मासिक साधना उपयोगी तिथियाँ

व्रत त्योहार और महत्वपूर्ण तिथियाँ

25 फरवरी - माघी पूर्णिमा
03 मार्च - रविवारी सप्तमी (शाम 06:19 से 04 मार्च सूर्योदय तक )
06 मार्च -
व्यतिपात योग (दोपहर 14:58 से 07 मार्च दिन 12:02 मिनट तक)
08 मार्च - विजया एकादशी (यह त्रि स्पृशा एकादशी है )
09 मार्च - शनि प्रदोष व्रत
10 मार्च - महा शिवरात्री (निशीथ काल मध्यरात्री 12:24 से 01:13 तक )
11 मार्च - सोमवती अमावस्या (
सूर्योदय से रात्री 1:23 तक )
11 मार्च - द्वापर युगादी तिथि
14 मार्च - षडशीति संक्रांति (पुण्यकाल शाम 4:58 से
सूर्योदय तक)
19 मार्च - होलाष्टक प्रारम्भ
20 मार्च - बुधवारी अष्टमी (
सूर्योदय से दोपहर 12:12 तक)
23 मार्च - आमलकी एकादशी
24 मार्च - प्रदोष व्रत
26 मार्च - होलिका दहन
27 मार्च - धुलेंडी , चैतन्य महाप्रभु जयंती
29 मार्च - संत तुकाराम द्वितीय
30 मार्च - छत्रपति शिवाजी जयन्ती

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

जीवन की संपत्तिः संयम - चैतन्य महाप्रभु (गौरांग) प्रसंग

एक बार चैतन्य महाप्रभु (गौरांग) अपने प्रांगण में शिष्यों के साथ श्रीकृष्ण-चर्चा कर रहे थे और चर्चा करते-करते भाव-विभोर हो रहे थे। पास में एक बड़ा वटवृक्ष था.... घटादार छाया.... मनमोहक वातावरण.. इतने में एक डोली उस वटवृक्ष के नीचे उतरी। उसमें से एक दूल्हा बाहर निकला और विश्राम के लिए वहीं बैठ गया। डोली के साथ बाराती भी थे, वे भी वहीं विश्राम करने लगे। दूल्हे का सुन्दर रूप, उसकी विशाल एवं सुडौल काया, बड़ी-बड़ी आँखें एवं आजानुबाहू.... देखते ही गौरांग बोल उठेः "अरे, यह कितना सुंदर है ! कितना बढ़िया लगता है !लेकिन यह शादी करके आया है। अब यह संसार की चक्की में पिसेगा, भोग विलास से इसका शरीर क्षीण होगा, दुर्बलकाय बनेगा, विषय-विकारों में खपेगा। संसार की चिन्ताओं में अपना जीवन बिताने की इसकी शुरुआत हो रही है। हे कृष्ण ! यह तेरा भक्त हो जाय तो कितना अच्छा हो !" वह दूल्हा कोई साधारण आदमी नहीं था वरन् वे बड़े विद्वान एवं कवि थे। वे कविराज रामचंद्र पण्डित स्वयं थे। उन्होंने गौरांग के ये वचन सुने तो उनके हृदय में तीर की तरह चुभ गये किः 'बात तो सच है।'

वे घर गये। दो दिन घर में रहे तो उन्हें लगा किः 'यह तो सचमुच अपने को खपाने-सताने जैसा है।' तीसरे ही दिन वे गौरांग के पास आये एवं उनके चरणों में गिरकर बोलेः 'हे संतप्रवर ! मुझे बचाइये। ऐसी सुडौल काया है, कुशाग्र बुद्धि है फिर भी यह जीवन विषय विलास में ही खपकर बरबाद हो रहा है। अब मेरी जीवन-गाड़ी की बागडोर आप ही सँभालिये।"

गौरांग का हृदय पिघल गया। उन्होंने कविराज रामचंद्र पंडित को गले से लगा लिया। उन्हें गुरुमंत्र की दीक्षा देकर प्राणायाम-ध्यान की विधि बता दी। थोड़े दिन तक वे गौरांग के साथ रहे एवं उनके अंतरंग शिष्य बन गये। ऐसे अंतरंग शिष्य बने कि गौरांग के मन के भाव जानकर अपने-आप ही तत्परता से उनकी सेवा कर लेते थे। गौरांग को इशारा भी नहीं करना पड़ता था। मानों, वे गौरांग की छायारूप हो गये।

एक बार गौरांग कीर्तन करते-करते ऐसी समधि में चले गये कि एक-दो दिन तो क्या, पूरे सात दिन हो गये, फिर भी उनकी समाधि न टूटी। सब शिष्य एवं विष्णुप्रिया देवी भी चिंतित हो उठी। आखिर इस सत्शिष्य रामचंद्र से कहा गयाः "अब आप ही कुछ करिये।"

उस वक्त गौरांग भाव-भाव में कृष्णलीला में चले गये थे। विहार करते-करते राधाजी का कुंडल यमुना के किनारे गहरे जल में कहीं खो गया था और गौरांग उसे खोजने गये थे। कविराज रामचन्द्र गुरु जी का त्राटक करते हुए उनके ध्यान में तल्लीन हो गये। ध्यान में वे वहीं पहुँच गये जहाँ गौरांग का अंतवाहक शरीर था। अब दोनों मिलकर खोजने लगे। कविराज ने देखा कि राधा जी का कर्णकुंडल किसी लता में फँस गया था। रामचन्द्र पंडित ने खोजा एवं दोनों ने राधाजी को अर्पण किया। राधाजी ने अपना चबाया हुआ तांबूल उनको प्रसाद में दिया वह प्रसाद चबाते ही उनकी आँखें खुली तो उसकी सुगंध चिंता में बैठे हुए समस्त भक्तों तक पहुँच गयी।

भक्त दंग रह गये कि जो आनंद एवं सुगन्ध देवताओं के लिए भी दुर्लभ है, वह राधाजी के प्रसाद की सुवास में है ! यह कितनी सुखदायी, शांतिदायी है !

संत-सान्निध्य एवं संयम में बड़ी शक्ति होती है। रामचन्द्र जा तो रहे थे भोग की खाई में किन्तु गौरांग के वचन सुनकर उनके सान्निध्य में आ गये तो ऐसे महान हो गये कि राधाजी के कर्णकुण्डल खोजने में अंतवाहक शरीर (सूक्ष्म शरीर) से गौरांग के भी सहायक हो गये ! यौवन, धन एवं सौन्दर्य आदि भोग के सभी साधन एकत्रित थे फिर भी गौरांग की कृपादृष्टि को अपना लिया तो भोग छोड़कर योग के रास्ते चल पड़े रामचन्द्र।

श्रद्धा-भक्ति-समर्पण

श्रद्धावान ही शास्त्र और गुरू की बात सुनने को तत्पर होता है। श्रद्धावान ही नेत्र, कर्ण, वाचा, रसना आदि इन्द्रियों को संयम में रखता है, वश में रखता है। इसलिए श्रद्धावान ही ज्ञान को उपलब्ध होता है। उस ज्ञान के द्वारा ही उसके भय, शोक, चिन्ता, अशांति, दुःख सदा के लिए नष्ट होते हैं। श्रद्धा ऐसी चीज है जिससे सब अवगुण ढक जाते हैं। कुतर्क और वितण्डावाद ऐसा अवगुण है कि अन्य सब योग्यताओं को ढक देता है। विनम्र और श्रद्धायुक्त लोगों पर सन्त की करूणा कुछ देने को जल्दी उमड़ पड़ती है।

भक्ति करे कोई सूरमा जाति वरण कुल खोय..... इसीलिए भक्तों के जीवन कष्ट से भरपूर बन जाते हैं। एक भक्त का जीवन ही स्वयं भक्ति शास्त्र बन जाता है। ईश्वर के प्रादुर्भाव के लिए भक्त अपना अहं हटा लेता है, मान्यताओँ का डेरा-तम्बू उठा लेता है।

आज हम लोग भक्तों की जय जयकार करते हैं लेकिन उनके जीवन के क्षण क्षण कैसे बीत गये यह हम नहीं जानते, चुभे हुए कण्टकों को मधुरता से कैसे झेले यह हम नहीं जानते।

संसार के भोग वैभव छोड़कर यदि प्रभु के प्रति जाने की वृत्ति होने लगे तो समझना कि वह तुम्हारे पूर्वकाल के शुभ संस्कारों का फल है। ईमानदारी से किया हुआ व्यवहार भक्ति बन जाता है और बेईमानी से की हुई भक्ति भी व्यवहार बन जाती है।

भगवान का सच्चा भक्त मिलना कठिन है। एक हाथ कान पर रखकर दूसरा हाथ लम्बा करके अपने साढ़े तीन इंच का मुँह खोलकर 'आ....आ....' आलाप करने वाले तो बहुत मिल जाते हैं, लेकिन सच्चे भक्त नहीं मिलते। परमात्मा से मिलने की प्रबल हृदय में होनी चाहिए। ढोलक हारमोनियम की आवाज वहाँ नहीं पहुँच सकती है लेकिन पवित्र हृदय की प्रबल इच्छा की आवाज वहाँ तुरन्त पहुँच जाती है।

ऐसी अक्ल किस काम की जो ईश्वर से दूर ले जाये ? ऐसा धन किस काम का जो लुटते हुए आत्मधन को न बचा सके ? ऐसी प्रतिष्ठा किस काम की जो अपनी ईश्वरीय महिमा में प्रतिष्ठित न होने दे ? परन्तु तथाकथित सयाने लोग उन नश्वर खिलौनों को इकट्ठे करने में अपनी चतुराई लगाते हैं। उनके लिए ईश्वर का बलिदान दे देते हैं पर भक्त ईश्वर के लिए नश्वर खिलौनों का बलिदान दे देता है।

आत्मशान्ति की प्राप्ति के लिए समय अल्प है, मार्ग अटपटा है। खुद को समझदार माननेवाले बड़े बड़े तीसमारखाँ भी इस मार्ग की भूलभूलैया से बाहर नहीं निकल पाये। वे जिज्ञासु धन्य हैं जिन्होंने सच्चे तत्त्ववेत्ताओं की छत्रछाया में पहुँच कर साहसपूर्वक आत्मशांति को पाने के लिए कमर कसी है।

दुःख से आत्यान्तिक मुक्ति पानी हो तो संत का सान्निध्य प्राप्त कर आत्मदेव को जानो। महापुरुषों के चरणों में निष्काम भाव से रहकर उनके द्वारा निर्दिष्ट साधना में लग जाने से लक्ष्यसिद्धि दूर नहीं रहती।

रविवार, 5 सितंबर 2010

अपने को तोलें - " परमपूज्य संत श्री आसारामजी बापू "

सहज जीवन तो महापुरुषों का होता है, जिनके मन और बुद्धि अपने अधिकार में होते हैं, जिनको अब संसार में अपने लिये पाने को कुछ भी शेष नहीं बचा है, जिन्हें मान-अपमान की चिन्ता नहीं होती है | वे उस आत्मतत्त्व में स्थित हो जाते हैं जहाँ न पतन है न उत्थान | उनको सदैव मिलते रहने वाले आनन्द में अब संसार के विषय न तो वृद्धि कर सकते हैं न अभाव | विषय-भोग उन महान् पुरुषों को आकर्षित करके अब बहका या भटका नहीं सकते | इसलिए अब उनके सम्मुख भले ही विषय-सामग्रियों का ढ़ेर लग जाये किन्तु उनकी चेतना इतनी जागृत होती है कि वे चाहें तो उनका उपयोग करें और चाहें तो ठुकरा दें, बाहरी विषयों की बात छोड़ो, अपने शरीर से भी उनका ममत्व टूट चुका होता है | शरीर रहे अथवा न रहे- इसमें भी उनका आग्रह नहीं रहता | ऐसे आनन्दस्वरूप में वे अपने-आपको हर समय अनुभव करते रहते हैं | ऐसी अवस्थावालों के लिये कबीर जी ने कहा है :

साधो, सहज समाधि भली |

हम यदि ऐसी अवस्था में हैं तब तो ठीक है | अन्यथा ध्यान रहे, ऐसे तर्क की आड़ में हम अपने को धोखा देकर अपना ही पतन कर डालेंगे | जरा, अपनी अवस्था की तुलना उनकी अवस्था से करें | हम तो, कोई हमारा अपमान कर दे तो क्रोधित हो उठते हैं, बदला तक लेने को तैयार हो जाते हैं | हम लाभ-हानि में सम नहीं रहते हैं | राग-द्वेष हमारा जीवन है | ‘मेरा-तेरा’ भी वैसा ही बना हुआ है | ‘मेरा धन … मेरा मकान … मेरी पत्नी … मेरा पैसा … मेरा मित्र … मेरा बेटा … मेरी इज्जत … मेरा पद …’ ये सब सत्य भासते हैं कि नहीं ? यही तो देहभाव है, जीवभाव है | हम इससे ऊपर उठ कर व्यवहार कर सकते हैं क्या ? यह जरा सोचें |

कई साधु लोग भी इस देहभाव से छुटकारा नहीं पा सके, सामान्य जन की तो बात ही क्या ? कई साधु भी ‘मैं स्त्रियों की तरफ देखता ही नहीं हूँ … मैं पैसे को छूता ही नहीं हूँ …’ इस प्रकार की अपनी-अपनी मन और बुद्धि की पकड़ों में उलझे हुए हैं | वे भी अपना जीवन अभी सहज नहीं कर पाए हैं और हम … ?

हम अपने साधारण जीवन को ही सहज जीवन का नाम देकर विषयों में पड़े रहना चाहते हैं | कहीं मिठाई देखी तो मुँह में पानी भर आया | अपने संबंधी और रिश्तेदारों को कोई दुःख हुआ तो भीतर से हम भी दुःखी होने लग गये | व्यापार में घाटा हुआ तो मुँह छोटा हो गया | कहीं अपने घर से ज्यादा दिन दूर रहे तो बार-बार अपने घरवालों की, पत्नी और पुत्रों की याद सताने लगी | ये कोई सहज जीवन के लक्षण हैं, जिसकी ओर ज्ञानी महापुरुषों का संकेत है ? नहीं |

मंगलवार, 31 अगस्त 2010

श्रीकृष्ण की गुरूसेवा

गुरू की महिमा अमाप है,अपार है। भगवान स्वयं भी लोक कल्याणार्थ जब मानवरूप में अवतरित होते हैं तो गुरूद्वार पर जाते हैं।
राम कृष्ण से कौन बड़ा, तिन्ह ने भी गुरू कीन्ह।
तीन लोक के हैं धनी, गुरू आगे आधीन।।
द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण अवतरित हुए और कंस का विनाश हो चुका, तब श्रीकृष्ण शास्त्रोक्त विधि से हाथ में समिधा लेकर और इन्द्रियों को वश में रखकर गुरूवर सांदीपनी के आश्रम में गये। वहाँ वे भक्तिपूर्वक गुरू की सेवा करने लगे। गुरू आश्रम में सेवा करते हुए, गुरू सांदीपनी से भगवान श्रीकृष्ण ने वेद-वेदांग, उपनिषद, मीमांसादि षड्दर्शन, अस्त्र-शस्त्रविद्या, धर्मशास्त्र और राजनीति आदि की शिक्षा प्राप्त की। प्रखर बुद्धि के कारण उन्होंने गुरू के एक बार कहने मात्र से ही सब सीख लिया। विष्णुपुराण के मत से 64 दिन में ही श्रीकृष्ण ने सभी 64 कलाएँ सीख लीं।
जब अध्ययन पूर्ण हुआ, तब श्रीकृष्ण ने गुरू से दक्षिणा के लिए प्रार्थना की।
"गुरूदेव ! आज्ञा कीजिए, मैं आपकी क्या सेवा करूँ ?"
गुरूः "कोई आवश्यकता नहीं है।"
श्रीकृष्णः "आपको तो कुछ नहीं चाहिए, किंतु हमें दिये बिना चैन नहीं पड़ेगा। कुछ तो आज्ञा करें !"
गुरूः "अच्छा....जाओ, अपनी माता से पूछ लो।"
श्रीकृष्ण गुरूपत्नी के पास गये और बोलेः "माँ ! कोई सेवा हो तो बताइये।"
गुरूपत्नी जानती थीं कि श्रीकृष्ण कोई साधारण मानव नहीं बल्कि स्वयं भगवान हैं, अतः वे बोलीः "मेरा पुत्र प्रभास क्षेत्र में मर गया है। उसे लाकर दे दो ताकि मैं उसे पयः पान करा सकूँ।"
श्रीकृष्णः "जो आज्ञा।"
श्रीकृष्ण रथ पर सवार होकर प्रभास क्षेत्र पहुँचे और वहाँ समुद्र तट पर कुछ देर ठहरे। समुद्र ने उन्हें परमेश्वर जानकर उनकी यथायोग्य पूजा की। श्रीकृष्ण बोलेः "तुमने अपनी बड़ी बड़ी लहरों से हमारे गुरूपुत्र को हर लिया था। अब उसे शीघ्र लौटा दो।"
समुद्रः "मैंने बालक को नहीं हरा है, मेरे भीतर पंचजन नामक एक बड़ा दैत्य शंखरूप से रहता है, निसंदेह उसी ने आपके गुरूपुत्र का हरण किया है।"
श्रीकृष्ण ने तत्काल जल के भीतर घुसकर उस दैत्य को मार डाला, पर उसके पेट में गुरूपुत्र नहीं मिला। तब उसके शरीर का पांचजन्य शंख लेकर श्रीकृष्ण जल से बाहर आये और यमराज की संयमनी पुरी में गये। वहाँ भगवान ने उस शंख को बजाया। कहते हैं कि उस ध्वनि को सुनकर नारकीय जीवों के पाप नष्ट हो जाने से वे सब वैकुंठ पहुँच गये। यमराज ने बड़ी भक्ति के साथ श्रीकृष्ण की पूजा की और प्रार्थना करते हुए कहाः "हे लीलापुरूषोत्तम ! मैं आपकी क्या सेवा करूँ ?"
श्रीकृष्णः "तुम तो नहीं, पर तुम्हारे दूत कर्मबंधन के अनुसार हमारे गुरूपुत्र को यहाँ ले आये हैं। उसे मेरी आज्ञा से वापस दे दो।"
'जो आज्ञा' कहकर यमराज उस बालक को ले आये।
श्रीकृष्ण ने गुरूपुत्र को, जैसा वह मरा था वैसा ही उसका शरीर बनाकर, समुद्र से लाये हुए रत्नादि के साथ गुरूचरणों में अर्पित करके कहाः
"गुरूदेव ! और जो कुछ भी आप चाहें, आज्ञा करें।"
गुरूदेवः "वत्स ! तुमने गुरूदक्षिणा भली प्रकार से संपन्न कर दी। तुम्हारे जैसे शिष्य से गुरू की कौन-सी कामना अवशेष रह सकती है ? वीर ! अब तुम अपने घर जाओ। तुम्हारी कीर्ति श्रोताओं को पवित्र करे और तुम्हारी पढ़ी हुई विद्या नित्य उपस्थित और नित्य नवीन बनी रहकर इस लोक तथा परलोक में तुम्हारे अभीष्ट फल को देने में समर्थ हों।"
गुरूसेवा का कैसा सुंदर आदर्श प्रस्तुत किया है श्रीकृष्ण ने ! थे तो भगवान, फिर भी गुरू की सेवा उन्होंने स्वयं की है।
सत्शिष्यों को पता होता है कि गुरू की एक छोटी सी सेवा करने से सकामता निष्कामता में बदलने लगती है, खिन्न हृदय आनंदित हो उठता है, सूखा हृदय भक्तिरस से सराबोर हो उठता है। गुरूसेवा में क्या आनंद आता है, यह तो किसी सत्शिष्य से ही पूछकर देखें।
गुरू की सेवा साधु जाने, गुरूसेवा कहाँ मूढ़ पिछानै।
गुरूसेवा सबहुन पर भारी, समझ करो सोई नरनारी।।
गुरूसेवा सों विघ्न विनाशे, दुर्मति भाजै पातक नाशै।
गुरूसेवा चौरासी छूटै, आवागमन का डोरा टूटै।।
गुरूसेवा यम दंड न लागै, ममता मरै भक्ति में जागे।
गुरूसेवा सूं प्रेम प्रकाशे, उनमत होय मिटै जग आशै।।
गुरूसेवा परमातम दरशै, त्रैगुण तजि चौथा पद परशै।
श्री शुकदेव बतायो भेदा, चरनदास कर गुरू की सेवा।।
हरि सेवा कृत सौ बरस, गुरू सेवा पल चार।
तो भी नहीं बराबरी, बेदन कियो विचार।।

**** आश्रम द्वारा प्रकाशित पुस्तक "श्रीकृष्ण-जन्माष्टमी" से लिया गया प्रसंग *****

बुधवार, 14 जुलाई 2010

मौनः शक्तिसंचय का महान स्रोत

मौन शब्द की संधि विच्छेद की जाय तो म+उ+न होता है। म = मन, उ = उत्कृष्ट और न = नकार। मन को संसार की ओर उत्कृष्ट न होने देना और परमात्मा के स्वरूप में लीन करना ही वास्तविक अर्थ में मौन कहा जाता है। वाणी के संयम हेतु मौन अनिवार्य साधन है। मनु्ष्य अन्य इन्द्रियों के उपयोग से जैसे अपनी शक्ति खर्च करता है ऐसे ही बोलकर भी वह अपनी शक्ति का बहुत व्यय करता है। मनुष्य वाणी के संयम द्वारा अपनी शक्तियों को विकसित कर सकता है। मौन से आंतरिक शक्तियों का बहुत विकास होता है। अपनी शक्ति को अपने भीतर संचित करने के लिए मौन धारण करने की आवश्यकता है।


कहावत है कि न बोलने में नौ गुण। ये नौ गुण इस प्रकार हैं।
1. किसी की निंदा नहीं होगी।
2. असत्य बोलने से बचेंगे।
3. किसी से वैर नहीं होगा।
4. किसी से क्षमा नहीं माँगनी पड़ेगी।
5. बाद में आपको पछताना नहीं पड़ेगा।
6. समय का दुरूपयोग नहीं होगा।
7. किसी कार्य का बंधन नहीं रहेगा।
8. अपने वास्तविक ज्ञान की रक्षा होगी। अपना अज्ञान मिटेगा।
9. अंतःकरण की शाँति भंग नहीं होगी।


मौन के विषय में महापुरूष कहते हैं।


सुषुप्त शक्तियों को विकसित करने का अमोघ साधन है मौन। योग्यता विकसित करने के लिए मौन जैसा सुगम साधन मैंने दूसरा कोई नहीं देखा। - परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू


ज्ञानियों की सभा में अज्ञानियों का भूषण मौन है। - भर्तृहरि


बोलना एक सुंदर कला है। मौन उससे भी ऊँची कला है। कभी-कभी मौन कितने ही अनर्थों को रोकने का उपाय बन जाता है। क्रोध को जीतने में मौन जितना मददरूप है उतना मददरूप और कोई उपाय नहीं। अतः हो सके तब तक मौन ही रहना चाहिए। - महात्मा गाँधी