मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

बुधवार, 14 सितंबर 2011

जब तक जीना तब तक सीना.....


कई लोग भगवान के रास्ते चलते हैं। गलती यह करते हैं कि 'चलो, सबमें भगवान हैं।' ऐसा करके अपने व्यवहार का विस्तार करते रहते हैं। तत्त्वज्ञान के रास्ते चलने वाले साधक सोचते हैं कि सब माया में हो रहा है। ऐसा करके साधन-भजन में शिथिलता करते हैं और व्यवहार बढ़ाये चले जाते हैं।

अरे, माया में हो रहा है लेकिन माया से पार होने की अवस्था में भी तो जाओ साधन भजन करके ! साधन भजन छोड़ क्यों रहे हो ? 'जब तक जीना तब तक सीना।' जब तक जीवन है तब तक साधन-भजन की गुदड़ी को सीते रहो।

थोड़ा वेदान्त इधर-उधर सुन लिया। आ गये निर्णय पर 'सब प्रकृति में हो रहा है।' फिर दे धमाधम व्यवहार में। साधन भजन की फुरसत ही नहीं।

जो साधन-भजन छोड़ देते हैं वे शाब्दिक ज्ञानी बनकर रह जाते हैं। 'मैं भगवान का हूँ' यह मान लेते हैं और संसार की गाड़ी खींचने में लगे रहते हैं। अपने को भगवान का मान लेना अच्छा है। साधन-भजन का त्याग करना अच्छा नहीं। भगवान स्वयं प्रातःकाल में समाधिस्थ रहते हैं। शिवजी स्वयं समाधि करते हैं। रामजी स्वयं गुरू के द्वार पर जाते हैं, आप्तकाम पुरूषों का संग करते हैं। श्रीकृष्ण दुर्वासा ऋषि को गाड़ी में बिठाकर, घोड़ों को हटाकर स्वयं गाड़ी खींचते हैं। उनको ऐसा करने की क्या जरूरत थी ?

हम लोगों को थोड़े रूपये-पैसे, कुछ सुख-सुविधाएँ मिल जाती हैं तो बोलते हैं- 'अब भगवान की दया है। जब मर जायेंगे तब भगवान हमें पकड़कर स्वर्ग में ले जायेंगे।'

अरे भाई ! तू अपनी साधना की गुदड़ी सीना चालू तो रख ! बन्द क्यों करता है ? साधन-भजन छोड़कर बैठेगा तो संसार और धन्धा-रोजगार के संस्कार चित्त में घुस जायेंगे। 'जब तक जीना तब तक सीना।'जीवन का मंत्र बना लो इसे।

चार पैसे की खेतीवाला सारी जिन्दगी काम चालू रखता है, चार पैसे की दुकानवाला सारी जिन्दगी काम चालू रखता है, चार पैसे का व्यवहार सम्भालने के लिए आदमी सदा लगा ही रहता है। मर जाने वाले शरीर को भी कभी छुट्टी की ? श्वास लेने से कभी छुट्टी ली ? पानी पीने से छुट्टी की ? भोजन करने से छुट्टी की ? नहीं। तो भजन से छुट्टी क्यों ?

'जब तक जीना तब तक सीना.... जब तक जीना तब तक सीना।' यह मंत्र होना चाहिए जीवन का।


स्रोत:- आश्रम से प्रकाशित पुस्तक "मुक्ति का सहज मार्ग" से

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

कलियुग में परमात्मा प्राप्ति शीघ्र कैसे ?


कहते हैं कि सतयुग में वर्षों के पुण्यों से परमात्म प्राप्ति होती थी। द्वापर में यज्ञ से होती थी, ध्यान से होती थी। कलियुग के लिए कहा गया हैः

दानं केवलं कलियुगे।

अथवा

कलिजुग केवल हरि गुन गाहा।

गावत नर पावहिं भव थाहा।।

परंतु शास्त्र का कोई एक हिस्सा लेकर निर्णय नहीं लेना चाहिए। शास्त्र के तत्मत से वाकिफ होना चाहिए। यह भी शास्त्र ही कहता है कि

राम भगत जग चारि प्रकारा।

सुकृति चारिउ अनघ उदारा।।

चहू चतुर कहुँ नाम अधारा।

गयानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा।।

(श्री राम चरित. बा. कां. 21.3 व 4)

राम के, परमात्मा के भक्त चार प्रकार के हैं। चारों भगवन्नाम का आधार लेते हैं, श्रेष्ठ हैं परंतु ज्ञानी तो प्रभु को विशेष प्यारा है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।

'इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निःसंदेह कुछ भी नहीं है।'

(गीताः 4.38)

दूसरे युगों में जप से, यज्ञ से परमात्म प्राप्ति होती थी तो श्रीकृष्ण ने अर्जुन को तत्त्वज्ञान का उपदेश क्यों दिया ? उद्धव को तत्त्वज्ञान क्यों दिया ?

जनसाधारण के लिए जप अपनी जगह पर ठीक है, हवन अपनी जगह पर ठीक है किंतु जिनके पास समझ है, बुद्धि है, वे अपनी-अपनी योग्यता के अनुसार साधन करके पार हो जाते हैं। जनक अष्टावक्र से तत्त्वज्ञान सुनकर पार हो गये।

वह भी जमाना था कि लोग 12-12 वर्ष, 25-25 वर्ष जप तप करते थे, तब कहीं उनको सिद्धी मिलती थी पर कलियुग में सिद्धि जल्दी हो जाती है।

एक आदमी को पेट में कुछ दर्द हुआ। वह बड़ा सेठ था। वह वैद्य के पास दवा लेने गया। वैद्य ने देखा कि यह अमीर आदमी है, इसको सस्ती दवा काम में नहीं आयेगी।

वैद्य ने कहाः "ठहरो जरा ! दवा घोंटनी है, सुवर्णभस्म डालना है, बंगभस्म डालना है, थोड़ा समय लगेगा। बढ़िया दवा बना देता हूँ।"

काफी समय उसको रोका, बाद में दवा दी। उसने खायी और वह ठीक हो गया।

वैद्य ने पूछाः "अब कैसा है ?"

"अच्छा है... आराम हो गया। कितने पैसे ?"

"केवल ग्यारह सौ रूपये।"

सेठ ने दे दिये। वैसे का वैसा रोग एक गरीब को हुआ और वह भी उसी वैद्य के पास आया।

बोलाः "पेट दुःखता है।"

वैद्य ने नाड़ी देखकर कहाः "कोई चिंता की बात नहीं, यह लो पुड़िया। एक दोपहर को खाना, एक शाम को खाना, ठीक हो जायेगा।"

"कितने पैसे ?"

"पचास पैसे दे दो।"

उसने दे दिये। दो पुड़िया खाकर वह ठीक हो गया। मर्ज वही का वही, वैद्य भी वही का वही, लेकिन एक से ग्यारह सौ रूपये लिये और समय भी ज्यादा लगाया तो दूसरे से पचास पैसे लिए और तुरंत दवा दे दी। ऐसे ही वैद्यों का वैद्य परमात्मा वही का वही है। हमारे अज्ञान का मर्ज भी वही का वही है। पहले के जमाने में लोगों के पास इतना समय था, इतना शुद्ध घी, दूध था, इतनी शक्ति थी तो लम्बे-लम्बे उपचार करने के बाद उनका दर्द मिटता था। अभी वह दयालु भगवान कहता है कि आ जाओ भाई ! ले जाओ जल्दी जल्दी।

अष्टावक्र महाराज बोलते हैं कि 'श्रवण मात्रेण।' सुनते सुनते भी आत्मज्ञान हो सकता है। पहले कितना तप करने के बाद बुद्धि शुद्ध, स्थिर होती थी, वह अब तत्त्वज्ञान सुनते सुनते हो सकती है। ऐसा नहीं है कि केवल उस समय सतयुग था, अभी नहीं है। सत्त्वगुण में तुम्हारी वृत्ति है तो सतयुग है। रजोमिश्रित सत्त्वगुण में वृत्ति है तो त्रेतायुग है। तमोमिश्रित रजोगुण में वृत्ति है तो द्वापर है और तमोगुण में वृत्ति है तो कलियुग है।

सतयुग में भी कलियुग के आदमी थे। श्रीराम थे तब रावण भी था। श्रीकृष्ण थे तब कंस भी था। अच्छे युगों में सब अच्छे आदमी ही थे, ऐसी बात नहीं है। बुरे युग में सब बुरे आदमी हैं, ऐसी बात भी नहीं। अतः दैवी संपदा के जो सदगुण हैं- निर्भयता, अंतःकरण की सम्यक् शुद्धि, ज्ञान में स्थिति, स्वाध्याय, शुद्धि, सरलता, क्षमा आदि छब्बीस सदगुण अपने जीवन में लायें और आत्मवेत्ता महापुरुषों का संग करें तो कलियुग में शीघ्र परमात्म प्राप्ति हो जायेगी। दैवी सम्पदा के सदगुण अपने जीवन में लाने वाला आदमी धन ऐश्वर्य में आगे बढ़ाना चाहे तो बढ़ सकता है, यश-सामर्थ्य में चमकना चाहे तो भी चमक सकता है और भगवत्प्राप्ति करना चाहे तो भी कर सकता है।

स्रोतः लोक कल्याण सेतु, अक्तूबर 2010, पृष्ठ संख्या 3,4 अंक 160

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सोमवार, 12 सितंबर 2011

परम हितैषी गुरु की वाणी बिना विचार करे शुभ जानी...


(पूज्य बापू जी की अमृतवाणी)

गणेशपुरी (महाराष्ट्र) में मुक्तानंद बाबा हो गये। उनके गुरु का नाम था नित्यानंद स्वामी। नित्यानंदजी के पास एक भक्त दर्शन करने के लिए आता था। उसका नाम था देवराव। वह काननगढ़ में मास्टर था। देवराव खूब श्रद्धा-भाव से अपने गुरु को एकटक देखता रहता था।

सन् 1955 की घटना है। वह नित्यानंदजी के पास आया और कुछ दिन रहा। बाबाजी से बोलाः

"बाबा ! अब मैं जाता हूँ।"

बाबा ने कहाः "नहीं-नहीं, अभी कुछ दिन और रहो, सप्ताह भर तो रहो।"

"बाबा ! परीक्षाएँ सामने हैं, मेरी छुट्टी नहीं है। जाना जरूरी है, अगर आज्ञा दो तो जाऊँ।"

"आज नहीं जाओ, कल जाना और स्टीमर में बैठो तो फर्स्ट क्लास की टिकट लेना। ऊपर बैठना, तलघर में नहीं, बीच में भी नहीं, एकदम ऊपर बैठना।

"जो आज्ञा।"

एक शिष्य ने पूछाः "बाबा ! साक्षात्कार का सबसे सरल मार्ग कौन सा है ? हम जैसों के लिए संसार में ईश्वरप्राप्ति का रास्ता कैसे सुलभ हो ?"

बाबा ने कहाः "सदगुरू पर दृढ़ श्रद्धा करो, बस !" गुरु वाणी में आता हैः

सति पुरखु जिनि जानिआ

सतिगुरु तिस का नाउ।

तिस कै संगि सिखु उधरै।

नानक हरिगुन गाउ।।

जिसने अष्टधा प्रकृति के द्रष्टा सत्पुरुष को पहचाना है, उसी को सदगुरु बोलते हैं। उसके संग से सिख (शिष्य) का उद्धार हो जाता है।

बाबा ने अपने सिर से एक बाल तोड़कर उसके एक छोर को अपनी उँगली से लगाकर दिखाते हुए बोलेः "सदगुरु के प्रति इतनी भी दृढ़ श्रद्धा हो, मतलब रत्ती भर भी दृढ़ श्रद्धा हो तो तर जायेगा। जिसने संत को जाना है, ऐसे सदगुरु के प्रति बाल भर भी पक्की श्रद्धा हो, उनकी आज्ञा का पालन करो तो बस हो जायेगा। कठिन नहीं है।"

संत कबीर जी ने भी कहा हैः

सदगुरु मेरा सूरमा, करे शब्द की चोट।

मारे गोला प्रेम का, हरे भरम की कोट।।

कबीर ते नर अंध हैं, गुरु को कहते और।

हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरू रूठे नहिं ठौर।।

भक्तिमार्ग, ज्ञानमार्ग, योगमार्ग और एक ऐसा मार्ग है कि जो महापुरुषों के प्रति श्रद्धा हो और उनके वचन माने तो वह भी तर जाता है। इसको बोलते हैं संत-मत।

देवराव ने गुरुजी की आज्ञा मानीक। स्टीमर में एकदम ऊपरी मंजिल की टिकट करायी। स्टीमर डूबने के कगार पर आ गया। कप्तान ने वायरलेस से खबर दी और मदद माँगी। मदद के लिए गोताखोर, नाव और जहाज आदि पहुँचे, उसके पहले ही तलघर में पानी भर गया, बीचवाले भाग में भी पानी भर गया लेकिन देवराव ने तो अपने गुरु की बात मानकर ऊपर की टिकट ली थी तो ऊपर से देखते रहे। इतने में मददगार आ गये और वे सही सलामत बच गये। गुरु लोग वहाँ (परलोक) का तो ख्याल रखते हैं लेकिन यहाँ (इहलोक) का भी ख्याल रखते हैं। अगर कोई उनकी आज्ञा मानकर चले तो बड़ी रक्षा होती है। योग्यता का सदुपयोग करे, संसार की चीजों की चाह को महत्त्व न दे और धन, सत्ता आदि किसी बात का अभिमान न करे। बाल के अग्रभाग जितना भी यदि दृढ़तापूर्वक गुरु आज्ञा का पालन करे तो शिष्य भवसागर से पार हो जाता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2011, पृष्ठ संख्या 18,19 अंक 223

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रविवार, 11 सितंबर 2011

आपका भाव कैसा है ? (पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)


आप भगवान का स्मरण करोगे तो भगवान आपका स्मरण करेंगे क्योंकि वे चैतन्यस्वरूप हैं। आप पैसों का, बँगले का स्मरण करोगे तो जड़ पैसों का, बँगले का स्मरण करोगे तो जड़ पैसों को, जड़ बँगले को पता नहीं है कि आप उनका स्मरण कर रहे हो। आप गाड़ी का स्मरण करोगे तो वह अपने-आप नहीं मिलेगी लेकिन भगवान का स्मरण करोगे तो वे स्वयं आकर मिलेंगे। शबरी ने भगवान का स्मरण किया तो वे पूछते-पूछते शबरी के द्वार पर आ गये। भावग्रही जनार्दनः..... मीरा ने स्मरण किया तो जहर अमृत हो गया। वह हृदयेश्वर आपके भाव के अनुसार किसी भी रूप में कहीं भी मिलने में सक्षम है, अगर सोऽहंस्वरूप में मिलना चाहो तो सोऽहंस्वरूप में भी अपना अनुभव कराने में समर्थ है। केवल अपनी बुद्धि में उसके प्रति भाव होना चाहिए। देवी देवता का, मूर्ति का आदर-पूजन, माता-पिता अथवा गुरु का आदर-पूजन यह हमारी बुद्धि में भगवदभाव को, भगवदज्ञान को, भगवदरस को प्रकट करने का मार्ग है।

भाव की बड़ी महिमा है। मान लो, एक सुपारी है। एक को उसे खाने का भाव है, दूसरे को उससे कमाने का भाव है, तीसरे को उसे पूजने का भाव है। तो फायदा किसने लिया ? खाने वाले ने, कमाने वाले ने कि पूजने वाले ने ? सुपारी तो जड़ है, प्रकृति की चीज है, उसमें भगवदबुद्धि करने से भगवदभाव पैदा होता है और खाने की भावना करते हैं तो तुच्छ लाभ होता है। बेचकर कमाने की भावना करते हैं तो ज्यादा लाभ होता है लेकिन उसमें गणेश जी का भाव करके पूजा करते हैं तो और ज्यादा लाभ होता है। सुपारी तो वही-की-वही है परंतु खाना है तो भोग, कमाना है तो लोभ और पूज्यभाव, भगवदभाव है तो भगवदरस देके भगवान के समीप कर देगी। अब सुपारी को खाके मजा लो, बेचके मजा लो या उसका पूजन करके मजा लो तुम्हारी मर्जी। खाके मजा लिया तो भोगी, बेचके मजा लिया तो लोभी और सुपारी में गणपति-बुद्धि की तो आप उपासक हो गये, भक्त हो गये और सुपारी का तत्त्व जान के अपना तत्त्व और सुपारी का तत्त्व 'एकमेव अद्वितीयं' कर दिया तो हो गये ब्रह्म !

ऐसे ही अगर आप गुरु से संसारी फायदा लेते हैं तो यह भोगबुद्धि हुई लेकिन गुरु चिन्मय हैं, दिव्य हैं, ब्रह्मस्वरूप हैं, ज्ञानस्वरूप हैं, तारणहार हैं, व्यापक हैं, सबके अंतरात्मा, भूतात्मस्वरूप हैं, प्राणिमात्र के हितैषी हैं, सुहृद हैं – ऐसा अहोभाव करते हैं और उनके वचनों में विश्वास करते हैं, उनके अनुसार चलते हैं तो कितना फायदा होता है !

आप सुपारी में गणपति का भाव करो तो सुपारी उसी समय आपके लिए ऐसा भाव नहीं कर सकती कि 'यह मुक्तात्मा हो जाय, चिंतारहित हो जाये...।' ऐसा सोचकर सुपारी उपदेश नहीं देगी। आपके अपने भाव के अनुसार अंतःकरण की वृत्ति बनेगी लेकिन गुरू के प्रति भगवदभाव, ब्रह्मभाव, अहोभाव करोगे तो गुरूदेव के अंतःकरण से भी आपके उद्धार के लिए शुभ संकल्प की, विशेष कृपा की वर्षा होने लगेगी, उनके द्वारा ऊँचा सत्संग मिलेगा, आनंद-आनंद हो जायेगा। सुपारी वही की वही लेकिन नजरिया बदलने से लाभ बदल जाता है। गुरु वही के वही लेकिन नजरिया बदलने से लाभ बदल जाता है।

कर्मों में भी अलग-अलग भाव अलग-अलग फल देते हैं। जहाँ राग से, द्वेष से सोचा जाता है, वहाँ कर्म बंधनकारक हो जाता है। जहाँ करने का राग मिटाने के लिए सबकी भलाई के, हित के भाव से सोचा और किया जाता है, वहाँ कर्म बंधन से छुड़ाने वाला हो जाता है। जैसे कोई दुष्ट है, धर्म का, संस्कृति का, मानवता का हनन कर-करके अपना कर्मबन्धन बढ़ाने वाले दुष्कर्म में लिप्त है और न्यायाधीश उसकी भलाई के भाव से उसे फाँसी देता है तो न्यायाधीश को पुण्य होता है। 'हे प्रभु जी ! अब इस शरीर में यह सुधरेगा नहीं, इसलिए मैं इसे फाँसी दे दूँ यह आपकी सेवा है' – इस भाव से अगर न्यायाधीश फाँसी देता है तो उसका अंतःकरण ऊँचा हो जाता हो जायेगा लेकिन 'यह फलाने पक्ष का है, अपने पक्ष का नहीं है.... इसलिए फाँसी दे दो' – ऐसा भाव है तो फिर न्यायाधीश का फाँसी देना अथवा सजा देना बंधन हो जायेगा।

आपके कर्मों में हित की भावना है, समता है तो आपके कर्म आपको बंधनों से मुक्त करते जायेंगे। अगर स्वार्थ, अधिकार और सत्ता पाने की या द्वेष की भावना है तो आपके कर्म से किसी को लाभ मिलता है तो अपनी संसार का आसक्ति मिटती है, दूसरे की भलाई का, हृदय की उदारता का आनंद आता है लेकिन दूसरे का हक छीना तो संसार की आसक्ति और कर्मबन्धन बढ़ता है।

आप जैसा देते हैं वैसा ही आपको वापस मिल जाता है। आप जो भी दो, जिसे भी दो भगवदभाव से, प्रेम से और श्रद्धा से दो। हर कार्य को ईश्वर का कार्य समझकर प्रेम से करो, सबमें परमेश्वर के दर्शन करो तो आपका हर कार्य भगवान का भजन हो जायेगा।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, फरवरी 2010, पृष्ठ संख्या 17,18 अंक 206

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शनिवार, 10 सितंबर 2011

मधुर चिंतन (आत्ममाधुर्य से ओतप्रोत बापू जी की अमृतवाणी)


वशीभूत अंतःकरण वाला पुरुष राग-द्वेष से रहित और अपनी वशीभूत इन्द्रियों के द्वारा विषयों मे विचरण करता हुआ भी प्रसन्नता को प्राप्त होता है। वह उनमें लेपायमान नहीं होता, उसका पतन नहीं होता। जिसका चित्त और इन्द्रियाँ वश में नहीं हैं, वह चुप होकर बैठे तो भी संसार का चिंतन करेगा। ज्ञानी संसार में बैठे हुए भी अपने स्वरूप में डटे रहते हैं।

भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. श्री राधाकृष्णन् अच्छे चिंतक माने जाते हैं। उन्होंने एक कहानी लिखी हैः

एक भट्ठीवाला था। उसको हररोज स्वप्न आता कि मैं चक्रवर्ती सम्राट हूँ। वह अपना काम निपटाकर जल्दी जल्दी सो जाता, उस मधुर स्वप्नलोक में जाने के लिए। बाहर के जगत में तो वह भट्ठीवाला था, उसके पास खाने-पीने को भी पर्याप्त नहीं था। गुजारा चलाने के लिए उसे बड़ा परिश्रम करना पड़ता था परंतु धीरे-धीरे वह स्वप्न में सुखी होना लगा तो बाहर के जगत में रूचि कम होने लगी।

प्रतिदिन स्वप्न में देखता कि 'मैं चक्रवर्ती सम्राट बन गया हूँ। छोटे-छोटे राजा लोग मेरी आज्ञा में चलते हैं। छनन छनन करते हीरे जवाहरात के गहनों से सजी ललनाएँ चँवर झुला रही हैं।

एक दिन स्वप्न में वह पेशाब करने के लिए उठा तो पास में जलती हुई भट्ठी में पैर पड़ गया। जलन के मारे वह चिल्ला उठा। सो तो रहा था भट्ठियों के बीच लेकिन स्वप्न देख रहा था कि सम्राट है, इसलिए वह सुखी था।

किसी भी परिस्थिति में आदमी का मन जैसा होता है, सुख-दुःख उसे वैसे ही प्रतीत होते हैं। ज्ञानी का मन परब्रह्म में होता है तो वे संसार में रहते हुए, सब व्यवहार करते हुए भी परम सुखी हैं, ब्रह्मज्ञान में मस्त हैं।

मनुष्य का शरीर कहाँ है, इसका अधिक मूल्य नहीं है। उसका चित्त कहाँ है, इसका अधिक मूल्य है। चित्त परमात्मा में है और आप संसार में रहते हैं तो आप संसार में नहीं हैं, परमात्मा में हैं। प्रभातकाल में जब उठो तब आँख बंद करके ऐसा चिंतन करो कि 'मैं गंगा किनारे गया। पवित्र गंगा मैया में गोता लगाया। किसी संत के चरणों में सिर झुकाया। उन्होंने मुझे मीठी निगाहों से निहारा।

पाँच मिनट ऐसा मधुर चिंतन करो। आपका हृदय शुद्ध होने लगेगा, भाव पवित्र होने लगेंगे। सुबह उठकर देखे हुए सिनेमा के दृश्य याद आयें- 'आहाहा.... वह मेरे पास आयी, मुझसे मिली....' आदि-आदि तो देखो, सत्यानाश हो जायेगा। कल्पना तो मन से होगी किंतु तन पर भी प्रभाव पड़ जायेगा। कल्पना में कितनी शक्ति है ! संत-महात्मा-सदगुरु परमात्मा के साथ विचरते हैं, समाधि लगाते हैं, उनका स्मरण-चिंतन करते हैं तो हृदय आनंदित होता है।

बुल्ला साहब नाम के एक बड़े प्रसिद्ध संत हो गये। जब वे घर में रहते थे तब उनका नाम था बुलाकीराम। गरीब, अनपढ़ बुलाकीराम उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले में जमींदार गुलाल साहब के यहाँ हल चलाने का काम करते थे।

बुलाकी राम ने भगवान को पाने का इरादा बना लिया। जिसे भगवान को पाना हो उसे संतों का दर्शन, सत्संग व उनकी सेवा करनी चाहिए।

बुलाकी राम खेत में हल चलाते-चलाते थोड़ी देर रुकते ताकि बैलों को आराम मिले। एक दिन दोपहर का समय था। वे खेत के किनारे मेंड़ पर बैठे आँखें बंद करके ध्यान कर रहे थे। गुलाल साहब आये तो देखा कि 'बैल तो ऐसे ही खड़े हैं ! इन हल में जुते बैलों की छुट्टी करके, उन्हें बाँध के बुलाकीराम कहाँ चला गया ?' जैसे नौकर काम के समय काम न करे, और कहीं बैठा हो तो सेठ को गुस्सा आता है, ऐसे ही गुलाल साहब को गुस्सा आया। वे चिल्लाने लगेः "बुलाकीराम ! बुलाकीराम !! ओ बुलाकी राम !!!..." अब बुलाकीराम तो ध्यानमग्न थे। इधर-उधर देखते-देखते गुलाल साहब जब निकट पहुँचे तो देखा कि बुलाकीराम मेंड़ पर बैठा है और हाथ में लोटा पकड़े हुए हैं। जमींदार को आया गुस्सा कि 'मैं इतना चिल्लाता हूँ तो भी जवाब नहीं देता है !' उसने उनकी पीठ पर जोर से एक लात मारी तो लोटा टेढ़ा हो गया, 'अरे ! मैंने लात मारने से पहले देखा था तो लोटे में पानी था। फिर यह अचानक दही कैसे बन गया !'

बुलाकीराम ने आँखें खोलीं और देखा कि मेंड़ पर दही गिरा हुआ है। जमींदार ने पूछाः

"बुलाकीराम ! यह क्या है ?"

बोलेः "मैं ध्यान-ध्यान में संतों को मानसिक भोजन करा रहा था। दाल बनायी, रोटी सब्जी बनायी फिर सोचा कि गर्मी है तो संतों को दही चाहिए। यह पानी लेकर इस भावना से कि यह दही है, मन नही मन मैं संतों के पास दही परोसने जाना चाहता था। दही परोसना ही चाहता था कि इतने में आपकी लात लगी और दही ढुल गया।"

भगवान का चिंतन करने वाले के मन में यह कैसा सामर्थ्य है कि पानी में से दही बना दे ! लोफर में से भक्त बना दे ! चंचल में से साधक बना दे ! भगवान में मन लगाने वाले के मन में बड़ी अदभुत कला, लीला, योग्यता होती है।

वह जमींदार गुलाल साहब बुलाकीराम के चरणों पर गिर पड़ा और बुलाकीराम का शिष्य बन गया। नौकर बुलाकीराम फिर नौकर नहीं रहे, भगवान की तरफ ऐसे चले की संत बुल्ला साहब हो गये। यह घटित घटना है।

कहाँ तो हल चलानेवाला, रूखी रोटी खाने वाला एक गरीब और भक्तिभाव से भगवान को, संतों को भोग लगात है तो पानी में से दही बन जाता है ! जो भगवान को चाहता है, भगवान उनके अनुकूल हो जाते हैं और उनके पाँच भूत भी उसके अनुकूल हो जाते हैं। हो गये न पाँच भूत अनुकूल ! हुए कि नहीं हुए ? लेकिन हम भगवान से चाहते हैं कि 'फैशन से, आराम से रहें। यह हो जाये, वह हो जाय.....' तो वह तो हो जाता है लेकिन फिर वही आदत पड़ जाती है और भगवान छूट जाते हैं। हम भगवान से संसारी चीजें माँगकर संसार के खड्ढे में गिर जाते हं। आप तो प्रभु में रहो और दूसरों को प्रभु में लगाओ। जब एक गरीब इतना महान संत बन सकता है तो तुम नहीं बन सकते क्या ! अवश्य बन सकते हो ! संकल्प में, शुद्ध चिंतन में अमोघ शक्ति है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अक्तूबर 2010, पृष्ठ संख्या 16,17 अंक 214

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