मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

शनिवार, 8 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 6



सत्रहवाँ सर्ग
दीनता, कृपणता और मृत्यु देने वाली, सम्पूर्ण जगत् को मोह में डालनेवाली तथा अनेकविध पापों की जननी तृष्णा की निन्दा।
रामचन्द्रजी ने कहाः परमप्रेमास्पद आत्मतत्त्व की तिरोधान होने के कारण अंधकारपूर्ण रात्रिरूपी दुरन्त तृष्णा से इस चेतनात्मक गगन में जीव में अनेक तरह की राग आदि दोष स्वरूप उल्लुओं की पंक्तियाँ स्फुरने लगती हैं।।1।। जैसे ताप पहुँचाने वाली सूर्य की किरणें कीचड़ के रस और मृदुता का अपहरण करके कीचड़ को सुखा देती हैं, वैसे ही अन्तःकरण को सन्तप्त करने वाली चिन्ताने मेरे रस और मृदुता का हरण कर या मुझे विनय और दाक्षिण्य से शून्य कर सूखा दिया है अर्थात् उक्त चिन्ताने मेरे विनयादि को नष्ट कर मुझे नीरस और कठोर बना दिया है।।2।। व्यामोहरूप अन्धकार से व्याप्त विचारशून्य मेरे चित्तरूपी बड़े जंगल में ताण्डव-नृत्य करने वाली आशारूपी पिशाचिका का जोर-शोर से उदय हुआ है।।3।। तत्-तत् आर्त वचनों द्वारा रचित अश्रुरूप नीहार (ओस) कणों से युक्त और समीपस्थ सुवर्ण आदि की अभिलाषा द्वारा पाण्डुता का सम्पादन करने से उज्जवल चिन्तारूप चने की मंजरी अर्थात् तृष्णा पूर्णरूप से विकसित हो रही है। तात्पर्य यह है कि नीहार से ही (तुषार से ही) चने के पौधे बढ़ते हैं, ऐसी प्रसिद्धि है, इसलिए जैसे रात्रिरचित नीहार के कणों से युक्त चने के पौधे की मंजरियाँ समीपस्थ धतूरे के बन से उज्जवल (शोभित) होकर विकसित होती हैं, वैसे ही अनेक तरह के दुःख-विलापों से जनित अश्रुबिन्दुओं से युक्त और समीपस्थ सुवर्ण आदि की अभिलाषा द्वारा उज्जवल मेरी तृष्णा मानों विकसित हो रही है।।4।। जैसे मध्य भाग को चंचल करने वाली तरंग समुद्र में केवल भ्रमण करने के लिए ही विषम ऊर्ध्व नाटय को प्राप्त होती है, वैसे ही चित्त को क्षुब्ध करने वाली तृष्णा ने केवल अंतःकरण में निविड़ भ्रम पैदा करने के लिए ही अनेक कष्टों से पूर्ण धनोपार्जन के लिए उत्साह प्राप्त कराया है।।5।। बढ़े हुए अधिक्षेप, अनृप भाषण आदिरूप प्रचण्ड कल्लोल शब्दों से युक्त अतएव उक्त तरंगों से तरल आकारवाली और एक विषय से दूसरे विषय की ओर जाने वाली तृष्णारूपी नदी मेरे शरीररूपी पर्वत में बह रही है।।6।। यद्यपि मैं अपनी चपलता को रोकने के लिए धर्ममेघा समाधि आदि मैं तत्पर हूँ, तथापि जैसे आँधी जीर्ण तृण को कहीं अन्यत्र ले जाती है, वैसे ही कलुषित तृष्णा ने मेरे चित्तरूपी चातक को कहीं अन्यत्र-अयोग्य विषय – में ही प्राप्त करा दिया है।।7।। मैं विवेक, वैराग्य आदि गुणों से युक्त पदार्थों के विषय में जिस जिस आस्था का (उत्साह का) आश्रय करता हूँ, उस उस आस्था को मेरी तृष्णा इस तरह काट देती है, जिस तरह चूहा वीणा के चर्मसूत्र को काट देता है। जैसे जल के आवर्त में (भौंरी में) पुराना पत्ता, वायु में लघु तृण और आकाश में शरत्कालीन मेघ यत्र-तत्र घूमते रहते हैं, वैसे ही मैं चिन्तारूपी चक्र में घूम रहा हूँ। जैसे जाल में फँसे हुए पक्षी अपने घोंसले में जाने के लिए असमर्थ होने से जाल में ही पड़े रहते हैं, वैसे ही अपने पारमर्थिक स्वरूप को प्राप्त करने में असमर्थ हुए हम लोग चिन्तारूपी जाल में मुग्ध हो रहे हैं।।8-10।। हे मुनिवर, तृष्णारूपी ज्वाला से मैं इस प्रकार दग्ध हो गया हूँ कि मुझे अमृत से भी अपने दाह की शान्ति की सम्भावना नहीं है। तृष्णारूपी उन्मत घोड़ी यहाँ से अतिदूर जाकर और फिर फिर वापस आकर बड़ी शीघ्रता से चारों ओर घूम रही है।।11,12।। धर्म और अधर्म के अनुसार नित्य स्वर्ग और नरक में गमन और आगमन  कराने वाली, भोक्ता और भोग्य के तादात्म्याध्यास एवं संसर्गाध्यास से युक्त, जड़ पदार्थों से सम्बन्द्ध एवं विक्षुब्ध तृष्णा घटीयन्त्र के ऊपर लगी हुई रज्जु के समान है। उक्त रज्जु भी सदा ऊपर नीचे आती जाती रहती है, जल से सम्बन्ध रखती है, गाँठवाली है एवं चचल रहती है। देह के भीतर मन में गूँथी गई तथा किसी प्रकार किसी से विच्छिन्न न की जाने वाली इस तृष्णारूपी रज्जु से बैल के समान ये मनुष्य अत्यन्त शीघ्रता से ऐहिक और आमुष्मिक (परलोक के) फल के हजारों साधनरूपी भार को वहन करते हैं।।13,14।। जैसे बहेलिये की स्त्री पक्षियों को फँसाने के लिए जाल बनाती है वैसे ही सदा आकर्षण स्वभाववाली तृष्णारूपी किराती ने लोगों को फँसाने के लिए यह पुत्र, मित्र, कलत्र आदिरूप जाल बनाया है।।15।। यद्यपि मैं धीर हूँ, तथापि भयंकर काली रात्रि की नाईं तृष्णा मुझे डरा रही है, विवेकरूपी चक्षु से सम्पन्न हूँ फिर भी अन्धा बना रही है और आनन्दस्वभाव हूँ तो भी दुःख दे रही है। हजारों कुटिलताओं से पूर्ण, अंशतः सुख देने वाले विषयों के लाभ से युक्त और परिणाम में वैर बन्धन आदिरूप विषय देने वाली यह तृष्णा तनिक स्पर्श होने पर ही काली नागिन की नाईं डस लेती है अर्थात् मोह में डाल देती है।।16,17।। पुरुषों के हृदय को भेदन करने वाली, बन्धन, रोग आदि की या सारे प्रपंच की उत्पादक, दुर्भाग्य देने वाली और दीनता से पूर्ण यह तृष्णा काली राक्षसी के सदृश है।।18।। हे ब्रह्मन्, अनेक तन्त्रियों (तारों) और नाड़ियों से वेष्टित शरीर को धारण करने वाली तृष्णा निरतिशय परमानन्द के लिए उपयुक्त नहीं है, अतः यह जीर्ण तुम्बी से युक्त वीणा है। तात्पर्य यह है कि जैसे आलस्यवश अन्य तुम्बी का सम्पादन न करने के कारण विच्छिन्न तन्त्रियों से सम्पन्न वीणा उत्सव आदि मांगलिक कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं होती, वैसे ही यह तृष्णा भी परमानन्द के लिए उपयुक्त नहीं है।।19।। नित्य अतिमलिन, परिणाम में दुःखप्रद उन्माद को देने वाली, दीर्घ तन्त्रियों से युक्त तथा विषयों में घनीभूत स्नेह करने वाली तृष्णा पर्वत की गुफा में उत्पन्न लतारूप ही है अर्थात् पर्वत गुफा में एक प्रकार की लता होती है, वह सूर्य के किरणों के न मिलने से अत्यन्त मलिन रहती है, उसका सेवन करने से परिणाम में उन्माद आदि दुःखप्रद व्याधियाँ होती हैं और वह अत्यन्त विस्तृत होती है। इसीलिए तृष्णा और उसकी समानता है। जैसे आम आदि उन्नत वृक्षों की शाखापर स्थित, सूख जाने के कारण अनेक कण्टकों से आकीर्ण, पुष्पशून्य और फलरहित क्षीण मंजरी आनन्दप्रद नहीं होती, वैसे ही यह तृष्णा न आनन्दप्रद है, न सुखप्रद है और  न फलप्रद है, किन्तु व्यर्थ-विस्तृत है, अमंगलकारिणी है और क्रूर है।।20,21।। चित्त को अपने वश में करने में असमर्थ वृद्ध वेश्या के समान तृष्णा प्रत्येक पुरुष के पीछे दौड़ती है, पर उसे फल कुछ नहीं मिलता।।22।। अनेक प्रकार के शोक, मोह आदि रसों से परिपूर्ण इस महान् संसारसमूह में भुवनरूपी विस्तृत नाटयशाला में तृष्णा वृद्ध नर्तकी है अर्थात् करूण, हास्य और बीभत्स आदि रसों से युक्त नृत्यशाला में स्थित वृद्ध वेश्या के समान तृष्णा है।।23।। ....................  क्रमशः

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 5



सोलहवाँ सर्ग
श्रीरामचन्द्रजी द्वारा चित्त और मन के विविध दोषों का युक्तियों और दृष्टान्तों से विस्तारपूर्वक वर्णन।

अहंकार के समान चित्त और मन भी सुख हेतु नहीं हैं, किन्तु दुःख हेतु ही हैं, ऐसा कहते हैं।
श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः 'हे मुनिवर, महापुरुषों की सेवा मुक्ति का द्वार है' ऐसा वचन है इसलिए सज्जनों (मुमुक्षुओं) द्वारा अवश्य करणीय महात्माओं की सेवा के बिना काम आदि दोषों से चित्त की शिथिलता को (चंचलता को अर्थात् पुरुषार्थ साधन  अपटुता को) प्राप्त होता है। चंचल चित्त वायु प्रवाह में पतित मयूर की पूँछ के अग्रभाग की नाईं स्थिर नहीं रहता, इधर-उधर घूमता रहता है। मन भी प्राणवायु के अधीन और चंचल है, ऐसा आगे कहेंगे।।1।।
उपर्युक्त कथन को ही दृष्टान्त द्वारा स्फुट करते हैं।
अत्यन्त व्याकुल चित्त युक्त और अयुक्त विचार के बिना इधर-उधर दूर से भी दूर प्रदेश तक, ग्राम में कुत्ते की नाईं, घूमता है कहीं पर भी अपनी पूर्ति के उपाय को न पाकर दीन-हीन बना रहता है अर्थात् जैसे कुत्ते अपने उदर की पूर्ति के लिए व्यग्रचित्त होकर ग्राम में घूमते हैं, अभीष्ट वस्तु न पाकर दीन-हीन बने रहते हैं।।2।। पहले तो उसे कहीं पर कुछ मिलता ही नहीं। कदाचित दैवयोग से प्रचूर धन प्राप्त होने पर भी न पाये हुए के समान वह अतृप्त ही रहता है जैसे करण्डक (बांस या बेंत से बना हुआ पात्र) जल से नहीं भरता, वैसे ही अन्तःकरण भी पूर्ण नहीं होता अर्थात् जैसे बांस की शलाका और बेंत की सींकों से बनी हुई टोकरी आदि पात्र जल से भरने पर भी पूर्ण नहीं होता, छिद्रों से जल के निकल जाने से उसमें कुछ भी जल नहीं रहता, वैसे ही व्यग्रचित्तवाले अशान्त लोगों का अन्तःकरण भी पूर्ण नहीं होता।।3।। जैसे अपने सजातीयों के झुण्ड से बिछुड़ा हुआ एवं बन्धन में पड़ा हुआ मृग सुख को प्राप्त नहीं होता, वैसे ही सब प्रकार से शून्य (मिथ्या) नित्य दुराशारूप रज्जु से वेष्टित मन कभी सुख को प्राप्त नहीं होता।।4।। हे मुने, तरंगों के समान चंचल वृत्ति को धारम कर रहा मेरा मन स्थूल और सूक्ष्म अवयवों के छेद के सिवा एक क्षण के लिए भी अपने स्थान पर स्थिरता को प्राप्त नहीं होता। विषयों के अनुसन्धान से विविध क्षोभ को प्राप्त हुआ मेरा मन मथनकाल में मन्दराचल के आघात से उच्चलित क्षीरसागर के जल के समान दसों दिशाओं में दौड़ता है, किन्तु सुख कहीं पर भी नहीं पाता।।5,6।। भोगों की प्राप्ति के हेतुभूत उत्साहरूप कल्लोलों से जिसने डूबने लायक आवर्त बना रक्खे हैं, मायारूप भोगों की प्राप्ति के हेतुभूत उत्साहरूप कल्लोलों से जिसने डूबने लायक आवर्त बना रक्खे हैं, माया रूप (परंवंचनारूप) मगरों से परिवेष्टित मनरूप महासमुद्र को अपने वश में करने के लिए मैं असमर्थ हूँ।।7।। ब्रह्मन्, मनरूपी हरिण नरक की परवाह न कर भोगरूपी दूब के तिनकों की अभिलाषा से युक्त होकर तीव्र वेग से बहुत दूर तक दौड़ता है, अर्थात् जैसे मृग गर्त में गिरने की चिन्ता न कर दूबके तिनकों के लोभ से वेग के साथ बहुत देर तक दौड़ते हैं, वैसे ही मेरा मन नरकपतन का भय छोड़कर भोगलाभ की आशा से बहुत दूर तक दौड़ता है।।8।। जैसे समुद्र अपनी चंचलता का त्याग नहीं करता, वैसे ही चित्तासक्त और चंचलस्वभाव मेरा मन भी स्थूल और सूक्ष्म अवयवों के विनाश का त्याग नहीं करता।।9।। जैसे पिंजड़े में बँधा हुआ सिंह विविध चिन्ताओं से पूर्ण होकर चंचल चित्तवृत्ति से एक जगह स्थिर नहीं रह सकता, वैसे ही विविध चिन्ताओं से अतिचपल और चंचल वृत्ति से युक्त मेरा मन भी एक जगह धैर्य को नहीं प्राप्त हो रहा है।।10।।
चित्त स्वतः ही चपलस्वभाव है, विविध चिन्ताओं द्वारा और भी विचलित किया जाता है, इसलिए हठपूर्वक उसका विरोध करने पर भी वह धैर्य को प्राप्त नहीं होता, यह भाव है।
जैसे हंस जल से दूध को निकाल लेता है, वैसे ही मेरा मोह रूपी रथ पर सवार मन भी इस शरीर से उद्वेगरहित समतारूप सुख को हर लेता है। अर्थात् उत्कर्ष और अपकर्ष औपाधिक हैं (उपाधिकल्पित हैं) अतएव परमार्थरूप से सब प्राणियों में आत्मा एकरूप से(Ω) विद्यमान है।
Ω एकात्मविज्ञान की अभयपद और समतासुख है। साम्यसुख ही नित्य और निरतिशय है। उससे अतिरिक्त जो कुछ है वह सभी असार और दुःखप्रद है। देहात्मविज्ञान सबसे बढ़कर असार है। इस शरीर में सार और असार दोनों विद्यमान हैं, परंतु मोहग्रस्त मन असार का ही ग्रहण करता है, सार का ग्रहण नहीं करता।
जीवन्मुक्तों द्वारा उक्त प्रकार से अनुभूत आत्मा की एकरूपता ही समतासुख कही जाती है। मन के मोहाक्रान्त होने पर इस शरीर में पहले से प्राप्त भी उस समतासुख को मन ग्रस लेता है। और असार (तुच्छ) देहमात्र में आत्मभाव बच जाता है, यह भाव है।
हे मुनिनायक, चित्त की आत्माभिमुखी वृत्तियाँ (स्वभाव) विविध द्वैत विषयों में आसक्तिकल्पनारूप शय्या पर सोई हुई हैं, वे बोध देने वाले शास्त्र और आचार्य के उपदेश के बिना केवल अपनी बुद्धि से किये गये हजार बार के विचार से भी नहीं जागती। उन वृत्तियों के न जागने से व्याकुल हुआ मैं सन्तप्त हूँ।।12।। जिसमें 'यह मैं हूँ' और 'यह मेरा है' इस प्रकार अन्योन्यतादात्म्याध्यास और अन्योन्यसंसर्गध्यासरूप दृढ़ ग्रन्थियाँ पड़ी हैं, ऐसे भोगस्पृहारूपी जाल में स्थित मैं अपने-आप चित्त द्वारा बाँधा गया हूँ, जैसे की अनाज के दानों के लोभ से पक्षी बहलिए द्वारा जाल से बाँधा जाता है।।13।। मुने, जैसे दुःसह धूम और ज्वाला से युक्त अग्नि सूखे तृण को जला डालती है, वैसे ही विस्तारित कोपरूपी धूम से युक्त चिन्तारूपी ज्वाला से व्याप्त चित्त से मैं जलाया गया हूँ।।14।। जैसे क्रूर और तृष्णा के समान सदा भूखी कुत्ती के पीछे चलने वाला कुत्ता शव को खा जाता है, वैसे ही निष्ठुर और तृष्णारूपी भार्या के पीछे चलने वाला चित्त अज्ञता को  प्राप्त हुए मुझको खा गया है।।15।।
मुनिवर, जैसे तरंगों से चंचलवृत्तिवाला जल का वेग तट के वृक्ष को उखाड़ कर फेंक देता है, वैसे ही तरंग के समान चंचल वृत्तिवाले जड़ चित्त ने मेरी भी दशा कर रखी है। धर्मकर्मों से स्वर्ग के प्राप्त होने पर सुखलेश से शून्य इसी लोक में कीट, पतंग आदि योनियों में भ्रमण करने के लिए चित्त ने मेरी वह दशा कर रक्खी है, जैसे कि आँधी तृण की दशा करती है। आँधी भी आकाश मे उड़ रहे तृण को भूमि पर पटक देती है और भूमि पर स्थित तृण को इधर-उधर उड़ा देती है।।16, 17।। इस संसाररूपी सागर से पार होने के लिए नित्य उद्योग कर रहे मुझ को यह कुत्सित चित्त इस भाँति रोकता है, जैसे की जल के प्रवाह को बाँध रोकता है।।18।। पृथिवी से (उर्ध्व प्रदेश से) पाताल को (अधः प्रदेश को) और पाताल से (अधःप्रदेश से) पृथिवी को (उर्ध्व प्रदेश को) जा रही रस्सी से लपेटे हुए घटीयंत्र (रस्सी से जल आदि भार को खींचने के लिए एक ओर जिसमें रस्सी बँधी रहती है, दूसरी ओर पत्थर आदि भरी वस्तु बँधी रहती है, जिसे अरहट कहते हैं, कुएँ से जल निकालने का यन्त्र) के समान मैं इस कुत्सित चित्तरूप रस्सी से वेष्टित होकर कभी ऊपर जाता हूँ कभी नीचे गिरता हूँ।।19।। जैसे बालकों को डराने के लिए कल्पित वेताल (विकरालस्वरूप) बालक को सत्य प्रतीत होता है, किन्तु बाल्यावस्था के बीतने पर उसके लिए वह असत्य हो जाता है, वैसे ही अज्ञान से मुझे दुर्जय प्रतीत होने वाला और विचार करने पर असत्यस्वरूप मन से मैं गृहीत हूँ जैसे कि बालक वेताल से गृहीत होता है।।20।। ब्रह्मन्, मन अग्नि से भी अधिक उष्ण, पर्वत से भी दुरारोह, वज्र से भी बढ़कर कठोर है, इसलिए मनरूपी ग्रह दुःख से भी गृहीत (वश में) नहीं हो सकता।।21।। जैसे मांसभक्षी चील, कौए आदि पक्षी मांस को देखते ही उसे खाने के लिए दौड़ पड़ते हैं हित और अहित का विचार नहीं करते, वैसे ही मन भी इन्द्रिय द्वारा देखे गये विषयों में टूट पड़ता है, हित और अहित का विचार नहीं करता और क्षणभर में उससे विरत हो जाता है। जैसे बालक खिलौने को देखते ही उस पर टूट पड़ता है और थोड़ी देर के बाद उसे छोड़कर दूसरा खेल बालक खिलौने को देखते ही उस पर टूट पड़ता है और थोड़ी देर के बाद उसे छोड़कर दूसरा खेल खेलने लगता है।।22।। हे तात, जैसे समुद्र जड़स्वभाव (जलरूप), चंचल, बड़े बड़े आवर्ती से (भौंरियों से) भरा और अनेक सर्प आदि हिंस्र जन्तुओं से पूर्ण है वैसे ही यह मन भी जड़, चंचल, विस्तीर्ण आवर्तरूपी वृत्तियों से युक्त और काम आदि छः शत्रुरूपी सौंपों से व्याप्त है। जैसे समुद्र हाथी को दूर फेंक देता है वैसे ही मन भी मुझे दूर फेंक रहा है।।23।। हे साधो, समुद्र को पीने, सुमेरू पर्वत को लाँघने और अग्निभक्षण से भी चित्त को अपने वश में करना कठिन है अर्थात् समुद्रपान आदि महान कार्य हैं, पर उनके होने की सम्भावना हो सकती है, परन्तु मन का निग्रह करना उससे भी कठिन है।।24।। सम्पूर्ण पदार्थों का कारण चित्त ही है उसके अस्तित्व में तीनों लोकों का अस्तित्व है, उसके क्षीण होने पर तीनों लोक नष्ट हो जाते हैं। हे मुने, इसलिए प्रयत्नपूर्वक मन की चिकित्सा करनी चाहिए अर्थात् रोग की तरह चित्त का अवश्य परित्याग करना चाहिए। हे मुनिवर, जैसे विन्ध्याचल आदि श्रेष्ठ पर्वत से अनेक वनों की उत्पत्ति होती है वैसे ही मन से ही ये सैंकड़ों सुख-दुःख उत्पन्न हुए है। ज्ञान से चित्त के क्षीण होने पर वे अवश्य ही नष्ट हो जाते हैं, ऐसा मेरा निश्चय है।।25,26।। मुमुक्षु पुरुषों ने जिस चित्त के जीतने पर शम, दम आदि गुणों के स्वाधीन होने की, काम, कर्म और वासनारूप कलाओं से युक्त सत्त्व, रज और तम-इन तीन गुणों से सम्पन्न अविद्या के नाश की और निरतिशयानन्दरूप ब्रह्म की प्राप्ति की आशा की थी, उस शत्रुरूप चित्त को जीतने के लिए मैं तत्पर हुआ हूँ, अतएव वैराग्यसम्पत्ति से युक्त होने के कारण मैं जैसे चन्द्रमा मेघपंक्ति का अभिनन्दन नहीं करता वैसे ही जड़-मलिन-विलासवाली लक्ष्मी का अभिनन्दन नहीं करता हूँ।।27।।

सोलहवाँ सर्ग समाप्त
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बुधवार, 5 सितंबर 2012

श्री योगवासिष्ठ महारामायण - 4

पन्द्रहवाँ सर्ग


इसी प्रकार अहंकार भी सुखकर नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण दोष अभिमान से ही होते हैं, ऐसा कहते हैं।

श्रीरामचन्द्रजी ने कहाः मुनिवर, अज्ञानरूप निमित्त कारण से व्यर्थ ही अहंकार की उत्पत्ति हुई है और व्यर्थ ही वह चारों तरफ से बढ़ता है, उससे किसी पुरुषार्थ की सिद्धि नहीं होती। 'मिथ्यामयेन' ऐसे यह दर्शाते हैं कि उसका उपादान कारण भी अज्ञान ही है अर्थात् वह अज्ञानमय है या 'मिथ्यामयेन' ऐसे छेद करना चाहिए। दुष्ट अहंकार नामक शत्रु (काटने वाले) रोग से मैं भयभीत हूँ।।1।। संसार एक आकार वाला नहीं है। उसके विविध प्रकार हैं। साध्य, साधन, फ, प्रवृत्ति – ये सभी संसार के आकार हैं। उक्त विविध आकारवाला संसार अनादिकाल से लेकर जन्म, मरण, नरक आदि अनन्त दुःखपरम्परा का अनुभव करके भी फिर उक्त दुःख परम्परा के हेतु तुच्छ सुखों को अनेक कष्टों से चाहने वाले इसीलिए दीनों से भी दीन विषयलम्पट लोगों को निरन्तर राग-द्वेष आदि दोषों में विक्षिप्त और कलंकित करता है। यह सब अहंकार का ही प्रसाद है, दूसरे का नहीं।।2।। अहंकार से ही विविध आपत्तियाँ – (शारीरिक कष्ट) होती हैं, अहंकार से ही अनेक भीष्ण मानसिक क्लेश होते हैं और अहंकार से ही विषयनुराग अथवा दुष्चेष्टाएँ होती हैं। मेरा रोग अहंकार ही है।।3।। मुनिवर, चिरकालिक परम वैरी उक्त अहंकार का अवलम्बन करके न तो मैं भोजन करता हूँ और न जल पीता हूँ। विविध भोगों के भोग का तो कहना ही क्या है ?।।4।। जैसे बहेलिया वागुरा को (मृर्गों को बाँधने का फन्दा अर्थात् जाल को) बिछाकर मृगों को पकड़ता है, वैसे ही अहंकार रूपी दोष ने संसाररूपी अँधेरी रात्रि में फैलाकर मन को मोहित करने वाली यह माया बिछा रखी है।।5।। जैसे पर्वत से खैर के वृक्षों की उत्पत्ति होती है, वैसे ही संसार में जितने चिरकाल स्थायी भीषण महादुःख हैं, उनकी उत्पत्ति अहंकार से ही हुई है।।6।। अहंकार शमरूपी चन्द्रमा को निगलने के लिए राहू का मुँह है, गुणरूपी कमलों का विनाश करने के लिए तुषाररूप वज्र है और सब भूतों में समदर्शितारूपी मेघ के लिए शरदऋतु है अर्थात् जैसे चन्द्रमा को राहू, निगल जाता है जैसे कमलों को हिमवर्षा नष्ट कर देती है और शरद ऋतु मेघों का विध्वंस कर डालती है, वैसे ही अहंकार शम, दया, दाक्षिण्य आदि गुण और सब पर समदृष्टि को नष्ट कर देता है, इसलिए मैं इस अहंकार का त्याग करता हूँ।।7।।

अहंकार का त्याग करने पर देहाभिमान, ममता आदि दोष स्वयं ही शान्त हो जाते हैं, ऐसा दर्शाते हैं।

न मैं रामचन्द्र हूँ, न मुझे विषयों की अभिलाषा है और न मेरा मन ही है। मैं निर्वैर होकर बुद्ध के समान अपनी आत्मा में स्थित रहना चाहता हूँ। जैसे बुद्ध किसी को किसी प्रकार की पीड़ा नहीं पहुँचाते थे वैसे ही में भी किसी को किसी प्रकार की पीड़ा न पहुँचा कर आत्माराम होना चाहता हूँ।।8।।

'निन्द्येष्यपि गुणो ग्रह्यः' इस न्याय से बुद्ध् का उदाहरण दिया है या 'जितः' ऐसा पाठ समझना चाहिए।

अहंकार के वशीभूत होकर मैंने जो कुछ खाया-पिया, यज्ञ-याग आदि किया तथा इसके अतिरिक्त और जो कुछ कर्म किया, वह सब तुच्छ (असार) है, अहंकार से रहित होना ही सार वस्तु है।।9।। ब्रह्मन, यदि अहंकार रहता है, तो आपत्ति में मुझे दुःख होता है और अहंकार नहीं रहता, तो मैं सुखी रहता हूँ, इसलिए अहंकार रहित होना श्रेष्ठ है।।10।।

भोगसम्पत्ति से ही उद्वेगहीनता आदि क्यों नहीं होते इस शंका पर कहते हैं।

मुनिवर, मैं अहंकार को त्याग कर शान्तचित्त होकर, उद्वेग को छोड़कर बैठा हूँ। भोग-समूह, भंगुर देह, इन्द्रिय, विषय आदि के अधीन हैं, इसलिए इनमें किसी एक के भी नष्ट होने पर उद्वेग की प्राप्ति दुर्वार होती है।।11।। ब्रह्मन, जब तक अहंकाररूपी मेघ के शान्त होने पर तृष्णा बिजली की लकीर के तुल्य, बुझी हुई दीपशिखा (दीपक की लौ) की तरह, बड़ी शीघ्रता से कहीं विलीन हो जाती है। जैसे मेघ गड़गड़ाहट के साथ गर्जता है वैसे ही अहंकाररूपी विशाल विन्ध्याचल में मन रूपी मत्त गजेन्द्र युद्धोत्साह के साथ या निविड़ शिलाओं के टूटने की ध्वनि के साथ गर्जता है।।12-14।। इस देहरूपी महाअरण्य में उन-उन हेतुओं से वृद्धि को प्राप्त यह निविड़ अहंकार रूपी मत्त सिंह निरन्तर भ्रमण करता है, उसी ने इस जगत समुदाय को बनाया है उसी ने पुण्य-पापादिरूपी बीज की वृद्धि से इस जगत के विस्तार को प्राप्त किया है।।15।। जैसे लम्पट पुरुष मोतियों की माला गूंथकर गले में पहने रहते हैं, वैसे ही अहंकार ने भी तृष्णारूपी तागे में जन्म परम्परारूप मोतियों की माला, गूँथ कर गले में धारण कर रक्खी है।।16।। महामुने, इस अहंकाररूपी परम शत्रु ने ही इस संसार में मन्त्र-तन्त्र से शून्य पुत्र, मित्र, कलत्र आदि वशीकरण, उन्मादन आदि के उपाय फैला रक्खे हैं।।17।। प्रबल शत्रु अहंकार का मूलोच्छेद पूर्वक निरास करने पर ये सभी मानसिक कष्ट बड़ी जल्दी अपने आप विलीन हो जाते हैं, थोड़ी-थोड़ी करके हो या तीव्र वेग से हो, हृदयाकाश में स्थित अहंकाररूपी मेघ के शान्त होने पर शान्ति का विनाश करने वाला महामोह रूपी कुहरा न मालूम कहाँ विलीन हो जाता है।।18,19।। हे ब्रह्मन्, मैं निरहंकार होकर भी मूर्खतावश शोक से दुःखी हो रहा हूँ इसलिए मेरी प्रार्थना है कि मेरे लिए जो विहित और हित हो, उसका मुझे उपदेश दीजिए।।20।।

इस प्रकार अहंकार, उससे होने वाले अनर्थ और उसके उच्छेद के फल का वर्णन कर अहंकार के त्याग से उत्पन्न हुई अपनी श्रवणाधिकार-सम्पत्ति को कह रहे श्रीरामचन्द्रजी मुनि से उपदेश की प्रार्थना करते हैं।

हे महानुभव, सम्पूर्ण आपत्तियों के घर, शान्ति आदि गुणों से रहित हृदयस्थ अहंकार को मैं आश्रय नहीं देना चाहता। मैं विवेक की दृढ़ता से अहंकार रूपी लांछन को चारों ओर से दुःख से पूर्ण समझता हूँ। महामुने, जो कुछ मेरे सम्पादन के योग्य अवशिष्ट रह गया है, उसके साथ मुझे आत्मतत्त्व का उपदेश दीजिए।।21।।

पन्द्रहवाँ सर्ग समाप्त

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