मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 10



उन्नीसवाँ सर्ग
अज्ञान, क्षुधा, पिपासा, रोग, अशौच और चपलता से दूषित जानवरों
की सी अवस्थावाली बाल्यावस्था की निन्दा।
देह की सभी अवस्थाएँ दुःखरूप नहीं है, क्योंकि उसकी बाल्यावस्था की सब लोग स्पृहा करते हैं, इससे प्रतीत होता है कि वह सुखमय है। 'तद्यथा महाराजो वा महाब्रह्मणो वा महाकुमारो वा अतिघ्नीमानन्दस्य गत्वा शयीत' यह श्रुति भी बाल्यावस्था में अतिशय आनन्द का प्रतिपादन करती है, ऐसी शंका करके विस्तारपूर्वक बाल्यावस्था की अनर्थकारिता का प्रतिपादन करने के लिए प्रतिज्ञा करते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः महर्षे, चंचल आकारावाले जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उदभिज्ज – इन चार शरीरों से पूर्ण और नाना प्रकार के कर्तव्यभाररूपी तरंगों से युक्त संसारसागर में मनुष्य जन्म पाकर भी बाल्यावस्था में केवल दुःख ही मिलता है। पहले मनुष्यजन्म ही दुर्लभ है, वह किसी प्रकार पुण्य परिपाक से यदि प्राप्त भी हो गया, तो उसमें बाल्यावस्था अतिक्लेशकारक है।।1।।
जिसकी पहले प्रतिज्ञा की थी, उसी अर्थ का विस्तार से वर्णन करते हैं।
अशक्ति (असामर्थ्य), आपत्तियाँ, खाने-पीने आदि की तृष्णा, मूकता, (बोल न सकना), मूढ़बुद्धिता (जान न सकना), क्रीडा, कौतुक आदि के विषय में अभिलाषा करना, न मिलने पर दीन-हीन बन जाना और चंचलता – ये सब बाल्यावस्था में ही होते हैं।।2।। हाथियों के बन्धन-स्तम्भ के समान बाल्यावस्था अकारण क्रोध और रोदन से भीषण और दीनता से जर्जरित दशाओं में बन्धन है अर्थात जैसे अकारण क्रोध, रोदन आदि से भीषण और दीनता से जर्जरित अवस्थाओं में हाथी का बन्धनस्तम्भ (आलान) बन्धन होता है, वैसे ही अकारण क्रोध, रोदन आदि से भीषण और दैन्य से जर्जरित अवस्थाओं में प्राणियों का बाल्यकाल भी बन्धन ही है।।3।। जैसी पराधीनताप्रयुक्त चिन्ताएँ बाल्यावस्था में जीव के हृदय को पीड़ित करती हैं, वैसी मरण में, बुढ़ापे में, रोगावस्था में, आपत्ति में एवं यौवनावस्था में नहीं करती।।4।। बाल्यावस्था में पशुपक्षियों की-सी चेष्टाएँ होती हैं, सभी लोग बालकों की भर्त्सना करते हैं, सचमुच चंचल बाल्यावस्था मरण से भी बढ़कर दुःखदायिनी है।।5।। सामने स्थित प्रतिबिम्ब के समान बाल्यावस्था में स्फुट और निबिड़ अज्ञान रहता है अथवा प्रत्येक क्षण में चित्त में तत् सत् विषयों का प्रतिबिम्ब पड़ने से अनेक प्रकार की भ्रान्तियाँ होती हैं, अतएव यह नाना प्रकार के संकल्पों से तुच्छ है। तत्-तत् संकल्पित विषयों के न मिलने से बाल्यावस्था में मन चारों ओर से कटा हुआ-सा और जीर्णशीर्ण-सा दुःखित रहता है, भला ऐसी बाल्यावस्था किसको सुखप्रद होगी ?।।6।। बाल्यावस्था में अज्ञानवश जल, अग्नि और वायु से सदा उत्पन्न होने वाले भय से पद-पद में जैसा दुःख होता है, वैसा आपत्ति में भी किसी को न होगा अर्थात् बाल्यावस्था में आपत्ति से भी बढ़कर दुःख होता है।।7।। बालक बाल्यावस्था में निरन्तर विविध दुश्चेष्टाओं में-दुर्लीलाओं में, दुराशाओं में, दुरभिसन्धानों में और दुर्विलासों में सहसा पड़कर ये सार वस्तुएँ हैं, ऐसे महाभ्रम को प्राप्त होता है।।8।। बाल्यावस्था में बालक तुच्छ कार्य को भी नन्हें बच्चे या निपट पागल के कहने-मात्र से बड़ा महत्त्व दे डालते हैं, अनेक दुष्चेष्टाएँ करते हैं और किसी प्रकार की भी प्रतिष्ठा को प्राप्त नहीं होते, इसलिए पुरुष की बाल्यावस्था, गुरु द्वारा किये ताड़न आदि से उत्पन्न दुःख भोगने के लिए ही है, सुख के लिए नहीं है। अर्थात् निष्फल कार्यप्रवृत्ति और सम्पूर्ण दुष्कर्मों का आवासरूप बाल्यकाल किसी प्रकार की भी शान्ति प्रदान नहीं करता, उक्त काल में प्रायः प्रतिक्षण गुरुजनों के समीप दण्डित होकर दुःखित होना पड़ता है और किसी प्रकार की भी प्रशंसा प्राप्त नहीं होती।।9।। जैसे उल्लू दिन में अन्धकारमय गड्ढों में छिपे रहते हैं, वैसे ही जितने दोष, जितने दुराचार, जितने दुष्कर्म और जितनी मानसिक चिन्ताएँ हैं, वे सब बाल्यावस्था में जीव के हृदय में छिपकर बैठे रहते हैं।।10।। ब्रह्मन्, बाल्यावस्था रमणीय (सुखमय) है, ऐसी जो लोग कल्पना करते हैं, वे सब दुर्बुद्धि हैं, उन हतचित्त मूढ़बुद्धि लोगों को बार-बार धिक्कार है।।11।। जिसमें हिंडोले के समान चंचल मन विविध विषयों के आकार को प्राप्त होता है, तीनों लोकों में अत्यन्त अमंगल वह बाल्यावस्था किस प्रकार सुखकर हो सकती है ? मुनिवर, सम्पूर्ण प्राणियों की सभी अवस्थाओं की अपेक्षा बाल्यावास्था में मन दस गुना चंचल होता है। मन की चंचलता का अधिक होना दुःख का हेतु है अर्थात जितना ही मन चंचल होगा, उतना ही अधिक कष्ट होगा, यह भाव है।।12,13।। मन स्वभावतः चंचल है ही बाल्यावस्था सम्पूर्ण चंचल पदार्थों में सर्वश्रेष्ठ है। उन दोनों का सम्बन्ध होने पर चंचलता प्रयुक्त अनर्थ से बचाने वाला कौन है ? अर्थात् कोई नहीं है। ब्रह्मन्, बाल्यावस्था से आक्रान्त चित्त से युवतियों के लोचनों ने, बिजली ने, अग्नि की ज्वालाओं ने और तरंगों ने चंचलता सीखी है अर्थात् मन सम्पूर्ण चंचल पदार्थों में सर्वश्रेष्ठ है। सभी व्यवहारों में बाल्यावस्था और मन – ये दोनों सदा सहोदर भाई-से प्रतीत होते हैं, ये दोनों चंचल हैं – दोनों की स्थिति क्षणिक है। दुःखपूर्ण सम्पूर्ण दुर्व्यसन, सम्पूर्ण दोष और सम्पूर्ण मानसिक चिन्ताएँ बाल्यावस्था में ही निवास करती हैं, जैसे कि मनुष्य धनवान पुरुष के आश्रय में रहते हैं।।14-17।। यदि बालक को प्रतिदिन मन को प्रसन्न करने वाली नई-नई वस्तुएँ न मिले, तो वह विष के समान असह्य चित्तविकृति से मूर्च्छा को प्राप्त हो जाता है। बालक कुत्ते के समान थोड़े से खाने पीन की वस्तु देने आदि से वश में आ जाता है, थोड़े से घुड़कने आदि विकृत हो जाता है और अपवित्र में (विष्ठा आदि में) क्रीड़ा करता है अर्थात् जैसे कुत्ता थोड़ा-सा खाना देने या पुचकारने से वश में हो जाता है, थोड़ा सा घुड़काने या छड़ी आदि दिखाने से बिगड़ जाता है और विष्ठा आदि से अपिवत्र स्थानों में खेलता है, ठीक वैसे ही बालक भी है।।18,19।। जैसे वर्षा से भीगी हुई और धूप से तपी हुई भूमि के ऊपर सदा भाप निकलती है, इधर उधर कीचड़ व्याप्त होता है और भीतर जल रहता है, वैसे ही बालक भी सदा आँसुओं से युक्त मुखवाला, कीचड़ से सना एवं मूढ़बुद्धि और अचेतन रहता है।।20।। मनुष्य सदा दूसरों से डरने और भोजन करने वाले, दीन-हीन, दुष्ट और अदृष्ट सब वस्तुओं की इच्छा करने वाले एवं चंचल बुद्धि और शरीर से युक्त बाल्याकाल को केवल दुःख भोग के लिए धारण करता है। विवश बालक जब अपने संकल्प से इच्छित पदार्थों को नहीं पाता, तब अत्यन्त सन्तप्त होकर ऐसे दुःख को प्राप्त होता है कि मानों किसी ने उसके हृदय को काट डाला हो।।21,22।। मुनिवर, बालक को दुष्ट चेष्टाओं या दुष्ट मनोरथों से उत्पन्न और भाँति भाँति के वंचना के उपायों से भीषण जो दुःख होते हैं, वे दूसरे किसी को नहीं होते।।23।।
बाल्यवास्था से बढ़कर दुःख और किसी अवस्था या योनि में नहीं होते, यह आशय है।
जैसे प्रखर ग्रीष्म ऋतु से वनभूमि सन्ताप को प्राप्त होता है। बालक जब विद्यालय में पढ़ने में जाता है, तब उसे बन्धनस्तम्भ में बँधे हे हाथी के समान पराधीनता, बेंतों की मार आदि और भी बड़े बड़े भीषण कष्ट झेलने पड़ते हैं। बाल्यावस्था में असत्य पदार्थों में ही सत्यत्यबुद्धि होती है, अनेक प्रकार के मनोरथों का साम्राज्य छाया रहता है और हृदय बड़ा कोमल रहता है, अतएव बाल्यावस्था में अत्यन्त दीर्घ दुःख के सिवा सुख का लेश भी नहीं होता।।24-26।। किसी समय जब बालक भूख लगने से रोता है, तब तुम्हें खाने के लिए भुवन (लोक) दूँगी, यों माता या पिता के कहने पर सन्तुष्ट होकर वह भुवन को ही खाने की इच्छा करता है। तुम्हें चन्द्रमारूपी खिलौना देंगे, यों ठगने पर आकाश से चन्द्रमा को हाथ में लेने की इच्छा करता है, ऐसी मूर्खता से पूर्ण बाल्यावास्था कैसे सुखकर हो सकती है ?।।27।।
हे महामते ! बालक के मन में शीत और ताप का अनुभव तो होता है, पर वह उनका निवारण नहीं कर सकता, इसलिए बालक और वृक्ष में क्या भेद है अर्थात् बालक वृक्ष के समान जड़ है।।28।। बालक सचमुच पक्षियों से सदृश हैं, जैसे भूखे पक्षी आकाश में बहुत ऊँचा उड़ने की इच्छा करते है, वैसे ही भूखा बालक भी आहार लेने के लिए हाथों के सहारे उठने की इच्छा करते हैं, पर सामर्थ्य न होने से उठ नहीं सकते। जैसे पक्षियों को दूसरे से भय और आहार की चिन्ता प्रधानरूप से रहती है, वैसे बालक भी भय और भोजन में तत्पर रहते हैं।।29।। बाल्यावस्था में गुरुओं से, माता-पिता से, अन्याय जनों से एवं अपने से बड़े बालक से भय बना रहता है, इसलिए बाल्यावस्था को यदि भय का कहा जाय, तो कोई अत्युक्ति न होगी।।30।। महामुने, सम्पूर्ण दोषपूर्ण दशाओं से दूषित किसी की रोकटोक के बिना स्वच्छन्द विहार करने वाले अविवेक का घर बाल्यकाल किसी के भी सन्तोष के लिए नहीं हो सकता।।31।।

उन्नीसवाँ सर्ग समाप्त
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सोमवार, 10 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 9




अठारहवाँ सर्ग
आधि, व्याधि आदि अनेक क्लेशों तथा जरा मृत्यु से ग्रस्त अभिमान और
तृष्णा के मूलकारण शरीर की निन्दा।

श्लोक ३५ से आगे ............


हे मुनीश्वर, जैसे कोई निर्बल जीव कीचड़ में फँसे हुए हाथी को नहीं निकाल सकता, वैसे ही मैं भी इस देहरूपी गृह को धारण करने में असमर्थ हूँ।।36।। क्या राज्यलक्ष्मी, क्या शरीर और क्या राज्य, क्या मनोरथ – इनमें से किसी से भी मेरा कुछ प्रयोजन नहीं है, क्योंकि थोड़े ही दिनों में काल उन सबका नाश कर डालता है अर्थात् नाशवान वस्तु से किसका क्या लाभ हो सकता है ?।।37।। मुनिवर, रक्त और मांस से विरचित विनाशशील इस देह के बाहर और भीतर भली भाँति देखकर कहिए कि इसमें कौन सी रमणीयता है ?।।38।। पूज्यवर, भला आप ही कहिये जो शरीर मरने के समय जीव के पीछे नहीं जाते जीव का त्याग कर देते हैं, उन कृतघ्न शरीरों पर ज्ञानवान पुरुषों का क्या आदर हो सकता है ? मदोन्मत्त हाथी के कानों के अग्रभाग की तरह चंचल और हाथी के कान के अग्रभाग में लटक रहे जलबिन्दु के समान विनाशशील यह शरीर मुझे छोड़े, उससे पहले ही मैं इसका त्याग कर देता हूँ। वायु के वेग से परिचालित कोमल पत्ते के समान चंचल यह शरीर आधि-व्याधिरूपी सैंकड़ों काँटों से क्षत विक्षत होने के कारण जर्जर हो जाता है। इस क्षुद्र स्वभाव, कटु और नीरस देह से हमारा किंचितमात्र भी उपकार नहीं है। चिरकाल तक भाँति-भाँति के सुन्दर खाद्य और पेय पदार्थों को खा-पीकर नवीन पत्ते के समान कोमल कृशता को प्राप्त होकर स्वतः विनाश की ओर अग्रसर होता है। यह पामर शरीर पूर्व जन्मों में बार बार उपयुक्त ही भाव और अभावरूप सुख-दुःखों का पुनः पुनः अनुभव करता हुआ लज्जित नहीं होता। जब यह दीर्घकालतक लोगों पर अपना आधिपत्य जमाकर और विविध विभवों को पाकर न तो वृद्धि या उत्कर्ष को प्राप्त होता है और न स्थिरता को प्राप्त होता है, तब इसके परिपालन या परीक्षण से क्या लाभ ? यह शरीर बुढ़ापे के समय में बुढ़ापे को अवश्य प्राप्त होता है और मरने के समय मृत्यु को अवश्य प्राप्त होता है, यह नियम भाग्यवान् और दरिद्र दोनों के लिए समान है, उसमें किसी प्रकार का भेद नहीं है, किन्तु यह बात इस अधम देह को ज्ञात नहीं है। यह शरीर मूक कच्छप के (कच्छपों द्वारा दुष्ट इन्द्रियों द्वारा दुर्विषयरूपी कीचड़ का पान करने वाले कछुए के) समान संसाररूप समुद्र के उदर में तृष्णारूपी छोटे बिल के अन्दर रहता है। अपनी आत्मा के उद्धार के अनुकूल इच्छा और चेष्टा भी इसमें नहीं है और गुरु के समीप में जाकर आत्मा के विषय में प्रश्न आदिरूप वाणी भी इसमें नहीं है। इस संसाररूपी महासागर में केवल जलना ही जिनका मुख्य प्रयोजन है, ऐसे हजारों देहरूपी काष्ठ भासित होते हैं, पर धीमान् जन उनमें से किसी को ही 'नर' कहते हैं, अर्थात् जो ज्ञानाग्नि के द्वारा जलाया जा सकता है, वह देह ही नरदेह है।।39-47।। दुष्टतारूपी बड़े बड़े बन्धनों युक्त और दुश्चरितों से जिसका पतन अवश्यम्भावी है, ऐसी देहरूपी लता से विवेकी पुरुष को कुछ भी काम नहीं है।।48।। यह शरीर कीचड़ से भरे पल्लवों में (तलैयों में) निमग्न मेंढक के समान विषय-भोग में अत्यन्त निमग्न होकर वृद्धावस्था से आक्रान्त हो जाता है, किन्तु यह शीघ्र ही कहाँ जाएगा और किस प्रकार की दुर्दशाओं से ग्रस्त होगा, यह ज्ञात नहीं होता।।49।। जैसे धूलिपटलयुक्त आकाशमार्ग से जा रही आँधी को कोई देख नहीं सकता, क्योंकि धूलि के कारण नेत्र बन्द हो जाते हैं, कुछ भी दिखाई नहीं देता, इस देहसमुदाय की चेष्टाएँ भी ठीक आँधी के ही अनुरूप हैं अर्थात् इसकी सब चेष्टाएँ नीरस (अनर्थकारिणी), और दर्शनशक्ति का नाश करने वाली हैं। यह शरीर ही आँधीरूपी चपलता का मूल है, यही राजसी प्रवृत्ति का उत्पादन कर आत्मदर्शन में बाधक होता है।।50।। वायु की, दीपक की और मन की गति-उत्पत्ति और विनाश-जैसे अज्ञात है वैसे ही इस शरीर की उत्पत्ति, विनाश आदि अज्ञात हैं। यह क्या है, किस प्रकार से और कहाँ से आता है और कहाँ जाता है, इस बात को कोई नहीं जानता।।51।। जो लोग अनित्य शरीरों में नित्यत्व का आदर करते हैं और जो लोग संसार स्थिति के विषय में नित्यत्व का अभिमान करते हैं अर्थात् जो लोग शरीरों को तथा संसार को आशायुक्त, चिरस्थायी और सत्य मानते हैं वे मोह (अज्ञान) रूपी मदिरा से उन्मत्त है, उन्हें बार-बार धिक्कार है।।52।।
न मैं देह का सम्बन्धी हूँ, न मैं देह हूँ, न मेरी देह है और न मैं ही देह हूँ, ऐसा विचारकर अर्थात् इदंता से विशिष्ट घट आदि के समान जड़ देह यह मैं नहीं हूँ, ऐसा विचार कर परमात्मा में जिनका चित्त विश्रान्त है, वे लोग ही पुरुषोत्तम हैं।।53।। मान और अपमान से वृद्धि को प्राप्त हुई एवं प्रचुर लाभ से सुन्दर लगने वाली दुष्ट दृष्टियाँ केवल शरीर में ही परमादर करने वाले पुरुष को मृत्यु के वशीभूत कर देती है। शरीररूपी गड्ढे में रहने वाली मनोहर भोगतृष्णारूपिणी पिशाचीने कपट से हमें संसार में पटककर हमारा सर्वस्व हर लिया-हमें ठग लिया है।।54,55।। शरीर को ही सब कुछ समझने वाली इस मिथ्याज्ञानरूपिणी राक्षसी ने अकेली अतएव दीन-हीन प्रज्ञा (सुबुद्धि) को पूर्णरूप से ठग लिया, यह बड़े कष्ट की बात है।।56।। जब इस दृश्य प्रपंच में कोई भी वस्तु सत्य नहीं है, तब उसके मध्यवर्ती होने से यह शरीर भी सत्य नहीं है। अपने आप जले हुए (असत्य) शरीर से जनता ठगी जाती है, यह महान आश्चर्य है।।57।।
यदि जनता को ठगने से इस शरीर को कोई प्रयोजन सिद्ध होता, तो किसी अंश में वह क्षन्तव्य भी होता, पर वह भी कुछ नहीं है, ऐसा कहते हैं।
कुछ ही दिनों में वृद्धता को प्राप्त हुआ यह शरीररूपी पत्ते झरने के जलकणों (सीकरों) के समान अपने आप गिर पड़ता है – मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।।58।। समुद्र में उत्पन्न हुए जल के बुदबुदों की नाईं इस शरीर का विनाश बहुत शीघ्र हो जाता है, यह संसार में परिभ्रमणरूपी जलभँवर में व्यर्थ ही प्रकाश को प्राप्त होता है। न तो संसार में परिभ्रमण से इसका कोई प्रयोजन सिद्ध होता है और न इससे किसी दूसरे का ही प्रयोजन सिद्ध होता है।।59।। मुनिश्रेष्ठ, यह शरीर मिथ्याभूत अज्ञान का विकार है – अज्ञानजनित है, स्वप्नरूपी भ्रान्तियों का आधार है और इसका विनाश सर्वथा स्पष्ट है, इसलिए इस शरीर के प्रति मेरा क्षणभर के लिए आदर भी नहीं है।।60।। जिस पुरुष ने बिजली में, शरत् ऋतु के मेघों में और गंधर्वनगर में ये चिरस्थायी हैं, ऐसा निर्णय कर रक्खा है, वह इस क्षणभंगुर शरीर को भले ही चिरस्थायी माने।।61।. किसका शीघ्र विनाश होता है, इस विषय में अपना अपना उत्कर्ष जताने के लिए हठ से प्रवृत्त हुए सम्पूर्ण पदार्थों में से सदा विनाशशील कार्यों में विजयी होने वाले बिजली, शरत् ऋतु के मेघ आदि से भी, नाशक सामग्री के अधिक होने से, उत्कृष्ट इस शरीर को तृण से भी तुच्छ समझकर मैं परम सुखी हुआ हूँ।।62।।


अठारहवाँ सर्ग समाप्त
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रविवार, 9 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 8



अठारहवाँ सर्ग
आधि, व्याधि आदि अनेक क्लेशों तथा जरा मृत्यु से ग्रस्त अभिमान और
तृष्णा के मूलकारण शरीर की निन्दा।
तृष्णा भले ही दुःख की कारण हो, पर 'जीवन्नरो भद्रपशतानि पश्येत्' (जीवित पुरुष अनेक मंगलों को देखता है) इस न्याय से भी शरीर सुख-भोग का स्थान है, ऐसी प्रसिद्धि है और शरीर पर सबका अतिशय प्रेम भी देखा जाता है, इसलिए शरीर सुख का कारण है, ऐसी शंका करके शरीर भी दुःख का ही कारण है ऐसा उपादान करते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः महर्षि जी, गीली आँतों (पेट में स्थित मल, मूत्र आदि की थैलियों) और नाड़ियों से व्याप्त परिणामशील और मरणधर्म जो शरीर संसार में सबके सामने प्रकाशित हो रहा है, वह भी केवल दुःखभोग के लिए ही है। अर्थात् मल, मूत्र, शुक्र और शोणित से आर्द्र नाड़ियों से परिव्याप्त, विविध प्रकार के विकारों से युक्त और पतनशील यह जीवदेह केवल दुःखभोग के लिए प्रकाशित हो रही है।।1।। युक्तिमार्ग का अवलम्बन करने पर स्पष्टरूप से ज्ञात होता है कि यह जीव शरीर दो रूप वाला है। प्राण आदि चार कोशों का आधार होने के कारण जिसमें आत्मचमत्कृति (अध्यस्त-चैतन्यतादात्म्य) लिपटी सी है, ऐसा यह शरीर अज्ञ होने पर भी अभिज्ञ के समान और अभव्य होने पर भी भव्य के समान प्रतीत होता है। यह न तो जड़ है और न चेतन ही है।(⌂)।।2।।
⌂ इस चित्त-जड़संयुक्त देह का देहभाग अज्ञ है अर्थात् जड़ है। आत्मा इसका ज्ञाता है और वह अभिज्ञ है। अभिज्ञ के संयोग से यह जड़ देह अभिज्ञ के समान प्रतीत होता है। इसके ही अवलम्बन से मुक्ति प्रदान होती है, इसलिए यह अभव्य-अमंगल-होने पर भी भव्य है। इसी कारण यह अन्यान्य जड़ों से विलक्षण एवं शुद्ध चेतनरूप आत्मा भी नहीं है।
चित् और जड़ दृष्टियों के मध्य में क्या यह शरीर आत्मकोटि में है (चेतन है) या अनात्मकोटि में है (जड़ है) ऐसा सन्देह होने पर निर्णय न होने से दुष्ट चित्त से युक्त एवं विवेक रहित होने से ही विमूढ़ आत्मावाला यह शरीर मोह ही पैदा करता है। अथवा 'प्रपश्यति' ऐसा पाठ होने पर अज्ञानी और विवेकी में से अज्ञानी इस देह में आत्मबुद्धि करने के कारण संसार को ही देखता है, पुरुषार्थ को नहीं देख पाता, क्योंकि वह चंचल एवं अशुद्ध चित्तवाला है।।3।। यह शरीर अल्प खाने-पीने से आनन्द को प्राप्त होता है और अल्प शीत-उष्ण आदि के क्लेश को प्राप्त होता है, इसलिए शरीर के समान गुणहीन, शोचनीय (शोक करने योग्य) और अधम दूसरा कोई नहीं है।।4।।
यह शरीर उपेक्षणीय है, यह दर्शाने के लिए वृक्ष के रूपक से उसका वर्णन करते हैं।
यह शरीर वृक्ष के तुल्य है। दो भुजाएँ इसकी शाखाएँ हैं उन्नत कन्धा इसका तना है, दो नेत्र इसके खोखले हैं, मस्तक इसका बड़ा भारी फल है, यह दाँतरूपी पक्षियों के बैठने के स्तम्भ के समान उत्तम रीति से खड़ा है, यह दो कर्णरूपी कठफोड़ा पक्षियों की चोंच के आघात से जर्जरित (छिद्रयुक्त-सा) रीति से खड़ा है, हाथ और पैर इसके सुन्दर पत्ते हैं, रोग आदि इसमें लता स्थानीय हैं। जैसे कुल्हाड़े आदि से वृक्ष काटा जाता है, वैसे ही शस्त्र आदि से इस शरीर का भी उच्छेद, किया जा सकता है, 'द्वा सुपर्णा' इस श्रुति में प्रसिद्ध (जीव और ईश्वररूप) पक्षियों ने जिसके हृदय में अपने निवास के लिए घोंसला बना रक्खा है, यह उत्पन्न और विनष्ट होने वाले दाँतरूपी केसर से शोभित हासरूप पुष्पों से हर घड़ी अलंकृत रहता है अर्थात् जैसे वसन्त आदि फूल की ऋतु आने पर वृक्ष उत्पन्न हो हो कर मुरझाने वाले एवं केसरर से शोभित होने वाले फूलों से अलंकृत होता है, वैसे ही यह शरीर भी हर्ष के समय में उत्पन्न होकर नष्ट होने वाले एवं दाँतरूपी केसरों से सुशोभित होने वाले मन्दहास से शोभित होता है। सुन्दर कान्तिरूपी छायावाला यह देहरूपी वृक्ष जीवरूपी यात्रियों का विश्राम-स्थान है। यह किसका आत्मीय (मित्र) और किसका शत्रु है ? इस देहरूपी वृक्ष में प्रेम और द्वेष करना व्यर्थ है अर्थात् देह के साथ जीव का कोई भी वास्वतविक सम्बन्ध नहीं है, इसलिए यह किसी का आत्मीय नहीं है, अतः इसके प्रति आस्था और अनास्था ही क्या ?।।5-8।।
यह शरीर सब लोगों में आत्मरूप से प्रसिद्ध है, इसको उपेक्षणीय कैसे कहते हैं ? ऐसी शंका होने पर कहते हैं।
पूज्यवर, संसार-सागर को पार करने के लिए पुनः पुनः गृहीत नौकारूपी देह में किसकी आत्मबुद्धि होगी ? अर्थात् जैसे सागर को पार करने के लिए गृहीत नौका में किसी की आत्मसंभावना का संभव नहीं है, वैसे ही संसार को पार करने के लिए अर्थात् संसार से मुक्त होने के लिए बार बार गृहीत देह में किसकी आत्मभावना हो सकती है ?।।9।। रोमरूपी असंख्य वृक्ष और इन्द्रियरूपी अनेक गड्ढों से युक्त देहनामक निर्जन वन में कौन पुरुष विश्वास को (यह चिरकाल तक निःशंक होकर रहने योग्य है, ऐसी प्रतीति को) प्राप्त होगा ?।।10।। पूज्य मुनि जी, साररहित तथा छिद्रयुक्त, मांस, नसें (स्नायु) और हड्डियों से वेष्टित और बाहर निकलने (मुक्त होने) के उपायभूत उपदेश (शब्द) से विरहित इस शरीररूपी नगाड़े में मैं बिल्ली की तरह रहता हूँ।।11।।
छः श्लोकों से देह का पाकड़ के वृक्ष के रूपक से निरूपण करते हैं।
शरीररूपी पाकड़ का वृक्ष मुझे सुखकारक प्रतीत नहीं होता। यह संसाररूपी अरण्य में पैदा हुआ है, चित्त चपल बन्दर इसमें इधर उधर कुदता फाँदता है, चिन्तारूपी मंजरी से यह फूला हुआ है, महादुःखरूपी घुनों ने इसके चारों ओर छेद कर रक्खे हैं, तृष्णारूपी सर्पिणी का यह घर है, कोपरूपी कौए ने इसमें घोंसला बना रक्खा है, मन्द हासरूप प्रस्फुटित पुष्पों से यह शोभायमान है, शुभ और अशुभ (पुण्य और पाप) ये दो इसके महाफल हैं, भुजाएँ ही इसमें लताएँ हैं, हाथ ही पुष्पों के गुच्छे हैं, यह बड़ा भला लगता है, प्राणवायुरूप वायु से इसके सम्पूर्ण अवयवरूपी पत्ते हिल रहे हैं, सम्पूर्ण इन्द्रियरूपी चिड़ियाँ इसमें बसेरा करती हैं, सुन्दर घुटनों से युक्त अधोभाग इसका तना है, यह उन्नत है और यौवनकान्तिरूपी शीतल छाया से युक्त है। कामदेवरूपी यात्री इस पर बास करता है, सिर में उगे हुए खूब लम्बे सिर के केश उसके बरोह हैं। अहंकाररूपी गीध इसमें घोंसला बनाकर डटा है, यह भीतर से खोखला (छिद्रयुक्त) है। विविध वासनारूपी जटाओं से चारों ओर वेष्टित होने के कारण दुश्छेद्य है, व्यायामरूपी विस्तार से कोमलतारहित और रूक्ष भी है।।12-17।।
महामुने, अहंकाररूपी गृहस्थ का महान् गृह यह कलेव चाहे भूमि में गिरकर बदल जाय, चाहे चिरकाल तक स्थिर रहे, इससे मेरा क्या प्रयोजन ?।।18।। इस देहरूपी अहंकार के घर में इन्द्रियरूपी पशु कतार बाँधकर खड़े हैं, तृष्णारूपी गृहस्वामिनी (घर की मालकिन) बार बार इधर उधर घूम रही है, कामदेवरूपी गेरू आदि रंगने के पदार्थों से सब अवयव रंगे गये हैं, इसलिए यह देह मुझे अभीष्ट नहीं है। पीठ की हड्डीरूपी (रीढ़रूपी) सहतीरों के परस्पर मिलने से जिसके भीतर बहुत थोड़ा स्थान रह गया है, आँतरूपी रज्जुओं से बँधा हुआ देहरूपी घर मुझे अभीष्ट नहीं है।।19-20।। स्नायु (नस) रूपी रस्सियाँ जिसमें चारों ओर तनी हैं, रस, रक्तरूप जल से रचित गारे से लिपा गया, वृद्धावस्था (केश रोम आदि को सफेद करने वाला बुढ़ापा) रूपी चूने से सफेद यह देहरूपी घर मुझे अभीष्ट नहीं है।।21।। चित्तरूपी नौकर ने विविध चेष्टाओं द्वारा इसकी स्थिति इतनी मजबूत कर रक्खी है कि यह गिर नहीं सकता, मिथ्या और अज्ञान इसके आधारस्तम्भ हैं, दुःखरूपी बाल-बच्चों ने इसमें रो रोकर कुहराम मचाया है, सुख-शय्या (सुषुप्ति) से यह मनोहर है, दुश्चेष्टारूपी दाह-व्रण से पीड़ित दासी इसमें रहती है, ऐसा देहरूपी घर मुझे अभीष्ट नहीं है।।22,23।।
हे मुने, यह देहरूपी गृह दोषपूर्ण विषयसमूहरूपी बर्तनों और अन्यान्य सामग्रियों से ठसाठस भरा हुआ है और अज्ञानरूपी क्षार से जर्जर है, भला बतलाइये तो सही, यह हमारा अभीप्सित कैसे हो सकता है ? टखने (एड़ी के ऊपर की गाँठ) रूपी आधारकाष्ठ स्थित पिण्डलीका घुटनारूप मस्तक जिसके स्तम्भ का मस्तक है, लम्बी लम्बी दो भुजाएँ रूपी आड़ी लकड़ियों से अत्यन्त दृढ़ यह देहरूपी घर मुझे अभीष्ट नहीं है। ब्रह्मन, जिसमें ज्ञानेन्द्रियरूपी झरोखों के भीतर प्रज्ञारूपिणी गृहस्वामिनी क्रीड़ा कर रही है, चिन्तारूपी अनेक पुत्रियाँ जिसमें विद्यमान हैं, ऐसा देहरूपी घर मुझे अभीष्ट नहीं है। सिर के केशरूपी छादन (छाजन-छाने की घास-फूस) से आच्छादित, कर्णरूपी शोभाशाली चन्द्रशालाओं से (घूर ऊपर के कमरों से) युक्त तथा लम्बी लम्बी अँगुलीरूपी काठ के चित्रों से सुसज्जित देहरूपी घर मुझे पसन्द नहीं है।।24-27।। जिसमें सम्पूर्ण अंगरूपी दीवारों में रोमरूपी निबिड़ (खूब घने) जौ के अंकुर उगे हैं और पेटरूपी छिद्र है, ऐसा देहरूपी घर मुझे नहीं चाहिए।।28।। जिसमें नखरूपी मकड़ियों के जाले तने हैं, कुत्ती की नाई भ्रमण, दीनता, कलह आदि कराने वाली क्षुधा जिसके अन्दर शोर मचाती है, जिसमें भीषण शब्द करने वाला वायु सदा चलता रहता है, वायु का वेग भीतर प्रवेश करने और बाहर निकलने में सदा व्यग्र रहता है और इन्द्रियरूपी झरोखे सदा खुले हैं, इस प्रकार का देहरूपी घर मुझे अभीष्ट नहीं है। उक्त देहरूपी घर के मुँहरूपी दरवाजे पर जिह्वारूप वानरी सदा डटी रहती है, इससे उसकी भीषणता और बढ़ जाती है, दाँतरूप हड्डी के टुकड़े स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं, अतः यह देहगृह मुझे अभीष्ट नहीं है।।29-31।। त्वचारूपी चूने के लेप से (पलस्तर से) चिकना है, सम्पूर्ण सन्धियाँ इस घर के यन्त्र हैं, उनके संचार से (भ्रमण आदि से) यह चंचल है, मनरूपी सदा रहने वाले चूहे ने इसे चारों ओर से खोदकर शिथिल और कूड़ा आदि से पूर्ण कर रक्खा है, अतः यह देहगृह मुझे नहीं जँचता।।32।। क्षणभर में मन्दहासरूपी दीपों की प्रभा से उज्जवल एवं आह्लाद से दैदीप्यमान और क्षणभर में अज्ञानरूपी अन्धकार से व्याप्त यह देहरूपी गृह मुझे भला नहीं लगता। यह देह सम्पूर्ण रोगों का घर, बुढ़ापे के कारण पड़ने वाली झुर्रियों और केशों की सफेदी का नगर है। इसमें मानसिक क्लेशों का ही प्रधानरूप से साम्राज्य है, अतः उनसे इसकी गहनता का कोई ठिकाना नहीं है, इसलिए यह देहरूपी घर मुझे अभीष्ट नहीं है। घोर अन्धकार से आच्छन्न दिशारूपी झाड़ियों से युक्त भीतर से शून्य अनेक गुहाओं से पूर्ण यह देहरूपी महाअरण्य है, इसमें इन्द्रियरूपी भालू भयप्रदर्शन करते हुए इधर उधर घूमते रहते हैं, अतः यह देहरूप अरण्य मुझे इष्ट नहीं है।।33-35।।
.................................... क्रमशः