मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

कार्तिक मास की महिमा


(कार्तिक मास व्रतः 12 अक्तूबर से 10 नवम्बर 2010)
सूतजी ने महर्षियों से कहाः पापनाशक कार्तिक मास का बहुत ही दिव्य प्रभाव बतलाया गया है। यह मास भगवान विष्णु को सदा ही प्रिय तथा भोग और मोक्षरूपी फल प्रदान करने वाला है।
हरिजागरणं प्रातः स्नानं तुलसिसेवनम्।
उद्यापनं दीपदानं व्रतान्येतानि कार्तिके।।
'रात्रि में भगवान विष्णु के समीप जागरण, प्रातःकाल स्नान करना, तुलसी के सेवा में संलग्न रहना, उद्यापन करना और दीप दान देना – ये कार्तिक मास के पाँच नियम हैं।'
पद्म पुराण, उ.खंडः 117.3
इन पाँचों नियमों का पालन करने से कार्तिक मास का व्रत करने वाला पुरुष व्रत के पूर्ण फल का भागी होता है। वह फल भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला बताया गया है।
मुनिश्रेष्ठ शौनकजी ! पूर्वकाल में कार्तिकेय जी के पूछने पर महादेवजि ने कार्तिक व्रत और उसके माहात्म्य का वर्णन किया था, उसे आप सुनिये।
महादेव जी ने कहाः बेटा कार्तिकेय ! कार्तिक मास में प्रातः स्नान पापनाशक है। इस मास में जो मनुष्य दूसरे के अन्न का त्याग कर देता है, वह प्रतिदिन कृच्छ्रव्रत1 का फल प्राप्त करता है।
1 इसमें पहले दिन निराहार रहकर दूसरे दिन पंचगव्य पीकर उपवास किया जाता है।
कार्तिक में शहद के सेवन, काँसे के बर्तन में भोजन और मैथुन का विशेषरूप से परित्याग करना चाहिए।
चन्द्रमा और सूर्य के ग्रहणकाल में ब्राह्मणों को पृथ्वीदान करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, वह फल कार्तिक में भूमि पर शयन करने वाले पुरुष को स्वतः प्राप्त हो जाता है।
कार्तिक मास में ब्राह्मण दम्पत्ति को भोजन कराकर उनका पूजन करें। अपनी क्षमता के अनुसार कम्बल, ओढ़ना-बिछौना एवं नाना प्रकार के रत्न व वस्त्रों का दान करें। जूते और छाते का भी दान करने का विधान है।
कार्तिक मास में जो मनुष्य प्रतिदिन पत्तल में भोजन करता है, वह 14 इन्द्रियों की आयुपर्यन्त कभी दुर्गति में नहीं पड़ता। उसे समस्त तीर्थों का फल प्राप्त हो जाता है तथा उसकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं।
पद्म पुराण, उ.खंडः अध्याय 120
कार्तिक में तिल दान, नदी स्नान, सदा साधु पुरुषों का सेवन और पलाश-पत्र से बनी पत्तल में भोजन मोक्ष देने वाला है। कार्तिक मास में मौनव्रत का पालन, पलाश के पत्तों में भोजन, तिलमिश्रित जल से स्नान, निरंतर क्षमा का आश्रय और पृथ्वी पर शयन – इन नियमों का पालन करने वाला पुरुष युग युग के संचित पापों का नाश कर डालता है।
संसार में विशेषतः कलियुग में वे ही मनुष्य धन्य हैं, जो सदा पितरों के उद्धार के लिए भगवान श्री हरि का सेवन करते हैं। वे हरिभजन के प्रभाव से अपने पितरों का नरक से उद्धार कर देते हैं। यदि पितरों के उद्देश्य से दूध आदि के द्वारा भगवान विष्णु को स्नान कराया जाय तो पितर स्वर्ग में पहुँचकर कोटि कल्पों तक देवताओं के साथ निवास करते हैं।
जो मुख में, मस्तक पर तथा शरीर पर भगवान की प्रसादभूता तुलसी को प्रसन्नतापूर्वक धारण करता है, उसे कलियुग नहीं छूता।
कार्तिक मास में तुलसी का पूजन महान पुण्यदायी है। प्रयाग में स्नान करने से, काशी में मृत्यु होने से और वेदों का स्वाध्याय करने से जो फल प्राप्त होता है, वह सब तुलसी के पूजन से मिल जाता है।
जो द्वादशी को तुलसी दल व कार्तिक में आँवले का पत्ता तोड़ता है, वह अत्यन्त निंदित नरकों में पड़ता है। जो कार्तिक में आँवले की छाया में बैठकर भोजन करता है, उसका वर्ष भर का अन्न-संसर्गजनित दोष (जूठा या अशुद्ध भोजन करने से लगने वाला दोष) नष्ट हो जाता है।
कार्तिक मास में दीपदान का विशेष महत्त्व है। 'पुष्कर पुराण' में आता हैः
'जो मनुष्य कार्तिक मास में संध्या के समय भगवान श्रीहरि के नाम से तिल के तेल का दीप जलाता है, वह अतुल लक्ष्मी, रूप, सौभाग्य एवं सम्पत्ति को प्राप्त करता है।'
यदि चतुर्मास के चार महीनों तक चतुर्मास के शास्त्रोचित नियमों का पालन करना सम्भव न हो तो एक कार्तिक मास में ही सब नियमों का पालन करना चाहिए। जो ब्राह्मण सम्पूर्ण कार्तिक मास में काँस, मांस, क्षौर कर्म (हजामत), शहद, दुबारा भोजन और मैथुन छोड़ देता है, वह चतुर्मास के सभी नियमों के पालन का फल पाता है।
(स्कन्द पुराण, नागर खण्ड, उत्तरार्ध)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2010, पृष्ठ संख्या 9,10 अंक 214
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सोमवार, 3 अक्टूबर 2011

वासना को हवा देते हैं ये स्थान..! रहें सावधान...


हिन्दू धर्मग्रंथो में जीवन में चार पुरुषार्थ का महत्व बताया गया है। ये हैं धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष। इनमें काम या भोग्य विषय-वस्तु के पीछे सकारात्मक पक्ष सृजन और गति है। इसलिए काम को योग के समान संयम और अनुशासन से अपनाने पर यशस्वी और सफल बनाने वाला माना गया है। किंतु भोग के रूप में असंयमित काम अपयश व असफलता देने वाला बताया गया है।

वहीं पौराणिक मान्यताओं में काम के स्वामी कामदेव को माना गया है। जिसे जगत के सृजन चक्र और गति को नियत करने की कामना से भगवान शंकर के तप भंग के लिये देवताओं द्वारा तैयार किया गया। जिसके परिणामस्वरूप भगवान शंकर द्वारा कामदेव भस्म हुआ। तब कामदेव की पत्नी रति की विनती पर भगवान शंकर द्वारा कामदेव को भाव रूप में प्रकृति और जीवो में वास करने की गति नियत की गई।

मुद्गल पुराण में इसी से जुड़े प्रसंग के मुताबिक जब शंकर के कोप से कामदेव जलकर शापित हुआ तो शापमुक्त होने के लिए कामदेव द्वारा श्री गणेश के ज्ञान-ब्रह्म स्वरूप महोदर का तप किया गया। तब भगवान महोदर द्वारा शिव के शाप की काट को असंभव बताया गया। लेकिन प्रकृति और जीव जगत में रहने के लिये कामदेव के लिए स्थान नियत किया गया।

भगवान महादेव द्वारा कामना या वासनाओं के प्रतीक कामदेव के रहने के लिये जिन विशेष स्थानों को बताया गया, वे इस प्रकार हैं -

लिखा गया है कि -

यौवनं स्त्री च पुष्पाणि सुवासानि महामते:। 
गानं मधुरश्चैव मृदुलाण्डजशब्दक:।। 
उद्यानानि वसन्तश्च सुवासाश्चन्दनादय:। 
सङ्गो विषयसक्तानां नराणां गुह्यदर्शनम्।
वायुर्मद: सुवासश्र्च वस्त्राण्यपि नवानि वै। 
भूषणादिकमेवं ते देहा नाना कृता मया।।

इस श्लोक  के मुताबिक इन स्थानों पर कामदेव वास करते हैं यानी इनके संपर्क में कामनाएं जागती हैं। ये हैं -

यौवन या सौंदर्य, स्त्री, फूल, गाना, परागकण या फूलों का रस, पक्षियों की मीठी आवाज, सुंदर बाग-बगीचा, बसन्त ऋतु, चन्दन, वासनाओं में लिप्त मनुष्य की संगति, छुपे अंगों के दर्शन, सुहानी और मन्द हवा, रहने का सुन्दर स्थान, नए कपड़े और आभूषण। 

इस पौराणिक बात के पीछे व्यावहारिक जीवन के लिये संकेत भी है कि चूंकि कामनाओं की अति मन को भटकाती है, इसलिए इन स्थान विशेष के संपर्क में आने पर संयम और अनुशासन बनाए रख मन को कमजोर होने से बचाएं। अन्यथा जीवन पतन की ओर जा सकता है।

रविवार, 2 अक्टूबर 2011

भगवान तो हैं पर भाव चाहिए..... पूज्य बापूजी



पत्नी तकलीफ में हो और पति भागता हुआ न आये तो पति किस बात का ! सेवक कष्ट में हो, स्वामी भागता हुआ न आये तो स्वामी किस बात का ! ऐसे ही जीव दुःखी होकर पुकारता हो और भगवान अवतार न लें तो भगवान किस बात के ! यह भारतीय संस्कृति की महिमा है, गरिमा है। कभी कृष्णरूप में तो कभी रामरूप में, कभी प्रेरणा अवतार तो कभी अंतर्यामी अवतार, कभी आवेश अवतार तो कभी नरसिंह अवतार, कभी प्रवेश अवतार.... द्रौपदी की साड़ी में भी प्रविष्ट हो जाने वाली भगवदसत्ता ! हाथियों का बल रखने वाला दुःशासन साड़ी खींचता-खींचता थक गया, बोलता है कि 'नारी है कि सारी है !' न नारी है न साड़ी है, तेरे बाप का अवतार है !
ऐसे ही वृंदावन के नारायण स्वामी जी महाराज की एक शिष्या कुबड़ी थी। जैसे भागवत में कुब्जा का वर्णन आता है न ! पीठ में कूबड़ निकला हुआ और झुकी हुई कमर ! नारायण स्वामी की शिष्या भी ऐसी ही कुबड़ी थी। वह अमृतसर में रहती थी और हर साल वृंदावन में श्रीकृष्ण की लीला करवाती थी। उसमें कोई लड़का कृष्ण बने, कोई राधा बने, ऐसे ही कोई बलराम आदि बने। जो-जो पात्र होते सब उस-उस तरह की पोशाक पहनते, रासलीला करते। रासलीला में जो लड़का कृष्ण बना था, उसमें उसकी भावना आ गयी कि 'ये साक्षात् कृष्ण ही तो हैं। ये राधा जी हैं, ये बलराम हैं, ये गोपियाँ हैं, ये ग्वाल हैं।'
देखो, भगवान कब, किसके द्वारा कैसा अपना अदभुत प्रभाव प्रकट कर दें ! उस बाई को पता था कि पैसे देकर मैंने ही रासलीला करने के लिए मण्डली मँगवायी है और रासलीला-मण्डली में रास करने वाला कृष्ण पगारदार (वेतनभोगी) हैं। लेकिन उस कुबड़ी की ऐसी भावना हो गयी कि 'ये प्रभुजी हैं।' एक बार क्या सूझा उसको कि रास करने वाले कृष्ण से बोलीः "हे केशव ! हे कृष्ण ! कुब्जा को तो बिना कहे आपने पैर पर पैर रखकर ठोढ़ी को झटका मार दिया और वह कुब्जा ठीक हो गयी। मैं भी तो आपकी कुब्जा ही हूँ कृष्ण ! मेरे को भी ठीक कर दो।" जो लड़का कृष्ण बना था उसके अंतःकरण में ऐसा भाव आ गया कि पकड़ के उस कुब्जा को दे मारा ठूँसा और वह ठीक हो गयी। अच्छी तरह से चलने-फिरने लगी। उसका कूबड़ ठीक हो गया। इस बात को हजारों आदमी जानते हैं। कैसी है भगवदसत्ता ! कहाँ संकल्प करके कैसा संचार कर दे कहा नहीं जा सकता ! ऐसी और भी बड़ी अलौकिक वार्ताएँ, लीलाएँ मिलती हैं।
वह भगवान की सत्ता जहाँ-जहाँ छलकती है, वहाँ कैसा संचार हो जाता है ! फिर चाहे वह भगवदसत्ता श्रीकृष्ण में छलके, रामजी में छलके, बुद्ध में छलके, लीलाशाहजी बापू में छलके, तुम्हारे में-हमारे में छलके। जहाँ-जहाँ विशेषता दिखती है, वह परमात्मा की है। जहाँ-जहाँ निष्काम प्रेम, निःस्वार्थ आनंद है वह भगवान का ही है।
रामहि केवल प्रेम पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा।।
भगवान जो रोम-रोम में रम रहे हैं, उनको केवल प्रेम प्यारा है। वे ही सबके सुहृद हैं, वे ही सबके अपने हैं। मैं भगवान का चिंतन करूँ तब भगवान आयेंगे, हम मरेंगे फिर भगवान के पास जायेंगे – यह वहम निकाल दो। भगवान मेरे हैं, आनन्दस्वरूप हैं, चैतन्यस्वरूप हैं, सदा है, सर्वत्र हैं, सभी देशों में हैं, सभी कालों में हैं, सभी परिस्थितियों में हैं। खम्भे तो बहुत हैं, प्रह्लाद की कमी है। वह तो प्रकट होने की बाट देखता रहता है।
तो तुम भी जीते-जीते जी भगवान के साथ अपने शाश्वत संबंध को जानकर जीवन्मुक्त होने की कला, भगवान को जब चाहे, जहाँ चाहे, जिस रूप में चाहे प्रकट करने की कला किन्हीं महापुरुष से सीख लो तो तुम्हारा तो कल्याण हो ही जायेगा, जो लोग तुम्हारी महिमा का गान करेंगे उनका भी हृदय भगवदरस से सराबोर हो जायेगा, भगवान की सर्वव्यापकता, सुहृदता के ज्ञान से भर जायेगा।

स्रोतः लोक कल्याण सेतु, अगस्त 2011, पृष्ठ संख्या 2, अंक 170
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शनिवार, 1 अक्टूबर 2011

अहंकार और प्रेम.... पूज्य बापू जी की पावन अमृतवाणी



जो जगत से सुखी होना चाहता है वह अकड़ने का मजा लोग - 'मेरे पास इतनी गाड़ियाँ हैं, इतनी मोटरें हैं, इतना अधिकार है, और अधिकार हथिआऊँ....' यह रावण का रास्ता है और गुरु के प्रसाद से जो तृप्त हुए हैं, उनका राम जी का रास्ता है। सब कुछ देकर नंगे पैर जंगलों में घूमते हैं फिर भी राम जी संतुष्ट हैं, प्रसन्न हैं और रावण के पास सब कुछ है फिर भी असंतुष्ट है, अप्रसन्न है। अपनी पत्नी और लंका की सुंदरियाँ मिलने पर भी अहंकार चाहता है कि इतनी सुंदर सीता को लंका की शोभा बढ़ाने को ले आऊँ। अहंकार ले-ले के, बड़ा बनकर सुखी होना चाहता है और प्रेम दे-देकर अपने-आप में पूर्णता का एहसास करता है।
अहंकार क्रोध में, लोभ में, विकारों में बरसकर, दूसरों को परिताप पहुँचाकर सुखी होना चाहता है लेकिन प्रेम अपनी मधुमय शीतलता से बरसते हुए दूसरों के दुःख, रोग, शोक हरकर उनकी शीतलता में अपनी शीतलता का एहसास करता है। अहंकार की छाया ऐसी है कि अहंकार छायामात्र शरीर को 'मैं' मानेगा और अपने आत्मा को 'मैं' रूप में न सुनेगा, न मानेगा, न जानेगा। जबकि प्रेम शरीर को क्षणभंगुर जानता है व मन परिवर्तनशील, तन परिवर्तनशील, चित्त परिवर्तनशील.... उन सबका साक्षी जो है अपरिवर्तनशील, उस अपने आत्मदेव को 'मैं' मानता है, जानता है।
जो सबका साक्षी है, उसमें तृप्त होने का यत्न करता है तो जिज्ञासु है। तृप्त हो गया तो व्यासजी है, कृष्णजी है, रामजी है, नारायणस्वरूप है। अहंकार तोड़ता है और महापुरुष जोड़ते हैं। अहंकार अपनी छाया से हमें विक्षिप्त और वासनावान करता है लेकिन प्रेम अपनी प्रभा से हमें विकसित, संतुष्ट, तृप्त, दानी और निरभिमानी करता है। अहंकार संग्रह से संतुष्ट होता है और प्रेम बाँटकर तृप्त होता है।
अहंकार बाह्य शक्ति, सामग्री से बड़ा होना चाहता है और प्रेम परमात्म-प्रीति से पूरे बड़प्पन में अपने 'मैं' को मिलाने में राजी रहता है। तरंग कितनी भी बड़ी बने फिर भी सागर नहीं हो सकती है लेकिन छोटी-सी तरंग अपने को पानी माने तो सागर तो वह खुद ही है। ऐसे ही यह जीव शरीर को 'मैं' मानकर, कुछ पा के जो बड़ा बनता है, ये उसके बड़प्पन के ख्वाब रावण की दिशा के हैं। एम.बी.ए. पढ़े हुए बच्चों को सिखाया जाता है कि गंजे आदमी को कंघी बेचनी है और नंगे लोगों को कपड़े धोने का साबुन बेचना है। चाहे उनको काम आये या न आये, उनसे पैसे बनाओ। साधन इकट्ठे करो और सुखी रहो। जो भी ऐसा रास्ता लेते हैं, वे खुद परेशान रहते हैं और दूसरों का शोषण करते हैं लेकिन जो शबरी का, मीरा का, रैदासजी का, राजा जनक का रास्ता लेते हैं वे खुद भी तृप्त होते हैं, दूसरों को भी तृप्त करते हैं।
स तृप्तो भवति। सः अमृतो भवति।
स तरति लोकांस्तारयति।
अहंकार लेने का अवसर खोजता है और प्रेम देने का अवसर खोजता है। चाहे निगाहों से पोसे, वाणी से पोसे, हरड़ रसायन से पोसे, पंचगव्य से पोसे अथवा हरि ॐ करके, प्रणाम करके पोसे, नम्रता के गुण देकर उनकी उन्नति करे.... प्रेम अवसर खोजता रहता है कि मेरे सम्पर्क में आने वाले पोषित हों। मेरे शिष्य जायेंगे, भण्डारा करेंगे, सेवाएँ करेंगे। सरकार का एक करोड़ निकलता है तो लोगों तक कितने पहुँचते होंगे भगवान जाने..... लेकिन हमारे यहाँ से एक करोड़ निकलता है तो लोगों तक तीन करोड़ होकर पहुँचता है। हमारे यहाँ से एक रूपया निकलता है तो शिष्यों द्वारा उसमें और सहयोग मिलता है। कोई सर्विस चार्ज नहीं, कोई हड़प चार्ज नहीं क्योंकि जो प्रेमी गुरु के प्यारे हैं, वे पहुँचाने में अपना भी सहयोग कर देते हैं। अहंकारी सबसे आगे और विशेष होने में मानता है और प्रेमी सबके पीछे रहकर, सेवा खोज के, मिटकर अमिट को पाने में सफल हो जाता है। राजा चतुरसिंह के उदयपुर राज्य में सत्संग होता था। वे संत-महात्मा के चरणों में जाते, पीछे बैठ जाते।
प्रेम गली अति साँकरी, ता में दो न समाहिं।
अहंकार और प्रेम..... एक म्यान में दो तलवारें नहीं रहतीं। अहंकार सब कुछ पा के, कुछ बनकर सुखी होने की भ्रान्ति में टकराते-टकराते हार जाता है, थक जाता है और प्रेम सब कुछ देते-देते अपने पूर्ण स्वभाव को जागृत कर लेता है।
ब्राह्मी स्थिति प्राप्त कर, कार्य रहे न शेष।
मोह कभी न ठग सके, इच्छा नहीं लवलेश।।
जो संसार में सुखी होना चाहता है, वह बड़े दुःख को बुलाता है। संसार दुःखालय है। संसार की सुविधा पाकर जो सुखी रहना चाहता है, वह किसी-न-किसी से धोखा, शोषण और कई वस्तुओं की पराधीनता करेगा और जो संसार की सेवा खोजकर निर्वासनिक होता है, उसका प्रेम-स्वभाव स्वतः जागृत होता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 4,5 अंक 225
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गुरुवार, 29 सितंबर 2011

तुम लगे रहो........ पूज्य बापू जी



समत्व योग बड़ा महत्त्वपूर्ण योग है। इस योग को समझने के लिए, इसमें प्रवेश करने के लिए धारणा, ध्यान, समाधि करो। समाधि करना अच्छा है, ध्यान करना अच्छा है, जप करना अच्छा है, सेवा करना अच्छा है लेकिन इन सबका फल यह है कि तुम विदेही की नाईं शोभा पा लो।

एक महात्मा बड़े सूक्ष्म विषय पर प्रवचन करते थे। वेदांत की गूढ़ बातें साधकों को समझाते थे। एक भक्त खोमचा लेकर साधकों की ग्राहकी भी कर लेता था और महात्मा का प्रवचन भी सुन लेता था। भक्त और साधक जब सत्संग सुनते थे तो वह भी सत्संग में एकतान हो जाता। कई महीने सत्संग सुनने के बाद एक बार वह बाबाजी के चरणों में दंडवत प्रणाम करके कहता हैः "गुरु महाराज ! मैंने वेदान्त को सुन लिया, समझ लिया कि यह (संसार) सरकने वाली चीज है। अन्वय(संबंध) और व्यतिरेक(असमानता) का सिद्धान्त मैंने जान लिया। जाग्रत का व्यतिरेक स्वप्न में हो जाता है, स्वप्न का व्यतिरेक सुषुप्ति में हो जाता है लेकिन आत्मा का तीनों अवस्थाओं में अन्वय है। दुःख है, दुःख आया तो सुख गायब का हो गया। सुख आया तो दुःख गायब हो गया। चिंता आयी तो आनंद गायब हो गया, हर्ष गायब हो गया और हर्ष आया तो चिंता गायब हो गयी किंतु इनमें आत्मा ज्यों का तयों है। यह मैं जान तो गया। बचपन आया, चला गया लेकिन बचपन का द्रष्टा रहा। जवानी आयी, चली गयी लेकिन उसको देखने वाला रहा। बुढ़ापा आया, मौत आयी परंतु मौत के बाद भी मैं रहता हूँ। मर जाने के बाद भी सुखी रहूँ – ऐसा भाव हम लोगों का होता है। यह बात आपकी मैंने गुरु महाराज ! अच्छी तरह से समझ ली, लेकिन आत्मा की मुक्तता का अनुभव मुझे नहीं हो रहा है। आत्मा मुक्त है, शरीर संसारी है। शरीर की संसार के साथ और आत्मा की परमात्मा के साथ एकता अनुभव करने की आप श्री की तरफ से जो वाणी थी, वह वाणी मैं समझ तो गया किंतु गुरु महाराज ! हे कृपानाथ ! हे प्राणिमात्र के परम मित्र, परम हितैषी गुरुवर ! मैं तो एक छोटा-सा धंधेवाला दिख रहा हूँ, खोमचे वाला, चना बेचने वाला। आपके वचन समझ तो गया हूँ लेकिन आत्मा का आनंद प्रकट नहीं हुआ।"

बाबा जी ने कहाः "कोई प्रतिबंधक प्रारब्ध, रूकावट का कोई प्रारब्ध होगा, इसीलिए तुम समझ गये फिर भी आनंद प्रकट नहीं होता है। तुम लगे रहना।"

गर्मियों के दिन थे, धूप तड़ाके की थी, लू चल रही थी। एक मोची उस गर्मी में, लू में नंगे पैर, नंगे सिर कष्ट का शिकार होता हुआ लथड़ता-लथड़ता आकर एक पेड़ के करीब बेहोश होकर गिरा। खोमचे वाले ने देखा कि गर्मी के मारे इसके प्राण सूख रहे हैं, कंठ सूख गया है। उसने उसके सिर पर हलकी-सी तेल की मालिश की। शर्बत बना कर उसके मुँह में थोड़ा-थोड़ा डाला। फिर चने वने खिलाकर उसको जरा तसल्ली दी। वह आदमी उठ खड़ा हुआ। जब वह जाने लगा तो धन्यवाद से, कृतज्ञता से उसकी आँखें भर गयीं। बार-बार उसकी आँखों से कुछ टपक रहा है। कुछ आशीर्वाद का भाव टपक रहा है। वह मोची तो चला गया लेकिन मोची के द्वारा वह अंतर्यामी परमात्मा इस पर बरस पड़ा। इसके हृदय में वह आनंद छलकने लगा। 'मोची के वेश में, खोमचेवाले के वेश में, श्रोताओं के वेश में, धनवान के वेश में और निर्धन के वेश में यह जो दिख रहा है, वह उसकी माया है लेकिन इसको जो चला रहा है वह महेश्वर है। वह सच्चिदानंद सोऽहम् है। वही मैं हूँ।' – ऐसा बोध प्रकट होने लगा। चित्त में बड़ी शांति, बड़ी निर्मलता, बड़ी आध्यात्मिक पूँजी प्रकट होने लगी। गुरु जी के पास गया। प्रणाम करके अपनी स्थिति का वर्णन करने लगा कि थोड़ी-सी सेवा करने से यह आत्मानंद प्रकट हुआ है।

बाबा ने कहा कि "निष्काम भाव से किये हुए कर्म अंतःकरण को शुद्ध करते हैं और शुद्ध हृदय में अपना मुख दिखता है। जैसे साफ आईने में अपना चेहरा दिखता है, ऐसे ही शुद्ध हृदय में अपने स्वरूप का बोध होता है। तेरा प्रतिबंधक प्रारब्ध हट गया।"

घटना घट जाय तो घड़ी भर में काम हो जात है। लगे रहें, कोई-न-कोई ऐसी घड़ी आती है जब सुने हुए उस तत्त्वज्ञान का, उसकी गरिमा का हम प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। ॐ... ॐ..... ॐ.....

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2011, पृष्ठ संख्या 13,14 अंक 225

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