मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

रविवार, 16 अक्टूबर 2011

जीवन


जीवन जीवत्व से ब्रह्मत्व की ओरि विकास की एक प्रक्रिया है।
हे मानव ! इस असार संसार की मिथ्या दौड़ धूप में कब तक दुःखी होना है ? नहाना, धोना, खाना-पीना, रोटी के लिए परिश्रम करना, निद्राधीन होना और वंशवृद्धि करना... यह कोई जीवन की सार्थकता नहीं है। जीवन की सार्थकता तो है अपने आपको जानने में।
रोटी के टुकड़ों की फिकर नहीं करो। जिसने जीवन दिया है वही अनाज भी देगा ही। फिकर करना ही हो तो इस बात की करो कि संसार के बन्धन से मुक्ति कैसे हो।
अपने लिए तो सब जीते हैं। दूसरों के लिए जो जीते हैं उनका जीवन धन्य है।
जीवन में प्रेम ही बाँटो, सुख ही बाँटो, दुःख न बाँटो। प्रेम और सुख बाँटोगे तो बदले में वे ही वापस आकर मिलेंगे। उसे कोई रोक नहीं सकता। .....हाँ बदले की अपेक्षा न रखो।
लोगों को अच्छा लगे इसलिए महँगे वस्त्र पहनना, उस ढंग से जीना यह तो लोगों की गुलामी हुई। लोग हमारे स्वामी हुए। वे हमारे भोक्ता हुए और हम उनके भोग्य हुए। लोग क्या कहेंगे ? लोगों को क्या अच्छा लगेगा ? अरे पागल ! यह नहीं सोचता कि लोकेश्वर को क्या अच्छा लगेगा ? सदगुरु को क्या अच्छा लगेगा ? शरीर को स्वस्थ रखने मात्र के लिए वस्त्रादि होना ठीक है लेकिन उसी में अधिक समय खर्चना, पूरी वृत्ति को लगाना यह जीवनदाता का घोर अपमान है।
बुद्धि रूपी स्त्री भीतर सोये हुए आत्मा रूपी स्वामी को छोड़कर बाह्य पदार्थों रूपी परदेसियों के साथ व्यवहार करती है। प्रेम स्वरूप परमात्मा को छोड़कर परदेसी को प्यार करने जाती है। विषयसुख भोगकर क्षणिक सुखाभास मिलता है लेकिन वह सुखाभास जीवन को अन्धकारमय कन्दरा में ही ले जाता है।
जगत के लोगों को खुश किये लेकिन आत्मदेव खुश नहीं हुए तो क्या खुशी मिली, खाक ? नाते-रिश्तेदारों को प्रसन्न किया लेकिन परमात्मा प्रसन्न नहीं हुए तो क्या प्रसन्नता मिली, खाक ? नश्वर चीजें इकट्ठी करने में जीवन खर्च दिया लेकिन आत्मधन नहीं मिला तो क्या कमाई की, खाक ?
जो शाश्वत है उस परम तत्त्व को जान लो। आप कहेंगेः हम तो गृहस्थ हैं। मैं कहता हूँ कि संन्यासी को योग की जितनी आवश्यकता है उससे ज्यादा आवश्यकता गृहस्थी को है। अपने जीवन को ऋषि जीवन बनाओ। योग के बल से अनेकों की जिन्दगियाँ बदल गई हैं तो तुम्हारी क्यों नहीं बदल सकती ? तुम अंशतः गुमराह हुए हो। यह गलती दूर करनी पड़ेगी। धन्य है उस वैदिक धर्म को कि जिसके कारण भारत जगत का गुरु बना है और भविष्य में भी बना रहेगा। लेकिन.... हमको जागना होगा। खड़ा होना पड़ेगा। जीवन आत्म-साक्षात्कार के लिए मिला है। यही समझाने के लिए विविध आध्यात्मिक उत्सवों की रचना की गई है।
आप अपने दिल की डायरी में सुवर्ण अक्षरों से लिखकर रखें कि प्रकृति में जो कुछ घटना घटती है वह जीव को अपने शिवस्वरूप की ओर ले जाने के लिए ही घटती है।
अपना हृदय विशाल रखो। अपने हृदय को सँभालो। कोई गिरता हो तो उसे थाम लो।
विषय-सेवन विष है, त्याग और संयम अमृत है। क्रोध विष है, क्षमा अमृत है। कुटिलता विष है, सरलता अमृत है। क्रूरता विष है, करूणा अमृत हे। देहाभिमान विष है, आत्मज्ञान अमृत है।
ऐसा कोई आदमी नहीं कि जिसको जीवन में सदा अनुकूलता मिलती रहे। ऐसा कोई आदमी नहीं कि जिसको सदा प्रतिकूलता मिलती रहे। ऐसा कोई आदमी नहीं कि जिसका सदा यश होता रहे या सदा अपयश होता रहे
आश्रम से प्रकाशित पुस्तक "ऋषि प्रसाद" से लिया गया प्रसंग 
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शनिवार, 15 अक्टूबर 2011

मृत्यु ...........


मौत से मनुष्य डरता है, जीवन में पग पग पर छोटी मोटी परिस्थितियों से घबरा उठता है। ऐसा भयभीत जीवन भी कोई जीवन है ? जहाँ पग पग पर मृत्यु का भय प्रकम्पित करता रहे ? ऐसा नीरस जीवन, भयपूर्ण जीवन मौत से भी बदतर है। ऐसा जीवन जीने में कोई सार नहीं। यह जीवन जीवन नहीं है। इसलिए कहता हूँ कि असली जीवन जीना हो, निर्भय जीवन जीना हो तो फकीरी मौत को एक बार जान लो।
मौत तो इतनी प्यारी है कि उसे यदि आमंत्रित किया जाय तो अमृतमय जीवन के द्वार खोल देती है।
एक ऐसी जगह है जहाँ मौत की पहुँच नहीं, जहाँ मौत का कोई भय नहीं, जिसमें मौत भी भयभीत होती है-उस जगह पर हम बैठे हैं। तुम चाहो तो तुम भी बैठ सकते हो।
मौत तो एक पड़ाव है, एक विश्रान्तिस्थान है। उससे भय कैसा ? यह तो प्रकृति की एक व्यवस्था है।
स्थूल शरीर से सूक्ष्म शरीर का वियोग, जिसको मृत्यु कहा जाता है वह विश्रामस्थल तो है परन्तु पूर्ण विश्रान्ति उसमें भी नहीं है। यह फकीरी मौत नहीं है। फकीरी मौत तो वह है जिसमें सारी वासनाएँ जड़ सहित भस्म हो जाय।
दिन के भारी काम से थका हुआ मनुष्य जैसे नींद की चाह करता है उसी प्रकार समझदार व्यक्ति मृत्यु से भय न रखकर उसे समझपूर्वक आमंत्रित करके आत्मा में आराम पाता है।
फकीरी मौत ही असली जीवन है। फकीरी मौत अर्थात् स्वयं के अहं की मृत्यु.... स्वयं के जीवभाव की मृत्यु..... मैं देह हूँ, मैं जीव हूँ, इस परिच्छिन्न भाव की मृत्यु... स्वयं की सूक्ष्म वासनाओं की मृत्यु।
एक बार फकीरी मौत में डूबकर बाहर आ जाओ। फिर देखो कि संसार का कौन-सा भय तुम्हें भयभीत कर सकता है। तुम शाहों के शाह हो।
हमारी भूल यह है कि अवस्थाएँ बदलने को हम अपना बदलना मान लेते हैं। वस्तुतः न तो हम जन्मते और न मरते हैं और न ही हम बालक, किशोर, प्रौढ़ और वृद्ध बनते हैं। ये सब हमारी देह के धर्म हैं और हम देह नहीं हैं।
मौत के बाद अपने सब पराये हो जाते हैं। तुम्हारा शरीर भी पराया हो जाता है लेकिन तुम्हारी आत्मा आज तक परायी नहीं हुई।
मौत से भी मौत का भय खराब है। मौत आ जाय यह ठीक है, लेकिन मौत से सदैव भयभीत रहना ठीक नहीं। क्योंकि भय में से ही सारे पाप पैदा होते हैं। भय ही मृत्यु है।
यदि हमने शरीर के साथ अहंबुद्धि की तो हम में भय व्याप्त हो ही जायगा, क्योंकि शरीर की मृत्यु निश्चित है। उसका परिवर्तन अवश्यंभावी है। उसको तो स्वयं ब्रह्माजी भी नहीं रोक सकते। यदि हमने अपने आत्मस्वरूप को जान लिया, स्वरूप में हमारी निष्ठा हो गई तो हम निर्भय हो गये, क्योंकि स्वरूप की मृत्यु होती नहीं। मौत भी उससे डरती है।
यदि मौत पर विजय प्राप्त करनी हो, जीवन को सही तरीके से जीना हो, तो फकीरों के कहे अनुसार आसन करो, प्राणायाम करो, ध्यान करो, योग करो, आत्मचिन्तन करो और ऐसा पद प्राप्त कर लो कि जहाँ मृत्यु की पहुँच नहीं है।
"..आश्रम से प्रकाशित पुस्तक ऋषि प्रसाद से लिया गया प्रसंग.."
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बुधवार, 5 अक्टूबर 2011

बिना मुहूर्त के मुहूर्त (पूज्य बापू जी के सत्संग से)

(विजयादशमीः 6 अक्तूबर 2011)
विजयादशमी का दिन बहुत महत्त्व का है और इस दिन सूर्यास्त के पूर्व से लेकर तारे निकलने तक का समय अर्थात् संध्या का समय बहुत उपयोगी है। रघु राजा ने इसी समय कुबेर पर चढ़ाई करने का संकेत कर दिया था कि 'सोने की मुहरों की वृष्टि करो या तो फिर युद्ध करो।' रामचन्द्रजी रावण के साथ युद्ध में इसी दिन विजयी हुए। ऐसे ही इस विजयादशमी के दिन अपने मन में जो रावण  के विचार हैं काम, क्रोध, लोभ, मोह, भय, शोक, चिंता – इन अंदर के शत्रुओं को जीतना है और रोग, अशांति जैसे बाहर के शत्रुओं पर भी विजय पानी है। दशहरा यह खबर देता है।
अपनी सीमा के पार जाकर औरंगजेब के दाँत खट्टे करने के लिए शिवाजी ने दशहरे का दिन चुना था – बिना मुहूर्त के मुहूर्त ! (विजयादशमी का पूरा दिन स्वयंसिद्ध मुहूर्त है अर्थात इस दिन कोई भी शुभ कर्म करने के लिए पंचांग-शुद्धि या शुभ मुहूर्त देखने की आवश्यकता नहीं रहती।) इसलिए दशहरे के दिन कोई भी वीरतापूर्ण काम करने वाला सफल होता है।
वरतंतु ऋषि का शिष्य कौत्स विद्याध्ययन समाप्त करके जब घर जाने लगा तो उसने अपने गुरुदेव से गुरूदक्षिणा के लिए निवेदन किया। तब गुरुदेव ने कहाः वत्स ! तुम्हारी सेवा ही मेरी गुरुदक्षिणा है। तुम्हारा कल्याण हो।'
परंतु कौत्स के बार-बार गुरुदक्षिणा के लिए आग्रह करते रहने पर ऋषि ने क्रुद्ध होकर कहाः 'तुम गुरूदक्षिणा देना ही चाहते हो तो चौदह करोड़ स्वर्णमुद्राएँ लाकर दो।"
अब गुरुजी ने आज्ञा की है। इतनी स्वर्णमुद्राएँ और तो कोई देगा नहीं, रघु राजा के पास गये। रघु राजा ने इसी दिन को चुना और कुबेर को कहाः "या तो स्वर्णमुद्राओं की बरसात करो या तो युद्ध के लिए तैयार हो जाओ।" कुबेर ने शमी वृक्ष पर स्वर्णमुद्राओं की वृष्टि की। रघु राजा ने वह धन ऋषिकुमार को दिया लेकिन ऋषिकुमार ने अपने पास नहीं रखा, ऋषि को दिया।
विजयादशमी के दिन शमी वृक्ष का पूजन किया जाता है और उसके पत्ते देकर एक-दूसरे को यह याद दिलाना होता है कि सुख बाँटने की चीज है और दुःख पैरों तले कुचलने की चीज है। धन-सम्पदा अकेले भोगने के लिए नहीं है। तेन त्यक्तेन भुंजीथा....। जो अकेले भोग करता है, धन-सम्पदा उसको ले डूबती है।
भोगवादी, दुनिया में विदेशी 'अपने लिए – अपने लिए....' करते हैं तो 'व्हील चेयर' पर और 'हार्ट अटैक' आदि कई बीमारियों से मरते हैं। अमेरिका में 58 प्रतिशत को सप्ताह में कभी-कभी अनिद्रा सताती है और 35 प्रतिशत को हर रोज अनिद्रा सताती है। भारत में अनिद्रा का प्रमाण 10 प्रतिशत भी नहीं है क्योंकि यहाँ सत्संग है और त्याग, परोपकार से जीने की कला है। यह भारत की महान संस्कृति का फल हमें मिल रहा है।
तो दशहरे की संध्या को भगवान को प्रीतिपूर्वक भजे और प्रार्थना करे कि 'हे भगवान ! जो चीज सबसे श्रेष्ठ है उसी में हमारी रूचि करना।' संकल्प करना कि'आज प्रतिज्ञा करते हैं कि हम ॐकार का जप करेंगे।'
'' का जप करने से देवदर्शन, लौकिक कामनाओं की पूर्ति, आध्यात्मिक चेतना में वृद्धि, साधक की ऊर्जा एवं क्षमता में वृद्धि और जीवन में दिव्यता तथा परमात्मा की प्राप्ति होती है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 9, अंक 225
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मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

कार्तिक मास की महिमा


(कार्तिक मास व्रतः 12 अक्तूबर से 10 नवम्बर 2010)
सूतजी ने महर्षियों से कहाः पापनाशक कार्तिक मास का बहुत ही दिव्य प्रभाव बतलाया गया है। यह मास भगवान विष्णु को सदा ही प्रिय तथा भोग और मोक्षरूपी फल प्रदान करने वाला है।
हरिजागरणं प्रातः स्नानं तुलसिसेवनम्।
उद्यापनं दीपदानं व्रतान्येतानि कार्तिके।।
'रात्रि में भगवान विष्णु के समीप जागरण, प्रातःकाल स्नान करना, तुलसी के सेवा में संलग्न रहना, उद्यापन करना और दीप दान देना – ये कार्तिक मास के पाँच नियम हैं।'
पद्म पुराण, उ.खंडः 117.3
इन पाँचों नियमों का पालन करने से कार्तिक मास का व्रत करने वाला पुरुष व्रत के पूर्ण फल का भागी होता है। वह फल भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला बताया गया है।
मुनिश्रेष्ठ शौनकजी ! पूर्वकाल में कार्तिकेय जी के पूछने पर महादेवजि ने कार्तिक व्रत और उसके माहात्म्य का वर्णन किया था, उसे आप सुनिये।
महादेव जी ने कहाः बेटा कार्तिकेय ! कार्तिक मास में प्रातः स्नान पापनाशक है। इस मास में जो मनुष्य दूसरे के अन्न का त्याग कर देता है, वह प्रतिदिन कृच्छ्रव्रत1 का फल प्राप्त करता है।
1 इसमें पहले दिन निराहार रहकर दूसरे दिन पंचगव्य पीकर उपवास किया जाता है।
कार्तिक में शहद के सेवन, काँसे के बर्तन में भोजन और मैथुन का विशेषरूप से परित्याग करना चाहिए।
चन्द्रमा और सूर्य के ग्रहणकाल में ब्राह्मणों को पृथ्वीदान करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, वह फल कार्तिक में भूमि पर शयन करने वाले पुरुष को स्वतः प्राप्त हो जाता है।
कार्तिक मास में ब्राह्मण दम्पत्ति को भोजन कराकर उनका पूजन करें। अपनी क्षमता के अनुसार कम्बल, ओढ़ना-बिछौना एवं नाना प्रकार के रत्न व वस्त्रों का दान करें। जूते और छाते का भी दान करने का विधान है।
कार्तिक मास में जो मनुष्य प्रतिदिन पत्तल में भोजन करता है, वह 14 इन्द्रियों की आयुपर्यन्त कभी दुर्गति में नहीं पड़ता। उसे समस्त तीर्थों का फल प्राप्त हो जाता है तथा उसकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
पद्म पुराण, उ.खंडः अध्याय 120
कार्तिक में तिल दान, नदी स्नान, सदा साधु पुरुषों का सेवन और पलाश-पत्र से बनी पत्तल में भोजन मोक्ष देने वाला है। कार्तिक मास में मौनव्रत का पालन, पलाश के पत्तों में भोजन, तिलमिश्रित जल से स्नान, निरंतर क्षमा का आश्रय और पृथ्वी पर शयन – इन नियमों का पालन करने वाला पुरुष युग युग के संचित पापों का नाश कर डालता है।
संसार में विशेषतः कलियुग में वे ही मनुष्य धन्य हैं, जो सदा पितरों के उद्धार के लिए भगवान श्री हरि का सेवन करते हैं। वे हरिभजन के प्रभाव से अपने पितरों का नरक से उद्धार कर देते हैं। यदि पितरों के उद्देश्य से दूध आदि के द्वारा भगवान विष्णु को स्नान कराया जाय तो पितर स्वर्ग में पहुँचकर कोटि कल्पों तक देवताओं के साथ निवास करते हैं।
जो मुख में, मस्तक पर तथा शरीर पर भगवान की प्रसादभूता तुलसी को प्रसन्नतापूर्वक धारण करता है, उसे कलियुग नहीं छूता।
कार्तिक मास में तुलसी का पूजन महान पुण्यदायी है। प्रयाग में स्नान करने से, काशी में मृत्यु होने से और वेदों का स्वाध्याय करने से जो फल प्राप्त होता है, वह सब तुलसी के पूजन से मिल जाता है।
जो द्वादशी को तुलसी दल व कार्तिक में आँवले का पत्ता तोड़ता है, वह अत्यन्त निंदित नरकों में पड़ता है। जो कार्तिक में आँवले की छाया में बैठकर भोजन करता है, उसका वर्ष भर का अन्न-संसर्गजनित दोष (जूठा या अशुद्ध भोजन करने से लगने वाला दोष) नष्ट हो जाता है।
कार्तिक मास में दीपदान का विशेष महत्त्व है। 'पुष्कर पुराण' में आता हैः
'जो मनुष्य कार्तिक मास में संध्या के समय भगवान श्रीहरि के नाम से तिल के तेल का दीप जलाता है, वह अतुल लक्ष्मी, रूप, सौभाग्य एवं सम्पत्ति को प्राप्त करता है।'
यदि चतुर्मास के चार महीनों तक चतुर्मास के शास्त्रोचित नियमों का पालन करना सम्भव न हो तो एक कार्तिक मास में ही सब नियमों का पालन करना चाहिए। जो ब्राह्मण सम्पूर्ण कार्तिक मास में काँस, मांस, क्षौर कर्म (हजामत), शहद, दुबारा भोजन और मैथुन छोड़ देता है, वह चतुर्मास के सभी नियमों के पालन का फल पाता है।
(स्कन्द पुराण, नागर खण्ड, उत्तरार्ध)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2010, पृष्ठ संख्या 9,10 अंक 214
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सोमवार, 3 अक्टूबर 2011

वासना को हवा देते हैं ये स्थान..! रहें सावधान...


हिन्दू धर्मग्रंथो में जीवन में चार पुरुषार्थ का महत्व बताया गया है। ये हैं धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष। इनमें काम या भोग्य विषय-वस्तु के पीछे सकारात्मक पक्ष सृजन और गति है। इसलिए काम को योग के समान संयम और अनुशासन से अपनाने पर यशस्वी और सफल बनाने वाला माना गया है। किंतु भोग के रूप में असंयमित काम अपयश व असफलता देने वाला बताया गया है।

वहीं पौराणिक मान्यताओं में काम के स्वामी कामदेव को माना गया है। जिसे जगत के सृजन चक्र और गति को नियत करने की कामना से भगवान शंकर के तप भंग के लिये देवताओं द्वारा तैयार किया गया। जिसके परिणामस्वरूप भगवान शंकर द्वारा कामदेव भस्म हुआ। तब कामदेव की पत्नी रति की विनती पर भगवान शंकर द्वारा कामदेव को भाव रूप में प्रकृति और जीवो में वास करने की गति नियत की गई।

मुद्गल पुराण में इसी से जुड़े प्रसंग के मुताबिक जब शंकर के कोप से कामदेव जलकर शापित हुआ तो शापमुक्त होने के लिए कामदेव द्वारा श्री गणेश के ज्ञान-ब्रह्म स्वरूप महोदर का तप किया गया। तब भगवान महोदर द्वारा शिव के शाप की काट को असंभव बताया गया। लेकिन प्रकृति और जीव जगत में रहने के लिये कामदेव के लिए स्थान नियत किया गया।

भगवान महादेव द्वारा कामना या वासनाओं के प्रतीक कामदेव के रहने के लिये जिन विशेष स्थानों को बताया गया, वे इस प्रकार हैं -

लिखा गया है कि -

यौवनं स्त्री च पुष्पाणि सुवासानि महामते:। 
गानं मधुरश्चैव मृदुलाण्डजशब्दक:।। 
उद्यानानि वसन्तश्च सुवासाश्चन्दनादय:। 
सङ्गो विषयसक्तानां नराणां गुह्यदर्शनम्।
वायुर्मद: सुवासश्र्च वस्त्राण्यपि नवानि वै। 
भूषणादिकमेवं ते देहा नाना कृता मया।।

इस श्लोक  के मुताबिक इन स्थानों पर कामदेव वास करते हैं यानी इनके संपर्क में कामनाएं जागती हैं। ये हैं -

यौवन या सौंदर्य, स्त्री, फूल, गाना, परागकण या फूलों का रस, पक्षियों की मीठी आवाज, सुंदर बाग-बगीचा, बसन्त ऋतु, चन्दन, वासनाओं में लिप्त मनुष्य की संगति, छुपे अंगों के दर्शन, सुहानी और मन्द हवा, रहने का सुन्दर स्थान, नए कपड़े और आभूषण। 

इस पौराणिक बात के पीछे व्यावहारिक जीवन के लिये संकेत भी है कि चूंकि कामनाओं की अति मन को भटकाती है, इसलिए इन स्थान विशेष के संपर्क में आने पर संयम और अनुशासन बनाए रख मन को कमजोर होने से बचाएं। अन्यथा जीवन पतन की ओर जा सकता है।