मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

गुरुवार, 4 अगस्त 2011

वे पाप जो प्रायश्चितरहित हैं


धर्मराज (मृत्यु के अधिष्ठाता देव) राजा भगीरथ से कहते हैं- "भूपाल ! जो स्नान अथवा पूजन के लिए जाते हुए लोगों के कार्य में विघ्न डालता है, उसे ब्रह्मघाती कहते हैं। जो परायी निंदा और अपनी प्रशंसा में लगा रहता है तथा जो असत्य भाषण में रत रहता है, वह ब्रह्महत्यारा कहा गया है।

जो अधर्म का अनुमोदन करता है उसे ब्रह्मघात का पाप लगता है। जो दूसरों को उद्वेग में डालता है, चुगली करता है और दिखावे में तत्पर रहता है, उसे ब्रह्महत्यारा कहते हैं।

भूपते ! जो पाप प्रायश्चितरहित हैं, उनका वर्णन सुनो। वे पाप समस्त पापों से बड़े तथा भारी नरक देने वाले हैं। ब्रह्महत्या आदि पापों के निवारण का उपाय तो किसी प्रकार हो सकता है परंतु जो ब्राह्मण अर्थात् जिसने ब्रह्म को जान लिया है ऐसे महापुरुष से द्वेष करता है, उसका पाप से कभी भी निस्तार नहीं होता।

नरेश्वर ! जो विश्वासघाती तथा कृतघ्न हैं उनका उद्धार कभी नहीं होता। जिनका चित्त वेदों की निंदा में ही रत है और जो भगत्कथावार्ता आदि की निंदा करते हैं, उनका इहलोक तथा परलोक में कहीं भी उद्धार नहीं होता।

भूपते ! जो महापुरुषों की निंदा को आदरपूर्वक सुनते हैं, ऐसे लोगों के कानों में तपाये हुए लोहे की बहुत सी कीलें ठोक दी जाती है। तत्पश्चात कानों के उन छिद्रों में अत्यंत गरम किया हुआ तेल भर दिया जाता है। फिर ये कुंभीपाक नरक में पड़ते हैं।

जो दूसरों के दोष बताते या चुगली करते हैं, उन्हें एक सहस्र युग तक तपाये हुए लोहे का पिण्ड भक्षण करना पड़ता है। अत्यंत भयानक सँडसो से उनकी जीभ को पीड़ा दी जाती है और वे अत्यंत घोर निरुच्छवास नामक नरक में आधे कल्प तक निवास करते हैं।

श्रद्धा का त्याग, धर्म कार्य का लोप, इन्द्रियसंयमी पुरुषों की और शास्त्र की निंदा करना महापातक बताया गया है।

जो परायी निंदा में तत्पर, कटुभाषी और दान में विघ्न डालने वाले होते हैं वे महापातकी बताये गये हैं। ऐसे महापातकी लोग प्रत्येक नरक में एक-एक युग रहते हैं और अंत में इस पृथ्वी पर आकर वे सात जन्मों तक गधा होते हैं। तदनंतर वे पापी दस जन्मों तक घाव से भरे शरीर वाले कुत्ते होते हैं, फिर सौ वर्षों तक उन्हें विष्ठा का कीड़ा होना पड़ता है। तदनंतर बारह जन्मों तक वे सर्प होते हैं। राजन ! इसके बाद एक हजार जन्मों तक वे मृग आदि पशु होते हैं। फिर सौ वर्षों तक स्थावर (वृक्ष) आदि योनियों में जन्म लेते हैं। तत्पश्चात् उन्हें गोधा (गोह) का शरीर प्राप्त होता है। फिर सात जन्मों तक वे पापाचारी चाण्डाल होते हैं। इसके बाद सोलह जन्मों तक उनकी दुर्गति होती है। फिर दो जन्मों तक वे दरिद्र, रोगपीड़ित तथा सदा प्रतिग्रह लेने वाले होते हैं। इससे उन्हें फिर नरकगामी होना पड़ता है।

राजन् ! जो झूठी गवाही देता है, उसके पाप का फल सुनो। वह जब तक चौदह इंद्रों का राज्य समाप्त होता है, तब तक सम्पूर्ण यातनाओं को भोगता रहता है। इस लोक में उसके पुत्र-पौत्र भी नष्ट हो जाते हैं और परलोक में वह रौरव तथा अन्य नरकों को क्रमश भोगता है।" (नारद पुराणः पूर्व भाग-प्रथम पादः अध्याय 15)

स्रोत - ऋषि प्रसाद - जनवरी २००९

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बुधवार, 3 अगस्त 2011

विवेकशक्ति बढ़ाने के साधन...

(पूज्य बापू जी के सत्संग से)

दस वर्ष की उम्र से लेकर चालीस वर्ष की उम्र तक विवेकशक्ति बढ़ती रहती है। अगर इस उम्र में कोई विवेकशक्ति नहीं बढ़ाता है तो फिर चालीस वर्ष के बाद उसकी विवेकशक्ति क्षीण होती जाती है। जो दस से चालीस वर्ष की उम्र में विवेकशक्ति बढ़ाने की कोशिश करता है उसकी तो यह शक्ति बाद में भी बढ़ती रहती है। 40 वर्ष के बाद भी विवेकशक्ति बढ़ती रहे उसकी एक साधना है। इस साधना को सात विभागों में बाँट सकते हैं। एक तो सत्संग सुनता रहे।

बिन सतसंग बिबेक न होई।

खाने पीने का, इधर-उधर का, अतिथि मेहमान का विवेक नहीं, आत्मा क्या है, जगत क्या है और परमात्मा क्या है ? – इस बात का विवेक।

अविनासी आतम अचल, जग तातैं प्रतिकूल।

आत्मा अविनाशी है, हम अविनाशी हैं और जगत विनाशी है। हम शाश्वत हैं, शरीर और जगत नश्वर है – इस प्रकार का प्रखर विवेक। यह सारी साधनाओं का मूल है।

उसने सब अध्ययन कर लिया, उसने सब पढ़ाई कर ली और सारे अनुष्ठान कर लिये जिसने सांसारिक इच्छाओं का त्याग करके इच्छारहित आत्मा-परमात्मा में आने का ठान लिया – ऐसा तीव्र विवेक ! ईश्वरप्राप्ति के उस तीव्र विवेक को जगाने के लिये ये सात साधन हैं।

दूसरा है सत्शास्त्रों का अध्ययन। तीसरा साधन है प्रातः और संध्या के समय त्रिबन्ध प्राणायाम करके जप। भगवद् ध्यान, भगवत्प्राप्ति का जो साधन या मार्गदर्शन गुरु ने दिया है उसका अभ्यास, इससे विवेक जगेगा। चौथा साधन है कम बोलना, कम खाना और कम सोना, आलस्य छोड़ना। नींद के लिए तो 4-5 घंटे काफी हैं, आलसी की नाईं न पड़े रहें। अति नींद नहीं, आलस्य नहीं, अति आहार नहीं, अति शब्द विलास नहीं। पाँचवाँ है शुद्ध, सात्त्विक भोजन और छठा सारगर्भित साधन हैब्रह्मचर्य पालना, 'दिव्य प्रेरणा प्रकाश' पुस्तक पढ़ना। इसने तो न जाने कितनी उजड़ी बगियाँ गुले-गुलेजार कर दी हैं। कई युवक-युवतियों की जिंदगी मृत्यु के कगार से उठाकर बाहर कर दी। आप लोग भी 'दिव्य प्रेरणा-प्रकाश' पुस्तक पढ़ना और दूसरों तक पहुँचाने की सेवा खोज लेना। सातवाँ साधन है सादगी।

ये सात साधन संसार की चोटों से, मुसीबतों से तो क्या बचायेंगे और आपके जीवन में भगवत्प्राप्ति का दिव्य विवेक भी जगमगा देंगे।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2011, पृष्ठ संख्या 5, अंक 223

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मंगलवार, 2 अगस्त 2011

भगवद-उपासना के आठ स्थान...

पूज्य बापू जी के सत्संग-प्रवचन से

भगवान श्रीकृष्ण ने भागवत में कहा कि मेरी उपासना के आठ स्थान हैं। उनमें से किसी में भी लग गये तो भगवदरस, भगवत्प्रीति, भगवत तृप्ति, भगवन्माधुर्य में प्रवेश मिल जाता है।

अर्चायां स्थण्डिलेऽग्नौ वा सूर्ये वाप्सु हृदि द्विजे।
द्रव्येण भक्तियुक्तोऽर्चेत् स्वगुरुं माममायया।।

'भक्तिपूर्वक निष्कपट भाव से अपने पिता एवं गुरूरूप मुझ परमात्मा की पूजा की सामग्रियों के द्वारा मूर्ति में, वेदी में, अग्नि में, सूर्य में, जल में, हृदय में अथवा ब्राह्मण में – चाहे किसी में भी आराधना करे।' (श्रीमद् भागवतः11.27.9)

मूर्तिः मुझ चैतन्य को पाने-जानने के लिए पूजा की सामग्रियों द्वारा देवी-देवता, भगवान, ब्रह्मज्ञानी गुरु आदि की जो मूर्ति है उसमें मेरी पूजा की जा सकती है। मेरी मूर्ति की सेवा पूजा करना और उसको एकटक देखते हुए एकाग्र होना, यह भी मेरी उपासना है।

वेदीः वेदी में आहूति देकर (यज्ञ के द्वारा) वातावरण में शुभ संकल्प फैलाना, ॐ इन्द्राय स्वाहा, इदं इन्द्राय इदं न मम। 'यह इन्द्र के लिए है, मेरा नहीं।' ॐ वरूणाय स्वाहा, इदं वरूणाय इदं न मम। "यह वरूण के लिए है, मेरा नहीं।" 'यह कुबेर के लिए है, मेरा नहीं...' इस प्रकार ममता हटायें। तो ममता हटाने की रीति जो यज्ञों में बतायी गयी, वह भी मेरी उपासना है।

'मेरा नहीं है'.... तो एक तो 'मैं' और दूसरा 'मेरा' ये दोनों माया है। 'वस्तु मेरी नहीं है, फिर शरीर को जो 'मैं' मानता हूँ वह 'मैं' मैं नहीं हूँ। शरीर के बाद भी जो ठहरता है, वह चैतन्य मेरा परमात्मा है।' – इस ढंग की समझ से विधि के द्वारा मेरी पूजा होती है।

अग्निः भगवान बोलते हैं कि अग्नि देवता के ध्यान के द्वारा घृतमिक्षित हवन-सामग्रियों से आहुति देकर की हुई पूजा भी मेरी पूजा है।

सूर्यः अर्घ्यदान, उपस्थान (उपासना, पूजा के निमित्त निकट जाना, सामने आना) तथा आँखें बंद करके सूर्यनारायण का ध्यान करना, इससे बुद्धि भी विकसित होती है और भगवत्साधना भी मानी जाती है।

जलः भगवान कहते हैं कि जलतत्त्व भी मेरा ही स्वरूप है। जल में तर्पण आदि से मेरी उपासना करनी चाहिए। जब मुझे कोई भक्त हार्दिक श्रद्धा से जल चढ़ाता है, तब मैं उसे बड़े प्रेम से स्वीकार करता हूँ। वह भक्त जल में एकदृष्टि (परमात्मदृष्टि) करता है अथवा 'गंगे च यमुने चैव...' कह के पुण्यनदियों का आवाहन करके उस जल से स्नान करता है, 'केशवाय नमः, नारायणाय नमः...' कहकर आचमन लेता है, पंचामृत आदि बनाता है तो जल में यह जो भगवदभाव है, आदरभाव है उससे शांति, पुण्याई होती है। यह भी मेरी पूजा का एक तरीका है।

हृदयः हृदय में मेरी पूजा करें। श्वासोच्छ्वास के साथ मेरा नाम जप करें।
बोलेः भगवान हृदय में हैं तो हृदय बड़ा और भगवान छोटे !

अरे ! भगवान हृदय में उतने लगते हैं लेकिन भगवान की सत्ता अनंत ब्रह्माण्डों में व्याप्त है। बीज छोटा लगता है पर उसमें संस्कार कैसे हैं कि बड़ा वटवृक्ष भी छुपा है उसमें ! एक बीज में कितने वृक्ष छिपे हैं, सारे विज्ञानी मिलकर उसका गणित नहीं लगा सकते, ब्रह्माजी भी नहीं लगा सकते। ऐसे ही एक मनुष्य से कितने मनुष्यों की परम्परा चलेगी, ब्रह्माजी नहीं बता सकते। हरि अनंत हैं तो हरि की हर चीज भी तो अनंत की खबर दे रही है। एक बीज का अंत हो जायेगा क्या ? एक गुठली बोयी आम की, उससे आम का वृक्ष बना और कल्पना करो कि हजार फल लगे उसमें। अब हजार फल खा लो और गुठलियाँ बो दो। फिर हजार पेड़ हुए। उन हजार पेड़ों की गुठलियाँ बो दो, अब उनकी संख्या कितने तक पहुँच सकती है ? एक आम का या एक वटवृक्ष का बीज कितने बीज दे सकता है, इसका कोई अंत है क्या? तो जैसे यह बीज है वैसे ही अनंत की हर चीज अनंत की खबर है। तो आप अपने को जन्मने-मरने वाला मत मानिये। जन्मने-मरने वाले शरीर को जो सत्ता दे रहा है, आप उस चैतन्य को 'मैं' रूप जानिये। इसलिए यह उपासना बताते हैं भगवान।

तो भगवान कहते हैं कि हृदय में मेरा ध्यान करे – चतुर्भुजी रूप का, द्विभुजी रूप का अथवा श्वास अंदर जाय तो उसको देखे, बाहर आये तो गिनती करे, इस प्रकार अंतरंग ध्यान करे। सुख आया, दुःख आया, काम आया, क्रोध आया.... इनको देखे, इनके साथ जुड़े नहीं तो यह भी एक प्रकार की मेरी अंतरंग उपासना है। एक-से-एक प्रभावशाली उपासनाएँ हैं भगवान की।

ब्राह्मणः ब्राह्मणों में मेरी भावना करे, उनमें मेरे स्वरूप को देखे। जो सदाचारी, संयमी ब्राह्मण हैं, वे भगवत्स्वरूप हैं। जो ब्रह्म को जानने का यत्न करते हैं और जिनका खानपान, व्यवहार सात्त्विक है, ऐसे ब्राह्मण देवता में भी मेरा भाव करे और उनके सदगुण ले।

सदगुरुः आठवाँ पूजा-स्थान बताते हुए भगवान बोलते हैं कि इन सब पूजाओं की पराकाष्ठा यह है कि जिन्होंने मुझ सच्चिदानन्द को पाया है, जिनको मेरा साक्षात्कार हुआ है, अवतार लेकर जिनको मैं पूजता हूँ, ऐसे आत्मवेत्ता सदगुरु तो मेरा स्वरूप ही हैं। सदगुरू मेरे भी आदरणीय-पूजनीय होते हैं। मैं अवतार लेकर उनका चेला बनता हूँ। ऐसे सदगुरु की आज्ञा में जिसने तन को, मन को, जीवन को लगा दिया, वह तो मेरे साथ एकाकारता कर लेता है।

पूर्ण गुरु किरपा मिली, पूर्ण गुरु का ज्ञान....

सदगुरू के वचन में शबरी लग गयी, पूरणपोड़ा लग गया और वे भगवान के साथ एकाकार हो गये। तारक सदगुरु मिल गये तो आप सारी उपासनाओं की ऊँचाई पर आ जाओगे। संत कबीर जी भी कहते हैं-

सदगुरु मेरा सूरमा, करे शब्द की चोट।
मारे गोला प्रेम का, हरे भरम की कोट।।


'मैं मराठा हूँ... मैं माई हूँ.... मैं भाई हूँ... मैं दुःखी हूँ..... मैं सुखी हूँ....' – यह भ्रम हो गया है। सुख-दुःख होते हैं मन को, मैं उनको जानने वाला हूँ। ऐसा दृश्य दिखे, ऐसा दिखे, ऐसा दिखे....' वह तो मन को दिखेगा, तेरे को क्या मिलेगा ? तो कभी-कभी मान्याताएँ और सामाजिक वातावरण ऐसा हमको उलझा देता है कि लगता है भगवान को पाना बड़ा कठिन है।

लोग सोचते हैं कि 'बापू जी ने बड़ी तपस्या की। महात्मा बुद्ध ने बड़ी तपस्या की।' नहीं पता था इसलिए बड़ी गधा-मजदूरी की, इधर-उधर भटके थे, पता चला तो यूँ है। मेरे बड़े बापू (भगवत्पाद साँईं श्री लीलाशाहजी महाराज) को जो मेहनत करनी पड़ी, उसका सौवाँ हिस्सा मुझे मेहनत नहीं करनी पड़ी। लेकिन फिर भी जो मुझे अनजाने में पापड़ बेलने पड़े, उसका हजारवाँ हिस्सा भी तुम्हें मेहनत नहीं करनी पड़ती और मौज मार रहे हो ! (सामने बैठे सत्संगियों से) तुम्हारे लिए क्या कठिन है ?सारी तपस्याओं से जो न मिले वह ऐसे ही मिल रहा है हँसते-खेलते, सुनते।

हँसिबो खेलिबो धरिबो ध्यान, अहर्निश कथिबो ब्रह्मज्ञान।
खावे पीवे न करे मन भंगा, कहे नाथ मैं तिसके संगा।।

क्या कठिन है ? नहीं तो रावण सोने की लंका बनाने में सफल हो गया, हिरण्यकशिपु सोने का हिरण्यपुर बनाने में सफल हो गया, ऐसा उनका तप था लेकिन शरीर, मन और बुद्धि तक ही तो पहुँचे ! यह तपोमय बुद्धि, एकाग्रता तो उन्हें मिली किंतु स्वतः सिद्ध जो सुख है वह नहीं मिला। साठ हजार वर्ष तप करके जो पाया उसका आखिर नाश हो गया। अगर इन दोनों सज्जनों को साक्षात्कारी गुरु मिले होते और उनके नजरिये से चले होते तो साल दो साल में ऐसी चीज पाते की जिसका कभी नाश नहीं हो सकता। सदगुरु मिले तो चालीस दिनों में मैंने जो पाया है, उसका कभी नाश नहीं हो सकता। तो भगवान सदगुरू की महिमा बताते हुए कहते हैं कि ऐसे सदगुरु की आराधना, पूजा मेरी एकदम सीधी और सहजता में मेरी प्राप्ति कराने वाली पूजा है।

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जून 2011, पृष्ठ संख्या 17,18,19 अंक 222

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भगवान के भी काम आ जाओ

(पूज्य बापू जी)

जिन्होंने भगवान के सत्स्वभाव को पाया है, चैतन्य स्वभाव को पाया है, आत्मानंद स्वभाव को पाया है, ऐसे सदगुरुओं के नजरिये से ही हमारी मान्यताओं के जाले कटते हैं। नहीं तो शास्त्र और सामाजिक व्यवस्था, हमारे रीति-रिवाज की व्यवस्था हमको ऐसे बंधनों में बाँध देती है कि उधर से निकले तो उधर फँसे, एक से निकले तो दूसरे में फँसे। जैसे मकड़ी जाल बना देती है और जीवों को फँसा देती है, ऐसे ही पत्नी का अपना जाल है, पुत्र का अपना जाल है।

बेटा कहेगाः "पिताजी ! आपका कर्तव्य है हमें पालना, अभी मैं छोटा हूँ, पढ़-लिख लूँ फिर आप भजन करने को जाइये।"

बाप का अपना जाल है कि 'पिता को छोड़कर कहाँ जा रहा बेटा ? पिता की सेवा करना तुम्हारा कर्तव्य है।' सब अपना-अपना उल्लू बनाकर, नोचकर छोड़ देंगे। नेता बोलेगाः 'तुम मेरे काम में आ आओ।' सब अपने-अपने काम में आपको लाकर, निचोड़कर छोड़ देंगे। जब सदगुरु मिलेंगे तो बतायेंगे कि 'दूसरों के काम तो आ गये लेकिन दूसरों के काम वास्तव में वही आता है जो अपना काम निपटाने में सजग रहता है।' नहीं तो जो अपना काम निपटाने में सजग नहीं है, वह दूसरों के काम आने वाला बनकर भी उनके प्रति वफादार नहीं रहेगा। महात्मा बुद्ध ने अपना काम निपटा लिया तो दूसरों के काम अच्छी तरह से आये। संत कबीर जी ने अपना काम निपटाया या हमने अपना काम निपटाया तो अच्छी तरह से दूसरों के काम आते हैं। अगर हम अपना काम भटका देते और किसी पदवी, प्रमाण-पत्र के पीछे लग जाते कि 'ऐसा बनूँ, ऐसा बनूँ...' तो दूसरों के काम हम इतना नहीं आ सकते थे। गरीबों में भंडारे होते हैं न, तो आदिवासी जब बाँटीक हुई सामग्री ले जा रहे होते हैं, तब उनके चेहरे की रौनक देखकर लगता है कि हम जिनके काम आये उनको खुशी हो रही है।

जब हम आपके बीच होते हैं तो चाहें तो आपसे मिलें, लाइन लगवायें। रूपये-पैसे ऐंठना हो तो खूब ऐंठ सकते हैं कि 'इस पर्व में दान का कयह महत्त्व है, वह महत्त्व है...।' लेकिन यह हम आपके धन के काम आये, आपके काम नहीं आये। हम तो आपके काम आने के लिए आपको लाइन में से, इससे-उसमें से रोककर आप जितने भी उन्नत हो सकते हैं, उतना सब प्रकार से यत्न करते हैं।

तो शरीर से समाज के मन से भगवान के और एकांत-सेवन, ईश्वर-उपासना व बुद्धियोग से मनुष्य अपने-आपके काम आता है।

शरीर से भले हम एक-दूसरे के, समाज के काम आये लेकिन अपने को इतना घिस-पिट न डालें कि भगवान के काम न आयें। मन से भगवान के काम आ पायें इसलिए तो शरीर को थोड़ा आराम भी चाहिए, मन को शांति भी चाहिए। भगवान से प्रीति करो तो भगवान के काम आ गये।

समाज के यथायोग्य काम आ जाओ, भूखे को अन्न, प्यासे को पानी, अविद्यावान को विद्या, नासमझ को समझ – कुल मिला के जिसको जैसे यहाँ अभी और बाद में लाभ हो, ऐसी कोशिश करना यह समाज के काम आना है। इसका मतलब यह नहीं कि 'शराबी को अंडे और मांस चाहिए तो उसके काम आ जाऊँ, कामी-विकारी को भोग चाहिए तो उसके काम आ जाऊँ।' यह अर्थ नहीं लगाना, शास्त्र-मर्यादा के अंदर रह के सेवा करना। किसी के काम आ जायें, तो दिवाली के दिन हैं और पाँच हजार रूपये आपको किसी को दान करते हैं। 'किसको दूँ, किसको दूँ ? अरे, पाँच हजार रूपये की फिल्म की टिकटें ले आता हूँ और रेलवे स्टेशन पर कुलियों में बाँट देता हूँ। वे बेचारे खुश हो जायेंगे, मजा आ जायेगा।' तुम्हारे पाँच हजार का तो सत्यानाश हुआ और उनके मन का, नेत्रों का और समाज का सत्यानाश हुआ। यह तुम उनके काम नहीं आये। देश, काल और पात्र देखकर दान करना चाहिए। उसको मजा आ जाय.... नहीं, उसकी उन्नति हो, उसका मंगल हो। मंगल के साथ मजा आता हो तो हरकत नहीं लेकिन अमंगल करके मजा न दिलाओ।

तो शरीर से हम समाज के काम आ गये, माता-पिता, पत्नी आदि लोगों के काम आ गये। मन से हम भगवान को प्रीति करें, उन्हें अपना मानें तो भगवान के काम आ गये और बुद्धि से हम अपने आत्मदेव को जानें। सात्त्विक बुद्धि, राजसी बुद्धि और तामसी बुद्धि – ये तीन गुणों वाली बुद्धि बदलती है लेकिन एक ऐसा तत्त्व है कि तीनों गुणों की बदलाहट को भी जानता है। ऐसा बुद्धियोग करके हम अपने-आपके काम आ जायें। और नित्य नवीन ज्ञान, नित्य नवीन आनंद....। फिर रस के लिए बाहर भटकना नहीं पड़ेगा। इन्द्र कहते हैं कि 'ऐसे आत्मवेत्ता सदगुरू मिल जायें तो परम सौभाग्य की बात है। मुझे सुख लेना है तो अप्सराएँ नाचें, गंधर्व गायें, साजी साज बजायें तब सुख मिलता है, लेकिन जिसने अपने-आपको पा लिया है, जो अपने-आपके काम आ गया है ऐसे महापुरुष की दृष्टि पड़ती है तो मनुष्य को आत्मा का नित्य नवीन रस मिलने लगता है। जैसे चन्द्रमा की नित्य नवीन शीतलता होती है, उससे अनंत गुना नित्य नवीन परमात्म-रस, परमात्म-ज्ञान, परमात्म-प्रेम उन महापुरुष के हृदय में उमड़ता रहता है। चन्द्रमा औषधि को पुष्ट करता है लेकिन महापुरुष की वाणी और दृष्टि हमको पुष्ट करती है।'

स्रोतः ऋषि प्रसाद, जुलाई 2011, पृष्ठ संख्या 22,23 अंक 223

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सोमवार, 1 अगस्त 2011

सबसे उत्तम मार्गदर्शक...


आप यह भली प्रकार जान लो कि कोई भी मनुष्य किसी के मार्गदर्शन बिना केवल अपने बल पर उन्नत नहीं बन सकता। आपका यह अनुभव है कि बाल्यकाल में बोलना आप अपने बल पर नहीं सीखे। माता-पिता आदि से सीखे। चलना भी किसी की मदद से ही सीखे। पढ़ना-लिखना शिक्षकों की मदद से सीखे। तो आनंदमय एवं सफल जीवन कैसे जीना तथा जीवन का वास्तविक लक्ष्य क्या है व उसे कैसे पाना – यह अपने आप कैसे जान सकोगे ? इसके लिए भी किसी मार्गदर्शक की जरूरत है। एक ऐसे मार्गदर्शक, जो कर्तव्य-अकर्तव्य के सच्चे पारखी हों, वैदिक ज्ञान का सार जानने वाले व उसके अनुभवी हों, हमारे सच्चे हितैषी हों, हमारे प्रति करूणावान हों व हमें उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ने हेतु सबल सहारा प्रदान करने में समर्थ हों।

वेद भगवान के वचन हैं-

प्र नूनं ब्रह्मणस्पतिर्मन्त्रं वदत्युक्थ्यम्। यस्मिन्निन्द्रो वरूणो मित्रो अर्यमा देवा ओकांसि चक्रिरे।।
'सचमुच परमात्मा और ब्रह्मज्ञानी महापुरुष ही स्पष्ट एवं प्रशंसनीय मार्गदर्शन देते हैं। उनके मार्गदर्शन में इन्द्रक, वरूण, मित्र और अर्यमा देवों का निवास होता है।' (ऋग्वेदः1.40.5)

जीवन की समस्याओं से हतप्रभ हो इधर-उधर मत भटको, भगवान की शरण में जाओ। वे तुम्हें किन्हीं ब्रह्मनिष्ठ महापुरुष की शरण में जाने की प्रेरणा देंगे या पहुँचा देंगे, जिनकी सीख एवं दिव्य ज्योति तुमको प्रकाशमय कर देगी। आपके अबोध मन में जब भी कर्तव्य-अकर्तव्य का द्वन्द्व उठ खड़ा हो, आप अपने उन समर्थ मार्गदर्शक से उत्तर पाने की लिए जहाँ हो वहीं शांत हो जाओ, उनका सुमिरन करो, आर्त भाव से उन्हें मन-ही-मन प्रार्थना करो। आपको अवश्य मार्ग मिलेगा। वे आपके लिए मार्ग दिखाने वाले, हाथ पकड़कर उस पर ले चलने वाले एवं सर्वश्रेष्ठ लक्ष्य से मिलाने वाले – सब कुछ बनने के लिए तैयार हैं। बस, आप उनके सान्निध्य में आपकी जो ऊँची स्थिति हो जाती है, उसे याद रखकर अपनी श्रद्धा को अधिकाधिक सुदृढ़ बनाते जाना। उनके आज्ञापालन में तत्पर बनते जाना। आज्ञापालन ही श्रद्धा का मापदंड है।

वेद भगवान के अनुसार ब्रह्मज्ञानी गुरु के मार्गदर्शन में इन्द्र, वरुण, मित्र और अर्यमा देवों का मार्गदर्शन भी निहित होता है। इन्द्र ऐश्वर्य, शक्ति, प्रगति और विजय सूचक देता है। वरुण पाप-विमोचक शक्ति का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। मित्र मैत्री और आपसी स्नेह-सौहार्द के सूचक हैं। अर्यमा ऊँच-नीच विभेद व्यवहार और न्यायकारिता के देवता हैं। ब्रह्मज्ञानी महापुरुष के मार्गदर्शन में उपर्युक्त सभी प्रकार की सीख स्वतः समाविष्ट होती है। अतः दैनंदिन जीवन में ब्रह्मज्ञानी महापुरूषों की सीख के अनुसार चलकर आप आत्मोन्नति कर लो। इससे आप हर क्षेत्र में विजय प्राप्त कर सकोगे, पाप से बच जाओगे, जन-जन के प्रति मैत्रीभाव से परिपूर्ण बनोगे और न्याय का आदर्श प्रस्तुत कर सकोगे। इतना ही नहीं, यदि आप उनकी कृपा को पूर्णरूप से झेल लोगे तो मनुष्य-जीवन का सुफल (परमात्म-साक्षात्कार) प्राप्त कर लोगे। आत्मोन्नति के लिए उनके उपदेशों को अपने जीवन का कानून बना लेना चाहिए।

स्रोतः लोक कल्याण सेतु, अप्रैल 2011क, पृष्ठ संख्या 2, अंक 166

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