मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

मंगलवार, 6 दिसंबर 2011

दुःख कारण और निवारण


(पूज्य बापूजी की ज्ञानमयी अमृतवाणी)
सात सौ करोड़ लोग धरती पर हैं। कोई ऐसा नहीं कह सकता कि "मैंने फलाना काम दुःखी होने के लिए किया था अथवा फलाना काम दुःखी होने के लिए करता हूँ।" सारे जीव, सभी मनुष्य सुबह से शाम तक, जीवन से मौत तक, जीवन भर सुख को थामने और दुःख को भगाने में लगे हैं। फिर भी देखा जाता है कि जीवन में कहीं-कहीं थोड़ा-सा सुख आया, बाकी तो दुःख ही दुःख है।
ऋषि से उनके शिष्यों ने प्रश्न कियाः "मनुष्य रोते हुए जन्मता है, फरियाद करते हुए जीता है निराश होकर मरता है, इसके पीछे क्या कारण है।"
ऋषि ने उत्तर दियाः "प्रश्न तो बढ़िया है, मानवमात्र का मंगल करने वाला है। मनुष्य का वास्तविक सुखस्वभाव, चेतनस्वभाव अकालपुरुष से स्फुरित है। जैसे हर तरंग का मूल स्थान पानी है, ऐसे ही हर जीव का मूल स्थान सच्चिदानंद चैतन्य आत्मा है। वह उस आत्मदेव की प्रीति, आत्मदेव के ज्ञान से स्फुरित होता है। लेकिन बाहर के दृश्य जगत को, माया को सत्य मानकर यह पा लूँ, यह भोग लूँ, यह कर लूँ तो मैं सुखी हो जाऊँ, इस वहम से, इस नासमझी से जीव एक दुःख से दूसरे दुःख, दूसरे दुःख से तीसरे दुःख में भटकता रहता है।"
"तो इसका उपाय "
बोले, जिसके जीवन में बाह्य सुख और दुःख, बाह्य अनुकूलता और प्रतिकूलता का ज्यादा महत्व है, वह छोटे मन का आदमी है। लेकिन जो बाहर की अनुकूलता का बहुजनित में लगा देता है, प्रतिकूलता में सम रहता है, दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः। (गीताः 2.56) जो दुःख में उद्विग्न नहीं होता, सुख में आसक्ति नहीं रखता, ऐसा समत्वयोग को जानने वाला पुरुष सुख-दुःख के बीच के सत्तास्वरूप साक्षी चैतन्य में टिकता है, वह बाजी मार लेता है।
सत्संग के बिना एक तो कान के द्वारों से संसार घुसता है, दूसरा आँख के दरवाजों से घुसता है। आँख से कम कान से ज्यादा घुसता है। किसी की निंदा कान से सुनकर उसके प्रति नफरत हो जाती है। किसी स्थान की प्रशंसा कान से सुनकर उससे आसक्ति हो जाती है। नफरत और आसक्ति हमारी आध्यात्मिक उन्नति में खलबली करती रहती है। जैसे पानी में उठ रही तरंग-पर-तरंग शांत पानी की गहराई नहीं देखने देती हैं, ऐसे ही जीव शांत, सुखस्वरूप, चेतनस्वरूप है लेकिन अनुकूलता के लिए तड़प और प्रतिकूलता से भागाभागी की दौड़ में जीव का हौसला खो गया है। भगवदाश्रय, सत्संग का आश्रय लेने से खोये हुए हौंसले को फिर पा सकते हैं।
दक्ष ने बाहर की सफलता को सर्वोपरि माना। हालाँकि दक्ष कोई साधारण राजा नहीं था, कई लोकपालों का अध्यक्ष था। कई राजे-महाराजे जिनके अधीन रहें, ऐसे लोकपालों का भी परम अध्यक्ष और भगवान शिवजी का ससुर था। फिर भी बाहर की चीजों को महत्व दिया और अंतरात्मा में गोता मारने से विमुख हो गया तो दक्ष की सारी करी-कमाई चौपट हो गयी, यज्ञ-विध्वंस हुआ, सिर कटा और बकरे का सिर लगा। अभी भी शिवालय में लोग बैं-बैं... करके याद दिलाते हैं कि ईश्वर की प्रीति के बिना, ईश्वर की शांति के बिना तुम बाहर कितनी भी मैं-मैं... करोगे, आखिर थक के संसार से रवाना हो जाओगे।
हमारे लिए माँ के शरीर में दूध बनाने की सत्ता उसी की है। माँ की जेर से नाभि जोड़ने की सत्ता, करुणा उसी की है। उस परमात्मा के चिंतन से हमारी बुद्धि से परमात्म-रस, परमात्म-ज्ञान, परमात्म-समता आ जाय तो हम संसार में आसानी से सफल हो सकते हैं।
राजा उत्तानपाद की दो पत्नियाँ थीं, सुरुचि और सुनीति। ध्रुव की माँ थी सुनिती। जो सामने दिखे मन उसके लिए ललक जाय और आगे-पीछे का विचार किये बिना उसके पीछे लग जाय, वह है सुरुचि। आज के जमाने में सुरुचि की दौड़ में लोग बड़े परेशान हो रहे हैं। अनिद्रा का रोग, आत्महत्या की मुसीबत, प्रेमी-प्रेमिकाओं को एड्स, यह सब सुरुचि का ही परिवार है। जिसमें रुचि हुई, वह कैसे भी करके करने लगो। चोरी, बेईमानी, कपट कुछ भी करके रुचि के अनुसार पाओ, खाओ, मजा करो - यह दुःख का कारण है। परिणाम का विचार करके और परिणामों को सफलता देने वाले परमात्मा में गोता मारकर निर्णय करना, भोगना या पाना यह हो गयी सुमति।
सुमति की धनी सुनिती का बेटा ध्रुव था और सुरुचि का बेटा उत्तम था। सुरुचि के जीवन में कलह, अशांति रही और उसके पुत्र के जीवन में भी देख लो। वह यक्षों से मारा गया, राजपाट चला गया। सुनिती के बेटे ध्रुव को भगवान के प्यारे संत नारदजी का सत्संग मिला, भगवन्नाम की दीक्षा मिली। सुनिती के पुत्र की मति सुमति हुई, राज्य  भी अच्छी तरह से सँभाला और ब्रह्मज्ञान भी पाया। जहाँ सुरुचि है वहाँ आदमी एक दुःख से निकलता है तो दूसरे दुःख आता है तो भी उसकी शक्ति बढ़ाता है। सुमतिवाला दुःख का भोगी न बनकर दुःखहारी में अपनी गति-प्रीति बढ़ाता है। उसका दुःख भी तपस्या और समता का सुख-साधन बन जाता है। सुमतिवाले के पास दुःख भी साधन बन जाता है और सुख भी साधन बन जाता है। सुरुचिवाले को सुख भोग-विलास करा के खोखला बना देता है और दुःख दूसरों पर दोषारोपण व राग-द्वेष करा के और भी कमजोर कर देता है, रागी-द्वेषी-मोही बना देता है। सुख-दुःख तो सभी के जीवन में आते हैं लेकिन सुमति वाला इनका सदुपयोग करके परमात्मा तक पहुँचता है और सुरुचिवाला इनमें उलझकर खप जाता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 227
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मंगलवार, 15 नवंबर 2011

परिप्रश्नेन.... (1)



प्र. – पतन किसका नहीं होता ?
उ. – वशीभूत अंतःकरण वाला पुरूष राग-द्वेष से रहित और अपनी वशीभूत इन्द्रियों के द्वारा विषयों का आचरण करता हुआ भी प्रसन्नता को प्राप्त होता है। वह उनमें लेपायमान नहीं होता। उसका पतन नहीं होता। जिसका चित्त और इन्द्रियाँ वश में नहीं है वह चुप होकर बैठे तो भी संसार का चिन्तन  करेगा। ज्ञानी संसार में बैठे हुए भी अपने स्वरूप में डटे रहते हैं।
भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. श्रीराधाकृष्णन् अच्छे चिन्तक माने जाते हैं। उन्होंने एक कहानी लिखी हैः
एक भठियारा था। उसको हर रोज स्वप्न आता कि मैं चक्रवर्ती सम्राट हूँ। वह अपना काम निपटाकर जल्दी-जल्दी सो जाता उस मधुर स्वप्नलोक में जाने के लिए। बाहर के जगत में वह भठियारा था। खाने-पीने को भी पर्याप्त नहीं था। गुजारा चलाने के लिए बड़ा परिश्रम करना पड़ता था। लेकिन धीरे-धीरे वह स्वप्न में सुखी होने लगा तो बाहर के जगत में रूचि कम होने लगी।
प्रतिदिन स्वप्न में देखता कि मैं चक्रवर्ती सम्राट बन गया हूँ। छोटे-छोटे राजा लोग मेरी आज्ञा में चलते हैं। छनन-छनन करते हीरे, जवाहरात के गहनों से सजी ललनाएँ चँवर डुला रही हैं।
एक दिन स्वप्न में वह बाथरूम जाने उठा तो पास में जलती हुई भट्ठी में पैर पड़ गया। जलन के मारे चिल्ला उठा। सो तो रहा था भट्ठियों के बीच लेकिन स्वप्न देख रहा था कि सम्राट है, इसलिए वह सुखी था।
किसी भी परिस्थिति में आदमी का मन जैसा होता है, सुख-दुःख उसे वैसे ही प्रतीत होते हैं। ज्ञानी का मन परब्रह्म में होता है तो वे संसार में रहते हुए, सब व्यवहार करते हुए भी परम सुखी हैं, ब्रह्मज्ञान में मस्त हैं।
आदमी का शरीर कहाँ है इसका अधिक मूल्य नहीं है। उसका चित्त कहाँ है इसका अधिक मूल्य है। मंदिर में बैठा है पुजारी। सोच रहा है कि कब बारह बजें और लड्डू लेकर पुजारिन के पास जाऊँ। तो वह मंदिर में नहीं है, पुजारिन के पास है। चित्त परमात्मा में है और आप संसार में रहते हैं तो आप संसार में नहीं हैं, परमात्मा में हैं।
प्रभातकाल में उठो तब आँख बन्द करके ऐसा चिन्तन करो कि मैं गंगाकिनारे पर गया। पवित्र गंगामैया में गोता लगाया। किसी संत के चरणों में सिर झुकाया। उन्होंने मुझे मीठी निगाहों से निहारा।
पाँच मिनट ऐसा मधुर चिन्तन करो, आपका हृदय शुद्ध होने लगेगा, भाव पवित्र होने लगेगा।
सुबह उठकर देखे हुए सिनेमा के दृश्य याद आयेः 'आहाहा... वह मेरे पास आयी, मुझसे मिली.....' आदि आदि। तो देखो, सत्यानाश हो जायगा। कल्पना तो मन से होगी लेकिन तन पर भी प्रभाव पड़ जायगा। कल्पना में कितनी शक्ति है !
संत-महात्मा-सदगुरू-परमात्मा के साथ विचरते हैं, समाधि लगाते हैं, उनका स्मरण-चिन्तन करते हैं तो हृदय आनन्दित होता है।

स्रोतः- ......पूज्य गुरुदेव के सत्संग से 

शनिवार, 5 नवंबर 2011

भोगों से वैराग्य


"इन मल-मूत्र से भरे स्थानों के लिए मैं काम से अंधा हो रहा हूँ ! इन गंदे अंगों के पीछे मैं अपनी जिंदगी तबाह किये जा रहा हूँ !"
आंध्र प्रदेश में एक धनाढय सेठ का छोटा पुत्र वेमना माता-पिता की मृत्यु के बाद अपने भैया और भाभी की छत्रछाया में पला-बढ़ा। उसकी भाभी लक्ष्मी उसे माँ से भी ज्यादा स्नेह करती थी। वह जितने रूपये माँगता उतने उसे भाभी से मिल जाया करते। बड़ा भाई तो व्यापार में व्यस्त रहने लगा और छोटा भाई वेमना खुशामदखोरों के साथ घूमने लगा। उनके साथ भटकते-भटकते एक दिन वह वेश्या के द्वार तक पहुँच गया। वेश्या ने भी देखा कि ग्राहक मालदार है। उसने वेमना को अपने मोहपाश में फँसा लिया और कुकर्म के रास्ते चल पड़ा।
अभी वेमना की उम्र केवल 16-17 साल की ही थी। वेश्या जो-जो माँगें उसके आगे रखती, भाभी से पैसे लेकर वह उन्हें पूरी कर देता। एक बार उस वेश्या ने हीरे-मोतियों से जड़ा हार, चूड़ियाँ और अँगूठी माँगी।
वेमना उस वेश्या के मोहपाश में पूरी तरह बँध चुका था। उसने रात को भाभी के गहने उतार लिये। भाभी ने देख के अनदेखा कर दिया। कुछ दिनों बाद वेमना ने भाभी का मँगलसूत्र उतारने की कोशिश की, तब भाभी ने पूछाः "सच बता, तू क्या करता है ? पहले के गहने कहाँ गये ?" सच्चाई जानकर भाभी रो पड़ी। सोचने लगी कि 'इतनी सी उम्र में ही यह अपना तेज बल सब नष्ट कर रहा है।'
किंतु भाभी कोई साधारण महिला नहीं थी, सत्संगी थी। उसने देवर को गलत रास्ते जाने से रोकने के लिए डाँट-फटकार की जगह विचार का सहारा लिया और देवर के जीवन में भी सदविचार आ जाय – ऐसा प्रयत्न किया। उसने एक शर्त रखकर वेमना को जेवर दियेः
"बेटा ! वह तो वेश्या ठहरी। तू जैसा कहेगा, वैसा ही करेगी। उसे कहना कि 'तू नग्न होकर सिर नीचे करक और अपने घुटनों के बीच से हाथ निकालकर पीछे से ले, तब मैं तुझे गहने दूँगा।' जब वह इस तरह तेरे से गहने लेने लगे तब तू काली माता का स्मरण करके उनसे प्रार्थना करना कि हे माँ ! मुझे विचार दो, भक्ति दो। मुझे कामविकार से बचाओ।"
दूसरे दिन वेमना की शर्त के अनुसार जब वेश्या गहने लेने लगी, तब वेमना ने माँ काली से सदबुद्धि के लिए प्रार्थना की। भाभी की शुभ भावना और माँ काली की कृपा से वेमना का विवेक जाग उठा कि 'इन मल-मूत्र से भरे स्थानों के लिए मैं काम से अंधा हो रहा हूँ। इन गंदे अंगों  पीछे मैं अपनी जिंदगी तबाह किये जा रहा हूँ....' यह विचार आते ही वेमना तुरन्त गहने लेकर भाभी के पास आया और भाभी के चरणों में गिर पड़ा। भाभी ने वेमना का और भी मार्गदर्शन किया।
वेमना मध्यरात्रि में ही माँ काली के मंदिर में चला गया और सच्चे हृदय से प्रार्थना की। उसकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर माँ काली ने उसे योग की दीक्षा दे दी और माँ के बताये निर्देश के अनुसार वह लग गया योग-साधना में। उसकी सुषुप्त शक्तियाँ जागृत होने लगीं और कुछ सिद्धियाँ भी आ गयीं। अब वेमना वेमना न रहा, योगिराज वेमना होकर प्रसिद्ध हो गया। उनके सत्संग से 'वेमना योगदर्शनम्' और 'वेमना तत्त्वज्ञानम्' – ये दो पुस्तकें संकलित हुई। आज भी आंध्र प्रदेश के भक्त लोग इन पुस्तकों को पढ़कर योग और ज्ञान के रास्ते पर चलने की प्रेरणा पाते हैं।
कहाँ तो वेश्या के मोह में फँसने वाला वेमना और कहाँ करूणामयी भाभी ने सही रास्ते पर लाने का प्रयास किया, माँ काली से दीक्षा मिली, चला योग व ज्ञान के रास्ते पर और भगवदीय शक्तियाँ पा लीं, भगवत्साक्षात्कार कर लिया एवं कइयों को भगवान के रास्ते पर लगाया। कई व्यसनी-दुराचारियों के जीवन को तार दिया। जिससे वे संत वेमना होकर आज भी पूजे जा रहे हैं।

आश्रम से प्रकाशित पुस्तक "अपने रक्षक आप" से लिया गया प्रसंग 
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सोमवार, 24 अक्टूबर 2011

महालक्ष्मी को कैसे बुलायें ?



लक्ष्मी चार प्रकार की होती है। एक होता है वित्त, दूसरा होता है धन, तीसरी होती है लक्ष्मी और चौथी होती है महालक्ष्मी जिस धन से भोग-विलास, आलस्य, दुराचार हो वह पापलक्ष्मी, अलक्ष्मी है।
 जिस धन से सुख-वैभव भोगा जाय वह वित्त है।
 जिस धन से सुख-वैभव भोगा जाय वह वित्त है।
 जिस धन से कुटुम्ब-परिवार को भी सुखी रखा जाय वह लक्ष्मी है और
 जिस धन से परमात्मा की सेवा हो, परमात्म तत्त्व का प्रचार हो, परमात्म-शांति के गीत दूसरों के दिल में गुँजाये जायें वह महालक्ष्मी है।

 हम लोग इसीलिए महालक्ष्मी की पूजा करते हैं कि हमारे घर में जो धन आये, वह महालक्ष्मी ही आये। महालक्ष्मी नारायण से मिलाने का काम करेगी। जो नारायण के सहित लक्ष्मी है, वह कुमार्ग में नहीं जाने देती। वह धन कुमार्ग में नहीं ले जायेगा, सन्मार्ग में ले जायेगा। धन में 64 दोष हैं और 16 गुण हैं, ऐसा वसिष्ठजी महाराज बोलते हैं।
सनातन धर्म ऐसा नहीं मानता है कि धनवानों को ईश्वर का द्वार प्राप्त नहीं होता, धनवान ईश्वर को नहीं पा सकते। अपने शास्त्रों के ये दृष्टान्त हैं कि जनक राजा राज्य करते थे, मिथिला नरेश थे और आत्मसाक्षात्कारी थे। भगवान राम जिनके घर में प्रकट हुए, वे दशरथ राजा राज्य करते थे, धनवान थे ही। जो सत्कर्मों में लक्ष्मी को लुटाता है, खुले हाथ पवित्र कार्यों में लगाता है उसकी लक्ष्मी कई पीढ़ियों तक बनी रहती है, जैसे राजा दशरथ, जनक आदि के जीवन में देखा गया। 22 पीढ़ियाँ चली जनक की, 22 जनक हो गये।
दीपावली में लक्ष्मी पूजन की प्रथा देहातों में भी है, शहरों में भी है। इस पर्व में जो व्यक्ति लक्ष्मी और तुलसी का आदर पूजन करेगा, वह धन-धान्य तथा आरोग्य पाकर सुखी रहेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, नवम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 8, अंक 215
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शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

विवेकसम्पन्न पुरुष की महिमा


 (श्री योगवाशिष्ठ महारामायण)

श्री वशिष्ठजी बोले: "रघुकुलभूषण श्रीराम ! जब संसार के प्रति वैराग्य सुदृढ़ हो जाता है, सत्पुरुषों का सान्निध्य प्राप्त हो जाता है, भोगों की तृष्णा नष्ट हो जाती है, पाँचों विषय नीरस भासने लगते हैं, शास्त्रों के ’तत्त्वमसि’ आदि महावाक्यों का यथार्थ बोध हो जाता है, आनन्दस्वरुप आत्मा की अपरोक्षानुभूति हो जाती है, ह्रदय में आत्मोदय की पूर्ण भावना विकसित हो जाती है तब विवेकी पुरुष एकमात्र आत्मानन्द मेंरममाण रहता है और अन्य भोग-वैभव, धन-सम्पत्ति को जूठी पत्तल की तरह तुच्छ समझकर उनसे उपराम हो जाता है ।

ऎसे विवेक-वैराग्यसम्पन्न पुरुष एकान्त स्थानों में या लोकाकीर्ण नगरों में, सरोवरों में, वनों में या उद्यानों में, तीर्थो में या अपने घरों में, मित्रों की विलासपूर्ण क्रीड़ाओं में या उत्सव-भोजनादि समारम्भों में एवं शास्त्रों की तर्कपूर्ण चर्चाओं में आसक्ति न होने से कहीं भी लम्बे समय तक रुकते नहीं । कदाचित कहीं रुकें तो तत्त्वज्ञान का ही अन्वेषण करते हैं । वे विवेकी पुरुष पूर्ण शांत, इन्द्रियनिग्रही, स्वात्मारामी, मौनी और एकमात्र विज्ञानस्वरुप ब्रह्म का ही कथन करनेवाले होते हैं । अभ्यास और वैराग्य के बल से वे स्वयं परमपदस्वरुप परमात्मा में विश्रांति पा लेते हैं । वे मनोलय की पूर्ण अवस्था में आरुढ़ हो जाते हैं । जिस प्रकारह्रदयहीन पत्थरों को दूध का स्वाद नहीं आता, उसी प्रकार इन अलौकिक पुरुषों को विषयों में रस नहीं आता ।

जिस प्रकार दीपक अन्धकार का नाश करता है, उसी प्रकार विवेक-ज्ञानसम्पन्न महापुरुष अपने ह्रदयस्थित अज्ञानरुपी अन्धकार का नाश कर देते हैं, बाहर के राग-द्वेष, शोक-भय आदि दूर हटा देते हैं । जिनमेंतमोगुण का सर्वथा अभाव है, जो रजोगुण से रहित हैं, सत्त्वगुण से भी पार हो चुके हैं वे महापुरुष गगनमण्डल में सूर्य के समान हैं, साक्षात परमात्मस्वरुप हैं । सर्व जीव, प्राणी, समग्र चराचर सृष्टि स्वेच्छानुसारउपहार प्रदान करके उन आनन्दस्वरुप आत्मदेव की ही निरन्तर पूजा करते हैं । अनेक जन्मों तक जब ये आत्मदेव पूजित होते हैं तब वे अपने पुजारी पर प्रसन्न होते हैं । प्रसन्न बने हुए ये देवाधिदेव महेश्वररुपआत्मा पूजा करनेवाले की शुभ कामना से उसे ज्ञान प्रदान करने के लिये अपने पावन दूत को प्रेरित करते हैं ।”

श्री रामजी ने पूछा : "ब्रह्मन ! परमेश्वररुप आत्मा कौन-से दूत को प्रेरित करते हैं और वह दूत किस प्रकार ज्ञानोपदेश देता है ? "

श्री वशिष्ठजी बोले : " रामभद्र ! आत्मा जिस दूत को प्रेरित करता है उसका नाम है विवेक । वह सदा आनन्द देनेवाला है । अधिकारी पुरुष की ह्रदयरुपी गुफा में वह दूत ऎसे स्थित हो जाता  है मानों निर्मल आकाश में चन्द्रमा । विवेक ही वासनायुक्त अज्ञानी जीव को ज्ञान प्रदान करता है और धीरे-धीरे संसार-सागर से उसका उद्धार कर देता है ।

यह ज्ञानस्वरुप अन्तरात्मा ही सबसे बड़े परमेश्वर हैं । वेदसम्मत जो प्रणव है, ॐ है वह उन्हींका बोधक शुभ नाम है । नर-नाग, सुर-असुर ये सब जप, होम, तप, दान, पाठ, यज्ञ और कर्मकाण्ड के द्वार नित्यउन्हींको प्रसन्न करते हैं । चिन्मय होने से वे ही सर्वत्र विचरण करते हैं, जागते हैं, और देखते हैं । वे सर्वव्यापक हैं । ये चिदात्मा ही विवेकरुपी दूत को प्रेरित करके उसके द्वारा चित्तरुपी पिशाच को मारकर जीव को अपने दिव्य अनिर्वचनीय पद तक पहुँचा देते हैं ।

अतः तमाम संकल्प-विकल्प, विकार तथा अर्थसंकटों को छोड़कर अपने पुरुषार्थ से उन चिदात्मा को प्रसन्न कर लेना चाहिए । ज्ञानरुपी चिदात्म-सूर्य का उदय होते ही संसाररुपी रात्रि में विचरता हुआ मनरुपी पिशाच नष्ट हो जायेगा । काम-क्रोधादि छः ऊर्मिरुपी कालिमा बिखर जायेगी । जीवन का मार्ग पूर्ण प्रकाशित, आनन्दमय हो जायेगा । मनुष्य जन्म सार्थक हो जायेगा । 

ॐ आनन्द ....

आश्रम से प्रकाशित पुस्तक "मन को सीख" से लिया गया प्रसंग
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ