ़ है। जो मनुष्य अभिमान युक्त अज्ञान के कारण मदोन्मत्त युवावस्था को उपादेय (सारयुक्त) वस्तु समझकर उस पर आसक्त होता है उस दुर्बुद्धि को शीघ्र ही पश्चात्ताप भोगना पड़ता है।।38-40।। मुनिवर, इस जगत में वे लोग पूजनीय हैं, वे ही महात्मा हैं और वे ही पुरुष हैं, जिन्होंने अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य आदि की हानि के बिना सुखपूर्वक यौवनरूपी संकट को पार कर दिया। बड़े-बड़े मगरों से पूर्ण सागर सुखपूर्वक तैरा जा सकता है, परन्तु रागद्वेष आदि रूप महातरंगों के कारण उमड़ा हुआ और अनेक दोषों से युक्त निन्दनीय यौवन के पार जाना कठिन है।।41-42।।
बाल्यावस्था और वृद्धावस्था में अज्ञान और अशक्ति से पुरुषार्थ साधन नहीं हो सकता और युवावस्था विविध दोषों से परिपूर्ण होने के कारण पुरुषार्थ साधन के योग्य नहीं है, ऐसी परिस्थितियों में पुरुष को कभी भी साधनसम्पत्ति मे मोक्ष की आशा नहीं है, ऐसी आशंका कर सम्पूर्ण यौवनों की निन्दा नहीं की जाती, किन्तु दुर्योधन की ही निन्दा की जाती है। सुयौवन का तो पुरुषार्थ में ही पर्यवसान होता है, ऐसा लक्षण द्वारा दिखलाते हुए उसकी दुर्लभता को दिखलाते हैं।
ब्रह्मन विनय से अलंकृत, साधुओं के आश्रम के समान शांतिप्रद, करुणापूर्ण और शम, दम आदि विविध गुणों से युक्त यौवन इस संसार में इस मनुष्य जन्म में भी वैसे ही दुर्लभ है जैसे की आकाश में वन। अर्थात् आकाश में वन की स्थिति अतिदुर्लभ है, वैसे ही इस संसार में विनययुक्त, पूज्य मुनिजनों में रहने वाला, दया से परिपूर्ण और शम, दम आदि गुणों से परिवृत सुयौवन मनुष्यजन्म में भी अतिदुर्लभ है, फिर अन्य योनियों में तो कहना ही क्या है ?।।43।।

बीसवाँ सर्ग समाप्त
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