मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

रविवार, 7 अगस्त 2011

पपीहे जैसा नियम हो तो प्रभुप्राप्ति इसी जन्म में हो जाय.....


कोई भी मनुष्य यदि दृढ़ निश्चय कर ले कि आज भगवान अवश्य मिलेंगे तो इसमें कोई संदेह नहीं कि उसे भगवान आज मिलेंगे। ऐसा निश्चय करना तो अपना काम है। इसमें भगवान की दया को भी निमित्त बना लें। जैसे कोई परम मित्र के पहुँचने का तार आ जाय तो हम उसके स्वागत के लिए कितनी व्यवस्था करते हैं और प्रतीक्षा करते हैं, ऐसे ही प्रभुप्राप्ति की प्रतीक्षा करनी चाहिए। प्रभु इस बात को जानते हैं कि कौन उनकी प्रतीक्षा कर रहा है। आज उन्हें सच्चे मन से पुकारेंगे तो आज ही आपसे मिलनि की उन्हें फुर्सत मिल जायेगी।

उसमें दो प्रकार की दशाएँ होती हैं – एक तो आर्तभाव, परम व्याकुलता जैसे मछली को जल से अलग होने पर होती है जड़ तो जड़ है, प्रभु चैतन्य हैं, वे बड़े दयालु हैं। दूसरा भाव प्रेम का है। जैसे मित्र के आने का दृढ़ निश्चय होता है, उसमें प्रसन्नता एवं प्रतीक्षा होती है इसी प्रकार प्रभु में प्रेम होने पर वे अवश्य पहुँच जाते हैं। नियम और प्रेम दोनों रखें। नियम पपीहे का होता है, वह स्वाति की बूँद से ही अपनी प्यास बुझाना चाहता है। बादल बरसें तब भी उसका नियम नहीं टूटता, प्रेम में कमी नहीं आती। यहाँ तक कि उसके प्राण भी चले जायें, तब भी वह नियम नहीं तोड़ता। इसमें बादल तो जड़ हैं, वैसे ही बरस जाते हैं। प्रभु तो चैतन्य हैं और बड़े दयालु हैं, वे अपने प्रेमी को मरने नहीं देते।

इसी प्रकार हम भी नियम ले लें कि सिवाय प्रभु के और कुछ भी नहीं चाहिए। किसी का चिंतन न करें तो हमें प्रभु अवश्य ही मिलेंगे।'हमें कैसे मिलेंगे ?' पहले से ही ऐसा विपरीत निश्चय नहीं करना चाहिए। दृढ़ विश्वास होना चाहिए।

कई लोग सोचते हैं कि अमुक महाराज दया कर दें, कह दें तो हमको ईश्वरप्राप्ति हो जायेगी, भगवान मिल जायेंगे। ऐसी अवस्था में भगवान से मिलने की आवश्यकता ही क्या है, जब किसी के कहने से मिलें।

करोड़ों में कोई एक भगवत्प्राप्त मनुष्य होता है और उनमें भी कोई विरला ही होता है जो भगवान को मिला सके। कोई कहे कि भगवत्प्राप्त पुरुष मार्ग तो बतला सकते हैं। यह ठीक है तो फिर लोग इतने अच्छे मार्ग पर क्यों नहीं चलते ? इसका उत्तर यही है कि इस विषय में उन्हें विश्वास नहीं है। इसी कारण समस्त संसार की यह दशा हो रही है।

बात रही महापुरुष की दया की, भगवान की दया की वह तो सतत रहती ही है। फिर भी काम नहीं होता तो यह मानना पड़ेगा कि हमें उनकी दया में विश्वास नहीं है। हमने उनकी दया को माना नहीं है, बात वास्तव में यही है।

गजेन्द्र, द्रौपदी आदि ने विश्वास से भगवान को बुलाया तो भगवान इनके पास अतिशीघ्र पहुँच गये। यद्यपि इनको दुःख-निवारण की ही आवश्यकता थी।

केवल भगवान से मिलने के लिए भगवान को चाहे तो वह तो बात ही कुछ और होती है। ऐसे भक्त से शीघ्र मिलने की भगवान की भी इच्छा हो जाती है, इसलिए ऐसा समझना चाहिए कि प्रभु की इच्छा तो पूरी होगी ही। हमारी इच्छा पूरी हो इसमें हम लाचार हैं, पर प्रभु की इच्छा पूरी न हो ऐसा नहीं हो सकता।

जब हमारी इच्छा केवल और केवल उनसे मिलने की हो जायेगी तो सारा भार भगवान पर आ जायेगा और ऐसे प्रेमी भक्त के वश होकर भगवान उससे मिल जाते हैं।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, सितम्बर 2010, पृष्ठ संख्या 17,19 अंक 213

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शनिवार, 6 अगस्त 2011

आरम्भ सँवारा तो सँवरता है जीवन...


जीवन का आरम्भिक समय बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। जीवन का पतन और उत्थान बाल्यावस्था के संस्कारों पर ही निर्भर है। बाल्यावस्था व युवावस्था से ही जो व्यक्ति सदगुणों का संग्राहक है, दयालु है, उदार है, कष्टसहिष्णु है, कर्तव्यपरायण तथा प्रेमी है, आगे चलकर वही समाज में एक अच्छा मानव हो सकता है। युवावस्था में ही जो नशीले पदार्थों का व्यसनी हो जाता है तथा जिसमें क्रोध, अभिमान, इन्द्रिय-लोलुपता की प्रधानता है एवं जो काम, क्रोध और रसना के स्वाद के वेग को नहीं रोक पाता, वही आगे चलकर समाज में मानवता को कलंकित करता है। सौभाग्यशाली युवक उसी को समझना चाहिए जो अपने जीवन में आरम्भ से ही सज्जन एवं साधु-महात्माओं के सुसंग से दैवी सम्पत्ति को बढ़ाता है और कुसंग से बचता है।

अपने कर्तव्यकर्मों में सावधान रहना, प्रसन्न रहना, उन्हें विधि के साथ पूर्ण करने का दृढ़ संकल्प लेना – यह सब सफलता का शुभ मुहूर्त है। इसके विपरीत अपने कर्तव्य में आरम्भ से आलस्य करना, खिन्न उदास रहकर बिना मन के कार्य आरम्भ करना – ये सफलता के पथ में अशुभ संकेत हैं, अपशकुन हैं।

सभी का यह अनुभव है कि जिस दिन प्रातः उठने में आलस्यवश देरी हो जाती है, उस दिन शौच, स्नान आदि नित्यकर्म समयानुसार नहीं होते, उस दिन सभी कार्यों में गड़बड़ी, अस्त-व्यस्तता रहती है और जिस दिन समय पर उठने में एवं नित्यनियम पूर्ण करने में आलस्य नहीं रहता, उस दिन सभी कार्य व्यवस्थित ढंग से पूरे होते हैं। वह दिन हँसता हुआ सा प्रतीत होता है।

जिसका आरम्भ सुन्दर, धर्म, नीति और मर्यादा से सुसंबद्ध होकर विधिवत चलता है, उसका भविष्य भला क्यों न सुंदर, पवित्र, सुखमय और मंगलमय होगा ? अवश्य होगा !

जिन व्यक्तियों के हृदय में आरम्भ से केवल शरीर की सुंदरता का तथा शरीर को सुंदर बनाने के लिए वस्त्राभूषणों का और वस्त्राभूषणों के लिए धन का महत्त्व प्रतीत होता है, वे जीवन को सुंदर नहीं बना पाते। ऐसे लोग वस्तुओं एवं व्यक्तियों की दासत में बँधे रहते हैं। यदि बाल्यावस्था एवं युवावस्था के आरम्भ में आलस्य, विलासित, दुर्व्यसन अथवा भोग-कामनाओं को स्थान मिल जाता है, तब उस जीवन का मध्य और अंत भी प्रायः अशुभ एवं असुंदर ही सिद्ध होता है।

मनुष्य का भविष्य प्रकाशपूर्ण होगा या अंधकारपूर्ण, इसका परिचय आरम्भ की गतिविधियों से ही मिल जाता है। आरम्भ में साथ लगा हुआ थोड़ा सा दोष, थोड़ा सा कोई दुर्व्यन, थोड़ी सी चोरी की आदत, थोड़ा झूठ बोलने का स्वभाव, थोड़ी सी कुटेव अथवा कोई भी अनुचित कुचेष्टा आगे चलकर थोड़ी न रह जायेगी। वह उसी प्रकार अपना बड़ा आकार धारण करेगी, जिस प्रकार आरम्भ में थोड़ी सी अग्नि की चिनगारी ईंधन का संयोग पाकर भयानक रूप धारण करती है।

यह समझने की बात है कि आरम्भ में जो कुछ थोड़ा दिखता है, वह आगे कभी थोड़ा नहीं रह जाता। वह चाहे थोड़ा सा दोष हो या साथ चलने वाली कोई थोड़ी सी भूल हो अथवा कोई थोड़ा गुण हो या सुंदर भाव अथवा सदविचार हो या दुर्विचार।

बुद्धिमान मनुष्य को चाहिए की सावधान होकर जो कुछ भी अशुभ, असुंदर, अपवित्र, अनावश्यक एवं अहितकर हो, उसे थोड़े से ही त्याग कर दे। जो थोड़े का त्याग नहीं कर सकता, वह अधिक का त्याग किस प्रकार करेगा ! अतः अधिक होने पर जिसका त्याग अति कष्टकर है उसका थोड़े से ही त्याग करना सुगम है।

जो प्रत्येक कार्य के आरम्भ में आवश्यक एवं हितकर का स्वीकार करना और अहितकर का त्याग करना जानता है, उसी का जीवन आगे चलकर सुंदर और पुण्यशाली होता है।

वैसे तो बाल्यावस्था और युवावस्था का आरम्भ अपने संरक्षकों अर्थात् माता-पिता, भाई, गुरुजनों के अधिकार में रहता है, फिर भी कुछ सयाने बालक अथवा युवक आरम्भ से ही अच्छी बुद्धि से युक्त होते हैं कि जिन्हें स्वयं ही अशुभ, असुंदर, अपवित्र बातों से घृणा होती है और शुभ, सुंदर, पवित्र बातों में अनायास ही प्रीति होती है।

माता-पिता, बड़े भ्राता तथा गुरु का कर्तव्य है कि वे अपनी संतान का आरम्भ से ही किसी प्रकार की अशुद्ध, असुंदर, अपवित्र बातों से संसर्ग न होने दें। बालकों के हृदय एवं मस्तिष्क में आरम्भ से विद्याध्ययन तथा बड़ों के प्रति शिष्टाचार, सदाचार, धर्म एवं ईश्वर का महत्त्व भरना चाहिए।

आरम्भ को सुंदर बनाना, कुसंग तथा कुसंस्कार से दूषित न होने देना, शुभ कर्मों में ही शक्ति का सदुपयोग करना, धर्मतत्त्व, ईश्वरतत्त्व को जानने की अभिलाषा को प्रबल बनाना – ये सौभाग्यवानों में ही देख जाते हैं।

मनुष्य की जीवनगति प्रकाश की ओर है या अंधकार की ओर – इसका ज्ञान दूरदर्शी एवं बुद्धिमान को आरम्भ के दर्शन से ही हो जाता है।

किसी प्रकार के आरम्भ को आलस्य और प्रमाद से बचाकर सुंदर संग से विधिवत् सँभालना ही भविष्य को सुंदर बनाना है।

प्रातःकाल नींद खुलते ही आरम्भ में ही उस परमात्मा का स्मरण कर लो, जिसकी सत्ता से तुम जी रहे हो और सब प्रकार की इच्छाओं की पूर्ति का रस ले रहे हो।

दिन में कार्य आरम्भ करने की विधि को, उसकी मर्यादित गति को और दिन भर के कार्यक्रम को समझ लो। स्मरण न रहे तो आरम्भ में ही सब कार्य लिख लो।

किसी से मिलो तो आरम्भ में सरल भाव से, प्रसन्नचित्त से, गम्भीरतापूर्वक, सुंदर शब्दों में बात करो अधिक बनावटीपन न आने दो और भद्दापन भी मिश्रित न होने दो। किसी से प्रीति का संबंध जोड़ो तो आरम्भ में ही अपनी चाह, अपना स्वभाव या त्रुटि उसके सामने रख दो, उसे आरम्भ में ही तैयार कर लो कि वह तुमसे यदि प्रेम करता है तो तुम्हारी त्रुटियों के साथ, भूलों के साथ, दोषों के साथ किस प्रकार निर्वाह करना होगा। उसे धोखा न दो ताकि विश्वासघात न हो।

जो कार्य आरम्भ करो, प्रारम्भ में ही उसकी पूर्ति के साधन जुटा लो, जो कुछ प्रतिकूलताएँ आ सकती हों, उनका सामना करने के लिए, अपने को सावधान करने के लिए जिन-जिन बातों की आवश्यकता पड़ती हो, उनको साथ लिये रहो। इससे साधन के सिद्ध होने में चूक नहीं होगी। यह तो हुई व्यवहार-जगत की बात, साधना-जगत में तो इससे भी अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2010, पृष्ठ संख्या 25,26 अंक 211

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शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

हर घर अमृत पहुँचाओ, हर दिल दीप जगाओ !...


एक बार विद्वानों की सभा में चर्चा हो रही थी कि जीवन का अमृत कहाँ है ?

एक विद्वान ने कहाः "पूछने की क्या जरूरत है, अमृत तो स्वर्ग में है।"

दूसरे ने कहाः "स्वर्ग में अमृत है तो वहाँ से पतन नहीं होना चाहिए। हम स्वर्ग में वास्तविक अमृत नहीं समझते हैं।"

तीसरे ने कहाः "अमृत चंद्रमा में है।"

चौथे ने कहाः "अगर चन्द्रमा में अमृत है तो उसका क्षय क्यों होता है ?"

किसी ने कहाः "सागर में अमृत है।"

"अगर सागर में अमृत होता तो वह खारा क्यों होता !"

बहुत देर चर्चा चली पर कोई निर्णय नहीं हो पाया। इतने में महाकवि कालिदास जी वहाँ आये। सबने कालिदासजी को प्रणाम किया और कहाः "इस समस्या का हल अब आप ही बताइये।"

उन्होंने कहाः "कंठे सुधा वसति वै भगवज्जनानाम्।

भगवान के प्यारे संतों के कंठ में, उनकी आत्मिक वाणी से ही वास्तविक अमृत होता है। स्वर्ग का अमृत तो क्षोभ से, मंथन से निकला था, वह वास्तविक अमृत नहीं है। संत के हृदय से जो परमात्म-अनुभव, आत्मानंद और ईश्वरीय शांति से ओतप्रोत अमृतवाणी का झरना फूट निकलता है, वही सच्चा अमृत है।"

हमारे जितने भी शास्त्र बने हैं, वे इसी अमृत से बने हैं इसलिए उनमें हर प्रकार के जागतिक लाभ के साथ-साथ आत्मलाभ कराने की भी शक्ति है। उन्हें शास्त्र नहीं, 'सत्शास्त्र' कहा जाता है और उनकी पूजा होती है। जीवन-निर्माण के महत्कार्य में सत्साहित्य नींव का मजबूत पत्थर है, जो भले दिखता न हो पर उसी के आधार पर सफल जीवनरूपी इमारत खड़ी हो सकती है। जैसा साहित्य हम पढ़ते हैं, वैसे ही विचार मन में चलते रहते हैं और उन्हीं विचारों से हमारा सारा व्यवहार प्रभावित होता है। अतः हमें ऐसे साहित्य का अध्ययन करना चाहिए जिससे हमारी शारीरिक, मानसिक, नैतिक, आध्यात्मिक – सर्वांगीण उन्नति हो।

सत्साहित्य की महत्ता को उजागर करती हुई नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के जीवन की एक घटना है। क्लंग की घाटी पर युद्ध में 100 अंग्रेजों का सामना आजाद हिन्द फौज के केवल 3 सैनिक कर रहे थे। सुभाष जी के पास समाचार भेजकर पूछा गया कि क्या सैनिक पीछे हटा लिये जायें ? वे असमंजस में पड़ गये परंतु घबराये नही। उनके जीवन में सत्शास्त्रों का बहुत प्रभाव था। जब भी कठिन परिस्थितियाँ आती थीं तो वे उनकी शरण जाते थे। उस दिन उन्होंने एक सत्साहित्य पढ़ा, जिसमें एक स्थान पर लिखा था - 'सिर पर संकटों के बादल मँडरा रहे हों, तब भी धैर्य नहीं खोना चाहिए।' यह पढ़कर उन्होंने उन तीनों सैनिकों को संदेश भेजाः "भारत माता के वीर सपूतो ! जब तक शत्रु का सफाया नहीं होता डटे रहो। परमात्मा हमारे साथ है।"

इन शब्दों ने सैनिकों के शरीर में जैसे जान ही फूँक दी। वे ऐसे जी-जीन से लड़े कि अंग्रेज सैनिकों के छक्के छूटने लगे। उनके हौंसले पस्त हो गये और वे चौकी छोड़ के भाग गये। यह परिणाम सत्साहित्य के कारण ही आया। इसलिए सत्साहित्य की तो जितनी महिमा गायी जाय उतनी कम है।

पूज्य बापू जी के गुरुदेव पूज्यपाद भगवत्प्राद श्री लीलाशाह जी महाराज का यह विश्वास था कि सत्साहित्य, धर्म एवं नीति के शास्त्र ही मानव-जीवन का निर्माण करने एवं जीवन को उन्नति के पथ पर ले जाने वाले हैं। साहित्य मनुष्य-जीवन, समाज एवं देश में नयी जागृति लाता है। लोगों को सच्ची राह बता के उन्नति के पथ पर चलने के लिए प्रेरित करता है। वे कहते थे कि "सच्चा साहित्य वही है जिसमें 'सत्यं शिवम् सुन्दरम्' के गीत गूँजते हों।"

सत्यम् अर्थात् जो निज स्वरूप का मार्ग बताये, शिवम् अर्थात् जो कल्याणकारी हो, सुंदरम् अर्थात् जो सुंदर जीवन जीने की कला बतायें।

पूज्य संत श्री आशारामजी बापू के कथनानुसार ऐसा साहित्य ही वास्तव में मानव-जीवन का अमूल्य खजाना है। इससे हमें बहुत अच्छा ज्ञान मिलता है, भगवान में प्रेम जागता है, आत्मकल्याण होता है। शरीर को निरोग बनाने, मन को प्रसन्न रखने और बुद्धि को दिव्य बनाने की अदभुत व्यवस्था हमारे सत्शास्त्रों में है। सत्साहित्य में महापुरुषों, गुरुभक्तों और भगवान के लाड़ले संतों की कथाओं व अनुभवों का वर्णन आता है, जिसका बार-बार पठन-मनन करके आप सचमुच महान बन जाओगे। जीवन में सत्साहित्य का महत्त्व बताते हुए युद्ध के मैदान में भगवान स्वयं कहते हैं-

न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।

भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि।।

'(मेरे ज्ञान का जो कोई संसार में प्रचार करेगा) उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है तथा पृथ्वी भर में उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं।' (गीताः 18.61)

स्वामी विवेकानंद कहते थेः 'जिस घर में सत्साहित्य नहीं, वह घर नहीं वरन् श्मशान है।'

पूज्य बापू जी कहते हैं- "मेरे गुरुदेव अस्सी वर्ष की आयु में भी किताबों की गठरी बाँधकर नैनीताल की पहाड़ियों में जाते, सत्संग सुनाते, प्रसाद बाँटते और लोगों को सत्साहित्य पढ़ने को देते। उन्हीं महापुरुष के निष्काम कर्मयोग का फल आज हम लाखों लोगों को मिल रहा है। साधक दिन-रात एक करके सत्साहित्य को लोगों तक पहुँचाने की जो सेवा करते हैं, उससे उनके हृदय में निष्कामता का आनंद उभरने लगता है।"

पूज्य बापू जी के ओजपूर्ण पावन अमृतवचनों के संकलन से बनी पुस्तकें समाज के हर वर्ग के लोगों के सर्वांगीण विकास की कुंजियाँ संजोये हुए हैं। अत्यंत कम कीमत में मिलने वाला यह सत्साहित्य वैचारिक प्रदूषण मिटाने में अत्यधिक कारगर सिद्ध हुआ है। इसके प्रचार-प्रसार से कितने ही घर बरबाद होने से बच गये, कितने ही लोगों की आलसी-प्रमादी और पलायनवादी लोग कर्मनिष्ठ बन गये, व्यसनी-दुराचारी लोग सदाचारी व समाजसेवी हो गये, नास्तिक आस्तिक हो गये, पतन की राह जाने वाले नैतिक, आध्यात्मिक उन्नति की ओर चल पड़े.... इससे समाज, राष्ट्र एवं समग्र विश्व को कितना लाभ हो रहा है, वह लाबयान है ! वे धनभागी हैं, जो सांसारिक कार्यों से समय निकाल के भगवत्प्रसन्नता पाने हेतु पूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी को घर-घर पुण्यात्मा राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रसेवा का अमित पुण्य लाभ भी घर बैठे ही ले रहे हैं। पूज्य श्री का संदेश अब हमें हर घर में पहुँचाना है, हर दिल को जगाना है !

गुरुपूर्णिमा महापर्व पर हम सब संकल्प लें कि मानव-समाज को उन्नति के मार्ग पर ले जाने वाले आश्रम के सत्साहित्य को त्यौहार, जन्मोत्सव, शादी-विवाह आदि शुभ प्रसंगों पर अपने सगे-संबंधियों, मित्रों या अन्य लोगों में वितरित करेंगे। 'घर-घर सत्साहित्य पहुँचाओ' अभियान चलायेंगे और पूज्य श्री की अमृतवाणी से ओतप्रोत सत्साहित्य को घर-घर तक पहुँचाने के भगीरथ सेवाकार्य में अधिक-से-अधिक सहभागी बनेंगे।

(यह सत्साहित्य सभी आश्रमों व समितियों के सेवा-केन्द्रों पर उपलब्ध है।)

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2011, पृष्ठ संख्या 8,9 अंक 223

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गुरुवार, 4 अगस्त 2011

वे पाप जो प्रायश्चितरहित हैं


धर्मराज (मृत्यु के अधिष्ठाता देव) राजा भगीरथ से कहते हैं- "भूपाल ! जो स्नान अथवा पूजन के लिए जाते हुए लोगों के कार्य में विघ्न डालता है, उसे ब्रह्मघाती कहते हैं। जो परायी निंदा और अपनी प्रशंसा में लगा रहता है तथा जो असत्य भाषण में रत रहता है, वह ब्रह्महत्यारा कहा गया है।

जो अधर्म का अनुमोदन करता है उसे ब्रह्मघात का पाप लगता है। जो दूसरों को उद्वेग में डालता है, चुगली करता है और दिखावे में तत्पर रहता है, उसे ब्रह्महत्यारा कहते हैं।

भूपते ! जो पाप प्रायश्चितरहित हैं, उनका वर्णन सुनो। वे पाप समस्त पापों से बड़े तथा भारी नरक देने वाले हैं। ब्रह्महत्या आदि पापों के निवारण का उपाय तो किसी प्रकार हो सकता है परंतु जो ब्राह्मण अर्थात् जिसने ब्रह्म को जान लिया है ऐसे महापुरुष से द्वेष करता है, उसका पाप से कभी भी निस्तार नहीं होता।

नरेश्वर ! जो विश्वासघाती तथा कृतघ्न हैं उनका उद्धार कभी नहीं होता। जिनका चित्त वेदों की निंदा में ही रत है और जो भगत्कथावार्ता आदि की निंदा करते हैं, उनका इहलोक तथा परलोक में कहीं भी उद्धार नहीं होता।

भूपते ! जो महापुरुषों की निंदा को आदरपूर्वक सुनते हैं, ऐसे लोगों के कानों में तपाये हुए लोहे की बहुत सी कीलें ठोक दी जाती है। तत्पश्चात कानों के उन छिद्रों में अत्यंत गरम किया हुआ तेल भर दिया जाता है। फिर ये कुंभीपाक नरक में पड़ते हैं।

जो दूसरों के दोष बताते या चुगली करते हैं, उन्हें एक सहस्र युग तक तपाये हुए लोहे का पिण्ड भक्षण करना पड़ता है। अत्यंत भयानक सँडसो से उनकी जीभ को पीड़ा दी जाती है और वे अत्यंत घोर निरुच्छवास नामक नरक में आधे कल्प तक निवास करते हैं।

श्रद्धा का त्याग, धर्म कार्य का लोप, इन्द्रियसंयमी पुरुषों की और शास्त्र की निंदा करना महापातक बताया गया है।

जो परायी निंदा में तत्पर, कटुभाषी और दान में विघ्न डालने वाले होते हैं वे महापातकी बताये गये हैं। ऐसे महापातकी लोग प्रत्येक नरक में एक-एक युग रहते हैं और अंत में इस पृथ्वी पर आकर वे सात जन्मों तक गधा होते हैं। तदनंतर वे पापी दस जन्मों तक घाव से भरे शरीर वाले कुत्ते होते हैं, फिर सौ वर्षों तक उन्हें विष्ठा का कीड़ा होना पड़ता है। तदनंतर बारह जन्मों तक वे सर्प होते हैं। राजन ! इसके बाद एक हजार जन्मों तक वे मृग आदि पशु होते हैं। फिर सौ वर्षों तक स्थावर (वृक्ष) आदि योनियों में जन्म लेते हैं। तत्पश्चात् उन्हें गोधा (गोह) का शरीर प्राप्त होता है। फिर सात जन्मों तक वे पापाचारी चाण्डाल होते हैं। इसके बाद सोलह जन्मों तक उनकी दुर्गति होती है। फिर दो जन्मों तक वे दरिद्र, रोगपीड़ित तथा सदा प्रतिग्रह लेने वाले होते हैं। इससे उन्हें फिर नरकगामी होना पड़ता है।

राजन् ! जो झूठी गवाही देता है, उसके पाप का फल सुनो। वह जब तक चौदह इंद्रों का राज्य समाप्त होता है, तब तक सम्पूर्ण यातनाओं को भोगता रहता है। इस लोक में उसके पुत्र-पौत्र भी नष्ट हो जाते हैं और परलोक में वह रौरव तथा अन्य नरकों को क्रमश भोगता है।" (नारद पुराणः पूर्व भाग-प्रथम पादः अध्याय 15)

स्रोत - ऋषि प्रसाद - जनवरी २००९

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बुधवार, 3 अगस्त 2011

विवेकशक्ति बढ़ाने के साधन...

(पूज्य बापू जी के सत्संग से)

दस वर्ष की उम्र से लेकर चालीस वर्ष की उम्र तक विवेकशक्ति बढ़ती रहती है। अगर इस उम्र में कोई विवेकशक्ति नहीं बढ़ाता है तो फिर चालीस वर्ष के बाद उसकी विवेकशक्ति क्षीण होती जाती है। जो दस से चालीस वर्ष की उम्र में विवेकशक्ति बढ़ाने की कोशिश करता है उसकी तो यह शक्ति बाद में भी बढ़ती रहती है। 40 वर्ष के बाद भी विवेकशक्ति बढ़ती रहे उसकी एक साधना है। इस साधना को सात विभागों में बाँट सकते हैं। एक तो सत्संग सुनता रहे।

बिन सतसंग बिबेक न होई।

खाने पीने का, इधर-उधर का, अतिथि मेहमान का विवेक नहीं, आत्मा क्या है, जगत क्या है और परमात्मा क्या है ? – इस बात का विवेक।

अविनासी आतम अचल, जग तातैं प्रतिकूल।

आत्मा अविनाशी है, हम अविनाशी हैं और जगत विनाशी है। हम शाश्वत हैं, शरीर और जगत नश्वर है – इस प्रकार का प्रखर विवेक। यह सारी साधनाओं का मूल है।

उसने सब अध्ययन कर लिया, उसने सब पढ़ाई कर ली और सारे अनुष्ठान कर लिये जिसने सांसारिक इच्छाओं का त्याग करके इच्छारहित आत्मा-परमात्मा में आने का ठान लिया – ऐसा तीव्र विवेक ! ईश्वरप्राप्ति के उस तीव्र विवेक को जगाने के लिये ये सात साधन हैं।

दूसरा है सत्शास्त्रों का अध्ययन। तीसरा साधन है प्रातः और संध्या के समय त्रिबन्ध प्राणायाम करके जप। भगवद् ध्यान, भगवत्प्राप्ति का जो साधन या मार्गदर्शन गुरु ने दिया है उसका अभ्यास, इससे विवेक जगेगा। चौथा साधन है कम बोलना, कम खाना और कम सोना, आलस्य छोड़ना। नींद के लिए तो 4-5 घंटे काफी हैं, आलसी की नाईं न पड़े रहें। अति नींद नहीं, आलस्य नहीं, अति आहार नहीं, अति शब्द विलास नहीं। पाँचवाँ है शुद्ध, सात्त्विक भोजन और छठा सारगर्भित साधन हैब्रह्मचर्य पालना, 'दिव्य प्रेरणा प्रकाश' पुस्तक पढ़ना। इसने तो न जाने कितनी उजड़ी बगियाँ गुले-गुलेजार कर दी हैं। कई युवक-युवतियों की जिंदगी मृत्यु के कगार से उठाकर बाहर कर दी। आप लोग भी 'दिव्य प्रेरणा-प्रकाश' पुस्तक पढ़ना और दूसरों तक पहुँचाने की सेवा खोज लेना। सातवाँ साधन है सादगी।

ये सात साधन संसार की चोटों से, मुसीबतों से तो क्या बचायेंगे और आपके जीवन में भगवत्प्राप्ति का दिव्य विवेक भी जगमगा देंगे।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2011, पृष्ठ संख्या 5, अंक 223

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