मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

शनिवार, 8 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 7



 सत्रहवाँ सर्ग

दीनता, कृपणता और मृत्यु देने वाली, सम्पूर्ण जगत् को मोह में डालनेवाली तथा अनेकविध पापों की जननी तृष्णा की निन्दा।.....

श्लोक २३ से आगे ........... 
संसाररूप विशाल जंगल में जरा, मरण आदि विकसित कुसुमों से युक्त एवं विनिपात और उत्पात आदि फलों की जननी तृष्णा विस्तृत विष लता है।।24।। तृष्णा जीर्ण नर्तकी के समान जिस कार्य के साधन में अशक्त है, (नर्तकी के पक्ष में) जहाँ जाने में असमर्थ है, वहाँ भी ताण्डवगति धारण करती है और उत्साह न होने के, निर्बल होने के कारण आनन्दरहित नृत्य करती है।।25।। चिन्तारूपी चपल मयूरी निहार में निहारसदृश मोहावरण में – नृत्य करती है, आलोक के आने पर विवेकरूप प्रकाश होने पर-शान्त हो जाती है, और असाध्य वस्तुओं में अपना कदम रखती है। मयूरी भी वर्षा में नृत्य करती हैं, शरत् में शान्त हो जाती है और दुर्गम स्थानों में गमन करती है। जैसे अन्यकाल में बहुत दिनों तक शून्य रहने वाली और वर्षा में भी बीच-बीच में शून्य रहने वाली नदी वर्षाकाल में जलकल्लोंलों से प्रचुर होकर क्षण में ही उल्लास को प्राप्त होती है, वैसे ही चिरकाल तक शून्य, फल पाने पर भी मध्य-मध्य में शून्य यह तृष्णा जड़ पदार्थों में अनेक प्रकार के कल्लोलों से-आनन्दों से – पूर्ण होकर क्षण में ही उल्लसित हो जाती है।।26,27।। चंचल बन्दरीरूपी तृष्णा दुष्प्राप्य स्थान में भी अपना कदम रखती है, तृप्त होने पर भी फल की आशा करती है, एक स्थान पर अधिक कालतक नहीं ठहरती, अतः वह चपल बन्दरी है।।29।। जैसे प्राणियों के कर्मों के अनुसार विधाता सदा चेष्टा करते हैं, वैसे ही यह तृष्णा भी शुभ कर्म का आरम्भ करके उसकी समाप्ति न करके अशुभ, अनुचित, असंजस या प्रकमविरूद्ध सभी कार्यों का अनुसरण करती है, उपरत नहीं होती, किन्तु शुभाशुभ के लिए सर्वदा चेष्टा करती रहती है।।30।। क्षण में पाताल में जाती है, क्षण में आकाश की ओर उड़ती है, क्षण में दिशारूप निकुंजों में घूमती है, इसलिए यह तृष्णा हृदयरूपी कमल में रहने वाली भँवरी है।।31।। संसार में जितने दोष हैं उनमें एक तृष्णा ही दीर्घ काल तक दुःख देने वाला दोष है, जो अन्तःपुर में रहने वाले को भी भीषण संकट में डाल देती है।।32।। परम-आत्मतत्त्वप्रकाश के साथ विरोध करने वाली मोहरूप निहार से निविड़ मेघमालारूपी तृष्णा केवल जड़ता ही प्रदान करती है। मेघमाला भी सूर्यप्रकाश की विरोधिनी है, निहार से पूर्ण होती है और शैत्यरूपी (शीतलतारूपी) जड़ता की दात्री है। अतः तृष्णा और मेघमालिका का साम्य उचित ही है।।33।। जैसे अनेक पशुओं के बाँधने के लिए गले में लगी हुई रस्सियों से ग्रथित मालासदृश तिरछी विस्तृत रज्जू होती है वैसे ही सांसारिक व्यवहार में फँसे हुए प्राणियों के समूहों में मनों को चारों ओर से बाँधने के लिए यह तृष्णारूप रज्जु है।।34।। जैसे इन्द्रधनुष विस्मयोत्पादक अनेक प्रकार के रूपों से युक्त, विगुण-ज्या से रहित, लम्बा-चौड़ा, मेघाश्रित, शून्यात्मक आकाश में स्थित और स्वतः शून्य-अवस्तु है, वैसे ही यह तृष्णा भी विचित्र विषयों से अनुरंजित, असत् गुणों से युक्त, दीर्घ, मलिन पुरुष में आश्रित और शून्यात्मक मन में स्थित है।।35।। तृष्णा गुणरूपी धान्यों के लिए वज्र है, फलरूप आपत्तियों के लिए शरदऋतु है, संवितरूप-तत्त्वज्ञानरूप-कमलों के लिए हिम है-विघातिका है एवं अज्ञान के लिए दीर्घ हेमन्त की रात्रि है।।36।। तृष्णा संसाररूप नाटक में नटी है, प्रवृत्तिरूप घोंसले में रहने वाली चिड़िया है, मनोरथरूप अरण्यों में रहने वाली हरिणी है और स्मरको-कामदेव को बढ़ाने के लिए संगीतवीणा है।।37।। तृष्णा व्यवहाररूपी समुद्र की लहरी है, मोहरूप मत्त हाथियों की श्रृंखला है, सृष्टिरूप वटवृक्ष की की सुन्दर लता है, दुःखरूप कमलीनियों की चन्द्रिका है, जरा, मरणरूप दुःखों की एक रत्नपेटिका है और सदा आधि, व्याधिरूप विलासों की मदमत्त विलासिनी है। तृष्णा को आकाशरूपी मार्ग की उपमा दी जा सकती है, क्योंकि जैसे आकाश कभी सूर्यप्रकाश से निर्मल हो जाता है, कभी मेघाच्छन्न होने पर कुछ-कुछ अँधियारी छा जाती है और कभी कुहरे से आवृत्त हो जाता है, वैसे ही तृष्णा भी कभी तनिक विवेकरूपी प्रकाश से निर्मल हो जाती है, विवेक न होने पर अज्ञान से मलिन और कभी कुहरे के तुल्य व्यामोह से व्याप्त हो जाती है।।38-40।।
यों तृष्णा का वर्णन कर अब तृष्णा की शान्ति का फल कहते है।
जैसे गाढ़ अन्धकार से अँधेरी कृष्णपक्ष की रात्रि निशाचरों (राक्षसों) के प्रचार के अभाव के लिए विनष्ट  हो जाती है अर्थात् राक्षसों का इतस्ततः गमन न हो, इसलिए बीत जाती है, वैसे ही तृष्णा भी देहप्रयुक्त परिश्रम की शान्ति के लिए (मुक्ति के लिए) नष्ट हो जाती है। अर्थात् तृष्णा की शान्ति होने से मुक्ति  हो जाती है।।41।। वेदान्त आदि आध्यात्मशास्त्रों के विचार से शून्य अतएव व्याकुलचित्त के संसारी लोग तभी तक मोह को प्राप्त होते हैं जब तक विषयप्रयुक्त विसूचिका रोग के समान मृत्यु की हेतु तृष्णा पीछा करती रहती है अर्थात् लोग उसका त्याग नहीं करते।।42।।
उसके त्याग का क्या उपाय है ? इस पर  कहते हैं। यहाँ पर चिन्ता का अर्थ विषयों का स्मरण है। उक्त चिन्ता के त्याग से संसारी जनों का दुःख नष्ट हो जाता है। विद्वानों ने चिन्तात्याग को ही तृष्णारूपी विसूचिका (हैजा) का मंत्र (प्रतीकारक उपाय) कहा है।।43।। जैसे तालाब में रहने वाली मछली घास-पत्ती, पत्थर-लकड़ी आदि सभी मेरा भक्ष्य है, ऐसा समझकर अन्त में भक्ष्ययुक्त बंशी को (मछली को फँसाने के काँटे को) भी मुँह में डालकर मछुए द्वारा मारी जाती हुई फड़फड़ाती है वैसे ही तृष्णा भी तृण, पत्थर, काष्ठ आदि निखिल वस्तुओं को अपना भक्ष्य समझकर ग्रहण करती हुई अन्त में स्फूर्ति को प्राप्त होती है।।44।। जैसे सूर्य की किरणें मुकुलित कमल को विकसित करा देती हैं, वैसे ही रोग, पीड़ा, स्त्री और तृष्णा भी धीर पुरुष को भी शीघ्र अधीरता को प्राप्त कर देती हैं। अर्थात् जैसे सूर्यकिरणें मुकुलितावस्था में गम्भीर (गहरे) कमल को खूब विकसित कर उत्तान (छिछला) कर देती है, वैसे ही तृष्णा भी धीर-अयाचित-व्रत-पुरुष को शीघ्र अधीर-याचना द्वारा लघु-बना देती है।।45।। तृष्णा बाँस की लता के समान सदा अन्तःसारशून्य (भीतर से खोखली), ग्रन्थियों से युक्त (तृष्णाओं के पक्ष में दुराग्रहरूपी ग्रन्थियों से युक्त और बाँस के पक्ष में पोररूपी ग्रन्थियों से युक्त), बड़ी-बड़ी चिन्ताओं और दुःखों से पूर्ण (बाँस के पक्ष में बड़े बड़े कोपलों के काँटों से युक्त), मोती और मणियों पर प्रेम करने वाली (बाँस के पक्ष में सर्वजनप्रिय मोतीरूपी मणियों की उपलब्धि के स्थान) है अर्थात् जैसे बाँस की लताएँ सदा भीतर से खोखली रहती हैं, उनके बीच में बहुत सी गाँठें होती हैं, उनमें बड़े बड़े कोंपलों के काँटे होते हैं और सर्वजन मनोहर मोती उनमें उपलब्ध होते हैं, वैसे ही तृष्णाएँ भी खोखली, दुराग्रह से भरी, बड़ी चिन्ताओं और कष्टों से पूर्ण और मोती, मणि आदि धन सम्पत्ति में अति प्रेम करने वाली होती है।।46।।
विवेक भी तृष्णा के नाश में हेतु हैं, ऐसा दर्शाते हैं।
यह बड़े आश्चर्य की बात है कि ऐसी दुश्चेद्य विषयतृष्णा को भी ज्ञान सम्पन्न महानुभाव लोग विवेकरूपी निर्मल (तीक्षण) तलवार से अनायास काट डालते हैं।।47।। हे ब्रह्मन् जीवों के हृदय में स्थित तृष्णा जैसी तीक्षण न तो तेज तलवार की धार है, न वज्राग्नि की चिनगारियाँ हैं और न बन्दूक की गोलियाँ (छर्रे) ही हैं।।48।।
अर्थात् तलवार की धार आदि बाह्य होने के कारण प्राणी के लिए कदाचित ही अनर्थकारी होते हैं, पर हृदय में रहने के कारण तृष्णा सदा ही अनर्थकारिणी होती है, इसलिए वह तलवार की धार आदि से भी बढ़कर है, यह आशय है।
जैसे दीये की लौ मध्य में उज्जवल और अन्त में कृष्णवर्ण, अग्रभाग से तीक्ष्ण, स्नेह से युक्त, दीर्घदशायुक्त, प्रकाशमान और दुःस्पर्श होती है, विषयतृष्णा भी ठीक वैसे ही है अर्थात् जैसे दीये की लौ पहले उज्जवल होती है, अन्त में उसका अग्रभाग काला और तीखा हो जाता है, उसमें तेल रहता है, बड़ी बत्ती रहती है और सन्ताप इतना अधिक रहता है कि उसे कोई छू नहीं सकता, वैसे ही विषयतृष्णा भी पहले भोग और वैभव से उज्जवल रहती है, अन्त में तमोगुण और मृत्यु का कारण होती है, माता, स्त्री और पुत्र के स्नेह से दीर्घ और उत्कृष्ट बाल्य, यौवन और वार्धक्य अवस्थाओं से युक्त, प्रत्यक्ष और इष्टवियोग से उत्पन्न हार्दिक क्लेश से असह्य है।।49।। हे महर्षि, एकमात्र विषयतृष्णा ही मेरु के सदृश अति उन्नत, गौरवशाली, पराक्रमी, अयाचित व्रत से अटल एवं विद्वान नरश्रेष्ठ को भी एक क्षण में याचना द्वारा दीन-हीन बनाकर तिनके के समान उपेक्षणीय और चंचल बना देती है।।50।।
किसी ने कहा भी हैः
तृणाल्लघुतरस्तूलस्तूलादपि च याचकः। वायुना किं न नीतोऽसौ मामयं याचयिष्ति।।
अर्थात् तृण से रुई हल्की होती है और रुई से भी याचक हल्का है। रुई को हवा उड़ा ले जाती है, पर याचक मुझसे भी कोई याचना करेगा, यह समझकर हवा उसे नहीं उड़ाती।
जैसे विन्ध्याचल अनेक बड़े बड़े अरण्यों से पूर्ण निबिडतारूपी जाल और घूलिपटल से आच्छन्न एवं भीषण अन्धकार और घने कुहरे से व्याप्त होता है, वैसे ही विषयपिपासारूपिणी तृष्णा भी अरण्यतुल्य अनेक बड़े बड़े साहस के कार्यों से युक्त, पतन हेतु होने से भयंकर, निबिड जाल की नाईं बन्ध में हेतुभूत आशारूपी रस्सी से और रजोगुण से बनी हुई एवं अज्ञानरूपी कुहरे से व्याप्त है अथवा 'संस्तीर्णगहना' पदका – एक ही विषयतृष्णा आशा, काम, लोभ, लम्पटता आदि के रूप से चौदहों भुवनों में व्याप्त और दुर्लक्ष्य है – ऐसा अर्थ है।।51।।
तृष्णा कैसे विस्तीर्ण है, कैसे दुर्लक्ष्य है और कैसे एक है ? क्योंकि आश्रय, विषय और वाचक शब्द के भेद से आशा, काम, लोभ आदिरूप से तृष्णा भिन्न भिन्न है, ऐसी आशंका कर उक्त अर्थ का दृष्टान्तपूर्वक प्रतिपादन करते हैं।
जैसे 'रसन' इन्द्रिय के रुप से शरीर में विद्यमान सब जलों के मध्य में (जल सामान्य में) रहने वाली एक ही माधुर्यशक्ति (नदी, समुद्र आदि में गिरने से) क्षीर, (गलाने से) उदक, (शब्द करने से) अम्बु, इस प्रकार क्रिया और वाचक शब्दों के भेद से विभिन्न चंचल तरंगों से संकुल जल में स्थित होकर दुर्लक्ष्य होती है, अर्थात् एक ही है ऐसा उसका ज्ञान नहीं होता, वैसे ही शरीर में विद्यमान तृष्णा एक होती है, अर्थात् एक ही ऐसा उसका ज्ञान नहीं होता, वैसे ही शरीर में विद्यमान तृष्णा एक होती हुई भी सम्पूर्ण भुवनों के भोग्य पदार्थों में व्याप्त होकर व्यवहार में दुर्लक्ष्य सी प्रतीत होती है – देहस्थित तृष्णा ने ही आशा, काम और लोभ का वेश धारण किया है, ऐसा स्पष्ट प्रतीत नहीं होता।।52।।

सत्रहवाँ सर्ग समाप्त

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 6



सत्रहवाँ सर्ग
दीनता, कृपणता और मृत्यु देने वाली, सम्पूर्ण जगत् को मोह में डालनेवाली तथा अनेकविध पापों की जननी तृष्णा की निन्दा।
रामचन्द्रजी ने कहाः परमप्रेमास्पद आत्मतत्त्व की तिरोधान होने के कारण अंधकारपूर्ण रात्रिरूपी दुरन्त तृष्णा से इस चेतनात्मक गगन में जीव में अनेक तरह की राग आदि दोष स्वरूप उल्लुओं की पंक्तियाँ स्फुरने लगती हैं।।1।। जैसे ताप पहुँचाने वाली सूर्य की किरणें कीचड़ के रस और मृदुता का अपहरण करके कीचड़ को सुखा देती हैं, वैसे ही अन्तःकरण को सन्तप्त करने वाली चिन्ताने मेरे रस और मृदुता का हरण कर या मुझे विनय और दाक्षिण्य से शून्य कर सूखा दिया है अर्थात् उक्त चिन्ताने मेरे विनयादि को नष्ट कर मुझे नीरस और कठोर बना दिया है।।2।। व्यामोहरूप अन्धकार से व्याप्त विचारशून्य मेरे चित्तरूपी बड़े जंगल में ताण्डव-नृत्य करने वाली आशारूपी पिशाचिका का जोर-शोर से उदय हुआ है।।3।। तत्-तत् आर्त वचनों द्वारा रचित अश्रुरूप नीहार (ओस) कणों से युक्त और समीपस्थ सुवर्ण आदि की अभिलाषा द्वारा पाण्डुता का सम्पादन करने से उज्जवल चिन्तारूप चने की मंजरी अर्थात् तृष्णा पूर्णरूप से विकसित हो रही है। तात्पर्य यह है कि नीहार से ही (तुषार से ही) चने के पौधे बढ़ते हैं, ऐसी प्रसिद्धि है, इसलिए जैसे रात्रिरचित नीहार के कणों से युक्त चने के पौधे की मंजरियाँ समीपस्थ धतूरे के बन से उज्जवल (शोभित) होकर विकसित होती हैं, वैसे ही अनेक तरह के दुःख-विलापों से जनित अश्रुबिन्दुओं से युक्त और समीपस्थ सुवर्ण आदि की अभिलाषा द्वारा उज्जवल मेरी तृष्णा मानों विकसित हो रही है।।4।। जैसे मध्य भाग को चंचल करने वाली तरंग समुद्र में केवल भ्रमण करने के लिए ही विषम ऊर्ध्व नाटय को प्राप्त होती है, वैसे ही चित्त को क्षुब्ध करने वाली तृष्णा ने केवल अंतःकरण में निविड़ भ्रम पैदा करने के लिए ही अनेक कष्टों से पूर्ण धनोपार्जन के लिए उत्साह प्राप्त कराया है।।5।। बढ़े हुए अधिक्षेप, अनृप भाषण आदिरूप प्रचण्ड कल्लोल शब्दों से युक्त अतएव उक्त तरंगों से तरल आकारवाली और एक विषय से दूसरे विषय की ओर जाने वाली तृष्णारूपी नदी मेरे शरीररूपी पर्वत में बह रही है।।6।। यद्यपि मैं अपनी चपलता को रोकने के लिए धर्ममेघा समाधि आदि मैं तत्पर हूँ, तथापि जैसे आँधी जीर्ण तृण को कहीं अन्यत्र ले जाती है, वैसे ही कलुषित तृष्णा ने मेरे चित्तरूपी चातक को कहीं अन्यत्र-अयोग्य विषय – में ही प्राप्त करा दिया है।।7।। मैं विवेक, वैराग्य आदि गुणों से युक्त पदार्थों के विषय में जिस जिस आस्था का (उत्साह का) आश्रय करता हूँ, उस उस आस्था को मेरी तृष्णा इस तरह काट देती है, जिस तरह चूहा वीणा के चर्मसूत्र को काट देता है। जैसे जल के आवर्त में (भौंरी में) पुराना पत्ता, वायु में लघु तृण और आकाश में शरत्कालीन मेघ यत्र-तत्र घूमते रहते हैं, वैसे ही मैं चिन्तारूपी चक्र में घूम रहा हूँ। जैसे जाल में फँसे हुए पक्षी अपने घोंसले में जाने के लिए असमर्थ होने से जाल में ही पड़े रहते हैं, वैसे ही अपने पारमर्थिक स्वरूप को प्राप्त करने में असमर्थ हुए हम लोग चिन्तारूपी जाल में मुग्ध हो रहे हैं।।8-10।। हे मुनिवर, तृष्णारूपी ज्वाला से मैं इस प्रकार दग्ध हो गया हूँ कि मुझे अमृत से भी अपने दाह की शान्ति की सम्भावना नहीं है। तृष्णारूपी उन्मत घोड़ी यहाँ से अतिदूर जाकर और फिर फिर वापस आकर बड़ी शीघ्रता से चारों ओर घूम रही है।।11,12।। धर्म और अधर्म के अनुसार नित्य स्वर्ग और नरक में गमन और आगमन  कराने वाली, भोक्ता और भोग्य के तादात्म्याध्यास एवं संसर्गाध्यास से युक्त, जड़ पदार्थों से सम्बन्द्ध एवं विक्षुब्ध तृष्णा घटीयन्त्र के ऊपर लगी हुई रज्जु के समान है। उक्त रज्जु भी सदा ऊपर नीचे आती जाती रहती है, जल से सम्बन्ध रखती है, गाँठवाली है एवं चचल रहती है। देह के भीतर मन में गूँथी गई तथा किसी प्रकार किसी से विच्छिन्न न की जाने वाली इस तृष्णारूपी रज्जु से बैल के समान ये मनुष्य अत्यन्त शीघ्रता से ऐहिक और आमुष्मिक (परलोक के) फल के हजारों साधनरूपी भार को वहन करते हैं।।13,14।। जैसे बहेलिये की स्त्री पक्षियों को फँसाने के लिए जाल बनाती है वैसे ही सदा आकर्षण स्वभाववाली तृष्णारूपी किराती ने लोगों को फँसाने के लिए यह पुत्र, मित्र, कलत्र आदिरूप जाल बनाया है।।15।। यद्यपि मैं धीर हूँ, तथापि भयंकर काली रात्रि की नाईं तृष्णा मुझे डरा रही है, विवेकरूपी चक्षु से सम्पन्न हूँ फिर भी अन्धा बना रही है और आनन्दस्वभाव हूँ तो भी दुःख दे रही है। हजारों कुटिलताओं से पूर्ण, अंशतः सुख देने वाले विषयों के लाभ से युक्त और परिणाम में वैर बन्धन आदिरूप विषय देने वाली यह तृष्णा तनिक स्पर्श होने पर ही काली नागिन की नाईं डस लेती है अर्थात् मोह में डाल देती है।।16,17।। पुरुषों के हृदय को भेदन करने वाली, बन्धन, रोग आदि की या सारे प्रपंच की उत्पादक, दुर्भाग्य देने वाली और दीनता से पूर्ण यह तृष्णा काली राक्षसी के सदृश है।।18।। हे ब्रह्मन्, अनेक तन्त्रियों (तारों) और नाड़ियों से वेष्टित शरीर को धारण करने वाली तृष्णा निरतिशय परमानन्द के लिए उपयुक्त नहीं है, अतः यह जीर्ण तुम्बी से युक्त वीणा है। तात्पर्य यह है कि जैसे आलस्यवश अन्य तुम्बी का सम्पादन न करने के कारण विच्छिन्न तन्त्रियों से सम्पन्न वीणा उत्सव आदि मांगलिक कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं होती, वैसे ही यह तृष्णा भी परमानन्द के लिए उपयुक्त नहीं है।।19।। नित्य अतिमलिन, परिणाम में दुःखप्रद उन्माद को देने वाली, दीर्घ तन्त्रियों से युक्त तथा विषयों में घनीभूत स्नेह करने वाली तृष्णा पर्वत की गुफा में उत्पन्न लतारूप ही है अर्थात् पर्वत गुफा में एक प्रकार की लता होती है, वह सूर्य के किरणों के न मिलने से अत्यन्त मलिन रहती है, उसका सेवन करने से परिणाम में उन्माद आदि दुःखप्रद व्याधियाँ होती हैं और वह अत्यन्त विस्तृत होती है। इसीलिए तृष्णा और उसकी समानता है। जैसे आम आदि उन्नत वृक्षों की शाखापर स्थित, सूख जाने के कारण अनेक कण्टकों से आकीर्ण, पुष्पशून्य और फलरहित क्षीण मंजरी आनन्दप्रद नहीं होती, वैसे ही यह तृष्णा न आनन्दप्रद है, न सुखप्रद है और  न फलप्रद है, किन्तु व्यर्थ-विस्तृत है, अमंगलकारिणी है और क्रूर है।।20,21।। चित्त को अपने वश में करने में असमर्थ वृद्ध वेश्या के समान तृष्णा प्रत्येक पुरुष के पीछे दौड़ती है, पर उसे फल कुछ नहीं मिलता।।22।। अनेक प्रकार के शोक, मोह आदि रसों से परिपूर्ण इस महान् संसारसमूह में भुवनरूपी विस्तृत नाटयशाला में तृष्णा वृद्ध नर्तकी है अर्थात् करूण, हास्य और बीभत्स आदि रसों से युक्त नृत्यशाला में स्थित वृद्ध वेश्या के समान तृष्णा है।।23।। ....................  क्रमशः

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 5



सोलहवाँ सर्ग
श्रीरामचन्द्रजी द्वारा चित्त और मन के विविध दोषों का युक्तियों और दृष्टान्तों से विस्तारपूर्वक वर्णन।

अहंकार के समान चित्त और मन भी सुख हेतु नहीं हैं, किन्तु दुःख हेतु ही हैं, ऐसा कहते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः 'हे मुनिवर, महापुरुषों की सेवा मुक्ति का द्वार है' ऐसा वचन है इसलिए सज्जनों (मुमुक्षुओं) द्वारा अवश्य करणीय महात्माओं की सेवा के बिना काम आदि दोषों से चित्त की शिथिलता को (चंचलता को अर्थात् पुरुषार्थ साधन  अपटुता को) प्राप्त होता है। चंचल चित्त वायु प्रवाह में पतित मयूर की पूँछ के अग्रभाग की नाईं स्थिर नहीं रहता, इधर-उधर घूमता रहता है। मन भी प्राणवायु के अधीन और चंचल है, ऐसा आगे कहेंगे।।1।।
उपर्युक्त कथन को ही दृष्टान्त द्वारा स्फुट करते हैं।
अत्यन्त व्याकुल चित्त युक्त और अयुक्त विचार के बिना इधर-उधर दूर से भी दूर प्रदेश तक, ग्राम में कुत्ते की नाईं, घूमता है कहीं पर भी अपनी पूर्ति के उपाय को न पाकर दीन-हीन बना रहता है अर्थात् जैसे कुत्ते अपने उदर की पूर्ति के लिए व्यग्रचित्त होकर ग्राम में घूमते हैं, अभीष्ट वस्तु न पाकर दीन-हीन बने रहते हैं।।2।। पहले तो उसे कहीं पर कुछ मिलता ही नहीं। कदाचित दैवयोग से प्रचूर धन प्राप्त होने पर भी न पाये हुए के समान वह अतृप्त ही रहता है जैसे करण्डक (बांस या बेंत से बना हुआ पात्र) जल से नहीं भरता, वैसे ही अन्तःकरण भी पूर्ण नहीं होता अर्थात् जैसे बांस की शलाका और बेंत की सींकों से बनी हुई टोकरी आदि पात्र जल से भरने पर भी पूर्ण नहीं होता, छिद्रों से जल के निकल जाने से उसमें कुछ भी जल नहीं रहता, वैसे ही व्यग्रचित्तवाले अशान्त लोगों का अन्तःकरण भी पूर्ण नहीं होता।।3।। जैसे अपने सजातीयों के झुण्ड से बिछुड़ा हुआ एवं बन्धन में पड़ा हुआ मृग सुख को प्राप्त नहीं होता, वैसे ही सब प्रकार से शून्य (मिथ्या) नित्य दुराशारूप रज्जु से वेष्टित मन कभी सुख को प्राप्त नहीं होता।।4।। हे मुने, तरंगों के समान चंचल वृत्ति को धारम कर रहा मेरा मन स्थूल और सूक्ष्म अवयवों के छेद के सिवा एक क्षण के लिए भी अपने स्थान पर स्थिरता को प्राप्त नहीं होता। विषयों के अनुसन्धान से विविध क्षोभ को प्राप्त हुआ मेरा मन मथनकाल में मन्दराचल के आघात से उच्चलित क्षीरसागर के जल के समान दसों दिशाओं में दौड़ता है, किन्तु सुख कहीं पर भी नहीं पाता।।5,6।। भोगों की प्राप्ति के हेतुभूत उत्साहरूप कल्लोलों से जिसने डूबने लायक आवर्त बना रक्खे हैं, मायारूप भोगों की प्राप्ति के हेतुभूत उत्साहरूप कल्लोलों से जिसने डूबने लायक आवर्त बना रक्खे हैं, माया रूप (परंवंचनारूप) मगरों से परिवेष्टित मनरूप महासमुद्र को अपने वश में करने के लिए मैं असमर्थ हूँ।।7।। ब्रह्मन्, मनरूपी हरिण नरक की परवाह न कर भोगरूपी दूब के तिनकों की अभिलाषा से युक्त होकर तीव्र वेग से बहुत दूर तक दौड़ता है, अर्थात् जैसे मृग गर्त में गिरने की चिन्ता न कर दूबके तिनकों के लोभ से वेग के साथ बहुत देर तक दौड़ते हैं, वैसे ही मेरा मन नरकपतन का भय छोड़कर भोगलाभ की आशा से बहुत दूर तक दौड़ता है।।8।। जैसे समुद्र अपनी चंचलता का त्याग नहीं करता, वैसे ही चित्तासक्त और चंचलस्वभाव मेरा मन भी स्थूल और सूक्ष्म अवयवों के विनाश का त्याग नहीं करता।।9।। जैसे पिंजड़े में बँधा हुआ सिंह विविध चिन्ताओं से पूर्ण होकर चंचल चित्तवृत्ति से एक जगह स्थिर नहीं रह सकता, वैसे ही विविध चिन्ताओं से अतिचपल और चंचल वृत्ति से युक्त मेरा मन भी एक जगह धैर्य को नहीं प्राप्त हो रहा है।।10।।
चित्त स्वतः ही चपलस्वभाव है, विविध चिन्ताओं द्वारा और भी विचलित किया जाता है, इसलिए हठपूर्वक उसका विरोध करने पर भी वह धैर्य को प्राप्त नहीं होता, यह भाव है।
जैसे हंस जल से दूध को निकाल लेता है, वैसे ही मेरा मोह रूपी रथ पर सवार मन भी इस शरीर से उद्वेगरहित समतारूप सुख को हर लेता है। अर्थात् उत्कर्ष और अपकर्ष औपाधिक हैं (उपाधिकल्पित हैं) अतएव परमार्थरूप से सब प्राणियों में आत्मा एकरूप से(Ω) विद्यमान है।
Ω एकात्मविज्ञान की अभयपद और समतासुख है। साम्यसुख ही नित्य और निरतिशय है। उससे अतिरिक्त जो कुछ है वह सभी असार और दुःखप्रद है। देहात्मविज्ञान सबसे बढ़कर असार है। इस शरीर में सार और असार दोनों विद्यमान हैं, परंतु मोहग्रस्त मन असार का ही ग्रहण करता है, सार का ग्रहण नहीं करता।
जीवन्मुक्तों द्वारा उक्त प्रकार से अनुभूत आत्मा की एकरूपता ही समतासुख कही जाती है। मन के मोहाक्रान्त होने पर इस शरीर में पहले से प्राप्त भी उस समतासुख को मन ग्रस लेता है। और असार (तुच्छ) देहमात्र में आत्मभाव बच जाता है, यह भाव है।
हे मुनिनायक, चित्त की आत्माभिमुखी वृत्तियाँ (स्वभाव) विविध द्वैत विषयों में आसक्तिकल्पनारूप शय्या पर सोई हुई हैं, वे बोध देने वाले शास्त्र और आचार्य के उपदेश के बिना केवल अपनी बुद्धि से किये गये हजार बार के विचार से भी नहीं जागती। उन वृत्तियों के न जागने से व्याकुल हुआ मैं सन्तप्त हूँ।।12।। जिसमें 'यह मैं हूँ' और 'यह मेरा है' इस प्रकार अन्योन्यतादात्म्याध्यास और अन्योन्यसंसर्गध्यासरूप दृढ़ ग्रन्थियाँ पड़ी हैं, ऐसे भोगस्पृहारूपी जाल में स्थित मैं अपने-आप चित्त द्वारा बाँधा गया हूँ, जैसे की अनाज के दानों के लोभ से पक्षी बहलिए द्वारा जाल से बाँधा जाता है।।13।। मुने, जैसे दुःसह धूम और ज्वाला से युक्त अग्नि सूखे तृण को जला डालती है, वैसे ही विस्तारित कोपरूपी धूम से युक्त चिन्तारूपी ज्वाला से व्याप्त चित्त से मैं जलाया गया हूँ।।14।। जैसे क्रूर और तृष्णा के समान सदा भूखी कुत्ती के पीछे चलने वाला कुत्ता शव को खा जाता है, वैसे ही निष्ठुर और तृष्णारूपी भार्या के पीछे चलने वाला चित्त अज्ञता को  प्राप्त हुए मुझको खा गया है।।15।।
मुनिवर, जैसे तरंगों से चंचलवृत्तिवाला जल का वेग तट के वृक्ष को उखाड़ कर फेंक देता है, वैसे ही तरंग के समान चंचल वृत्तिवाले जड़ चित्त ने मेरी भी दशा कर रखी है। धर्मकर्मों से स्वर्ग के प्राप्त होने पर सुखलेश से शून्य इसी लोक में कीट, पतंग आदि योनियों में भ्रमण करने के लिए चित्त ने मेरी वह दशा कर रक्खी है, जैसे कि आँधी तृण की दशा करती है। आँधी भी आकाश मे उड़ रहे तृण को भूमि पर पटक देती है और भूमि पर स्थित तृण को इधर-उधर उड़ा देती है।।16, 17।। इस संसाररूपी सागर से पार होने के लिए नित्य उद्योग कर रहे मुझ को यह कुत्सित चित्त इस भाँति रोकता है, जैसे की जल के प्रवाह को बाँध रोकता है।।18।। पृथिवी से (उर्ध्व प्रदेश से) पाताल को (अधः प्रदेश को) और पाताल से (अधःप्रदेश से) पृथिवी को (उर्ध्व प्रदेश को) जा रही रस्सी से लपेटे हुए घटीयंत्र (रस्सी से जल आदि भार को खींचने के लिए एक ओर जिसमें रस्सी बँधी रहती है, दूसरी ओर पत्थर आदि भरी वस्तु बँधी रहती है, जिसे अरहट कहते हैं, कुएँ से जल निकालने का यन्त्र) के समान मैं इस कुत्सित चित्तरूप रस्सी से वेष्टित होकर कभी ऊपर जाता हूँ कभी नीचे गिरता हूँ।।19।। जैसे बालकों को डराने के लिए कल्पित वेताल (विकरालस्वरूप) बालक को सत्य प्रतीत होता है, किन्तु बाल्यावस्था के बीतने पर उसके लिए वह असत्य हो जाता है, वैसे ही अज्ञान से मुझे दुर्जय प्रतीत होने वाला और विचार करने पर असत्यस्वरूप मन से मैं गृहीत हूँ जैसे कि बालक वेताल से गृहीत होता है।।20।। ब्रह्मन्, मन अग्नि से भी अधिक उष्ण, पर्वत से भी दुरारोह, वज्र से भी बढ़कर कठोर है, इसलिए मनरूपी ग्रह दुःख से भी गृहीत (वश में) नहीं हो सकता।।21।। जैसे मांसभक्षी चील, कौए आदि पक्षी मांस को देखते ही उसे खाने के लिए दौड़ पड़ते हैं हित और अहित का विचार नहीं करते, वैसे ही मन भी इन्द्रिय द्वारा देखे गये विषयों में टूट पड़ता है, हित और अहित का विचार नहीं करता और क्षणभर में उससे विरत हो जाता है। जैसे बालक खिलौने को देखते ही उस पर टूट पड़ता है और थोड़ी देर के बाद उसे छोड़कर दूसरा खेल बालक खिलौने को देखते ही उस पर टूट पड़ता है और थोड़ी देर के बाद उसे छोड़कर दूसरा खेल खेलने लगता है।।22।। हे तात, जैसे समुद्र जड़स्वभाव (जलरूप), चंचल, बड़े बड़े आवर्ती से (भौंरियों से) भरा और अनेक सर्प आदि हिंस्र जन्तुओं से पूर्ण है वैसे ही यह मन भी जड़, चंचल, विस्तीर्ण आवर्तरूपी वृत्तियों से युक्त और काम आदि छः शत्रुरूपी सौंपों से व्याप्त है। जैसे समुद्र हाथी को दूर फेंक देता है वैसे ही मन भी मुझे दूर फेंक रहा है।।23।। हे साधो, समुद्र को पीने, सुमेरू पर्वत को लाँघने और अग्निभक्षण से भी चित्त को अपने वश में करना कठिन है अर्थात् समुद्रपान आदि महान कार्य हैं, पर उनके होने की सम्भावना हो सकती है, परन्तु मन का निग्रह करना उससे भी कठिन है।।24।। सम्पूर्ण पदार्थों का कारण चित्त ही है उसके अस्तित्व में तीनों लोकों का अस्तित्व है, उसके क्षीण होने पर तीनों लोक नष्ट हो जाते हैं। हे मुने, इसलिए प्रयत्नपूर्वक मन की चिकित्सा करनी चाहिए अर्थात् रोग की तरह चित्त का अवश्य परित्याग करना चाहिए। हे मुनिवर, जैसे विन्ध्याचल आदि श्रेष्ठ पर्वत से अनेक वनों की उत्पत्ति होती है वैसे ही मन से ही ये सैंकड़ों सुख-दुःख उत्पन्न हुए है। ज्ञान से चित्त के क्षीण होने पर वे अवश्य ही नष्ट हो जाते हैं, ऐसा मेरा निश्चय है।।25,26।। मुमुक्षु पुरुषों ने जिस चित्त के जीतने पर शम, दम आदि गुणों के स्वाधीन होने की, काम, कर्म और वासनारूप कलाओं से युक्त सत्त्व, रज और तम-इन तीन गुणों से सम्पन्न अविद्या के नाश की और निरतिशयानन्दरूप ब्रह्म की प्राप्ति की आशा की थी, उस शत्रुरूप चित्त को जीतने के लिए मैं तत्पर हुआ हूँ, अतएव वैराग्यसम्पत्ति से युक्त होने के कारण मैं जैसे चन्द्रमा मेघपंक्ति का अभिनन्दन नहीं करता वैसे ही जड़-मलिन-विलासवाली लक्ष्मी का अभिनन्दन नहीं करता हूँ।।27।।

सोलहवाँ सर्ग समाप्त
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