मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

हर परिस्थिति का सदुपयोग...

(पूज्य बापू जी की सर्वहितकारी अमृतवाणी)

आपके जीवन का मुख्य कार्य प्रभुप्राप्ति ही है। शरीर से संसार में रहो किंतु मन को हमेशा भगवान में लगाये रखो। समय बड़ा कीमती है, फालतू गप्पे मारने में अथवा व्यर्थ कि चेष्टाओं में समय बर्बाद न करके उसका सदुपयोग करना चाहिए। भगवदस्मरण, भगवदगुणगान और भगवदचिंतन में समय व्यतीत करना ही समय का सदुपयोग है। आपका हर कार्य भगवदभाव युक्त हो, भगवान की प्रसन्नता के लिए हो इसका ध्यान रखें।

आपके पास क्या है, क्या नहीं है इसका महत्त्व नहीं है, जो है, जितना है उसका उपयोग किसलिए कर रहे हो इसका महत्त्व है। धन है, मान है और धन की हेकड़ी दिखा रहे होः "मैं बड़ा हूँ अथवा मेरे कुटुम्बी ऐसे हैं, वैसे हैं....।" धन का दिखावा करके दूसरों को प्रभावित करते हो और ईश्वर को भूलते हो तो धन का यह दुरुपयोग आपको दुःख में गिरा देगा। धन है, भगवान के रास्ते जाने में उसका सदुपयोग करते हो, जिसका है उसी की प्रीति के लिए लगाते हो तो धन आपका कल्याण कर देगा।

गरीब हो, मजदूरी करते हो, कमियाँ हैं इसकी परवाह न करो। इनका सदुपयोग करने से आपका मंगल हो जायेगा। आपके पास कैसी भी परिस्थिति आये – बीमारी की हो या तंदरुस्ती की, निंदा की हो या वाहवाही की, सबका सदुपयोग करो। आपके पास क्या है इसका मूल्य नहीं है, आप उसका उपयोग सत् के लिए, प्रभु को पाने के लिए करो तो आपका कल्याण हो जायेगा। शबरी भीलन अनपढ़ थी, नासमझ थी लेकिन मैं भगवान की हूँ, गुरु की हूँ..... ऐसा सोचकर गुरुआज्ञा में चली तो महान हो गयी। राजा जनक विद्वान थे, धनवान थे, धन को, विद्या को समाज के हित में लगा दिया तो महान हो गये।

बीमारी आयी। किस कारण आयी यह समझकर सावधान हो गये कि दुबारा वह गलती नहीं करेंगे। बीमारी आयी तो तपस्या हो गयी, वाह प्रभु ! ऐसे प्रसन्न हुए तो यह बीमारी का सदुपयोग हुआ। जरा सी बीमारी आयी और परेशान हो गये... तुरंत इंजेक्शन ले लिया, बिना विचार किये ऑपरेशन करा लिया और असमय बूढ़े हो गये। पैसे भी लुटवाये और शरीर भी खराब करा लिया तो यह बीमारी का दुरुपयोग हुआ।

लोग आपका मजाक उड़ाते हैं तो सावधान हो जाओ कि 'मरने वाले शरीर का मजाक उड़ा रहे हैं, मसखरी कर रहे हैं। मैं इसको जानने वाला हूँ। ॐआनन्द... तो यह उस परिस्थिति का सदुपयोग हो गया।

कैसी भी परिस्थिति आये, उसका सदुपयोग करके अपने-आपको जानने की, भगवान को पाने की कला सीख लो।

बोलेः महाराज ! हमको भगवान पाने की इच्छा तो है लेकिन हमारे पतिदेव मर गये न, उनकी याद आ रही है। पति में बड़ा मोह था हमारा।

कोई बात नहीं, मोह को रहने दो, मोह को तोड़ो मत। पतिदेव चले गये तो चले गये, भगवान की तरफ गये। मेरे पति को भगवान ने अपने-आपमें समा लिया। अब पति की आकृति में ममता और विकार सब चला गया, भगवान रह गये। हम उस भगवान के रो रहे हैं- 'हे प्रभु !कब मिलेंगे....' यह ममता का, रुदन का सदुपयोग हो गया।

"बाबा ! झूठ बोलने की आदत है। क्या करें?"

ठीक है, खूब झूठ बोलो किंतु उसका सदुपयोग करो, भगवान खुश हो जायेंगे। आप मन ही मन ठाकुरजी के लिए सिंहासन सजाओ और भगवान से झूठ बोलो कि 'प्रभु ! आओ, आपके लिए सोने का सिंहासन बनाया है, बहुत नौकर-चाकर लगा रखे हैं, मक्खन मिश्री रखी है....' इस प्रकार मन में जो भी भाव आये ठाकुर जी को प्रसन्न करने के लिए बंडल पर बंडल मारते जाओ। झूठ बोलने की आदत है, कोई बात नहीं, उसको दबाओ मत और कर्मों में फँसाने वाला झूठ कभी बोलो मत। ठाकुर जी को रिझाने वाला झूठ रोज बोलो, धीरे-धीरे झूठ चला जायेगा। ठाकुर जी की प्रीति, ठाकुर जी की निगाहें और ठाकुर जी का माधुर्य आपके हृदय रति, प्रीति और तृप्ति के रूप में प्रगट होगा। कैसी है सनातन धर्म की व्यवस्था !

मिले हुए का आदर, जाने हुए में दृढ़ता और प्रभु में विकल्परहित विश्वास से आपका कर्मयोग हो जायेगा, भक्तियोग हो जायेगा, ज्ञानयोग हो जायेगा।

गरीबी से भी निर्दुःखता नहीं आती, अमीरी से भी निर्दुःखत नहीं आती बल्कि गरीबी व अमीरी का सदुपयोग करने से निर्दुःखता आती है और हृदय में परमात्मा का प्रागट्य हो जाता है। आपके पास गरीबी है तो डरो मत, उसका सदुपयोग करो, इससे आपके पास वह प्रगट होगा जिसके लिए दुनिया तरसती है। आप पठित हो या अनपढ़ हो, विद्वान हो या मूर्ख हो, बीमार हो या स्वस्थ हो, जैसे भी हो उसका सदुपयोग करे, भाई है तो भाईपने का सदुपयोग करे। मुख्य सम्पादक है तो सम्पादकपने का सदुपयोग करे। पत्रकार हो तो पत्रकारिता का सदुपयोग करे। सदुपयोग में इतनी शक्ति है कि उसके सहारे भगवान मिल जाते हैं।

'बाबा ! दुर्घटना हो जाय, दुःख आये उसका सदुपयोग करें तो क्या भगवान मिल जायेंगे ?' हाँ ! मर्खता का विद्वता का, धन-धान्य का सदुपयोग करें तो क्या भगवान मिल जायेंगे ?' हाँ बिल्कुल मिल जायेंगे। कुछ भी नहीं है, निपट-निराले एकदम कंगाल हैं, इस परिस्थिति का भी सदुपयोग करें तो क्या भगवान मिल जायेंगे ?' बोलेः हाँ !

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं-

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।

सुखं वा यदि वा दुखं स योगी परमो मतः।।

'हे अर्जुन ! जो योगी अपनी भाँति सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है और सुख या दुःख को भी सबमें सम देखता है, वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।'

(भगवदगीताः 6.32)

परिस्थिति कैसी भी आयें, उनमें डूबो मत। उनका उपयोग करो। समझदार लोग संतों से, सत्संग से सीख लेते हैं और सुख-दुःख का सदुपयोग करके बहुतों के लिए सुख, ज्ञान व प्रकाश फैलाने में भागीदार होते हैं और मूर्ख लोग सुख आता है तो अहंकार में तथा दुःख आता है तो विषाद में डूब के स्वयं का तो सुख, ज्ञान और शांति नष्ट कर लेते हैं, औरों को भी परेशान करके संसार से हारकर चले जाते हैं।

संसार से जाना तो सभी को है, हमको भी जाना है, आपको भी जाना है, यहाँ सब जाने वाले ही आते हैं। भगवान राम, भगवान श्रीकृष्ण, बुद्ध-महावीर सब आये और चले गये, हमारे दादे-परदादे सब चले गये तो हम कब तक ? यह शरीर तो जाने वाला है। जो जाने वाला है उसके जाने का सदुपयोग करो और जो रहने वाला है उसको सत्संग के द्वारा पहचान कर अभी आप निहाल हो जाओ, खुशहाल हो जाओ, पूर्ण हो जाओ।

पूर्ण गुरु किरपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान।.....

तो अब करना क्या है ? गरीब होना है ? अमीर होना है ? यहाँ रहना है ? परदेश जाना है ? क्या करना है ?

कुछ करना नहीं है, कोई परिवर्तन की इच्छा नहीं करनी है, जो कुछ हो रहा है उसका सदुपयोग करना है। 'ऐसा हो जाय, वैसा हो जाय, ऐसा बन जाऊँ....' इस चक्कर में मत पड़ो।

प्रारब्ध पहले रच्यो, पीछे भयो शरीर।

तुलसी चिंता क्या करे, भज ले श्री रघुवीर।।

पुरुषार्थ अपनी जगह पर है, प्रारब्ध अपनी जगह पर है, दोनों का सदुपयोग करने वाला धन्य हो जाता है।

परिस्थिति कैसी भी आये, अपने चित्त में दुःखाकार या सुखाकार वृत्ति पैदा होगी लेकिन उस वृत्ति को बदलकर भगवदाकार करना, यह है परिस्थिति का सदुपयोग। धन आया, सत्ता आयी, योग्यता आयी और अहंकार बढ़ाया तो आपने इनका दुरुपयोग किया। यदि धन से 'बहुजन हिताय-बहुजनसुखाय' का नजरिया बना और मिली हुई योग्यता का सत्यस्वरूप ईश्वर के ज्ञान में, शांति में, ईश्वरप्रसादजा बुद्धि बनाने में सदुपयोग किया तो आप और ऊपर उठते जायेंगे, अनासक्त भाव से और ऊँचाइयों को छूते जायेंगे। बाहर की ऊँचाई दिखे चाहे न दिखे लेकिन अंतरात्मा की संतुष्टि, प्रीति और तृप्ति आपके हृदय में आयेगी।

ऋषि प्रसाद, जून 2010, पृष्ठ संख्या 18,19,20 अंक 210

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गुरुवार, 18 अगस्त 2011

अंधकार में अवतार लिया... प्रकाशमय जग को किया


श्री कृष्ण जन्माष्टमीः 21-22 अगस्त 2011

(पूज्यपाद बापू जी के सत्संग-प्रवचन से)

भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी की रात... बारिश हो रही है और वसुदेव – देवकी कारागार में हैं.... उनके रिश्तेदार भय और आतंक से आतंकित हैं, दुःख में हैं, शोषित हो रहे हैं। ऐसों के यहाँ आने के लिए भगवान श्रीकृष्ण मध्यरात्रि, अँधेरी रात चुनते हैं। अंधकार में पड़े हुए जीव के यहाँ, साधक के यहाँ प्रकाशमय श्रीकृष्ण, दुःख में डूबे हुए समाज के यहाँ सुख स्वरूप श्रीकृष्ण, विषाद में पड़े हुए लोगों के बीच, माधुर्य बरसाने वाले कृष्ण का अवरतरण होता है। कहाँ होता है ? जेल में किसके यहाँ होता है ? वसुदेव-देवकी के यहाँ।

शुद्ध बुद्धि का नाम है देवकी और सत्त्वमय प्रकाश का नाम है वसुदेव। इस जीव का सत्त्वमय प्रकाश हो और शुद्ध बुद्धि हो तो इसके हृदय में भी श्रीकृष्ण का अवतरण होता है, प्रागट्य तो वसुदेव-देवकी के यहाँ होता है परंतु पोषण होता है नंद-यशोदा के यहाँ। वसुदेव जी कृष्ण को ले गये और यशोदा की गोद में रख दिया। यशोदा सोयी है, न माला कर रही है, न इंतजार कर रही है, सोयी हुई यशोदा के पास कृष्ण पहुँचते हैं। अपने लीला-माधुर्य में सराबोर करने के लिए श्रीकृष्ण क्या करते हैं ? रोते हैं।

यशोदा के यहाँ शक्ति का, माया का जन्म हुआ है और वसुदेव – देवकी के यहाँ आनंद का प्रागट्य हुआ है। शक्तिवाले सोते रहते हैं और आनंदवाले जागते और जगाने वाले को छुड़ाने का काम करते हैं। वसुदेव जी माया को ले गये। कृष्ण ने ऊवाँऽऽऽ.....ऊवाँऽऽऽ करके मैया को जगाया कि 'मैं आया हूँ तेरे घर, अब तू कब तक सोयेगी ?' सोये हुए को जगाना यह भगवान का भगवदपना है। असाधनवाले को भी सहज में मिलना यह भगवान का भगवदपना है।

जन्माष्टमी के दिन किया हुआ जप अनंत गुना फल देता है। युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण से पूछाः "जन्माष्टमी के उपवास से क्या फायदा होता है?" श्रीकृष्ण बोलेः "उस व्यक्ति के जीवन में धन-धान्य, यश की कमी नहीं रहेगी।" जन्माष्टमी के दिन अगर कोई संसार-व्यवहार करता है तो विकलांग संतान होगी अथवा तो जानलेवा बीमारी पकड़ लेती है।

श्रीकृष्ण मथुरा जा रहे हैं तो सड़कों पर लोग दायें-बायें खड़े हैं और उनके रूप-लावण्य, माधुर्य, उनकी चितवन का आनंद ले रहे हैं। लोग तो कृष्ण को देखकर गदगद हो रहे हैं पर कृष्ण एक कुबड़ी स्त्री पर टिकटिकी लगाये हुए हैं। उसका नाम है कुब्जा, वह कंस के पास अंगराग लेकर जा रही है। कृष्ण बोलते हैं- "ओ सुन्दरी !''

उस कुरुपा में भी सौंदर्य देखने वाला कैसा है तुम्हारा अकालपुरुष ब्रह्म ! कुब्जा ने सोचा कि 'किसी सुंदरी को बुलाते होंगे, मैं तो कुब्जा हूँ।'अनसुना करके खबुर-खबुर जूतियाँ घसीटती हुई धूल उड़ाती जा रही है। श्रीकृष्ण ने फिर से आवाज लगायीः "ओ सुन्दरी !" उसने देखा कि यहाँ तो छोरे-छोरे हैं, कोई छोरी तो है नहीं ! वह आगे बढ़ी। श्रीकृष्ण ने फिर से प्रेम में भरकर कहाः "ओ सुन्दरी !" अब उसका छुपा हुआ प्रेमस्वभाव छलका, उसने कहाः "बोलो सुन्दर !"

कृष्ण बोलेः "यह अंगराग मुझे दोगी ?"

बोलीः "हाँ ! लो, लगा लो, लगा लो।"

बात बन गयी। कुछ न कुछ दिये बिना जीव कैसे मुझे पायेगा ! अंगराग माँग लिया। विश्व को देने वाले वे दाता अंगराग लगाने वाली एक साधारण कुब्जा-कुरुपा, कुबड़ी को बोलते हैं- "ए सुंदरी !" और वह कृष्ण को बोलती हैः "बोलो सुन्दर !" काम बन गया !

श्रीकृष्ण बताते हैं कि प्रेम ही विश्व में राज्य करता है। स्वामी रामतीर्थ बोलते थे यह कायदा-कानून तो अपने अधिकार की रक्षा और दूसरे का शोषण करने का एक राजमार्ग है। डण्डे के बल से, आतंक के बल से जो करवाया है, वह लोग बेचारे मजबूरन करते हैं और व्यवस्था है त वह प्रेम के बल से है। माँ बच्चे को प्रेम से पालती-पोसती है। बच्चा भी कर्तव्य समझकर प्रेम से माँ-बाप, गुरु या समाज की सेवा करता है। संत कबीर जी कहते हैं-

प्रेम न खेतों ऊपजे प्रेम न हाट बिकाय।

राजा चहो प्रजा चहो शीश (अहं) दिये ले जाय।।

और तुम्हारा वास्तविक स्वभाव प्रेम है। प्रेम जब धन में फँसता है तो लोभ बनता है, परिवार में फँसता ह तो मोह बनता है, शरीर की अहंता में फँसता है तो अहंकार बनता है। प्रेम अगर किसी नाम-रूप में उलझता है तो मायामय बनकर फँसाता है और प्रेम को अगर शुद्ध-बुद्ध रूप में देखा जाय तो वह परमात्मा ही है।

अंगराग लिया और उसके पैर पर पैर रखके ठोड़ी को यूँ झटका मारा तो सचमुच वह कुबड़ी सुंदरी हो गयी। कृष्ण कन्हैया लाल की जय !

भगवान का भगवानपना केवल अवतारकाल में ही नहीं था, वह अब भी है। हमारा भगवान यह नहीं जो कभी हो और कभी न हो, कहीं हो और कहीं न हो, किसी में हो और किसी में न हो, उसको भारतवासी पूर्ण परमात्मा नहीं मानते। आया और चला गया, फिर नहीं है उसको हम भगवान नहीं मानते। भगवान तो हम मानते हैं जो पहले थे, अभी हैं और बाद में रहेंगे। कभी साकार रूप मे विशेष लीला करने के लिए प्रेमावतार में आ गये, मर्यादा-अवतार में आ गये, कच्छप-अवतार में आ गये, मत्स्य-अवतार में आ गये और सर्वत्र ज्यों के त्यों भरपूर भी रहे... जिस-जिस अवतार में जितनी बुद्धि, योग्यता और सामर्थ्य की आवश्यकता होती है, उतना ही प्रगट करते हैं और फिर वह अवतार अन्तर्धान हो जाता है, फिर भी भगवान सबमें रहते हैं। जैसे कहीं-कहीं छोटी तरंग, कहीं बड़ी, कहीं बहुत बड़ी तरंग.... फिर भी समुद्र में पानी हो तो व्याप रहा है।

जीवन केवल समस्याएँ और उनके समाधान के लिए नहीं है। जीवन हास्य के लिए, विनोद के लिए, आनंद के लिए, माधुर्य के लिए, अपने सुखस्वभाव को छलकाने के लिए है और अंतरात्मा में विश्रान्ति पाने के लिए है। श्रीकृष्ण के पास गंधर्व-विद्या है। उसमें वाद्ययंत्र भी होता है, गायन और नृत्य भी होता है। वाद्य में भी बंसी सर्वोपरि है तो उसको बजाने वाले श्रीकृष्ण भी सर्वोपरि हैं।

श्रीकृष्ण ने इतना मन लगाकर चार वेद, चार उपवेद का ज्ञान पाया कि उनके ज्ञान की थोड़ी-सी छटा है, जो गीता होकर विश्वंदनीय हो रही है। ऐसे श्रीकृष्ण के अवतरण का दिवस है जन्माष्टमी-महोत्सव।

आप कभी यह नहीं मानना कि वे दूर हैं, दुर्लभ हैं, परिश्रम से मिलेंगे, पराये हैं, कुछ साधन होगा, कुछ तपस्या होगी, कुछ क्या-क्या होगा। तब मिलेंगे.... नहीं-नहीं। सो साहिब सद सदा हजूरे, अंधा जानत ताको दूरे। श्रीकृष्ण सुबह उठते हैं तो शांत भाव में रहते हैं। वे तुम्हें प्रेरणा देते हैं कि प्रातः उठते ही अपने आत्मस्वभाव में, आनंद-स्वभाव में, शांतस्वभाव में संकल्परहित स्थिति में टिक रहो। जिसको जाना है उसका आदर करो, जिसको माना है उसमें दृढ़ श्रद्धा करो। करने की शक्ति का, जानने की शक्ति का, मानने की शक्ति का ठीक सदुपयोग करो।

गुरु की वाणी वाणी गुर, वाणी विच अमृत सारा।

भगवान ने गुरुरूप में अर्जुन को तत्त्वज्ञान का उपदेश दिया और अर्जुन ने स्थिति पायी। अर्जुन कहता हैः नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा। तो गीता के ज्ञान से ही आम आदमी को यह संदेशा मिलता है कि भगवान के साकार दर्शन के बाद भी जब भगवद्-तत्त्व का ज्ञान देने वाले गुरु हमको मिलें अथवा भगवान गुरु की भूमिका अदा करें, तब हम दुःखों से बचते हैं। इसलिए कहते हैं-

गुरुकृपा ही केवलं शिष्यस्य परं मंगलम्।

मंगल तो देवता की कृपा से हो जायेगा, तपस्या से हो जायेगा, किसी के वरदान से हो जायेगा, किसी के साथ-सहयोग से हो जायेगा परंतु परम मंगल तो सदगुरु के, साक्षात्कारी महापुरुष के ज्ञान से ही होगा। श्रीकृष्ण ऐसे सदगुरु हैं, ऐसे महापुरुष हैं।

जो विद्या अरण्य में दी जाती है वह युद्ध के मैदान में श्रीकृष्ण ने बंसी बजाते हुए दी है। वीर अर्जुन को भी उस गीता का प्रसाद मिलता है और भक्त संजय को भी मिलता है। बाहर से और भीतर से जो अंधे हैं धृतराष्ट्र.... बाहर से आँखें नहीं हैं और भीतर से ऐसी ममता है कि भीतर से भी कुछ सूझता नहीं है, उन्हें भी गीता का प्रसाद मिला है।

वैदिक धर्म में प्रार्थनाएँ हैं, मंदिर में प्रार्थनाएँ करते हैं, यकीन-श्रद्धा है, करूणा भी है, अहिंसा भी है किंतु एक खास बात है – विशेषता यह है कि इसमें हित की प्रधानता है। अगर उँगली कटाने से हाथ बच जाता है तो उँगली काटो। अगर हाथ कटाने से शरीर बच जाता है तो हाथ कटाओ। दुर्योधन को मारने से मानवता की रक्षा होती है तो दुर्योधन को पहुँचाओ। अर्जुन कहता है कि "मैं भिक्षा माँगकर खाऊँगा, युद्ध नहीं करूँगा।" कृष्ण ने प्रोत्साहित किया कि 'जो आततायी हैं, जो निर्दोषों को सताते हैं और फिर मानते नहीं हैं, ऐसे लोगों को दण्ड देना क्षत्रिय का कर्तव्य है।'

कर्तव्यता में देखो तो कृष्ण पूर्ण ! केवल कर्तव्य, नृत्य, हास्य- विनोद है ऐसा नहीं, वैराग्य भी उनमें पूर्ण है। भगवान के छः-के-छः ऐश्वर्य कृष्ण-अवतार में छलकते हैं। बारह साल वृंदावन नहीं आये। नहीं तो ललनाएँ तरस रही हैं, लाले पुकार रहे हैं... कैसा वैराग्य ! गोवर्धन उठाने का ऐश्वर्य भी भगवान में है। धर्म-अनुष्ठान करते हैं, धर्म भी पूर्ण है। यश भी पूर्ण है। अर्जुन और उद्धव जैसों को ज्ञान देने का सामर्थ्य श्रीकृष्ण में है।

अमीरी की ऐसी की, सब जर लुटा बैठे।

फकीरी की तो ऐसी की, ज्ञान के द्वार आ बैठे।।

जीवन में लोलुपता का अभाव, भय का, शुष्कता का अभाव देखना है तो श्रीकृष्ण के जीवन में देखो। श्रीकृष्ण के बेटे उनकी बात नहीं मानते और कभी उनके मुँह पर सुना भी देते हैं किंतु कृष्ण उदास नहीं होते। आज साधारण सेठ का बेटा नहीं मानता तो सेठ कहता हैः "मैं तो मर गया ! दो छोकरे तो मानते हैं पर तीसरा ऐसा है।" आँसू बहार रहे हैं... दो मान रहे हैं उसकी खुशी में तू बंसी बजा। श्रीकृष्ण के बेटे तो मानते ही नहीं थे। साधु-संत आते, अरे ! भीम जैसे आते, युधिष्ठिर आते तो श्रीकृष्ण खड़े हो जाते, ऐसे शिष्टाचार के धनी। और श्रीकृष्ण के छोरे तो साधु-संत जा रहे थे तो उनकी मखौल उड़ाने के लिए एक लड़के को तसला बाँध के, अंदर मूसल रख के महिला का पहनावा पहना के बोलेः "महाराज ! यह गर्भवती है। इसको बेटा होगा कि बेटी ?" संत बोलेः "न बेटा आयेगा, न बेटी आयेगी, तुम्हारा नाश करने वाला आयेगा।" लो ! इन शैतानों की शैतानियत समाज को दुःख देगी इसलिए अपने होते-होते अपने बेटों को भी ऋषियों के द्वारा रवाना करते हैं। कैसा वैराग्य ! कैसा समाज के हित की भावना से भरा हुआ यह भगवान है !!

सचमुच, हम भाग्यशाली हैं कि हमारा वैदिक धर्म में जन्म हुआ है, हम और भी महाभाग्यशाली हैं कि भारतीय संस्कृति का जो स्तम्भ है ऐसा वेद और गीता का ज्ञान सुनने और सुनाने वाले माहौल में हम पैदा हुए हैं। आप 'दासोऽहम्-दासोऽहम्' करके सिकुड़-सिकुड़ के दीन-हीन होकर अपनी शक्तियों को कुंठित मत करिये। आप तो संकल्प कीजियेः "मैं भगवान का हूँ, भगवान मेरे हैं। भगवान विकारों के बीच भी निर्विकार हैं तो मैं भी विकारों के बीच भी निर्विकार रहूँगा। भगवान सुख में आसक्त नहीं होते और दुःख में दुःखी नहीं होते, दुःख का भी सदुपयोग करते हैं तो मैं भी ऐसा करूँगा।'

जब जाने का समय हुआ तो एक शिकारी के द्वारा संसार से विदाई ले रहे हैं। शिकारी ने देखा कि यह कोई मृग है, कसा निशाना और तीर श्रीकृष्ण के पैर के तलवे में लगा। शिकारी शिकार समझ के दौड़ता हुआ आया, देखा तो घबराया। श्रीकृष्ण बोलेः "कोई बात नहीं। मैं जानता हूँ ऐसी होनी थी तू जा, निश्चिंत हो जा।"

आखिरी श्वास लेने की वेला है और जिसने तीर मारा है उसको देखकर भी नाराजगी नहीं होती। क्या बात है ! कैसा है तुम्हारा भगवान !!'हाय रे, ए तू चला जाऽऽ... अब मैं प्राण-त्याग करता हूँ... आह....!!' ऐसा करक नहीं गये। अंतिम यात्रा कैसे करनी चाहिए यह भी कृष्ण बताते हैं।

आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।

सुखं व यदि दुःखं स योगी परमो मतः।।

'हे अर्जुन ! जो योगी अपनी भाँति सम्पूर्ण भूतों में सम देखता है और सुख अथवा दुःख को भी सबमें सम देखता है वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है।'

(गीताः 6.32)

सुखद अवस्था आये तो भी, दुःखद अवस्था आये तो भी आप अपने परम ज्ञान में रहिये, परम चेतना में रहिये, परम आनन्द में रहिये और परमपुरुष गुरु के तत्त्व में रहिये, उलझिये मत।

कंस को तो हृदयाघात करके भेज सकते थे अथवा त और कोई दुश्मन देकर पहुँचा सकते थे परंतु भगवान का भगवदपना यह है कि एक उद्देश्य के पीछे कई कल्याणकारी उद्देश्यों को लेकर वर अव्यक्त सत्ता व्यक्त हो जाती है, निराकार साकार हो जाता है, अजन्मा सजन्मा हो जाता है, सबसे असंग रहने वाला सबका संगी बन जाता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2010, पृष्ठ संख्या 16,17,18,19 अंक 212

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बुधवार, 17 अगस्त 2011

हृदयमंदिर की यात्रा कब करोगे ?


कलकत्ता में दो भाई रहते थे। दोनों के पास खूब धन-सम्पदा थी। उनके बीच इकलौता बैटा था प्राणकृष्ण सिंह। ये दोनों भाइयों की सम्पत्ति के एकमात्र उत्तराधिकारी थे। उनके यहाँ भी एक ही लड़का था। उसका नाम था कृष्णचंद्र सिंह। उनके दादा जी, पिता उन्हें प्यार से'लाला' कहकर पुकारते और नौकर-चाकर 'लालाबाबू' कहते थे। शिक्षा प्राप्त करने के बाद लालाबाबू की वर्धमान कलेक्टरी के सेरेस्तादार पद पर नियुक्ति हो गयी। बाद में उड़ीसा के सर्वोच्च दीवान के पद पर भी उन्हें नियुक्त किया गया।

समय बीता, लालाबाबू के पिताजी का स्वर्गवास हो गया। पिता की जमींदारी और सारी सम्पदा की देखभाल का भार इनके ऊपर आ गया। इनके दादाजी अंग्रेज शासन काल में दीवान थे और बड़ी धन-सम्पदा के मालिक थे।

लालाबाबू कलकत्ता में अपने कामकाज से समय निकाल कर शाम को गंगाजी के किनारे घूमने निकल जाते। पाँच-पचीस मुनीम, मैनेजर और खुशामदखोर साथ चलते। नौकर-चाकर आरामदायक कुर्सी लगा देते, चाँदी का हुक्का रख देते। लालाबाबू आराम से हुक्का गुड़गुड़ाते और गंगाजी की लहरों का आनन्द लेते।

एक शाम को लालाबाबू गंगा किनारे बैठे थे। कोई माई अपने कुटुम्बी को जगा रही थीः "लाला ! शाम हो गयी, कब तक सोओगे, जागो। दे ह्वै गयी, दिन बीतो जाय रियो है। लालाबाबू ! देर ह्वै गयी, जागो !"

पुण्यात्मा लालाबाबू ने सोचा कि 'सच है, देर हो रही है। जिंदगी का उत्तरकाल शुरु हो रहा है, बाल सफेद हो रहे हैं, अब जागना चाहिए। समाज की चीज धन-दौलत, वाहवाही.... ये कब तक !"

घर आये और कुटुम्बियों से कहाः "अब मैं वृंदावन जाऊँगा। जीवन की साँझ हो रही है, देर हो रही है। मेरे को जागना है।"

सब छोड़-छाड़कर वृंदावन में आ गये। भिक्षुक लोग जैसे भिक्षा माँगते हैं, ऐसे अन्नक्षेत्रों से टुकड़ा माँगकर खाते और 'राधे-राधे, राधे-कृष्ण, राधे-राधे-राधे.....' का जप कीर्तन करते। देखा कि 'अब मैं टुकड़ा माँगकर खाता हूँ पर और साधु-संत भी भिक्षा माँग रहे हैं। घर पर खूब सम्पदा है, वहाँ से धन मँगाकर साधु-संतों के लिए अन्नक्षेत्र और उनके निवास के लिए कुछ आश्रम-वाश्रम बनवायें।'

रंगजी के मंदिर में दर्शन करने गये तो मन में हुआ कि 'सेठ लक्ष्मीचंद ने यह मंदिर बनवाया है, मैं खूब धन लगाकर इससे भी बढ़िया मंदिर बनवाऊँ।'

घर से कुछ सम्पदा मँगाकर लालाबाबू ने बाँके बिहारी जी का मंदिर बनवाया। अब भगवान को पाने की तड़प ने लालाबाबू की जिज्ञासा जगायी कि अगर ठाकुरजी की प्राण प्रतिष्ठा विधिपूर्वक हुई है तो मूर्ति में प्राण चलने चाहिए।

सर्दियों के दिन थे। लालाबाबू ने पूजारी को मक्खन की एक टिक्की दी और बोलेः "ठाकुर जी के सिर पर रखो। यदि प्राण चलते हैं तो शरीर में गर्मी होती है, मस्तक की गर्मी से मक्खन पिघलेगा।"

उनकी सदभावना से ठाकुरजी के सिर पर रखा हुआ मक्खन पिघलने लगा। वे बड़े भाव विभोर हो गये और जोर जोर से पुकारने लगेः "जय हो प्रभु ! जय हो !! राधे गोविन्द, राधे-राधे, राधे-गोविन्द-राधे, कृष्ण-कण्हैया लाल की जय !" दण्डवत प्रणाम करके ठाकुरजी के चरणों में गिर पड़े। जैसे तुलसीदास जी के कहने से भगवान श्रीकृष्ण ने बंसी छोड़ दी और धनुष उठाया था, ऐसे ही बाँके बिहारी ने प्रार्थना सुन ली। बाँके बिहारी की मूर्ति से शरीर की गर्मी का प्रमाण मिल गया। मन में संतोष हुआ कि ठाकुर जी में प्राण प्रतिष्ठा हुई है, मूर्ति में चैतन्य जागृत हो गया है।

कुछ दिनों बाद फिर परीक्षा का विचार आया। पुजारी को पतली सी रूई दी और बोलेः "ठाकुर जी की नासिका पर रखो। अगर प्राण-प्रतिष्ठा हुई है तो शरीर में प्राण भी चलने चाहिए। देखें, ठाकुर जी श्वास लेते हैं कि नहीं।"

पुजारी ने रूई रखी तो देखते हैं कि ठाकुरजी की मूर्ति के निःश्वास से रूई हिल रही है ! लालाबाबू अहोभाव से भर गये। लेकिन कुछ समय के बाद देखा कि 'अब भी ठाकुरजी के स्वरूप का ज्ञान नहीं हुआ। मेरे सदभाव से, संकल्प से, शुद्ध पूजा से ठाकुरजी की मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा का तो मैं एहसास करता हूँ परंतु मेरे प्राण, मन ठाकुर जी में रमण करें तब तो बात बने।'

उस समय कृष्णदासजी महाराज प्रसिद्ध थे वृंदावन में। लालाबाबू उनके पास गये और प्रार्थना कीः "महाराज ! मुझे भगवान से मिलाओ, भगवान के दर्शन कराओ, भगवान के स्वरूप का ज्ञान, भगवान की प्रीति का दान दे दो।"

कृष्णदास जी महाराज बोलेः "अभी समय नहीं हुआ है, समय होगा तो मैं तुम्हें खुद आकर दीक्षा दे दूँगा।"

लालाबाबू सोचने लगे कि 'सब कुछ छोड़कर आया हूँ, पढ़ा लिखा हूँ, सदभाव से ठाकुरजी मममें प्राण-प्रतिष्ठा का एहसास भी मुझे हो गया किंतु गुरु जी मुझे बोलते हैं कि अभी समय नहीं हुआ है, मैं दीक्षा के योग्य नहीं हुआ हूँ। क्या कमी है ?'

अपनी कमी खोजने जाओ ईमानदारी से तो जल्दी मिल जायेगी। हम अपनी कमी जितनी जानते हैं उतना हमारे कुटुम्बी नहीं जानते, पड़ोसी नहीं जानते, दूसरे नहीं जानते। अपनी कमी पर चादर रखने से हमारी मति-गति और जिज्ञासा दब जाती है। अगर अपनी कमी निकालकर फेंक दें तो हमारे हृदय में परमेश्वर यूँ छलकते हुए प्रकटते हो जायें ! जैसे बोर करने से मिट्टी, कंकड़ हट जाते हैं तो पानी के झरने अंदर मिल जाते हैं और खूब नित्य नवीन जलधारा मिलती रहती है, ऐसे ही अपनी कमी निकालें तो नित्य नवीन सुख, नित्य नवीन प्रेमरस, ज्ञानरस और आरोग्य रस मिलता रहता है। लेकिन हमने वासनाओं से पर्दे से, इच्छाओं के कंकड़ और मिट्टी से उसे दबाकर रखा है, इसलिए स्वास्थ्य के लिए औषधि लेनी पड़ती है, ज्ञान के लिए पोथे रटने पड़ते हैं, प्रसन्नता के लिए क्लबों में भटकना पड़ता है। जिसके जीवन में भगवदरस आ गया उसको प्रसन्नता के लिए क्लबों में नहीं जाना पड़ता, वह निगाह डाल दे तो लोगों में प्रसन्नता छा जाय।

लालाबाबू कमी खोजते गये तो पाया कि 'मेरे में कमी तो है। लक्ष्मीचंद सेठ ने रंगजी का मंदिर बनवाया और मैंने उनके प्रति प्रतिस्पर्धी भाव रखा। उनके साथ मुकद्दमेबाजी भी की। मुकद्दमे में जीत गया, मेरे में यह अहं भी है।'

जब तक अहं रहता है तब तक ठाकुरजी की प्राप्ति नहीं होती।

खुदी को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले।

खुदा तुझसे पूछे कि बंदे ! तरी रजा क्या है ?

अभी खुदी अहंवाली है, खुदी ईश्वर में नहीं खोयी।

रंगजी के मंदिर के बाहर अन्न क्षेत्र में गरीब गुरबों को भोजन मिलता था। जहाँ सब याचक लोग कतार में खड़े रहते थे, वहाँ जाकर वे खड़े रह गये। नौकर ने सेठ लक्ष्मीचंद को बताया कि "लालाबाबू जिन्होंने रंगजी के मंदिर जैसे ही भव्य मंदिर बनवाया, साधु-संतों के लिए सदावर्त खोला, वे स्वयं भिक्षा माँगने के लिए अपने यहाँ खड़े हैं।"

सेठ लक्ष्मी चंद कच्चा सीधा, पक्की रसोई और सौ अशर्फियाँ लेकर हाजिर हो गये कि "महाराज ! स्वीकार करें।"

लालाबाबू बोलेः "यह आप मुझ भिक्षुक के लिए लाये हैं ! भिक्षुक को यह शोभा नहीं देता। आप इतना सारा सामान उठाकर लाये हैं, यह आप मेरी सम्पदा का स्वागत कर रहे हैं। इसका मैं अधिकारी नहीं हूँ। मैंने तो आपसे मुकद्दमेबाजी की थी, अब आप मुझे क्षमा कीजिए। एक भिक्षुक, तुच्छ भिक्षुक, आपके द्वार का भिखारी मानकर मुट्ठी भर अन्न दे दीजिए। मैं उसी से निर्वाह कर लूँगा।"

ये नम्रता के, अहंशून्यता के वचन सुनकर लक्ष्मीचंद सेठ के हृदय में छुपे हुए हृदयेश्वर का, परमात्म-सत्ता का भक्तिभाव छलका। आँखों में आँसू, हृदय में प्यार...

लक्ष्मीचंद बोलेः "यह क्या कह रहे हो लालाबाबू !"

लालाबाबू ने कहाः "लक्ष्मीचंद ! क्षमा करो, मैं आपका गुनहगार हूँ।"

दो और दो चार आँखें लेकिन प्रेमस्वरूप परमात्मा दोनों के द्वारा रसमय होकर छलक रहा है, द्रवीभूत हो रहा है। दोनों गले लगे और दोनों एक दूसरे के चरणों में दण्डवत प्रणाम करने लगे। इतने में कृष्णदास महाराज आये और बोलेः "लालाबाबू ! आ जाओ, दीक्षा का समय हो गया है।"

कृष्णदास जी ने लालाबाबू को दीक्षा दी और कहाः "भगवान को प्राप्त करना है तो किसी से मिलो मत, जब तक ईश्वरप्राप्ति न हो तब तक इसी गुफा में रहो। भिक्षा तुम्हें हम यहीं भिजवा देंगे।"

अमीरी की तो ऐसी की, सब जर लुटा बैठे।

फकीरी की तो ऐसी की, कृष्णदास की गुफा में आ बैठे।।

सातत्य.... भक्ति में सातत्य ! हम लोग थोड़ी भक्ति करते हैं, थोड़ा साधन करते हैं और बहुत सा असाधन करते हैं इसलिए ईश्वरप्राप्ति का रास्ता लम्बा हो जाता है, नहीं तो ईश्वर तो हमारा आत्मा है। जिसको हम कभी छोड़ नहीं सकते वह परमात्मा है और जिसको सदा न रख सकें उसी का नाम संसार है।

तो लालाबाबू ने अपना कल्याण कर लिया। ब्रह्मज्ञानी गुरु के चरणों में पहुँच गये और हृदय मंदिर की यात्रा की। पुत्रों और पत्नी के मोहपाश में न पड़े, प्रभुप्रेम में पावन हुए। लालाबाबू ने तो अपना काम बना लिया। अब हम इस माया से निपटकर किस दिन कल्याण के मार्ग पर चलेंगे ?

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2010, पृष्ठ संख्या 20,21,22 अंक 211

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गुरु की आवश्यकता क्यों ?

बात दो टूक, पर है सच्ची !

स्वामी श्रीअखंडानंदजी सरस्वती

गुरु की आवश्यकता क्यों ?

यूँ तो प्रत्येक ज्ञान में गुरु की अनिवार्य उपयोगिता है परंतु ब्रह्मज्ञान के लिए तो दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है। गुरु के बिना उपासना-मार्ग के रहस्य मालूम नहीं होते और न उसकी अड़चनें दूर होती है। जो उपासना करना चाहता है, वह गुरु के बिना एक पग भी नहीं बढ़ सकता। गुरु के संतोष में ही शिष्य की पूर्णता है। एक दृष्टांत कहता हूँ – मेरे बचपन का एक मित्र था। हम दोनों वर्षों से मिले नहीं किंतु पत्र-व्यवहार चलता था। एक बार मैं उसके घर गया पर उसने पहचाना नहीं। मैंने अपना नाम नहीं बताया और उसके साथ खुला व्यवहार करने लगा। वह तो हैरान हो गया। इतने में किसी ने मेरा नाम ले दिया तो आकर गले से लिपट गया। अब देखो कि मैं उसके सामने प्रत्यक्ष था परंतु नेत्रों के सामने होना एक बात है और पहचानना दूसरी वस्तु है।

हमारा आत्मा जो ब्रह्म है, हमसे कहीं दूर नहीं है। सदा सोते-जागते, उठते-बैठते अपने साथ है। यह नित्य प्राप्त है। इसमें वियोग की सम्भावना नहीं है। परंतु ऐसे नित्य प्राप्त आत्मा को हम पहचान नहीं रहे हैं। यदि इसमें स्थित होने से इसकी पहचान होती तो सुषुप्ति में, समाधि में हो जाती। पास रहते हम इसे पहचान नहीं रहे हैं तो बताने वाले की आवश्यकता है। जब तक कोई बतायेगा नहीं कि 'वह ब्रह्म तो तू ही है' तब तक उसका ज्ञान नहीं होगा।

उस ब्रह्म को आत्मरूप से जानने के लिए साधन-सम्पन्न जिज्ञासु हाथ में समिधा लेकर श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ सदगुरु की शरण में जाय।

सदगुरु प्राप्त हो जायें तब क्या करें ?

तब उनकी विनय से सेवा करें और उसके प्रति प्रेम करें। उनमें दोष बुद्धि न करें और उनके महत्त्व को हृदयंगम करके उनसे ही अपने कल्याण की आशा करें। इस प्रकार सेवा और भक्ति से सदगुरु को अपने अनुकूल बनायें।

जब तक हम सदगुरु को भगवान के रूप में नहीं देख पाते, उनसे प्रवाहित होने वाले भगवदज्ञान को स्वीकार नहीं करते और उनकी प्रत्येक क्रिया हमें लीला के रूप में नहीं मालूम होने लगती, तब तक गुरुकरण नहीं हुआ है, ऐसा समझना चाहिए। सदगुरु मानने के पश्चात उन्हें भगवान से नीचे कुछ भी समझना पतन का हेतु है। इस भगवदस्वरूप में वे ही एक हैं, जगत के और जितने भी गुरु हैं वे मेरे गुरु के लीलाविग्रह हैं। सर्वत्र उन्हीं का ज्ञान और उन्हीं का अनुग्रह प्रकट हो रहा है।

मंत्रदान के पश्चात गुरु की मनुष्यरूप में प्रतीती होना, यह तो शिष्य की कल्पना है। वास्तव में गुरु परमात्मा ही हैं। इन गुरु की शरण और इनके करकमलों की छत्रछाया पाकर शष्य धन्य-धन्य हो जाता है।

सदगुरु के प्रति शिष्य के हृदय में जितनी श्रद्धा, प्रेम और उनके महत्त्व का ज्ञान होता है, उसी के अनुसार उनसे शिष्य का व्यवहार होता है। जिह्वा पर 'गुरू' शब्द के आते ही शिष्य गदगद हो जाता है। गुरु का स्मरण कराने वाली वस्तु को देखकर लोट-पोट होने लगता है। गुरू सबसे श्रेष्ठ हैं, गुरु साक्षात् भगवान हैं, गुरु की पूजा ही भगवत्पूजा है। गुरु, गुरुमंत्र और इष्टदेवता ये तीन नहीं एक हैं। शिष्य अधिकारहीन होने पर भी यदि सदगुरू की शरण में पहुँच जाय तो वे उसे अधिकारी बना लेते हैं। पारस तो लोहे को ही सोना बनाता है अन्य धातु को नहीं, पर सदगुरू अधिकारहीन को भी अधिकारी बनाकर परम पद दे देते हैं।

जिस शरीर से सदगुरु की प्राप्ति हुई है, उस शरीर के प्रति अपनी कृतज्ञता कैसे प्रकट की जाय ?

उस शरीर को परमात्मा की, सदगुरु की सेवा में लगा दिया जाय – यही कृतज्ञता है। सेवा क्या है ? पाँव दबाने का नाम सेवा नही है, न पानी भरने का, उनके विचार में अपना विचार, उनके संकल्प में अपना संकल्प, उनकी पसंदगी में अपनी पसंदगी मिला देने का नाम सेवा है, यह सच्ची सेवा है। सेवा अपने मन की पसंद नहीं है, जिसकी सेवा की जाती है उसकी पसंद है। सदगुरु के प्रति अपने जीवन को समर्पित कर देना ही कृतज्ञता है और यही भगवान की भी सेवा है।

गुरू और इष्ट एक ही हैं – यह बुद्धि कैसे हो ?

आत्मा और परमात्मा एकी है, ज्यों-ज्यों इस बुद्धि के निकट पहुँचते जायेंगे त्यों-त्यों गुरू और परमात्मा की एकता समझ में आती जायेगी। ईमानदारी से देखो कि आप कितनी गहराई के साथ शालग्राम की शिला को परमात्मा समझते हो। जयपुर से या वृंदावन से गढ़ी हुई जो मूर्तियाँ निकलती हैं, उनको आप कितनी ईमानदारी, कितनी गहराई से साक्षात् भगवान समझते हैं। जब हम अपने आत्मा को सच्चाई और ईमानदारी से हड्डी, मांस के शरीर से अलग, क्रिया-प्रक्रिया से अलग, इच्छाओं एवं भिन्न-भिन्न विचारों से अलग और जाग्रत, स्वप्न, सुषप्ति से भी अलग जितनी सूक्ष्मता से समझेंगे, उतनी ही सूक्ष्मता में गुरु को समझेंगे। और जितनी सूक्ष्मता में अपने को और गुरु को समझेंगे, उतनी ही सूक्ष्मता में परमात्मा को समझेंगे।

संत ज्ञानेश्वरजी ने 'ज्ञानेश्वरी गीता' में आचार्योपासना की व्याख्या में कहा है- "आचार्य के 'उप' माने पास आसन लगाना। जहाँ तुम्हारे गुरु बैठते हैं वहाँ तुम बैठो। तुम्हारे गुरू ईश्वर से एकता का अनुभव करते हैं तो तुम भी वैसा ही अनुभव करो। जितनी गहराई में तुम्हारे गुरू बैठते हैं, उतनी ही गहराई में तुम भी अपना आसन लगाओ।"

बाहर जाकर ईश्वर के पास नहीं बैठा जाता है, बाहर से लौटकर भीतर, हृदय के भी हृदय में, अंतर्देश के भी अंतर्देश में, अपने-आपमें जब हम बैठते हैं, उतने ही हम गुरु के पास बैठते हैं। असल में गुरू और ईश्वर दो अलग-अलग अपने स्वार्थ के कारण ही मालूम पड़ते हैं। बात जरा दो टूक है, पर है सच्ची !

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2010, पृष्ठ संख्या 4, 5, 8 अंक 211

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बुधवार, 10 अगस्त 2011

उसके लिये क्या असम्भव है !......


महर्षि आयोद धौम्य के तीन प्रमुख शिष्यों में से एक थे वेद। वे विद्याध्ययन समाप्त कर घर गये और वहाँ गृहस्थ-धर्म का पालन करते हुए रहने लगे। उनके भी तीन शिष्य हुए जिनमें सबसे प्यारे उत्तंक थे।

उत्तंक का अध्ययन समाप्त हो गया। वे घर जाने लगे। विद्याध्ययन की समाप्ति पर गुरुदक्षिणा अवश्य देनी चाहिए' – ऐसा सोचकर उन्होंने गुरुजी से विनती कीः "गुरुदेव ! मैं आपको क्या दक्षिणा दूँ ? मैं आपका कौन-सा प्रिय कार्य करूँ ?"

गुरु ने बहुत समझाया कि 'तुमने पूरे मन से मेरी सेवा की है, यही सबसे बड़ी गुरुदक्षिणा है।' किंतु उत्तंक बार-बार गुरुदक्षिणा के लिए आग्रह करने लगे, तब गुरु ने कहाः "अच्छा, भीतर जाकर गुरु पत्नी से पूछ आओ। उसे जो प्रिय हो, वही तुम कर दो, यह तुम्हारी गुरुदक्षिणा है।'' यह सुनकर उत्तंक भीतर गये और गुरुपत्नी से प्रार्थना की, तब गुरुपत्नी ने कहाः "राजा पौष्य (जिनके राजगुरु थे वेदमुनि) की रानी जो कुण्डल पहने हुए है, वे मुझे आज से चौथे दिन पुण्यक नामक व्रत (वह व्रत जो स्त्रियाँ पति तथा पुत्र के कल्याण की कामना से रखती हैं) के अवसर पर अवश्य लाकर दो। उस दिन मैं उन कुण्डलों को पहनकर ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहती हूँ।"

यह सुनकर उत्तंक गुरु और गुरुपत्नी को प्रणाम करके पौष्य राजा की राजधानी को चल दिये।

रास्ते में उन्हें धर्मरूपी बैल पर चढ़े हुए इन्द्र मिले। इन्द्र ने कहाः "उत्तंक तुम इस बैल का गोबर खा लो। भय मत करो।'' उनकी आज्ञा पाकर बैल का पवित्र गोबर और मूत्र उन्होंने ग्रहण किया। जल्दी में साधारण आचमन करके वे पौष्य राजा के यहाँ पहुँचे। पौष्य ने ऋषि के आगमन का कारण पूछा। तब उत्तंक ने कहाः "गुरुदक्षिणा में गुरुपत्नी को देने के लिए मैं आपकी रानी के कुण्डलों की याचना करने आया हूँ।"

राजा ने कहाः "आप स्नातक ब्रह्मचारी हैं। स्वयं ही जाकर रानी से कुण्डल माँग लाइये।" यह सुनकर उत्तंक राजमहल में गये। वहाँ उन्हें रानी नहीं दिखीं, तब राजा के पास आकर बोलेः "महाराज ! क्या आप मुझसे हँसी करते हैं ? रानी तो भीतर नहीं हैं।"

राजा ने कहाः "ब्राह्मण ! रानी भीतर ही हैं। जरूर आपका मुख उच्छिष्ट है। सती स्त्रियाँ उच्छिष्ट मुख पुरुष को दिखाई नहीं देतीं।"

उत्तंक को अपनी गलती मालूम हुई। उन्होंने हाथ पैर धोकर, प्राणायाम करके तीन आचमन किया, तब वे भीतर गये। वहाँ जाते ही रानी दिखायी दीं। उत्तंक का उन्होंने सत्कार किया और आने का कारण पूछा।

उत्तंक ने कहाः "गुरुपत्नी के लिए मैं आपके कुण्डलों की याचना करने आया हूँ।"

उसे स्नातक ब्रह्मचारी और सत्पात्र समझकर रानी ने अपने कुण्डल उतारकर दे दिये और यह भी कहा कि "बड़ी सावधानी से इन्हें ले जाना। सर्पों का राजा तक्षक इन कुण्डलों की तलाश में सदा घूमा करता है।" उत्तंक रानी को आशीर्वाद देकर कुण्डलों को लेकर चल दिये।

रास्ते में एक नदी पर वे नित्यकर्म कर रहे थे कि इतने में ही तक्षक मनुष्य का वेश बनाकर कुण्डलों को लेकर भागा। उत्तंक ने उसका पीछा किया किंतु वह अपना असली रूप धारण कर पाताल में चला गया। इन्द्र की सहायता से उत्तंक पाताल में चला गया। इन्द्र को अपनी स्तुति से प्रसन्न करके नागों को जीतकर तक्षक से उन कुण्डलों को ले आये। इन्द्र की ही सहायता से वे अपने निश्चित समय से पहले गुरुपत्नी के पास पहुँच गये। गुरुपत्नी उन्हें देखकर बहुत प्रसन्न हुई और बोलीं- "मैं तुम्हें आशीर्वाद देती हूँ, तुम्हें सब सिद्धियाँ प्राप्त हों।"

गुरुपत्नी को कुण्डल देकर उत्तंक गुरु के पास गये। समाचार सुनकर गुरु ने कहाः "इन्द्र मेरे मित्र हैं। वह गोबर अमृत था, उसी के कारण तुम पाताल में जा सके। मैं तुम्हारे साहस से बहुत प्रसन्न हूँ। अब तुम प्रसन्नता से घर जाओ।" इस प्रकार गुरु और गुरुपत्नी का आशीर्वाद पाकर उत्तंक अपने घर गये।

परमात्मस्वरूप श्री सदगुरुदेव के श्रीचरणों में जिसकी अनन्य श्रद्धा हो, गुरुवचनों पर पूर्ण विश्वास हो एवं गुरु-आज्ञापालन में दृढ़ता हो उसके लिए जीवन में कौन सा कार्य असम्भव है ! आगे चलकर उत्तंक बड़े ही तपस्वी, ज्ञानी ऋषि हुए। भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के अनंतर द्वारका लौटते समय इन्हें अपने महिमामय विराट स्वरूप का दर्शन कराया था।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, अगस्त 2010, पृष्ठ संख्या 11, 25 अंक 212

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